संस्कृत रंगमंच की विस्मृत परम्परा : उपरूपक, नृत्य-नाट्य और सांगीतरूपक की सम्भावनाएँ

 संवादों से परे संस्कृत नाट्य की एक समृद्ध दुनिया

संस्कृत नाट्यपरम्परा का स्मरण होते ही सामान्यतः हमारे मन में भास, कालिदास, शूद्रक और भवभूति जैसे नाटककारों के नाम आते हैं। गीतगोविन्दम् का उल्लेख होने पर महाकवि जयदेव की गीतिमय काव्यप्रतिभा और राधा-कृष्ण की प्रेमलीलाओं से अनुप्राणित नृत्य-परम्परा का ध्यान आता है। किन्तु संस्कृत नाट्य-साहित्य का संसार इससे कहीं अधिक विस्तृत है। इसमें ऐसे नाट्यरूप भी विकसित हुए, जिनमें संवादों की अपेक्षा गीत, वाद्य, नृत्य, हस्तमुद्राओं और आंगिक अभिनय की प्रधानता रहती है। नाट्यशास्त्रीय परम्परा में इनसे सम्बन्धित विविध रूपों को समझने के लिए उपरूपक की अवधारणा अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

विडम्बना यह है कि संस्कृत नाट्य की इस समृद्ध परम्परा से आज के अनेक रंगकर्मी, नृत्य-निर्देशक और सांस्कृतिक संस्थाएँ पर्याप्त परिचित नहीं हैं। परिणामस्वरूप संस्कृत में मौलिक नाट्य-प्रयोगों की सम्भावनाएँ सीमित होती जा रही हैं, जबकि हमारे प्राचीन और परवर्ती साहित्य में ऐसी अनेक कृतियाँ उपलब्ध हैं, जिन्हें आधुनिक मंच की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रस्तुत किया जा सकता है।

इस परम्परा की पुनर्खोज केवल साहित्यिक अनुसंधान का विषय नहीं है। यह संस्कृत को जनसामान्य के निकट लाने, भारतीय शास्त्रीय कलाओं को नवीन अभिव्यक्ति देने और अपनी सांस्कृतिक विरासत को समकालीन रंगमंच से जोड़ने का भी एक महत्त्वपूर्ण माध्यम है।

 

नाट्य में संगीत : केवल मनोरंजन नहीं, भावाभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम

प्राचीन काल से ही नाट्यप्रयोगों में गीत और वाद्य का विशेष महत्त्व रहा है। नाटक के प्रदर्शन से पूर्व प्रस्तुत किया जाने वाला संगीत दर्शकों को नाटकीय वातावरण में प्रवेश कराने में सहायक होता है। नाटक का इतिवृत्त हास्यप्रधान हो अथवा करुणाप्रधान, उसकी प्रकृति के अनुरूप संगीत की योजना दर्शकों की भावभूमि तैयार करती है।

     नाटक के मध्य में भी संगीत की भूमिका कम महत्त्वपूर्ण नहीं होती। किसी प्रसंग में उत्पन्न नीरसता को दूर करने, कथा के प्रवाह को प्रभावशाली बनाने और पात्रों की मनःस्थितियों को अभिव्यक्त करने में गीत, वाद्य और नृत्य अत्यन्त उपयोगी सिद्ध होते हैं। युद्ध, मृत्यु अथवा अन्य ऐसी घटनाएँ, जिनका प्रत्यक्ष प्रदर्शन रंगमंच पर कठिन हो, उन्हें भी संगीत के माध्यम से प्रभावशाली ढंग से संकेतित किया जा सकता है।

पात्रों के चरित्र-चित्रण में संगीत का योगदान विशेष रूप से उल्लेखनीय है। शिव-पार्वती के प्रसंगों में ताण्डव और लास्य की योजना, कृष्ण के चरित्र में वेणुवादन का प्रयोग तथा प्रकृति के मनोरम दृश्यों में सुकोमल स्वर-लहरियों का समावेश नाट्यप्रयोग को अधिक प्रभावोत्पादक बना सकता है। इसी प्रकार पात्रों की शोक, हर्ष, उत्साह, प्रेम और विरह जैसी मनःस्थितियों को अनुकूल रागों, स्वरों तथा लयों के माध्यम से अधिक सजीव बनाया जा सकता है।

