संस्कृत शिक्षण पाठशाला 2

संस्कृत भाषा सीखने के लिए मेरे ब्लॉग तक आये अध्येता कृपया ध्यान दें।  इस पाठ को समझने के लिए इसके पूर्व के पाठ संस्कृत शिक्षण पाठशाला 1 को अवश्य पढ़ें। 

                                                       पाठ 10
पूर्व के पाठ में आपने क्रिया के बारे में संक्षेप में जाना था। इस पाठ में हम उसके विविध स्वरूपों पर चर्चा तथा प्रयोग करेंगें। 
लिखना, जाना, करना, पढ़ना, देखना, बोलना आदि जो भी क्रियाएँ हैं, उन क्रियाओं के वाचक जो लिख्, गम्, कृ, पठ्, दृष् आदि शब्द हैं, संस्कृत में इनका नाम धातु है। धातुपाठ में पाणिनि ने इन धातुओं का उपदेश दिया है। अतः इसे औपदेशिक धातु भी कहते हैं। इसके अतिरिक्त सन्, क्यच् ,काम्यच्, क्यष्, क्यङ्, क्विप्, णिङ्, ईयङ्, णिच्, यक्, आय, यङ्, ये 12 प्रत्यय जिसके भी अन्त में लगते हैं, उसका नाम भी धातुहो जाता है। ये आतिदेशिक धातु कहे जाते हैं। इन्हें आप प्रत्ययान्त धातु भी कह सकते हैं। इस प्रकार ये धातु दो तरह के होते हैं।
 धातुओं के मूल स्वरूप तथा भेद को जानने के बाद ही हम उसमें लगने वाले उपसर्गों, कृदन्त, सनन्त आदि के प्रत्ययों तथा वाच्य के बारे में ठीक से समझ सकेगें। संस्कृत में धातुओं की संख्या पर मतभेद हैं। अनेक गणों में कह गये एक ही धातु को कोई अलग-अलग स्वीकार करते हैं तो कोई एक। इसी प्रकार कुछ ऐसे धातु जिनका विभक्तियों में रूप तथा अर्थ एक समान होते हुए मूल धातु के स्वरूप में थोड़ा अंतर होता है कुछ लोग उन्हें एक ही मानते हैं,जबकि कुछ लोग अलग। इस प्रकार इसकी कुल संख्या 1930 से 1970 के बीच मानी जाती है। इनमें से व्यवहार में लगभग 600 धातुओं का ही प्रयोग होता है।  इसमें यदि लगभग 50 सन्नन्त धातुओं को जोड़ ले तो व्यवहार में आने वाली धातुओं की कुल संख्या 650 होगी। व्यवहार में प्रचलित धातुओं की सूची मैं एक अलग पोस्ट में उपलब्ध करा दूंगा । इन धातुओं में लगने वाले 175 प्रत्ययों की रूप सिद्धि के लिए 175 सूत्रों (नियमों) को जानने की आवश्यकता है। सम्पूर्ण संस्कृत वाङ्मय में प्रयुक्त किये गये क्रियापद के विविध रूप बस इतने में ही सिमटा हुआ है। इसी से हम लाखों नवीन क्रियाओं को जान लेते हैं। 

संस्कृत धातुओं के स्वरूप तथा प्रयोग

धातुओं को उसके विकरण प्रत्यय के आधार पर कुल 10 गणों में विभाजित किया गया है। प्रत्येक गण का नाम उसके प्रथम धातु के आधार पर रखा गया है,जैसे भ्वादिगण का नाम उसके प्रथम धातु भू (सत्तायाम्) के आधार पर है। भू+आदि = भ्वादि । इसी प्रकार अदादि आदि। विकरण के कारण धातुओं के स्वरूप में परिवर्तन देखा जाता है। अतः यहाँ 10 गणों के नाम तथा उसके विकरण से परिचित कराया जाता है। 

गण का  नाम          मूल विकरण       लोप के बाद का विकरण
1. भ्वादि गण                  शप्                     अ                           
2. अदादिगण                    शप्                   शप् का लुक् हो जाता है
3. जुहोत्यादि गण              शप् श्लु              श्लु का लुक्, शप् का अ बचता है।
4. दिवादि गण                 श्यन्                 य           
5. स्वादि गण                    श्नु                     नु
6. तुदादि गण                    श                     अ
7. रुधादि गण                    श्नम्                  न
8. तनादि गण                     उ                     उ
9. क्रयादि गण                     श्ना                  श्ना
10. चुरादि गण                   शप् णिच्          अ

