सूत्रार्थ - खर् परे रहते विसर्जनीय के स्थान पर सकार आदेश हो।
विष्णुस्त्राता।विष्णुः + त्राता में विसर्जनीयस्य सः सूत्र से खर् (त्राता के तकार) परे
रहने पर विष्णुः के विसर्ग को स् हुआ। विष्णुस्त्राता बना। इसी प्रकार शिवः तथा
में विसर्ग को सकार होकर शिवस्तथा बनता है।
विशेष-विष्णुस् + त्राता में ससजुषो रुः से रुत्व होकरविष्णुरुँ + त्राता हुआ। उपदेशेऽजनुनासिक इत् से रू घटक उकार की
इत्संज्ञा,तस्य लोपः होकर विष्णुर् + त्राता बना। अब खरवसानयोर्विसर्जनीयः
से विसर्ग होकर विष्णुः+त्राता होता है।विसर्जनीयस्य
सः से सकार, विष्णुस् + त्राता, अनचि
च से वैकल्पिक द्वित्व, विष्णुस्त्राता, विष्णुस्स्त्राता बना।खरि च से चर् वर्णों का
सवर्ण चर् ही रहता है ।विष्णुस्त्राता तथाविष्णुस्स्त्राता।अणोऽप्रगृह्यस्यानुनासिकः
से अनुनासिक होकर विष्णुस्त्राता, विष्णुस्त्राताँ, विष्णुस्स्त्राता, विष्णुस्स्त्राताँ ये 4
रूप बनेंगें।झरो झरि सवर्णे की भी प्रवृत्ति होती है ।
१०४ वा शरि
शरि विसर्गस्य विसर्गो वा । हरिः शेते, हरिश्शेते ।।
सूत्रार्थ - शर् परे रहते विसर्ग के स्थान पर विकल्प से विसर्ग आदेश हो।
हरिः शेते, हरिश्शेते ।हरिः + शेते में वा शरि सूत्र से हरिः के विसर्ग
को शर् (शेते का शकार) परे रहते विकल्प से विसर्ग हुआ। हरिः शेते बना। विसर्ग के
अभाव पक्ष में विसर्जनीयस्य सः सूत्र से विसर्ग को स् होकर हरिस् + शेते हुआ।
स्तोः श्चुना श्चुः से हरिश् के सकार को श्रुत्व शकार होकर हरिश्शेते बना।
१०५ ससजुषो रुः
पदान्तस्य सस्य सजुषश्च रुः स्यात् ।।
सूत्रार्थ -पदान्त सकार तथा सजुष् के सकार के स्थान पर रु हो।
सूत्रार्थ -अप्लुत अत् से परे रू को उ हो, अप्लुत अत् परे रहते।
शिवोऽर्च्यः। शिवस् + अर्च्यः
में ससजुषो रुः से सकार को रु हुआ। रु के
उकार की इत्संज्ञा, लोप, शिवर् + अर्च्यः बना। शिवर् + अर्च्यः में व् का अकार अप्लुत अ है,
उसके बाद र् है और र् के बाद अर्च्यः का अप्लुत अ है, इसलिए यहाँ र् को उत्व होकर शिवोऽर्च्यः बना ।
सिद्धि इस प्रकार है-
शिव सु अर्च्यःसुप्तिङन्तं पदम् से शिव सु की पद संज्ञा
शिव स् अर्च्यःसु के उकार का अनुबन्ध लोप
शिव रु अर्च्यःससजुषो रुः सूत्र से पदान्त स् को रु
शिव र् अर्च्यःरु के उकार का अनुबन्ध लोप
शिव उ अर्च्यःअतोरोरप्लुतादप्लुते सूत्र से र् को उत्व
शिवो अर्च्यःआद्गुणः सूत्र से गुण
शिवोऽर्च्यःएङः पदान्तादति सूत्र से पूर्वरूप
१०७ हशि च
तथा । शिवो वन्द्यः ।।
सूत्रार्थ - अप्लुत अत् से परे रहते रु को उ आदेश हो, हश् परे रहते।
शिवो वन्द्यः।शिव सु वन्द्यः में सु के उकार का अनुबन्ध लोप शिव + स् + वन्द्यः हुआ। ससजुषो रुः सूत्र से स् को रु आदेश हुआ। शिव् + रु + वन्द्यः हुआ। रु के उकार का अनुबन्ध लोप, शिव + र् + वन्द्यः हुआ। यहाँ शिव का अकार अप्लुत अत् है अतः हशि च सूत्र सेहश् (वन्द्यः का वकार) परे रहते र् को उत्व हुआ। शिव + उ + वन्द्यः हुआ। आद्गुणः सूत्र से अ + उ का गुण एकादेशहोकर शिवो वन्द्यः बना।
सूत्रार्थ - भोस् भगोस् अघोस् तथा अवर्ण पूर्वक रु को यकार आदेश हो अश् परे
रहते।
देवा इह ।देवा + स् + इहमें
ससजुषो रुः से स् को रु आदेश, देवा + रु + इह हुआ। रु
के उकार का अनुबन्ध लोपदेवा + र् + इह
हुआ। भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि सूत्र से रेफ को य् का आदेश, देवा + य् + इह हुआ । लोपः शाकल्यस्य सूत्र से य् का विकल्प से लोप होकर
देवा इह बना। विकल्प के अभाव पक्ष में देवा + य् + इह में वर्ण सम्मेलन कर देवायिह
बना।
सूत्रार्थ - भोस्
भगोस् अघोस् तथा अवर्ण पूर्वक य का लोप हो हल् परे रहते।
अर्थ- भोस् भगोस् अघोस् अ अवर्ण
पूर्व वाले य् का लोप होता है हल् परे रहते। भोस् भगोस् तथा अघोस् ये तीनों
सकारान्त निपात हैं। इसके सकार रु एवं रु को य् आदेश किया जाता है। रूप सिद्धि इस
प्रकार है।
भोस् देवाः
भो रु देवाःससजुषो रूः सूत्र से स् को रु आदेश
भो र् देवारु के उकार का अनुबन्ध लोप
