भर्तृहरि का स्फोट सिद्धांत

शंकर वेदांत के पूर्व अद्वैतवादी सिद्धान्त में भर्तृहरि का शब्दाद्वैतवाद प्रमुख स्थान रखता है। भर्तृहरि ने सर्वप्रथम स्फोट सिद्धांत की सुव्यवस्थित आधार शिला रखी। स्फुट विकसने धातु से घन् प्रत्यय करने पर स्फोट शब्द बनता है, जिसका अर्थ होता है- विकास। शब्द को ब्रह्म स्वीकार करते हुए इसे मोक्ष का साधन कहा। इनके पूर्व शब्दब्रह्म की चर्चा उपनिषदों में भी की गयी है। बुद्धि में स्थित शब्द ध्वनियों में विकासित होकर अर्थ प्रकट करता है। इसी को भट्टोजि दीक्षित ने कहा है - जिससे अर्थ स्फुटित होता है, वहां बुद्धि में रहने वाला शब्द स्फोट है।
 
 स्फुटति अर्थः यस्मात् अर्थात् जिस शब्द द्वारा स्फोट (ध्वनि) अर्थबोध होना। मंडन मिश्र की स्फोटसिद्धि पर वाक्यपदीय का विशेष प्रभाव लक्षित होता है। इनकी गणना एक वैयाकरण के रूप में किया जाता है। विद्वानों ने इनका समय 65 ईसवी के आसपास निर्धारित किया है। इत्सिंग ने इन्हें बौद्ध प्रमाणित करने का प्रयास किया. किंतु यमुनाचार्य के सिद्धित्रय, सोमानंद और उत्पल देव की शिवदृष्टि तथा उनकी वृत्ति और प्रत्यग्रूप की चित्सुखी टीका में इन्हें अद्वैतवादी कहा गया है। वाक्यपदीयम् और नीति, श्रृंगार, वैराग्य शतक के अध्ययन से भी यही बात प्रमाणित होती है। वाक्यपदीयम् के प्रारंभ में भर्तृहरि ने अनादि निधन शब्द ब्रह्म को प्रणाम किया है।
            अनादिनिधनं ब्रह्म शब्दतत्त्वं यदक्षरम्।
विवर्ततेऽर्थभावेन प्रक्रिया जगतो यतः। ।वाक्यपदीयम्।1।।
नीति शतक के प्रारम्भ में भी उन्होंने दिक्कालाद्यनवच्छिन्न, अनन्त, चिन्मात्र मूर्ति, स्वानुभूतिगम्य, शांत तेजस् रूप ब्रह्म तत्व को नमस्कार किया है।
दिक्कालाद्यनवच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये।
स्वानुभूत्येकमानाय नमः शान्ताय तेजसे ॥ नीतिशतक।
वैराग्य शतक में भर्तृहरि के दर्शन का वेदान्त स्वरुप अधिक स्पष्ट हुआ है।
उत्खातं निधिशङ्कया क्षितितलं ध्माता गिरेर्धातवो
निस्तीर्णः सरितां पतिर्नृपतयो यत्नेन सन्तोषिताः ।
मन्त्राराधनतत्परेण मनसा नीताः श्मशाने निशाः
प्राप्तः काणवराटकोऽपि न मया तृष्णे सकामा भव ।। वैराग्य - 3 ।।
 इन श्लोकों में जगत् की अनित्यता का प्रतिपादन किया है। नित्य शब्द के उपासना से ही नित्य विवेक द्वारा संसार की निस्पृहता और वैराग्य का उत्पादन कर उस वैराग्य द्वारा ज्ञान और उसे मोक्ष की लब्धि का वर्णन किया है।
 भर्तृहरि शब्द अद्वैत वाद के समर्थक हैं। इन्होंने अपने ग्रन्थों में शब्द को ही ब्रह्म माना है, जो अर्थ रूप में विभाजित होता है और इसी से संपूर्ण जगत प्रक्रियाएं चलती है। कुछ विद्वानों के मत के अनुसार भर्तृहरि परिणामवादी हैं। वे विवर्त का अर्थ परिणाम करते हैं। वस्तुतः यह स्फोटवादी हैं और स्फोट को ही शब्द का वास्तविक स्वरुप मानते हैं। नादों द्वारा बुद्धि में बीज का आधान हो जाने पर, आवृत्ति से क्रमशः बीज परिपक्व होता है और अन्त्य ध्वनि द्वारा स्फोटात्मक शब्द का स्वरूप निर्धारित होता है-
            नादैराहितबीजायामन्त्येन ध्वनिना सह ।
आवृत्तिपरिपाकायां बुद्धौ शब्दोऽवधार्यते ॥ वा॰प॰ १.८४.
अनुपाख्येय तथा ग्रहणानुग्रह प्रत्ययों द्वारा ध्वनि प्रकाशित शब्द बुद्धि में अवधृत अर्थ होता है,यही स्फोट है। भर्तृहरि के इस सिद्धांत का दहराधिकरण भाष्य में शंकराचार्य ने खंडन किया है।
भर्तृहरि के अनुसार परमार्थ में एकत्व नानात्व प्रभृति के भेद घात निरस्त हो जाते हैं। सभी शक्तियों से एक ही सत्व सर्वत्र व्याप्त है। द्रष्टा, दृश्य और दर्शन परमार्थ में ही विकल्पित है। आगम से ही सर्वाधिक प्रमाण है। ऋषियों का ज्ञान भी आगम हेतुक है। एक ही शब्द शक्ति व्यापाराश्रय से अनेक रूपों में विभाजित होता है और उपायों से परमार्थ की शिक्षा दी जाती है।
उपायाः शिक्षमाणानां बालानां उपलापनाः ।
असत्ये वर्त्मनि स्थित्वा ततः सत्यं समीहते ॥ वाक्यपदीय, ब्रह्मकाण्ड- 53

 भर्तृहरि पश्यन्ती वाक् को परब्रह्म मानते हैं। मध्यमा और वैखरी इसी की क्रमशः स्थूल अभिव्यक्तियां है। इस प्रकार भर्तृहरि शब्दाद्वैतवादी आचार्य हैं। 
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