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गदाधर त्रिपाठी कृत वाग्विलास काव्य की समीक्षा

 
नई शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत विभिन्न विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में आधुनिक संस्कृत साहित्य को रखा गया है। बुंदेलखंड विश्वविद्यालय, झांसी के एम. ए. संस्कृत साहित्य, चतुर्थ सेमेस्टर में डॉ. गदाधर त्रिपाठी की पुस्तक "वाग्विलास" का 1 से 25 श्लोक पाठ्यक्रम में है। मुझे इस विश्वविद्यालय के पाठ्यचर्या को देखकर महान आश्चर्य हुआ कि पाठ्यचर्या के संयोजक ने बिना पुस्तक देखे ही पुस्तक के 1 से 25 श्लोक को पाठ्यक्रम में रखा दिया। तथ्य यह है कि वाग्विलास के किसी भी  विलास में 1 से 25 श्लोक नहीं मिलते हैं। इस संबंध में मैंने पुस्तक के लेखक डॉ. त्रिपाठी से भी बात किया। उन्होंने इस संबंध में अभिज्ञता प्रकट की है। मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि यहां का पाठ्यक्रम बनाते समय पुस्तक के लेखक गदाधर त्रिपाठी अथवा मूल पुस्तक को क्यों नहीं देखा गया?

यह पाठ्यक्रम बनाने वाले की त्रुटि है । आशा है विश्वविद्यालय इस त्रुटि को सुधार करेगा।



अग्निः

सृष्टेरादिशब्दस्त्वग्निरेव हि स्वीकृतः।

तेनैव ऋग्वेदे चाग्निमीडे पुरोहितम् ।।1।।

अग्निरेव च ऊर्जाया आदिस्रोतश्च स्वीकृतः ।

व्याप्तोऽयं सर्वक्षेत्रेषु प्रकाशकोऽपि च सर्वदा।।2।।

अर्थ- अग्नि ही ऊर्जा का मूल स्रोत माना जाता है। वह सभी क्षेत्रों में व्याप्त है और सदैव वस्तु को प्रकाश में लाता है।

टिप्पणी- लेखक ने प्रस्तुत श्लोक में अग्नि को ऊर्जा का मूल स्रोत कहा है। वस्तुतः अग्नि को ही ऊर्जा कहा जाता है। पार्थिव तत्व, जल से जिस तरह ऊर्जा उत्पन्न किया जाता है, वैसे अग्नि से ऊर्जा उत्पन्न नहीं होता। अग्नि से ऊर्जा को उत्पन्न नहीं किया जा सकता। पञ्च महाभूतों (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश) में अग्नि (तेज) एक महाभूत है। वैशेषिक दर्शन के अनुसार ऊर्जा का दो रूप है। 1. नित्य 2. अनित्य । नित्य ऊर्जा परमाणु रूप है। विषय रूप में स्थित  अनित्य ऊर्जा (अग्नि) के 4 भेद अथवा स्रोत हैं। भौम, दिव्य, उदर्य तथा आकरज । भौम अर्थात् भूमि तत्व से उत्पन्न अग्नि। भौम को ही भौतिक विज्ञान में जीवाश्म इंधन कहा जाता है। वायोमास भी भौम इंधन है। जलीय इंधन को दिव्य कहा है। दिव आकाश का नाम है। वैशेषिक दर्शन में बादलों के टकराने से उत्पन्न ऊर्जा को दिव्य तेज कहा गया। जल विद्युत भी दिव्य तेज के अन्तर्गत आता है। भोजन को पचाने वाली आग उदर्य है। स्वर्ण आदि धातुओं में विद्यमान चमक आकरज है। लकड़ी, कोयला, पेट्रोल की तरह स्वर्ण को जलाने या तपाने पर यह नष्ट नहीं होता।  भौतिक विज्ञान में ऊर्जा के स्रोत में रसायनिक, चुम्बकीय, जीवाश्म इंधन, तापीय विद्युत, जल विद्युत, पवन, सूर्य, ज्वार भाटा, नाभकीय, भूतापीय आदि ऊर्जा है।

