संस्कृत शिक्षण पाठशाला 2

संस्कृत भाषा सीखने के लिए मेरे ब्लॉग तक आये अध्येता कृपया ध्यान दें।  इस पाठ को समझने के लिए इसके पूर्व के पाठ संस्कृत शिक्षण पाठशाला 1 को अवश्य पढ़ें। 

                                     धातुओं (क्रियाओं) से परिचय         पाठ 10

पूर्व के पाठ में आपने क्रिया के बारे में संक्षेप में जाना था। इस पाठ में हम उसके विविध स्वरूपों पर चर्चा तथा प्रयोग करेंगें। 
लिखना, जाना, करना, पढ़ना, देखना, बोलना आदि जो भी क्रियाएँ हैं, उन क्रियाओं के वाचक जो लिख्, गम्, कृ, पठ्, दृष् आदि शब्द हैं, संस्कृत में इनका नाम धातु है। धातुपाठ में पाणिनि ने इन धातुओं का उपदेश दिया है। अतः इसे औपदेशिक धातु भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त सन्, क्यच् ,काम्यच्, क्यष्, क्यङ्, क्विप्, णिङ्, ईयङ्, णिच्, यक्, आय, यङ्, ये 12 प्रत्यय जिसके भी अन्त में लगते हैं, उसका नाम भी धातुहो जाता है। ये आतिदेशिक धातु कहे जाते हैं। इन्हें आप प्रत्ययान्त धातु भी कह सकते हैं। इस प्रकार ये धातु दो तरह के होते हैं।
 धातुओं के मूल स्वरूप तथा भेद को जानने के बाद ही हम उसमें लगने वाले उपसर्गों, कृदन्त, सनन्त आदि के प्रत्ययों तथा वाच्य के बारे में ठीक से समझ सकेगें। 
        संस्कृत में धातुओं की संख्या पर मतभेद हैं। अनेक गणों में कह गये एक ही धातु को कोई अलग-अलग स्वीकार करते हैं तो कोई एक। इसी प्रकार कुछ ऐसे धातु जिनका विभक्तियों में रूप तथा अर्थ एक समान होते हुए मूल धातु के स्वरूप में थोड़ा अंतर होता है। कुछ लोग उन्हें एक ही मानते हैं,जबकि कुछ लोग अलग। इस प्रकार इसकी कुल संख्या 1930 से 1970 के बीच मानी जाती है। इनमें से व्यवहार में लगभग 600 धातुओं का ही प्रयोग होता है।
इन धातुओं का संकलित कर मैंने अपने इस ब्लॉग के एक पोस्ट में लिखा है। यहाँ सभी धातुओं के हिन्दी अर्थ, धातु नाम, गण नाम, परस्मैपद/ आत्मनेपद तथा लट् लकार के प्रथमा एकवचन का रूप भी दिया है। विशेष यह कि यहाँ धातुओं को अकारादि क्रम में नहीं रखते हुए हिन्दी अर्थ को अकादि क्रम में रखते हुए उसके सम्मुख धातु का नाम तथा अन्य विवरण दिया गया है। जैसे-  
अच्छा लगना                    रुच दीप्तावभिप्रीतौ च                      भ्वादि    आत्मनेपद           रोचते
अच्छा लगना                    लस् श्लेषणक्रीडनयो:                       भ्वादि    परस्मैपद             लसति
अध्ययन करना                  इङ् अध्ययने नित्यमधिपूर्वः               अदादि   आत्मनेपद           अधीते
अभिनय करना                  नट् नृत्तौ                                     चुरादि    परस्मैपदी            नाटयति
 यह कोश क्रम आपके अनुवाद कार्य में उपयोगी होगा। यहाँ से आप किसी क्रिया का धातु आसानी से खोज सकते हैं। इस लिंक पर जाने के लिए संस्कृत की महत्वपूर्ण धातुओं के अर्थ, गण तथा रूप चटका लगायें।
  इसमें यदि लगभग 50 सन्नन्त धातुओं को जोड़ ले तो व्यवहार में आने वाली धातुओं की कुल संख्या 650 होगी। व्यवहार में प्रचलित धातुओं की सूची मैं एक अलग पोस्ट में उपलब्ध करा दूंगा । इन धातुओं में लगने वाले 175 प्रत्ययों की रूप सिद्धि के लिए 175 सूत्रों (नियमों) को जानने की आवश्यकता है। सम्पूर्ण संस्कृत वाङ्मय में प्रयुक्त किये गये क्रियापद के विविध रूप बस इतने में ही सिमटा हुआ है। इसी से हम लाखों नवीन क्रियाओं को जान लेते हैं। 

