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नैमिषारण्य, जिसे मैंने देखा


मैं अनेक बार लखनऊ से नैमिषारण्य जा चुका हूँ। लोग इसे संक्षेप में नैमिष कहते हैं। स्थानीय बोलचाल में इसका नाम नीमसार है। कल वैशाख कृष्ण त्रयोदशी 2076 तदनुसार 02 मई 2019 को फिर मैं नैमिषारण्य में था। यह उत्तर प्रदेश के लखनऊ से 85 कि. मी. दूर गोमती नदी के किनारे स्थित है। यह एक वैष्णव तीर्थ है। मेरे दीक्षा गुरु के दादा गुरु राजेन्द्र सूरी परमहंस इसी क्षेत्र से चलकर तरेत, पटना, बिहार तक पहुँचे थे। मैंने ललिता देवी मंदिर से दर्शन आरम्भ किया। इसकी गणना 108 शक्तिपीठों में होती है। यहाँ सती का हृदय गिरा था। मंदिर के गर्भगृह में पायजामा और पैंट पहने पंडित मिले। पता चला कि यह मंदिर सरकार द्वारा अधिग्रहीत है। मैंने वहाँ बैठे अन्य पुजारियों से मंदिर के पुजारियों के पहनावे के निर्धारण के बारे में पूछताछ की। वे संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके। कुल मिलाकर हिन्दुओं का यह मंदिर अब कोई धार्मिक स्थल नहीं होकर पर्यटन स्थल बनकर रह गया है। विगत यात्रा में मैंने पाया था कि यहाँ के पुजारियों को एक भी शुद्ध श्लोक या मंत्र नहीं आता है। मुझे यह जानकर काफी क्षोभ हुआ कि यह तीर्थ कहाँ से कहाँ पहुँच गया। जिस महर्षि व्यास तथा शौनक आदि ऋषियों ने ज्ञान सत्र के आयोजन के लिए इस स्थान का चयन किया, जहाँ सूत जी ने शौनक आदि 88 हजार ऋषियों को 18 पुराणों की कथा सुनायी।


