भू धातु की रूप सिद्धि


भू सत्तायाम्।  भू धातु का अर्थ होता है सत्ता = स्थिति। भूवादयो धातवः से भू की धातु संज्ञा हुई। स्थिति में कर्म नहीं होने के कारण यह अकर्मक धातु है।
अकर्मक धातु से लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः सूत्र से लकार का विधान हुआ।
वर्तमाने लट् से वर्तमान अर्थ में भू धातु के लट् लकार हुआ भू + लट् यह रूप बना।
लट् में  ट् की हलन्त्यम् सूत्र से इत् संज्ञा और उपदेशेऽजनुनासिक इत् से अकार की इत् संज्ञा हुई। तस्य लोपः से इत्संज्ञक अ एवं ट् का लोप हो गया।  भू + ल् यह रूप बना।
तिप्‍तस्‍झिसिप्‍थस्‍थमिब्‍वस्‍मस्‍ताताञ्झथासाथाम्‍ध्‍वमिड्वहिमहिङ्   सूत्र से ल् के स्थान पर तिप् आदि 18 विभक्तियां प्राप्त हुई। ल् के स्थान पर परस्मैपदी धातु से तिप् होने के कारण लः परस्‍मैपदम् से तिप् की परस्‍मैपद संज्ञा हुई।
इसके बाद तिङस्‍त्रीणि त्रीणि प्रथममध्‍यमोत्तमाः सूत्र से तिप् तस् झि आदि तीन तीन के समुदाय को प्रथम, मध्यम और उत्तम पुरुष संज्ञा हुई।
तान्‍येकवचनद्विवचनबहुवचनान्‍येकशः सूत्र से तिप् तस् झि आदि को क्रम से एकवचन,द्विवचन तथा बहुवचन संज्ञा हुई।
मध्यम पुरुष तथा उत्तम पुरुष की विवक्षा नहीं होने के कारण शेषे प्रथमः से प्रथम पुरुष का विधान किया जाता है।
इस प्रकार एक संख्या विवक्षा होने पर  द्वयेकयोर्द्विवचनैकवचने सूत्र से एकवचन में तिप् आया। भू + तिप् रूप बना।
हलन्त्यम् से प् की इत् संज्ञा तथा तस्य लोपः से इत्संज्ञक अ का लोप हो गया।  भू + ति रूप बना।
तिङ्शित्‍सार्वधातुकम् से ति की  सार्वधातुक संज्ञा हुई।
कर्तरि शप्  से शप् प्रत्यय हुआ। भू + शप् + ति रूप बना।
शप् के प् तथा अ की इत्संज्ञा एवं लोप हुआ।  भू + अ + ति रूप बना।
सार्वधातुकार्धधातुकयोः  सूत्र से सार्वधातुक शप् का अ बाद में रहने के कारण भू के उ को गुण ओ हो गया। भो + अ + ति रूप बना।
भो + अ इस स्थिति में एचोऽयवायावः से भो के ओ का अव् आदेश हुआ। भ् + अव् + अ + ति रूप बना। वर्णों के आपस में मिलने पर        भ् + अव् = भव्
                                                       भव् + अ = भव
                                                       भव + ति = भवति रूप सिद्ध हुआ।

भवतः       रूप की सिद्धि भी पूर्वोक्त भवति के समान ही होती है।  प्रक्रिया यहाँ प्रदर्शित है-

भू  + लट्                    वर्तमाने लट् से वर्तमान अर्थ में लट् लकार का विधान हुआ।
भू  + ल्                      ट् एवं अ की इत्संज्ञा एवं लोप हुआ ।
भू  + तस्                    प्रथम पुरूष द्विवचन का तस् आया। 
भू + शप् + तस्             कर्तरि शप्  से शप् हुआ ।  
भू + अ + तस्               श् एवं प् की इत्संज्ञा एवं लोप हुआ । 
भो + अ + तस्               सार्वधातुकार्धधातुकयोः से भू के उ का गुण ओ हुआ।
भ् + अव् + अ + तस्        एचोऽयवायावः से भो के ओ का अव् आदेश हुआ ।
भ् + अव् + अ + तः         सकार का ससजुषो रुः से रुत्व विसर्जनीयस्य सः से विसर्ग
भवतः                           परस्पर वर्ण संयोग हुआ।
भवन्ति   
भू  + झि                        प्रथम पुरूष बहुवचन में झि आदेश हुआ ।