इस तरह हमने जाना कि ऊर्जा का स्रोत जीवाश्म, सूर्य, जल, परमाणु आदि है । जिस स्रोत का उपभोग कर ऊर्जा उत्पन्न होती है, उस स्रोत का पुनः उपभोग नहीं किया जा सकता अतः अग्नि ऊर्जा का स्रोत नहीं है। इस तरह लेखक द्वारा स्थापित सिद्धान्त पोषणीय नहीं है।

सृष्टौ पञ्चभूता येऽग्निस्तेष्वपि समन्वितः।

अग्निना पच्यते सर्वं सृष्टिश्चलति सर्वदा।।3।।

अर्थ- सृष्टि में जो पांच तत्व हैं, उनमें अग्नि भी जुड़ी हुई है। आग से हर चीज़ पकती है और सृष्टि हमेशा गतिशील रहती है।

सर्वेभ्यश्च देवेभ्यः कार्यमेकं सुनिश्चितम्

अग्निदेवस्त्वेको हि प्रकाशकः पाचकस्तथा ।।4 ।।

अर्थ- और सभी देवताओं के लिए एक कार्य निश्चित है। एकमात्र अग्नि देवता हैं जो प्रकाश देते हैं और भोजन पकाते हैं।

बडवानलो हि व्याप्तोऽस्ति सागरे नु वै चोर्मिषु।

जठरानलश्च य उदरे पाचकः स्वास्थ्यवर्धकः ।।5।।

यज्ञाद्भवन्ति पर्जन्यः पर्जन्यादन्न सम्भवः।

अग्निं विना न यज्ञस्य हि कल्पना भवति कदाचन ।।6 ।।

हुतं प्राप्नुवन्ति देवा वै अग्निर्वहति सर्वदा।

सुरक्षितमस्ति देवानां देवत्वं सर्वथा हि वै।।7।।

प्रकाशकैश्च किरणैश्चोर्ध्वं गच्छति सर्वथा।

तेजस्विनाञ्च गमनं ह्योर्ध्वं भवति निश्चितम् ।।8।।

शास्त्रेषु त्रिविधोऽग्निर्वर्णितः विद्वद्भिस्तदा ।

गृहेषु स्थापनीयो हि कल्याणप्राप्तये सदा।। 9 ।।

स्वाहाग्नेः पत्नी खलु भारतनाम्ना प्रतिष्ठितः ।

त्रयो पुत्रा अभवन् वै प्रचलिताग्नेः परम्परा ।।10।।

यज्ञाद्भवन्ति पर्जन्यः पर्जन्यादन्न सम्भवः।

अग्निं विना न यज्ञस्य हि कल्पना भवति कदाचन ।।11।।
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कवि बिल्हण और उनका विक्रमाङ्कदेवचरितम्

संस्कृत साहित्य में कवि बिल्हण ही एक ऐसे कवि हैं, जिनका जीवनचरित और काल प्रकाशित है। बिल्हण संस्कृत साहित्य के उन चुने हुए महाकवियों में हैं, जिन्होंने अपने समकालीन वातावरण और देशकाल का प्रामाणिक विवरण प्रस्तुत करके अपने जीवन की घटनाओं और अपनी वंश-परम्परा का भी विवरण प्रस्तुत किया है।

विक्रमाङ्कदेवचरितम् महाकाव्य के १८ वें सर्ग में कवि (७० से १०४ श्लोक तक) ने अपना जीवन चरित लिखा है। श्रीनगर (प्रवरपुर) से ढाई कोस पर खोनमुष (आजकल खुन् मोह) गाँव में इनका जन्म हुआ। इनके पिता का नाम ज्येष्ठकलश तथा माता का नाम नागादेवी था। इनके पिता व्याकरण के प्रकाण्ड पण्डित थे। इनके बड़े भाई का नाम इष्टराम और छोटे भाई का नाम आनन्द था। काश्मीर में रह कर इन्होंने वेदों और शास्त्रों का यथावत् अध्ययन किया। ईस्वीय सन् १०६२ से १०६५ के बीच में ये काश्मीर से बाहर यात्रा के लिए निकल पड़े ।