संस्कृत धातुओं के स्वरूप तथा प्रयोग

धातुओं को उसके विकरण प्रत्यय के आधार पर कुल 10 गणों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक गण का नाम उसके प्रथम धातु के आधार पर रखा गया है,जैसे भ्वादिगण का नाम उसके प्रथम धातु भू (सत्तायाम्) के आधार पर है। भू+आदि = भ्वादि । इसी प्रकार अदादि आदि। विकरण के कारण धातुओं के स्वरूप में परिवर्तन देखा जाता है। अतः यहाँ 10 गणों के नाम तथा उसके विकरण से परिचित कराया जाता है। 

गण का  नाम          मूल विकरण       लोप के बाद का विकरण
1. भ्वादि गण                  शप्                     अ                           
2. अदादिगण                    शप्                   शप् का लुक् हो जाता है
3. जुहोत्यादि गण              शप् श्लु              श्लु का लुक्, शप् का अ बचता है।
4. दिवादि गण                 श्यन्                 य           
5. स्वादि गण                    श्नु                     नु
6. तुदादि गण                    श                     अ
7. रुधादि गण                    श्नम्                  न
8. तनादि गण                     उ                     उ
9. क्रयादि गण                     श्ना                  श्ना
10. चुरादि गण                   शप् णिच्          अ

नियम - 1
यदि धातु से लगने वाला प्रत्यय कर्मार्थक या भावार्थक सार्वधातुक हो, तब किसी भी गण के धातु से यक्विकरण लगाया जाता है। शप् आदि अन्य कोई भी विकरण नहीं। जैसे - गम्यते, स्थीयते, चीयते, तन्यते आदि में धातु + प्रत्यय के बीच मेंयक्’, यह विकरण ही बैठा है, क्योंकि यहाँ तेप्रत्यय का अर्थ कर्म या भाव है।
धातु से लगने वाला प्रत्यय जब आर्धधातुक होता हैतब धातुओं से कोई विकरण नहीं जोड़ा जाता। 
नियम 2
जब धातु से लगने वाला प्रत्यय कर्त्रर्थक सार्वधातुक होता है, तब धातु में तत् तत् गणों के विकरण जोड़े जाते हैं।
कर्तृ वाच्य के सार्वधातुक लकारों में धातुओं से लगने वाले विकरण-
भ्वादिगण में 1035 धातु हैं। इस गण के लिए कोई  विकरण नहीं कहा गया है, अतः कर्तरि शप् से कर्ता अर्थ में सार्वधातुक प्रत्यय परे होने पर सभी धातुओं से शप् विकरण लगता है। शप् में शकार और अकार की इत्संज्ञा तथा लोप हो जाता है। शकार के लोप होने से इसे शित् प्रत्यय कहते हैं। शित् प्रत्यय की सार्वधातुक संज्ञा होती है। इसके अनुसार भ्वादिगण के सारे धातुओं से शप् विकरण लगेगा। प्रक्रिया- भू + लट् ।  भू + ति, भू + शप् + ति । भू + अ + ति । भो + अ + ति ।  भव + ति = भवति। 

अदिप्रभृतिभ्यः शपः (लुक्) - धातुपाठ में अदादिगण में 72 धातु हैं। इस गण के धातुओं से शप् विकरण लगता है और उसका लुक् (लोप) हो जाता है। जैसे - अद् + शप् + ति = अद् + ति = अत्ति। इस प्रकार अदादिगण अर्थात् द्वितीयगण का विकरण शप्लुक्है। शप् प्रत्यय सार्वधातुक है, परन्तु यहाँ उसका लुक् हो जाता है।
जुहोत्यादिभ्यः श्लुः - जुहोत्यादिगण में 24 धातु हैं। इस गण के धातुओं से शप् विकरण लगता है और उसका श्लु (लोप) हो जाता है। जैसे - जुहु + शप् + ति = जुहु + ति = जुहोति। इस प्रकार जुहोत्यादिगण अर्थात् तीसरा गण का विकरण शप् श्लुहै। शप् प्रत्यय सार्वधातुक है, परन्तु यहाँ उसका श्लु = लोप हो जाता है।