भो य् देवाः भो-भगो-अघो-अपूर्वस्य
योऽशि सूत्र से र् को य् आदेश
भो देवाःहलि सर्वेषाम् सूत्र से य् का लोप
इसी प्रकार भगोस् तथा अघोस् के सकार को रुत्व तथा यत्व होकर भगो नमस्ते। अघो याहि
बनेगें।
अभ्यास-
पुनः रमते. एषः
विष्णुः. हरि: चरितम् में सन्धि का प्रयोग करें।
११० रोऽसुपि
अह्नो रेफादेशो न तु
सुपि । अहरहः । अहर्गणः ।।
सूत्रार्थ - अहन् शब्द के नकार को रेफ आदेश हो परन्तुसुप् परे रहते नहीं हो।
अहरहः ।अहन् + अहः इस अवस्था मेंरोऽसुपि सूत्र से अहन् केनकार के स्थान पर र्
आदेश हुआ। यहाँ पर अहः बाद में है, जि कि सुप् प्रत्याहार का
नहीं है। अहर् + अहः हुआ। परस्पर वर्ण सम्मेलन करने परअहरहः
बना।
सूत्रार्थ - लोप
निमित्तक ढकार तथा रेफ रहते पूर्व अण् वर्ण को दीर्घ होता है।
अकार का उदाहरण-
पुना रमते ।पुनर् + रमते मेंरो रि सूत्र सेर्
परे रहतेपूर्ववर्ती र् का लोपहुआ, पुन + रमतेबना।ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः सूत्र से पुन के अकार को दीर्घ हुआ।पुना रमते बना।
इसी तरह इकार तथा उकार के उदाहरणों
में हरिर् रम्यः = हरी रम्यः । शम्भुर् राजते = शम्भू राजते भी सिद्ध होंगे।
अणः किम्? तृढः
अण्
(अ इ उ) से परे र् और ढ् होने पर अण् को ही दीर्घ होता है। अन्य को नहीं। जैसे-
तृढ् ढः यहाँ पर ढो ढे लोपः से ढकार से परे ढकार रहने के कारण ढ् का लोप तो हुआ
परन्तु ढ्रलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः में अणः कहने से तृ के ऋकार को दीर्घ नहीं हुआ।
सूत्रार्थ - समान
बल वाले सूत्र के एक साथ प्रवृत्त होने पर बाद वाले सूत्र का कार्य हो।
मनोरथः ।मनस् रथः इस
स्थिति में
मन रु रथःससजुषो रूः सूत्र से स् को रु आदेश
मन र् रथःअनुबन्ध लोप
यहाँ रो रि सूत्र से र् का लोप और हशि च सूत्र
से र् को उत्व-दोनों की एक साथ प्राप्ति हुई। विप्रतिषेधे परं कार्यम् से रो रि
(8.3.14)से र् का लोप हो गया। मन + रथः बना। हशि च
(6.1.110) से रथ के थकार पर रहने के कारण लुप्त रकार के स्थान पर उत्व हुआ।
मन उ रथः बना। आद्गुणः सूत्र से गुण एकादेश होकर मनोरथः बना।
विशेष-तुल्य
बल विरोध या समान बल वाले का विरोध उसे कहते हैं, जब दोनों
सूत्रों की प्रवृत्ति अन्य स्थलों पर हो चुकी हो। वे दोनों कार्य कर चुके हों तथा
किसी एक स्थल पर दोनों की प्राप्ति हो रही हो।
अन्यत्रान्यत्रलब्धावकाशयोरेकत्रप्राप्तिः तुल्यबलविरोधः । जैसे- रो रि सूत्र पुना
रमते में रेफ का लोप कर चुका है तथा शिवो वन्द्यः में हशि च उत्व कर चुका है। मनोरथः
में दोनों की प्राप्ति है अतः यहाँ तुल्य बल विरोध है। ऐसे प्रसंग में विप्रतिषेधे
परं कार्यम् से पर कार्य होता है। संस्कृत व्याकरण के सूत्र में किस सूत्र का कौन
विरोध करता है,किसका कौन बाधक है आदि पर परिभाषेन्दुशेखर आदि
ग्रन्थों में विस्तार से चर्चा की गयी है।
सूत्रार्थ - सः पद के सु का लोप हो अच् परे रहते यदि लोप करने से पाद की पूर्ति हो रही हो तब।
सस् + इमाम् सस् के सु(स्) का लोप हुआ
स इमाम् आद् गुणः से गुण
सेमामविड्ढि प्रभृतिं सिद्ध हुआ। सेमामविड्ढि प्रभृतिं च ईशिषे यह एक पाद की पूर्ति हो गयी।
स सु एष दाशरथी रामः
स एष दाशरथी रामः सोऽचि लोपे चेत्पादपूरणम् सूत्र से सु का लोप
सैष दाशरथी रामः वृद्धिरेचि सूत्र से वृद्धि एकादेश
विशेष- यदि पाद पूर्ति होगी तभी सु का लोप होगा। यदि सु के लोप के बिना ही पाद की पूर्ति हो जायेगी तो इस सूत्र की उपयोगिता नहीं रहेगी। जैसे- सोऽहमाजन्मशुद्धानाम् इत्यादि।
इस टूल की सहायता से मधु़ +इदम् , मातृ़ + आदेश, चन्द्र + उदय, लक्ष्मी + ईश्वर, प्रिया + एव, साधो + अत्र, यमुने + इति, सत् + जन, तत् + रूप, गृहम् + गच्छति, अं + चित, परि+छेद, छिन्नः+तरु, भानुस्+ अपि, सुन्दरः+भवति आदि में सन्धि का अभ्यास करें। सन्धि करते समय यह ध्यान रखें कि यह टूल दो पदों अथवा प्रातिपदिक एवं प्रत्यय के बीच सन्धि करता है। अतः देख लें कि इनमें कौन पद है, कौन प्रातिपदिक तथा कौन प्रत्यय है। यदि आपको पद, प्रातिपदिक तथा प्रत्यय की सुनिश्चित जानकारी नहीं हो तो इनमें से विकल्प को बदलकर देखें।