यमुना के किनारे-किनारे ये पहले मथुरा गए और वहां के पण्डितों को शास्त्रार्थ में हरा कर वृन्दावन में कुछ दिन बिताए। वहां से कन्नौज और प्रयाग होते हुए ये काशी आए। काशी में उस समय डालदेश के अधिपति हैहयवंशीय महाराज कर्ण की छोटी राजधानी थी। यहां पर कविराज का परिचय राजा से हुआ और यहीं पर इन्होंने प्रसिद्ध कवि गङ्गाधर को शास्त्रार्थ में हराया। यहां से वे अयोध्या गए । सम्भवतः अयोध्या में रह कर इन्होंने भगवान् राम की स्तुति में किसी काव्य की रचना भी की, जो उपलब्ध नहीं है।

कर्णराज के बाद बिल्हण भोजराज की राजधानी धारा भी गए। परन्तु इनके वहां जाने के पहले ही १०५५ ई० में भोजराज परलोक सिधार गए थे। वहां से कवि ने गुर्जरदेश की यात्रा की। परन्तु वहां पर उनका मन नहीं लगा और वे सोमनाथ का दर्शन करते हुए दक्षिण भारत का भ्रमण करने के लिए निकल पड़े।

रामेश्वरम् तक जाकर वे पुनः कल्याण नगर लौट आए और अपना शेष जीवन चालुक्य राजा विक्रमादित्य के दरबार में बिताया। इसी दरबार में इन्हें विद्यापति की पदवी प्रदान की गई। डा० बुहलर के अनुसार इन्होंने अपनी वृद्धावस्था में १०८५ ई० के आसपास विक्रमाङ्कदेवचरित महाकाव्य की रचना की होगी। इन्होंने कर्णसुन्दरी नाटक और चौरपञ्चाशिका नामक दो अन्य ग्रन्थों की भी रचना की है।

ये स्वभाव से अभिमानी मालूम पड़ते हैं। इनको काश्मीर के ऊपर इतना गर्व है कि इनके अनुसार काश्मीर के बाहर कविता होती ही नहीं। इनका अभिमानी स्वभाव विक्रम के दरबार में भी छिपा न रह सका। महाराज विक्रम से इनका अनबन हो गया। इसीलिए कुछ लोग यह कहते हैं कि विक्रमाङ्देवचरित काव्य में महाराज विक्रम के सम्पूर्ण जीवन का वर्णन नहीं लिखा गया। लेकिन यह मत राजतरंगिणी की उस युक्ति से विरूद्ध है, जिसके अनुसार हर्ष की आश्रयदानिता को सुनकर भी विद्यापति बिल्हण अत्यन्त सन्तुष्ट होने के कारण उसके पास नहीं गए। अतः अनुमान यह निकलता है कि विक्रम के साथ मनमुटाव हो जाने पर राजा ने इन्हें मना लिया होगा।

महाराज विक्रम

चालुक्य वंश की चार प्रसिद्ध शाखाएं हो चुकी हैं। महाराज विक्रम का सम्बन्ध कल्याण नगर की शाखा से है। इसी शाखा में ९७३ ई० में तैलप नामक बलशाली राजा हुए। उसके बाद सत्याश्रय और जयसिंह ने १०४२ ई० तक राज्य किया। जयसिंह के स्वर्गगत हो जाने पर उसके पुत्र आहवमल्लदेव ने १०४२ ई० से १०६८ ई० तक राज्य किया। इसने चोल, मालवा और डाहल देशों की विजय की और कल्याण नगरी को अपनी राजधानी बनाया ।

आहवमल्लदेव के तीन पुत्र हुए। ज्येष्ठ पुत्र का नाम सोमेश्वर और कनिष्ठ का नाम जयसिंह था। इन्हीं के द्वितीय पुत्र विक्रमदेव हुए। अपने पिता के जीवन काल में ही विक्रम ने कई लड़ाइयां लड़ीं और वीरता की धाक जमा दी। चोल के राजाधिराज प्रथम के १०४६ ई० के शिलालेख से मालूम होता है कि विक्रम ने युद्ध में अपने पिता का हाथ बटाया था। इसका यह अर्थ हुआ कि १०४६ ई० के पूर्व हुए युद्ध में विक्रम युवा हो चला था अतः उस समय उसकी बीस वर्ष की भी अवस्था यदि मान ली जाय तो विक्रम का जन्म १०२६ के आसपास सिद्ध होता है।