 यहाँ हिन्दुओं के  देवता, तीर्थ, जीवन पद्धति, संस्कृति आदि में नयी क्रान्ति आयी। जिन ऋषियों ने वेद विरूद्ध विचारधारा को भारत के बाहर खदेड़ने के लिए पुराण रूपी हथियार हमें दिये।  वह धरा भोगी तथा स्वार्थी लोगों के चंगुल में कैसे फँस गयी
? यदि आप स्मृतियों और पुराणों से ऊपजी वैचारिक क्रान्ति और उसके प्रभाव को ठीक से समझ रहे होंगें तो इस नैमिषारण्य को आप उसी दृष्टि से खोजेंगें। संक्षेप में यहाँ मैं इतना ही कहूँगा कि भगवान् वेद व्यास ने यहाँ रहकर एक ऐसी कथामयी विचारधारा को लिखा, जो वेदों की कथामयी व्याख्या थी। वे कथानक गीत, नाट्य, कथा साहित्य आदि  के माध्यम से हर भारतवासी तक पहुँचा। इसे कहने और समझने के लिए लाखों ऋषि यहाँ इकठ्ठे होते थे। उत्तर वैदिक काल में यह स्थान देश में एक नयी तरह की ज्ञान क्रान्ति लाने में सफल हुआ। वैदिक देवता, सैकड़ों वर्षों तक चलने वाले श्रौत याग के स्थान पर पौराणिक देवता, लघुतम व्रतों, त्यौहारों  की व्यवस्था दी गयी। ये व्यवस्थायें केवल लिखित रूप में नहीं रह जाये इसके लिए यहाँ व्यूह रचना होती रही। प्रचारकों की टोली खड़ी की गयी। दान पुण्य की अवधारणा को स्पष्ट किया गया। ऐसी व्यवस्था खड़ी की गयी, जिससे हजारों वर्षों तक सनातन परम्परा अक्षुण्ण रह सके। यहीं वृत्र असुर को परास्त करने के लिए महर्षि दधीचि ने  इन्द्रादि देवताओं को अस्थि दान किया। यहाँ रहकर ऋषि शस्त्र और शास्त्र दोनों के द्वारा सनातन परम्परा की रक्षा में लगे रहे।
मैं अपनी नजरिये से नैमिष को देखना और ढ़ूढ़ना चाह रहा था । मैं उस व्यास की खोज में था, जो मूल रहस्य को हमेशा विस्तार करके समझता है। मैं माता आनन्दमयी पौराणिक एवं वैदिक अध्ययन तथा अनुसंधान संस्थान की खोज में भी था। मैं इस नैमिष को उस क्रम से देखने की कोशिश में था, जिस क्रम से हिन्दू जीवन दर्शन का विकास हुआ। मुझे सृष्टि के आरम्भकर्ता मनु शतरूपा से व्यास और शौनक होते आदि गंगा गोमती का अविरलता, निर्मलता का स्पर्श करते भावी व्यास को खोजना था।
यहाँ से आगे चक्रतीर्थ होते हुए मैं व्यास गद्दी तक पहुँचा। यहाँ के युवा पंडित थोड़े बहुत संस्कृत जानते थे। वे आचार्य की उपाधि ले रखे थे। पास में ही मनु शतरूपा तपस्थली है। दिन चढ़ने लगा था। चारों ओर सन्नाटा पसरने लगा था। लंगूर और कुत्ते के बीच रह रहकर नोक झोंक हो जा रहा था। बल्लभाचार्य की गद्दी की ओर जाने वाले रास्ते में भी सन्नाटा था।  
व्यास गद्दी के समीप एक संस्कृत विद्यालय का बोर्ड लगा था। मैं नहर के किनारे- किनारे सूनसान पेड़ पौधे से भरे रास्ते से होकर उस विद्यालय की ओर चल पड़ा। काफी दूर खरंजे के रास्ते चलते हुए एक पुराने हनुमान मंदिर तक पहुँचा। यहाँ पर्यटन विभाग ने आगन्तुकों के लिए बेंच आदि लगा रखा है। नैमिषारण्य से लगभग दूर शांत, एकांत स्थान पर एक संत ने आकर तप किया था। संतों के तीन पीढ़ियों की समाधि बनी है। वहाँ के सेवादार ने बताया कि परिक्रमा का आरंभ यहीं से होता है। इसे किसी दमिंदार ने 25 बीघे जमीन दान में दिया था। नगर पालिका मंदिर की पूजा अर्चना तथा देखरेख के लिए किसी को नियुक्त कर देती है। उन्होंने यहाँ का इतिहास बताया। उन्होंने कहा कि नहर के किनारे - किनारे चलकर संस्कृत विद्यालय पहुँचा जा सकता है। मैं वहाँ से वापस व्यास गद्दी की ओर लौटा।
नहर के किनारे - किनारे चलकर विद्यालय तक पहुँचा, जो गोमती नदी के किनारे अवस्थित है। इतना अच्छा सुरम्य वातावरण मैंने अभी तक नहीं देखा था। सूर्य के आतप से झुलसती गर्मी में भी यहाँ की ठंढ़ी हवा शहरी जीवन को नारकीय जीवन बता रही थी। विशाल वृक्षों के नीचे यज्ञशाला, गोशाला तथा संस्कृत विद्यालय ऋषिकुल का दिव्य दर्शन करा रहा था। इस विद्यालय का नाम श्री सूर्येश्वरनारायण लक्ष्मीनारायण गुरुकुल संस्कृत विद्यापीठ,  मौनी कुटीर, मणि पर्वत, नैमिषारण्य, सीतापुर है। इसे आचार्य अनुज कुमार मिश्र संचालित कर रहे हैं। सम्पर्क- 9450902349  । विद्यालय में प्रथमा कक्षा के 10-12 बच्चे अध्ययन करते हुए मिले। अभी इस विद्यालय को मान्यता नहीं मिली है। विद्यालय के छात्रों से पुस्तकें पढ़ाकर देखा । उनका उच्चारण शुद्ध था। सम्बन्धित कक्षा के पाठ्यपुस्तकों के बारे में पूछताछ किया। संस्कृत व्याकरण की पुस्तक लघुसिद्धान्त कौमुदी तथा तर्क संग्रह से प्रश्न पूछा । बच्चों ने समुचित जबाब दिया। छोटे बच्चे अंग्रेजी का अभ्यास करते दिखे। यहाँ  का वातावरण अति सुखद तथा शान्त था। शेष बच्चे परीक्षा दे लेने के कारण अपने घर जा चुके थे। इस विद्यालय में संसाधन की भारी कमी थी। आर्थिक परेशानियों से जुझते हुए भी यह विद्यालय संस्कृत के प्रति हमें आश्वस्त करता है। मुझे लगा कि मैं गोमती से दूर हूँ। मैंने वहाँ के आचार्यों से अनुमति मांगी कि चलकर गोमती का दर्शन कर लूँ। परन्तु यह क्या? मैं तो गोमती के तट पर खड़ा था। सामने ही सीढ़ी थी। सीढ़ी के दोनों ओर घने पेड़। इन वृक्षों की छाया में गोमती के किनारे बैठने का आनन्द ही कुछ और था। कहीं कोई शोर नहीं । चिड़ियों की चहचहाहट, ठंढ़ी हवा गोमती के उसपार वनाच्छादित प्रदेश पारलौकिक आनन्द की अनुभूति करा रहा था। मैंने यहीं दोपहर व्यतीत करने का निश्चय किया। लखनऊ में गोमती तो नाला बनकर रह गयी है। यहाँ के गोमती का पानी इतना स्वच्छ कि एक मीटर नीचे की वस्तुएँ साफ दिख जाय। मैंने जल हाथ में लेकर आचमन किया। स्वादिष्ट जल। गर्मी से बचने के लिए सीपी घाट के तटों पर आ गयी थी। मैं कुछ देर यहाँ रुका रहा। हैंडपम्प का जल पीया। RO जल और इसमें बहुत अंतर नहीं था। अब आगे बढ़ने का निश्चय किया।
इसके आगे हनुमान गढ़ी पहुँचा। कुछ देर यहाँ भी रुका,क्योंकि मध्याह्न का धूप काफी तेज थी। मैं इसके समीप अनन्त श्री वासुदेव संस्कृत महाविद्यालय कई बार जा चुका हूँ। अतः इस बार वहाँ नहीं गया। हनुमान गढ़ी के पीछे के रास्ते गोमती के घाट तक पहुँचा। इस बार मछलियों को दाना नहीं दे सका। प्रचण्ड आतप से हरेक तीर्थयात्रियों को वृक्षों के छांव तले रूकने को विवश कर रखा था। कहता चलूँ कि नैमिषारण्य तीर्थ सीतापुर जनपद के अन्तर्गत आता है। इस तीर्थ नगरी के आस- पास कभी संस्कृत के विद्वानों का बोल बाला हुआ करता था। यहाँ के कुछ विद्यालय अति प्रसिद्ध थे। पवित्र तीर्थ नैमिषारण्य के निकट हरदोई जनपद के संडीला निवासी पंडित शिव गोविन्द त्रिपाठी तथा इनके पुत्र शिव सागर त्रिपाठी तथा शिव प्रसाद त्रिपाठी संस्कृत काव्य रचना में प्रवीण तथा हैं। इस क्षेत्र के संस्कृतज्ञ आयुर्वेद के ज्ञाता भी होते हैं। अस्तु ।
       मेरे पास समय अधिक शेष नहीं था। उसी दिन लखनऊ लौटना भी था अतः देव दर्शन करने के साथ साथ संस्कृत विद्यालयों की स्थिति भी देखते जाना था।  यहाँ से मुझे रुद्रावर्त होते लखनऊ जाना था। सुना था कि रुद्रावर्त कुण्ड में विल्वपत्र पानी के नीचे चला जाता है तथा चढ़ाया गया फल ऊपर तैरता रहता है। मैं यहाँ से जल्द निकल लिया।  मध्याह्न के 3.30 हो चुके थे।
        भाजपा नीत की सरकार उत्तर प्रदेश में एक नया संस्कृत विश्वविद्यालय स्थापना करने की घोषणा की है। पहले अयोध्या में खोले जाने पर विचार हो रहा था। पुनः स्थान परिवर्तन होकर नैमिषारण्य में खोले जाने पर विचार होने लगा। मुझे लगता है कि इस प्रदेश में एक और संस्कृत विश्वविद्यालय की आवश्यकता नहीं है। संपूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से सम्बद्ध महाविद्यालय तथा उत्तर प्रदेश माध्यमिक संस्कृत शिक्षा बोर्ड से सम्बद्ध संस्कृत माध्यमिक विद्यालयों की स्थिति बहुत अधिक खराब है। संस्कृत के विद्यालय और महाविद्यालय शिक्षक विहीन होते जा रहे हैं। शिक्षक विहीन विद्यालयों में दूसरे विद्यालयों को शिक्षकों को संबद्ध कर किसी तरह विद्यालय को संचालित करने की कोशिश की जा रही है। विद्यालयों के भवन को देखकर मन भय से काँप उठता है। जिन विद्यालयों ने एक से बढ़कर एक कीर्तिमान स्थापित किये उसे खंडहर में परिणत होता देख किसी भी संस्कृत प्रेमी का मन उद्वेलित हो जाएगा। यहाँ पढ़ रहे बच्चों की दुरवस्था देख बस एक ही इच्छा होती है कि जावन को इनकी सेवा में समर्पित कर दूँ। जब ये विद्यालय और यहाँ के छात्र इस त्रासदी में जी रहे हों तो एक और विश्वविद्यालय को खोले जाने का निर्णय अदूरदर्शी ही प्रतीत होता है। अच्छा होता कि पहले माध्यमिक शिक्षा को मजबूत करने पर ध्यान दिया जाता। जब नीचे की कक्षा में छात्र ही नहीं हो तो उच्च कक्षा में कौन पढ़ने जाएगा। इसका ज्वलंत उदाहरण माता आनन्दमयी पौराणिक तथा वैदिक अध्ययन एवं अनुसंधान संस्थान मेरे सम्मुख था। इसके भीतर प्रवेश करने पर सूनसान नजारा था। गेट के आगे दूर दूर तक कहीं कोई दिखाई नहीं दिया। परिसर के अंत में एक सेवक मिला, जिसने जानकारी दी कि यह अनुसंधान संस्थान केवल परीक्षा के समय खुलता है। पुस्तकालय के बाहरी दीबार पर सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय के अवकाश की सूची चस्पा मिली। इस संस्थान की स्थापना उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल 
एम. चेन्ना रेड्डी तथा अन्य शीर्षस्थ व्यक्तियों द्वारा की गयी। स्वामी नारदानन्द तथा अन्य महानुभावों ने इसके लिए भूमि दान में दिया। इसका शिलापट मुख्य गेट पर लगा है। 40 वर्षों में ही इस संस्थान की यह दुर्गति हो जाएगी किसी ने सोचा तक नहीं होगा। इसके पास में अनन्त श्री वासुदेव संस्कृत माध्यमिक तथा महाविद्यालय है। यहाँ मैं गुरुपूर्णिमा के अवसर पर पहले भी जा चुका था। यहाँ भी एक मात्र शिक्षक नियुक्त हैं तथापि यहाँ अध्ययन- अध्यापन का माहौल है।
 