सूत्रार्थ - सकार तथा तवर्ग का शकार तथा चवर्ग के साथ योग होने पर सकार के स्थान पर शकार तथा तवर्ग के स्थान पर चवर्ग हो।
विशेष-
सकार तथा तवर्ग काशकार तथा चवर्ग के साथ पूर्व या पर (पहले या बाद) में कहीं भी योग होने पर स् कोश् तथा तवर्ग के स्थान पर यथासंख्य चवर्ग आदेश होगा। अर्थात् सकार तथा तवर्ग का शकार तथा चवर्ग के साथ योग होना चाहिए। यह योग किसी भी प्रकार से हो रहा हो। पहले सकार तथा तवर्ग आता हो या बाद में । दोनों स्थिति में शकार चवर्ग होगा।
स्थिति इस तरह होगी।
👇
स, त, थ, द, ध, न ↔ श, च, छ, ज, झ, ञ
अथवा
श, च, छ, ज, झ, ञ ↔ स, त, थ, द, ध, न
रामश्शेते । रामस् + शेते में स् के बाद शकार होने से स्तोः श्चुना श्चुः से स् को श् आदेश हुआ। रामश्शेते बना।आप वा शरि सूत्र के नियम से रामः शेते भी लिख सकते है। इसे हम विसर्ग सन्धि में पढ़ेंगे।
इसी प्रकार अन्य उदाहरण-
रामश्चिनोति । रामस् + चिनोति में रामस् के स् के बाद चवर्ग का चकार बाद में होने के कारण स्तोः श्चुना श्चुः से स् को श् आदेश होकर रामश्चिनोति बना।
सच्चित् । सत् + चित् अस स्थिति में सत् के तकार को जश्त्व द् होकर सद् बनता है। इसके बाद दकार को श्चुत्व ज् हुआ। पुनः जकार को खरि च से चर्त्व च् होकरसच्चित् बना। प्रस्तुत उदाहरण में छात्र को दकार को स्तोः श्चुना श्चुः से श्चुत्व ज् होने की प्रक्रिया बतायी जाय।
शार्ङ्गिञ्जय । शार्ङ्गिन् + जयमें न् के बाद चवर्ग का जकार बाद में होने से स्तोः श्चुना श्चुः से नकार को ञ् आदेश होकरशार्ङ्गिञ्जयबना।
विशेष-
सकार एवं तवर्ग में कुल 6 अक्षर हैं- स् त् थ् द् ध् न् । इन वर्णों के स्थान परयथासंख्य नियम के अनुसारक्रमशः श् च् छ् ज् झ् ञ् आदेश होगा। अतः सकार के स्थान पर शकार, तकार के स्थान पर चकार, इसी प्रकार क्रमशः यथासंख्य आदेश होंगें। शात् सूत्र से ज्ञात होता है कि यह यथासंख्य नियम केवल आदेश में ही लागू होगा। स्थानी (सकार तथा तवर्ग का कोई वर्ण) या योग (शकार या चवर्ग) का कोई भी वर्ण पूर्व या पर में होने पर श्चुत्व हो जाता है।
श्चुत्व नियम का निषेध-
६३शात्
शात्परस्य तवर्गस्य श्चुत्वं न स्यात् । विश्नः । प्रश्नः ।।
सूत्रार्थ - शकार से परे तवर्ग का शकार और चवर्ग नहीं हो।
विश्नः। विश् + न में शकार के बाद न (तवर्ग) होने पर स्तोः श्चुना श्चुः से न को श्चुत्व ञ् प्राप्त था, इस सूत्र सेश्चुत्व का निषेध होकर विश्नः ही रह गया। इसी प्रकार प्रश्नः में भी।
इस निषेध सूत्र से ज्ञात होता है कि श् चवर्ग के पूर्व या बाद तवर्ग, स हो या स्तवर्ग के बाद श् या चवर्ग हो। दोनों ही स्थिति मेंश्चुत्व होगा। पूर्व या पर किसी भी स्थिति में होने परश्चुत्वप्राप्त नहीं होता तोयह सूत्र निषेध नहीं करता।
सूत्रार्थ - पदान्त टवर्ग से परे नाम भिन्न शब्द के सकार तथातवर्ग के स्थान पर ष्टुत्व नहीं हो।
षट् सन्तः । षड् + सन्तः में सकार को ष्टुना ष्टुः से ष्टुत्व प्राप्त था। षड् पद के बाद सकार होने से न पदान्तात् सूत्र से ष्टुत्व का बाध हो गया। षड् + सन्तः में डकार को खरि च से चर् (टकार) हो जाने पर षट् सन्तः रूप बनता है। इसी प्रकार षड् + ते में षड् पद के बाद तवर्ग ते होने से कारण इस सूत्र से ष्टुत्व का निषेध हो गया। डकार का चर्त्व टकार होकर षट् ते रूप बना।
आचार्य पाणिनि के सूत्रों में किये गये प्रत्येक अनुबन्धों की समीक्षा कर उसकी उपयोगिता बताते हैं।न पदान्तात् सूत्र में पदान्त ग्रहण क्यों किया गया? उत्तर देते हैं- इट् + ते में तिङन्त ते है, जिसकी सुप्तिङन्तं पदम् से पद संज्ञा होती है। यदि यहाँ पदान्त नहीं कहा जाता तो इट् के टकार के बाद तकार होने से ष्टुत्व का निषेध हो जाता। इस प्रकार की अनिष्ट आपत्ति से बचने के लिए इस सूत्र में पदान्त कथन किया गया। इट् + ते में तकार का ष्टुत्व टकार होकर इट्टे रूप सिद्ध हुआ।