विक्रम के पिता ने इनकी वीरता और योग्यता से प्रभावित हो कर इन्हीं को युवराज बनाना चाहा परन्तु इन्होंने अपने बड़े भाई के रहते युवराज बनना स्वीकार नहीं किया। इसलिए सोमेश्वर हो युवराज हुए। परन्तु वस्तुतः राज्य का सारा काम काज विकम ही देखा करते थे। अपने पिता के जीवन काल में ही इन्होंने चोल देश की राजधानी काञ्ची को जोता, मालवा की विजय की और कामरूप तथा बंगाल तक धावा बोला। केरल देश पर भी इन्होंने अपनों विजय पताका फहराई । जब ये चोल देश के गाङ्गकुण्ड और चक्रकोट नगर की विजय करके लौट रहे थे तब रास्ते में इनके पिता की मृत्यु का समाचार मिला। ये बिचारे दुखित होकर अपनी राजधानी गए। वहां पर अपने बड़े भाई सोमेश्वर के साथ कुछ दिन व्यतीत किए । परन्तु स्वभाव से सोमेश्वर उग्र और दुर्विनीत निकल गया जिससे सर्वदा उसका याद करने वाले विक्रम की भी नहीं पट सकी और वह अपने छोटे भाई तथा अन्य साथियों को लेकर कल्याण से चल पड़ा। इसके भाई ने इसके पीछे सेना भेजी परन्तु इसने भाई की सेना का विध्वंस कर डाला। इसने तुङ्गभद्रा नदी के किनारे डेरा डाला और यहां से ही अन्य राजाओं की विजय प्रारम्भ की और उनसे कर लेने लगा। चोल के राजा ने विक्रम से सन्धि करली और अपनी कन्या का विवाह विक्रम से कर दिया। विवाह के बाद इसके श्वशुर को मृत्यु हो गई और उसकी राजधानी काञ्ची में विप्लव हो गया। विक्रम ने सारे उपद्रव को दबा कर अपने साले को राजा बनाया । परन्तु उसका साला राज्य पर बैठते ही मर गया और काथो में दवा विद्रोह पुनः भड़क उठा । राजिग नामक बेंगिदेश के राजा ने चोलराज्य पर अधिकार कर लिया। इस समाचार को सुन कर विक्रम ने राजिग पर चढ़ाई के लिए प्रस्थान किया। इसी समय भाई से बदला लेने का अच्छा अवसर समझ कर सोमेश्वर ने विक्रम पर पीछे से आक्रमण कर दिया। भाई के साथ युद्ध करने को वह बुरा मानता था और दूत भेज कर उसने उसे समझाया भी, परन्तु कुछ फल न निकला। अन्त में इसे युद्ध करना ही पड़ा। विजय विक्रम को हुई। राजिग तो भाग कर लुप्त हो गया परन्तु सोमेश्वर पकड़ लिया गया और बन्दी बना लिया गया। अब विक्रम ही कल्याण नगरी में शासन करने लगा। विक्रम ने अपने भाई से २५ दिसम्बर १०७५ से ३० जून १०७६ के बीच में राज्य जीता। कुछ लोगों के अनुसार विक्रम ने कराड़ देश की राजकुमारी चन्द्रलेखा को स्वयंवर में जीता और उसे अपनी पटरानी बनाया। अन्य लोगों के मत से उसने स्वयंवर न करके विवाह किया था और यह विवाह वस्तुतः विक्रम के राज्यारोहण के पहले ही सम्पन्न हो चुका था।

राज्यारोहण के कुछ समय बाद विक्रम के छोटे भाई जयसिंह ने जो वनवास मण्डल का शासन करता था, लम्बी सेना इकट्ठी करके विक्रम पर चढ़ाई कर दो। विक्रम ने उसे समझाया बुझाया परन्तु फल न निकला। अन्त में युद्ध हुआ और जयसिंह पकड़ कर राजा के सामने लाया गया। विक्रम ने उसे कड़ी डांट फटकार सुनाई। इसके शासन काल में चोल लोगों ने एक बार पुनः अपना सिर उठाया परन्तु अबकी बार विक्रम ने चोल का अच्छी प्रकार दमन कर दिया और उनकी राजधानी काञ्ची को अपने कब्जे में कर लिया। इसने ११२७ ई० तक राज्य किया। इसके दो पुत्र (जयकर्ण, सोमेश्वर) और एक कन्या (मैललमहादेवी) हुई ।