इस दृष्टि से संगीत नाटक का बाहरी अलंकरण मात्र नहीं है। वह भावाभिव्यक्ति, वातावरण-निर्माण और रसोत्पत्ति की प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभाता है।

 

शारदातनय और भावप्रकाशन की विशिष्टता

भारतीय नाट्यपरम्परा में संगीत और नाट्य के सम्बन्ध पर विचार करते समय आचार्य शारदातनय के ग्रन्थ भावप्रकाशन का उल्लेख विशेष रूप से आवश्यक है। संगीत, उसके विभिन्न अंगों और उसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि का जो विस्तृत विवेचन इस ग्रन्थ में मिलता है, वह इसे भारतीय नाट्यशास्त्रीय साहित्य में विशिष्ट स्थान प्रदान करता है।

शारदातनय संगीत की उत्पत्ति और उसके स्वरूप पर विचार करते हुए उसे व्यापक दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। उनके विवेचन में शैव एवं तान्त्रिक दर्शन के छत्तीस तत्त्वों के साथ सांख्य और वेदान्त की दार्शनिक अवधारणाओं का भी सन्दर्भ मिलता है। इस प्रकार संगीत उनके लिए केवल कलात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि सृष्टि, चेतना और भावानुभूति से सम्बद्ध एक व्यापक विषय बन जाता है।

भरतमुनि के नाट्यशास्त्र, धनञ्जय के दशरूपक तथा अन्य नाट्यविषयक ग्रन्थों में भी संगीत का महत्त्व स्वीकार किया गया है। तथापि संगीत और नाट्य के सम्बन्ध का जैसा विस्तृत तथा दार्शनिक विवेचन भावप्रकाशन में दिखाई देता है, वह शारदातनय की विशिष्ट दृष्टि का परिचायक है।

भरतमुनि के यहाँ गीत और वाद्य नाट्यप्रयोग के सहायक अंगों के रूप में विवेचित होते हैं। उनके विवेचन में नाट्य की प्रधानता और संगीत के उपयुक्त नियोजन पर बल दिखाई देता है। दूसरी ओर, अभिनवगुप्त ने गीत को नाट्यप्रयोग का प्राण कहा है। इन आचार्यों की दृष्टियों के बीच शारदातनय का विस्तृत विवेचन संगीत और नाट्य के पारस्परिक सम्बन्ध को समझने के लिए एक महत्त्वपूर्ण आधार प्रस्तुत करता है।

शारदातनय के बाद संगीतरत्नाकर और संगीतमकरन्द जैसे ग्रन्थों में संगीत के विविध पक्षों का विवेचन हुआ। इन ग्रन्थों का अपना महत्त्व है, किन्तु संगीत की दार्शनिक पृष्ठभूमि तथा नाट्य के साथ उसके सम्बन्ध को एक साथ समझने के लिए भावप्रकाशन का अध्ययन विशेष उपयोगी है।

इस समूची परम्परा से स्पष्ट होता है कि भारतीय आचार्यों ने संगीत को नाट्य के भीतर भावों और रसों की अभिव्यक्ति का सशक्त साधन माना था। यही दृष्टि उपरूपकों और सांगीतरूपकों की रचनात्मक सम्भावनाओं को समझने में भी सहायक है।

 

उपरूपक : जब गीत और अभिनय स्वयं कथा कहने लगते हैं

संस्कृत नाट्यपरम्परा में रूपक और उपरूपक का विवेचन मिलता है। उपरूपकों के अन्तर्गत अनेक ऐसे नाट्यरूपों का उल्लेख है, जिनमें नृत्य, गीत, संगीत और अभिनय की विशिष्ट भूमिकाएँ होती हैं। इनके स्वरूप, लक्षण और प्रयोगों का अध्ययन करने पर भारतीय रंगमंच की विविधता का परिचय मिलता है।

इनमें कुछ ऐसी नाट्य-शैलियाँ भी हैं, जिनकी प्रस्तुति में संवाद गौण हो सकते हैं अथवा कथा का अधिकांश भाग गीतों और नृत्याभिनय के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। पार्श्व में राग और ताल से युक्त गीत चलते हैं तथा मंच पर कलाकार हस्तमुद्राओं, अंग-संचालन, नेत्राभिनय और मुखमुद्राओं के माध्यम से कथा को साकार करते हैं।

