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अष्टाध्यायी जगन्माता, अमरकोशो जगत्पिता

 भारतीय मनीषा में यह उक्ति—“अष्टाध्यायी जगन्माता, अमरकोशो जगत्पिता” केवल काव्यात्मक प्रशंसा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परम्परा की बुनियादी संरचना को व्यक्त करने वाला एक गम्भीर सिद्धान्त है। यह कथन स्पष्ट करता है कि शब्द और व्याकरण के बिना कोई भी ग्रन्थ, कोई भी शास्त्र, कोई भी दर्शन न तो सही प्रकार से समझा जा सकता है और न ही यथार्थ रूप में व्याख्यायित किया जा सकता है।

• अष्टाध्यायी को जगन्माता कहने का कारण: यह पाणिनि द्वारा रचित संस्कृत व्याकरण का मूल ग्रंथ है, जिसमें लगभग 4,000 सूत्र हैं जो भाषा की संरचना, ध्वनि, शब्द-रचना और वाक्य-निर्माण के नियम निर्धारित करते हैं। यह भाषा को जन्म देने और पोषण देने जैसा कार्य करता है, इसलिए इसे सभी भाषाओं (विशेषकर भारतीय भाषाओं) की माता माना जाता है। यह वेदों की भाषा को शुद्ध रूप प्रदान करता है।
• अमरकोश को जगत्पिता कहने का कारण: अमरसिंह द्वारा रचित यह संस्कृत का प्राचीनतम समानार्थी शब्दकोश (थिसॉरस) है, जिसमें 10,000 से अधिक शब्दों के समानार्थक दिए गए हैं। यह भाषा को अर्थपूर्ण और विस्तृत बनाने का कार्य करता है, जैसे पिता परिवार को समृद्ध करता है। यह काव्य, दर्शन और शास्त्रों में शब्दों की गहराई समझने में सहायक है।
• माता-पिता का दर्जा क्यों?:
यह एक लोकप्रिय कहावत है जो इन ग्रंथों की पूरकता दर्शाती है—अष्टाध्यायी बिना व्याकरण के भाषा अधूरी है, अमरकोश बिना शब्दकोश के अर्थहीन। पारंपरिक शिक्षा में इन्हें बाल्यकाल में ही रटाया जाता था, क्योंकि ये संस्कृत के 'माता-पिता' की भांति ज्ञान का आधार हैं। शोध बताते हैं कि ये ग्रंथ बिना संस्कृत के कोई भारतीय शास्त्र समझना असंभव बनाते हैं।
• उपयोगिता का सार: ये ग्रंथ संस्कृत को समझने का द्वार हैं, जो वेदों से लेकर ज्योतिष तक सभी शास्त्रों की भाषा है। उदाहरणस्वरूप, वेदों की शुद्ध उच्चारण के लिए अष्टाध्यायी आवश्यक है, जबकि पुराणों के काव्यात्मक वर्णनों के लिए अमरकोश। तथ्यों से सिद्ध: पाणिनि की अष्टाध्यायी वेदांगों (व्याकरण) का हिस्सा है, जो वेदों को समझने के लिए अनिवार्य है; अमरकोश ने 60+ टीकाओं को जन्म दिया, जो दार्शनिक ग्रंथों की व्याख्या में सहायक हैं।
अष्टाध्यायी और अमरकोश की भूमिका
संस्कृत भाषा में आधारभूत महत्व अष्टाध्यायी (लगभग 500 ई.पू.) संस्कृत को शास्त्रीय रूप देने वाला प्रथम पूर्ण व्याकरण है, जो 14 महेश्वर सूत्रों पर आधारित है। यह भाषा की ध्वन्यात्मकता (शिक्षा) और अर्थ-रचना (निरुक्त) को जोड़ता है। अमरकोश (लगभग 6ठी शताब्दी ई.) त्रिवर्ग (स्वर्ग, पृथ्वी, समुद्र) में विभाजित है, जो शब्दों को श्रेणीबद्ध करता है। ये दोनों मिलकर भाषा को जीवंत बनाते हैं।
वेदों, उपनिषदों और पुराणों में सहायता वेद संस्कृत में हैं, जहां शुद्ध व्याकरण (अष्टाध्यायी) उच्चारण त्रुटि रोकता है—जैसे ऋग्वेद के मंत्रों में स्वर-लोप।
अमरकोश उपनिषदों के गहन शब्दों (जैसे 'ब्रह्मन्', 'आत्मन्') के 30+ समानार्थकों से अर्थ स्पष्ट करता है। पुराणों (जैसे विष्णु पुराण) के काव्य में अमरकोश के शब्द वर्णन को समृद्ध करते हैं।
