संस्कृत- शिक्षण- पाठशाला 1


क्लिक 


मंगलाचरण

ध्वनिवर्णाः पदं वाक्यमित्यास्पदचतुष्टयम्।
यस्याः सूक्ष्मादिभेदेन वाग्देवीं तामुपास्महे।। सरस्वतीकण्ठाभरणम् 1.1

अर्थ- जिस वाक्यरूपी वैखरी वाणी के सूक्ष्म आदि भेद से ध्वनि, वर्ण, पद तथा वाक्य ये चार आश्रय हैं, उस वाग्देवी की उपासना करता हूँ।

आादिक्षान्तविलासलालसतया तासां तुरीया तु या।

क्रीडाकृत्य जगत्त्रयं विजयते वेदादिविद्यामयी।


आत्म निवेदन/ कथ्य/ भूमिका

     किसी भी भाषा के दो स्वरूप होते हैं। 1. लिखित 2. बोलचाल / भाषिक या सम्पर्क भाषा। चुंकि मैं यहाँ आपसे लिखित रूप में सम्पर्क कर रहा हूँ, अतः इस पाठ के माध्यम से आप लिखित संस्कृत सीख सकेंगें। संस्कृत भाषा शिक्षण के लिए अनेक विधियाँ प्रचलित हैं। अंग्रेजी तथा हिन्दी माध्यम के विद्यालयों में अनुवाद विधि प्रचलित है। इसमें हिन्दी या अंग्रेजी के वाक्य को संस्कृत में अनुवाद करना सिखाया जाता है। आपको इस विधि से संस्कृत सिखाने का की अनेक पुस्तकें, विडियो तथा वेबसाइट मिल जाएँगें। प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कराने वाले कोचिंग में भी अन्य भाषा के वाक्य को संस्कृत में अनुवाद कराना ही सिखाते हैं। संस्कृत शिक्षण पाठशाला  में सीधे संस्कृत में वाक्य बनाना सिखाया गया है। इस विधि में अन्य भाषा  की न्यूनतम आवश्यकता होती है। इस विधि की विशेषता यह है कि आप संस्कृत में अनुवाद करना सीखने के साथ-साथ, किसी भी विषयको सीधे संस्कृत भाषा में लिखने में तथा संस्कृत में लिखी सभी प्रकार की पुस्तकों को पढ़कर समझने में समर्थ हो जाते हैं। अनुवाद विधि से संस्कृत सीखने पर यह सब संभव नहीं हो पाता है। संस्कृत शिक्षण पाठशाला को 1,2,3,4,5,6 में विभाजित किया गया है।

संस्कृत शिक्षण पाठशाला 1 में कुल 28 पाठ हैं।  इसमें वर्ण परिचय, संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, अव्यय, लिंग, वचन, पुरुष. उपसर्ग तथा संख्यावाचक शब्दों का सामान्य परिचय तथा उदाहरण दिया गया है। पाठशाला 1 में महत्वपूर्ण शब्दरूप, विभक्ति तथा सन्धि से भी परिचय कराया गया है।

संस्कृत शिक्षण पाठशाला 2 तथा 3 में क्रिया (धातु से तिङ् प्रत्यय)

संस्कृत शिक्षण पाठशाला 4 में कृदन्त प्रत्यय (धातु से कृत् प्रत्यय),

संस्कृत शिक्षण पाठशाला 5 में  तद्धित प्रत्यय तथा

संस्कृत शिक्षण पाठशाला 6 समास दिया गया हैं।

इस पाठ्यक्रम को सीखने के बाद आप संस्कृत भाषा एवं देवनागरी लिपि में लिखी संस्कृत की पुस्तकें पढ़कर आसानी से समझ सकेंगें। आप संस्कृत में अपना भाव या विचार लिख सकेगें। मेरे इस पाठशाला में अभ्यास हेतु स्थान- स्थान पर लिंक दिये गये हैं । आप किसी अन्य पुस्तक की सहायता भी ले सकते हैं।

         यहाँ पर अभी सतत् पाठ का विस्तार हो रहा है। अतः क्रम में परिवर्तन दिखेगा। कोई भी भाषा अध्ययन तथा अभ्यास से सीखी जा सकती है। केवल नियम या व्याकरण जान लेने से भाषा को सीख पाना संभव नहीं है। भाषा शिक्षण के  लिए सामान्य नियम/ व्याकरण बता दिये जाते हैं। कतिपय उदाहरण तथा अभ्यास दे दिये जाते हैं, परन्तु मेरा अनुभव कहता है कि जबतक उस भाषा के साहित्य को नहीं पढ़ा जाय, जबतक उस भाषा को व्यवहार में/ प्रयोग में नहीं लाया जायतब तक किसी भी भाषा में दक्षता नहीं आ पाती है। अतः इन नियमों को जानने के बाद आप कोई एक संस्कृत की पत्रिका/ संस्कृत साहित्य को अवश्य पढ़ें। इस ब्लॉग में संस्कृतसर्जना पत्रिका के कतिपय अंक तथा संस्कृत के सैकड़ों पुस्तकों उपलब्ध हैं।


पाठ- 1
लिपि शिक्षण (वर्ण विचार)
संस्कृत भाषा को लिखने के लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जाता है। अतः संस्कृत सीखने से पहले हमें देवनागरी लिपि के वर्णमाला का ज्ञान होना आवश्यक हो जाता है। यहाँ मैं आपको सबसे पहले वर्णमाला से परिचय करा रहा हूँ।
 देवनागरी में तीन प्रकार के वर्ण होते हैं।
1. स्वर वर्ण   2. व्यंजन वर्ण  3. अयोगवाह वर्ण
स्वर वर्ण
अ इ उ ऋ ऌ ए ऐ ओ औ

विशेष ज्ञान

👉 ए, ऐ, ओ, औ को संयुक्त स्वर कहा जाता है, क्योंकि ये दो स्वर वर्णों के मेल से बनते हैं। संस्कृत में अ इ उ ऋ वर्णों का ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत ये तीन भेद होते हैं। अतः व्याकरण में अ (अवर्ण) का अर्थ आ भी होता है। इसी प्रकार इ उ ऋ को भी समझना चाहिए।

व्यंजन वर्ण
क्  ख्  ग्  घ्  ङ्  - कवर्ग
च्  छ्  ज्  झ्  ञ् -  चवर्ग
ट्  ठ्  ड्  ढ्   ण् -  टवर्ग
त्  थ्  द्  ध्   न् -  तवर्ग
प्  फ्  ब्  भ्  म् - पवर्ग
य्  र्  ल्  व् -  अन्तस्थ वर्ण
श्  ष्  स्  ह् - ऊष्म वर्ण

विशेष ज्ञान 👉

स्वर रहित व्यंजन वर्ण में ् लगाया जाता हैं। इसे हलन्त कहते हैं। जैसे- क्, ख्, ग्, घ्, ङ् । व्यंजन में स्वर वर्ण को जब मिलाया जाता है तब वह उच्चारण करने योग्य होता है। पाणिनि ने 14 माहेश्वर सूत्रों में इन वर्णों को कहा है। वहाँ पर वर्णों के क्रम में थोड़ा सा परिवर्तन है। संस्कृत सीखने के इच्छुक लोगों को चाहिए कि वे माहेश्वर सूत्र को याद कर लें, ताकि संस्कृत व्याकरण सीखना आसान हो सके ।

अयोगवाह - अनुस्वार तथा विसर्ग को अयोगवाह कहा जाता है। इसका प्रयोग ( लिखने तथा बोलने में ) केवल स्वर वर्णों के साथ ही होता है। जैसे - अं, अः । कं, कः आदि।
संयुक्त व्यंजन- दो व्यंजन वर्णों को आपस में मिलने पर एक संयुक्त व्यंजन का निर्माण होता है। 
जैसे- क् + ष् = क्ष् । त् + र् = त्र् । ज् + ञ् = ज्ञ् । श् + र् = श्र् । द् + व् = द्व् । द् + य् = द्य् ।
अभ्यास - 
1. व्यञ्जन वर्ण के साथ स्वर वर्ण जोड़ें। जैसे - त् + अ = त । ख् + इ = खि ।
2. व्यञ्जन वर्ण के साथ व्यञ्जन वर्ण जोड़कर संयुक्त व्यंजन बनायें। जैसे - क् + र् = क्र ।

व्यंजन वर्णों के संयोग के कारण इसके लिखावट (आकृति) में परिवर्तन
 
1. कहीं-कहीं दो व्यंजनों के मेल को पहचानना आसान होता है। जैसे स् + व् + अ = स्व । 
कभी- कभी व्यंजनों के मेल से बने अक्षर में इतना परिवर्तन हो जाता कि पहचानना कठिन हो जाता है। जैसे- क् + ष् + अ = क्ष  त् + र् + अ = त्र ज् + ञ् + अ =  ज्ञ  इत्यादि। 
जहाँ दो व्यंजन वर्णों के मेल से उसकी आकृति में बहुत अधिक अंतर आ जाता हैऐसे  श् + र् + अ =  श्र  घ् + न् + अ = घ्न  जैसे वर्ण को पहचानना चाहिए।
2. इस लिपि मे र एक ऐसा वर्ण हैजो किसी अन्य व्यंजन के साथ मिलने पर तीन तरह से परिवर्तित हो जाता है। कभी यह वर्ण के ऊपरकभी मध्य में कभी नीचे जुड़ता है। जैसे- वर्ण में ऊपर वाला र् को देखें-  व + र्  +   = वर्ण,  क्रम में मध्य वाला र् को देखें- क् + र + म = क्रम उष्ट्र में नीचे वाला र् को देखें-  + ष् +ट् + र = उष्ट्र । 
3. संस्कृत भाषा में कहीं कहीं तीन या इससे अधिक व्यंजन वर्ण भी आपस में जुड़ते हैं। जैसे- ओष्ठ्य । व्यंजन वर्णों के आकृति परिवर्तन को समझने के लिए देवनागरी यूनीकोड टाइपिंग (टंकन) अत्यधिक सहायता करता है।
प्रश्न- कूर्मांचल शब्द में क् + ऊ + र् + म् + आ + न् + च् + अ + ल्+ अ (न् को अनुस्वार पढ़ें) अक्षर हैं। यहाँ ऊ अक्षर के बाद र् आया है। इस र् अक्षर को मा अक्षर के ऊपर लिखते हैं, जबकि मान् का न् अक्षर (अनुस्वार को) मा के ही ऊपर क्यों लगाया जाता है? अर्थात् र् की ही तरह अनुस्वार को भी अगले वर्ण च पर क्यों नहीं लगाया जाता?
उत्तर- र् की तीन गति होती है । १. ट् + र = ट्र में नीचे की ओर जाना। २. व् + अ+ र् + ग = वर्ग में आगामी वर्ण के उपर जाना। ३. आम् + र = आम्र में बीच में ही रह जाना।

ध्यान से देखें तो किसी भी व्यंजन की दो गति होती है स्वरयुक्त और स्वररहित। जैसे – र् तथा र ।  स्वरयुक्त को पूरा तथा स्वरहीन को आधा कहते हैं। ट्र में र स्वरयुक्त है जबकि ट् स्वरहीन।  वर्ग में रेफ स्वर विहीन या स्वर रहित है। ऐसे ही ग्रन्थ में भी र स्वरयुक्त है।

र् के बाद यदि कोई स्वर वर्ण नहीं होकर व्यञ्जन होने पर र् अगले व्यञ्जन के ऊपर लगता है । इसे यों समझ सकते हैं स्वर विहीन अर्थात् पैर से लंगड़ा, किसी के कन्धे पर ही सवारी करता है। अतः कर् + ता में र् स्वर विहीन है। अतः यह ता अक्षर के कंधे पर सवारी करता है। अब बात रह गयी स्वर युक्त अर्थात् र् + अ = र की। यदि र् के पहले कोई व्यंजन वर्ण है तब र् नीचे या बीच में लगता है।  जैसे- आ + म् + र् + अ =आम्र । स् + अ + ह् + अ + स् + र् + अ = सहस्र । देवनागरी लिखने की एक प्रथा है, जिसे अभ्यास द्वारा सीखा जा सकता है।

अनुस्वार अर्धस्वर है । वह मात्रा है, इसलिए वह पूर्ववर्ती स्वर पर आश्रित रहता है, वह व्यंजन पर आश्रित नहीं हो सकता। रेफ शुद्ध व्यंजन है, मात्रा नहीं । इसलिए हमेशा परवर्ती स्वर पर (जैसे ट्र में रेफ अपने बाद वाले अ पर आश्रित है) या स्वरयुक्त व्यंजन पर (जैसे पर्व में व पर) आश्रित होता है

देवनागरी लिपि के वर्णविन्यास को देखने से ज्ञात होता है कि अक्षरों के संयोग से उत्पन्न नए शब्द विन्यास की सीमा बहुत अधिक हो जाती है।

अभ्यास
1. द्वद्धभ्रपर्णदुग्ध शब्द में व्यंजन तथा स्वर को अलग- अलग कर लिखें।
2. 10 ऐसे संयुक्त व्यंजन को लिखें,जो दो व्यंजन को मिलने पर भी आसानी से पहचाना जा सकता है। 
3. 10 ऐसे संयुक्त व्यंजन को लिखें,जो दो व्यंजन को मिलने पर स्वरूप में परिवर्तन हो जाता है। 
वर्ण संयोग
स्वर तथा व्यंजन के मेल से शब्द बनते हैं। जैसे- ज्+ अ+ य्+ ए+ श्+ अ  इन वर्णों के आपस में जुड़ने पर जयेश शब्द बनता है। र् + अ + थ् + अ = रथ । ग् + अ + ज् + अ = गज आदि। 
जब कोई स्वर व्यंजन में जोड़ा जाता है तो उसे मात्रा के रूप में दिखाया जाता है। क् में आ की मात्रा जुड़ने पर काक् में इ जुड़ने पर कि आदि शब्द बनते हैं। अ अक्षर की कोई भी मात्रा नहीं होती है। बल्कि यह हलन्त  चिह्न के हटने से पता चलता है।
वर्ण विच्छेद
जिस तरह से शब्दों का संयोग किया जाता है, उसी तरह शब्दों का अलग-अलग (विच्छेद) भी किया जा सकता है । नीचे दिये गये शब्दों को विच्छेद कर लिखें- 

जैसे - आशा = आ + श् + आ (आकारान्त) दुर्ग = द् + उ + र् + ग् + अ (अकारान्त)

प्रश्न- "राजन्" यह पद किन - किन वर्णों के मेल से बना है ?