इसी प्रकार सूत्र में टवर्ग ग्रहण की उपयोगिता का उदाहरण सर्पिष्टमम् देते हैं। यदि पदान्त से परे नाम से भिन्न सकार तवर्ग के ष्टुत्व का निषेध किया जाता तो सर्पिष् +तमम् जैसे स्थल पर भी ष्टुत्व का निषेध हो जाता। अतः सूत्र में टवर्ग से परे कहा गया। सर्पिष् +तमम् में ष्टुना ष्टुः से तकार को ष्टुत्व होकर सर्पिष्टमम् रूप बना।
अर्थ - नाम, नवति, नगरी को छोड़कर ष्टुत्व का निषेध हो।
षण्णाम् । षण्णवतिः । षण्णगर्यः ।
षड् + नाम, षड् + नवति, षड् + नगर्यः में ष्टुना ष्टुः से नाम, नवति तथा नगर्यः के नकार को ष्टुत्व णकार प्राप्त था, जिसे न पदान्ताट्टोरनाम् से ष्टुत्व का निषेध हो रहा था। ष्टुत्व निषेध होने से अनिष्ट रूप बन रहे थे,जबकि ष्टुत्व होने पर ही इच्छित रूप बन सकता है। अतः अनाम्नवति० वार्तिक द्वारा नाम, नवति तथा नगरी को छोड़कर ष्टुत्व निषेध का विधान किया। इस प्रकार षड् + नाम में नकार को ष्टुत्व णकार होकर षड् + णाम् हुआ । षड् के डकार को प्रत्यये भाषायां नित्यम् सूत्र से णकार हुआ षण्णाम् रूप बना । इसी प्रकार षड् + नवतिमें नकार को ष्टुत्व णकार तथा डकार को यरोऽ नुनासिके० से णकार हुआ षण्णवतिः रूप बना ।
६६तोः षि
न ष्टुत्वम् । सन्षष्ठः ।।
सूत्रार्थ - तवर्ग का षकार परे रहते ष्टुत्व नहीं हो।
सन्षष्ठः । सन् + षष्ठः इस अवस्था में ष्टुना ष्टुः से सन् के नकार को ष्टुत्व प्राप्त हुआ। प्रकृत सूत्र से सन् + षष्ठः में तवर्ग नकार से षकार परे रहने पर ष्टुत्व का निषेध हो गया । सन्षष्ठः यथावत् रूप बना।
६७झलां जशोऽन्ते
पदान्ते झलां जशः स्युः । वागीशः ।।
सूत्रार्थ - पदान्त में झल् के स्थान पर जश् हो। वाक् + ईशः में पदान्त झल् है वाक् का क् , इसे जश् हुआ ग् ।वाग् + ईशः = वागीशः रूप बना।
विशेष-
जश्त्व सन्धि 1. पदान्त (झल्) वर्णों का 2. अपदान्त (झल्) वर्णों का में होता है। यहाँ आपने पदान्त झल् के जश्त्व के बारे में पढ़ा है।अपदान्त जश्त्व के बारे मेंसुध्युपास्यः सिद्ध करते समय झलां जश् झसि इस सूत्र को पढ़ चुके हैं।
६८यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा
यरः पदान्तस्यानुनासिके परेऽनुनासिको वा स्यात् । एतन्मुरारिः, एतद् मुरारिः ।
सूत्रार्थ - पदान्त में यर् के स्थान पर विकल्प से अनुनासिक हो अनुनासिक परे रहते।
एतन्मुरारिः।एतद् + मुरारिः इस दशा में एतद् इस पद के अंत में यर् वर्ण है दकार। इस दकार को अनुनासिक मुरारिः के मकार परे रहते अनुनासिक वर्ण नकार हो जाएगा। यहाँ पर द् को अनुनासिक न् आदेश उच्चारण स्थान की समानता के कारण हुआ।एतन्मुरारिः रूप बना। विकल्प पक्ष में एतद्मुरारिः रहेगा।इसी प्रकार धिक् + मनःआदि बनाकर देखें।
अर्थ- अनुनासिक से प्रारम्भ होने वाले प्रत्यय परे रहते पदान्त यर् के स्थान पर नित्य अनुनासिक हो।
तन्मात्रम्।तद् + मात्रम् इस अवस्था में तद् एक पद है तथा इसके आगे मात्रच् प्रत्यय का मकार है, जो कि अनुनासिक है।अनुनासिक से प्रारम्भ होने वाला मात्रच् प्रत्यय के मकार, तद् इस पदान्त यर् के बाद में है। अतः द् के स्थान परअनुनासिक वर्ण होगा नकार। तन्मात्रम् रूप बनेगा। इसी प्रकार चित् + मयम् में पदान्त यर् चित् के बाद मयट् प्रत्यय का म होने से चिन्मयम् रूप बनेगा। कई लोग संस्कृत वाङ्मय शब्द अशुद्ध लिखते है। यहाँ वाक् + मयम् शब्द है। ककार को ङकार होकर वाङ्मय रूप बनेगा।
सूत्रार्थ - लकार परे रहते तवर्ग के स्थान पर परसवर्ण हो।
तल्लयः। तद् + लयः इस स्थिति में तवर्ग के दकार से परे लयः का लकार रहने पर दकार के स्थान पर पर सवर्ण आदेश प्राप्त हुआ। तुल्यास्यप्रयत्नं सवर्णम् के अनुसार दकार तथा लकार का एक उच्चारण स्थान है (ॡतुलसानां दन्ताः । ॡ, तवर्ग, ल एवं श का उच्चारण स्थान दांत है।) अतः दकार के स्थान पर स्थान साम्य आदेश लकार होगा। तल्लयः रूप बनेगा। इसी प्रकार विद्वान् + लिखति में नकार के अनुनासिक होने से इसके स्थान पर अनुनासिक लँकार आदेश हुआ। विद्वाँल्लिखति बना।