ऐसी प्रस्तुति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह भाषा की सीमा को काफी हद तक पार कर सकती है। दर्शक प्रत्येक पद का शाब्दिक अर्थ न जानते हुए भी संगीत, लय, भावभंगिमा और अभिनय के सहारे कथा के भावात्मक पक्ष से जुड़ सकते हैं। यही कारण है कि गीतप्रधान नृत्य-नाट्य संस्कृत को जनाभिमुख बनाने की दृष्टि से विशेष उपयोगी हो सकता है।

यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है। उपरूपकों के सभी प्रकार एक जैसे नहीं होते। उनकी संरचना, संवाद-योजना, गीतों की भूमिका और नृत्य की प्रधानता में भिन्नता मिलती है। इसलिए किसी भी संस्कृत कृति को उपरूपक अथवा संवादमुक्त नृत्य-नाट्य के रूप में प्रस्तुत करने से पहले उसके मूल स्वरूप और नाट्यशास्त्रीय लक्षणों का अध्ययन आवश्यक है।

 

गीतगोविन्दम् से आगे : संस्कृत की पाँच गेय कृतियाँ

महाकवि जयदेव का गीतगोविन्दम् भारतीय संगीत, नृत्य और भक्तिकाव्य की एक अनुपम उपलब्धि है। राधा-कृष्ण की प्रेमलीलाओं, विरह और मिलन की अनुभूतियों तथा अष्टपदियों की गेयता ने इसे विभिन्न नृत्य-परम्पराओं में विशेष स्थान दिलाया है। किन्तु संस्कृत का गीतप्रधान साहित्य केवल गीतगोविन्दम् तक सीमित नहीं है। इसके अतिरिक्त भी अनेक ऐसी कृतियाँ हैं, जिनकी ओर रंगकर्मियों और नृत्य-निर्देशकों का ध्यान जाना चाहिए।

 

1. अभिनवगीतगोविन्दम् — पुरुषोत्तमदेव

अभिनवगीतगोविन्दम् का उल्लेख उन कृतियों में किया जा सकता है, जिन्हें गीतगोविन्द की परम्परा के विस्तार के रूप में देखा जाता है। राधा-कृष्ण की लीलाओं पर आधारित ऐसी गीतप्रधान रचनाएँ नृत्य-निर्देशन, संगीत-संयोजन और भावाभिनय के लिए उपयोगी सामग्री प्रदान कर सकती हैं।

इस कृति के आधार पर नृत्य-नाट्य तैयार करने से पूर्व इसके पाठ, राग-ताल सम्बन्धी निर्देशों, उपलब्ध संस्करणों और रचनाकाल का प्रामाणिक अध्ययन किया जाना चाहिए। इससे निर्देशक को मूल रचना की विशेषताओं को सुरक्षित रखते हुए मंचीय प्रस्तुति विकसित करने में सहायता मिलेगी।

 

2. जगन्नाथवल्लभनाटकम् — राय रामानन्द

राय रामानन्द से सम्बद्ध जगन्नाथवल्लभनाटकम् संस्कृत की गीतप्रधान नाट्यपरम्परा में उल्लेखनीय स्थान रखता है। कृष्णभक्ति, प्रेमानुभूति और गीतात्मकता से युक्त इसकी कथावस्तु संगीत तथा नृत्य के समन्वित प्रयोग के लिए महत्त्वपूर्ण सम्भावनाएँ प्रस्तुत करती है।

इस कृति को मंच पर लाने के लिए उसके गीतों, प्रसंगों और नाटकीय संरचना का सूक्ष्म अध्ययन किया जा सकता है। ओडिसी जैसी शास्त्रीय नृत्यशैलियों की भावाभिव्यक्ति और गीतात्मक परम्परा के सन्दर्भ में भी यह कृति विशेष रुचि का विषय है। इसके आधार पर राधा-कृष्ण के प्रसंगों को संगीत, नृत्य और अभिनय के माध्यम से प्रभावशाली रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है।

 