उत्तर - राजा = र् + आ + ज् + अ+ न् (नकारान्त)

प्रश्न- "लता" यह पद किन - किन वर्णों के मेल से बना है ?

उत्तर - लता = ल् + अ + त् + आ ( आकारान्त )

प्रश्न- "कवि" यह पद किन - किन वर्णों के मेल से बना है ?

उत्तर - कवि = क् + अ + व् + इ (इकारान्त)

प्रश्न- "मति" यह पद किन - किन वर्णों के मेल से बना है ?

उत्तर - मति = म् + अ + त् + इ (इकारान्त)

प्रश्न- "नदी" यह पद किन - किन वर्णों के मेल से बना है ?

उत्तर - नदी = न् + अ + द् + ई ( ईकारान्त )

प्रश्न- "पृथ्वी" यह पद किन - किन वर्णों के मेल से बना है ?

उत्तर - पृथ्वी = प् + ऋ + थ् + व् + ई ( ईकारान्त )

प्रश्न- "दीपावली" यह पद किन - किन वर्णों के मेल से बना है ?

उत्तर - दीपावली = द् + ई + प् + आ + व् + अ + ल् + ई ( ईकारान्त )

प्रश्न- "शिशु" यह पद किन - किन वर्णों के मेल से बना है ?

उत्तर - शिशु = श् + इ + श् + उ ( उकारान्त )

प्रश्न- "मधु" यह पद किन - किन वर्णों के मेल से बना है ?

उत्तर - मधु = म् + अ + ध् + उ ( उकारान्त )

प्रश्न- "गुरु" यह पद किन - किन वर्णों के मेल से बना है ?

उत्तर - गुरु = ग् + उ + र् + उ ( उकारान्त )

प्रश्न- "वधू" यह पद किन - किन वर्णों के मेल से बना है ?

उत्तर - वधू = व् + अ + ध् + ऊ ( ऊकारान्त )

प्रश्न- "मातृ" यह पद किन - किन वर्णों के मेल से बना है ?

उत्तर - मातृ = म् + आ + त् + ऋ ( ऋकारान्त )

प्रश्न- "पितृ" यह पद किन - किन वर्णों के मेल से बना है ?

उत्तर - पितृ = प् + इ + त् + ऋ

प्रश्न- "राजन्" यह पद किन - किन वर्णों के मेल से बना है ?

उत्तर - राजन् = र् + आ + ज् + अ + न् (नकार )

प्रश्न- "वाच्" यह पद किन - किन वर्णों के मेल से बना है ?

उत्तर - वाच् = व् + आ + च्

प्रश्न- "आसन्द:" शब्द का वर्ण विच्छेद कीजिए तथा अन्तिम वर्ण बताइए ?

उत्तर – आसन्द:=  + स् +  + न् + द् + अ + विसर्ग

प्रश्न- "विद्यालयः" शब्द का वर्ण विच्छेद कीजिए तथा अन्तिम वर्ण बताइए।

प्रश्न- "उज्ज्वल" शब्द का वर्ण विच्छेद कीजिए तथा अन्तिम वर्ण बताइए ?

उत्तर ज् + ज् + व् +  + ल् + अ (अकारान्त)

प्रश्न- "कार्तिक" शब्द का वर्ण विच्छेद कीजिए तथा अन्तिम वर्ण बताइए ?

उत्तर – क् + आ र् + त् +  +  +अ (अकारान्त)

प्रश्न- "समृद्धि" शब्द का वर्ण विच्छेद कीजिए तथा अन्तिम वर्ण बताइए ?

उत्तर – स् +  + म् +  + द् + ध् +   (इकारान्त)

इसी प्रकार शब्दों का वर्ण विच्छेद करें-

पयः । जलम् । नीरम् । अवलेहः । शीतल । आढकी। आलुः । अमृती । एला । एवम् । अलाबुः । शाकम् । अभिनवः । तिलः ।  कफघ्नी । कलाकन्दः । संस्कृत । शब्द । सन्धि । स्वरूप । उच्चारण । जिह्वा । आदि। विशेष । प्रयत्न । देवभाषा । भाषा । व्याकरण । अत्यंत । परिमार्जित । वैज्ञानिक ।

विशेष ज्ञान

हम शब्दों को ढ़ूढ़ने के लिए शब्दकोश का प्रयोग करते है। यहाँ पर वर्ण क्रम से शब्द रखे होते हैं। यहाँ आरम्भिक अक्षर महत्वपूर्ण होता हैजो हमें शब्दों को खोजने में मदद करता है। संस्कृत या हिन्दी जैसी भाषा में शब्दों का अंतिम वर्ण लिंग (पुल्लिंगस्त्रीलिंगनपुंसक लिंग) को पहचानने में सहयोग करता है। संस्कृत में शब्दों का स्वरूप अधिकांश विभक्ति तथा वचन में  परिवर्तित हो जाते हैं। शब्दों  के अंतिम वर्ण तथा लिंग के कारण संस्कृत शब्दों के स्वरूप में परिवर्तन  देखा जाता है। क्रिया में भी बहुत कुछ ऐसा होता हैजिसकी चर्चा हम आगे यथास्थान करेंगें। 

दो शब्दों या पदों के मेल को सन्धि कहा जाता है। सन्धि का नियम आगे के पाठ में दिया गया है । वर्णों के संक्षेपीकरण को प्रत्याहार कहा जाता है। सन्धि आदि नियमों में प्रत्याहारों का उपयोग किया जाता है। प्रत्याहार बनाने के लिए माहेश्वर सूत्र का एक अक्षर तथा एक अंतिम (हलन्त) अक्षर लिया जाता है। प्रत्याहार से इन दोनों वर्णों के बीच में आने वाले वर्णों का बोध होता है। जैसे अक् प्रत्याहार कहने पर अ इ उ ऋ ऌ का बोध होता है। संस्कृत के सभी प्रकार के शब्दों से परिचय हो जाने के बाद ही आप उसका वाक्य बना सकते हैं। संस्कृत में वाक्य बनाने तक पहुँचने के लिए सलाह है कि आप अपने पास संस्कृत का एक शब्दकोश अवश्य रखेंजिसमें आगे कहे जाने वाले सभी प्रकार के शब्द हों। 

 
पाठ-2
संस्कृत के शब्दों से परिचय (शब्द विचार)
संस्कृत के वाक्य में संज्ञा, सर्वनामक्रिया, विशेषण तथा अव्यय इन पाँच प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया जाता हैं। इसके अतिरिक्त संस्कृत में प्र परा आदि प्रादि शब्दों का भी प्रयोग होता है। इसे निपात कहा जाता है।  क्रिया के साथ जुड़ने पर इन्हें उपसर्ग कहा जाता हैं। इन शब्दों को मुख्यतः तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है।


पिछले पाठ में हमने देवनागरी लिपि के वर्णों (स्वर और व्यंजन) को सीखा। जब इन वर्णों को एक निश्चित क्रम में आपस में जोड़ा जाता है, तो 'शब्द' बनते हैं; जैसे— ज् + अ + य् + ए + श् + अ = जयेश।
संस्कृत भाषा के वाक्यों में मुख्य रूप से पाँच प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इन्हें हम 'शब्द-भेद' (Parts of Speech) कहते हैं। आइए, इनसे परिचित होते हैं:
पाठ-2: शब्द विचार (Introduction to Words)
पिछले पाठ में हमने देवनागरी लिपि के वर्णों (स्वर और व्यंजन) को सीखा। जब इन वर्णों को एक निश्चित क्रम में आपस में जोड़ा जाता है, तो 'शब्द' बनते हैं; जैसे— ज् + अ + य् + ए + श् + अ = जयेश।
संस्कृत भाषा के वाक्यों में मुख्य रूप से पाँच प्रकार के शब्दों का प्रयोग किया जाता है। इन्हें हम 'शब्द-भेद' (Parts of Speech) कहते हैं। आइए, इनसे परिचित होते हैं:

1. संज्ञा (Noun)

संसार में किसी भी व्यक्ति, वस्तु, पशु, पक्षी, स्थान या भाव के नाम को संज्ञा कहते हैं।

·   उदाहरण:

o     व्यक्तियों के नाम: रामः (राम), सुरेशः (सुरेश), लता (लता)।

o     पशु-पक्षियों के नाम: अश्वः (घोड़ा), गजः (हाथी), खगः (पक्षी)

o     स्थान या वस्तुओं के नाम: हिमालयः (हिमालय), फलम् (फल), पुस्तकम् (किताब)।

 

o     संस्कृत में भाववाचक संज्ञा के उदाहरण:

1.       सुखम् (सुख / Happiness)

2.       दुःखम् (दुःख / Sadness)

3.       क्रोधः (गुस्सा / Anger)

4.       लोभः (लालच / Greed)

5.       क्षमा (माफी / Forgiveness)

6.       दया (करुणा / Kindness)

7.       शांतिः (शांति / Peace)

8.       सत्यम् (सच / Truth)

9.       बाल्यम् / बाल्यकालः (बचपन / Childhood - अवस्था का नाम)

o     सरल वाक्य उदाहरण:

§   क्रोधः मनुष्यस्य शत्रुः अस्ति। (क्रोध मनुष्य का शत्रु है। - यहाँ 'क्रोधः' एक भाव का नाम है, इसलिए यह संज्ञा है।)

§   सत्यम् वद। (सत्य बोलो। - यहाँ 'सत्यम्' एक भाव/विचार का नाम है।)


💡 क्या आप जानते हैं? (Do you know?)