नियम - 1
यदि धातु से लगने वाला प्रत्यय कर्मार्थक या भावार्थक सार्वधातुक हो, तब किसी भी गण के धातु से यक्विकरण लगाया जाता है। शप् आदि अन्य कोई भी विकरण नहीं। जैसे - गम्यते, स्थीयते, चीयते, तन्यते आदि में धातु + प्रत्यय के बीच मेंयक्’, यह विकरण ही बैठा है, क्योंकि यहाँ तेप्रत्यय का अर्थ कर्म या भाव है।
धातु से लगने वाला प्रत्यय जब आर्धधातुक होता हैतब धातुओं से कोई विकरण नहीं जोड़ा जाता। 
नियम 2
जब धातु से लगने वाला प्रत्यय कर्त्रर्थक सार्वधातुक होता है, तब धातु में तत् तत् गणों के विकरण जोड़े जाते हैं।
कर्तृ वाच्य के सार्वधातुक लकारों में धातुओं से लगने वाले विकरण-
भ्वादिगण में 1035 धातु हैं। इस गण के लिए कोई  विकरण नहीं कहा गया है, अतः कर्तरि शप् से कर्ता अर्थ में सार्वधातुक प्रत्यय परे होने पर सभी धातुओं से शप् विकरण लगता है। शप् में शकार और अकार की इत्संज्ञा तथा लोप हो जाता है। शकार के लोप होने से इसे शित् प्रत्यय कहते हैं। शित् प्रत्यय की सार्वधातुक संज्ञा होती है। इसके अनुसार भ्वादिगण के सारे धातुओं से शप् विकरण लगेगा। प्रक्रिया- भू + लट् ।  भू + ति, भू + शप् + ति । भू + अ + ति । भो + अ + ति ।  भव + ति = भवति। 
अदिप्रभृतिभ्यः शपः (लुक्) - धातुपाठ में अदादिगण में 72 धातु हैं। इस गण के धातुओं से शप् विकरण लगता है और उसका लुक् (लोप) हो जाता है। जैसे - अद् + शप् + ति = अद् + ति = अत्ति। इस प्रकार अदादिगण अर्थात् द्वितीयगण का विकरण शप्लुक्है। शप् प्रत्यय सार्वधातुक है, परन्तु यहाँ उसका लुक् हो जाता है।
जुहोत्यादिभ्यः श्लुः - जुहोत्यादिगण में 24 धातु हैं। इस गण के धातुओं से शप् विकरण लगता है और उसका श्लु (लोप) हो जाता है। जैसे - जुहु + शप् + ति = जुहु + ति = जुहोति। इस प्रकार जुहोत्यादिगण अर्थात् तीसरा गण का विकरण शप् श्लुहै। शप् प्रत्यय सार्वधातुक है, परन्तु यहाँ उसका श्लु = लोप हो जाता है।
दिवादिभ्यः श्यन् -  दिवादिगण में 140 धातु हैं। इस गण के धातुओं से श्यन् विकरण लगता है। जैसे - दीव् + श्यन् + ति = दीव् + य + ति = दीव्यति। इस प्रकार दिवादिगण अर्थात् चतुर्थगण का विकरण श्यन्है। श्यन् प्रत्यय सार्वधातुक है।
स्वादिभ्यः श्नुः - धातुपाठ में स्वादि गण में 34 धातु हैं। इस गण के धातुओं से शप् के स्थान पर श्नु विकरण लगता है। जैसे - सु + श्नु + ति = सु + नु + ति = सुनोति। इस प्रकार स्वादिगण अर्थात् पांचवें गण का विकरण श्नुहै। यह सार्वधातुक है।
तुदादिभ्यः शः - तुदादिगण में 157 धातु हैं। इस गण के धातुओं से ’ विकरण लगता है। जैसे - तुद् + श + ति = तुद + अ + ति = तुदति। इस प्रकार तुदादिगण अर्थात् छठे गण का विकरण है। श प्रत्यय सार्वधातुक है।
रुधादिभ्यः श्नम् - धातुपाठ के रुधादिगण में 25 धातु हैं। इस गण के धातुओं से श्नम् विकरण लगता है। जैसे - रुध् + श्नम् + ति = रुणद्धि। इस प्रकार रुधादिगण अर्थात् सप्तवें गण का विकरण श्नम्है। श्नम् प्रत्यय सार्वधातुक है।
तनादिकृञ्भ्यः उः - तनादिगण में 10 धातु हैं। इस गण के धातुओं से ‘विकरण लगता है। जैसे - तन् + उ + ति = तनोति। इस प्रकार तनादिगण अर्थात् आठवें गण का विकरण है। प्रत्यय आर्धधातुक है।
क्रयादिभ्यः श्ना - क्रयादिगण में 61 धातु हैं। इस गण के धातुओं से श्ना विकरण लगता है। जैसे - क्री + श्ना + ति = क्रीणाति। इस प्रकार क्रयादिगण अर्थात् नवमें का विकरण श्ना है। श्नाप्रत्यय सार्वधातुक है।
सत्यापपाशरूपवीणातूलश्लोकसेनालोमत्वच्वर्मवर्णचूर्णचुरादिभ्यो णिच् - चुरादिगण में 410 धातु हैं। इन धातुओं से पहले णिच्प्रत्यय लगाकर धातु बनाया जाता है। अनन्तर शप् विकरण लगता है। चूँकि इनसे भी कोई अन्य विकरण नहीं कहा गया है, अतः इनसे शप् विकरण ही लगता है।
चुरादिगण के धातुओं से लगने वाला णिच् प्रत्यय स्वार्थिक प्रत्यय है, यह विकरण नहीं है, विकरण तो शप् ही है। जैसे - चुर् + णिच् = चोरि। यह चोरिबन जाने के बाद ही अब इससे शप् विकरण लगाकर चोरि + शप् + ति = चोरयति बनाया जाता है।
ध्यान रहे कि वस्तुतः सारे धातुओं के लिये विकरण तो शप् ही है किन्तु यह शप् केवल उन धातुओं से ही लगता है, जिनसे कोई अन्य विकरण न कहा जाये। जैसे - दिवादिगण के धातुओं से श्यन् विकरण कहा गया है, अतः इनसे श्यन् ही लगेगा, शप् नहीं। चुरादिगण के धातुओं से कोई विकरण नहीं कहा गया है, अतः इनसे भी शप् ही लगेगा। हमने यह देखा कि जिस विकरण में श् का लोप होता है, वह विकरण सार्वधातुक कहा जाता है। इसके लिए हमें तिङ्शित्सार्वधातुकम् सूत्र को याद रखना चाहिए।

साथ ही सनाद्यन्ता धातवःसूत्र से जिन प्रत्ययान्त धातुओं की धातु संज्ञा हुई है, इन धातुओं से कोई भी विकरण नहीं कहा गया। यहाँ लगने वाले विकरण पर विचार किया जाएगा।
इसी प्रकार सन्, क्यच् ,काम्यच्, क्यष्, क्यङ्, क्विप्, णिङ्, ईयङ्, णिच्, यक्, आय, यङ् ये 12 प्रत्यय लगाकर सनाद्यन्ता धातवः सूत्र से जो भी धातु बनेंगे, उनसे भी शप् ही लगेगा, क्योंकि इन धातुओं से भी अन्य कोई विकरण नहीं कहा गया है।

संस्कृत में सकर्मक / अकर्मक धातु

सकर्मक धातु (क्रिया) कर्म और कर्ता में तथा अकर्मक धातु (क्रिया) भाव और कर्ता में होता है।  इसमें पाँच पारिभाषिक शब्द हैं। इसे आगे और स्पष्ट किया जाएगा। क्रिया को धातु कहा जाता है। इस धातु के दो अर्थ होते हैं। फल और व्यापार।
फलव्यापारयोः धातुराश्रये तु तिङः स्मृतः।
फल जिस चीज की प्राप्ति के लिए कोई क्रिया की जाती है, उसे फल कहते हैं। बालकः गृहं गच्छति वाक्य में घर की प्राप्ति के लिए गमन क्रिया की जा रही है। यहाँ गाँव के साथ संयोग फल है।
व्यापार फल को पाने के लिए की जाने वाली क्रिया व्यापार कहलाता है। गच्छति में गाँव जाने की क्रिया को व्यापार कहते हैं। फल हमेशा कर्म में रहता है तथा व्यापार कर्ता में रहता है, क्योंकि कर्ता ही किसी कार्य को करता है।
कर्ता क्रिया के व्यापार का आश्रय कर्ता कहलाता है। किसी कार्य को जो करता है, उसे कर्ता कहते हैं।
कर्म -  क्रिया के फल का आश्रय कर्म कहलाता है। अर्थात् क्रिया का फल जिसमें रहता है, उसे कर्म कहते हैं।
भाव व्यापार को भाव कहते हैं। अर्थात् जो कार्य होता है, उसे भाव कहते है।

सकर्मक  तथा अकर्मक धातुओं को इस श्लोक से समझा जा सकता है।
            क्रियापदं कर्तृपदेन युक्तं व्यपेक्षते यत्र किमित्यपेक्षाम् ।
            सकर्मकं तं सुधियो वदन्ति शेषस्ततो धातुरकर्मकः स्यात् ।।
कर्ता से युक्त जिस क्रियापद को किम् इस पद की अपेक्षा रहती है, उसे सकर्मक क्रिया और इसके अतिरिक्त को अकर्मक क्रिया कहते हैं। जैसे - बालकः ओदनं खदति में किम् इस पद की अपेक्षा करने पर ओदनं उत्तर आएगा, जबकि बालकः शेते में  किम् इस पद की अपेक्षा करने पर कोई भी उत्तर नहीं आता। इससे स्पष्ट है कि शीङ् शयने (शयन करना/ सोना) धातु अकर्मक है। अकर्मक धातुओं की पहचान के लिए कतिपय क्रियाओं की स्थितियों को श्लोक में बताया गया है। इससे अकर्मक धातु को पहचानना और आसान हो जाता है।
अकर्मक - लज्जा-सत्ता-स्थिति-जागरणं वृद्धि-क्षय-भय-जीवित-मरणम्।
  शयन-क्रीडा-रुचि-दीप्त्यर्थं धातुगणं तमकर्मकमाहुः।।
अर्थ – लज्जा, सत्ता, स्थिति, जागरण, वृद्धि, क्षय, भय, जीवित, मरण, शयन, क्रीडा, रुचि,दीप्ति इतने अर्थों में धातुएँ अकर्मक होती है।
सकर्मक, अकर्मक को पहचानने का अन्य उपाय-
1. फलव्यापारव्यधिकरणवाचकत्वं सकर्मकत्वम्।
यदि किसी धातु के फल और व्यापार का वाचक अलग- अलग हो तो वह सकर्मक धातु है।
2. फलव्यापारसमानाधिकरणवाचकत्वम् अकर्मकत्वम्।
यदि किसी धातु के फल और व्यापार का वाचक एक हो तो वह अकर्मक धातु है।
                                              पाठ 11