3. श्रीकृष्णलीलामृतम् — कवि ईश्वर दीक्षित

कृष्ण की लीलाओं पर आधारित गेय साहित्य नृत्य-नाट्य के लिए सदैव आकर्षण का विषय रहा है। श्रीकृष्णलीलामृतम् का उल्लेख भी इसी सन्दर्भ में किया जा सकता है। कृष्ण के बालरूप, उनकी विविध लीलाओं और भक्तिभाव से सम्बद्ध प्रसंगों को गीत तथा अभिनय के माध्यम से मंच पर प्रस्तुत करने की पर्याप्त सम्भावनाएँ हैं।

इस प्रकार की कृति का प्रयोग करते समय मूल पाठ में उपलब्ध राग-ताल सम्बन्धी निर्देशों का परीक्षण करना विशेष उपयोगी होगा। संगीतकार, गायक और नर्तक यदि मूल काव्य की गीतात्मकता तथा भावभूमि के अनुरूप कार्य करें, तो प्रस्तुति में साहित्यिक प्रामाणिकता और कलात्मक प्रभाव दोनों सुरक्षित रखे जा सकते हैं।

 

4. शिवलीलामृतम् — अग्निचित् नित्यानन्द

संस्कृत गीतप्रधान नाट्य-परम्परा की चर्चा केवल कृष्णभक्ति तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। शैव परम्परा में भी नृत्य और संगीत की अत्यन्त समृद्ध सम्भावनाएँ हैं। शिवलीलामृतम् का उल्लेख इस दृष्टि से महत्त्वपूर्ण है।

 

शिव-पार्वती के प्रसंग, शिव का ताण्डव, पार्वती का लास्य, विवाह, प्रेम तथा विरह जैसे विषय नृत्य-नाट्य की प्रभावशाली संरचना के लिए उपयुक्त आधार प्रदान कर सकते हैं। ऐसी कृति पर कार्य करने वाली संस्था शिव के विविध रूपों को आंगिक अभिनय, नृत्य, गीत और वाद्य के माध्यम से मंच पर साकार कर सकती है।

इसके लिए आवश्यक है कि कृति के प्रामाणिक पाठ, रचनाकार, रचनाकाल और उपलब्ध संगीत-निर्देशों का समुचित सत्यापन किया जाए, जिससे प्रस्तुति कल्पनाशील होने के साथ-साथ मूल साहित्य के प्रति उत्तरदायी भी रहे।

 

5. मुकुन्दविलास — रघूत्तम तीर्थ

भगवान विष्णु और उनके विभिन्न रूपों से सम्बद्ध गेय साहित्य में भी मंचीय प्रस्तुति की व्यापक सम्भावनाएँ हैं। मुकुन्दविलास का उल्लेख ऐसी कृतियों में किया जाता है, जिनके आधार पर विष्णु के वैभव, विविध लीलाओं तथा अवतारों से सम्बन्धित प्रसंगों को संगीत और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत करने पर विचार किया जा सकता है।

इस प्रकार की प्रस्तुति में वीर, अद्भुत और भक्ति जैसे भावों की अभिव्यक्ति के लिए उपयुक्त रागों, तालों, नृत्य-संरचनाओं और समूह-अभिनय का संयोजन किया जा सकता है।

इन पाँचों कृतियों के सन्दर्भ में एक साझा आवश्यकता है—मूल ग्रन्थों के प्रामाणिक संस्करण उपलब्ध हों, उनके पाठ और संगीत-निर्देशों का अध्ययन किया जाए तथा संस्कृत के विद्वानों, संगीतज्ञों और नृत्य-निर्देशकों के सहयोग से मंचीय रूप विकसित किए जाएँ। केवल ग्रन्थ का नाम जान लेना पर्याप्त नहीं; उसकी वास्तविक नाट्य-सम्भावनाएँ उसके सूक्ष्म अध्ययन और रचनात्मक प्रयोग से ही सामने आएँगी।

 

वर्तमान रंगमंच की चुनौती : परिचित नामों से आगे बढ़ने की आवश्यकता

कुछ समय पूर्व मुझे देश की प्रतिष्ठित नाट्य एवं नृत्य संस्थाओं के निर्देशकों और कलाकारों का साक्षात्कार लेने का अवसर मिला। संस्कृत नाटक, संगीत तथा उपरूपकों के माध्यम से संस्कृत के जनाभिमुखीकरण के उद्देश्य से एक विशेष कार्यशाला आयोजित की जानी थी। इसी कार्यशाला के लिए संस्थाओं से आवेदन आमन्त्रित किए गए थे।