दिवादिभ्यः श्यन् -  दिवादिगण में 140 धातु हैं। इस गण के धातुओं से श्यन् विकरण लगता है। जैसे - दीव् + श्यन् + ति = दीव् + य + ति = दीव्यति। इस प्रकार दिवादिगण अर्थात् चतुर्थगण का विकरण श्यन्है। श्यन् प्रत्यय सार्वधातुक है।

स्वादिभ्यः श्नुः - धातुपाठ में स्वादि गण में 34 धातु हैं। इस गण के धातुओं से शप् के स्थान पर श्नु विकरण लगता है। जैसे - सु + श्नु + ति = सु + नु + ति = सुनोति। इस प्रकार स्वादिगण अर्थात् पांचवें गण का विकरण श्नुहै। यह सार्वधातुक है।

तुदादिभ्यः शः - तुदादिगण में 157 धातु हैं। इस गण के धातुओं से ’ विकरण लगता है। जैसे - तुद् + श + ति = तुद + अ + ति = तुदति। इस प्रकार तुदादिगण अर्थात् छठे गण का विकरण है। श प्रत्यय सार्वधातुक है।

रुधादिभ्यः श्नम् - धातुपाठ के रुधादिगण में 25 धातु हैं। इस गण के धातुओं से श्नम् विकरण लगता है। जैसे - रुध् + श्नम् + ति = रुणद्धि। इस प्रकार रुधादिगण अर्थात् सप्तवें गण का विकरण श्नम्है। श्नम् प्रत्यय सार्वधातुक है।

तनादिकृञ्भ्यः उः - तनादिगण में 10 धातु हैं। इस गण के धातुओं से ‘विकरण लगता है। जैसे - तन् + उ + ति = तनोति। इस प्रकार तनादिगण अर्थात् आठवें गण का विकरण है। प्रत्यय आर्धधातुक है।

क्रयादिभ्यः श्ना - क्रयादिगण में 61 धातु हैं। इस गण के धातुओं से श्ना विकरण लगता है। जैसे - क्री + श्ना + ति = क्रीणाति। इस प्रकार क्रयादिगण अर्थात् नवमें का विकरण श्ना है। श्नाप्रत्यय सार्वधातुक है।

सत्यापपाशरूपवीणातूलश्लोकसेनालोमत्वच्वर्मवर्णचूर्णचुरादिभ्यो णिच् - चुरादिगण में 410 धातु हैं। इन धातुओं से पहले णिच्प्रत्यय लगाकर धातु बनाया जाता है। अनन्तर शप् विकरण लगता है। चूँकि इनसे भी कोई अन्य विकरण नहीं कहा गया है, अतः इनसे शप् विकरण ही लगता है।
         चुरादिगण के धातुओं से लगने वाला णिच् प्रत्यय स्वार्थिक प्रत्यय है, यह विकरण नहीं है, विकरण तो शप् ही है। जैसे - चुर् + णिच् = चोरि। यह चोरिबन जाने के बाद ही अब इससे शप् विकरण लगाकर चोरि + शप् + ति = चोरयति बनाया जाता है।
ध्यान रहे कि वस्तुतः सारे धातुओं के लिये विकरण तो शप् ही है किन्तु यह शप् केवल उन धातुओं से ही लगता है, जिनसे कोई अन्य विकरण न कहा जाये। जैसे - दिवादिगण के धातुओं से श्यन् विकरण कहा गया है, अतः इनसे श्यन् ही लगेगा, शप् नहीं। चुरादिगण के धातुओं से कोई विकरण नहीं कहा गया है, अतः इनसे भी शप् ही लगेगा। हमने यह देखा कि जिस विकरण में श् का लोप होता है, वह विकरण सार्वधातुक कहा जाता है। इसके लिए हमें तिङ्शित्सार्वधातुकम् सूत्र को याद रखना चाहिए।