महर्षि पाणिनि के प्रसिद्ध व्याकरण ग्रंथ अष्टाध्यायी के नियमों के अनुसार, संस्कृत में संज्ञा शब्दों को 'प्रातिपदिक' कहा जाता है। इसके अंतर्गत दो मुख्य प्रकार के अर्थवान् शब्द आते हैं:

1.    धातु (Verb root) और प्रत्यय (Suffix) को छोड़कर संसार का कोई भी ऐसा मूल शब्द जिसका कोई निश्चित 'अर्थ' होता है (जैसे— सुख, दुःख)

2.    धातुओं या शब्दों में विशेष प्रत्यय (कृत् और तद्धित) लगाकर बनाए गए नए अर्थवान् शब्द (जैसे— क्रोध, जो 'क्रुध' धातु में प्रत्यय लगाने से बनता है)।

यही कारण है कि हमारे मन के भावों, गुणों या अवस्थाओं को बताने वाले सुख, दुःख, क्रोध, दया, शांति आदि सभी शब्द संस्कृत व्याकरण में संज्ञावाची (प्रातिपदिक) शब्द माने जाते हैं।

 


2. सर्वनाम (Pronoun)

जो शब्द संज्ञा (नाम) के स्थान पर प्रयोग किए जाते हैं, उन्हें सर्वनाम कहते हैं। बार-बार नाम न लेना पड़े, इसलिए हम इनका प्रयोग करते हैं। संस्कृत व्याकरण के 'सर्वादि गण' में ऐसे प्रमुख शब्दों को गिना गया है।
  • उदाहरण:
    • सः (वह) — 
    • त्वम् (तुम) — 
    • अहम् (मैं) — 
    • एतत् (यह), 
    • किम् (कौन/क्या) आदि।

3. विशेषण (Adjective)

जो शब्द किसी संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता (जैसे—गुण, रंग, आकार, संख्या आदि) बताते हैं, उन्हें विशेषण कहते हैं। विशेषण जिसके बारे में बताता है, उसे विशेष्य कहा जाता है।
  • उदाहरण:

    o  सुन्दरः बालकः (सुन्दर लड़का) — यहाँ 'सुन्दरः' विशेषण है और 'बालकः' विशेष्य है।

    o  सुन्दरी बालिका (सुन्दर लड़की)

    o  लघुः (छोटा), मूर्खः (मूर्ख), एकः (एक) आदि।

4. क्रिया (Verb)

जिन शब्दों से किसी काम के करने या होने का पता चलता है, उन्हें क्रिया कहते हैं। संस्कृत में क्रिया के मूल रूप को धातु कहा जाता है। (इसके बारे में हम अगले पाठ में विस्तार से पढ़ेंगे)।
  • उदाहरण:
    • पठति (पढ़ता है), धावति (दौड़ता है), वहति (बहता है), खादति (खाता है)।

5. अव्यय (Invariable Words)

संस्कृत में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो कभी नहीं बदलते। कर्ता लड़का हो या लड़की, एक हो या अनेक, ये शब्द हमेशा एक जैसे ही रहते हैं। इनमें कोई बदलाव (व्यय) नहीं होता, इसलिए इन्हें अव्यय कहते हैं।
  • उदाहरण:
    • अत्र (यहाँ), तत्र (वहाँ), (और), अपि (भी) आदि।

💡 याद रखने योग्य मुख्य बिंदु (Quick Tips)

  • संस्कृत में वाक्य बनाने के लिए सबसे पहले हमें संज्ञा या सर्वनाम शब्द के साथ क्रियापद को जोड़ना सीखना होता है।
  • शब्दों के अंतिम अक्षर (जैसे—राम के अंत में '' है, लता के अंत में '' है) और उनके लिंग के आधार पर संस्कृत में शब्दों के रूप बदलते हैं।

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises)

प्रश्न 1: नीचे दिए गए शब्दों को उनके सही भेद के साथ मिलान (Match) कीजिए:
  1. गजः           (क) विशेषण
  2. अहम्           (ख) अव्यय
  3. सुन्दरः         (ग) संज्ञा
  4. पठति          (घ) सर्वनाम
  5. अत्र            (ङ) क्रिया
प्रश्न 2: कोष्ठक में से सही विशेषण चुनकर रिक्त स्थान भरिए:
  1. .................... बालकः। (सुन्दरः / सुन्दरी)
  2. .................... बालिका। (सुन्दरः / सुन्दरी)
✍️ अतिरिक्त अभ्यास कार्य (More Exercises)
प्रश्न 3: बहुविकल्पीय प्रश्न (MCQs) - सही उत्तर पर (✓) का चिह्न लगाइए:
  1. 'अहम्' (मैं) शब्द व्याकरण की दृष्टि से क्या है?
    • (क) संज्ञा
    • (ख) सर्वनाम
    • (ग) क्रिया
    • (घ) अव्यय
  2. 'अश्वः' (घोड़ा) शब्द किस भेद के अंतर्गत आता है?
    • (क) संज्ञा
    • (ख) विशेषण
    • (ग) अव्यय
    • (घ) सर्वनाम
  3. निम्नलिखित शब्दों में से 'अव्यय' शब्द कौन-सा है, जो कभी नहीं बदलता?
    • (क) रामः
    • (ख) खादति
    • (ग) तत्र
    • (घ) पुस्तकम्
  4. 'लघुः मूषकः' (छोटा चूहा) में विशेषण शब्द कौन-सा है?
    • (क) मूषकः
    • (ख) लघुः
    • (ग) दोनों
    • (घ) कोई नहीं
प्रश्न 4: अलग शब्द चुनिए (Odd One Out):
(नीचे दिए गए समूहों में से उस शब्द को चुनकर लिखिए जो बाकी चारों से अलग भेद का है)
  1. रामः, सुरेशः, लता, अत्र, हिमालयः।
    • उत्तर: .................... (संकेत: 'अत्र' अव्यय है, बाकी सब संज्ञा हैं)
  2. सः, त्वम्, अहम्, एतत्, पठति
    • उत्तर: .................... (संकेत: 'पठति' क्रिया है, बाकी सब सर्वनाम हैं)
  3. धावति, खादति, सुन्दरः, वहति, लिखति।
    • उत्तर: .................... (संकेत: 'सुन्दरः' विशेषण है, बाकी सब क्रिया हैं)
प्रश्न 5: सत्य या असत्य (True or False) बताइए:
  1. संस्कृत में क्रिया के मूल रूप को 'धातु' कहते हैं।   (सत्य / असत्य)
  2. अव्यय शब्द कर्ता के बदलने पर बदल जाते हैं।   (सत्य / असत्य)
  3. 'गजः' (हाथी) एक सर्वनाम शब्द है।   (सत्य / असत्य)
इस पाठ में संज्ञा आदि शब्दों से परिचय कराया जाएगा। इसके बाद स्वर तथा हल् वर्णान्त संज्ञावाची तथा सर्वनाम शब्दों के रूपों के बारे में चर्चा की जाएगी। वाक्य बनाने के लिए सबसे पहले संज्ञा शब्द के साथ वर्तमान काल की क्रिया का प्रयोग करेंगें। इसके आगे तीनों वचनों तथा पुरुषों का, पुनः तीनों लिंगों का प्रयोग करेंगें । इसी प्रकार  क्रमशः भूतकाल एवं भविष्यत् काल का प्रयोग करेंगें। 
संस्कृत भाषा के वाक्य में प्रयुक्त होने वाले पाँचों प्रकार के शब्दों का संक्षिप्त परिचय यहाँ दिया जा रहा है। यह संस्कृत भाषा सीखने का औजार हैं। इनका संग्रह करके ही संस्कृत में वाक्य बनाया जा सकता है। 

(प्रौढ शिक्षार्थी के लिए )

पाठ: संज्ञा और वर्तमान काल की क्रिया (Noun and Present Tense Verbs)

आइए, अब हम संस्कृत व्याकरण के सबसे मुख्य स्तंभ 'संज्ञा' और वाक्यों में उसके प्रयोग को बहुत ही आसान तरीके से सीखते हैं।

1. संज्ञा की परिभाषा (Definition of Noun)

संसार में किसी भी व्यक्ति, वस्तु, स्थान, पशु-पक्षी या नदी आदि के नाम को संज्ञा कहते हैं। 
  • उदाहरण: रामः (राम), हिमालयः (हिमालय), अश्वः (घोड़ा), हरिः (विष्णु/हरि), भानुः (सूर्य), गङ्गा (गंगा नदी), मतिः (बुद्धि) आदि। 

2. संज्ञा और विभक्ति का नियम (The Grammar Rule)

वाक्य बनाते समय संज्ञा शब्दों के लिए मुख्य रूप से निम्नलिखित नियमों का ध्यान रखा जाता है:
  • प्रथमा विभक्ति का प्रयोग: संज्ञा शब्दों का मूल रूप में प्रयोग करने के लिए 'प्रथमा विभक्ति' का प्रयोग किया जाता है।
  • कर्ता क्या है? वाक्य में क्रिया (काम) को करने वाले को कर्ता (Subject) कहते हैं। संस्कृत व्याकरण के नियम के अनुसार 'कर्ता में हमेशा प्रथमा विभक्ति होती है' [6, 7]
  • संज्ञा ही कर्ता है: अधिकांश वाक्यों में क्रिया को करने वाला (कर्ता) कोई न कोई संज्ञावाची शब्द ही होता है।
    • जैसे: रामः पठति (राम पढ़ता है), अश्वः धावति (घोड़ा दौड़ता है), पवनः वहति (हवा बहती है)।

3. संज्ञा शब्द के साथ वर्तमान काल की क्रिया (Examples)

आइए, अब हम देखते हैं कि वर्तमान काल (लट् लकार) की क्रियाओं के साथ संज्ञा शब्दों का प्रयोग कैसे किया जाता है:

(क) व्यावहारिक उदाहरण:

रामः पठति।
  • स्पष्टीकरण: इस वाक्य में 'रामः' कर्ता (संज्ञा) है तथा 'पठति' क्रिया है। चूँकि पढ़ने की क्रिया को राम कर रहा है, अतः राम ही क्रिया को करने वाला यानी 'कर्ता' है। [8]

(ख) कुछ अन्य महत्वपूर्ण उदाहरण:

संज्ञा / कर्ता (Noun)

क्रियापद (Verb)

पूरा वाक्य (Sentence)

हिंदी अर्थ (Meaning)

नदी (नदी)

वहति (बहती है)

नदी वहति।

नदी बहती है।

मृगः (हिरण)

धावति (दौड़ता है)

मृगः धावति।

हिरण दौड़ता है।

खगः (पक्षी)

कूजति (चहकता है)

खगः कूजति।

पक्षी चहकता है।

वायुः (हवा)

वहति (बहती है)

वायुः वहति।

हवा बहती है।

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises)

प्रश्न 1: नीचे दिए गए वाक्यों में से 'कर्ता' (संज्ञा) और 'क्रिया' शब्दों को अलग-अलग करके लिखिए:
1. अश्वः धावति।   कर्ता: .......... | क्रिया: ..........
2. खगः कूजति।     कर्ता: .......... | क्रिया: ..........
3. पवनः वहति।     कर्ता: .......... | क्रिया: ..........
प्रश्न 2: सही क्रियापद चुनकर रिक्त स्थान भरिए:
  1. रामः .................... । (पठति / पठन्ति)
  2. मृगः .................... । (धावतः / धावति)

🔑 उत्तरमाला (Answer Key)

  • प्रश्न 1: (1) कर्ता: अश्वः, क्रिया: धावति | (2) कर्ता: खगः, क्रिया: कूजति | (3) कर्ता: पवनः, क्रिया: वहति।
  • प्रश्न 2: (1) पठति, (2) धावति।

पाठ: सर्वनाम परिचय (Introduction to Pronouns)

प्यारे बच्चो! पिछले पाठ में आपने संज्ञा (नाम) शब्दों को पढ़ा। आइए, अब हम भाषा को और सुंदर तथा सरल बनाने वाले शब्दों, यानी 'सर्वनाम' के बारे में पढ़ते हैं।

1. परिभाषा (Definition)

जो शब्द संज्ञा (नाम) के स्थान पर प्रयोग किए जाते हैं, उन्हें सर्वनाम कहते हैं। बार-बार एक ही नाम न लेना पड़े (जैसे— मोहन पढ़ता है, मोहन खाता है, मोहन सोता है की जगह 'वह पढ़ता है, वह खाता है'), इसलिए हम सर्वनाम का प्रयोग करते हैं।
विशेष नियम: संज्ञा शब्दों की तरह ही सर्वनाम शब्दों में भी 'प्रथमा विभक्ति' और वचनों का प्रयोग किया जाता है।

2. महर्षि पाणिनि के अनुसार सर्वनामों की संख्या

संस्कृत व्याकरण के प्रणेता महर्षि पाणिनि ने अपने ग्रंथ अष्टाध्यायी में एक प्रसिद्ध सूत्र दिया है:
"सर्वादीनि सर्वनामानि" (अष्टाध्यायी - 1.1.27)
  • सूत्र का अर्थ: 'सर्व' शब्द से शुरू होने वाले शब्दों के समूह (गण) को 'सर्वनाम' कहा जाता है।
  • कुल संख्या: इस नियम के अनुसार संस्कृत में सर्वनाम शब्दों के गण (समूह) में कुल 35 शब्द गिने गए हैं।

3. सभी 35 सर्वनाम शब्दों का वर्गीकरण (Classification)

इन 35 सर्वनाम शब्दों को याद रखना बहुत आसान है। बच्चों की सरलता के लिए इन्हें चार प्रमुख भागों में नीचे बाँटा गया है:

(क) सामान्य और भेद बताने वाले सर्वनाम (14 शब्द)

  1. सर्व (सब/All)
  2. विश्व (संसार/सब)
  3. उभ (दोनों)
  4. उभय (दोनों प्रकार के)
  5. डतर (दो में से एक चुनने के लिए प्रत्यय)
  6. डतम (बहुत में से एक चुनने के लिए प्रत्यय)
  7. अन्य (दूसरा)
  8. अन्यतर (दो में से कोई एक)
  9. इतर (दूसरा)
  10. त्वत् (तुम्हारा)
  11. त्व (दूसरा/एक)
  12. नेम (आधा)
  13. सम (समान/बराबर)
  14. सिम (सब/संपूर्ण)