७०उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य
उदः परयोः स्थास्तम्भोः पूर्वसवर्णः ।।
सूत्रार्थ - उद् उपसर्ग पूर्वक स्था और स्तम्भ धातुओं को पूर्वसवर्ण हो।
सूत्रार्थ - पंचमी विभक्ति के निर्देश के द्वारा किया जाना वाला कार्य दूसरे वर्ण के व्यवधान रहित पर वर्ण को हो।
इस सूत्र को समझने के लिए उदः स्थास्तम्भोः सूत्र तथा तस्मादित्युत्तरस्य इन दोनों सूत्रों को समझना अनिवार्य है। परिभाषा के अनुसार उदः इस पञ्चम्यन्त पद के निर्देश द्वारा जिस कार्य का विधान बाद के पद के स्थान में किया गया हो, वह कार्य पर पद के आदि वर्ण के स्थान में हो।
उत्थानम् ।उद् +थ + थानम् में दकार हल् से परे थकार झर् है। इसके बाद सवर्ण झर् है शानम् का थकार, अतः पूर्व थकार का विकल्प से लोप होगा। लोप हो जाने पर उद् + थानम् होगा।
उद् + थानम् तथा उद् +थ + थानम् दोनों रूपों में खर् (थकार) के परे रहते (दकार) झल् के स्थान पर सदृशतम चर् आदेश तकार होगा। लोप पक्ष में उत् + थानम् = उत्थानम् तथा विकल्प पक्ष में उत् +थ + थानम् = उत्थथानम् रूप बनेगा।इसी प्रकार उद् + थ + तम्भनम् मेंउत्तम्भनम् तथा उत्थ्तम्भनम्रूप बनेगा।
विशेष-
यह सूत्र झल् वर्णों को चर् करता है अतः इसे चर्त्व सन्धि कहते हैं। हल् सन्धि का यह महत्वपूर्ण सूत्र है।
७५झयो होऽन्यतरस्याम्
झयः परस्य हस्य वा पूर्वसवर्णः । नादस्य घोषस्य संवारस्य महाप्राणस्य तादृशो वर्गचतुर्थः । वाग्घरिः, वाग्हरिः ।। सूत्रार्थ - झय् परे रहते हकार को पूर्वसवर्ण हो विकल्प हो।
सूत्रार्थ - झय् से परे शकार के स्थान पर विकल्प से छकार हो अट् परे रहते।
तच्छिवः, तच्शिवः। तद् + शिवः इस अवस्था में स्तोः श्चुना श्चुः से तद् के दकार का श्चुत्व जकार हुआ। तज् + शिवः रूप बना। खरि च सूत्र से तज् के जकार को चकार हुआ तच् + शिवः रूप बना। अब शश्छोऽटि से तच् इस पद के अंत के अंतिमवर्ण च् के परेशिवः का शकारहोने से शकार को विकल्प से छकार हुआ। तच्छिवः रूप बना। जिस बार शश्छोऽटि शकार को छकार नहीं होगा उस पक्ष में तच्शिवः रूप बनेगा।
(छत्वममीति वाच्यम्)तच्छ्लोकेन ।।
अर्थ - अम् परे रहते पदान्त झय् से परे शकार के स्थान पर विकल्प से छकार हो।
तच्छ्लोकेन ।तद् + श्लोकेन मेंतद् के दकार को स्तोः श्चुना श्चुः से श्चुत्व जकार हुआ तथा जकार को खरि च से चकार होकर तच् + श्लोकेन हुआ। तद् श्लोकेन मेंपद है- तच्, इसके अंत में झय् का चकार है, इस पदान्त झय् से परे है श्लोकेन का शकार है। इस शकार से परे अम् है लकार। ऐसी स्थिति में शकार के स्थान पर विकल्प से छकार हो गया। वर्ण सम्मेलन होकर तच्छ्लोकेन बना।
७७ मोऽनुस्वारः
मान्तस्य पदस्यानुस्वारो हलि । हरिं वन्दे ।।
सूत्रार्थ - मकारान्त पद के स्थान पर अनुस्वार हो हल् परे रहते।
हरिं वन्दे। हरिम् + वन्दे में मान्त पद हरिम्है, हल् परे है वन्दे का वकार अतः हरिम् इस पद को मोऽनुस्वारः से अनुस्वार प्राप्त हुआ। अलोऽन्त्यस्य के अनुसार हरिम् क् अंतिम अल् मकार के स्थान पर अनुस्वार होकर हरिं वन्दे रूप सिद्ध हुआ। इसी प्रकार व्याघ्रं हन्ति। मधुरं खादति आदि में अनुस्वार होता है।
सूत्रार्थ - अपदान्त नकार तथा मकार से झल् परे रहते उसके स्थान पर अनुस्वार हो।
यशांसि ।जो पद के अंत में नहीं हो उसे अपदान्त कहते हैं। यशान् + सि में यशान् का नकार पद के अंत में नहीं है। यशस् शब्द का पद है यशांसि। अपदान्त यशान् के नकैर को झल् (स्) परे रहते अनुस्वार हो गया। यशांसि रूप बना। इसी प्रकार आक्रम् + स्यते में मकार को अनुस्वार होकर आक्रंस्यते रूप बना। अन्य उदाहरण- पयांसि, नमांसि आदि ।
झलि किम् ? ग्रन्थकारप्रश्न करते हुए प्रत्येक अनुबन्ध की उपयोगिता दिखाते हैं। यहाँ प्रश्न हुआ कि यदि सूत्र में झल् परे रहने पर ऐसा नहीं कहतेअर्थात् अपदान्त नकार तथा मकार के स्थान पर अनुस्वार हो। इतना मात्र कहते तो क्या होता? उसका उत्तर मन्यसे इस उदाहरण से दे रहे हैं। मन् + यसे में अपदान्त मन् के नकार को अनुस्वार होकर मंन्यसे ऐसा अनिष्ट रूप बन जाता । अतः सूत्र में झलि कहा। झलि कहने से यसे का यकार झल् प्रत्याहार में नहीं आता अतः यहाँ अनुस्वार नहीं होता।