   माता आनन्दमयी पौराणिक तथा वैदिक अध्ययन एवं अनुसंधान संस्थान से आगे बढ़ते हुए स्वामी नारदानन्द आश्रम है। स्वामी नारदानन्द जी महाराज ने साधकों के लिए एक आश्रम बनवाया था। यह गोमती तट से सटा हुआ है।इस  आश्रम के समीप ब्रह्मचारियों को संस्कृत की शिक्षा देने के लिए ब्रह्मचर्याश्रम संस्कृत विद्यालय की स्थापना की थी। इस विद्यालय का विशाल परिसर इसके गौरवपूर्ण अतीत का बोध कराता है। कभी यहाँ सैकड़ों की संख्या में ब्रह्मचारी संस्कृत शिक्षा प्राप्त करते थे। यह नैमिषारण्य का सबसे समृद्ध और भव्य विद्यालय था। पूरे परिसर में प्रथमा कक्षा में अध्ययन करने वाले कुल 4 छात्र मिले। छात्रों से कुशल वार्ता कर शिक्षा की जानकारी ली। देखरेख के अभाव में बच्चे मैले वस्त्र धारण किये मिले। छात्रावास की टूटी हुए खिड़कियाँ, खंडहर बनते भवन शिक्षा के पतन की गाथा कह रहे थे। छात्रावास में रहने वाले छात्रों के सोने के लिए सिमेंट से ढालकर बनाया गया चौकी, बच्चों की पुस्तकें रखने के लिए बनायी गयी आलमारी सबकुछ अवस्था प्राप्त कर लेने के कारण हमसे विदा लेने को व्याकुल दिखा। छात्रों के भोजन, जलपान की भी समुचित व्यवस्था नहीं थी। इन सारी असुविधाओं के बाद भी वहाँ रहकर बटुक विद्या का अभ्यास कर रहे हैं। संस्कृत विद्या और भारतीय संस्कृति से प्रेम करने वाले लोगों को चाहिए कि एऐसे संस्कृत विद्यालयों को गोद लेकर वहाँ शिक्षा और संसाधनों पर कुछ खर्च करें। इससे हमारी हिन्दू संस्कृति जीवन्त रह सके। हर हिन्दू भारतीयों को याद रखना चाहिए, जबतक संस्कृत विद्या जीवित है तभी तक हिन्दू संस्कृति भी जीवित है। अप्रैल से जुलाई के मध्य इन विद्यालयों में जाकर अपने सामर्थ्य के अनुसार पुस्तकें, वस्त्र, खाद्यान्न आदि दान देकर इन विद्यालयों को पोषण करना चाहिए। तीर्थ यात्रा का सच्चा फल तभी मिलेगा। मैंने इस परिसर का चित्र लेना उचित नहीं समझा। सच में इसकी दुरवस्था देखकर मुझे रोने का मन करने लगा था। मैं कुछ पल के लिए अपने अतीत में खो गया था। भवन का जीर्णोद्धार होते भी देखा। शौचालय और स्नानगार पर्याप्त मात्रा में बन चुके हैं।
 रेलवे स्टेशन पार करते हुए श्री ललितादेवी ऋषिकुल संस्कृत माध्यमिक विद्यालय, नैमिषारण्य तक पहुँचा। वैशाख कृष्ण त्रयोदशी के दिन कोई सरकारी अवकाश नहीं होने के बावजूद यह विद्यालय बंद था। आसपास पता करने पर पता चला कि यह विद्यालय त्रयोदशी के कारण बंद है आगे यह द्वितीया को खुलेगा। अर्थात् 2 मई 2019 से लेकर 5 मई 2019 तक यह विद्यालय बंद रहेगा। खैर, शिक्षा विभाग आँखें बंद कर क्यों सो रहा है,यह पूछा जाना चाहिए। जहाँ विना अवकास के स्कूल बंद रहता हो वहाँ विश्वविद्यालय के बारे में चर्चा का विचार किसी को भी अचरज में डाल सकता है। एक और बात मैंने यहाँ देखी, वह यह कि जिस विद्यालय को सरकारी मान्यता मिली है, वह अपनी अवस्था को प्राप्त है। जिसे मान्यता नहीं मिली वह ठीक- ठाक संचालित है। अब मैं तिराहे पर पहुँच चुका था। इसके आगे रुद्रावर्त के रास्ते में ज्ञान स्थली देववाणी संस्कृत विद्यापीठ मिला। यह सदा शिव आश्रम तिराहा रोड, निकट पी. डब्लू. डी. गेस्ट हाउस के निकट संचालित है। विद्यालय मान्यता प्राप्त नहीं है। यहाँ भी प्रथमा कक्षा के छात्र मिले। इसे तीन वर्ष पूर्व आरम्भ किया गया था। विद्यालय की व्यवस्था एवं शिक्षा अच्छी है। विद्यालय में नामांकन के लिए पम्पलेट छपवाया गया है। प्रवेश के लिए 6393623476,9455776101,795136117, 7268905380 पर सम्पर्क किया जा सकता है। यहाँ हिन्दी, अंग्रेजी एवं गणित आदि की भी शिक्षा दी जाती है। विद्यालय के आचार्य की पत्नी तथा पुत्रियाँ बच्चों का देखभाल करती है। यहाँ भोजन, स्वास्थ्य आदि का ध्यान रखा जाता है। मैंने इनसे संस्कृत विद्यालय को सोशल मीडिया द्वारा प्रचारित करने का सुझाव दिया।
 यहाँ के एक अन्य मधुर कृष्ण बाला जी संस्कृत आवासीय विद्यालय नैमिषारण्य सीतापुर में मैं नहीं जा सका। इस विद्यालय में प्रवेश हेतु सम्पर्क - 9532271168 , 8090194640,  9532271168 
नैमिषारण्य के विद्यालय में मुझे एक बात दिखी। यहाँ लोक से जुड़े विषयों यथा ज्योतिष, कर्मकाण्ड, वेद आदि की शिक्षा भी दी जाती है। काशी में शास्त्रों की शिक्षा और यहाँ लोक जीवन से जुड़ी शिक्षा।  आधुनिक विषय का एक शिक्षक ने मुझे बताया कि जब भी मैं छात्रों को ज्योतिष कर्मकाण्ड जैसे विषय से दूर रहने की सलाह देता हूँ, छात्र यहाँ से वापस लौट जाते है। तीर्थों के सहारे संस्कृत शिक्षा को जीवित रखने का प्रयास किया जा रहा है, परन्तु यह कितना और कब तक रह सकेगा कहना सम्भव नहीं है। ई- शिक्षा की यहाँ दूर - दूर तक सम्भावना नजर नहीं आती। दूरदर्शन, समाचार पत्र, संस्कृत की पत्रिकायें, सोशल मिडिया आदि के बारे में भी मैंने यथासंबव जानना चाहा। मैं यहाँ यह समझने की भरपूर कोशिश की थी कि संस्कृत के विकास के लिए जो योजनायें शहरों में बैठकर बनती है, उसके लिए कितनी समझ की जरूरत है। उन सरकारी योजनाओं के बारे में यहाँ के लोगों को कितनी जानकारी है? इनतक अपनी बात पहुँचाने के लिए कौन सा माध्यम सही है आदि। आज की तिथि में कक्षा 5 का छात्र सूचना क्रान्ति से परिचित है। सूचना के स्रोत को पहचानने लगता है। ई- शिक्षण से जुड़ा होता है। इनके लिए वह अवसर कब और कैसे आ सकता है? हम ऑनलाइन छात्रवृत्ति का फार्म भरवाने को सोच रहे हैं। यह सबकुछ कितना कारगर हो सकता है?
 मैंने अपने फेसबुक पर 2018 में लिखा था- प्रतिभा पलायन, योग्य व्यक्तियों के लिए अवसर का अभाव, आरक्षितों के लिए सुरक्षित पनाह, प्रतिभाशाली बच्चों द्वारा क्षेत्र में भविष्य नहीं देखा जाना, ये सभी तत्व संस्कृत के प्रसार में भारी अवरोध पैदा कर रहा है।
दूसरी ओर HCL जैसी कंपनियां मात्र 12000 मासिक देकर भारी मानव संसाधन जुटा लेती है, जबकि हम 20 से 30 हजार रुपये प्रतिमाह का ऑफर देकर भी योग्य मानव संसाधन पाने में विफल रहते हैं। कारण - सही रणनीति तथा समानुपातिक रूप से मानव संसाधन का अभाव होना। यदि आप बाजार में बीए. बीकॉम. बीएससी पास को खोजने निकलो तो लाखों की संख्या में योग्य युवा उपलब्ध हो जाते हैं, परंतु यह स्थिति संस्कृत क्षेत्र में नहीं है। यहां अल्पकालीन कार्यों के लिए भी युवा नहीं मिल पाते। इसके अनेक कारण है। वाराणसी, प्रयाग, नैमिषारण्य, अयोध्या, वृन्दावन, चित्रकूट जैसे तीर्थ स्थलों में भी संस्कृत पढ़ने वालों की भारी कमी है। यहां युवा शास्त्र ज्ञान के लिए नहीं अपितु धार्मिक साहित्य अध्ययन के लिए आते हैं, ताकि वे कथा, प्रवचन कर सके। इसका आधार संस्कृत न होकर हिंदी या अन्य साहित्य होता है। संस्कृत शिक्षा बोर्ड तथा संस्कृत विश्वविद्यालय के परीक्षा परिणाम में यहां के छात्र उच्चतम स्थान नहीं पा पाते हैं। हमारे यहां कैंपस से प्रतिभाशाली छात्रों के चुनाव की परिपाटी शुरू नहीं हो पाई। संस्कृत के लिए गठित कोई भी संस्था प्रतिभाशाली की खोजबीन नहीं करती। आज के दौर में हम काफी पीछे हैं। वर्ष 2018 तथा 2019 का परीक्षा परिणाम देखने से यह बात सटीक लग रही है। प्रथमा, पूर्वमध्यमा तथा उत्तर मध्यमा की कक्षा के परिक्षा परिणाम में शीर्ष 3 स्थानों पर उपर्युक्त तीर्थों के बच्चे स्थान नहीं पा रहे हैं। 
 रुद्रावर्त की ओर
तिराहे पर मैंने लोगों से रुद्रावर्त जाने का मार्ग पूछा। उन्होंने सीधे चलते रहने की सलाह दी। यह खरंजा की सीधी रास्ता थी। बीच- बीच कच्चा मार्ग मिला। संभवतः मैं नदी के किनारे किनारे जा रहा था, क्योंकि यहाँ की जमीन काफी ऊँची नीची था। लगभग 3.6 कि. मी. चलकर मैं रुद्रावर्त पहुँच गया। यह गोमती नगी के किनारे है। फल तथा विल्वपत्र लेकर कुंड पर पहुँचा। जैसा कि हरेक तीर्थ स्थान पर होता है, यहाँ के पुजारी भी संस्कृत शिक्षा से शून्य मिले। विल्वपत्र जल के नीचे चला गया। इसका मूल कारण विल्वपत्र को सीधे डालना रहा हो। पंडित ने केले को छिलकर पांच टुकड़े किये साथ में खीरा भी दिया। इसमें से खीरा तथा केले के चार टुकड़े पानी में तैरने लगा। उसे प्रसाद के रूप में मैंने लिया। यहाँ से खंरजे के रास्ते मैं वापस करने नहीं चाहता था । लोगों ने एक दूसरा मार्ग बताया जो गाँव के रास्ते जाता है। इससे मात्र एक कि. मी. की दूरी बढ़ती है। मं रात्री 10.00 बजे तक अपने घर लखनऊ आ गया।
देवदेवेश्वर मंदिर (दिनांक 10 एवं 11 जुलाई 2021 की यात्रा)
फेसबुक पर एक मित्र ने नैमिष क्षेत्र में स्थित देवदेवेश्वर मंदिर के बारे में बताया। उस मंदिर प्रांगण से सटे  निम्बार्क सम्प्रदाय के काठिया बाबा का आश्रम है। वहाँ एक संत एकाकी साधना करते हैं। इस बार मैंने उनका दर्शन करना चाह रहा था। यह स्थान नैमिषारण्य से मात्र 5 किलोमीटर दूरी पर गोमती नदी के किनारे अवस्थित है।  नैमिषारण्य से हरदोई रोड पर टचलते हुए इस मुख्य मार्ग से मात्र 1 किलो मीटर दूरी पर देवदेवेश्वर शिव मंदिर पर पहुँच गया।