विक्रम वस्तुतः प्रतापी राजा था। उसने विशाल साम्राज्य की स्थापना की जो दक्षिण में तुङ्गभद्रा नदी से लेकर उत्तर में नर्मदा तक फैला था। उसने लोक कल्याण के लिए अनेक सराह‌नीय कार्य किए। कवियों और विद्वानों का वह बड़ा भारी आश्रयदाता था क्योंकि काश्मीर जैसे दूर देश से आ कर बिल्हण उसके दरबार में आदर पा रहे थे। इसने शक संवत् के स्थान पर सन् १०७७ में चालुक्य संवत् की स्थापना की परन्तु वह सम्वत् अधिक दिनों तक चल न सका ।

विक्रमाङ्कदेवचरितम् महाकाव्यम्

महाकवि बिल्हण ने अपने आश्रयदाता विक्रम के यश का वर्णन करने के लिए विक्रमाङ्कदेवचरित नामक महाकाव्य की रचना की। संस्कृत साहित्य में चरित काव्यों की भी एक सुन्दर परम्परा रही है। आदिकवि वाल्मीकि ने सर्वप्रथम रामायण में रामचरित्र का पावन वर्णन किया। महाकवि कालिदास ने भी 'रघुवंश' के राजाओं का चरित्र वर्णन अपने काव्य में किया। सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो कथा के भेद से चरित काव्यों के दो विभाग हो सकते हैं। पहले प्रकार के चरित काव्यों में नायक पौराणिक कथाओं से लिया जाता है और पुराण की परम्परा में आए हुए उसके कार्यों का कवि अपने काव्य में गुम्फन करता है। दूसरे प्रकार की परम्परा में वे चरित काव्य आते हैं जिनका चरितनायक पुराण प्रसिद्ध पुरुष या वंश न होकर कविकालिक या उससे पूर्व का इतिहास प्रसिद्ध पुरुष या वंश होता है। विक्रमाङ्कदेवचरित महाकाव्य दूसरे प्रकार के काव्यों का प्रतिनिधित्व करता है।

यह काव्य सरस वैदर्भी रीति में लिखा गया है। कवि ने अपने काव्य में स्वयं वैदर्भी रीति की प्रशंसा की है (१.९०) । वैदर्भी रीति सरस कोमल कान्त पदावली के लिए प्रसिद्ध है। इस रीति के काव्य दुरूह न होकर सरल किन्तु रस सिद्ध और ध्वनि मर्म से भरे होते हैं। छोटे पदों में बड़े भाव भरे जाते हैं। महाकवि बिल्हण ने इस तत्त्व को अपने काव्य में बड़ी कुशलता के साथ सजाया है। अनुप्रास की छटा और सरस सरल श्लेष की माधुरी से काव्य भरा है। अन्य अलङ्कार भी उचित मात्रा में उचित स्थान पर जड़े गए हैं।

कवि दूर की सूझ वाला है। इसके वर्णन मनोहारी होते हैं। ऋतुवर्णन में तो यह अपनी सानी नहीं रखता। एक उदाहरण देखिये-

कृतक्षणं क्षुद्रनदीसमागमे तरङ्गिणीनाथमवेक्ष्य संप्रति ।

विलङ्घ्य मार्गं सहसा महापगाः पतन्ति नीचेषु नदान्तरेष्वपि ।। (१३.४१.)

 

वर्षा का समय है। छोटी-छोटी नदियां भी उमड़ कर उतावली हो समुद्र से मिलने के लिए दौड़ पड़ी हैं। समुद्र भी उन क्षुद्र नदियों के साथ क्रीडा करता हुआ आनन्द ले रहा हैं। महानदियां समुद्र के इस व्यवहार को न सह सकीं और उसकी प्रतिस्पर्धा करती हुए वे भी नीच नद में जाकर मिल रहीं हैं। समुद्र जब नीच नदियों के साथ आनन्द करने में न सकुचाता हुआ मर्यादाहीन हो रहा है तो फिर नदियां क्यों न अपनी मर्यादा छोड़ कर नीच नदों के साथ क्रीड़ा करें? वर्षा में नदियों की अमर्यादिता का इससे सुन्दर आलंकारिक वर्णन क्या हो सकता है।