सनाद्यन्ता धातवः सूत्र से जिन प्रत्ययान्त धातुओं की धातु संज्ञा हुई है, इन धातुओं से कोई भी विकरण नहीं कहा गया। यहाँ लगने वाले विकरण पर विचार किया जाएगा।
इसी प्रकार सन्, क्यच् ,काम्यच्, क्यष्, क्यङ्, क्विप्, णिङ्, ईयङ्, णिच्, यक्, आय, यङ् ये 12 प्रत्यय लगाकर सनाद्यन्ता धातवः सूत्र से जो भी धातु बनेंगे, उनसे भी शप् ही लगेगा, क्योंकि इन धातुओं से भी अन्य कोई विकरण नहीं कहा गया है।

संस्कृत में सकर्मक / अकर्मक धातु

सकर्मक धातु (क्रिया) कर्म और कर्ता में तथा अकर्मक धातु (क्रिया) भाव और कर्ता में होता है।  इसमें पाँच पारिभाषिक शब्द हैं। इसे आगे और स्पष्ट किया जाएगा। क्रिया को धातु कहा जाता है। इस धातु के दो अर्थ होते हैं। फल और व्यापार।
फलव्यापारयोः धातुराश्रये तु तिङः स्मृतः।
फल जिस चीज की प्राप्ति के लिए कोई क्रिया की जाती है, उसे फल कहते हैं। बालकः गृहं गच्छति वाक्य में घर की प्राप्ति के लिए गमन क्रिया की जा रही है। यहाँ गाँव के साथ संयोग फल है।
व्यापार फल को पाने के लिए की जाने वाली क्रिया व्यापार कहलाता है। गच्छति में गाँव जाने की क्रिया को व्यापार कहते हैं। फल हमेशा कर्म में रहता है तथा व्यापार कर्ता में रहता है, क्योंकि कर्ता ही किसी कार्य को करता है।
कर्ता क्रिया के व्यापार का आश्रय कर्ता कहलाता है। किसी कार्य को जो करता है, उसे कर्ता कहते हैं।
कर्म -  क्रिया के फल का आश्रय कर्म कहलाता है। अर्थात् क्रिया का फल जिसमें रहता है, उसे कर्म कहते हैं।
भाव व्यापार को भाव कहते हैं। अर्थात् जो कार्य होता है, उसे भाव कहते है।

सकर्मक  तथा अकर्मक धातुओं को इस श्लोक से समझा जा सकता है।
            क्रियापदं कर्तृपदेन युक्तं व्यपेक्षते यत्र किमित्यपेक्षाम् ।
            सकर्मकं तं सुधियो वदन्ति शेषस्ततो धातुरकर्मकः स्यात् ।।
कर्ता से युक्त जिस क्रियापद को किम् इस पद की अपेक्षा रहती है, उसे सकर्मक क्रिया और इसके अतिरिक्त को अकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे - बालकः ओदनं खदति में किम् इस पद की अपेक्षा करने पर ओदनं उत्तर आएगा, जबकि बालकः शेते में  किम् इस पद की अपेक्षा करने पर कोई भी उत्तर नहीं आता। इससे स्पष्ट है कि शीङ् शयने (शयन करना/ सोना) धातु अकर्मक है। अकर्मक धातुओं की पहचान के लिए कतिपय क्रियाओं की स्थितियों को श्लोक में बताया गया है। इससे अकर्मक धातु को पहचानना और आसान हो जाता है।
अकर्मक - लज्जा-सत्ता-स्थिति-जागरणं वृद्धि-क्षय-भय-जीवित-मरणम्।
  शयन-क्रीडा-रुचि-दीप्त्यर्थं धातुगणं तमकर्मकमाहुः।।
अर्थ – लज्जा, सत्ता, स्थिति, जागरण, वृद्धि, क्षय, भय, जीवित, मरण, शयन, क्रीडा, रुचि,दीप्ति इतने अर्थों में धातुएँ अकर्मक होती है।
सकर्मक, अकर्मक को पहचानने का अन्य उपाय-
1. फलव्यापारव्यधिकरणवाचकत्वं सकर्मकत्वम्।
यदि किसी धातु के फल और व्यापार का वाचक अलग- अलग हो तो वह सकर्मक धातु है।
2. फलव्यापारसमानाधिकरणवाचकत्वम् अकर्मकत्वम्।
यदि किसी धातु के फल और व्यापार का वाचक एक हो तो वह अकर्मक धातु है।