 यहाँ पर पता करने पर उस संत का पता चल गया जो संस्कृत में बोलने में प्रगल्भ हैं। आपने श्रीमद्भागवत् पर शोध किया है। दिन के अपराह्ण में भीषण उमस भरा था। आश्रम का मुख्य दरवाजा बंद था। मैंने बगल के दरवाजे से प्रवेश कर संत को खोजने लगा। लोहे की चैनल को खोलकर भीतर जाने पर अध्ययनरत संत का दर्शन हो गया। इस जटाधारी संत के शरीर पर वस्त्र नहीं था। लगभग 1 घंटे तक अध्यात्म के विविध पक्षों पर वार्ता होती रही। एकाकी जीवन और वृद्धावस्था पर मेरे द्वारा पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि अकेले में स्वाध्याय तथा भगवद्भजन होता है। दो व्यक्ति की उपस्थिति में वार्तालाप अतः श्रीमद्भागवत् के अनुसार मुमुक्षु को एकाकी निवास करना चाहिए। मरणधर्मा जीव मृत्यु को लेकर भयभीत रहता है। जो स्वयं भयभीत है, उससे वृद्धावस्था की क्या आशा की जाय। श्रीकृष्ण सतत रक्षा करने में समर्थ हैं। जीवन के अंत समय में राजा दशरथ के समान जल के तड़पते हुए राम राम कहते हुए प्राण चले जायेंगे। उन्होंने अपना शोध प्रबंध पढ़ने को दिया। काशी के विद्वानों पर चर्चा हुई, जिनसे उन्होंने अध्ययन किया था। चलते समय अपनी एक पुस्तक दी। कुल मिलाकर  इनसे मिलना और इनके आश्रम की सादगी मुझे बहुत पसंद आया। 

हंस हंसी मंदिर
स्थानीय लोगों ने इस सुरम्य तथा एकान्त स्थान के बारे में जानकारी दी। यह सिद्ध स्थल गोमती के किनारे है। नारदानन्द आश्रम के भीतर से होते हुए रेलवे लाइन के नीचे से पार कर अजीजपुर होकर जाने पर नैमिष से इसकी दूरी कम हो जाती है, परन्तु इस मार्ग से मात्र पैदल या मोटर साइकिल से ही जाया जा सकता है। यहाँ तक जाने के लिए हरदोई रोड एक सुगम रास्ता है। गोमती नदी पर बने पुल से कुछ पहले से बायीं श्मशान की ओर चलकर यहाँ पहुँचा जा सकता है। यह एक टीलेनुमा जगह पर अवस्थित है। 
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गया तीर्थ की ऐतिहासिकता