(ख) दिशा और स्थान बताने वाले सर्वनाम (7 शब्द)

  1. पूर्व (पहले का/पूर्व दिशा)
  2. पर (बाद का/दूसरा)
  3. अवर (पीछे का/कम)
  4. दक्षिण (दायाँ/दक्षिण दिशा)
  5. उत्तर (बायाँ/उत्तर दिशा/बाद का)
  6. अपर (दूसरा)
  7. अधर (नीचे का)

(ग) आत्मीयता और बाहरी भेद बताने वाले सर्वनाम (2 शब्द)

  1. स्व (अपना/Oneself)
  2. अन्तर (भीतर का/बाहर का)

(घ) संकेत, व्यक्ति और प्रश्नवाचक सर्वनाम (12 शब्द - सबसे अधिक उपयोगी)

ये वे सर्वनाम हैं जिनका वाक्यों में हम सबसे ज्यादा प्रयोग करते हैं:
24. त्यद् (वह)
25. तद् (वह)
26. यद् (जो)
27. एतद् (यह)
28. इदम् (यह)
29. अदस् (वह/परम)
30. एक (एक - संख्या के रूप में)
31. द्वि (दो - संख्या के रूप में)
32. युष्मद् (तुम/तुम सब)
33. अस्मद् (मैं/हम सब)
34. भवत् (आप - आदर के लिए)
35. किम् (कौन/क्या - प्रश्न पूछने के लिए)

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises)

प्रश्न 1: रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:
  1. 'सर्वादीनि सर्वनामानि' सूत्र के अनुसार सर्वनाम शब्दों की कुल संख्या .................... है। (25 / 35)
  2. सर्वनाम शब्दों का प्रयोग .................... के स्थान पर किया जाता है। (संज्ञा / क्रिया)
प्रश्न 2: निम्नलिखित में से कौन-सा शब्द 'सर्वनाम' समूह के अंतर्गत आता है? (✓ का निशान लगाएँ):
  • (क) रामः
  • (ख) सर्व
  • (ग) बालकः
  • (घ) पठति

🔑 उत्तरमाला (Answer Key)

  • प्रश्न 1: (1) 35, (2) संज्ञा।
  • प्रश्न 2: (ख) सर्व। 

पाठ: विशेषण परिचय (Introduction to Adjectives)

प्यारे बच्चो! पिछले पाठों में आपने संज्ञा (नाम) शब्दों को अच्छी तरह समझा। आइए, अब हम उन शब्दों की विशेषता बताने वाले शब्दों, यानी 'विशेषण' के बारे में पढ़ते हैं।

1. परिभाषा (Definition)

जिस शब्द से किसी विशेष्य (संज्ञा/सर्वनाम शब्द) के गुण, दोष, अवस्था, संख्या तथा परिमाण (नाप-तोल) आदि का बोध होता है, उसे विशेषण कहते हैं।
  • विशेष्य क्या है? विशेषण शब्द जिस संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताता है, उसे विशेष्य कहा जाता है। 

🌟 संस्कृत के कुछ प्रमुख विशेषण शब्द:

  • गुण/दोष बताने वाले: भद्रः (सज्जन/अच्छा), कोमलः (मुलायम), वाचालः (बहुत बोलने वाला), मूर्खः (बेवकूफ)।
  • आकार/अवस्था बताने वाले: लघुः (छोटा), तुङ्गः (ऊँचा), दुर्बलः (कमजोर), धनिकः (अमीर)।
  • दिशा/स्थान बताने वाले: उदीच्यः (उत्तर दिशा का/उत्तरी), दाक्षिणात्यः (दक्षिण दिशा का/दक्षिणी)।
  • संख्या बताने वाले: एकः (एक)।

2. विशेषण और विशेष्य का संबंध (The Golden Rule)

संस्कृत व्याकरण का स्वर्णिम नियम:
विशेष्य (संज्ञा) जिस लिंग, विभक्ति और वचन का होता है; उसका विशेषण भी उसी लिंग, विभक्ति और वचन का होता है। यदि संज्ञा का लिंग बदलेगा, तो विशेषण का रूप भी बदल जाएगा।
आइए, आपके मूल उदाहरणों के माध्यम से इस नियम को बहुत ही सरल तरीके से समझते हैं:

(क) 'सुन्दर' विशेषण का तीनों लिंगों में प्रयोग

  • बालकः सुन्दरः अस्ति। (लड़का सुन्दर है।) — यहाँ 'बालकः' विशेष्य पुल्लिङ्ग है, इसलिए विशेषण भी पुल्लिङ्ग 'सुन्दरः' आया।
  • बालिका सुन्दरी अस्ति। (लड़की सुन्दर है।) — यहाँ 'बालिका' विशेष्य स्त्रीलिङ्ग है, इसलिए विशेषण बदलकर स्त्रीलिङ्ग 'सुन्दरी' हो गया।
  • पुष्पं सुन्दरम् अस्ति। (फूल सुन्दर है।) — यहाँ 'पुष्पम्' विशेष्य नपुंसकलिङ्ग है, इसलिए विशेषण भी नपुंसकलिङ्ग 'सुन्दरम्' आया।

(ख) 'लघु' (छोटा) विशेषण का प्रयोग

  • बालकः लघुः अस्ति। (लड़का छोटा है।) — पुल्लिङ्ग विशेष्य के साथ पुल्लिङ्ग विशेषण 'لघुः'
  • बालिका लघ्वी अस्ति। (लड़की छोटी है।) — स्त्रीलिङ्ग विशेष्य के साथ विशेषण का रूप 'लघ्वी' हो जाता है।

📊 स्पष्टता के लिए कुछ और नए व्यावहारिक उदाहरण (New Examples)

आइए, आपके अभ्यास को और मजबूत करने के लिए कुछ और प्रचलित उदाहरण देखते हैं:

विशेष्य का लिंग

वाक्य उदाहरण (विशेषण + विशेष्य)

हिंदी अर्थ

पुल्लिङ्ग

भद्रः पुरुषः वदति।
दुर्बलः गजः चलति।

अच्छा पुरुष बोलता है।
कमजोर हाथी चलता है।

स्त्रीलिङ्ग

कोमला लता अस्ति।
वाचाला महिला जल्पति।

कोमल बेल है।
बहुत बोलने वाली महिला बकती है।

नपुंसकलिङ्ग

एकम् फलम् पतति।
तुङ्गम् गृहम् दृश्यते।

एक फल गिरता है।
ऊँचा घर दिखाई देता है।

💡 मुख्य बिंदु (Quick Summary)

  • बालकः सुन्दरः में 'बालकः' विशेष्य है तथा 'सुन्दरः' विशेषण है।
  • चूँकि 'सुन्दरः' शब्द बालक की विशेषता बताता है, अतः बालकः (पुल्लिङ्ग, एकवचन) के समान ही 'सुन्दरः' में भी पुल्लिङ्ग एकवचन का प्रयोग हुआ है।

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises)

प्रश्न 1: नीचे दिए गए वाक्यों में से विशेषण और विशेष्य शब्द अलग-अलग करके लिखिए:
  1. धनिकः नरः अस्ति।   → विशेषण: .................... | विशेष्य: ....................
  2. कोमलम् पुष्पम् विकसति। → विशेषण: .................... | विशेष्य: ....................
  3. लघ्वी पिपीलिका चलति। → विशेषण: .................... | विशेष्य: ....................
प्रश्न 2: कोष्ठक में से सही विशेषण शब्द चुनकर रिक्त स्थान भरिए:
  1. .................... सिंहः गर्जति। (दुर्बलः / दुर्बला / दुर्बलम्)
  2. .................... नदी बहति। (तुङ्गः / तुङ्गा)

🔑 उत्तरमाला (Answer Key)

  • प्रश्न 1: (1) विशेषण: धनिकः, विशेष्य: नरः | (2) विशेषण: कोमलम्, विशेष्य: पुष्पम् | (3) विशेषण: लघ्वी, विशेष्य: पिपीलिका।
  • प्रश्न 2: (1) दुर्बलः, (2) तुङ्गा (नदी स्त्रीलिंग है, इसलिए तुङ्गा)।

  पाठ- 3  

क्रिया

जिन शब्दों से किसी काम का करना या होना जाना जाता हैउसे क्रिया कहते हैं। संस्कृत में  इसके लिए धातु शब्द का प्रयोग किया गया है।  
उदाहरण- पठ् (पढ़ना), खाद् (खाना), चल् (चलना), लिख् (लिखना), वद् (बोलना), पा/पिब् (पीना), हस् (हँसना), कूज् (चहकना) आदि।

1. संस्कृत में क्रियापद दो  प्रकार से बनते हैं ।  
(क) धातु से तिङ् प्रत्यय (विभक्ति) लगाकर तिङन्त क्रियापद बनाए जाते हैं। 
जैसे- भव-ति,  भव-तः, भव-न्ति आदि में तिप्, तस् , झि आदि में क्रमशः तिप्, तस्, झि आदि तिङ् प्रत्यय लगे हैं।  पठ्, खाद्, चल्, लिख्, वद्, पा (पिब्), हस्, कूज्, धातुओं के वर्तमान काल (लट् लकार) प्रथम पुरुष एकवचन में इस प्रकार रूप बनता है-  
लट् लकार (वर्तमान काल) - प्रथम पुरुष, एकवचन के उदाहरण:
  • पठ् → पठति
  • चल् → चलति
  • वद् → वदति
  • हस् → हसति
  • खाद् → खादति
  • लिख् → लिखति
  • पा (पिब्) → पिबति
  • कूज् → कूजति
(ख) धातु से कृत् प्रत्यय लगाकर कृदन्त क्रियापद या संज्ञा/विशेषण शब्द बनाते हैं। 
  • उदाहरण: गम् + क्त → गतः (गया)
2. कार्य को करने या होने की स्थिति (समय) को हम मुख्यतः तीन भागों में बांटते हैं। वर्तमान कालभूतकाल और भविष्यत् काल । लकार समय का वाचक है। अतः काल या समय के लिए यहाँ लकार शब्द का भी प्रयोग किया जाता है। 
क. वर्तमान काल (जिस समय कार्य होते रहता है) । इसे लट् लकार कहा जाता है। 
ख. भूत काल (जब कोई काम हो चुका होता है) । इसे लङ् लकार कहा जाता है। 
ग. भविष्यत् काल (जब कोई काम होने वाला हो)। इसे लृट् लकार कहा जाता है।
लट्, लङ्, लृट् आदि में  लकार लगा है अतः इसे लकार भी कहा जाता है।  

पाठ-4: प्रादि या उपसर्ग (Introduction to Prefixes)

क्या आप जानते हैं कि संस्कृत भाषा में कुछ ऐसे जादुई शब्द-खंड (Letter combinations) होते हैं, जो किसी शब्द के आगे जुड़कर उसका पूरा अर्थ ही बदल देते हैं? आइए, आज हम ऐसे ही जादुई तत्वों को सीखते हैं, जिन्हें व्याकरण में 'प्रादि' या 'उपसर्ग' कहा जाता है।

1. परिभाषा (Definition)

जो शब्दांश किसी धातु (क्रिया) या शब्द के आगे (पहले) जुड़कर उसके अर्थ में परिवर्तन या विशेषता ला देते हैं, उन्हें उपसर्ग कहते हैं।
💡 एक मजेदार उदाहरण (An Interesting Example):
संस्कृत में 'हार' शब्द का अर्थ होता है— माला। लेकिन जब इसके आगे अलग-अलग उपसर्ग जुड़ते हैं, तो देखिए कैसे नए-नए अर्थ बनते हैं:
  • प्र + हार = प्रहार (चोट करना)
  • + हार = आहार (भोजन)
  • सम् + हार = संहार (विनाश करना)
  • वि + हार = विहार (घूमना-फिरना)
  • उप + हार = उपहार (गिफ्ट/भेंट)
देखा आपने! एक ही 'हार' शब्द के आगे अलग-अलग उपसर्ग लगने से कितने सारे नए शब्द बन गए!