कवि ने अपना महाकाव्य बिलकुल शास्त्रीयपरम्परा में लिखा है। दण्डी आदि आचार्यों ने महाकाव्य के जो लक्षण बतलाए है, यह महाकाव्य उन सभी गुणों को ग्रहण करता है। इसी लिए इस महाकाव्य का इतिहासत्व दब गया है और काव्यपक्ष ही प्रधान रह सका है। अपने नायक को मानवसुलभ कमजोरियों और दुर्गुणों से दूर करके कवि ने उदात्त गुणों को भूमि पर ला बिठाया है।

यही कारण है कि बहुत कुछ काल्पनिक बातें कवि को लानी पड़ी हैं। अपने बड़े भाई के साथ राज्य की लालसा से युद्ध करने में कवि ने भगवान शंकर के आदेश को कारण बताया। इसी प्रकार इतिहास सिद्ध बात यह है कि विक्रम अपने बड़े भाई सोमेश्वर के राज्य पा लेने पर भीतर भीतर राज्य को उलट देने का कुचक करने लगा था और यह बात खुल जाने पर उसके भाई ने उसे राज्य से निकाल दिया था। कवि ने इस तथ्य को छिपा कर विक्रम का स्वतः ही राज्य छोड़ कर चला जाना लिखा है। इसी तरह स्थान स्थान पर कवि ने विक्रम के द्वारा चोलों पर विजय दिखलाई है परन्तु चोल लोग सर्वदा काञ्ची पर शासन करते ही रहे। काञ्ची कभी भी विक्रम के वश में पूर्णतः नहीं आई। राजिग ने जब विक्रम के साले को मार कर चोलसिंहासन पर अपना अधिकार जमा लिया तब विक्रम ने उससे युद्ध किया और कवि कहता है कि राजिग न जाने कहां भाग गया। वस्तुतः इतिहास से तो यह सिद्ध होता है कि राजिग और कोई नहीं बल्कि इतिहास प्रसिद्ध राजेन्द्र चोल ही था और युद्ध में वह भागा नहीं अपितु सर्वदा काञ्ची पर राज्य करता रहा। इसी प्रकार अन्य कई स्थल ऐसे मिलते हैं जो इतिहास के विरोध में रखे जा सकते हैं। परन्तु कवि इतिहास को ही प्रधान न मान कर अपनी कल्पना की उड़ान भरता हुआ नैसगिक काव्य प्रस्तुत कर रहा या न कि इतिहास । काव्य में इतिहास आ जाय तो यह शोभा देता है लेकिन कवि कभी भी इतिहास में काव्य नहीं ढूंढ़ता ।

इस काव्य की एक विशेषता और ध्यान देने योग्य है। यह काव्य एक बड़ी भूमिका के साथ प्रारम्भ होता है। इस भूमिका में पहले तो काव्यमय भाषा में देवताओं और देवियों की स्तुति की गई है। बाद में कवि कर्म की प्रशंसा, खलों और दुष्टों की निन्दा तथा काव्यचोरों का उपहास किया गया है। काव्य की शैली का निर्देश, अपनी विद्वत्ता तथा अपने मुंह अपनी कृति की बड़ाई भी मिलती है। अन्य काव्यों में इस प्रकार की भूमिका का प्रायः अभाव ही है। यह कवि की अपनी विशेषता है।

साहित्यपाथोनिधिमन्थनोत्थं

कर्णामृतं रक्षत हे कवीन्द्राः ! ।

यदस्य दैत्या इव लुण्ठनाय

काव्यार्थचौराः प्रगुणीभवन्ति ॥ ११ ॥

हे कवीन्द्रजन ! साहित्यरूपी समुद्र के मन्थन से निकले हुए कानों को अमृत लगने वाले काव्य की आप लोग रक्षा करें। क्योंकि दैत्यों के समान इस अमृत को चुराने के लिए भी शब्द और अर्थ के चोर आजकल बहुत बलवान् हो रहे हैं ।॥ ११ ॥