हिंदुओं के अनेक प्रकार के तीर्थ है। ब्रह्म पुराण के अनुसार तीर्थों चार प्रकार के होते हैं 1- ईश्वर द्वारा उत्पन्न 2- असुर से सम्बन्धित 3- ऋषियों से सम्बन्धित 4- राजाओं (मनुष्यों) द्वारा निर्मित। गया के तीर्थों का संबंध मृत मानवों अर्थात् पितरों के साथ है। गया एक ऐसा तीर्थ है, जहां लोग अपने पूर्वजों के मृत्यु का पर्व मनाने जाते हैं। गया पितृतीर्थ है। इस तीर्थ का संबंध मानवों के अतिरिक्त दानवों तथा देवताओं से भी रहा है। यह अत्यंत प्राचीन तीर्थ है। ऋग्वेद में सर्वप्रथम इसके बारे में संकेत प्राप्त होता है। ऋग्वेद के 2 सूक्तों के रचयिता प्लति के पुत्र गय थे। महाभारत तथा वायु पुराण में जिस गयासुर का वर्णन प्राप्त होता है, उसका मूल उत्स अथर्ववेद है। यहाँ असित एवं कश्यप के साथ गय नामक एक व्यक्ति वर्णित है। गय यहां पर ऐंद्रजालिक के रूप में वर्णित है। चुंकि असुर इंद्रजाल करने में सिद्धहस्त थे, अतः परवर्ती रचनाकारों ने गय को असुर (ऐंद्रजालिक) मानते हुए कथा को विस्तार दे दिया। और्णनाभ जो बुद्ध के पूर्ववर्ती थे ने इदम् विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् के त्रेधा शब्द का अर्थ समारोहण,विष्णुपद एवं गयशीर्ष किया है। गयशीर्ष शब्द की चर्चा महाभारत के वनपर्व, विष्णुधर्मसूत्र, विष्णु पुराण तथा महाभारत में प्राप्त होता है। नारदीय पुराण में भी गयशीर्ष की चर्चा प्राप्त होती है। गयशीर्ष का नाम वनपर्व 87/ 11 एवं 95/9, विष्णु धर्मसूत्र 85/4 विष्णु पुराण 22/20 तथा महावग्ग 1/21/1 में आया है। जैन एवं बौद्ध ग्रंथों में राजा गय का राज्य गया के चारों ओर था ऐसा उल्लेख प्राप्त होता है। उत्तराध्ययन सूत्र में आया है कि वह राजगृह के राजा समुद्रविजय का पुत्र था और ग्यारहवां चक्रवर्ती हुआ। अश्वघोष के बुद्धचरितम् में ऋषि गय के आश्रम में बुद्ध का आना तथा उस संत ने निरंजना नदी के पुनीत तट पर अपना निवास बनाया और पुनः वह गया के कश्यप के आश्रम में, जो उरुबिल्व कहलाता था, का प्रसंग प्राप्त होता है। इस ग्रंथ में यह भी आया है कि वहां धर्माटवी भी थी, जहां 700 जटिल रहते थे। उन्हें बुद्ध ने निर्माण प्राप्ति में सहायता दी थी। विष्णु धर्मसूत्र में श्राद्ध के लिए विष्णुपद पवित्र स्थल कहा गया है।पद्म पुराण आदि 38/2-21, गरूड 1 अध्याय 82-86 आदि में गया के विषय में अनेक उद्धरण एवं कखानक प्राप्त होते हैं। इस प्रकार हम पाते हैं कि पौराणिक काल आते आते वेद की एक ऋचा किस प्रकार एक कथानक के रूप ले लेती है। संस्कृत का ग्रन्थ धार्मिक पर्यटन (तीर्थ) के माध्यम से किस प्रकार अर्थव्यवस्था को रप्तार देता है। भारत की एकता और अखण्डता में इसका कितना अहम योगदान है। यह धर्म के फलक को भी विस्तार देता है। पवित्र नदियों में स्नान का भी उतना ही महत्व है,जितना कि विशाल द्रव्य खर्च कर होने वाले यज्ञ यागादि का। ये तीर्थ विना भेदभाव के सभी के लिए उपलब्ध थे। अस्तु।

गया ईसा के कई शताब्दियों पूर्व एक समृद्धशाली नगर था। फाहियान के भारत आगमन के समय (चौथी शताब्दी) में यह नगर नष्टप्राय था, किंतु सातवीं शताब्दी में जब ह्वेनसांग यहां आया तो इसे भरा पूरा देखा। व्हेनसांग के अनुसार यहां ब्राह्मणों के 1000 कुल थे। प्राचीन पाली ग्रंथों एवं ललितविस्तर में भी गया के मंदिरों का उल्लेख प्राप्त होता है। कुल मिलाकर इतना स्पष्ट है कि बुद्ध के आविर्भाव के पूर्व गया तीर्थ अपने अस्तित्व में आ चुका था।
हजारों वर्षों से गया तीर्थ हिंदुओं के आस्था का केन्द्र रहा है। गया के बारे में विपुल मात्रा में साहित्य भी प्राप्त होते हैं। आज संपूर्ण गया 15 किलोमीटर में फैला है। इसके पूर्व में महानदी फल्गु अवस्थित है। यह सुखी नदी है। गड्ढा खोदकर लोग इसमें से जल प्राप्त करते हैं। इसका संबंध गायबाल जाति के लोगों से तथा गयासुर से भी जोड़ा जाता है। वायु पुराण के 106 अध्याय में इस नगर का नाम तथा इसके उत्पत्ति की कहानी प्राप्त होती है। गय नामक असुर से पीड़ित देवगन अपनी रक्षा हेतु ब्रह्मा के पास जाते हैं। ब्रह्मा उन्हें लेकर शिव के पास गये। शिव ने उन्हें विष्णु के पास जाने का सुझाव दिया। ब्रह्मा तथा शिव ने मिलकर विष्णु की स्तुति की। विष्णु प्रकट होकर सभी देवों से कहे कि आप लोग गयासुर के पास चलें। विष्णु ने गयासुर के कठिन तप का कारण पूछा गया से वरदान मांगा कि वह देवताओं, ऋषि तथा मंत्रों से भी अधिक पवित्र हो जाए। देवों ने तो अस्तु कहा और स्वर्ग चले गए। इस प्रकार एक लंबी कथा वहां प्राप्त होती है। गया के प्रमुख स्थान है- विष्णुपद,  बोधिवृक्ष, प्रेतशिला, फाल्गु नदी
गया के तीर्थ की संख्या तो बहुत अधिक है परंतु सभी तीर्थयात्री सभी तीर्थों की यात्रा नहीं करते हैं बल्कि इन्हीं तीन स्थलों की यात्रा करते हैं। विष्णुपद में भगवान विष्णु के पदचिन्ह स्थापित है। जिसका आकार लगभग 16 इंच लंबा है। इस मंदिर में सभी हिंदू मतावलंबी दर्शन करने जाते हैं। यहां कोई 45 वेदियां हैं। विस्तृत अध्ययन के लिए पढें-वायु पुराण (गया माहात्म्य)
प्राचीन ग्रन्थ जिसमें गया तीर्थ का वर्णन प्राप्त होता है-
1- तीर्थचिन्तामणि
2- तीर्थप्रकाश
3- तीर्थेन्दु शेखर
4- त्रिस्थली सेतु
5- त्रिस्थली सेतु सार संग्रह
गया श्राद्ध के लिए लिखित प्राचीन ग्रन्थ
ग्रन्थ ग्रन्थकार
1- गयाश्राद्धपद्धति ---- वाचस्पति
2- तीर्थयात्रातत्व --------- रघुनन्दन
3- गयाश्राद्धपद्धति ---------- माधव के पुत्र रघुनाथ
4- गयाश्राद्धविधि ---------- वाचस्पति


नोट- साक्ष्य तथा सामग्री मिलने के साथ- साथ लेख में निरन्तर परिवर्तन होता रहेगा।


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चित्रकूट के प्रमुख दर्शनीय स्थल