भू  + अन्त् + इ               झोन्तः से झ् को अन्त आदेश हुआ।
भू  + अन्ति                    परस्पर वर्ण संयोग
भू + शप् + अन्ति             कर्तरि शप्  से शप् हुआ ।  
भू + अ + अन्ति               श् एवं प् की इत्संज्ञा एवं लोप हुआ । 
भो + अ + अन्ति              सार्वधातुकार्धधातुकयोः से भू के उ का गुण ओ हुआ।
भ् + अव् + अ + अन्ति       एचोऽयवायावः से भो के ओ का अव् आदेश हुआ ।
भव + अन्ति                    परस्पर वर्ण संयोग
भवन्ति                           अतो गुणे से पररूप हुआ।  
भवसि भवथः भवथ में युष्‍मद्युपपदे समानाधिकरणे स्‍थानिन्‍यपि मध्‍यमः
                           से मध्यम पुरुष का विधान होगा। शेष प्रक्रिया पूर्ववत् होगी।
भवामि 
भू  + लट्                    वर्तमाने लट् से वर्तमान काल में लट् लकार का विधान हुआ।
भू  + मिप्                    अस्मद्युत्तमः से उत्तम पुरूष में मिप् हुआ।
भू  + मि                      प् की इत्संज्ञा एवं लोप हुआ
भू + शप् + मि              कर्तरि शप्  से शप् हुआ ।  
भू + अ + मि               श् एवं प् की इत्संज्ञा एवं लोप हुआ । 
भो + अ + मि              सार्वधातुकार्धधातुकयोः से भू के उ का गुण ओ हुआ।
भ् + अव् + अ + मि       एचोऽयवायावः से भो के ओ का अव् आदेश हुआ ।
भव + मि                    अतो दीर्घो यञि से यञादि सार्वधातुक मि बाद में होने के कारण 
                                 अदन्त अंग भव के अ का दीर्घ हुआ।  
भवा + मि                    परस्पर वर्ण संयोग।
भवामि रूप सिद्ध हुआ। इसी प्रकार भवावः भवामः रूप बनेंगें।  
भविष्यति
भू  + लृट्                     लृटः शेषे च से सामान्य भविष्यत् काल में लृट् लकार।
भू  + तिप्                    तिप् आदेश, तिप् की सार्वधातुक संज्ञा, प् की इत्संज्ञा एवं लोप हुआ ।
भू + स्य + ति               कर्तरि शप्  से शप् की प्राप्ति हुई, स्यतासी लृलुटोः से स्य प्रत्यय । 
भू + स्य + ति                आर्धधातुकं शेषः से स्य की आर्धधातुक संज्ञा
भू +इ+ स्य + ति           आर्धधातुकस्‍येड्वलादेः से इट् का आगम,ट् की इत्संज्ञा एवं लोप
भो +इ+ स्य + ति           सार्वधातुकार्धधातुकयोः से भू के उ का गुण ओ हुआ।
भ् +अव् +इ+ स्य + ति    एचोऽयवायावः से भो के ओ का अव् आदेश हुआ ।
भ् +अव् +इ+ ष्य + ति     आदेशप्रत्ययोः से स्य के स् को ष् हुआ।
भविष्यति रूप सिद्ध हुआ। इसी प्रकार  भविष्यतः। भविष्यन्ति। 
भविष्यसि। भविष्यथः। भविष्यथ। 
भविष्यामि भविष्यावः भविष्यामः रूप सिद्ध करना चाहिए।
भवतु   भवतात्
भू  + लोट्                   लोट् च से विधि, निमंत्रण आदि अर्थ में लोट् लकार का विधान हुआ।
भू  + लो                      ट् की इत्संज्ञा एवं लोप हुआ ।
भू  + तिप्                    प्रथम पुरूष एकवचन का तिप् आया। 
भू + शप् + ति             प् का अनुबन्ध लोप। कर्तरि शप्  से शप् हुआ ।  
भू + अ + ति                 श् एवं प् की इत्संज्ञा एवं लोप। अ की सार्वधातुक संज्ञा।
भो + अ + ति               सार्वधातुकार्धधातुकयोः से भू के उ का गुण ओ हुआ।