गृह्णन्तु सर्वे यदि वा यथेष्टं

नास्ति क्षतिः कापि कवीश्वराणाम् ।

रत्नेषु लुप्तेषु बहुष्वमत्यै-

रद्यापि रत्नाकर एव सिन्धुः ॥ १२ ॥

अथवा अपनी इच्छा भर सभी लोग काव्यामृत का ग्रहण करें । इसमें कवीन्द्रों की कोई क्षति नहीं है, क्योंकि देवताओं ने अनेक रत्न समुद्र से निकाल लिए फिर भी समुद्र तो रत्नाकर ही कहा जाता है ॥ १२ ॥

सहस्रशः सन्तु विशारदानां

वैदर्भलीलानिधयः प्रबन्धाः ।

तथापि वैचित्र्यरहस्यलुब्धाः

श्रद्धां विधास्यन्ति सचेतसोऽत्र ।।१३।।

विद्वानों द्वारा विरचित वैदर्भीरीति से गुम्फित काव्य हजारों हों फिर भी जो सहृदय- जन वैचित्र्य के रहस्य से मुग्ध हो जाते हैं वे तो इस काव्य में श्रद्धा रखेंगे ही ॥ १३ ॥ 

इस महाकाव्य के प्रथम सर्ग में उपजाति छन्द का प्रयोग किया गया है। जिस छन्द के पूर्वार्ध में उपेन्द्रवज्रा छन्द तथा उत्तरार्द्ध में इन्द्रवज्रा छन्द हो उसे उपजाति छन्द कहा जाता है ।

उपेन्द्रवज्रा का लक्षण- 'उपेन्द्रवज्रा जतजास्ततो गौ'

इन्द्रवज्रा का लक्षण- 'स्यादिन्द्रवज्रा यदि तौ ज गौ गः'

उपजाति का लक्षण- 'अनन्तरोदीरितलक्ष्मभाजौ पादौ यदीयावुपजातयस्ताः ।'

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हास्यकणिका

 स्वयं सुरेशः श्वशुरो नगेशः सखा धनेशस्तनयो गणेशः ।

तथापि भिक्षाटनमेव शम्भोर्वलीयसी केवलमीश्वरेच्छा ।। १ ।।

 

दोषाकरः शिरसि भाति गले द्विजिह्वः

पाषाणजा सहचरी पशुरन्तरङ्गः ।

दुःखं निवेदयति को भवदन्तिकं मे

त्वं च त्रिलोचन ! निमीलित-लोचनोऽसि ॥ २ ॥

 

काली कान्ता विषमनयना सर्वदा युद्धशीला

पुत्रोप्येकः करिवरमुखः षण्मुखश्च द्वितीयः ।

भृत्यः श्रेष्ठः कपिवरमुखो वाहनं वृद्ध उक्षाः

स्मारं स्मारं स्वगृहचरितं मृन्मयो विश्वनाथः ॥ ३ ॥

 

एका भार्या प्रकृतिरचला चञ्चला च द्वितीया

एक: पुत्रो त्रिभुवनजयी मन्मथो दुर्निरीक्ष्य: ।

शेषश्शय्या जलधिशयनं वाहनं पन्नागारि:

स्मारं स्मारं स्वगृहचरितं दारुभूतो मुरारि: ॥ ४ ॥

 

सहस्रास्यो नागः स्वयमपि भवान् पञ्चवदनः

षडास्यो हन्तैकस्तनय इतरो वारणमुखः ।

चिरं भिक्षावृत्तिर्भवति च कथं वर्तन मिति

ब्रुवत्या पार्वत्या समभवदुमेशो विवसनः ॥ ५ ॥

 

किं गोत्रं किमु जीवनं किमु धनं का जन्म-भूः किं वयः

का विद्या किमु सद्म के सहचराः के वंशजाः प्राक्तनाः ।

का माता च पिता तवेति गुरुणा पृष्टो विवाहे शिवो

मालिन्येन हृदः स्वकीयभवनं त्यक्त्वा श्मशाने स्थितः ॥ ६ ॥

 

लक्ष्मि ! क्षमस्व वचनीयमिदं मयोक्तमन्धीभवन्ति पुरुषास्त्वदुपासनेन ।

नो चेत् कथं कमलपत्रविशालनेत्रो नारायणः स्वपिति पन्नगभोगतल्पे ॥ ७ ॥

 