                 चित्रकूट के महत्व का गुणगान आदि-कवि वाल्मीकि, पुराणों के रचयिता महर्षि व्यास, महाकवि कालिदास, संस्कृत नाटककार भवभूति, संतकवि तुलसी, मुसलमान कवि रहीम  ने मुक्त कण्ठ से किया है। मानवीय सृष्टि-सरणि में अवतारी पुरुष भगवान राम ने जिस स्थान को अपना निवास स्थान चुना हो और जिसकी प्रशंसा के भाव भरे गीत गायें हों उसके प्रभाव तथा माहात्म्य के बारे में कुछ कहना अशेष रह जाता है।

स्थान परिचयः- 

         चित्रकूट उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की करवी तहसील तथा मध्यप्रदेश के सतना जिले की सीमा पर स्थित है। यह प्रयाग (इलाहाबाद) से 120 किलो-मीटर पश्चिम झाँसी-मानिकपुर (मध्य रेलवे) के बीच चित्रकूट-धाम-करवी रेलवे स्टेशन से 8 किलोमीटर दक्षिण है। सामान्यतया करवी, सीतापुर कामता, खोही तथा नयागाँव- से पाँच बस्तियाँ और इनका समीपवर्ती विस्तृत वनांचल ‘चित्रकूट’ नाम से विख्यात है।

चित्रकूट पहुँचने का साधनः- 

           चित्रकूट पहुँचने के लिए रेल बसों की सेवाएँ उपलब्ध हैं। चित्रकूट-धाम-करवी झाँसी-मानिकपुर (मध्य रेलवे) का स्टेशन है। इनके अतिरिक्त इलाहाबाद-जबलपुर मार्ग पर चलने वाली अन्य रेलगाडि़यो से यात्रा करने वाले यात्रियों को मानिकपुर जंक्शन पर उतरना पड़ता है। वहाँ से चित्रकूटधाम-करवी के लिए कोई रेलगाड़ी अथवा बस पकड़नी पड़ती है। मानिकपुर से चित्रकूटधाम-करवी की दूरी लगभग 25 किलोमीटर है। रेलों के अलावा आज कल तो ‘बसों’ का प्रचलन इतना अधिक हो गया है कि चाहे जिधर से चित्रकूट आना हो, सभी तरफ से बसें चित्रकूट के लिए मिल जाती है। प्रयाग से दिन भर घण्टे-घण्टे बाद रोडवेज की बसें आती रहती हैं। सतना से चित्रकूट का मार्ग बन जाने से वहाँ से भी बसें चित्रकूट तक चलने लगी है। सागर से होती हुई बसें चित्रकूट पहुँचती है।

आवास की सुविधायेंः- 

        यात्रियों के ठहरने के लिए सीतापुर (चित्रकूट) में कई धर्मशालायें है, जिनमें कलकत्ता वाली धर्मशाला, माँजी की धर्मशाला, आगरा वालों की धर्मशाला, तुमसर धर्मशाला, श्रीराम धर्मशाला तथा राठी की कोठी धर्मशाला अधिक प्रसिद्व है। इधर चित्रकूट में अनेक जातीय धर्मशालायें बन गयी है अतः वहाँ भी यात्रियांे को आवास की सुविधायें मिल जाती है। सीतापुर में चित्रकूटधाम नगरपालिका का यात्री-ग्रह तथा पयस्विनी के किनारे मध्यप्रदेश सरकार द्वारा निर्मित सार्वजनिक निर्माण विभाग-डाकबंगला और वन विभाग-डाकबंगला भी है। इनके अतिरिक्त चित्रकूट में सैकड़ों मठ व मन्दिर है, जहाँ यात्रियांे को निःशुल्क आवास की व्यवस्था कर दी जाती है। यहाँ पण्डे लोग भी पर्याप्त संख्या में रहते हैं, जो यात्रियों को हर सम्भव सुविधायें प्रदान करते है। हाल में यहाँ ‘जयपुरिया भवन’ तथा पर्यटन विभाग का ‘यात्रीगृह’ बन जाने से उन यात्रियों को भी सुविधा मिल गई है जो आधुनिक ढ़ग का आवास पसन्द करते है।