वाच्य

क्रिया के उस प्रकार को वाच्य कहते हैं, जिसके द्वारा इस बात का ज्ञान होता है कि क्रिया (धातु) कर्ता, कर्म या भाव में से किसके अर्थ में प्रयुक्त हो रहा है। संस्कृत भाषा में वाक्यों का प्रयोग तीन प्रकार से किया जाता है - 1. कर्ता प्रधान वाक्य 2. कर्म प्रधान वाक्य तथा 3. भाव या क्रिया प्रधान वाक्य । जिस वाक्य में कर्ता की प्रधानता होती है उसे कर्तृ वाच्य, जिस वाक्य में कर्म की प्रधानता होती है उसे कर्मवाच्य तथा जिस वाक्य में क्रिया मात्र की प्रधानता होती है उसे भाव वाच्य  कहा जाता है।
आईये अब वाच्य को क्रमबद्ध रूप से जानते हैं कि किस धातु से कौन सा वाच्य होगा।
लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः (पा.सू. 3/4/69)
सकर्मक धातुओं से कर्ता और कर्म में तथा अकर्मक धातुओं से कर्ता और भाव में लकार होते हैं।
इस सूत्र से स्पष्ट है कि कोई भी धातु सकर्मक हो या अकर्मक, कर्ता दोनों में आता है। अतः लकार का प्रयोग तीन ही रूपों में होगा- कर्ता, कर्म और भाव में। इनको ही क्रमशः कर्तृ वाच्य, कर्मवाच्य और भाववाच्य की संज्ञा दी गई है।  इस सूत्र का अभिप्राय इन्ही वाच्य विभेदों को स्पष्ट करना है। 
वाच्य परिवर्तन के साथ-साथ वाक्य की संरचना में भी अन्तर देखा जाता है। इसके कतिपय कारण हैं। उदाहरण के लिए कर्तृ वाच्य में लकार कर्ता में होता है। तात्पर्य यह है कि लकार का वचन और पुरुषकर्ता के अनुसार ही होता है, जैसे रामः पुस्तकं पठति
                                               पाठ 12

उपसर्ग

प्र, परा, अप, सम्‌, अनु, अव, निस्‌, निर्‌, दुस्‌, दुर्‌, वि, आङ्, नि, अधि, अपि, अति, सु, उत्, अभि, प्रति, परि तथा उप एते प्रादयः। प्रादि गण में पठित शब्दों को उपसर्ग कहा जाता है। ये धातु तथा प्रातिपदिक (कारक विभक्ति ) के पहले लगते हैं। इससे उसके मूल अर्थ में परिवर्तन हो जाता है। संस्कृत के मूल धातु में कभी एक तो कभी एक से अधिक उपसर्गों का प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार एक धातु के अनेक अर्थ हो जाते हैं। कहा भी गया है-
                 उपसर्गेणैव धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते ।
                प्रहाराहारसंहारविहारपरिहारवत् ।।
इनमें से निस् निर् तथा दुस् दुर् के में से क्रमशः नि तथा दु उपसर्ग  ही अर्थ परिवर्तन करता है। अतः अलग- अलग उदाहरण नहीं दिये गये हैं।
प्र -         अधिक, आगे,
परा -       विपरीत, अनादर, नाश
अप -     हीन, अभाव, हीनता, विरुद्ध 
सम्-      संयोग, पूर्णता
अनु-      पीछे, समानता, क्रम, पश्चात्
अव-      नीचे, अनादर, पतन
निस्-     निषेध, नीचे, अतिरिक्त
निर्-     बुरा, निषेध, रहित
दुस्-      बुरा, हीन
दुर्-       बुरा, हीन
वि-       हीनता,विशेष
आङ्-     सहित, सीमा, विपरीत
नि-       भीतर, नीचे, अतिरिक्त
अधि-    ऊपर, श्रेष्ठ
अपि-     और, निकट
अति-     अधिक, ऊपर,
सु-        अच्छा
उत्-      ऊपर
अभि-    और
प्रति-     विरुद्ध
परि-     चारों ओर
उप-      निकट 
इन उपसर्गों के अतिरिक्त कुछ अव्यय भी उपसर्ग की तरह प्रयुक्त होते हैं-
अन्तः-   बीच में
अधस्-   नीचे
चिरम्-  बहुत देर
नञ्-      नहीं
पुनर्-    फिर
बहिर्-   बाहर

अन्तः-   सामने
 यहाँ पर इन के कुल 223 उदाहरण नीचे के लिंक में दिये जा रहे हैं।
संस्कृत भाषा सीखने के इच्छुक व्यक्ति संस्कृत के उपसर्गों का अर्थ लिंक पर चटका लगायें। यह एक अलग विंडो में खुलेगा। यहाँ पर उपसर्गों के अर्थ और उनके प्रयोग को विस्तार से बताया गया है।
                                                    कृदन्त भाग        पाठ 13


इस पाठ में हम ण्वुल्, तव्य / तव्यत् , अनीयर्, यत्,ण्यत्, क्यप्, शतृ,  शानच्,  क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् इतने प्रत्ययों का अध्ययन करेंगें।
जिन्होंने व्याकरण का अध्ययन गहराई से नहीं किया हो, वे  सोच रहे होंगें कि ण्वुल् प्रत्यय में ण् तथा ल् को हटाने तथा वु को शेष बचाने जैसी लम्बी प्रक्रिया करने की क्या आवश्यकता है? सीधे वु आदेश कर देते। ऐसे छात्रों को संज्ञा, इत्संज्ञा, लोप आदि व्याकरण के कुछ सामान्य स्वभाव समझना चाहिए। इसे समझने पर वे प्रातिपदिक या धातु से आने वाले प्रत्ययों में वर्णों की इत्संज्ञा, लोप या अन्य संज्ञा के कारण के स्वरूप में होने वाले परिवर्तन को आसानी से समझ सकते हैं। वे यह जान सकते हैं कि जब पठ् + क्त = पठितः, पा + क्त = पीतः  बन सकता है तो धा + क्त = धीतः क्यों नहीं? जबकि धा + क्त = हितः बनता है।