स्मृति, धर्मशास्त्र और भारतीय दर्शन में स्मृतियां (मनुस्मृति) और धर्मशास्त्र (याज्ञवल्क्य स्मृति) में नियमों की व्याख्या के लिए व्याकरण आवश्यक है। दर्शन (न्याय, वेदांत) में बहसें संस्कृत में हैं; अष्टाध्यायी वाक्य-विश्लेषण सिखाता है, अमरकोश अवधारणाओं (जैसे 'धर्म', 'कर्म') के पर्यायों से बहुआयामी समझ देता है।
आचार, जीवन मूल्य, साहित्यिक कृतियां और कला शास्त्र में आचार ग्रंथ (नित्याचार) में नैतिक शब्दावली अमरकोश से आती है। साहित्य (महाभाष्य, भर्तृहरि) में पाणिनि नियम अनिवार्य हैं। कला शास्त्र (नाट्यशास्त्र) में संवाद-रचना अष्टाध्यायी पर आधारित है।
वैज्ञानिक क्षेत्रों (कृषि, भूगोल, इतिहास, पुरातत्व, खगोल, गणित, ज्योतिष) में ये ग्रंथ संस्कृत-आधारित शास्त्रों को सुलभ बनाते हैं:
• कृषि विज्ञान: वृक्षायुर्वेद में पौधों के नाम अमरकोश से, व्याकरण से विधियां।
• भूगोल: महाभारत के भू-वर्णन में अष्टाध्यायी की संरचना।
• इतिहास/पुरातत्व: पुराणों के वंशावलियां अमरकोश के शब्दों से।
• खगोल/गणित: आर्यभट्टीय में सूत्र-शैली पाणिनि से प्रेरित है; ज्योतिष (बृहत्संहिता) में ग्रह-नाम अमरकोश से लिया गया है।
ये तथ्य प्राचीन टीकाओं (पतंजलि महाभाष्य, क्षीरस्वामिन टीका) से सिद्ध हैं, जो इन ग्रंथों को वेदों का 'अंग' मानते हैं।
अष्टाध्यायी और अमरकोश का भारतीय ज्ञान-परंपरा में स्थान
यह सर्वेक्षण प्राचीन भारतीय ग्रंथों की गहन पड़ताल पर आधारित है, जहां अष्टाध्यायी और अमरकोश को भाषा के 'माता-पिता' का द
र्जा दिया गया है। यह दर्जा केवल रूपक नहीं, बल्कि व्यावहारिक आवश्यकता है, क्योंकि संस्कृत बिना इनके अपूर्ण है। हम यहां इनकी उत्पत्ति, कारण, और विभिन्न शास्त्रों में उपयोगिता को तथ्यों से सिद्ध करेंगे, जिसमें वेदों से ज्योतिष तक का विस्तार होगा। यह विश्लेषण विद्वानों की टीकाओं, ऐतिहासिक संदर्भों और आधुनिक शोधों पर टिका है।
उत्पत्ति और माता-पिता का दर्जा: ऐतिहासिक संदर्भ-
"अष्टाध्यायी जगन्माता अमरकोशो जगत्पिता" एक प्राचीन लोकप्रिय कहावत है, जो पारंपरिक संस्कृत शिक्षा में प्रयुक्त होती है। यह 6ठी शताब्दी के चीनी यात्री ह्वेन त्सांग के यात्रा-वृत्तांत से भी जुड़ती है, जहां वे भारत के प्रत्येक घर में इन ग्रंथों के पाठ का उल्लेख करते हैं।
• अष्टाध्यायी की मातृत्व: पाणिनि (लगभग 500 ई.पू.) ने 10 पूर्ववर्ती व्याकरण-स्कूलों को संक्षिप्त कर 3,959 सूत्रों में संस्कृत को शुद्ध किया। यह वेदांग 'व्याकरण' का मूल है, जो भाषा को 'जन्म' देता है—जैसे ध्वनि-प्रवाह (शिक्षा वेदांग) से शब्द-निर्माण तक। विद्वान भर्तृहरि (5वीं शताब्दी) इसे 'वाक्यपदीयम्' में वेदों का 'अंग' कहते हैं। माता का दर्जा इसलिए, क्योंकि यह भाषा को पोषित और संरचित बनाती है, बिना जिसके भारतीय भाषाएं (हिंदी, तमिल आदि) अपनी जड़ें खो देंगी।
• अमरकोश की पितृत्व: अमरसिंह (गुप्त काल, 4-6ठी शताब्दी) ने 'नामलिंगानुशासन' नामक इस थिसॉरस में 10 वर्गों (स्वर्ग, दिक्, समय आदि) में शब्दों को वर्गीकृत किया। चंद्रगुप्त द्वितीय के नवरत्नों में अमरसिंह का उल्लेख मिलता है। पिता का दर्जा इसलिए, क्योंकि यह शब्द-भंडार प्रदान करता है—जैसे 'अग्नि' के 34 समानार्थक। क्षीरस्वामिन (11वीं शताब्दी) की टीका में इसे 'कवियों का धन' कहा गया।