भ् + अव् + अ + ति       एचोऽयवायावः से भो के ओ का अव् आदेश हुआ ।
भ् + अव् + अ + तु         एरुः से लोट् लकार के इकार का उ आदेश हुआ।
भवतु                           परस्पर वर्ण संयोग हुआ।
आशीर्वाद देने के अर्थ में भवतु के तु को तुह्‍योस्‍तातङ्ङाशिष्‍यन्‍यतरस्‍याम् से विकल्प से तातङ् आदेश होगा। तातङ् के अ तथा ङ् का अनुबन्ध लोप होने पर तात् शेष रहता है। इस प्रकार भू धातु लोट् लकार प्रथमा एकवचन में भवतु तथा भवतात् दो रूप बनेंगें।
भवताम् 
भू  + लोट्                  अनुबन्ध लोप,भू  + ल् हुआ     
भू  + तस्                    प्रथमपुरुष द्विवचन का तस् आया। तस् की सार्वधातुक संज्ञा। 
भू + शप् + तस्              कर्तरि शप्  से शप् हुआ । श् प् का अनुबन्ध लोप। 
भू + अ + तस्                अ की सार्वधातुक संज्ञा।
भो + अ + तस्               सार्वधातुकार्धधातुकयोः से भू के उ का गुण ओ हुआ।
भ् + अव् + अ + तस्        एचोऽयवायावः से भो के ओ का अव् आदेश हुआ ।
भ् + अव् + अ + तस्         लोटो लङ्वत् लोट् लकार सम्बन्धी तस् को ङित्वद्भाव 
                                   (ङित् के समान)
भ् + अव् + अ + ताम्        ङित्वात् तस्‍थस्‍थमिपां तान्तन्तामः से तस् के स्थान पर 
                                    ताम् आदेश हुआ।
भवताम्                          परस्पर वर्ण संयोग हुआ।
भवन्ति की तरह भू + झि  भव + अन्ति इ को एरुः के उ कर भवन्तु रूप सिद्ध करना चाहिए।
भवतात्  भव
भू  + सिप्                  लोट् लकार, मध्यमपुरुष एकवचन का सिप् आया।  
                               सिप् की  सार्वधातुक संज्ञा। 
भव + सि                   प् का अनुबन्ध लोप, शप् आगम । श् प् का अनुबन्ध लोप। गुण, अवादेश
भव + हि                   सेर्ह्यपिच्‍च से सि के स्थान पर हि आदेश।
भवतात्                    तुह्‍योस्‍तातङ्ङाशिष्‍यन्‍यतरस्‍याम् से हि को विकल्प से 
                               तातङ् आदेश हुआ।
भव                         तुह्‍यो सूत्र के वैकल्पिक पक्ष में अतो हेः से हि का लोप हुआ।
भवतम्                    तस्‍थस्‍थमिपां तान्तन्तामः से थस् को तम् । 
                             शेष प्रकिया भवताम् की तरह होगी।
भवत                       तस्‍थस्‍थमिपां तान्तन्तामः थ के स्थान पर त आदेश ।
भवानि
भू + मिप्                  लोट् लकार, उत्तम पुरुष एकवचन का मिप् आया। प् का अनुबन्ध लोप।
                               मि की सार्वधातुक संज्ञा। 
भू +अ+ मि                 कर्तरि शप्  से शप् हुआ । श् प् का अनुबन्ध लोप। 
भू + अ + नि               मेर्निः से लोट् लकार के मि को नि आदेश।
भू + अ + आ + नि    आडुत्तमस्य पिच्च से लोट् लकार के नि के पूर्व आट् का आगम,
                            ट् का अनुबन्ध लोप।
भव + आ + नि           भू के ऊ का गुण, अवादेश
अकः सवर्णे दीर्घः से अ + आ का दीर्घ एकादेश आ करने पर भवानि रूप सिद्ध हुआ।
भवाव 
भू  + वस्                  लोट् लकार, उत्तम पुरुष द्विवचन का वस् आया। 
भू  + आ + वस्          आडुत्तमस्य पिच्च से नि के पूर्व आट् का आगम,