कृदन्त के ण्वुल्, तव्य / तव्यत् , अनीयर्, यत् ,ण्यत्, क्यप्, शतृशानच्क्त्वा, क्त, क्तवतु, तुमुन्, णमुल् प्रत्ययों के कारण होने वाले लोप, आगम, विकार और प्रयोग विशिष्टता को समझ लेने पर कठिन से कठिन प्रश्न को सुलझाया जा सकता है। कृदन्त का क्रमबद्ध तथा विशिष्ट अध्ययन के लिए आप लघुसिद्धान्तकौमुदी कृदन्ततः स्त्रीप्रत्ययपर्यन्तम् पर चटका लगायें।

ण्वुल् प्रत्यय

ण्वुल्तृचौ – धातु से ण्वुल् और तृच् प्रत्यय होते हैं। कर्तरि कृत् सूत्र के नियम से ण्वुल् प्रत्यय कर्ता अर्थ में होगा। तिङ् और शित् से भिन्न होने का कारण ण्वुल् प्रत्यय की आर्धधातुक संज्ञा होती है। अतः आर्धधातुक संज्ञा के कारण होने वाले अनेक कार्य ण्वुल् प्रत्यय में होते हैं। यथा- अस्तेर्भूः से अस् धातु को भू आदेश, ब्रुवो वचिः से ब्रु के स्थान पर वच् आदेश आदि।

ण्वुल् में ण् की चुटू से तथा ल् की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा तथा तस्य लोपः से लोप हो जाने पर वु शेष रहता है। युवोरनाकौ सूत्र से वु के स्थान में अक आदेश हो जाता है। कृ + वु, वु को अक, कृ + अक, ण्वुल् में णकार की इत्संज्ञा होने के कारण कृ के ऋ को वृद्धि आर् हुआ, कार् + अक = कारक । प्रातिपदिक संज्ञा सु विभक्ति आने पर सु का रुत्व विसर्ग होकर कारकः बनेगा। कारकः का अर्थ होगा- करने वाला।
उदाहरण- 
कृ + ण्वुल् = कारकः       पठ् + ण्वुल् = पाठकः       पाठि + ण्वुल् = पाठकः       शिक्ष + ण्वुल् = शिक्षकः          दृश् + ण्वुल् = दर्शकः     भुज् + ण्वुल् = भोजकः       वह् + ण्वुल् = वाहकः           अश् + ण्वुल् = आशिका 
अस् + ण्वुल् = भावकः    ब्रू + ण्वुल् =  वाचकः
धातु से दो प्रकार के प्रत्यय होते हैं। तिङ् और कृत् । तिङ् प्रत्यय धातुओं से लकारों के स्थान पर होते हैं। धातुओं से होने वाले शेष प्रत्यय कृत्  संज्ञा वाले होते हैं। धातुओं से कृत् प्रत्यय लगने से वह कृदन्त बन जाता है । इसकी प्रातिपदिक संज्ञा होती है। तिङ् प्रत्यय से भिन्न प्रत्ययों की कृत् संज्ञा होती है। इस कृत् प्रत्यय से निष्पन्न कृदन्त को चार भागों में बांटा गया है- कृत्य, पूर्वकृदन्त, उत्तरकृदन्त और उणादि। 

वाऽसरूपोऽस्त्रियाम् सूत्र के अनुसार कृदन्त में उत्सर्ग (नित्य) शास्त्र को अपवाद शास्त्र के द्वारा विकल्प से बाधा जाता है। अर्थात् उत्सर्ग सूत्र भी लगेगा और विशेष सूत्र भी। कृदन्त में तव्यत्, तव्य, अनीयर् , यत्, ण्वुल् और तृच् प्रत्यय परस्पर असरूप अर्थात् असमान हैं । इस प्रकार धातुओं से होने वाले प्रत्ययों के वैकल्पिक रूप देखने को मिलेंगें। जैसे अजन्त धातु से होने वाले यत् प्रत्यय को बाधकर ऋदन्त एवं हलन्त धातु  से ण्यत् प्रत्यय होता है। 
अब यह देखना है कि कौन कृत् प्रत्यय कर्ता में कौन कर्म में और कौन भाव में होगा। इसके लिए निम्न सूत्रों को याद रखना चाहिए। 

यदि आप यह समझ जायें कि कौन- कौन धातु सेट्, अनिट् और वेट् होता है तब रूप सिद्धि में काफी सहायता मिलेगी। जिस धातु में इट्  का आगम होता है वह सेट् कहा जाता है, जिसमें इट् का आगम / प्रयोग नहीं होता वह  'अनिट्' कहा जाता है ।
निम्नलिखित अजन्त धातुओं को छोड़कर शेष सभी अजन्त धातु अनिट् कहे जाते हैं-
ऊदन्त, ऋदन्‍त, यु, रु, क्ष्‍णु, शीड्., स्‍नु, नु, क्षु, श्वि, डीड्., श्री, वृड्., वृञ् ।
अधिक जानकारी देने के लिए एक पृथक् प्रकरण में इडागम व्यवस्था, सेट्, अनिट् धातु के बारे में बताया जाएगा।

कर्तरि कृत् – कृत् प्रत्यय कर्ता में होते हैं।
तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः - 1. धातु से कृत्य प्रत्यय, क्त तथा खलर्थ प्रत्यय भाव तथा कर्म में होते हैं। 
इसमें क्त प्रत्यय पूर्व कृदन्त में तथा खलर्थ प्रत्यय उत्तर कृदन्त में आते हैं।
तव्यत्तव्यानीयरः – 1. धातु से तव्यत् , तव्य और अनीयर् प्रत्यय भाव तथा कर्म में होते हैं।  कृत्य प्रत्यय का कभी-कभी बहुलता से होते हैं। प्रसंग आने पर कौन प्रत्यय किसमें होंगें इसकी जानकारी दी जाएगी। इससे आप शुद्ध वाक्य निर्माण करना सीख सकेंगें। 
1.  तव्यत् प्रत्यय का प्रयोग विधिलिङ् लकार के स्थान में होता है ।
2.कर्म में प्रत्यय होने के कारण यह कर्म का विशेषण होता है। इसकी क्रिया कर्म के अनुसार होगी। 
3. इसका पुल्लिंग में राम के समान, स्त्रीलिंग में रमा के समान तथा नपुंसक लिंग में फल के समान रूप बनते हैं। 
4. ये प्रत्यय प्रायः सभी धातुओं से होते हैं।
5. अकर्मक धातु से तव्यत् प्रत्यय से युक्त क्रिया प्रथमान्त, नपुंसक लिंग तथा एकवचन में होगी।
6. जिस धातु के अंत में अम् हो यथा गम् तथा जिस धातु के अंत में आ हो जैसे पा उसमें तव्य, अनीयर् प्रत्यय सीधे जुड़ते हैं।
7. इकारान्त, ईकारन्त धातु के इ, ई को गुण होकर ए, उकारान्त धातु के उ को गुण होकर ओ तथा ऋकारन्त धातु के ऋ को गुण होकर अर् हो जाता है।
8. जिस धातु के अंतिम वर्ण व्यंजन हो तथा उससे पूर्व का स्वर वर्ण इ, उ, या ऋ हो तो उसे भी गुण हो जाता है।
खल प्रत्यय जिस अर्थ में होता है उसी अर्थ में होने वाले प्रत्यय को खलर्थ प्रत्यय कहते हैं। 

 तव्यत् , तव्य और अनीयर्

 तव्यत् में त् की इत्संज्ञा तथा लोप होता है। लोप होने के पश्चात् तव्यत् और तव्य प्रत्यय से बने शब्द एक समान होते हैं। धातु से उक्त प्रत्यय होने से निम्नलिखित रूप बनेंगें।
                                                                                  