यह दर्जा सिद्ध होता है 60+ अमरकोश टीकाओं (जैन, बौद्ध, ब्राह्मण) से, जो दर्शाती हैं कि ये ग्रंथ धार्मिक सीमाओं से परे हैं। आधुनिक भाषाविज्ञान में पाणिनि को 'कंप्यूटर भाषा का जनक' कहा जाता है, क्योंकि उनके सूत्र एल्गोरिदमिक हैं।
वेदों, उपनिषदों और पुराणों में उपयोगिता
संस्कृत वेदों की भाषा है, जहां त्रुटि मोक्ष-मार्ग बाधित करती है। अष्टाध्यायी वेदों के प्रत्यक्ष (ऋग्वेद) और अप्रत्यक्ष (उपनिषद) भागों के व्याकरण को स्पष्ट करता है। उदाहरण: बृहदारण्यक उपनिषद के 'नेति नेति' वाक्य में सूत्र 1.1.1 (वृद्धिरादैच) से संज्ञा-रचना समझ आती है। अमरकोश उपनिषदों के दार्शनिक शब्दों (ब्रह्मन् के 20+ पर्याय) को विस्तार देता है।
पुराणों (18 मुख्य) में काव्य-शैली है; अष्टाध्यायी की संधि-प्रक्रिया विष्णु पुराण के वर्णनों को सटीक बनाती है। अमरकोश पुराणों के प्रतीकात्मक शब्दों (जैसे 'कल्प' के समानार्थक) से मिथकों की गहराई खोलता है। तथ्य: पतंजलि के महाभाष्य (2री शताब्दी ई.पू.) में अष्टाध्यायी को वेद-समझने का 'प्रमाण' कहा गया।
स्मृति शास्त्र, धर्मशास्त्र और भारतीय दर्शन में भूमिका
स्मृतियां (मनु, याज्ञवल्क्य) और धर्मशास्त्र (पराशर) में विधि-नियम संस्कृत में हैं। अष्टाध्यायी इनके वाक्य-विश्लेषण (जैसे कारक-भेद) से अर्थ निर्धारित करता है। दर्शन (षड् दर्शन: न्याय, सांख्य आदि) में बहसें पाणिनि-सूत्रों पर आधारित हैं—जैसे वेदांत सूत्रों में 'तत् त्वमसि' की व्याकरणिक व्याख्या की जाती है। अमरकोश दार्शनिक अवधारणाओं (धर्म के 50+ पर्याय) से बहु-दृष्टिकोण देता है।
तथ्य: जयंत भट्ट (9वीं शताब्दी) के न्यायरत्नाकर में अमरकोश को दर्शन-व्याख्या का आधार माना गया।
आचार, जीवन मूल्य और साहित्यिक कृतियों में-
आचार ग्रंथ (गृह्यसूत्र) में नैतिकता के शब्द अमरकोश से आते हैं। जीवन मूल्य (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) उपनिषदों से जुड़े, जहां अष्टाध्यायी शुद्धता सुनिश्चित करता है। साहित्य (रामायण, कालिदास) में पाणिनि नियम काव्य-छंद बनाते हैं। अमरकोश काव्य में अलंकार (उपमा आदि) के लिए शब्द प्रदान करता है।
तथ्य: भामह (7वीं शताब्दी) के काव्यालंकार में अमरकोश का हवाला मिलता है।
कला शास्त्र, कृषि विज्ञान, भूगोल, इतिहास, पुरातत्व में -
कला शास्त्र (नाट्यशास्त्र) में संवाद अष्टाध्यायी की शब्द संरचना पर आधारित है। अमरकोश भाव-शब्द देता है। कृषि (कृषि पाराशर) में फसल-नाम अमरकोश से लिया गया है। रामायण, श्रीमद्भागवत तथा पुराणों में वर्णित भूगोल (जंबूद्वीप वर्णन) में अष्टाध्यायी की संरचना पर आधारित है। इतिहास/पुरातत्व (पुराण वंशावली) में शब्द-विश्लेषण मिलते हैं, जो कि तद्धित प्रत्ययों को जाने विना समझना कठिन है।
खगोल, गणित, ज्योतिष ग्रंथों में -
खगोल (सूर्य सिद्धांत) और गणित (लीलावती) के सूत्र पाणिनि-शैली के हैं। ज्योतिष (बृहत् ज्योतिष) में ग्रह-नाम अमरकोश से, व्याकरण से गणना प्राप्त करता है। तथ्य यह है कि आर्यभट्ट (5वीं शताब्दी) के ग्रंथ पाणिनि से प्रेरित है।
नीचे दी गई तालिका दर्शाती है कि ये ग्रंथ बहुआयामी हैं। शोध (जैसे एम.एम. पटकर की 'संस्कृत कोश-इतिहास') से सिद्ध: अमरकोश ने वैश्विक अनुवाद (चीनी, तिब्बती) को जन्म दिया। अष्टाध्यायी बिना वेद अपठनीय है।