                               ट् का अनुबन्ध लोप।। 
भव + आ + वस्          सार्वधातुक संज्ञा, शप् , अनुबन्ध लोप, गुण, अवादेश 
भवा + वस्                अकः सवर्णे दीर्घः से अ + आ का दीर्घ एकादेश आ ।
भवा                       नित्यं ङितः से सकार का लोप हुआ
इसी प्रकार भवाम रूप बनेंगें।  
                 
 --------------------------------------------------------------------------------                
विशेष- 1. पाणिनि की प्रतिज्ञा के अनुसार भू का उ अनुनासिक नहीं माना जाता, अतः  उपदेशेऽजनुनासिक इत्  से उ की इत्संज्ञा एवं तस्य लोपः से लोप नहीं होता। 
2. तिप् सिप् मिप् के प् की, इट् में ट् की तथा महिङ् में ङ् की इत्संज्ञा तथा लोप हो जाता है। आताम् आथाम् एवं ध्वम् के म् की इत्संज्ञा प्राप्त होती है, परन्तु न विभक्तौ तुस्माः से निषेध हो जाता है।
3. पित् को मानकर होने वाले स्वरविधान एवं गुण के लिए इत्संज्ञक प् का विधान किया गया। इट् में ट् का विधान स्पष्टता के लिए महिङ् के ङ् की इत्संज्ञा तिङ् एवं तङ् प्रत्याहार  बनाने के लिए किया गया। 
4. भू झि एस दशा में चूटू सूत्र से झ् की इत्संज्ञा प्राप्त थी, परन्तु झोन्तः से झ् को अन्त आदेश हुआ।
5. यहां आत्मनेपद का विधान नहीं है, अतः कर्तरि परस्मैपदम् से भू धातु से परस्मैपद पद अर्थात तिप् आदि प्राप्त हुए। लः परस्‍मैपदम् से तिङ् को परस्‍मैपदम् प्राप्त होता है, जबकि तङानावात्‍मनेपदम्  से तङ् को आत्मनेपद संज्ञा होती है।  शेषात्‍कर्तरि परस्‍मैपदम् तङ् को छोड़कर शेष को परस्‍मैपद संज्ञा हुई।
6. तिङस्‍त्रीणि त्रीणि प्रथममध्‍यमोत्तमाः तथा तान्‍येकवचनद्विवचनबहुवचनान्‍येकशः सूत्र का सारांश-
               एकवचन   द्विवचन   बहुवचन   एकवचन       द्विवचन         बहुवचन
परस्‍मैपद प्रत्यय
प्रथम पुरुष       तिप्     तस्       झि           स भवति          तौ भवतः        ते भवन्‍ति 
मध्यम पुरुष      सिप्     थस्       थ            त्‍वं भवसि        युवां भवथः      यूयं भवथ
उत्तम पुरुष       मिप्     वस्      मस्           अहं भवामि      आवां भवावः     वयं भवामः 
                                 आत्मनेपद प्रत्यय
प्रथम पुरुष              आताम्       
मध्यम पुरुष      थास्    आथाम्    ध्वम्
उत्तम पुरुष        इट्      वहि      महिङ्

नोट- 1. धातुरूप की सिद्धि के लिए सन्धि का ज्ञान होना आवश्यक होता है। धातुरूप सिद्धि के पहले आप एक बार पुनः सन्धि का अभ्यास अवश्य कर लें, जिससे इसमें आपको सुगमता आएगी।
      2. धातुओं को 10 गणों में विभाजित किया गया। गण के आदि में जो धातु सर्वप्रथम आया उस गण का नाम उसी धातु के नाम से रखा गया है। जैसे- भू धातु आरंभ में होने के कारण भ्वादि नाम पड़ा। इसी प्रकार अद् आदि धातुओं के नाम से अदादि, जुहोत्यादि  गणों के नाम हुए।
अभ्यास-           1. भवति रूप की सिद्धि में कितनी बार तस्य लोपः सूत्र लगा।
                        2. भवति रूप की सिद्धि में किन किन वर्णों की इत्संज्ञा हुई?
                        3. भवति रूप की सिद्धि में कौन सन्धि हुई?