 धातु      विधिलिङ्       तव्यत् (पु.)        तव्यत् (स्त्री.)     तव्यत् (नपुं.)           अनीयर्
गम्       गच्छेत्           गन्तव्यः              गन्तव्या             गन्तव्यम्              गमनीयम्
पठ्       पठेत्              पठितव्यः             पठितव्या           पठितव्यम्            पठनीयम्
लिख्     लिखेत्            लेखितव्यः            लेखितव्या         लेखितव्यम्
खादृ      खादेत्            खादितव्यः           खादितव्या         खादितव्यम्
पा        पिबेत्             पातव्यः               पातव्या            पातव्यम्
नी        नयेत्               नेतव्यः               नेतव्या              नेतव्यम्
गा        गायेत्              गातव्यः              गातव्या             गातव्यम्
दृश्       पश्येत्              द्रष्टव्यः               द्रष्टव्या               द्रष्टव्यम्
दा        दद्यात्              दातव्यः              दातव्या             दातव्यम्
कृ         कुर्यात्              कर्तव्यः               कर्तव्या             कर्तव्यम्
पृच्छ्     पृच्छेत्               प्रष्टव्यः               प्रष्टव्या              प्रष्टव्यम्  

विश्      उपविशेत्          ----------      ----------              उपवेष्टव्यम्
इन प्रत्ययों के बारे में अधिक जानकरी लेने तथा अभ्यास करने के लिए तव्यत् अनीयर् पर चटका लगायें।

यत् प्रत्यय

अजन्त धातु से यत् प्रत्यय होता है। यत् प्रत्यय का अर्थ होता है – योग्य । जैसे- पा पाने धातु से यत् = पेयम् (पीने योग्य )
यत् प्रत्यय में त् की इत्संज्ञा तथा लोप होने से य शेष बचता है। यत् एक आर्धधातुक प्रत्यय है अतः धातुओं में निम्न परिवर्तन होगें। यह प्रत्यय भाव तथा कर्म में होता है।
1.  जिस धातु के अंत में इक् प्रत्याहार के वर्ण होंगें उसे गुण हो जाएगा। जैसे- चि + य = चेयम्
2.  यत् प्रत्यय का आदि वर्ण य है अतः यह यादि प्रत्यय है। यादि होने के कारण वान्तो यि प्रत्यये से धातु के
     अंतिम ओ वर्ण को अव्  तथा औ वर्ण को आव् आदेश होगा।
     जैसे- नियम 1 लू + य, लू के ऊ को गुण ओ , लो + य,
    नियम 2 लो के ओ को अव् आदेश ल् + अव् + य = लव्यम्
3.  आकारन्त धातु के आ को इ हो जाता है। जैसे - पा + यत्, पी + य,  पे + य = पेयम्
विशेष नियम
4.  जिस धातु के अंत में पवर्ग हो तथा अंतिम पवर्ग के ठीक पूर्व का वर्ण अ हो तो ऐसे धातु से भी यत् प्रत्यय होता है।
     जैसे - शप् + यत्, शप् + य = शप्यम्, लभ् + य = लभ्यम्, रम् + य = रम्यम्
5. तक्, शस्, चत्, जन्, शक्, सह् इतने हलन्त धातु से यत् प्रत्यय होता है। तक्यम्, शस्यम् रूप बनेगा।
6. हन् धातु से यत् प्रत्यय विकल्प से होता है तथा हन् को वध् आदेश हो जाता है। जैसे – हन् + य, वध् + य = वध्यः
7. उपसर्ग से रहित गद्, मद्, चर्, और यम् धातु से यत् प्रत्यय होता है। गद् + य = गद्यम् । धातु के पूर्व उपसर्ग
     रहने  पर ण्यत् होगा जैसे – प्रगाद्यम्
अभ्यास-

क्षि + यत् =                    ध्या + यत् =                   श्रु + यत् =                     गम् + यत् =                        दा + यत् =                    यम् + यत् =       आ + सह् + यत्?
ण्यत् प्रत्यय
ण्यत् प्रत्यय में 'णकारकी 'चुटूसे तथा 'तकारकी 'हलन्त्यम्सूत्र से इत् संज्ञा करके तस्य लोपः से लोप हो जाता है। ण्यत् में य शेष रहता है। इस प्रत्यय में णकार की इत्संज्ञा होने के कारण यह णित् प्रत्यय है।   

कार्यम्। कृ धातु से ऋहलोर्ण्यत् सूत्र से ण्यत् प्रत्यय हुआ। कृ + ण्यत् में 'ण्की 'चुटूसे तथा 'त्की 'हलन्त्यम्सूत्र से इत् संज्ञा करके तस्य लोपः से लोप हो जाता है। कृ + य शेष बचा। णित्वात् आदि वृद्धि, रपर होकर कार्यम् रूप सिद्ध हुआ।

शतृ औप शानच् प्रत्यय

लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे--3.2.124
प्रथमा विभक्ति को छोड़कर शेष विभक्तियों में समानाधिकरण होने पर लट् के स्थान पर शतृ तथा शानच् प्रत्यय होते हैं।

मुख्य स्मरणीय नियम

1. शतृ, शानच् प्रत्यय लट् लकार के स्थान पर होता है ।
2. परस्मैपदी धातुओं से शतृ प्रत्यय तथा आत्मनेपदी धातु से शानच् प्रत्यय होता है।
3. उभयपदी धातुओं से शतृ और शानच् दोनों प्रत्यय होते हैं।
4. यह प्रत्यय लट् के स्थान में होता हैअतः यह वर्तमानकालिक प्रत्यय है। 
5.  यह प्रत्यय प्रथमा विभक्ति को छोड़कर अन्य विभक्तियों में लगता है। 
6. कहीं कहीं (विकल्प से) प्रथमा समानाधिकरण में भी ये दोनों प्रत्यय होते हैं।
7. शतृ में अन् तथा शानच् में आन या मान शेष रहता है। 
8. इसमें वही लिंग होगा जो विशेष्य में होगा । अतः इनके विशेष्य के अनुसार तीनों लिंगोंसभी विभक्तियों और तीनों वचनों में रूप बनते हैं। 
9. जो धातु जिस गण का होउस गण का विकरण भी धातु के साथ प्रयोग होता हैजैसेःपठ्- शप्- शतृपठत् । पठ् धातु भ्वादि गण का हैइसमें शप् विकरण होता है । इस पेज पर सभी गण हो के विकिरण दिए गए हैं शतृ और शानच् प्रत्यय लगाने के पहले यह देखना चाहिए कि वह धातु किस गण का है और उसमें कौन सा विकिरण लगेगा।
10. शतृ प्रत्ययान्त शब्द का रूप पुल्लिङ्ग में पठत्‌ के समान,स्त्रीलिङ्ग में नदी के समान तथा नपुंसक लिंग में जगत्‌ के समान रूप चलेगें।

 इसमें मूल धातु के साथ  इस प्रकार रूप बनेगा । 
धातु                  पुल्लिंग          स्त्रीलिंग          नपुंसकलिंग             अर्थ
पा    (पीना)       पिबन्             पिबन्ती                पिबत्                पीता हुआ/ पीती हुई
घ्रा (सूंघना)        जिघ्रन्               जिघ्रन्ती             जिघ्रत्               सूंघता हुआ/ सूंघती हुई    
वाक्यों द्वारा उदाहरण-
पिबन्तं बालकं पश्य। माता जिघ्रन्तीं बालिकां आह्वयति।

