लघुसिद्धान्तकौमुदी (विसर्गसन्धि प्रकरणम्)

                                                        अथ विसर्गसन्‍धिः


१०३ विसर्जनीयस्‍य सः
खरि । विष्‍णुस्‍त्राता ।।

खर् परे रहते विसर्जनीय के स्थान पर सकार आदेश हो।

विष्‍णुस्‍त्राता  विष्णुः + त्राता में विसर्जनीयस्य सः सूत्र से खर् (त्राता के तकार) परे रहने पर विसर्ग को स् हुआ। विष्णुस्त्राता बना।

१०४ वा शरि

शरि विसर्गस्‍य विसर्गो वा । हरिः शेतेहरिश्‍शेते ।।

शर् परे रहते विसर्ग के स्थान पर विकल्प से विसर्ग आदेश हो।

हरिः शेतेहरिश्शेते । हरिः + शेते में वा शरि सूत्र से हरिः के विसर्ग को शर् (शेते का शकार) परे रहते विकल्प से विसर्ग हुआ। हरिः शेते बना। विसर्ग के अभाव पक्ष में विसर्जनीयस्य सः सूत्र से विसर्ग को स् होकर हरिस् + शेते हुआ। स्तोः श्चुना श्चुः से हरिश् के सकार को श्रुत्व शकार होकर हरिश्शेते बना।

काव्य में प्रयोग-

कमले कमला शेते हरश्शेते हिमालये।

क्षीराब्धौ च हरिश्शेते मन्ये मत्कुणशङकया ।।

१०५ ससजुषो रुः

पदान्‍तस्‍य सस्‍य सजुषश्‍च रुः स्‍यात् ।।

पदान्त सकार तथा सजुष् के सकार के स्थान पर रु हो।

१०६ अतो रोरप्‍लुतादप्‍लुतादप्‍लुते

अप्‍लुतादतः परस्‍य रोरुः स्‍यादप्‍लुतेऽति । शिवोऽर्च्यः ।।

अप्लुत अत् से परे रू को उ होअप्लुत अत् परे रहते।

शिवोऽर्च्यः। शिवर् + अर्च्यः में व् का अ अप्लुत अ हैउसके बाद र् है और र् के बाद अर्च्यः का अप्लुत अ हैइसलिए यहाँ र् को उत्व हो गया है।

सिद्धि इस प्रकार है- 

शिव सु अर्च्यः                सुप्तिङन्तं पदम् से शिव सु की पद संज्ञा

शिव स् अर्च्यः                 सु के उकार का अनुबन्ध लोप

शिव रु अर्च्यः                ससजुषो रुः सूत्र से पदान्त स् को रु

शिव र् अर्च्यः                 रु के उकार का अनुबन्ध लोप

शिव उ अर्च्यः                 अतोरोरप्लुतादप्लुते सूत्र से र् को उत्व

शिवो अर्च्यः                   आद्गुणः सूत्र से गुण

शिवोऽर्च्यः                     एङः पदान्तादति सूत्र से पूर्वरूप 

१०७ हशि च

तथा । शिवो वन्‍द्यः ।।

अप्लुत अत् से परे रहते रु को उ आदेश होहश् परे रहते।

शिवो वन्द्यः। शिव सु वन्द्यः में सु का अनुबन्ध लोप शिव + स् + वन्द्यः हुआ। ससजुषो रुः सूत्र से स् को रु आदेश हुआ। शिव् + रु + वन्द्यः हुआ। रु के उकार का अनुबन्ध लोप शिव + र् + वन्द्यः हुआ। यहाँ शिव का अकार अप्लुत अत् है अतः हशि च सूत्र से  हश् (वन्द्यः का वकारपरे रहते र् को उत्व हुआ। शिव + उ + वन्द्यः हुआ। आद्गुणः सूत्र से अ + उ का गुण एकादेश होकर शिवो वन्द्यः बना।  

वेद में प्रयोग-

हिण्ययेन सविता रथेना देवो याति भुवनानि पश्यन्।

१०८ भोभगोअघोअपूर्वस्‍य योऽशि

एतत्‍पूर्वस्‍य रोर्यादेशोऽशि । देवा इहदेवायिह । भोस् भगोस् अघोस् इति सान्‍ता निपाताः । तेषां रोर्यत्‍वे कृते ।।