धातुओं में सेट्, अनिट् और वेट् व्यवस्था

        यदि आप यह समझ जायें कि कौन- कौन धातु सेट्अनिट् और वेट् होता है तब रूप सिद्धि में काफी सहायता मिलेगी। जिस धातु में इट्  का आगम होता है वह सेट् कहा जाता हैजिसमें इट् का आगम / प्रयोग नहीं होता वह  'अनिट्कहा जाता है ।
निम्नलिखित अजन्त धातुओं को छोड़कर शेष सभी अजन्त धातु अनिट् कहे जाते हैं-
ऊदन्तऋदन्‍तयुरुक्ष्‍णुशीड्.स्‍नुनुक्षुश्विडीड्.श्रीवृड्.वृञ् ।
अधिक जानकारी देने के लिए एक पृथक् प्रकरण में इडागम व्यवस्थासेट्अनिट् धातु के बारे में बताया जाएगा।

                                              पाठ 11

वाच्य

क्रिया के उस प्रकार को वाच्य कहते हैं, जिसके द्वारा इस बात का ज्ञान होता है कि क्रिया (धातु) कर्ता, कर्म या भाव में से किसके अर्थ में प्रयुक्त हो रहा है। संस्कृत भाषा में वाक्यों का प्रयोग तीन प्रकार से किया जाता है - 1. कर्ता प्रधान वाक्य 2. कर्म प्रधान वाक्य तथा 3. भाव या क्रिया प्रधान वाक्य । जिस वाक्य में कर्ता की प्रधानता होती है उसे कर्तृ वाच्य, जिस वाक्य में कर्म की प्रधानता होती है उसे कर्मवाच्य तथा जिस वाक्य में क्रिया मात्र की प्रधानता होती है उसे भाव वाच्य  कहा जाता है।

आईये अब वाच्य को क्रमबद्ध रूप से जानते हैं कि किस धातु से कौन सा वाच्य होगा।
लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः (पा.सू. 3/4/69)
सकर्मक धातुओं से कर्ता और कर्म में तथा अकर्मक धातुओं से कर्ता और भाव में लकार होते हैं।
इस सूत्र से स्पष्ट है कि कोई भी धातु सकर्मक हो या अकर्मक, कर्ता दोनों में आता है। अतः लकार का प्रयोग तीन ही रूपों में होगा- कर्ता, कर्म और भाव में। इनको ही क्रमशः कर्तृ वाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य की संज्ञा दी गई है।  इस सूत्र का अभिप्राय इन्ही वाच्य विभेदों को स्पष्ट करना है। 
वाच्य परिवर्तन के साथ-साथ वाक्य की संरचना में भी अन्तर देखा जाता है। इसके कतिपय कारण हैं। उदाहरण के लिए कर्तृ वाच्य में लकार कर्ता में होता है। तात्पर्य यह है कि लकार का वचन और पुरुषकर्ता के अनुसार ही होता है, जैसे रामः पुस्तकं पठति
                                               पाठ 12