                        4. भवति रूप सिद्धि में आये प्रत्याहारों को विस्तार पूर्वक लिखिये।
सन्धि के अभ्यास के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-
इस लिंक पर लेख के अंत में इन सन्धियों के बारे में बताया गया है-  गुण सन्धि,  दीर्घ सन्धि, वृद्धि सन्धि,     यण् सन्धि,  पूर्वरूप सन्धि, पररूप सन्धि
अथवा लघुसिद्धान्तकौमुदी (विसर्गसन्धिपर्यन्तम्) इस लिंक पर चटका लगायें।
संज्ञा शब्द - तिङ्, लोप, इत्संज्ञा, अनुबन्ध लोप, गुण
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मध्वाचार्य

मध्वाचार्य जीवन वृत्त  (1199-13030)
भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तक द्वैतवादी मध्वाचार्य का जन्म कर्णाटक के पाजक नामक स्थान पर हुआ। यह उडुपी के समीप है। इनके पिता का नाम मध्वगेद भट्ट तथा गुरु का नाम अच्युतप्रेक्ष था। भारत के दार्शनिकों में से एक थे। इनका अन्य नाम पूर्णप्रज्ञ व आनंदतीर्थ भी हैं। मध्वाचार्य को वायु का तृतीय अवतार माना जाता है (हनुमान और भीम क्रमशः प्रथम व द्वितीय अवतार थे)। मध्वाचार्य ने गोदावरी के तटवर्ती भाग में रहने वाले शोभनभट्ट जैसे अनेक वेदान्तयों को अपना शिष्य बनाया। उन्होंने तत्ववाद का प्रवर्तन किया जिसे द्वैतवाद के नाम से जाना जाता है। द्वैतवाद, वेदान्त की तीन प्रमुख दर्शनों में एक है।
मध्वाचार्य लिखित ग्रन्थ
मध्वाचार्य ने सैंतीस ग्रन्थों की रचना की। इन्होने द्वैत दर्शन के ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा और अपने वेदांत के व्याख्यान की तार्किक पुष्टि के लिये एक स्वतंत्र ग्रंथ 'अनुव्याख्यान' भी लिखा। श्रीमद्भगवद्गीता और 10 उपनिषदों पर टीकाएँ, महाभारत के तात्पर्य की व्याख्या करनेवाला ग्रंथ महाभारततात्पर्यनिर्णय तथा श्रीमद्भागवतपुराण पर टीका ये इनके मुख्य ग्रंथ है। ऋग्भाष्य (ऋग्वेद 1.1- 40) के चालीस सूक्तों पर भी एक टीका लिखी । ऐसा लगता है कि ये अपने मत के समर्थन के लिये प्रस्थानत्रयी की अपेक्षा पुराणों पर अधिक निर्भर है।
मध्वाचार्य के सिद्धान्त
       वैष्णव सम्प्रदाय के आचार्यों के सिद्धान्त को समझने के लिए शंकराचार्य के अद्वैत सिद्धान्त को जानना आवश्यक हो जाता है। वैष्णव सम्प्रदाय के सभी आचार्यों ने अद्वैत सिद्धान्त का खण्डन करने के साथ-साथ एक दूसरे के सिद्धान्त का भी खण्डन करते हैं। श्री मध्वाचार्य ने प्रस्थानत्रयी ग्रंथों से अपने द्वैतवाद सिद्धांत का विकास किया। यहाँ इन्होंने शंकराचार्य के अद्वैतवाद तथा रामानुज के विशिष्टाद्वैतवाद का खण्डन किया है। ये जीव और जगत् को मिथ्या न मानकर सत्य मानते हैं। मध्व जीवात्मा एवं परमात्मा की विशेषताओं में साम्य मानते हैं। यह `सद्वैष्णव´ भी कहा जाता है, यह श्री रामानुजाचार्य के श्री वैष्णवत्व से अलग है।
मध्वाचार्य ने 'पाँच भेदों' की स्थापना की, जो `अत्यन्त भेद दर्शनम्´ भी कहा जाता है। उसकी पांच विशेषतायें हैं-
(क) भगवान और व्यक्तिगत आत्मा का पार्थक्य, (ईश्वर और जीव)
(ख) परमात्मा और पदार्थ का पार्थक्य,             (ईश्वर और जड जगत्)
(ग) जीवात्मा एवं पदार्थ का पार्थक्य,                (जीव और जगत्)
(घ) एक आत्मा और दूसरी आत्मा में पार्थक्य तथा (जीव और जीव)
(ङ) एक भौतिक वस्तु और अन्य भौतिक वस्तु में पार्थक्य। (जड और जड)
मध्व दर्शन के अनुसार समस्त जीव एक दूसरे से भिन्न है। यह परमात्मा से भी भिन्न है।