भोस् भगोस् अघोस् तथा अवर्ण पूर्वक रु को यकार आदेश हो अश् परे रहते।

देवा इह । देवा + स् + इह में ससजुषो रुः से स् को रु आदेशदेवा + रु + इह हुआ। रु के उकार का अनुबन्ध लोप   देवा + र् + इह हुआ। भोभगोअघोअपूर्वस्य योऽशि सूत्र से य् का आदेशदेवा + य् + इह हुआ । लोपः शाकल्यस्य सूत्र से य् का विकल्प से लोप होकर देवा इह बना। विकल्प के अभाव पक्ष में देवा + य् + इह में वर्ण सम्मेलन कर देवायिह बना।

१०९ हलि सर्वेषाम्

भोभगोअघोअपूर्वस्‍य यस्‍य लोपः स्‍याद्धलि । भो देवाः । भगो नमस्‍ते । अघो याहि ।

भोस् भगोस् अघोस् तथा अवर्ण पूर्वक य का लोप हो हल् परे रहते।

अभ्यास-

पुनः रमते. एषः विष्णुः. हरि: चरितम् में सन्धि का प्रयोग करें। 

११० रोऽसुपि

अह्‍नो रेफादेशो न तु सुपि । अहरहः । अहर्गणः ।।

अहन् शब्द के नकार को रेफ आदेश होसुप् परे न रहते।

१११ रो रि

रेफस्‍य रेफे परे लोपः ।।

रेफ परे रहते रेफ का लोप हो।

११२ ढ्रलोपे पूर्वस्‍य दीर्घोऽणः

ढरेफयोर्लोपनिमित्तयोः पूर्वस्‍याणो दीर्घः । पुना रमते । हरी रम्‍यः । शम्‍भू राजते । अणः किम् ? तृढः । वृढः । मनस् रथ इत्‍यत्र रुत्‍वे कृते हशि चेत्‍युत्‍वे रोरीति लोपे च प्राप्‍ते ।।
लोप निमित्तक ढकार तथा रेफ रहते पूर्व अण् वर्ण को दीर्घ होता है। 
११३ विप्रतिषेधे परं कार्यम्
तुल्‍यबलविरोधे परं कार्यं स्‍यात् । इति लोपे प्राप्‍ते । पूर्वत्रासिद्धमिति रोरीत्‍यस्‍यासिद्धत्‍वादुत्‍वमेव । मनोरथः ।।
समान बल वाले सूत्र के एक साथ प्रवृत्त होने पर बाद वाले सूत्र का कार्य हो।
११४ एतत्तदोः सुलोपोऽकोरनञ्समासे हलि
अककारयोरेतत्तदोर्यः सुस्‍तस्‍य लोपो हलि न तु नञ्समासे । एष विष्‍णुः । स शम्‍भुः । अकोः किम् ? एषको रुद्रः । अनञ्समासे किम् ? असः शिवः । हलि किम् ? एषोऽत्र ।।
ककार रहित एतद् तथा तद् शब्द का जो सुउसका लोप होता हैहल् परे रहतेनञ् समास को छोड़कर।
१५ सोऽचि लोपे चेत्‍पादपूरणम्
स इत्‍यस्‍य सोर्लोपः स्‍यादचि पादश्‍चेल्‍लोपे सत्‍येव पूर्येत । सेमामविड्ढ प्रभृतिम् । सैष दाशरथी रामः ।।
सः पद के सु का लोप हो अच् परे रहते यदि लोप करने से पाद की पूर्ति हो रही हो तब।
इति विसर्गसन्‍धिः ।।
इति पञ्चसन्‍धिप्रकरणम् ।
सन्धि के बारे में मुख्य सिद्धान्त – 
Share:

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

लोकप्रिय पोस्ट

ब्लॉग की सामग्री यहाँ खोजें।

लेखानुक्रमणी

जगदानन्द झा. Blogger द्वारा संचालित.

मास्तु प्रतिलिपिः

इस ब्लॉग के बारे में

संस्कृतभाषी ब्लॉग में मुख्यतः मेरा
वैचारिक लेख, कर्मकाण्ड,ज्योतिष, आयुर्वेद, विधि, विद्वानों की जीवनी, 15 हजार संस्कृत पुस्तकों, 4 हजार पाण्डुलिपियों के नाम, उ.प्र. के संस्कृत विद्यालयों, महाविद्यालयों आदि के नाम व पता, संस्कृत गीत
आदि विषयों पर सामग्री उपलब्ध हैं। आप लेवल में जाकर इच्छित विषय का चयन करें। ब्लॉग की सामग्री खोजने के लिए खोज सुविधा का उपयोग करें