चित्रकूट के दर्शनीय स्थलः- 

         चित्रकूट एक आरण्यक तीर्थ है। हरी-भरी वन-श्रेणियों के बीच स्थान-स्थान पर यहाँ ऐसे दर्शनीय स्थल हैं, जो रमणीयता और पवित्रता के लिए युगों से सुविख्यात है। केवल धार्मिक महत्व वाले स्थानो की संख्या बहुत अधिक है, पर अध्यात्म, संस्कृति तथा पर्यटन-तीनों दृष्टियों से जो स्थान महत्वपूर्ण है, उन्ही का संक्षिप्त परिचय यहाँ दिया जा रहा है।
कामदगिरिः- चित्रकूट तीर्थ के मुख्य देव ‘श्री कामदगिरि‘ है। इसकी प्राकृतिक सुषमा बड़ी ही निराली है। महर्षि वाल्मीकि, महाकवि कालिदास तथा संत कवि तुलसी ने बड़े ही प्रभावशाली शब्दों में इसका वर्णन किया है। इसके दर्शन एवं परिक्रमा करने से श्रद्धालु-यात्री के सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं। इसीलिए इसका नाम ‘कामदगिरि’ है। इस गिरिराज का प्रभाव यों तो अनादिकाल से चला आ रहा है, पर भगवान राम के प्रवास करने से इसका महत्व और भी बढ़ गया है।
                 कामदगिरि के दर्शन के लिए प्रतिमास की अमावस्या, चैत्र रामनवमी और दीपमालिका को भारत के कोने-कोने से अंसख्य यात्री चित्रकूट आते हैं और इसकी परिक्रमा कर स्वयं को धन्य मानते है। पर्वत के चारों ओर परिक्रमा के लिए पक्का मार्ग बना हुआ है, जिसकी परिधि लगीाग 3 मील है। परिक्रमा के किनारे-किनारे सैकड़ों देवालय बने हुए हैं, जिनमें राममुहल्ला, मुखारविन्द, साखी गोपाल, भरत-मिलाप (चरण-पादुका) तथा पीली कोठी अधिक महत्वपूर्ण है।
          पर्वत के दक्षिण पाश्र्व में एक छोटी-सी पहाड़ी है, जिसे ‘लक्ष्मण पहडि़या’ कहते हैं। इसके शिखर पर श्री लक्ष्मण जी का मन्दिर बना हुआ है। जन-श्रुति के अनुसार राम के वनवास-काल में लक्ष्मण जी का यही निवास स्थान था।
भरत-मिलाप (चरण-पादुका)ः- यह स्थान कामदगिरि के दक्षिण पाश्र्व में परिक्रमा पथ पर है। यह वही स्थान है, जहाँ भरत राम का अश्रुप्रवाही मिलन हुआ था। वह मिलन, जिसमें पर्वतराज की कठिन शिलायें भी पिघल कर पानी-पानी हो गयी थी, पक्षियांे का कलरव शान्त पड़ गया था और वन खण्ड की तरु-लतायें भी चार आँसू रो पड़ी थीं। जहाँ धर्म के समक्ष राजनीति ने मात्था टेका था और कर्तव्य ने वैभव को पैरों तले कुचल राज्य-पद को कुन्दक बना कर इधर-उधर फेंका था। पिघली हुई उन शिलाओं का चिहनावशेष आज भी उस अपूर्व मिलन की याद को ताजा कर देता है।
रामघाटः- चित्रकूट पर्वत से डेढ़ किलोमीटर पूर्व पयस्विनी (मंदाकिनी) नदी तट निर्मित रामधाट भक्तों एवं श्रद्धालुओं के लिए बड़ा ही पवित्र स्थान माना जाता है। यहाँ पर बैठ कर इधर-उधर दृष्टि डालने से वाराणसी में गंगा के घाटों का स्मरण हो आता है।                 
       रामघाट के ऊपर अनेक मन्दिर व मठ है, जिनमें श्री मत्तगयेन्द्र (मदगंजन स्वामी) शंकरजी का मन्दिर अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। मन्दिरों के इस समुदाय को ‘पुरी’ कहते है। इसके चतुर्दिक परिक्रमा बनी हुई है। लोग श्रद्धा के साथ पुरी की भी परिक्रमा करते है।
प्रमोद वनः- रामधाट से एक किलोमीटर दक्षिण चित्रकूट-सतना रोड पर पयस्विनी तट यह स्थान स्थित है। इसमें रीवां नरेश का बनवाया हुआ श्री नारायण भगवान का मन्दिर है। इसके चारों ओर लगभग 300 कोठरियाँ बनी हुई है, जिनके सम्बन्ध में कहा जाता है कि रीवां नरेश ने किसी दैवी बाधा की शान्ति के लिए इनका निर्माण करा कर उतने ही पण्डितों द्वारा किसी विशेष अनुष्ठान का आयोजन किया था।
         प्रमोद वन के ठीक सामने पश्चिम में ‘दास हनुमान’ नामक स्थान है, जो एक सिद्व जगह मानी जाती है।
जानकी कुण्डः- प्रमोद वन से एक फलाँग दक्षिण स्थित जानकी कुण्ड आज कल चित्रकूट का सर्वाधिक रम्य आश्रम समझा जाता है। यहाँ विरक्त महात्माओं की सैकडों गुफायें तथा कुटीरें है, जहाँ तीन-चार सौ महात्मा सदैव तपश्चर्या करते रहते है। इस आश्रम का प्राकृतिक दृश्य बहुत सुहावना है। नीचे मंदाकिनी छल-छल करती हुई बह रही है। इसके दोनों किनारे सघन वृक्षों की सुन्दर कतारें हैं, जो दर्शक का मन हठात् मोह लेती है। मंदाकिनी के जल में यहाँ अंसख्य दीर्घकाल मछलियाँ तैरती रहती है, जो कुछ क्षणों के लिए पर्यटकों के मनोरंजन का साधन बन जाती है।
          आश्रम में स्व0 संत श्री रणछोरदास जी महाराज द्वारा स्थापित एक संस्कृत पाठशाला तथा रघुवीर जी का भव्य मन्दिर है। यहाँ एक धर्मशाला तथा कई सुन्दर भजनाश्रम बने हुए है। स्वामी पंजाबी भगवान् द्वारा निर्मित श्री हनुमान जी का मन्दिर भी विशेष दर्शनीय है।
          प्रसिद्वि है कि वनवास काल में महारानी जानकी जी यहाँ नित्य स्नान करने आती थीं, इसीलिए इसका नाम ‘जानकी कुण्ड’ पड़ा।
स्फटिक शिलाः- यह स्थान जानकी कुण्ड से लगभग डेढ़ किलोमीटर दक्षिण सधन वृक्षावली से आवृत्त पयस्विनी के तट पर है। यह वही स्थान है जहाँ एक विशाल शिला-खण्ड पर भगवान राम के चरण-चिन्ह अंकित है। इसी शिला पर बैठी हुई भगवती सीता पर इन्द्र-पुत्र जयन्त ने काक का रुप धारण कर चच्चु प्रहार किया था। यहाँ का प्राकृतिक दृश्य अतीव आकर्षक, मनोमुग्धकारी और नेत्रानुरज्जनकारी है।
अनुसूया आश्रमः- जानकी कुण्ड से लगभग 15 किलोमीटर दक्षिण प्रकृति देवी की हरी-भरी गोद में अवस्थित महासती अनुसूया तथा महर्षि अत्रि जी की तपश्चर्या का पवित्र स्थल ‘अनुसूया-आश्रम’ के नाम से विख्यात है। पुण्यशील दम्पति (अत्रि-अनुसूया) के प्रभाव से इसका कण-कण परम पवित्र तथा प्रेरणा स्त्रोत है। यह जन समूह के कोलाहल से दूर शान्ति  का आगार परम रमणीक आश्रम है। इस आश्रम की पुनीत शरण में अनेक महात्माओं ने परम सिद्वि प्राप्त की है। यहाँ अत्रि अनुसूया तथा उनके पुत्र भगवान दत्रात्रय, दुर्वासा और चन्द्रमा की मूर्तियाँ स्थापित है। प्राकृतिक, धार्मिक तथा सांस्कृतिक-तीनों दृष्टियों से यह स्थान महत्वपूर्ण है। यह वही स्थान है, जहाँ महासती अनुसूया ने महारानी सीता को ‘पतिव्रत धर्म’ का दिव्य उपदेश देकर नारी-जाति का स्वर्ग प्रशस्त किया था।
          चित्रकूट-सतना रोड से फूट कर एक पक्का उपमार्ग यहाँ तक जाता है। इसे मध्य प्रदेश शासन द्वारा बनाया गया है। यहाँ एक सिद्व बाबा का बड़ा सुन्दर आश्रम बना है। नीचे अनुसूयाजी की तपस्या में लाई गयी पयस्विनी (मन्दाकिनी) नदी बह रही है।
          पर विचारणीय बात यह है कि इतने सुन्दर तथा रमणीक आश्रम में पर्यटकों के आवासादि के लिए न तो कोई धर्मशाला है, न सरकारी विश्राम-गृह ही। देश के धर्मशील सम्पन्न परिवारों तथा शासन को इस ओर ध्यान देना चाहिए।