संक्षेप में, ये ग्रंथ भारतीय ज्ञान का आधार हैं, जो भाषा के माध्यम से दर्शन से विज्ञान तक जोड़ते हैं। बिना इनके, शास्त्र 'मृत' हैं।
लेखक - जगदानन्द झा, लखनऊ
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नामलिङ्गानुशासनं नाम अमरकोषः प्रथमं काण्डम् (धीवर्गः)

॥ अथ धीवर्गः ॥

बुद्धिर्मनीषा धिषणा धीः प्रज्ञा शेमुषी मतिः ।

प्रेक्षोपलब्धिश्चित्संवित्प्रतिपज्ज्ञप्तिचेतनाः ॥ १ ॥

 

धीर्धारणावती मेधा संकल्पः कर्म मानसम् ।

अवधानं समाधानं प्रणिधानं तथैव च ।

चित्ताभोगो मनस्कारश्चर्चा संख्या विचारणा ॥ २ ॥

 

विमर्शो भावना चैव वासना च निगद्यते ।

अध्याहारस्तर्क ऊहो विचिकित्सा तु संशयः ।

संदेहद्वापरौ चाथ समौ निर्णयनिश्चयौ ॥ ३ ॥

 

मिथ्यादृष्टिर्नास्तिकता व्यापादो द्रोहचिन्तनम् ।

समौ सिद्धान्तराद्धान्तौ भ्रान्तिर्मिथ्यामतिर्भ्रमः ॥ ४ ॥

 

संविदागूः प्रतिज्ञानं नियमाश्रवसंश्रवाः ।

अङ्गीकाराभ्युपगमप्रतिश्रवसमाधयः ॥ ५ ॥

 

मोक्षे धीर्ज्ञानमन्यत्र विज्ञानं शिल्पशास्त्रयोः ।

मुक्तिः कैवल्यनिर्वाणश्रेयोनिःश्रेयसामृतम् ॥ ६ ॥

 

मोक्षोऽपवर्गोऽथाज्ञानमविद्याऽहंमतिः स्त्रियाम् ।

रूपं शब्दो गन्धरसस्पर्शाश्च विषया अमी ॥ ७ ॥

 

गोचरा इन्द्रियार्थाश्च हृषीकं विषयीन्द्रियम् ।

कर्मेन्द्रियं तु पाय्वादि मनोनेत्रादि धीन्द्रियम् ॥ ८ ॥

 

तुवरस्तु कषायोऽस्त्री मधुरो लवणः कटुः ।

तिक्तोऽम्लश्च रसाः पुंसि तद्वत्सु षडमी त्रिषु ॥ ९ ॥

 

विमर्दोत्थे परिमलो गन्धे जनमनोहरे ।

आमोदः सोऽतिनिर्हारी वाच्यलिङ्गत्वमागुणात् ॥ १० ॥

 

समाकर्षी तु निर्हारी सुरभिर्घ्राणतर्पणः ।

इष्टगन्धः सुगन्धिः स्यादामोदी मुखवासनः ॥ ११ ॥

 