संस्कृतसर्जना वर्ष 1 अंक 2

संस्कृतसर्जना वर्ष 1 अंक 3

Sanskritsarjana वर्ष 2 अंक-1

संस्कृतसर्जना वर्ष 1 अंक 1

समर्थक एवं मित्र

सर्वाधिकार सुरक्षित

विषय श्रेणियाँ

ब्लॉग आर्काइव

Recent Posts

लेखाभिज्ञानम्

अंक (1) अभिनवगुप्त (1) अलंकार (3) आचार्य (1) आधुनिक संस्कृत (1) आधुनिक संस्कृत गीत (1) आधुनिक संस्कृत साहित्य (3) आम्बेडकर (1) उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान (1) उत्तराखंड (1) ऋग्वेद (1) ऋतु (1) ऋषिका (1) कणाद (1) करक चतुर्थी (1) करण (2) करवा चौथ (1) कर्मकाण्ड (33) कामशास्त्र (1) कारक (1) काल (3) काव्य (4) काव्यशास्त्र (8) काव्यशास्त्रकार (1) कुमाऊँ (1) कूर (1) कूर्मांचल (1) कृदन्त (3) कोजगरा (1) कोश (2) गंगा (1) गया (1) गाय (1) गीतकार (1) गीति काव्य (1) गुरु (1) गृह कीट (1) गोविन्दराज (1) ग्रह (1) चरण (1) छन्द (4) छात्रवृत्ति (1) जगत् (1) जगदानन्द झा (3) जगन्नाथ (1) जीवनी (3) ज्योतिष (13) तद्धित (10) तिङन्त (11) तिथि (2) तीर्थ (3) दर्शन (8) धन्वन्तरि (1) धर्म (1) धर्मशास्त्र (12) नक्षत्र (3) नाटक (2) नाट्यशास्त्र (2) नायिका (2) नीति (2) पक्ष (1) पतञ्जलि (3) पत्रकारिता (4) पत्रिका (6) पराङ्कुशाचार्य (2) पाण्डुलिपि (2) पालि (3) पुरस्कार (13) पुराण (2) पुरुषार्थोपदेश (1) पुस्तक (2) पुस्तक संदर्शिका (1) पुस्तक सूची (14) पुस्तकालय (5) पूजा (1) प्रत्यभिज्ञा शास्त्र (1) प्रशस्तपाद (1) प्रहसन (1) प्रौद्योगिकी (1) बिल्हण (1) बौद्ध (6) बौद्ध दर्शन (2) ब्रह्मसूत्र (1) भरत (1) भर्तृहरि (2) भामह (1) भाषा (1) भाष्य (1) भोज प्रबन्ध (1) मगध (3) मनु (1) मनोरोग (1) महाविद्यालय (1) महोत्सव (2) मुहूर्त (2) योग (6) योग दिवस (2) रचनाकार (3) रस (1) राजभाषा (1) रामसेतु (1) रामानुजाचार्य (4) रामायण (1) राशि (1) रोजगार (2) रोमशा (1) लघुसिद्धान्तकौमुदी (45) लिपि (1) वर्गीकरण (1) वल्लभ (1) वाल्मीकि (1) विद्यालय (1) विधि (1) विश्वनाथ (1) विश्वविद्यालय (1) वृष्टि (1) वेद (2) वैचारिक निबन्ध (22) वैशेषिक (1) व्याकरण (15) व्यास (2) व्रत (2) व्रत कथा (1) शंकाराचार्य (2) शतक (1) शरद् (1) शैव दर्शन (2) संख्या (1) संचार (1) संस्कार (19) संस्कृत (16) संस्कृत आयोग (1) संस्कृत गीतम्‌ (9) संस्कृत पत्रकारिता (2) संस्कृत प्रचार (1) संस्कृत लेखक (1) संस्कृत वाचन (1) संस्कृत विद्यालय (2) संस्कृत शिक्षा (4) संस्कृतसर्जना (5) सन्धि (3) समास (6) सम्मान (1) सामुद्रिक शास्त्र (1) साहित्य (1) साहित्यदर्पण (1) सुबन्त (7) सुभाषित (3) सूक्त (3) सूक्ति (1) सूचना (1) सोलर सिस्टम (1) सोशल मीडिया (2) स्तुति (2) स्तोत्र (11) स्त्रीप्रत्यय (1) स्मृति (11) स्वामि रङ्गरामानुजाचार्य (2) हास्य (1) हास्य काव्य (1) हुलासगंज (2) Devnagari script (2) Dharma (1) epic (1) jagdanand jha (1) JRF in Sanskrit (Code- 25) (3) Kahani (1) Library (1) magazine (1) Mahabharata (1) Manuscriptology (2) Pustak Sangdarshika (1) Sanskrit (2) Sanskrit language (1) sanskrit saptaha (1) sanskritsarjana (3) sex (1) Student Contest (1) UGC NET/ JRF (4)