साक्षात्कार के दौरान एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न सामने आया। संस्कृत नाट्य की परम्परा में गीत, संगीत और नृत्य पर आधारित कृतियों की उपलब्धता तथा उनके मंचीय प्रयोग की सम्भावनाओं के विषय में अनेक निर्देशकों की जानकारी सीमित दिखाई दी। संवादमुक्त अथवा गीतप्रधान नृत्य-नाट्य की शास्त्रीय परम्परा को लेकर भी पर्याप्त परिचय का अभाव अनुभव हुआ।

यह स्थिति विचारणीय है। जब संस्कृत साहित्य में इतने विविध नाट्यरूप और गेय कृतियाँ उपलब्ध हैं, तब मंचीय प्रयोगों का दायरा कुछ प्रसिद्ध रचनाकारों और परिचित कृतियों तक ही क्यों सीमित रह जाए?

संस्कृत के प्राचीन नाटकों को आधुनिक दर्शकों के सामने प्रस्तुत करना निस्सन्देह महत्त्वपूर्ण कार्य है। इसी प्रकार अन्य भाषाओं के नाटकों का संस्कृत रूपान्तरण भी उपयोगी हो सकता है। किन्तु यदि संस्कृत रंगमंच का विकास मुख्यतः इन्हीं दो मार्गों पर निर्भर रह जाए, तो मूल संस्कृत नाट्य-साहित्य और उसकी विविध परम्पराओं का पर्याप्त उपयोग नहीं हो सकेगा।

आवश्यकता इस बात की है कि संस्कृत रंगकर्मी भास, कालिदास, शूद्रक और जयदेव से आगे बढ़कर अन्य नाटककारों, गेय कृतियों, उपरूपकों तथा परवर्ती सांगीतरूपकों की खोज करें। संस्कृत साहित्य में उपलब्ध सामग्री का व्यवस्थित संकलन, सम्पादन, अनुवाद, संगीतात्मक विश्लेषण और मंचीय प्रयोग इस दिशा में ठोस कार्य हो सकता है।

 

वधूटि मा स्म रोदीः : संस्कृत नौटंकी की एक उल्लेखनीय कृति

इसी खोज के क्रम में हाल ही में मेरे हाथ में महाराजदीन पाण्डेय विभाष जी की कृति वधूटि मा स्म रोदीः आई। इस सांगीतरूपक को पाकर मुझे अत्यन्त प्रसन्नता हुई। इसके लिए मैं आदरणीय विभाष जी के प्रति अपना हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ, जिन्होंने मेरे ऊपर स्नेहवर्षा करते हुए यह कृति उपलब्ध कराई।

     पुस्तक के आरम्भ में दी गई सत्रह पृष्ठों की विस्तृत प्रस्तावना विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। यह केवल प्रस्तुत रचना का परिचय नहीं देती, बल्कि संस्कृत की सांगीतरूपक-परम्परा और नौटंकी जैसी लोकनाट्य-विधा के साथ उसके सम्बन्ध को समझने में भी सहायता करती है।


कुछ समय पूर्व इसी विषय पर मेरी चर्चा प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र जी से हुई थी। चर्चा के दौरान उन्होंने उपरूपकों के विषय में एक महत्त्वपूर्ण बात कही थी कि दशरूपक आदि ग्रन्थों में जिन उपरूपकों के नाम और लक्षण मिलते हैं
, उनसे सम्बद्ध अनेक रचनाएँ आज सहज रूप में उपलब्ध नहीं हैं। उन्होंने अपनी दो कृतियों से भी परिचित कराया था।

यह तथ्य संस्कृत नाट्य के अध्ययन के लिए एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठाता है। किसी नाट्यरूप का शास्त्रीय ग्रन्थों में उल्लेख मिलना और उस विधा की कोई पूर्ण, उपलब्ध तथा मंचनीय रचना प्राप्त होना—ये दोनों अलग-अलग स्थितियाँ हैं। इसलिए उपरूपकों के पुनरुद्धार के लिए केवल शास्त्रीय लक्षणों का अध्ययन ही नहीं, बल्कि पाण्डुलिपियों, प्रकाशित ग्रन्थों और आधुनिक संस्कृत रचनाओं की खोज भी आवश्यक है।