शतृ प्रत्ययान्त शब्दों के स्त्रीलिंग में  नुमागम का सामान्य नियम

चुंकि पहले ही कहा जा चुका है कि शतृ प्रत्यय विशेष्य के अनुसार तीनों लिंगोंसभी विभक्तियों और तीनों वचनों में रूप बनते हैं और उसके तीनों लिंगों का उदाहरण भी दिखाया गया है। इन उदाहरणों के स्त्रीलिंग में पिबन्ती, लिखन्ती, खेलन्ती आदि रूप बनता है। अहं खेलन्तीं बालिकां पश्यामि। मैं खेलती हुई बालिका को देखता हूँ। इसमें न् तथा ई वर्ण अतिरिक्त रूप से दिखायी दे रहा है। यह न् तथा ई किस- किस अवस्था में किस सूत्र से लगेगा इसपर विचार करेंगें। 
पा धातु में शतृ प्रत्यय लगने से पिबत् रूप बना। जब यह किसी स्त्रीलिंग के विशेषण के रूप में प्रयोग किया जाएगा तो इसे भी स्त्रीलिंग बनाना पड़ेगा। स्त्री लिंग बनाने के लिए स्त्री प्रत्यय लगाया जाता है। शतृ प्रत्यय से कौन सा स्त्री प्रत्यय लगता है इस पर विचार किया जाता है-
उगितश्च 4.1.6
उगित अन्त में हो जिस प्रातिपदिक के ऐसे प्रातिपदिक से स्त्रीत्व की विवक्षा में ङीप् (ई) प्रत्यय होता है। शतृ प्रत्यय में अंतिम स्वर ऋ की इत्संज्ञा होती है। यह उक् (उ ऋ ऌ ) प्रत्याहार में आता है अतः पठत् उगित् है। ऐसे उगित प्रतिपदिक पठत् से ङीप् प्रत्यय होगा । ङीप् में ङ् तथा प् की इत्संज्ञा लोप हो जाता है। ई शेष बचता है। पठत् + ई = पठती रूप बना। अब बची बात पठन्ती में न् के आने की इसके लिए सूत्र है-
शप्श्यनोर्नित्यम् 7.1.81
शप् और श्यन् (विकरण/प्रत्यय) के अवर्ण से परे जो शतृ का अवयव तदन्त को नित्य ही नुमागम होता है, शी और नदी संज्ञक (ङीप् के ईकार की नदी संज्ञा होती है) प्रत्यय बाद में हो तो।
भ्वादि, चुरादि में शप् का अकार और दिवादि में श्यन् के यकारोत्तरवर्ती अकार तथा तुदादि में श का अकार उससे परे शतृ प्रत्यय रहने पर शतृ के अवयव अत् को नुमागम होगा। यहाँ तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य के अनुसार त् के पूर्व नुम् का आगम होगा। यह सूत्र आच्छीनद्योर्नुम् द्वारा विहित वैकल्पिक नुम् का बाधक है।  इसलिए इन गणों के धातुओं में नित्य नुमागम  होगा। 
भ्वादि गण के धातुओं से बनने वाले स्त्रीलिंग में- 
भू + शप् + शतृ+ ङीप्
भो + अ + अत् + ई
भव + अ + अ नुम् त् + ई
भवन्ती होगा। विस्तृत प्रक्रिया दिवादि में देख लें।

दिवादि गण के धातुओं से बनने वाले स्त्रीलिंग में- 
तुष् + लट्, लटः शतृ सूत्र से लट् को शतृ आदेश हुआ।
तुष् + श्यन् + शतृ             दिवादिभ्यः श्यन् से श्यन्, 
तुष् + य + अत्                 अतो गुणे से पररूप एकादेश
तुष्यत् 
तुष्यत् + औ ,                    नपुंसक लिंग प्रथमा / द्वितीया द्विवचन
तुष्यत् + शी,                    नपुंसकाच्च से  औ को शी, शी के श् का अनुबन्ध लोप
तुष्यत् + ई                      शप्श्यनोर्नित्यम् से शतृ के अत् को नुम्   
तुष्य + नुम् + त् + ई         नुम् के उकार तथा मकार को अनुबन्ध लोप
तुष्यन्त् + ई तुष्यती         तुष्यन्ती नगरे रामः अशोकश्च निवसतः।  संतुष्ट होने वाले दो नगरों में राम और अशोक निवास करता है।         
स्त्रीत्व की विवक्षा (स्त्रीलिंग) में
तुष्यत्
तुष् + ङीप् ,    उगितश्च से ङीप् तथा शप्श्यनोर्नित्यम् से शतृ के अत् को नुम् का आगम हुआ। तुष्य + नुम् + त् + ई, नुम् के उ तथा मकार की इत्संज्ञा एवं लोप हुआ। न् बचा। तुष्यन्त् + ई तुष्यती बनेगा। संतुष्ट होने वाली महिला। 

चुरादि गण के धातुओं से बनने वाले स्त्रीलिंग में-
चुर् + णिच् + शप् + शतृ + ङीप्
चोरय् + अ + अत् + ई
चोरय् + अ + अ नु + त् + ई
चोरयन्ती सिद्ध हुआ।