2. उपसर्गों की संख्या (The 22 Prefixes)

संस्कृत भाषा में कुल बाइस (22) उपसर्ग होते हैं। चूँकि इनकी शुरुआत 'प्र' से होती है, इसलिए इन्हें 'प्रादि' (प्र + आदि यानी प्र से शुरू होने वाले) भी कहा जाता है। इन सभी उपसर्गों के एक से अधिक अर्थ होते हैं।
आइए, इन 22 उपसर्गों को इस सुंदर तालिका के माध्यम से एक साथ याद करते हैं:
1 से 67 से 1213...1718 से 22
प्रनिस्‌निउत्
परानिर्‌अधिअभि
अपदुस्‌अपिप्रति
सम्‌दुर्‌अतिपरि
अनुविसुउप
अवआ (आङ्‌)

3. उपसर्गों का व्यावहारिक प्रयोग

ये उपसर्ग न केवल क्रियाओं (धातुओं) के साथ जुड़ते हैं, बल्कि सुबन्त पदों (संज्ञा, सर्वनाम और विशेषण शब्दों) के साथ भी प्रयुक्त होते हैं।
जब आप अपनी संस्कृत की पुस्तकें पढ़ेंगे, तो आपको बहुत से उपसर्गयुक्त क्रियापद देखने को मिलेंगे; जैसे—
  • विधास्यति (वि + धास्यति = करेगा)
  • आगत्य (आ + गत्य = आकर)
  • निस्सरति (निस् + सरति = निकलता है)
  • प्राप्नोति (प्र + आप्नोति = प्राप्त करता है)
  • प्रतिपाद्यते (प्रति + पाद्यते = निरूपित/साबित किया जाता है)

📌 एक महत्वपूर्ण और पते की बात:

जब आप शब्दकोश (Dictionary) में इन शब्दों का अर्थ ढूँढ़ेंगे, तो आपको सीधे विधास्यति, आगत्य या निस्सरति जैसे शब्द नहीं मिलेंगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मूल धातु के साथ उपसर्ग को जोड़कर असंख्य क्रियावाची शब्द बनते हैं। शब्दकोश में आपको मूल धातु (जैसे— गम्, सृ, धा) के अंतर्गत ही उनके उपसर्ग वाले अर्थ मिलेंगे। इन्हें लगातार अभ्यास के द्वारा बहुत आसानी से सीखा जा सकता है।
(विशेष: हमारे ब्लॉग के एक अलग लेख में इन सभी 22 उपसर्गों के अलग-अलग अर्थों और उदाहरणों के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी दी गयी है, जिसे आप पढ़ सकते हैं।)
💡 एक पते की बात: प्रादि और उपसर्ग में अंतर
महर्षि पाणिनि के नियम 'उपसर्गाः क्रियायोगे' के अनुसार, इन 22 शब्दों (प्र, परा, अप...) को 'उपसर्ग' केवल तब कहा जाता है, जब ये किसी क्रिया (काम बताने वाले शब्द) के आगे जुड़ते हैं; जैसे— प्रति + पाद्यते = प्रतिपाद्यते
यदि ये क्रिया के बिना किसी नाम (संज्ञा) के आगे जुड़ते हैं, तो इन्हें केवल 'प्रादि' कहा जाता है।
  • उदाहरण: उपेन्द्रः (उप + इन्द्रः)। यहाँ 'इन्द्रः' एक नाम (संज्ञा) है, कोई क्रिया नहीं। इसलिए यहाँ 'उप' शब्द उपसर्ग नहीं, बल्कि केवल 'प्रादि' कहलाएगा।

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises)

प्रश्न 1: नीचे दिए गए शब्दों में से उपसर्ग और मूल शब्द को अलग-अलग करके लिखिए:
  1. उपहारः       → उपसर्ग: .................... | मूल शब्द: ....................
  2. निस्सरति    → उपसर्ग: .................... | मूल शब्द: ....................
  3. प्राप्नोति     → उपसर्ग: .................... | मूल शब्द: ....................
प्रश्न 2: रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए:
  1. संस्कृत भाषा में कुल .................... उपसर्ग होते हैं। (12 / 22)
  2. उपसर्ग हमेशा शब्द या धातु के .................... जुड़ते हैं। (पहले / बाद में)

🔑 उत्तरमाला (Answer Key)

  • प्रश्न 1: (1) उपसर्ग: उप, मूल शब्द: हारः | (2) उपसर्ग: निस्, मूल शब्द: सरति | (3) उपसर्ग: प्र, मूल शब्द: आप्नोति।
  • प्रश्न 2: (1) 22, (2) पहले।
🧠 विशेष ज्ञान (Advanced Grammar Knowledge)
संस्कृत के क्रियावाची शब्दों (Verb Forms) को अच्छी तरह समझने के लिए उपसर्गों को जानना अत्यंत महत्वपूर्ण है। आइए, उपसर्गों के जुड़ने से क्रियाओं में होने वाले कुछ बड़े और जादुई बदलावों को समझते हैं:
  1. अर्थ में परिवर्तन: मूल क्रिया (धातु) के साथ जब कोई उपसर्ग जुड़ता है, तो वह धातु के मूल अर्थ को पूरी तरह बदल देता है। इस प्रकार, उपसर्गों के मेल से संस्कृत में अनन्त (असंख्य) प्रकार की क्रियाएँ बनती हैं।
  2. पद का परिवर्तन (परस्मैपद से आत्मनेपद): संस्कृत में धातुएँ मुख्य रूप से दो प्रकार से चलती हैं— परस्मैपद (जैसे— पठति) और आत्मनेपद (जैसे— सेवते)। कुछ धातुएँ मूल रूप में परस्मैपद की होती हैं, लेकिन उनके आगे विशेष उपसर्ग जुड़ते ही वे आत्मनेपद में बदल जाती हैं। इसी प्रकार कुछ आत्मनेपद की धातुएँ परस्मैपद में बदल जाती हैं। 
🌟 आइए, इसे एक सुंदर उदाहरण से समझें:
'क्रीड्' (खेलना) मूल रूप से परस्मैपद की धातु है। इसके रूप इस प्रकार चलते हैं:
  • क्रीडति, क्रीडतः, क्रीडन्ति (एक खेलता है, दो खेलते हैं, सब खेलते हैं)।
परन्तु, जब इसी 'क्रीड्' धातु के पहले अनु, परि तथा उपसर्ग जुड़ जाते हैं, तो यह जादुई रूप से आत्मनेपद की धातु बन जाती है! तब इसके रूप इस प्रकार बनते हैं:
  • अनु + क्रीड्  अनुक्रीडते (पीछे खेलता है / नक़ल करता है)
  • परि + क्रीड्  परिक्रीडते (चारों ओर खेलता है)
  • आ + क्रीड्  आक्रीडते (क्रीड़ा या खेल करता है)

पाठ-4 (ख): अव्यय परिचय (Introduction to Invariable Words)

उपसर्गों को समझने के बाद आइए अब हम संस्कृत व्याकरण के एक और बहुत ही महत्वपूर्ण और अनोखे शब्द-भेद को सीखते हैं, जिसे 'अव्यय' कहा जाता है।

1. परिभाषा (Definition)

संस्कृत में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जिनका स्वरूप हमेशा एक ही जैसा बना रहता है। अर्थात् जिन शब्दों का सभी वचनों, लिंगों, पुरुषों और विभक्तियों में कोई भी परिवर्तन (बदलाव) नहीं होता है, उन्हें अव्यय कहते हैं। 
💡 समझने के लिए आसान मंत्र:
व्यय का अर्थ होता है— बदलना या खर्च होना, और अव्यय का अर्थ होता है— जिसमें कोई बदलाव न हो। ये शब्द हमेशा सदाबहार होते हैं!
चाहे कर्ता लड़का हो या लड़की, एकवचन हो या बहुवचन, अव्यय शब्द हर परिस्थिति में जैसे के तैसे ही रहते हैं।

2. प्रमुख अव्ययवाची शब्द और उनके अर्थ (अव्यय तालिका)

सबसे अधिक प्रयोग होने वाले प्रमुख अव्यय शब्द और उनके हिन्दी अर्थ नीचे तालिका में दिए गए हैं। इन्हें आप बहुत आसानी से याद रख सकते हैं:
अव्यय शब्द (Sanskrit) हिन्दी अर्थ (Hindi Meaning)अव्यय शब्द (Sanskrit)हिन्दी अर्थ (Hindi Meaning)
अत्रयहाँसर्वत्रसब जगह
तत्रवहाँएकदाएक बार
कुत्रकहाँअद्यआज
यत्रजहाँश्वःआने वाला कल (Tomorrow)
सर्वत्रसब जगहह्यःबीता हुआ कल (Yesterday)
यदाजबकदाकब
तदातबऔर
अपिभीकिम् / किंक्या
शीघ्रम्जल्दी / तेज़शनैःधीरे
उच्चैःऊँचा / ज़ोर सेनीचैःनीचे / धीमे
आम्हाँनहीं / मत

3. वाक्यों में व्यावहारिक प्रयोग (Examples)

आइए देखते हैं कि ये शब्द वाक्यों में बिना बदले कैसे प्रयोग होते हैं:
  • बालकः अत्र पठति। (लड़का यहाँ पढ़ता है।)
  • बालिका अत्र पठति। (लड़की यहाँ पढ़ती है।)
  • ध्यान दें: यहाँ 'बालकः' (पुल्लिंग) से 'बालिका' (स्त्रीलिंग) बदलने पर भी 'अत्र' शब्द में कोई बदलाव नहीं आया।
  • गजः शनैः चलति। (हाथी धीरे चलता है।)
  • कच्छपः शनैः चलति। (कछुआ धीरे चलता है।)

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises)

प्रश्न 1: कोष्ठक में से उचित अव्यय शब्द चुनकर रिक्त स्थान भरिए:
  1. ईश्वरः .................... अस्ति। (तत्र / सर्वत्र) (संकेत: ईश्वर सब जगह है)
  2. सः .................... गच्छति? (कुत्र / यदा) (संकेत: वह कहाँ जाता है?)
  3. कच्छपः .................... चलति। (उच्चैः / शनैः) (संकेत: कछुआ चलता है।)
प्रश्न 2: सत्य या असत्य (True or False) बताइए:
  1. अव्यय शब्द कर्ता का लिंग बदलने पर बदल जाते हैं। (सत्य / असत्य)
  2. 'च' एक अव्यय शब्द है जिसका अर्थ 'और' होता है। (सत्य / असत्य) 


🔑 उत्तरमाला (Answer Key)

  • प्रश्न 1: (1) सर्वत्र, (2) कुत्र, (3) शनैः।
  • प्रश्न 2: (1) असत्य (अव्यय कभी नहीं बदलते), (2) सत्य।

अबतक पढ़े गए पाठ का सारांश (Summary of the Lessons Covered So Far)
आइए, अब तक हमने जो कुछ भी सीखा है, उसका एक बार जल्दी से दोहराव (Revision) कर लेते हैं और यह भी जानते हैं कि आगे हम क्या सीखने वाले हैं।

📌 अब तक हमने क्या सीखा?

  • अब तक के पाठों में आपने संस्कृत के शब्दों और उनके पाँच प्रमुख भेदों (संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया और अव्यय) का संक्षिप्त परिचय प्राप्त किया।
  • आपने जाना कि संज्ञा आदि शब्दों के अपने पुरुष, वचन तथा लिंग होते हैं, जिनके बारे में हम आगे के पाठों में एक-एक करके विस्तार से पढ़ेंगे।
  • अव्यय शब्दों को छोड़कर शेष सभी प्रकार के शब्द 'विकारी' (बदलने वाले) होते हैं। इसका अर्थ यह है कि कर्ता, लिंग या वचन बदलने पर इनके मूल रूप में परिवर्तन (विकार) आ जाता है।

🎯 आगे का मार्ग (Our Next Goal)

जब तक आप संस्कृत शब्दों के सभी रूपों (शब्दरूपों) और उनमें लगने वाली विभक्तियों को ठीक से नहीं समझ लेते, तब तक आपको संस्कृत में वाक्यों का निर्माण करने और लिखी हुई संस्कृत का सही अर्थ निकालने में थोड़ी कठिनाई आ सकती है।
इसलिए, आगे के पाठों में हम आपको उदाहरणों के माध्यम से सभी प्रकार के शब्दों के रूपों से परिचित कराएंगे। इन्हें सीखने के बाद आप शब्दकोश (Dictionary) और संस्कृत की पुस्तकों में आने वाले अन्य नए शब्दों के रूप भी खुद-ब-खुद बनाना सीख जाएँगे।


📚 शब्दों का अर्थ जानने के साधन (How to Know the Meaning of Words)