आदरणीय महाराजदीन पाण्डेय विभाष जी ने अपनी पुस्तक की प्रस्तावना में कुछ ऐसी रचनाओं का उल्लेख किया है, जिनकी ओर हमारा ध्यान पहले नहीं गया था। वे लिखते हैं कि सन् 1987 में लखनऊ के एक संस्कृतप्रेमी डॉ. कृष्णनारायण पाण्डेय की संस्कृत नौटंकी सीता स्वयंवरम् देखने का अवसर मिला। उसी प्रसंग में डॉ. वीरभद्र मिश्र द्वारा आयोजित ‘संस्कृताक्रीड’ में उनकी नौटंकी सुल्तानादस्युः का मंचन हो रहा था।

विभाष जी के अनुसार, इन रचनाओं के अतिरिक्त उस समय तक उनकी दृष्टि में संस्कृत सांगीतरूपक अथवा नौटंकी की अन्य रचनाएँ नहीं आई थीं। वे आचार्य मिश्र की सुल्तानादस्युः को सम्पूर्ण नाट्यलक्षणों से युक्त संस्कृत के प्रारम्भिक सांगीतरूपकों में एक महत्त्वपूर्ण कृति मानते हैं।

वे यह भी बताते हैं कि लगभग बीस-पच्चीस वर्ष पूर्व उन्होंने यौतकीयम् नाम से एक संस्कृत नौटंकी लिखी थी। उनकी अन्य प्रकाशित पुस्तकों की ग्रन्थसूचियों में इसका उल्लेख कई बार ‘प्रकाश्य’ कृति के रूप में हुआ। वर्तमान वधूटि मा स्म रोदीः उसी रचना का विस्तृत और परिवर्तित रूप है।

     इस जानकारी का महत्त्व इसलिए भी है कि संस्कृत सांगीतरूपक की परम्परा को समझते समय हमें केवल प्राचीन ग्रन्थों की ओर नहीं देखना चाहिए। आधुनिक संस्कृत लेखकों ने भी लोकनाट्य की लोकप्रिय विधाओं को संस्कृत में अपनाने और उनके माध्यम से नाट्य-रचना करने के प्रयास किए हैं। इन प्रयासों का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण किया जाना चाहिए।

 

परम्परा और प्रयोग का समन्वय

वधूटि मा स्म रोदीः की प्रस्तावना में रचना की संरचना से सम्बन्धित कुछ रोचक विशेषताओं की ओर भी संकेत किया गया है। परम्परागत सांगीतरूपक में दृश्यों का विधान नहीं होता, जबकि इस कृति के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध में क्रमशः पाँच-पाँच दृश्य रखे गए हैं। पूर्वार्द्ध के तृतीय दृश्य में एक गर्भदृश्य भी है।

नौटंकी की परम्परा में अभिनय के साथ-साथ इतिवृत्त के उन अंशों की सूचना देने के लिए, जिन्हें मंच पर प्रत्यक्ष रूप में नहीं दिखाया जाता, ‘कवि’ अथवा ‘रंगा’ जैसे पात्र का प्रयोग मिलता है। प्रस्तुत कृति में इस प्रयोजन के लिए ‘ग्रन्थिक’ का प्रयोग किया गया है। इसी प्रकार जहाँ नौटंकी की परम्परा में अर्थोपेक्षकों की व्यवस्था सामान्यतः नहीं मिलती, वहाँ इसके उत्तरार्द्ध में विष्कम्भक का प्रयोग भी उल्लेखनीय है। पुस्तक की प्रस्तावना में इस नाट्य की वस्तु को उत्पाद्य बताया गया है।

इन विशेषताओं से यह समझने में सहायता मिलती है कि कोई आधुनिक संस्कृत रचनाकार परम्परागत नाट्यरूप के मूल स्वभाव को ग्रहण करते हुए उसकी संरचना में किस प्रकार नवीन प्रयोग कर सकता है। यहाँ परम्परा का अर्थ केवल पुराने विधान की पुनरावृत्ति नहीं है, बल्कि उसके आधार पर नई रचनात्मक सम्भावनाओं का विकास भी है।

 