पूतिगन्धस्तु दुर्गन्धो विस्रं स्यादामगन्धि यत् ।

शुक्लशुभ्रशुचिश्वेतविशदश्येतपाण्डुराः ॥ १२ ॥

 

अवदातः सितो गौरोऽवलक्षो धवलोऽर्जुनः ।

हरिणः पाण्डुरः पाण्डुरीषत्पाण्डुस्तु धूसरः ॥ १३ ॥

 

कृष्णे नीलासितश्यामकालश्यामलमेचकाः ।

पीतो गौरो हरिद्राभः पलाशो हरितो हरित् ॥ १४ ॥

 

लोहितो रोहितो रक्तः शोणः कोकनदच्छविः ।

अव्यक्तरागस्त्वरुणः श्वेतरक्तस्तु पाटलः ॥ १५ ॥

 

श्यावः स्यात्कपिशो धूम्रधूमलौ कृष्णलोहिते ।

कडारः कपिलः पिङ्गपिशङ्गौ कद्रुपिङ्गलौ ॥ १६ ॥

 

चित्रं किर्मीरकल्माषशबलैताश्च कर्बुरे ।

गुणे शुक्लादयः पुंसि गुणिलिङ्गास्तु तद्वति ॥ १७ ॥

॥ इति धीवर्गः ॥

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नामलिङ्गानुशासनं नाम अमरकोषः प्रथमं काण्डम् (कालवर्गः)

 ॥ अथ कालवर्गः ॥

कालो दिष्टोऽप्यनेहापि समयोऽप्यथ पक्षति ।

प्रतिपद् द्वे इमे स्त्रीत्वे तदाऽऽद्यास्तिथयो द्वयोः ॥ १ ॥

 

घस्रो दिनाऽहनी वा तु क्लीबे दिवसवासरौ ।

प्रत्यूषोऽहर्मुखं कल्यमुषःप्रत्युषसी अपि ॥ २ ॥

व्युष्टं विभातं द्वे क्लीबे पुंसि गोसर्ग इष्यते ।

प्रभातं च दिनान्ते तु सायं संध्या पितृप्रसूः

प्राह्णाऽपराह्ण-मध्याह्नास्त्रिसंध्यमथ शर्वरी ॥ ३ ॥

निशा निशीथिनी रात्रिस्त्रियामा क्षणदा क्षपा ।

विभावरीतमस्विन्यौ रजनी यामिनी तमी ॥ ४ ॥

 

तमिस्रा तामसी रात्रिर्ज्यौत्स्नी चन्द्रिकयाऽन्विता ।

आगामिवर्तमानार्हयुक्तायां निशि पक्षिणी ॥ ५ ॥

 

गणरात्रं निशा बह्व्यः प्रदोषो रजनीमुखम् ।

अर्धरात्रनिशीथौ द्वौ द्वौ यामप्रहरौ समौ ॥ ६ ॥

 

स पर्वसंधिः प्रतिपत्पञ्चदश्योर्यदन्तरम् ।

पक्षान्तौ पञ्चदश्यौ द्वे पूर्णमासी तु पौर्णिमा ॥ ७ ॥

 

कलाहीने साऽनुमतिः पूर्णे राका निशाकरे ।

अमावास्या त्वमावस्या दर्शः सूर्येन्दुसंगमः ॥ ८ ॥

 

सा दृष्टेन्दुः सिनीवाली सा नष्टेन्दुकला कुहूः ।

उपरागो ग्रहो राहुग्रस्ते त्विन्दौ च पूष्णि च ॥ ९ ॥

 

सोपप्लवोपरक्तौ द्वौ अग्न्युत्पात उपाहितः ।

एकयोक्त्या पुष्पवन्तौ दिवाकरनिशाकरौ ॥ १० ॥

 

अष्टादश निमेषास्तु काष्ठा त्रिंशत् तु ताः कला ।

तास्तु त्रिंशत् क्षणस्ते तु मुहूर्तो द्वादशाऽस्त्रियाम् ॥ ११ ॥

 

ते तु त्रिंशदहोरात्रः पक्षस्ते दशपञ्च च ।

पक्षौ पूर्वाऽपरौ शुक्लकृष्णौ मासस्तु तावुभौ ॥ १२ ॥

 