मूर्खाय द्रविणं ददासि कमले ! विद्वत्सु किं मत्सरो

नाऽहं मत्सरिणी बुधेषु न च मे मूर्खे रतिर्विद्यते ।

मूर्खेभ्यो द्रविणं ददामि यदहो तत्कारणं श्रूयतां

विद्वान् सर्वगुणैर्विभूषिततनुर्मूखस्य नान्या गतिः ॥ ८ ॥

 

पीतोऽगस्त्येन तातश्चरणतलहतो वल्लभोऽन्येन रोषा

दाबाल्याद् विप्रवर्गैः स्ववदनविवरे धारिता मे सपत्नी ।

गेहं मे च्छेदयन्ति प्रतिदिवसमुमाकान्तपूजानिमित्तं

तस्मात् खिन्ना सदाऽहं द्विजगणसदनं नाथ ! नित्यं त्यजामि ॥ ९ ॥

 

असारे खलु संसारे सारं श्रशुरमन्दिरम् ।

हरो हिमालये शेते हरिः शेते महोदधौ ॥ १० ॥

 

कमले कमला शेते हरः शते हिमालये ।

क्षीराब्धौ च हरिः शेते मन्ये मत्कुणशङ्कया ॥ ११ ॥

 

उत्फुल्लेन्दीवराक्षी शशधरवदना विभ्रती शुभ्रकान्तिं,

गत्वाऽसौ राजधानीं दशरथमवदत् कैकयी कोपयुक्ता ।

राजा रामाभिषेकाद् विरमतु सहसा निष्कलङ्के कुलेऽस्मिन्,

भूपुत्री यस्य पत्नी स भवति कथं भूपती रामचन्द्रः ॥ १२ ॥

 

को न याति वशं लोके मुखे पिण्डेन पूरित:

मृदङ्गो मुखलेपेन करोति मधुरध्वनिम् ॥ १३ ॥

 

चतुर: सखि ते भर्ता यल्लिखति तत् परो न वाचयति ।

तस्मादप्यधिको मे स्वयमपि लिखितं न वाचयति ॥ १४ ॥

 

परान्नं प्राप्य दुर्बुद्धे ! मा प्राणेषु दयां कृथाः ।

दुर्लभानि परान्नानि प्राणा जन्मनि जन्मनि ।। १ ।।

 

या पाणिग्रहलालिता सु-सरला तन्वी सुवंशोद्भवा

गौरी स्पर्शसुखावहा गुणवतो नित्यं मनोहारिणी ।

सा केनाऽपि हृता तथा विरहितो गन्तुं न शक्नोम्यहं

रे भिक्षो, तव कामिनी ? नहि नहि प्राणप्रिया यष्टिका।। १६ ।।

 

हे दारिद्र्य ! नमस्तुभ्यं सिद्धोऽस्मि त्वदनुग्रहात् ।

पश्याम्यहं जगत् सर्वं न मां पश्यति कश्चन ॥ १७ ॥

 

शक्तिं करोति सञ्चारे शीतोष्णे मर्षयत्यपि ।

दीपयत्युदरे वह्निं दारिद्रयं परमौषधम् ।। १८ ।

 

वैद्यराज नमस्तुभ्यं यमराजसहोदर ।

यमस्तु हरते प्राणान् वैद्यः प्राणान् धनानि च ।। १९ ।।

 

चितां प्रज्ज्वलितां दृष्ट्वा वैद्यो विस्मयमागतः ।

नाऽहं गतो न मे भ्राता कस्येदं हस्तलाघवम् ॥ २० ॥

 

वैद्यानां शारदी माता पिता च कुसुमाकरः ।

यमदंष्ट्रा स्वसा प्रोक्ता हितभुग् मितभुग् रिपुः ॥ २१ ॥

 

उपाध्यायश्च वैद्यश्च ऋतुकाले वराङ्गना ।

सूतिका दूतिका चैव कार्यान्ते तृणवन्मता ॥ २२ ॥

 

सदा वक्रः सदा क्रूरः सदा पूजामपेक्षते ।

कन्याराशिस्थितो नित्यं जामाता दशमो ग्रहः ॥ २३ ॥

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