अत्यन्त भेद दर्शनम्  का वर्गीकरण पदार्थ रूप में इस प्रकार भी किया गया है :
(अ) स्वतंत्र
(आ) आश्रित
स्वतंत्र वह है जो पूर्ण रूपेण स्वतंत्र है। जो भगवान या सनातन सत्य है। लेकिन जीवात्मा और जगत् भगवान पर आश्रित हैं। इसलिये भगवान उनका नियंत्रण करते हैं। परमात्मा स्वतंत्र हैं। इसलिए उनका वर्गीकरण असम्भव है। आश्रित तत्त्व सकारात्मक एवं नकारात्मक रूप में विभाजित किये जाते हैं। सकारात्मक को भी चेतन (जैसे आत्मा) और अचेतन (जैसे वे पदार्थ) में वर्गीकृत किया जा सकता है।
अचेतन तत्त्व को परिभाशित करने के पहले मध्वाचार्य स्वतंत्र और आश्रित के बारे में बताते हैं जो संसार से नित्य मुक्त हैं। इस विचारधारा के अनुसार विष्णु स्वतंत्र हैं जो विवेकी और संसार के नियन्ता हैं। उनकी शक्ति लक्ष्मी हंत जो नित्य मुक्त हैं। कई व्यूहों एवं अवतारों के रूपों में हम विष्णु को पा सकते हैं (उन तक पहुँच सकते हैं)। उसी प्रकार अत्यन्त आश्रित लक्ष्मी भी विष्णु की शक्ति हैं और नित्य भौतिक शरीर लिये ही कई रूप धारण कर सकती हैं। वह दुख-दर्द से परे हैं। उनके पुत्र ब्रह्मा और वायु हैं। `प्रकृति´ शब्द प्र = परे + कृति = सृष्टि का संगम है।
मध्वाचार्य ने सृष्टि और ब्रह्म को अलग माना है। उनके अनुसार विष्णु भौतिक संसार के कारण कर्ता हैं। भगवान प्रकृति को लक्ष्मी द्वारा सशक्त बनाते हैं और उसे दृश्य जगत में परिवर्तित करते हैं। प्रकृति भौतिक वस्तु, शरीर एवं अंगों का भौतिक कारण है। प्रकृति के तीन पहलुओं से तीन शक्तियाँ आविर्भूत हैं : लक्ष्मी, भू (सरस्वती-धरती) और दुर्गा। अविद्या (अज्ञान) भी प्रकृति का ही एक रूप है जो परमात्मा को जीवात्मा से छिपाती है।
मध्वाचार्य जी का विश्वास है कि प्रकृति से बनी धरती माया नहीं, बल्कि परमात्मा से पृथक सत्य है। यह दूध में छिपी दही के समान परिवर्तन नहीं है, न ही परमात्मा का रूप है। इसलिए यह अविशेष द्वैतवाद ही है।
मध्वाचार्य जी ने रामानुजाचार्य का आत्माओं का वर्गीकरण को स्वीकार किया। जैसे :--
(क) नित्य - सनातन (लक्ष्मी के समान)
(ख) मुक्त - देवता, मनुष्य, ॠषि, सन्त और महान व्यक्ति
(ग) बद्ध - बँधे व्यक्ति
मध्वाचार्य ने इनके साथ और दो वर्ग जोड़ा, जो मोक्ष के योग्य है और जो मोक्ष के योग्य नहीं है :
1. पूर्ण समर्पित लोग, बद्ध भी मोक्ष के लिए योग्य हैं।
2. जो मोक्ष के लिए योग्य नहीं हैं। वे हैं:
(क) नित्य संसारी : सांसारिक चक्र में बद्ध।
(ख) तमोयोग्य : जिन्हें नरक जाना है।
इस वर्गीकरण के अनुसार जीवात्मा का एक अलग अस्तित्व है। इस प्रकार एक आत्मा दूसरी आत्मा से भिन्न होती हैं। इसका अर्थ आत्मा अनेक हैं। जीवात्मा परमात्मा एवं प्रकृति से भिन्न होने से परमात्मा के निर्देश पर आश्रित है। उनके पिछले जन्मों के आधार (कर्मो) पर परमात्मा उन्हें प्रेरित करते हैं। पिछले कर्मो के अनुसार जीवात्मा कष्ट झेलते हैं, जिससे उनकी आत्मा पवित्र हो जाती है और जीवन-मरण से मुक्त होकर आनन्द का अनुभव करती हैं जो आत्मा की सहजता है। आनन्दानुभूति में जीवात्मा भिन्न होती है। लेकिन उनमें कोई वैमनस्य नहीं होता और वे पवित्र होकर परब्रह्म को प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन वे परमात्मा के बराबर नहीं हो सकतीं। वे परमात्मा की सेवा के लायक हो जाती हैं। नवधा भक्ति मार्ग से आत्मा परमात्मा की कृपा से मुक्ति प्राप्त कर लेती है।


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