द्वौ द्वौ मार्गादिमासौ स्यादृतुस्तैरयनं त्रिभिः ।

अयने द्वे गतिरुदग्दक्षिणाऽर्कस्य वत्सरः ॥ १३ ॥

समरात्रिदिवे काले विषुवद्विषुवं च तत् ।

पुष्पयुक्ता पौर्णमासी पौषी मासे तु यत्र सा ।

नाम्ना स पौषो माघाऽऽद्याश्चैवमेकादशाऽपरे ॥

मार्गशीर्षे सहा मार्ग आग्रहायणिकश्च सः ॥ १४ ॥


पौषे तैषसहस्यौ द्वौ तपा माघेऽथ फाल्गुने ।

स्यात्तपस्यः फाल्गुनिकः स्याच्चैत्रे चैत्रिको मधुः ॥ १५ ॥

 

वैशाखे माधवो राधो ज्येष्ठे शुक्रः शुचिस्त्वयम् ।

आषाढे श्रावणे तु स्यान्नभाः श्रावणिकश्च सः ॥ १६ ॥

 

स्युर्नभस्यप्रौष्ठपदभाद्रभाद्रपदाः समाः ।

स्यादाश्विन इषोऽप्याश्वयुजोऽपि स्यात्तु कार्तिके ॥ १७ ॥

 

बाहुलोर्जौ कार्तिकिको हेमन्तः शिशिरोऽस्त्रियाम् ।

वसन्ते पुष्पसमयः सुरभिर्ग्रीष्म ऊष्मकः ॥ १८ ॥

 

निदाघ उष्णोपगम उष्ण ऊष्मागमस्तपः ।

स्त्रियां प्रावृट् स्त्रियां भूम्नि वर्षा अथ शरत्स्त्रियाम् ॥ १९ ॥

 

षडमी ऋतवः पुंसि मार्गादीनां युगैः क्रमात् ।

संवत्सरो वत्सरोऽब्दो हायनोऽस्त्री शरत्समाः ॥ २० ॥

 

मासेन स्यादहोरात्रः पैत्रो वर्षेण दैवतः ।

दैवे युगसहस्रे द्वे ब्राह्मः कल्पौ तु तौ नृणाम् ॥ २१ ॥

 

मन्वन्तरं तु दिव्यानां युगानामेकसप्ततिः ।

संवर्तः प्रलयः कल्पः क्षयः कल्पान्त इत्यपि ॥ २२ ॥

 

अस्त्री पङ्कं पुमान्पाप्मा पापं किल्बिषकल्मषम् ।

कलुषं वृजिनैनोऽघमंहो दुरितदुष्कृतम् ॥ २३ ॥

 

स्याद्धर्ममस्त्रियां पुण्यश्रेयसी सुकृतं वृषः ।

मुत्प्रीतिः प्रमदो हर्षः प्रमोदाऽऽमोदसम्मदाः ॥ २४ ॥

 

स्यादानन्दथुरानन्दः शर्मशातसुखानि च ।

श्वःश्रेयसं शिवं भद्रं कल्याणं मङ्गलं शुभम् ॥ २५ ॥

 

भावुकं भविकं भव्यं कुशलं क्षेममस्त्रियाम् ।

शस्तं चाऽथ त्रिषु द्रव्ये पापं पुण्यं सुखादि च ॥ २६ ॥

 

मतल्लिका मचर्चिका प्रकाण्डमुद्धतल्लजौ ।

प्रशस्तवाचकान्यमून्ययः शुभाऽऽवहो विधिः ॥ २७ ॥

 

दैवं दिष्टं भागधेयं भाग्यं स्त्री नियतिर्विधिः ।

हेतुर्ना कारणं बीजं निदानं त्वादिकारणम् ॥ २८ ॥

 

क्षेत्रज्ञ आत्मा पुरुषः प्रधानं प्रकृतिः स्त्रियाम् ।

विशेषः कालिकोऽवस्था गुणाः सत्त्वं रजस्तमः ॥ २९ ॥

 

जनुर्जननजन्मानि जनिरुत्पत्तिरुद्भवः ।

प्राणी तु चेतनो जन्मी जन्तुजन्युशरीरिणः ॥ ३० ॥

 

जातिर्जातं च सामान्यं व्यक्तिस्तु पृथगात्मता ।

चित्तं तु चेतो हृदयं स्वान्तं हृन्मानसं मनः ॥ ३१ ॥

॥ इति कालवर्गः ॥

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नामलिङ्गानुशासनं नाम अमरकोषः प्रथमं काण्डम् (दिग्वर्गः)