उपसर्ग

प्र, परा, अप, सम्‌, अनु, अव, निस्‌, निर्‌, दुस्‌, दुर्‌, वि, आङ्, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि तथा उप एते प्रादयः। प्रादि गण में पठित शब्दों को उपसर्ग कहा जाता है। ये धातु तथा प्रातिपदिक (कारक विभक्ति ) के पहले लगते हैं। इससे उसके मूल अर्थ में परिवर्तन हो जाता है। संस्कृत के मूल धातु में कभी एक तो कभी एक से अधिक उपसर्गों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार एक धातु के अनेक अर्थ हो जाते हैं। कहा भी गया है-
                 उपसर्गेणैव धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते ।
                प्रहाराहारसंहारविहारपरिहारवत् ।।
इनमें से निस् निर् तथा दुस् दुर् के में से क्रमशः नि तथा दु उपसर्ग  ही अर्थ परिवर्तन करता है। अतः अलग- अलग उदाहरण नहीं दिये गये हैं।
प्र -         अधिक, आगे,
परा -       विपरीत, अनादर, नाश
अप -     हीन, अभाव, हीनता, विरुद्ध 
सम्-      संयोग, पूर्णता
अनु-      पीछे, समानता, क्रम, पश्चात्
अव-      नीचे, अनादर, पतन
निस्-     निषेध, नीचे, अतिरिक्त
निर्-     बुरा, निषेध, रहित
दुस्-      बुरा, हीन
दुर्-       बुरा, हीन
वि-       हीनता,विशेष
आङ्-     सहित, सीमा, विपरीत
नि-       भीतर, नीचे, अतिरिक्त
अधि-    ऊपर, श्रेष्ठ
अपि-     और, निकट
अति-     अधिक, ऊपर,
सु-        अच्छा
उत्-      ऊपर
अभि-    और
प्रति-     विरुद्ध
परि-     चारों ओर
उप-      निकट 
इन उपसर्गों के अतिरिक्त कुछ अव्यय भी उपसर्ग की तरह प्रयुक्त होते हैं-
अन्तः-   बीच में
अधस्-   नीचे
चिरम्-  बहुत देर
नञ्-      नहीं
पुनर्-    फिर
बहिर्-   बाहर

अन्तः-   सामने

 यहाँ पर इन के कुल 223 उदाहरण नीचे के लिंक में दिये जा रहे हैं।
संस्कृत भाषा सीखने के इच्छुक व्यक्ति संस्कृत के उपसर्गों का अर्थ लिंक पर चटका लगायें। यह एक अलग विंडो में खुलेगा। यहाँ पर उपसर्गों के अर्थ और उनके प्रयोग को विस्तार से बताया गया है।

व्याकरण में  इनका नाम उपदेश है-

धातुसूत्रगणोनादि वाक्यलिङ्गानुशासनम् ।
आगमप्रत्ययादेशा उपदेशाः प्रकीतिताः ।।
धातु , सूत्रगणउणादि,वाक्य,लिङ्गानुशासनआगमप्रत्यय तथा आदेश ।
सूत्र छः प्रकार के होते हैं-

संज्ञा च परिभाषा च विधिर्नियम एव च ।
अतिदेशो अधिकारश्च षड्विधं सूत्रलक्षणम् ।।
संज्ञा      -           संज्ञासंज्ञिप्रत्यायकं सूत्रम् ।
परिभाषा-          अनियमे नियमकारिणी ।
विधिः   -           आदेशादिविधायकं सूत्रम् ।
नियमः  -           प्राप्तस्य विधेः नियामकम् ।          
अतिदेशः-          अन्यतुल्यत्वविधानम् ।
अधिकारः-         एकत्र उपात्तस्य अन्यत्र व्यापारः ।
उदाहरण -
संज्ञासूत्रम् =                   हलन्त्यम्अदर्शनं लोपः अदेङ् गुणः,
परिभाषासूत्रम्   =          यथासंख्यमनुदेशः समानाम् , स्थानेऽन्तरतमः ।
विधिसूत्रम् =                  वृद्धिरेचिआद्गुण:तस्य लोपः ।
नियमसूत्रम्        =          षष्ठी स्थाने योगाकृत्तद्धितसमासाश्च।
अतिदेशसूत्रम्     =          स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ ।
अधिकारसूत्रम्    =          प्रत्ययःपूर्वत्रासिद्धम्,संहितायाम्।


इस पाठ के आगे अध्ययन करने के लिए संस्कृत शिक्षण पाठशाला 3 पर क्लिक करें।


बाबूराम सक्सेना कृत संस्कृत व्याकरण प्रवेशिका पुस्तक फ्री में डाउनलोड करें। 


2 टिप्‍पणियां:

  1. कृपया व्यवहार में प्रचलित धातुओं की सूची का लिंक प्रदान करें ।

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत ही सुन्दर प्रयास

    जवाब देंहटाएं

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