क्या आपने कभी सोचा है कि किसी भी नए शब्द का असली अर्थ हमें कैसे पता चलता है? संस्कृत साहित्य के महान आचार्य जगदीश जी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक 'शब्दशक्ति-प्रकाशिका' में शब्दों का अर्थ जानने के आठ (8) प्रमुख साधन बताए हैं। उन्होंने इसके लिए यह सुंदर श्लोक लिखा है:
शक्तिग्रहं व्याकरणोपमान-कोशाप्तवाक्याद् व्यवहारतश्च।
वाक्यस्य शेषाद् विवृतेर्वदन्ति सान्निध्यतः सिद्धपदस्य वृद्धाः॥
सरल शब्दों में, किसी शब्द का अर्थ हम इन 8 तरीकों से सीख सकते हैं:
  1. व्याकरण: नियमों और संधियों को समझकर।
  2. उपमान: किसी दूसरी जानी-पहचानी वस्तु से तुलना करके।
  3. कोश: शब्दकोश या डिक्शनरी की मदद से।
  4. आप्तवाक्य: ज्ञानी पुरुषों, ऋषियों या गुरुओं के वचनों द्वारा।
  5. व्यवहार: लोगों को आपस में बातचीत और व्यवहार करते हुए देखकर।
  6. वाक्यशेष (प्रकरण): पूरे वाक्य या प्रसंग को देखकर अर्थ का अंदाजा लगाना।
  7. विवृति: किसी विद्वान द्वारा की गई व्याख्या या विवरण को पढ़कर।
  8. प्रसिद्ध पद का सान्निध्य: किसी जाने-पहचाने शब्द के पास होने से अनजान शब्द का अर्थ समझना।
💡 हमारे इस ब्लॉग/पुस्तक की विशेषता:
मेरे द्वारा लिखे गए इन पाठों में आपको मुख्य रूप से 1. व्याकरण, 2. कोश (शब्दकोश) और 3. व्यवहार (व्यावहारिक वाक्यों) के माध्यम से बहुत ही आसान तरीके से संस्कृत सिखाई जा रही है।


🧠 महाभारत का संदेश: बुद्धि के गुण

महाभारत के वनपर्व (2-16) में भी विद्वानों ने शब्दों के सही अर्थ को समझने और ज्ञान प्राप्त करने के लिए बुद्धि के कुछ विशेष गुणों की चर्चा की है:
शुश्रूषा श्रवणं चैव ग्रहणं धारणं तथा।
ऊहापोहोऽर्थविज्ञानं तत्त्वज्ञानं च धीगुणाः॥
इसका अर्थ यह है कि यदि आप किसी भाषा या ज्ञान को गहराई से सीखना चाहते हैं, तो आपकी बुद्धि में ये गुण होने चाहिए:
  • शुश्रूषा: विद्वानों और गुरुओं की सेवा करना तथा सीखने की इच्छा रखना।
  • श्रवणं: ध्यान से बातों को सुनना।
  • ग्रहणम्: सुनी हुई बात को अच्छी तरह समझना।
  • धारणं: सीखे हुए ज्ञान को मन में याद रखना (भूलना नहीं)।
  • ऊहापोह (तर्क-वितर्क): सही और गलत का विचार करना।
  • अर्थविज्ञानं: शब्दों के गहरे अर्थ को जानना।
  • तत्त्वज्ञानं: सत्य या वास्तविक ज्ञान को प्राप्त करना।
अब आप समझ चुके होंगे कि संस्कृत भाषा को अच्छी तरह सीखने के लिए इन पाठों को पढ़ने के साथ-साथ आपको ध्यान से सुनने, उसे याद रखने और गुरुओं के मार्गदर्शन की भी कितनी आवश्यकता है।
                                                

 पाठ- 5


पाठ-5: वचन परिचय (Introduction to Number)

प्यारे बच्चो! अभी तक हमने संस्कृत के शब्दों और उनके भेदों को समझा। आइए, अब हम संस्कृत व्याकरण के एक और बेहद महत्वपूर्ण स्तंभ को सीखते हैं, जिसे 'वचन' (Number) कहा जाता है।
वचन हमें यह बताता है कि हम जिस व्यक्ति या वस्तु की बात कर रहे हैं, वह संख्या में कितनी है। हिंदी और अंग्रेजी में केवल दो वचन होते हैं, लेकिन संस्कृत भाषा में तीन वचन होते हैं: 
  1. एकवचन (Singular Number)
  2. द्विवचन (Dual Number)
  3. बहुवचन (Plural Number)


1. वचनों की परिभाषा और उदाहरण

(क) एकवचन (Singular Number)

जिस शब्द से किसी एक व्यक्ति या वस्तु का ज्ञान (बोध) होता है, उसे एकवचन कहते हैं; जैसे— बालकः (एक लड़का)।

(ख) द्विवचन (Dual Number)

जिस शब्द से किन्हीं दो व्यक्तियों या वस्तुओं का ज्ञान (बोध) होता है, उसे द्विवचन कहते हैं; जैसे— बालकौ (दो लड़के)। 

(ग) बहुवचन (Plural Number)

जिस शब्द से दो से अधिक (तीन या तीन से अधिक) व्यक्तियों या वस्तुओं का ज्ञान (बोध) होता है, उसे बहुवचन कहते हैं; जैसे— बालकाः (सब लड़के)। 


2. अकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दों का नियम (The Secret Rule)

आइए, अब एक बहुत ही जरूरी और पते की बात सीखते हैं। बालक शब्द का सबसे अंतिम अक्षर 'अ' है। जब हम इसका वर्ण-विच्छेद करते हैं, तो यह इस प्रकार दिखता है:
  • ब् + आ + ल् + अ + क् + अ = बालक
चूँकि इस शब्द के अंत में 'अ' आता है और यह पुरुष जाति का बोध कराता है, इसलिए इसे 'अकारान्त पुल्लिङ्ग' शब्द कहा जाता है। बालक शब्द का तीनों वचनों में इस प्रकार रूप बनता है: 
एकवचनद्विवचनबहुवचन
बालकःबालकौबालकाः
👉 याद रखें: संस्कृत में शब्द का रूप हमेशा उसके अंतिम वर्ण (अक्षर) और उसके लिंग के आधार पर बनता है।
अतएव, 'अ' वर्ण जिस किसी भी पुल्लिङ्ग शब्द के अंत में होगा, उन सभी के रूप बिल्कुल 'बालक' शब्द की तरह ही चलेंगे!


🌟 बालक की तरह चलने वाले अन्य अकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द:

ओष्ठ (होंठ), कपोत (कबूतर), मयूर (मोर), ऐरावत (हाथी), काल (समय), कुक्कुर (कुत्ता), केश (बाल), दूत (संदेशवाहक), दीपक (दीया), नृप (राजा), मेघ (बादल), पाठक (पढ़ने वाला), निर्धन (गरीब), रक्षक (रखवाला), सैनिक (सिपाही), सहोदर (सगा भाई), हंस (हंस पक्षी), कृषक (किसान), अपूप (पुआ/मालपुआ), सप्ताह (हफ्ता), श्लोक (मंत्र/कविता), श्वसुर (ससुर), नर (मनुष), छात्र (विद्यार्थी) आदि।


3. वाक्यों और शब्दों में व्यावहारिक उदाहरण

आइए, ऊपर दी गई सूची में से कुछ शब्दों के तीनों वचनों के रूपों को इस सुंदर तालिका के माध्यम से समझते हैं:
मूल शब्द एकवचन (1)द्विवचन (2)बहुवचन (3+)हिन्दी अर्थ
बालकबालकःबालकौबालकाःएक लड़का | दो लड़के | सब लड़के
कपोतकपोतःकपोतौकपोताःएक कबूतर | दो कबूतर | सब कबूतर
ऐरावतऐरावतःऐरावतौऐरावताःएक ऐरावत | दो ऐरावत | सब ऐरावत

✍️ वचन का अभ्यास (Exercises)

प्रश्न 1: नीचे दिए गए मूल शब्दों के एकवचन, द्विवचन तथा बहुवचन रूप अपनी पुस्तिका में लिखिए और उनके शब्दरूपों का बोल-बोलकर शुद्ध उच्चारण कीजिए:
  1. कपोल (गाल)  एकवचन: ............. | द्विवचन: ............. | बहुवचन: .............
  2. मयूर (मोर)  एकवचन: ............. | द्विवचन: ............. | बहुवचन: .............
  3. काल (समय)  एकवचन: ............. | द्विवचन: ............. | बहुवचन:.............
  4. निर्धन (गरीब)  एकवचन: ............. | द्विवचन: ............. | बहुवचन: ..............
  5. रक्षक (रखवाला)  एकवचन:............ | द्विवचन: ............. | बहुवचन: .............
  6. सैनिक (सिपाही)  एकवचन: ............. | द्विवचन: .............| बहुवचन: .............

🔑 उत्तरमाला (Answer Key - केवल जाँच के लिए)

  • कपोल: कपोलः, कपोलौ, कपोलाः
  • मयूर: मयूरः, मयूरौ, मयूराः
  • काल: कालः, कालौ, कालाः
  • निर्धन: निर्धनः, निर्धनौ, निर्धनाः
  • रक्षक: रक्षकः, रक्षकौ, रक्षकाः
  • सैनिक: सैनिकः, सैनिकौ, सैनिकाः

🧠 विशेष ज्ञान: वचन के नियम और अपवाद (Advanced Knowledge & Exceptions)
अब तक हमने वचन के सामान्य नियमों को सीखा। आइए, अब हम संस्कृत व्याकरण के कुछ बहुत ही महत्वपूर्ण नियमों और उनके अपवादों (Exceptions) को जानते हैं, जो आपकी भाषा को और भी शुद्ध बनाएंगे:

1. जब वचन का निर्णय न हो पाए (The Default Rule)

संस्कृत व्याकरण का एक बहुत ही प्रसिद्ध नियम है:
"एकवचनं त्वौत्सर्गिकं बहुवचनं चार्थबहुत्वापेक्ष्यम्"
  • इसका सरल अर्थ यह है: जहाँ पर किसी बात या वस्तु के वचन का निर्णय (Fianl Decision) आसानी से न हो सके कि वह एक है या अनेक, वहाँ हमेशा डिफ़ॉल्ट (Default) रूप से एकवचन का ही प्रयोग करना चाहिए। बहुवचन का प्रयोग केवल तभी किया जाता है जब बहुत सारी वस्तुओं का होना पूरी तरह स्पष्ट और निश्चित हो।

2. सामान्य नियम का अपवाद (Always Plural Words)

संस्कृत में कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो हमेशा एक निश्चित वचन में ही रहते हैं, चाहे परिस्थिति कुछ भी हो। आइए, ऐसे शब्दों को देखें जो हमेशा बहुवचन (Always Plural) में ही प्रयोग किए जाते हैं:
(क) पुल्लिङ्ग शब्द (Always Plural Masculine Words):
  • दार (पत्नी / Wife)
  • अक्षत (पूजा के चावल)
  • लाज (खील / धान का लावा)
  • विशेष: यदि हमें कहना हो "एक पत्नी" या "पूजा के चावल", तो भी संस्कृत में इनके लिए हमेशा बहुवचन रूप (जैसे— दाराः, अक्षताः) का ही प्रयोग होगा।
(ख) स्त्रीलिङ्ग शब्द (Always Plural Feminine Words):
नीचे दिए गए स्त्रीलिङ्ग शब्द भी हमेशा बहुवचन में ही प्रयुक्त होते हैं:
  • अप् (जल / Water)
  • सुमनस् (फूल / Flower)
  • वर्षा (बरसात / Rain)
  • सिकता (रेत / Sand)
  • विशेष: पानी भले ही एक गिलास हो या पूरी नदी, 'अप्' शब्द का रूप हमेशा बहुवचन (आपः) में ही चलेगा।

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises)

प्रश्न: सत्य या असत्य (True or False) बताइए:
  1. जहाँ वचन का निर्णय न हो पाए, वहाँ हमेशा बहुवचन का प्रयोग करना चाहिए। (सत्य / असत्य)
  2. संस्कृत में 'दार' (पत्नी) शब्द हमेशा बहुवचन में प्रयोग किया जाता है। (सत्य / असत्य)
  3. 'वर्षा' शब्द का प्रयोग केवल एकवचन में होता है। (सत्य / असत्य) 

🔑 उत्तरमाला (Answer Key)

  1. असत्य (वहाँ हमेशा एकवचन का प्रयोग होता है)।
  2. सत्य
  3. असत्य ('वर्षा' सदा बहुवचन शब्द है)। 

 पाठ- 6      

 पुरुष
पुरुष तीन होते हैं- 1. प्रथम पुरुष 2. मध्यम पुरुष तथा 3. उत्तम पुरुष
अभी हमलोग बालक, सुरेश, गज, खग आदि प्रथम पुरुष के शब्दों का अभ्यास कर रहे थे। 
खेलति, खेलतः, खेलन्ति । अस्ति, स्तः, सन्ति प्रथम पुरुष की क्रिया है। 
👉याद रखें-  युष्मद् (तुम) शब्द तथा अस्मद् (मैं) को छोड़ कर शेष सभी शब्दों के लिए प्रथम पुरुष का प्रयोग होता है। 