आच्छीनद्योर्नुम्
अवर्णान्त अंग से परे जो शतृ का अवयव तदन्त अंग को नुम् का आगम विकल्प से हो, शी और नदी (ङीप् प्रत्यय का ई) परे रहते।
तुदादि गण के धातुओं में विकल्प से नुम् का आगम होगा। अतः इसके शतृ प्रत्ययान्त स्त्रीलिंग के प्रतिपदिक में विकल्प से नुम् का आगम होकर तुदन्ती तथा तुदति इस प्रकार दो रूप बनेंगे। 
इसी प्रकार जहाँ औ विभक्ति को शी आदेश होगा वहाँ भी नुमागम होगा। उपर्युक्त 4 गणों को छोड़कर शेष गणों के धातुओं से नुमागम नहीं होता। 
ध्यातव्य है कि आच्छीनद्योर्नुम् के अनुसार जिस धातु के अंत में अ या आ हो ऐसे अङ्ग को नुम् का आगम करता है अतः अदादि गण के कुछ धातुओं में भी नुमागम होता है -
अदादिगण
इस गण में शप् विकरण / प्रत्यय का लोप हो जाता है, अतः अदन्त धातु बहुत ही कम मिलते हैं। परन्तु कुछ धातु स्वतः अदन्त होते हैं उनमें नुमागम विकल्प से होता है जैसे -
या + शप् + शतृ + ङीप्
या + 0 + शतृ + ङीप्
यहाँ शप्-प्रत्यय का लुक् हो जाने पर भी 'या' धातु आकारान्त अङ्ग है। इसलिए उसमे “ आच्छीनद्योर्नुम् ” इस सूत्र से नुमागम विकल्प से होता है।
या + नुम् +शतृ + ई
या + न् + अत् + ई
यान्ती सिद्ध होगा।
विकल्प में 'याती' रूप बनेगा।
           यान्ती  यान्त्यौ  यान्त्यः
           याती   यात्यौ   यात्यः
वा भा ष्णा श्रा द्रा प्सा पा रा ला दा ख्या प्रा मा आदि आकारान्त धातु हैं। ऐसे धातुओं से नुमागम विकल्प से होगा। जुहोत्यादि गण के अदन्त धातु को नुमागम का निषेध हो जाता है। देखें सूत्र-  नाभ्यस्तच्छतुः। शतृ प्रत्यय से सम्बन्धित और अधिक जानकारी के लिए इन सूत्रों को देखें- (1) वा नपुंसकस्य (2) सम्बोधने च 3.2.125 (3) लक्षणहेत्वोः क्रियायाः 3.2.126 (4) इङ्धार्योः शत्रकृच्छ्रिणि (5) द्विषोमित्रे (6) सुञो यज्ञसंयोगे (7) अर्हः प्रशंसायाम् (8)  ऌटः सद्वा (9) पूरणगुणसुहितार्थ-- (10) न लोकाव्ययनिष्ठा.. (11) विदेः शतुर्वसुः 
शानच् प्रत्यय वाले धातुओं से "मुक्" का आगम
अदादि तथा जुहोत्यादि गण को छोड़कर शेष गणों के ण्यन्त--सन्नन्त धातुओं से जब "शानच्" (आन) प्रत्यय होगातब "आने मुक्" से "आन" से पूर्व "मुक्" का आगम होगा । "मुक्" का "म्" शेष रहता है। 
जैसेः---पचमानःमोदमानःआदि ।
अदादि. और जुहोत्यादिगण की धातुओं के साथ सीधा-सीधा "आन" ही जोड देते हैं । जैसेः--सन्दिहानव्याचक्षाणःसञ्जिहानः ।
लृट् स्थानीय "शानच्" प्रत्ययान्त के रूप भी इसी प्रकार से चलेंगे । जैसेः--
पुल्लिंग में -यतिष्यमाणःस्त्री लिंग में -यतिष्यमाणानपुंसक लिंग में -यतिष्यमाणम् ।
"शानच्" प्रत्यय दो वाक्यों को जोड़ने का भी काम करता है । जैसे---
लताः कम्पन्ते । लताभ्यः पुष्पाणि पतन्ति ।
कम्पमानाभ्यः लताभ्यः पुष्पाणि पतन्ति ।

शानच् प्रत्यय
याच् (मांगना)    याचमानः          याचमाना          याचमानम्         मांगते हुए/ हुई
शीङ् (सोना)       शयानः              शयाना              शयानम्             सोते हुए/ सोती हुई
 शानच्‌ प्रत्ययान्त शब्द पुल्लिङ्ग में रामस्त्रीलिङ्ग में रमा व नपुंसक लिंग पुस्तक के समान रूप चलेगें। इस प्रत्यय के प्रयोग के लिए प्रत्येक गण के विकरण का स्मरण करना चाहिए।

यह लृट् प्रत्यय के स्थान पर भविष्यत् काल में विकल्प से होता है। लृटः सद्वा 3.3.14
क्त्वा / ल्यप् प्रत्यय 
आभीक्ष्ण्ये णमुल् च 
हमेशा, निरन्तर, बार बार के भाव को आभीक्ष्ण्य कहते हैं। आभीक्ष्ण्य द्योतित पर  समान कर्तृक पूर्व कालिक विद्यमान धातु से परे क्त्वा तथा णमुल् प्रत्यय हो। णमुल् में णकार, उकार तथा मकार की इत्संज्ञा तथा लोप हो जाता है । अम् शेष बचता है। 
उदाहरण - स्मारं स्मारम् में स्मृ धातु से णमुल् प्रत्यय करने पर स्मृ + अम् ।  णमुल् में णकार की इत्संज्ञा होने कारण यह णित् है, अतः णित्व होने के कारण अचो ञ्णिति सूत्र से ऋ की वृद्धि और होगी आर् । स्म + आर् = स्मार् बना । स्वादि विभक्ति की उत्पत्ति प्रक्रिया पूर्ण कर स्मारं रूप बना लें। ध्यातव्य की स्मारम् में मकारांत कृत् प्रत्यय है, ऐसा शब्द कृन् मेजन्तः सूत्र के नियम के अनुसार अव्यय हो जाता है। 
नित्य - वीप्सयोः 
नित्यता और वीप्सा के अर्थ पद को द्वित्व होता है। ( व्याप्त होने की इच्छा को वीप्सा कहते हैं) यह निरंतरता तिङन्त और अव्यय संज्ञक कृदन्त की क्रिया की बताई जाती है । स्मारं को नित्यता या निरंतरता के अर्थ में होने के कारण इस पद को द्वित्व हो गया।

क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग

प्रथम नियम
जब दो धातुओं (कार्यों) का कर्ता एक हो तो पूर्वकालिक क्रिया से क्त्वा प्रत्यय होता है।
समानकर्तृकयोः पूर्वकाले 3/4/21
समानकर्तृकयोः धात्वर्थयोः पूर्वकाले विद्यमानाद्धातोः क्त्वा स्यात्।
क्त्वा प्रत्यय के क्त्वा में "त्वा" शेष रहता हैक् हट जाता है।
क्त्वा प्रत्यय का उदाहरणः-           दा+क्त्वा = दत्वा
                                                पठ्+क्त्वा = पठित्वा
                                                तृ+क्त्वा = तीर्त्वा
द्वितीय नियम
अलं कृत्वोः प्रतिषेधयोः प्राचां क्त्वा 3/4/18  
निषेधवाची अलं तथा खलु शब्द यदि किसी क्रिया के पूर्व में हो तो उस क्रिया में भी क्त्वा प्रत्यय होता है।

 ध्यान देने योग्य प्रयोग अथवा वैकल्पिक प्रयोग

कुछ छात्र भ्रमित हो जाते हैं कि लिखित्वा प्रयोग सही है या लेखित्वा। अधोलिखित नियम के अनुसार दोनों प्रयोग सही हैं।
रलो व्युपधाद्धलादेः संश्च 1/2/26
इवर्ण तथा उवर्ण हो उपधा में जिसके ऐसे रलन्त धातुओं से परे इट् सहित क्त्वा एवं सन् विकल्प से कित् होते  है।
इट् सहित क्त्वा प्रत्यय का उदाहरणः- लिख्+क्त्वा = लिखित्वालेखित्वा
                              गुप्+क्त्वा = गोपित्वागुप्त्वा
                              क्षुध्+क्त्वा = क्षुधित्वाक्षोधित्वा
आगे और पढ़ें  ----    वच्+क्त्वा = उक्त्वा का प्रयोग कैसे होता है?