भाषा की प्रौढ़ता और मंचीय सम्प्रेषण

इस कृति का एक पक्ष ऐसा भी है, जिस पर विचार किया जाना आवश्यक है। वधूटि मा स्म रोदीः में प्रौढ़ संस्कृत का प्रयोग हुआ है। साहित्यिक दृष्टि से यह उसकी विशेषता हो सकती है, किन्तु मंचीय प्रस्तुति के समय अभिनेता के लिए इस भाषा को सहज प्रवाह के साथ बोलना और सामान्य दर्शक के लिए उसे तत्काल समझ पाना कुछ कठिन हो सकता है।

यह कठिनाई संस्कृत नाट्य के समक्ष उपस्थित एक व्यापक प्रश्न की ओर संकेत करती है। साहित्यिक प्रामाणिकता और मंचीय सम्प्रेषण के बीच सन्तुलन कैसे स्थापित किया जाए?

इसका समाधान मूल रचना को अनावश्यक रूप से सरल बनाकर उसकी साहित्यिक गरिमा कम करने में नहीं है। इसके स्थान पर अभिनेता-प्रशिक्षण, उच्चारणाभ्यास, संवादों के भावार्थ का पूर्वाभ्यास, उपयुक्त संगीत, दृश्य-संकेत, मुद्राभिनय तथा आवश्यकतानुसार संक्षिप्त परिचय या भावानुवाद की सहायता ली जा सकती है। इस प्रकार संस्कृत की प्रौढ़ता भी सुरक्षित रह सकती है और दर्शकों तक नाट्य का भाव भी पहुँच सकता है।

गीतप्रधान नाट्य में यह सम्भावना और भी अधिक है। संगीत, लय और आंगिक अभिनय दर्शक को कथा से जोड़ने में सहायक होते हैं। यदि निर्देशक इन तत्त्वों का संतुलित प्रयोग करे, तो संस्कृत के प्रति अपरिचित दर्शक भी प्रस्तुति का आनन्द ले सकते हैं।

 

संस्कृत नौटंकी की सम्भावनाएँ

नौटंकी भारतीय लोकनाट्य की एक लोकप्रिय विधा है। इसके संगीत, गायन, कथावाचन, अभिनय और रंगमंचीय ऊर्जा ने इसे व्यापक जनसमुदाय से जोड़ने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यदि इस विधा की विशेषताओं का संस्कृत के साथ रचनात्मक समन्वय किया जाए, तो यह संस्कृत के जनाभिमुखीकरण का एक उपयोगी माध्यम बन सकती है।

सीता स्वयंवरम्, सुल्तानादस्युः, यौतकीयम् और वधूटि मा स्म रोदीः जैसी रचनाओं का उल्लेख इस दिशा में आगे अनुसंधान करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। इन कृतियों के पाठ, रचनाकाल, प्रकाशन-इतिहास, उपलब्ध प्रतियों और मंचन-विवरणों का संकलन किया जाना चाहिए। इनके आधार पर यह समझा जा सकेगा कि आधुनिक संस्कृत लेखकों ने नौटंकी की परम्परा को किस प्रकार अपनाया और संस्कृत नाट्य की आवश्यकताओं के अनुरूप उसमें क्या परिवर्तन किए।

     ऐसा कार्य संस्कृत के शोधार्थियों, नाट्य-निर्देशकों, संगीतज्ञों और लोकनाट्य के अध्येताओं के लिए समान रूप से उपयोगी हो सकता है।

 

वधूटि मा स्म रोदीः के प्रसंग में पुस्तक से प्राप्त यह पद भी उल्लेखनीय है—

 

“उच्चैरियं विरौति रागमालपति च भिन्नं भिन्नम्।

बहिर्यात एव त्वय्यस्याः शुभं नेक्ष्यते चिह्नम्।

दर्शं दर्शं बोभवीति पुत्रक चेतो मे खिन्नम्।

किं वदानि यत्त्वयि सुचिन्तितं सर्वं जातं छिन्नम्॥”

 

इन पंक्तियों में स्वर, राग, विरह और व्याकुलता का जो भावलोक दिखाई देता है, वह सांगीतरूपक की प्रकृति को समझने में सहायक है। यहाँ पद केवल कथ्य को आगे नहीं बढ़ाता, बल्कि अपने भीतर एक भावात्मक वातावरण भी निर्मित करता है। उचित संगीत-संयोजन और अभिनय के साथ ऐसी पंक्तियाँ मंच पर अधिक प्रभावशाली रूप ग्रहण कर सकती हैं।