सारांश-
अनुस्वार सन्धि दो स्थितियों में होती है। 1. कोई भी व्यंजन वर्ण बाद में होने पर पदान्त म् वर्ण को नित्य अनुस्वार होता है। 2. झल् परे रहते अपदान्त न् तथा म् वर्णों का अनुस्वार होता है। मोऽनुस्वारः हल् सन्धि का यह महत्वपूर्ण सूत्र है।
७९ अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः
स्पष्टम् । शान्तः ।।
सूत्रार्थ - अनुस्वार के स्थान में परसवर्ण हो, यय् परे रहते
शान्तः।शां + तः में शां के अनुस्वार को यय् (तः) तकार परे रहने पर परसवर्ण हो गया। अनुस्वार का स्थान साम्य परसवर्ण तवर्ग का पंचमवर्ण नकार होगा।
विशेष-
शाम् + तः में मकार को नश्चापदान्तस्य से अनुस्वार तथा अनुस्वार को इस सूत्र से परसवर्ण (नकार) होने पर शांतः रूप बना। अन्य उदाहरण- शङ्का, गुण्ठितः, गङ्गा, अञ्चितः, मुक्तिञ्च, अर्चनञ्च आदि
८० वा पदान्तस्य
त्वङ्करोषि, त्वं करोषि ।।
सूत्रार्थ - पदान्त अनुस्वार के स्थान पर विकल्प से परसवर्ण हो, यय् परे रहते।
त्वङ्करोषि।त्वम् + करोषि में त्वम् और करोषि ये दो पद हैं । इन दोनों पदों में से त्वम् इस पद के मकार को मोऽनुस्वारः से अनुस्वार होकर त्वं हो गया।यह अनुस्वार बाद में स्थित वर्ण के करोषि के ककारसमान होगा।इस अनुस्वार वर्ण को तुल्यास्यप्रयत्नं सूत्र के अनुसार विकल्प से परसवर्ण होगा। त्वं का अनुस्वार परवर्ती ककार के पंचम वर्ण के समान होकरत्वङ्करोषि हो जाएगा। विकल्प पक्ष में त्वं करोषि ही रहेगा।
पूर्व में अनुस्वार तथा बाद में यय् प्रत्याहार का वर्ण होने पर अनुस्वार के स्थान पर परसवर्ण हो जाता है।इसे परसवर्ण सन्धि भी कहा जाता है।परसवर्ण सन्धि दो स्थितियों में होती है।
1. अपदान्त अनुस्वार के बादयय् परे रहने पर नित्य अनुस्वार होता है जबकि
2. पदान्त अनुस्वार के बादयय् परे रहने पर विकल्प से अनुस्वार होता है।
सूत्रार्थ - क्विप् प्रत्ययान्त राज् धातु परे रहते सम् के मकार के स्थान पर म् ही हो।
सम्राट् ।सम् + राट्में राट् यह क्विप् प्रत्ययान्त शब्द है। उसके परे रहते सम् के मकार को मोऽनुस्वारः से अनुस्वार प्राप्त था। उसका निषेध इस सूत्र के होकर सम् के मकार को मकार ही रह गया। सम्राट्रूप बना।
सूत्रार्थ - मकार है परे जिस हकार के ऐसे हकार के परे रहते मकार के स्थान पर विकल्प से मकार हो।
यहाँ तीन शर्तों का ध्यान रखना चाहिए -
1. मकार के स्थान पर विकल्प से मकार होता है, विकल्प पक्ष में अनुस्वार होता है । 2. मकार के बाद का वर्ण हकार हो। 3. इस हकार के बाद पुनः मकार हो। यहाँ वर्णों की स्थिति होगी – म् + ह् + म् ।
किम् ह्मलयति, किं ह्मलयति ।किम् + ह्मलयति में हे मपरे वा से हकार के परे ह्म का मकार पर है ऐसे हकार किं के अनुस्वार के परे रहतेमोऽनुस्वारः से प्राप्त अनुस्वार को बाधकर कर विकल्प से मकार कर दिया। किम् ह्मलयति बना। विकल्प पक्ष में मोऽनुस्वारः से अनुस्वार होकर किं ह्मलयति बना।
अर्थ- यकार, वकार, लकार है परे है जिस हकार के ऐसे हकार के परे रहते मकार के स्थान पर विकल्प सेय्ँ , व्ँ, ल्ँआदेश हो।
यवलपरे वार्तिक में तीन शर्तों का ध्यान रखना चाहिए -
1. मकार के स्थान पर विकल्प सेय्ँ , व्ँ, ल्ँआदेशहोता है, विकल्प पक्ष में अनुस्वार होता है । 2. मकार के बाद का वर्ण हकार हो। 3. इस हकार के बाद पुनःय / व/ लहो। यहाँ वर्णों की स्थिति होगी – म् + ह् +य / व/ ल।
यहाँ स्थानी मकार अनुनासिक है अतः आदेश य् व् ल् भी अनुनासिक होगा। किम् + ह्यः, किम् + ह्वलयति, किम् + ह्लादयति में ह्यः, ह्वलयति तथा ह्लादयति के हकार के परे क्रमशः य,र, तथा ल है। ऐसा हकार किम् के मकार के परे होने पर किम् के मकार को क्रमशः अनुनासिक सहित य्ँ , व्ँ, ल्ँ होकर किय्ँ ह्यः, किव्ँ ह्वलयति, किल्ँ ह्लादयति बना। विकल्प पक्ष में मोऽनुस्वारः से अनुस्वार होकर किं ह्यः, किं ह्वलयति, किं ह्लादयति बने।