क्तक्तवतु प्रत्यय

क्तक्तवतु निष्ठा
क्तक्तवतु प्रत्यय में ततवत् शेष रहता है। यह प्रत्यय भूतकालिक क्रिया के अर्थ में वर्तमान धातु से क्त और क्तवतु प्रत्यय होता है।
नियम-1
 ‘क्त‘ प्रत्यय  भाव और कर्म में होता हैं।
क्तवतु प्रत्यय कर्ता में होता हैं।
उदाहरण - मया हसितम्भक्तेन कृष्णः स्तुतःविष्णुः विश्वं कृतवान्।
नियम-2
 गत्यर्थकअकर्मक एवं  श्लिष्शीड्स्थाआस्वस्जन्रूहजृ- इतने (उपसर्ग पूर्वक सकर्मक) धातुओं से भाव और कर्म के साथ कर्ता में भी ‘क्त‘ होता है।
उदाहरण - गृहं गतः। बालः भीतः। प्रियामाश्लिष्टः। हरिः शेषमधिशयितः। वैकुण्ठमधिष्ठितः। कृष्णमुपासितः।                    हरिदिनमुपोषितः। लक्ष्मणो भरतम् अनुजातः। यानमारूढ़ः। विश्वमनुजीर्णः।
नियम-3
इच्छार्थकज्ञानार्थक तथा पूजार्थक धातुओं से वर्तमानकाल में ‘क्त‘ प्रत्यय होता है। उदाहरण - मम मतःइष्टः। मम बुद्धंविदितमस्ति। पूजितःअर्चितः आदि।

तुमुन् प्रत्यय

को अथवा के लिए को प्रकट करने के लिए तुमुन् प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। तुमुन् में  उन् हट जाता है एवं तुम् शेष रहता है । तुमुन् प्रत्ययान्त शब्दों का प्रयोग अव्यय की तरह होता है। अतः इसके रूप नहीं चलते हैं।
उदाहरण
धातु                  तुमुन् प्रत्ययान्त रूप                     अर्थ
कथ् (कहना)       कथितुम्                                     कहने के लिए
स्था (ठहरना)     स्थातुम्                                      ठहरने के लिए
विशेष-
कालवाची शब्दों के योग में भी तुमुन् प्रत्यय का प्रयोग होता है। जैसे- भोक्तुं कालः समागतः।
ईच्छार्थक धातुओं के योग में भी तुमुन् प्रत्यय का प्रयोग होता है। जैसे- गृहं गन्तुं इच्छामि

संस्कृत के तुलनार्थक प्रत्यय

1. दो की तुलना में तर और दो से अधिक के बीच की तुलना में तमप् प्रत्यय का प्रयोग होता है । जैसेः-
अयम् एतयोरतिशयेन लघुः-- लघुतरः,
अयम् एषामतिशयेन लघुः--लघुतमः।
इसी प्रकार युवन्-       युवतर,        युवतमः
विद्वस्-        विद्वत्तर,       विद्वत्तमः
प्रच्-           प्राक्तर,        प्राक्तमः
धनिन्-        धनितरः
गुरू-          गुरूतरः         गुरूतमः आदि।
2. क्रिया और क्रियाविशेषण के रूप में प्रयुक्त होने वाले अव्ययों से तर और तम प्रत्यय होने पर उनका रूप तराम् और तमाम् हो जाता है। जैसे- 
पचतितराम्पचतितमाम्ः उच्चैस्तराम्उच्चैस्तमाम्ः नितराम्नितमाम्ः सुतराम्आदि। किन्तु विशेषण                 शब्द उच्चैस्तरः (अधिक ऊँचा) ही होगा।
3. दो की तुलना में इयस् और बहुतों की तुलना में इष्ठन् प्रत्यय होते हैं। यह दोनों प्रत्येक गुणवाचक शब्द से            होते हैं। इयस् और इष्ठन् प्रत्यय होने पर टि का लोप हो जाता है। जैसे-
लघु शब्द से लघीयस् लघिष्ठः  
पटु शब्द से पटीयस्पटिष्ठः
महत्- महीयस्महिष्ठआदि।
यहाँ पर क्रमशः उ तथा अत् (टि) का लोप (अदृश्य) हो गया है।
अपवाद- पाचक से पाचकतरपाचकतम ही रूप बनेगें।
4. मत्वर्थक प्रत्यय विन् और मत् का तथा तृ प्रत्यय का लोप हो जाता हैबाद में यदि ईयस् तथा इष्ठ प्रत्यय हो तो। यहाँ भी टि लोप का नियम लगेगा। जैसे
मतिमत् (बुद्धिमान)--मतीयस्मतिष्ठः
मेधाविन्--मेधीयस्मेधिष्ठः
धनिन्--धनीयस्धनिष्ठः
कर्तृ--करीयस्करिष्ठ (अतिशयेन कर्ता)स्तोतृ--स्तवीयस्स्वविष्ठ। इसी प्रकार स्त्रग्विन् (मालाधारी) से                  स्रजीयस् और स्रजिष्ठ रूप होगें।
5. साधारणतः तर और तम प्रत्यय से पहले शब्द के अंतिम ई और ऊ का विकल्प से ह्रस्व हो जाता है।
 जैसे—  
श्री + तरा = श्रीतरा-श्रितराश्रीतमा-श्रितमा,
घेमूतरा-घेमुतरा (अधिक लँगड़ा)घेमूतमा-घेमुतमाइत्यादि।
ईयस् इष्ठ और ईमन् प्रत्यय बाद में होने पर ह्रस्व ऋ के स्थान पर र हो जाता है। शब्द के प्रारंभ में कोई                   व्यंजन अक्षर होना चाहिए। जैसे-
शब्द                       ईयस्             इष्ठ
 कृश (दुर्बल)            क्रशीयस्        क्रशिष्ठ
दृढ (बलवान्)                 द्रढीयस्              द्रढिष्ठ
परिवृढ (मुख्य)                परिव्रढीयस्      परिव्रढिष्ठ
पृथु (विशालचैड़ा)           प्रथीयस्              प्रथिष्ठ
भृश (अधिक)                  भ्रशीयस्            भ्रशिष्ठ

मृदु (कोमल)                    भ्रदीयस्            भ्रदिष्ठ

व्याकरण में  इनका नाम उपदेश है-
धातुसूत्रगणोनादि वाक्यलिङ्गानुशासनम् ।
आगमप्रत्ययादेशा उपदेशाः प्रकीतिताः ।।
धातु , सूत्रगणउणादि,वाक्य,लिङ्गानुशासनआगमप्रत्यय तथा आदेश ।
सूत्र छः प्रकार के होते हैं-

संज्ञा च परिभाषा च विधिर्नियम एव च ।
अतिदेशो अधिकारश्च षड्विधं सूत्रलक्षणम् ।।
संज्ञा      -           संज्ञासंज्ञिप्रत्यायकं सूत्रम् ।
परिभाषा-          अनियमे नियमकारिणी ।
विधिः   -           आदेशादिविधायकं सूत्रम् ।
नियमः  -           प्राप्तस्य विधेः नियामकम् ।          
अतिदेशः-          अन्यतुल्यत्वविधानम् ।
अधिकारः-         एकत्र उपात्तस्य अन्यत्र व्यापारः ।
उदाहरण -
संज्ञासूत्रम् =                   हलन्त्यम्अदर्शनं लोपः अदेङ् गुणः,
परिभाषासूत्रम्   =          यथासंख्यमनुदेशः समानाम् , स्थानेऽन्तरतमः ।
विधिसूत्रम् =                  वृद्धिरेचिआद्गुण:तस्य लोपः ।
नियमसूत्रम्        =          षष्ठी स्थाने योगाकृत्तद्धितसमासाश्च।
अतिदेशसूत्रम्     =          स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ ।
अधिकारसूत्रम्    =          प्रत्ययःपूर्वत्रासिद्धम्,संहितायाम्।



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1 टिप्पणी:

  1. कृपया व्यवहार में प्रचलित धातुओं की सूची का लिंक प्रदान करें ।

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