 अथ दिग्वर्गः ॥

दिशस्तु ककुभः काष्ठा आशाश्च हरितश्च ताः ।

प्राच्यवाचीप्रतीच्यस्ताः पूर्वदक्षिणपश्चिमाः ॥ १ ॥

 

उत्तरादिगुदीची स्याद्दिश्यं तु त्रिषु दिग्भवे ।

 

अवाग्भवमवाचीनमुदीचीचीनमुदग्भवम् ।

प्रत्यग्भवं प्रतीचीनं प्राचीनं प्राग्भवं त्रिषु ॥

इन्द्रो वह्निः पितृपतिर्नैरृतो वरुणो मरुत् ॥ २ ॥

कुबेर ईशः पतयः पूर्वाऽऽदीनां दिशां क्रमात् ।

 

रविः शुक्रो महीसूनुः स्वर्भानुर्भानुजो विधुः ।

बुधो बृहस्पतिश्चेति दिशां चैव तथा ग्रहाः ॥

ऐरावतः पुण्डरीको वामनः कुमुदोऽञ्जनः ॥

कुबेर ईशः पतयः पूर्वाऽऽदीनां दिशां क्रमात् ।

 

रविः शुक्रो महीसूनुः स्वर्भानुर्भानुजो विधुः ।

बुधो बृहस्पतिश्चेति दिशां चैव तथा ग्रहाः ॥

ऐरावतः पुण्डरीको वामनः कुमुदोऽञ्जनः ॥

 

पुष्पदन्तः सार्वभौमः सुप्रतीकश्च दिग्गजाः ।

करिण्योऽभ्रमुकपिलापिङ्गलाऽनुपमाः क्रमात् ॥ ४ ॥

 

ताम्रकर्णी शुभ्रदन्ती चाऽङ्गना चाऽञ्जनावती ।

क्लीबाऽव्ययं त्वपदिशं दिशोर्मध्ये विदिक् स्त्रियाम् ॥ ५ ॥

 

अभ्यन्तरं त्वन्तरालं चक्रवालं तु मण्डलम् ।

अभ्रं मेघो वारिवाहः स्तनयित्नुर्बलाहकः ॥ ६ ॥

 

धाराधरो जलधरस्तडित्वान् वारिदोऽम्बुभृत् ।

घनजीमूतमुदिरजलमुग्धूमयोनयः ॥ ७ ॥

 

कादम्बिनी मेघमाला त्रिषु मेघभवेऽभ्रियम् ।

स्तनितं गर्जितं मेघनिर्घोषे रसिताऽदि च ॥ ८ ॥

 

शम्पा शतह्रदाह्रादिन्यैरावत्यः क्षणप्रभा ।

तडित्सौदामनी विद्युच्चञ्चला चपला अपि ॥ ९ ॥

 

स्फूर्जथुर्वज्रनिर्घोषो मेघज्योतिरिरंमदः ।

इन्द्रायुधं शक्रधनुस्तदेव ऋजुरोहितम् ॥ १० ॥

 

वृष्टिवर्षं तद्विघातेऽवग्राहाऽवग्रहौ समौ ।

धारासम्पात आसारः शीकरोम्बुकणाः स्मृताः ॥ ११ ॥

 

वर्षोपलस्तु करका मेघच्छन्नेऽह्नि दुर्दिनम् ।

अन्तर्धा व्यवधा पुंसि त्वन्तर्धिरपवारणम् ॥ १२ ॥

 

अपिधानतिरोधानपिधानाऽऽच्छादनानि च ।

हिमांशुश्चन्द्रमाश्चन्द्र इन्दुः कुमुदबान्धवः ॥ १३ ॥

 

विधुः सुधांशुः शुभ्रांशुरोषधीशो निशापतिः ।

अब्जो जैवातृकः सोमो ग्लौर्मृगाङ्कः कलानिधिः ॥ १४ ॥

 

द्विजराजः शशधरो नक्षत्रेशः क्षपाकरः ।

कला तु षोडशो भागो बिम्बोऽस्त्री मण्डलं त्रिषु ॥ १५ ॥

 

भित्तं शकलखण्डे वा पुंस्यर्धोऽर्धं समेंशके ।

चन्द्रिका कौमुदी ज्योत्स्ना प्रसादस्तु प्रसन्नता ॥ १६ ॥

 

कलङ्काङ्कौ लाञ्छनं च चिह्नं लक्ष्म च लक्षणम् ।

सुषमा परमा शोभा शोभा कान्तिर्द्युतिश्छविः ॥ १७ ॥

 