गुप्त गोदावरीः- यह तीर्थस्थल अनुसूया आश्रम से लगभग 6 किलोमीटर पश्चिम में है। एक लम्बी गुफा से निरन्तर जल स्त्राव होता रहता है। भीतर अँधेरा होने से यात्री दीपक (गैस) के प्रकाश में अन्दर प्रवेश करते है। इसके भीतर एक कुण्ड है, जिसे सीता कुण्ड कहते है जो दरवाजे से 15-16 गज की दूरी पर है। गुफा से पानी की धारा कुण्डों पर गिरती है और वही लृप्त हो जाती है, इसी से इसे गुप्त गोदावरी कहते है। यहाँ का प्राकृतिक कला-कौशल अद्भुत है। जलवाही गुफा के बगल में एक दूसरी विशाल गुफा है, जिसका ऊपरी भाग काफी ऊँचा है। छत पर एक ऐसा पत्थर लटका हुआ है जो हिलता रहता है। इसे लोग ‘खटखटा चोर’ कहते है, जिसके पीछे अनेक किंवदन्तियाँ जुड़ी हुई है।
मड़फाः- गुप्त गोदावरी से 3-4 किलोमीटर दूर माण्डय ऋषि का परम प्राचीन आश्रम ‘मड़फा’ नाम से प्रसिद्व है। एक छोटी पहाड़ी पर ध्वंसावशेष मात्र एक अति प्राचीन किला है, जो कालिंजर दुर्ग का ही एक अंग बताया जाता है। यहाँ का पर्वतीय प्राकृतिक दृश्य बहुत ही चित्ताकर्षक है। भगवान श्री बाला जी का भव्य मन्दिर यहाँ बना है, पास में ही पंचमुखी शंकर जी की विशाल प्रतिमा भी स्थापित है। पहाड़ी से कई झरने झरते है तथा नीचे ‘पाप-मोचन’ नामक एक प्रसिद्व सरोवर है।
          यह आश्रम दुर्गम वनांचल में अवस्थित है, इसलिए यहाँ सुरक्षा की दृष्टि से यात्रियों को बड़ी सावधानी से जाना चहिए।
भरत कूपः- यह श्री कामदगिरि से आठ किलोमीटर पश्चिम तथा झाँसी-मानिकपुर रेलवे लाइन पर ऐतिहासिक कूप है, जिसमें भरत जी ने श्री रामचन्द्र जी के अभिषेकार्थ लाए हुए समस्त तीर्थों के जल को डाला था। इसलिए इसके जल में स्नान का बड़ा महत्व माना जाता है।
          कूप के पास ही भरत जी का मन्दिर है। भरत जी की स्मृति में एक संस्कृत पाठशाला भी चलाई जा रही है।
गणेश बागः- करवी से डेढ़ किलोमीटर दक्षिण में देश के प्राचीन गौरव तथा समृद्वि का प्रतीक-स्वरुप गणेश बाग पेशवा नरेशों की कीर्ति सँजोये खड़ा है। इसका निर्माण उन्नीसवीं शताब्दी के आरम्भ में श्रीमन्त विनायकराव पेशवा ने अपने आमोद-प्रमोद के लिए कराया था। यहाँ की इमारतों का निर्माण भारतीय स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। बीच में प्राचीन शैली का भव्य षट्कोणी पंचमन्दिर है, जिसके ऊपरी भाग में भित्ति-प्रस्तरों की बारीक कटाई करके ‘खजुराहो’ की भाँति देवी-देवताओं की अंसख्य मूर्तियाँ उत्कीर्ण की गयी है। सामने एक सरोवर है, जिससे इसकी शोभा और भी बढ़ गयी है। पश्चिमी भाग में एक बड़ा ही भव्य जलाशय है, जिसमें कूप और वापी का सुन्दर सम्मिश्रण है। यह तीन खण्डों का है और इसके दो खण्ड प्रायः पानी से भरे रहते है। गर्मियों में दूसरा खण्ड भी खुल जाता है। पर सरकार द्वारा विधनतः संरक्षित-इमारत घोषिट किये जाने के बावजूद सुरक्षा तथा मरम्मत के अभाव में भारतीय शिल्प मला का अद्भुत नमूना धीरे-धीरे धराशायी होता हुआ स्मृति-शेष ही रह जाता दीख रहा है।
बाँके सिद्धः- गणेश बाग से 3 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व हरे-भरे विन्ध्य पर्वत के पाश्र्व भाग में स्थित बाँके सिद्ध अपने प्राकृतिक सौन्दर्य के लिए प्रसिद्ध है।
          सचमुच यह देव निर्मित एक सुन्दर कन्दरा है। इसके निर्माण में भगवती प्रकृति देवी ने अपूर्व चातुर्य दिखाया है। एक विशाल चट्टान के नीचे विस्तृत कक्ष बना हुआ है, जो धरातल से सैकड़ों फीट नीचा है। गुफा तक पहुँचने के लिए नीचे से पक्की सीढि़याँ बनी हुई है। ऊपर से निर्मल जल वाला झरना गिर रहा है, जिसका दृश्य बड़ा ही मनोहर है। यह गुफा के उत्तरी भाग को नहलाता हुआ पर्वत के ही वक्ष में विलीन हो जाता है।
कोतितीर्थः- बाँके सिद्व से डेढ़ किलोमीटर दक्षिण इसी पर्वत पर ‘कोटितीर्थ’ नामक रम्य स्थान है। इसका प्राकृतिक दृश्य भी सिद्व की भांति ही है। यहाँ भी एक झरना बह रहा है, जो पर्वत में ही अन्तर्लीन हो जाता है। कहा जाता है कि जब भगवान राम चित्रकूट पधारे थे, तब उनके दर्शनार्थ देवलोक से आए हुए करोड़ों देवता इसी स्थान पर रुके थे। इसीलिए इसे ‘कोतितीर्थ’ कहते है।
देवड़गनाः- यह स्थान कोटितीर्थ से 2 किलोमीटर दक्षिण (करवी से 6 किलोमीटर दक्षिण अथवा रामघाट (चित्रकूट) से 3 मी पूर्व) कोटितीर्थ वाले पर्वत केक अच्चल में ही सुशोभित है। यहाँ का पर्वतीय दृश्य तथा जल प्रपात का उद्गम बाँके सिद्व एवे कोटितीर्थ के ही सामान है। प्रसिद्वि है कि राम के वनवास-काल में उनके दर्शनार्थ से आयी हुई विविध देवों की स्त्रियाँ इस स्थान पर रुकी थीं, इसलिए इसे देवड़गना कहते है।
हनुमान-धाराः- यह स्थान देवड़गना वाली पर्वत श्रंृखला पर ही (चित्रकूट) से तीन किलोमीटर पूर्व स्थित है। यहाँ श्री हनुमान जी की भव्य मूर्ति स्थापित है, जिनके दर्शन के लिए यों तो यात्री प्रतिदिन पहुँचते रहते है, पर भाद्रपद शुक्ल पक्ष के अन्तिम मंगलवार (बुढ़वा मंगल) को यहाँ प्रतिवर्ष बड़ा भारी मेला जगता है।
          पर्वत के भीतर से एक ऐसा झरना फूट निकला है, जिसकी शुण्डाकार निर्मल जलधारा श्री हनुमान जी की बायीं भुजा पर पड़ती है। इसे देखने से शंकर भगवान के मस्तक पर गंगावरण के दृश्य की कल्पना होने लगती है। मूर्ति के पास तक पहुँचने के लिए नीचे से 360 सीढि़याँ बनी हुई है। यात्रियों के विश्राम के लिए एक छोटी-सी धर्मशाला भी यहाँ है।
      इसी पर्वत श्रेणी में हनुमान-धारा के ऊपर ‘सीता रसोई’ तथा ‘नरसिंह-धारा’ नामक स्थान भी दर्शनीय है।
          उल्लिखित स्थानों के अतिरिक्त चित्रकूटधाम में और भी कई दर्शनीय स्थल है। जानकी कुण्ड के मार्ग में ‘रामघाट’ तथा दक्षिण ‘सिरसावन’, परिक्रमा मार्ग में पीली कोठी तथा सैकड़ों अन्य मन्दिर, पीली कोठी से थोड़ी दूर ‘राम शैया’, करवी से 6 किलोमीटर ‘सूर्य कुण्ड’ आदि पवित्र स्थान है, जो दर्शन करने योग्य है। चित्रकूट के दक्षिणी वनाच्चल में शरभंग आश्रम तथा सुतीक्षण आश्रम भी दर्शनीय है, पर ये स्थान बड़े दुर्गम है।
वाल्मीकि आश्रमः- करवी से 16 किलोमीटर पूर्व चित्रकूट-इलाहाबाद राजमार्ग पर आदि-कवि महर्षि वाल्मीकि जा का पावन आश्रम एक हरी-भरी पहाड़ी के शिखर पर स्थित है। पहाड़ी के नीचे वाल्मीकि नदी (ओहन नदी) बहती है। पहाड़ी के शिखर पर एक मन्दिर है, जिसमें महर्षि वाल्मीकि की प्रतिमा स्थापित है। इसके दक्षिण-पूर्व में पाश्र्व मार्ग में एक गुफा में अपेक प्रकार की प्राचीन मूतियाँ स्थापित है।
          पहाड़ी के शिखर के नीचे तल भाग से कुछ ऊपर प्रसिद्व असावर देवी (आशा मणि देवी) का मन्दिर है, जिनके दर्शनार्थ प्रति सोमवार को मेला लगता है। चैत्र राम नवमी को यहाँ बहुत बड़ा मेला लगता है, जो 4-5 दिन तक चलता है।वाल्मीकि-आश्रम वही स्थान है, जहाँ महर्षि वाल्मीकि ने वनवासी भगवान राम कोचित्रकूट में वास करने का परामर्श दिया था स्थान अत्यन्त रमणीक है।यहाँ एक संस्कृत पाठशाला भी स्थापित है।
ब्लाग लेखक- जगदानन्द झा, लखनऊ
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