 👉 मध्यम पुरुष में युष्मद् (तुम) शब्द का प्रयोग होता है। 
👉 उत्तम पुरुष में अस्मद् (मैं) शब्द का प्रयोग होता है।
विशेष बात -
शिष्टाचार दिखाने या सम्मान प्रकट करने के लिए युष्मद् शब्द (तुम) के स्थान पर संस्कृत में भवत् (आप) शब्द का प्रयोग होता है। प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों में अस्मद् (मैं) युष्मद् (तुम) तथा भवत् (आप) शब्द का रूप इस प्रकार है। इसके ठीक सामने क्रिया दिखायी जा रही है ।

कर्ता                                            

                एकवचन     द्विवचन    बहुवचन      

भवत् (आप) भवान्    भवन्तौ     भवन्तः    प्रथम पुरुष

युष्मद् (तुम) त्वम्        युवाम्       यूयम्       मध्यम पुरुष

अस्मद् (मैं) अहम्      आवाम्      वयम्      उत्तम पुरुष

क्रिया                                         पुरुष

एकवचन   द्विवचन    बहुवचन

पठति        पठतः        पठन्ति      प्रथम पुरुष

पठसि       पठथः         पठथ        मध्यम पुरुष

पठामि      पठावः        पठामः      उत्तम पुरुष   
 

इस तरह अबतक आपने जाना कि –

v  बालकः, सुरेशः, गजः, खगः, पर्वतः, वृक्षः, कर्गदः. ग्रन्थः, भवत् आदि प्रथम पुरुष के शब्द हैं।

v  युष्मद् (तुम) मध्यम पुरुष का शब्द है।

v  अस्मद् (मैं) उत्तम पुरुष का शब्द है।

v  पठति, पठतः, पठन्ति प्रथम पुरुष की क्रिया है।

v  पठसि, पठथः, पठथ मध्यम पुरुष की क्रिया है।

v  पठामि, पठावः, पठामः उत्तम पुरुष की क्रिया है।

v  युष्मद् (तुम) शब्द तथा अस्मद् (मैं) को छोड़ कर शेष सभी शब्दों के लिए प्रथम पुरुष का प्रयोग होता है।

 अकारान्त पुल्लिंग शब्द, युष्मद् (तुम) शब्द तथा अस्मद् (मैं)  के तीनों पुरुष एवं वचन तथा प्रथमा विभक्ति को पहचान चुके हैं। यह भी देख चुके हैं कि कर्ता जिस वचन तथा पुरुष का होता है, क्रिया भी उसी वचन तथा पुरुष की होगी। इस आधार पर अलग- अलग क्रिया पदों के साथ वाक्य बनाना सीखिये।

क्रिया का अभ्यास

जिस शब्द से किसी कार्य के होने या किए जाने का बोध होता है, वह क्रिया शब्द कहलाता है। जैसे- पढ़ना, लिखना, चलना, हँसना आदि क्रिया है। संस्कृत में क्रिया के मूलरूप को धातु कहते हैं। जैसे- 'पठ्' (पढ़ना), लिख् (लिखना), 'खाद्' (खाना) 'धाव्' (दौ़ड़ना) 'वस्' (रहना) 'कथ्' (कहना) आदि धातु हैं और पठति (पढ़ता है), लिखति (लिखता है), खादति (खाता है), खेल् (खेलता है) धातुओं से बने रूप हैं। इसके तीनों वचनों में इस तरह का रूप बनता है-

            एकवचन     द्विवचन     बहुवचन
खेल् - खेलति         खेलतः        खेलन्ति
खाद् - खादति        खादतः        खादन्ति
रक्ष् -  रक्षति            रक्षतः        रक्षन्ति 
धाव् -  धावति          धावतः        धावन्ति 
वस् -  वसति          वसतः        वसन्ति 
अब हम कर्ताक्रिया और वचन को जोड़कर वाक्य बनाने के अभ्यास करेंगें। किसी कार्य को करने वाले को कर्ता कहा जाता है। यहाँ बालक कर्ता है, क्योंकि वह खेलति जैसे कार्य को कर रहा है। कर्ता में जो वचन होगा, वही वचन क्रिया में भी होगा। बालकः में एकवचन है अतः खेलति क्रिया भी एकवचन की है । इसी प्रकार द्विवचन के साथ द्विवचन की क्रिया तथा बहुवचन कर्ता के लिए बहुवचन की क्रिया होगी। सरल अभ्यास के लिए अधोलिखित वाक्य को देेंखें-
         एकवचन     द्विवचन         बहुवचन
कर्ता-   बालकः        बालकौ        बालकाः
क्रिया - खेलति         खेलतः        खेलन्ति 
क्रिया - अस्ति         स्तः              सन्ति
👉 वाक्य इस तरह बनेगा -  
बालकः खेलति ।
बालकौ खेलतः । 
बालकाः खेलन्ति । 
छात्रः अस्ति ।
छात्रौ स्तः । 
छात्राः सन्ति । 
इसी तरह कर्ताछात्र और क्रिया पठ् में एकवचन का वाक्य बनाने पर छात्रः पठति बनेगा।  बालक शब्द के अंत में अ है। जिस शब्द के अंत में अ अक्षर होता है, उसे अकारान्त शब्द कहते हैं। सभी अकारान्त शब्द बालक की तरह बनेंगें। जैसे- वीरः, वीरौ, वीराःदीपः, दीपौ, दीपाःकृषकः, कृषकौ, कृषकाः आदि। 
खेलति क्रिया शब्द की तरह ही वर्तमान काल के प्रथम पुरुष में  -
खाद् से खादति खादतः खादन्ति। 
लिख् से लिखति लिखतः लिखन्ति। 
अट् = (घूमना) से अटति, अटतः, अटन्ति आदि क्रिया के शब्द बनते हैं। 
इसी प्रकार पत् = गिरना, व्रज् = जाना, कूज् = चहकना, चर् = चरना, ज्वल् = जलना, खाद् = खाना, रक्ष् = रक्षा करना आदि का रूप बना लें।
अभ्यास

अब आप निम्नलिखित संज्ञा शब्दों के साथ क्रमशः सभी वचन की क्रिया को जोड़कर वाक्य बनायें।

संज्ञा शब्द- खग, बालक,  सेवक, गज,  रमेश, सुरेश, अध्यापक, उपग्रह, अश्व, अमात्य, कृषक।

क्रिया शब्द-  खेल्, कूज्,  हस्, धाव्, क्रीड्, पूज्, सेव्, क्रीड, चल्, पच्, दह् ,वद्, नम्, वह् ।

एक उदाहरण - खगः कूजति ।  खगौ कूजतः । खगाः कूजन्ति ।

कोष्ठक में दिए गए संज्ञा तथा क्रिया शब्दों का  वचन लिखें । जैसे- मकरौ = द्विवचन ।

नरः हसति । मालाकारौ गच्छतः । मालाकाराः गच्छन्ति । मकरौ खादतः । नृपाः रक्षन्ति ।

मालाकारः गच्छति । मकराः खादन्ति । मकरः खादति । कपोतौ पश्यतः । नृपः रक्षति। कपोताः पश्यन्ति । कुक्कुरः धावति । नरौ हसतः। छात्रः नमति । कपोतः पश्यति ।

नृपौ रक्षतः। वृक्षौ फलतः । वृक्षाः फलन्ति। शुकः कूजति । मृगौ धावतः । गजाः चलन्ति।

सर्वनाम
त्यद्, तद्, यद्एतद्इदम्अदस्एकद्वियुष्मद्अस्मद्भवत्किम् (12) इन सर्वनाम को त्यादादि सर्वनाम भी कहा जाता है, क्योकि इसके आदि (आरम्भ) में त्यद् शब्द आया है। वाक्यों में इन सर्वनाम का अधिक प्रयोग होता है। इनके तीनों लिंगों में रूप होते हैं। 
उदाहरण - जगदानन्दः खेलति । इस वाक्य में जगदानन्दः कर्ता (संज्ञा)  है तथा खेलति क्रिया है। इसमें कर्ता के लिए तद् सर्वनाम के सः (वह) का प्रयोग किया जाता है । वाक्य इस तरह बनेगा- सः जगदानन्दः खेलति। एकः सिंहः अस्ति। इसके बाद के वाक्य में सिंहः के स्थान पर सः सर्वनाम का प्रयोग होता है। जैसे- सः अशक्तः आसीत् । 
संज्ञा पद (नाम पद) के स्थान पर सर्वनाम शब्द का प्रयोग करके वाक्य बनायें-
शृगालः पशुः अस्ति ।  .... बहिः गच्छति।
लिंग-
संस्कृत में तीन लिङ्ग होते हैं- पुल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग तथा नपुंसकलिङ्ग । जिससे पुरुष शब्द का बोध होता हैउसे पुल्लिंग कहते है। जिससे स्त्री शब्द का बोध होता हैउसे स्त्रीलिंग तथा जिससे नपुंसक का बोध होता है. उसे नपुंसक लिंग कहते हैं।
1.पुल्लिंग    जैसे- बालकहरिभानुपितृलिह्सः आदि
2.स्त्रीलिंग      जैसे-  बालिकागौरीउज्जयिनीश्रीसा आदि
3.नपुंसकलिंग  जैसे- ज्ञानअक्षरअंगमौन,दधिधातृतत् आदि

विशेषः- संस्कृत में शब्दों का लिंग होता है । वस्तु के आधार पर लिंग नहीं होता है। जैसे- स्त्री का पर्यायवाची दार शब्द पुल्लिंग है। पुंसक लिंग में प्रयुक्त शरीर का पर्याय तनु शब्द स्त्रीलिंग है। एक ही वस्तु के लिए पुल्लिंगस्त्रीलिंगनपुंसक लिंग के शब्द का प्रयोग किया जाता है। 

    जैसे-जैसे आप शब्दकोश का प्रयोगसंस्कृत की पुस्तकों का अध्ययनवाक्यों का प्रयोग तथा शब्दों के प्रकृति तथा प्रत्यय से परिचित होते जाते हैंवैसे शब्दों के लिंग को जानना आसान हो जाता है।

 अधिक जानकारी के लिए लिंगानुशासन पर चटका लगायें।

बालिका शब्द (स्त्रीलिंग) –एकवचन  द्विवचन  बहुवचन

                  बालिका  बालिके  बालिकाः

 
स्त्रीलिंग बालिका शब्द का वाक्य में प्रयोग -

बालिका हसति । बालिके हसतः । बालिकाः हसन्ति । बालिका नृत्यति । बालिके नृत्यतः । बालिकाः नृत्यन्ति ।

👉 इसी तरह मक्षिका, राधिका, पिपीलिका, वृद्धा, गङ्गा, यमुना आदि आकारान्त स्त्रीलिंग शब्द से वाक्य बनायें-

नदी शब्द (स्त्रीलिंग) –  एकवचन  द्विवचन  बहुवचन

                 नदी        नद्यौ         नद्यः

स्त्रीलिंग नदी शब्द का वाक्य में प्रयोग -
नदी वहति । नद्यौ धावतः । नद्याः धावन्ति । शशी उदयति । मही चलति ।  मृग्यः चरन्ति । काकल्यौ कूजतः।
👉 इसी तरह गोपी, भगिनी, मोहिनी, वाणी, रूपवती, काकली, काली, गृहिणी, गौरी, जगती, जननी, तन्त्री, देवी, लक्ष्मी, नागरी, नटी, नारी, पत्नी, पृथ्वी, पार्वती, युवती, राज्ञी, गार्गी, त्रिलोकी, रात्री, भवानी, शैली, श्री, सखी, स्त्री, सती आदि ईकारान्त स्त्रीलिंग शब्द से वाक्य बनायें-
अब तक आप संस्कृत भाषा के वाक्य में आने वाले अवयव (पद या शब्द) संज्ञा , सर्वनाम, विशेषण, क्रिया तथा अव्यय से परिचित हो चुके हैं। अब इसे इस तरह समझते हैं-
  • संज्ञा तथा सर्वनाम विशेषण का लिंग, वचन तथा पुरुष होता है।
  • अव्यय का  वचन तथा पुरुष नहीं होता है।
  • क्रिया वचन तथा पुरुष होता है। 

संज्ञा के साथ क्रिया का प्रयोग

वेदः पठति। गजः गच्छति। मोहनः रोदति। वानरौ कूर्दतः। मयूराः नृत्यन्ति।  रामलक्ष्मणौ पठतः ।  रामश्यामौ गच्छतः ।  रामः वदति । मानवौ लिखतः। पतयः वसन्ति। शशकः कूर्दन्ति । बृकः चरति।


ऊपर के वाक्यों में हमने देखा कि
संज्ञा के साथ  गच्छ, रोद, कूर्द, हस, पिब, चर आदि प्रथम पुरुष के क्रिया शब्द  का प्रयोग कर वाक्य बनाया गया हैं।

सर्वनाम के साथ क्रिया का प्रयोग (Use of Verbs with Pronouns)