अवश्यायस्तु नीहारस्तुषारस्तुहिनं हिमम् ।

प्रालेयं मिहिका चाऽथ हिमानी हिमसंहतिः ॥ १८ ॥

 

शीतं गुणे तद्वदर्थाः सुषीमः शिशिरो जडः ।

तुषारः शीतलः शीतो हिमः सप्ताऽन्यलिङ्गकाः ॥ १९ ॥

 

ध्रुव औत्तानपादिः स्यात् अगस्त्यः कुम्भसम्भवः ।

मैत्रावरुणिरस्यैव लोपामुद्रा सधर्मिणी ॥ २० ॥

 

नक्षत्रमृक्षं भं तारा तारकाऽप्युडु वा स्त्रियाम् ।

दाक्षायिण्योऽश्विनीत्यादितारा अश्वयुगश्विनी ॥ २१ ॥

 

राधाविशाखा पुष्ये तु सिध्यतिष्यौ श्रविष्ठया ।

समा धनिष्ठाः स्युः प्रोष्ठपदा भाद्रपदाः स्त्रियः ॥ २२ ॥

 

मृगशीर्षं मृगशिरस्तस्मिन्नेवाऽऽग्रहायणी ।

इल्वलास्तच्छिरोदेशे तारका निवसन्ति याः ॥ २३ ॥

 

बृहस्पतिः सुराचार्यो गीष्पतिर्धिषणो गुरुः ।

जीव आङ्गिरसो वाचस्पतिश्चित्रशिखण्डिजः ॥ २४ ॥

 

शुक्रो दैत्यगुरुः काव्य उशना भार्गवः कविः ।

अङ्गारकः कुजो भौमो लोहिताङ्गो महीसुतः ॥ २५ ॥

 

रौहिणेयो बुधः सौम्यः समौ सौरिशनैश्चरौ ।

तमस्तु राहुः स्वर्भानुः सैंहिकेयो विधुन्तुदः ॥ २६ ॥

सप्तर्षयो मरीच्यत्रिमुखाश्चित्रशिखण्डिनः ।

राशीनामुदयो लग्नं ते तु मेषवृषादयः ॥ २७ ॥

 

सूरसूर्यार्यमादित्यद्वादशात्मदिवाकराः ।

भास्कराहस्करब्रध्नप्रभाकरविभाकराः ॥ २८ ॥

 

भास्वद्विवस्वत्सप्ताश्वहरिदश्वोष्णरश्मयः ।

विकर्तनार्कमार्तण्डमिहिरारुणपूषणः ॥ २९ ॥

 

द्युमणिस्तरणिर्मित्रश्चित्रभानुर्विरोचनः ।

विभावसुर्ग्रहपतिस्त्विषांपतिरहर्पतिः ॥ ३० ॥

 

भानुर्हंसः सहस्रांशुस्तपनः सविता रविः ।

भानुर्हंसः सहस्रांशुस्तपनः सविता रविः ।

पद्माक्षस्तेजसांराशिश्छायानाथस्तमिस्रहा ।

कर्मसाक्षी जगच्चक्षुर्लोकबन्धुस्त्रयीतनुः ॥

 

प्रद्योतनो दिनमणिः खद्योतो लोकबान्धवः ।

इनो भगो धामनिधिश्चांऽशुमाल्यब्जिनीपतिः ॥

माठरः पिङ्गलो दण्डश्चण्डांशोः पारिपार्श्वकाः॥ ३१ ॥

सूरसूतोऽरुणोऽनूरुः काश्यपिर्गरुडाग्रजः ।

परिवेषस्तुपरिधिरुपसूर्यकमण्डले ॥ ३२ ॥

 

किरणोस्रमयूखांशुगभस्तिघृणिरश्मयः ।

भानुः करो मरीचिः स्त्रीपुंसयोर्दीधितिः स्त्रियाम् ॥ ३३ ॥

 

स्युः प्रभारुग्रुचिस्त्विड्भाभाश्छविद्युतिदीप्तयः ।

रोचिः शोचिरुभे क्लीबे प्रकाशो द्योत आतपः ॥ ३४ ॥

 

कोष्णं कवोष्णं मन्दोष्णं कदुष्णं त्रिषु तद्वति ।

तिग्मं तीक्ष्णं खरं तद्वन्मृगतृष्णा मरीचिका ॥ ३५ ॥

 इति दिग्वर्गः ॥

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