     गीतप्रधान नाट्य की विशेषता यही है कि काव्य, संगीत और अभिनय अलग-अलग कलारूप बने रहने के स्थान पर एक-दूसरे के अर्थ को विस्तार देते हैं। संस्कृत उपरूपकों और सांगीतरूपकों की परम्परा को पुनर्जीवित करने के लिए कुछ ठोस कदम आवश्यक हैं।

    पहला, उपरूपकों के शास्त्रीय लक्षणों और उनसे सम्बन्धित उपलब्ध रचनाओं का प्रामाणिक संकलन किया जाए। दूसरा, गीतगोविन्दम् के अतिरिक्त अन्य गेय संस्कृत कृतियों के पाठ, संस्करण, राग-ताल निर्देश और मंचीय इतिहास का अध्ययन किया जाए। तीसरा, संस्कृत के विद्वानों, संगीतज्ञों, नृत्य-निर्देशकों और अभिनेताओं के बीच संयुक्त कार्यशालाएँ आयोजित की जाएँ। चौथा, उपलब्ध रचनाओं पर छोटे-छोटे प्रयोगात्मक मंचन किए जाएँ, जिनसे यह जाना जा सके कि किस प्रकार की कृतियाँ वर्तमान दर्शकों तक प्रभावी ढंग से पहुँच सकती हैं।

     इसके साथ ही संस्कृत नाट्य की आधुनिक रचनाओं विशेषतः संस्कृत नौटंकी और अन्य सांगीतरूपकों का भी व्यवस्थित अभिलेखीकरण होना चाहिए। यदि कोई रचना दुर्लभ है, तो उसकी प्रति, लेखक का परिचय, प्रकाशन-विवरण और मंचन से सम्बन्धित सामग्री सुरक्षित की जानी चाहिए। इससे भविष्य के शोधकर्ताओं और कलाकारों को उपयोगी आधार प्राप्त होगा।

     संस्कृत रंगमंच के विकास का अर्थ केवल पुराने नाटकों का पुनर्मंचन अथवा दूसरी भाषाओं के नाटकों का संस्कृत अनुवाद नहीं है। इसका वास्तविक विस्तार तब होगा, जब हम अपनी नाट्यपरम्परा के विविध रूपों को पहचानेंगे, उपेक्षित कृतियों को खोजेंगे और उन्हें समकालीन मंच की आवश्यकताओं से जोड़ेंगे।

     संस्कृत नाट्य-साहित्य में संवादप्रधान नाटकों के साथ-साथ गीत, संगीत, नृत्य और अभिनय के समन्वय से विकसित अनेक नाट्यरूपों की सम्भावनाएँ निहित हैं। भावप्रकाशन में संगीत का दार्शनिक विवेचन हो, गीतगोविन्दम् की गीतात्मक परम्परा हो, अन्य गेय संस्कृत कृतियाँ हों अथवा वधूटि मा स्म रोदीः जैसी आधुनिक संस्कृत नौटंकी—ये सभी हमें भारतीय रंगमंच की बहुआयामी प्रकृति का स्मरण कराते हैं।

     हमारी आवश्यकता केवल इन कृतियों की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि उन्हें पढ़ना, समझना, प्रमाणित करना, उन पर शोध करना और मंच पर लाना है। जब संस्कृत के विद्वान, संगीतज्ञ, नर्तक और रंगकर्मी एक साथ कार्य करेंगे, तभी इस विरासत की वास्तविक सम्भावनाएँ सामने आएँगी।

     महाराजदीन पाण्डेय विभाष जी की वधूटि मा स्म रोदीः जैसी कृतियाँ इस दिशा में हमारी जिज्ञासा को बढ़ाती हैं। अब आवश्यकता है कि ऐसी रचनाओं को व्यक्तिगत संग्रहों और सीमित पाठक-वर्ग तक सीमित न रहने दिया जाए, बल्कि उन्हें व्यापक सांस्कृतिक विमर्श और रंगमंचीय प्रयोगों का हिस्सा बनाया जाए।

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