सूत्रार्थ - नकार है परे जिस हकार के ऐसे हकार के परे रहते मकार के स्थान पर विकल्प से नकार हो।
यहाँ भी तीन शर्तों का ध्यान रखना चाहिए -
1. मकार के स्थान पर विकल्प से नकार होता है, विकल्प पक्ष में अनुस्वार होता है । 2. मकार के बाद का वर्ण हकार हो। 3. इस हकार के बाद पुनः नकार हो। यहाँ वर्णों की स्थिति होगी – म् + ह् + न् ।
किम् + ह्नुते। यहाँ मकार से परे हकार और इस हकार के बाद नकार है अतः किम् के मकार को विकल्प से नकार हो गया किन् ह्नुते बना। नकार विकल्प पक्ष में मोऽनुस्वारः से अनुस्वार होकर किं + ह्नुते बना।
८४डः सि धुट् डात्परस्य सस्य धुड्वा ।
सूत्रार्थ - डकार से परे सकार को धुट् आगम विकल्प से हो।
सूत्रार्थ - टित् तथा कित् आगम क्रमशः स्थानी के आदि तथा अन्त में अवयव स्वरूप हो। टित्आगमआदि में तथा कित्आगमअन्त में होगा।
षट्त् सन्तः, षट् सन्तः।षड् + सन्तः इस स्थिति में षड् के डकार से परे सकार को धुट् का आगम हो गया। धुट् में उकार तथा टकार की इत्संज्ञा होती है अतः यह टित् है। टित् होने के कारण आद्यन्तौ टकितौ सूत्र के अनुसार इसका आगम सकार के आदि में होगा। षड् + ध् + सन्तः बना। खरि च से धकार को चर्त्व होकर तकार तथा डकार को टकार होकर षट् + त् + सन्तः बना। परस्पर वर्ण सम्मेलन होकर षट्त्सन्तः बना। धुट् का आगम विकल्प से होता है। विकल्प पक्ष में षड् + सन्तः के डकार को चर्त्व होकर षट्सन्तः बना।
विशेष-
अध्ययनकर्ताओं को व्याकरण के आगम और आदेश को समझना चाहिए। ये दोनों पारिभाषिक शब्द हैं। शत्रुवदादेशः मित्रवदागमः के अनुसार -
आगम मित्र के समान होता है। आगम जिस वर्ण को लक्षित कर होता है वह आगम उस वर्ण के पास में आकर बैठ जाता है। वह कहाँ बैठे? पहले या बाद में इसके बारे में आपने आद्यन्तौ टिकितौ के निर्देश को जान लिया। उदाहरण - डः सि धुट् तथा ङणोः कुक् टुक् शरिसे होने वाले धुट्, कुक् तथा टुक् आगम हैं।
आदेश शत्रु के समान होता है। यह आदेश दो प्रकार का होता है। एकादेश तथा सामान्य आदेश ।
उदाहरण - एकः पूर्वपरयोः(6.1.84) यह सूत्र एकादेश अधिकार का विधान करता है। यदि पूर्व पर के स्थान में एक ही आदेश होता तो वह एकादेश कहा जाता है। एकादेश अधिकार में अच् सन्धि आता है। आद्गुणः (6.1.87), वृद्धिरेचि (6.1.88), एत्येधत्यूठ्सु (6.1.89) आदि द्वारा किया जाने वाला एकादेश हैं। ।
सामान्य आदेश- इको यणचि (6.1.77), एचोऽयवायावः (6.1.78), अवङ् स्फोटायनस्य (6.1.123) आदि सामान्य आदेश के उदाहरण हैं । यह आदेश अच् तथा हल् दोनों वर्णों के स्थान पर होता है। अच् के स्थान में होने वाले आदेश को अजादेश कहा जाता है तथा हल के स्थान में होने वाले आदेश को हलादेश। इको यणचि आदि अजादेश के तथा समः सुटि (8.3.5) हलादेश के उदाहरण हैं।
८६ङ्णोः कुक्टुक् शरि
वा स्तः ।प्राङ्क् षष्ठः, प्राङ् षष्ठः।
सूत्रार्थ - शर् परे रहते ङकार तथा णकार को क्रमशः कुक् तथा टुक् का आगम हो, विकल्प से।
कुक् और टुक् के ककार की हलन्त्यम् से तथा उकार की उपदेशेऽजनुनासिक इत् से इत् संज्ञा तथा तस्य लोपः स् लोप हो जाता है। क् तथा ट् शेष रहता है।
प्राङ्क् षष्ठः।प्राङ् + षष्ठः में शर् (षष्ठः का आदि षकार) परे रहते प्राङ् के ङकार को ङ्णोः कुक्टुक् शरि से कुक् का आगम हुआ। कुक् के ककार तथा उकार का अनुबन्धलोप हुआ। कुक् कित् है अतः आद्यन्तौ टकितौ से कित् ङकार के अन्त्य में आया। प्राङ् + क्+ षष्ठः हुआ। वर्णसम्मेलन कर प्राङ्क् षष्ठः बना। ङ्णोः कुक्टुक् शरि विकल्प से कित् करता है। विकल्प पक्ष में प्राङ् षष्ठः रूप बना। इसी प्रकार सुगण् + षष्ठः में णकार को टित् का आगम होकर सुगण्ट् षष्ठः तथा विकल्प पक्ष मेंसुगण् षष्ठः बना।
अर्थ- चय् के स्थान पर द्वितीय वर्ण हो शर् परे रहते पौष्करसादि आचार्य के मत में।
प्राङ्ख् षष्ठः। प्राङ् + षष्ठः में शर् (षष्ठः का आदि षकार) परे रहते प्राङ् के ङकार को ङ्णोः कुक्टुक् शरि से कुक् का आगम हुआ। कुक् के ककार तथा उकार का अनुबन्धलोप होने पर प्राङ् + क् +षष्ठः हुआ।चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम् सेशर् (ष) परे रहते चय् (क्) के स्थान पर द्वितीय वर्ण ख् हुआ। प्राङ् + ख् +षष्ठः हुआ। वर्ण सम्मेलन कर प्राङ्ख्षष्ठः बना। चयो द्वितीयाः शरि विकल्प से द्वितीय वर्ण करता है अतः विकल्प पक्ष में प्राङ्क् षष्ठः पूर्ववत् बनेगा। इसी प्रकार सुगण्ठ्षष्ठःसमझना चाहिए।
इस तरह एक शब्द के तीन रूप बनते हैं- प्राङ्ख् षष्ठः (कुक् आगम चय् को द्वितीय वर्ण पक्ष), प्राङ्क्षष्ठः (कुक् आगम चय् को द्वितीय वर्ण का अभाव पक्ष) , प्राङ् षष्ठः (कुक् आगम अभाव पक्ष) । सुगण्ठ् षष्ठः(कुक् आगम चय् को द्वितीय वर्ण पक्ष), सुगण्ट् षष्ठः (कुक् आगम चय् को द्वितीय वर्ण का अभाव पक्ष), सुगण् षष्ठः(कुक् आगम अभाव पक्ष) ।
सूत्रार्थ - नकारान्त पद से परे रहते सकार को धुट् का आगम विकल्प से हो।
सन्त्सः, सन्सः ।सन् + सः यहाँ पर पद है सान् । इस पह के अंत में नकार है अतः यह नान्त पद है। इस नान्त पद से परे सः के सकार को धुट् का आगम विकल्प से हुआ। धुट् टित् है अतः यह सकार के पूर्व होगा। सन् + धुट् + सः हुआ। धुट् में उकार तथा टकार का अनुबन्ध होने पर ध् शेष रहा सन् + ध् + सः हुआ। खरि च से धुट् के धकार को चर्त्व उसी वर्ण का तकार होकर सनत्सः बना। धुट् विकल्प पक्ष में सन्सः बना।
इसी प्रकार नान्त पदों से धुट् का आगम कर और शब्द बनायें। यथा- विद्वान् + सीदति आदि।
सूत्रार्थ - शकार परे रहते पदान्त नकार को तुक् का आगम विकल्प से हो।
सन् + शम्भुःइस स्थिति में आद्यन्तौ टकितौ सूत्र के निर्देशानुसार न् के बाद शि तुक् सूत्र से विकल्प से तुक् आगम हुआ। सन् + तुक् + शम्भुः हुआ। तुक् में उक् का अनुबन्ध लोप हुआ। सन् + त् + शम्भुः हुआ। स्तोः श्चुना श्चुः सूत्र से तकार को श्चुत्व चकार पुनः नकार को ञकार होकर सञ् + च् + शम्भुः हुआ। शश्छोऽटि सूत्र से झय् (चकार) के बाद श को विकल्प से छकार होकर सञ्च्छम्भुः बना। शि तुक् से तुक् के अभाव पक्ष में सञ्छम्भुः बना। शश्छोऽटि से छ के अभाव पक्ष एवं शि तुक् से तुक् आगम के पक्ष में सन् + त् + शम्भुः में श्चुत्व होकर सञ्च्शम्भुः बना। तुक् के अभाव पक्ष में सन् + शम्भुः में केवल श्चुत्व कार्य होकर सञ्शम्भुः रूप बना।
सन् + शम्भुः शि तुक् सूत्र से तुक् आगम विकल्प से
सन् + तुक् + शम्भुःआद्यन्तौ टकितौ सूत्र से न् के बाद
सन् + त् + शम्भुःअनुबन्ध लोप
सञ्च् + शम्भुःस्तोः श्चुना श्चुः सूत्र सेश्चुत्व
सञ्च्छम्भुःशच्छोऽटि सूत्र से श को छ विकल्प से
सञ्छम्भुःतुक् के अभाव पक्ष में-
सञ्च्शम्भुःछ के अभाव पक्ष एवं तुक् आगम के पक्ष में
सूत्रार्थ - ह्रस्व स्वर से परे जो ङम् (ङ् ण् न्) वह ङम् है जिसके अंत में ऐसा पद , उस पद से परे अच् को ङमुट् का आगम नित्य हो।
ङमुट् में टकार तथा उकार की इत्संज्ञा होती है । ङम् शेष बचता है। यह ङम् प्रत्याहार है । इसमें ङ ण तथा न वर्ण आते हैं। ङ् ण् न् को ङ् ण् न् यथासंख्य होते हैं। अतःङुट्, णुट्, नुट् आगम क्रमशः होंगें।
प्रत्यङ् + आत्माइस स्थिति में ङमो ह्रस्वादचि ङमुण् नित्यम् सूत्र से नित्य ङमुट् का आगम होगा यह आगम आद्यन्तौ टकितौ सूत्र से आ के पूर्व होगा । प्रत्यङ् + ङमुट् + आत्मा मेंटकार तथा उकारका अनुबन्ध लोप होकर प्रत्यङ्ङात्मा बना। इसी प्रकार सुगण् + ईशः में णुट् का आगम तथा सन् + अच्युतः में नुट् का आगम होकर क्रमशः सुगण्णीशः तथा सन्नच्युतःरूप बनता है।
प्रयोग-
यावद् देहे चिदान्दः प्रत्यङ्ङात्मा विराजते।
तावदेव जगत्सर्व प्रतिभाति मनोहरम्।।
९० समः सुटि
समो रुः सुटि ।।
सूत्रार्थ - सम् के मकार को रु आदेश हो सुट् परे रहते।
९१ अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा
अत्र रुप्रकरणे रोः पूर्वस्यानुनासिको वा ।।
सूत्रार्थ - इस रु के प्रकरण में रु से पूर्व वर्ण को विकल्प से अनुनासिक हो।