पिछले पाठों में आपने सर्वनाम शब्दों (त्वम्, अहम्, भवान् आदि) और क्रिया के पुरुषों (प्रथम, मध्यम, उत्तम) को अलग-अलग समझा। आइए, अब देखते हैं कि वाक्यों में इनका एक साथ प्रयोग कैसे किया जाता है।

याद रखने योग्य स्वर्णिम नियम (Golden Rule):

·     मध्यम पुरुष की क्रिया केवल 'युष्मद्' (त्वम्, युवाम्, यूयम्) सर्वनाम के साथ आती है।

·     उत्तम पुरुष की क्रिया केवल 'अस्मद्' (अहम्, आवाम्, वयं) सर्वनाम के साथ आती है।

·     इन दोनों को छोड़कर बाकी संसार के सभी सर्वनाम (जैसे—भवान्, तद्, एतद्) प्रथम पुरुष के अंतर्गत आते हैं।

1. मध्यम पुरुष और उत्तम पुरुष के व्यावहारिक वाक्य

आइए, नीचे दी गई तालिका के माध्यम से समझें कि कर्ता (सर्वनाम) के वचन के अनुसार क्रिया कैसे बदलती है:

पुरुष (Person)

एकवचन (Singular)

द्विवचन (Dual)

बहुवचन (Plural)

मध्यम पुरुष (तुम/Listening)

त्वं नृत्यसि।

(तुम नाचते हो।)

युवां हसथः।

(तुम दोनों हँसते हो।)

यूयं पिबथ।

(तुम सब पीते हो।)

उत्तम पुरुष (मैं)

अहं इच्छामि। (मैं चाहता हूँ।)

अहं हसामि। (मैं हँसता हूँ।)

अहं पिबामि। (मैं पीता हूँ।)

आवां कुर्वः।

(हम दोनों करते हैं।)

वयं कुर्मः। (हम सब करते हैं।)

वयं खादामः। (हम सब खाते हैं।)

2. एक विशेष और महत्वपूर्ण नियम (भवान्/भवती का प्रयोग)

संस्कृत में जब हम अपने से बड़ों को आदर देने के लिए 'आप' शब्द का प्रयोग करते हैं, तो पुल्लिंग के लिए 'भवान्' और स्त्रीलिंग के लिए 'भवती' शब्द का प्रयोग होता है।

·     ध्यान दें: यद्यपि 'आप' शब्द से सामने वाले (सुनने वाले) का बोध होता है, फिर भी व्याकरण के नियम के अनुसार 'भवान्' या 'भवन्तः' शब्दों के साथ हमेशा 'प्रथम पुरुष' की क्रिया का ही प्रयोग किया जाता है, मध्यम पुरुष का नहीं।

इसके उदाहरण देखें:

भवान् नृत्यति। (आप नाचते हैं।) — [यहाँ 'भवान्' के साथ प्रथम पुरुष, एकवचन की क्रिया 'नृत्यति' लगी है]

भवन्तः खादन्ति। (आप सब खाते हैं।) — [यहाँ 'भवन्तः' के साथ प्रथम पुरुष, बहुवचन की क्रिया 'खादन्ति' लगी है]

💡 पाठ का निष्कर्ष (Conclusion)

💡 पाठ का निष्कर्ष (Conclusion)

ऊपर के वाक्यों को ध्यान से देखने पर हमने निम्नलिखित बातें सीखीं:

1.    नृत् (नृत्यसि), हस् (हसथः), और पिब् (पिबथ) क्रियाएँ मध्यम पुरुष की हैं, क्योंकि इनका कर्ता क्रमशः त्वम्, युवाम् और यूयम् है।

2.    इष् (इच्छामि), हस् (हसामि), पिब् (पिबामि), कृ (कुर्वः, कुर्मः) और खाद् (खादामः) क्रियाएँ उत्तम पुरुष की हैं, क्योंकि इनका कर्ता अहम्, आवाम् और वयम् है।

3.    नृत्यति और खादन्ति क्रियाएँ प्रथम पुरुष की हैं, क्योंकि आदरसूचक सर्वनाम 'भवान्' और 'भवन्तः' के साथ हमेशा प्रथम पुरुष की क्रिया लगाई जाती है।

संज्ञा तथा सर्वनाम शब्द का लिंग एवं वचन (Gender and Number Compatibility)

पिछले पाठों में आपने संज्ञा (नाम) और सर्वनाम शब्दों के भेदों को जाना। आइए, अब सीखते हैं कि वाक्यों में संज्ञा के स्थान पर सर्वनाम का प्रयोग करते समय लिंग (Gender) और वचन (Number) का सही तालमेल कैसे बिठाया जाता है।

महत्वपूर्ण नियम: वाक्य में संज्ञा (नाम) शब्द जिस लिंग और वचन का होता है, उस नाम के स्थान पर आने वाला सर्वनाम शब्द भी उसी लिंग और उसी वचन का प्रयोग किया जाता है।

आइए, इसे विस्तार से समझते हैं।

1. 'तद्' (वह) सर्वनाम शब्द के तीनों लिंगों में रूप

संज्ञा के स्थान पर प्रयोग करने के लिए सबसे प्रमुख सर्वनाम 'तद्' (वह - That/He/She/It) है। इसके प्रथमा विभक्ति के रूप तीनों लिंगों और वचनों में इस प्रकार चलते हैं:

लिंग (Gender)

एकवचन (Singular)

द्विवचन (Dual)

बहुवचन (Plural)

पुल्लिङ्ग (Masculine)

सः (वह)

तौ (वे दोनों)

ते (वे सब)

स्त्रीलिङ्ग (Feminine)

सा (वह)

ते (वे दोनों)

ताः (वे सब)

नपुंसकलिङ्ग (Neuter)

तत् (वह)

ते (वे दोनों)

तानि (वे सब)


2. वाक्यों में व्यावहारिक अनुप्रयोग (उदाहरण)

 वाक्यों में व्यावहारिक अनुप्रयोग (उदाहरण)

आइए, संज्ञा शब्दों के स्थान पर 'तद्' सर्वनाम का प्रयोग करके इस नियम को स्पष्ट रूप से समझें:

(क) पुल्लिङ्ग (Masculine) उदाहरण:

·     संज्ञा वाक्य: मोहनः खादति। (मोहन खाता है।)

·     सर्वनाम वाक्य: सः खादति। (वह खाता है।)

·     स्पष्टीकरण: यहाँ 'मोहनः' संज्ञा शब्द पुल्लिङ्ग और एकवचन का है, इसलिए इसके स्थान पर पुल्लिङ्ग एकवचन का सर्वनाम 'सः' प्रयोग किया गया है।

(ख) स्त्रीलिङ्ग (Feminine) उदाहरण:

·     संज्ञा वाक्य: लता पठति। (लता पढ़ती है।)

·     सर्वनाम वाक्य: सा पठति। (वह पढ़ती है।)

·     स्पष्टीकरण: यहाँ 'लता' संज्ञा शब्द स्त्रीलिङ्ग और एकवचन का है, इसलिए इसके स्थान पर स्त्रीलिङ्ग एकवचन का सर्वनाम 'सा' प्रयोग किया गया है।

(ग) नपुंसकलिङ्ग (Neuter) उदाहरण:

·     संज्ञा वाक्य: फलम् पतति। (फल गिरता है।)

·     सर्वनाम वाक्य: तत् पतति। (वह गिरता है।)

·     स्पष्टीकरण: यहाँ 'फलम्' संज्ञा शब्द नपुंसकलिङ्ग और एकवचन का है, इसलिए इसके स्थान पर नपुंसकलिङ्ग एकवचन का सर्वनाम 'तत्' प्रयोग किया गया है।

🔄 द्विवचन और बहुवचन के कुछ अन्य उदाहरण

संज्ञा के वचन के बदलते ही सर्वनाम का वचन भी कैसे बदल जाता है, आइए देखें:

  • पुल्लिङ्ग द्विवचन: बालकौ गच्छतः। तौ गच्छतः। (वे दोनों जाते हैं।)
  • पुल्लिङ्ग बहुवचन: बालकाः धावन्ति। ते धावन्ति। (वे सब दौड़ते हैं।)
  • स्त्रीलिङ्ग बहुवचन: बालिकाः हसन्ती। ताः हसन्ति। (वे सब हँसती हैं।)
  • नपुंसकलिङ्ग बहुवचन: पत्रानि पतन्ति। तानि पतन्ति। (वे सब गिरते हैं।)

💡 मुख्य बिंदु (Quick Summary)

  • सर्वनाम का चयन हमेशा संज्ञा के लिंग और वचन को देखकर ही करें।

  • ध्यान दें कि संज्ञा बदलने से क्रिया का रूप भी कर्ता के वचन के अनुसार बदलता है (जैसे— पठति, पठतः, पठन्ति), लेकिन सर्वनाम के लिंग बदलने से क्रिया पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता (सः पठति / सा पठति)।

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises)

प्रश्न 1: रेखांकित संज्ञा शब्दों के स्थान पर कोष्ठक से सही सर्वनाम शब्द (सः / सा /   तत्) चुनकर वाक्य दोबारा लिखिए:

  1. सीता मधुरं गायति। (सः / सा / तत्)

    • उत्तर: ............................................................

  2. चन्द्रः रात्रौ प्रकशते। (सः / सा / तत्)

    • उत्तर: ............................................................

  3. पुष्पम् सुन्दरम् अस्ति। (सः / सा / तत्)

    • उत्तर: ............................................................

  4. अश्वः तीव्रं धावति। (सः / सा / तत्)

    • उत्तर: ............................................................

प्रश्न 2: उचित सर्वनाम पद चुनकर रिक्त स्थान की पूर्ति कीजिए (Fill in the blanks):

(सः, तौ, ते, सा, ताः, तानि)

1. सिंहौ गर्जतः।  .......... गर्जतः। (संकेत: सिंहौ पुल्लिङ्ग द्विवचन है)

2. चक्राणि भ्रमन्ति।.......... भ्रमन्ति। (संकेत: चक्राणि नपुंसकलिङ्ग बहुवचन है)

3. शिक्षिकाः पाठयन्ति। .......... पाठयन्ति। (संकेत: शिक्षिकाः स्त्रीलिङ्ग बहुवचन है)

4. गजाः चलन्ति। .......... चलन्ति। (संकेत: गजाः पुल्लिङ्ग बहुवचन है)

प्रश्न 3: सही मिलान कीजिए (Match the Following संज्ञा with correct सर्वनाम):

संज्ञा पद (क)

सर्वनाम पद (ख)

1. विद्यालयः

(क) सा

2. कलिके

(ख) ते (स्त्रीलिङ्ग द्विवचन)

3. लता

(ग) सः

4. फलानि

(घ) तानि

🔑 उत्तरमाला (Answer Key - शिक्षकों और छात्रों की जाँच के लिए)

  • प्रश्न 1 के उत्तर: (1) सा गायति, (2) सः प्रकाशते, (3) तत् सुन्दरम् अस्ति, (4) सः धावति।

  • प्रश्न 2 के उत्तर: (1) तौ, (2) तानि, (3) ताः, (4) ते।

  • प्रश्न 3 के उत्तर: 1-(ग), 2-(ख), 3-(क), 4-(घ)।

सर्वनाम 'तद्' (वह) शब्द का वाक्य में प्रयोग 

आइए अब हम 'तद्' (वह) सर्वनाम शब्द के रूपों (सः, तौ, ते, सा, ताः आदि) का अलग-अलग लिंगों और वचनों में व्यावहारिक वाक्य-प्रयोग देखते हैं।
विशेष नोट: जिस लिंग और वचन का कर्ता (संज्ञा या सर्वनाम) होता है, क्रिया भी उसी वचन की लगाई जाती है।

1. पुल्लिङ्ग (Masculine) वाक्य-प्रयोग

  • सः साधकः अस्ति। (वह साधक है।)
  • सः सेवकः अस्ति। (वह सेवक है।)
  • सः भुजङ्गः अस्ति। (वह साँप है।)
  • सः मोहनः लिखति। (वह मोहन लिखता है।)
  • तौ बालकौ पततः। (वे दोनों लड़के गिरते हैं।) — [पत् = गिरना]
  • तौ खगौ वसतः। (वे दोनों पक्षी रहते हैं।) — [वस् = रहना]

2. स्त्रीलिङ्ग (Feminine) वाक्य-प्रयोग

  • ताः बालिकाः पतन्ति। (वे सब लड़कियाँ गिरती हैं।)
  • कृष्णा व्रजति। (कृष्णा जाती है।) — [व्रज् = जाना। ध्यान दें: यहाँ 'कृष्णा' आकारान्त स्त्रीलिङ्ग नाम है, टाइपिंग में विसर्ग नहीं होगा]
  • श्यामे व्रजतः। (दो श्यामा जाती हैं।)
  • ते श्यामे व्रजतः। (वे दोनों श्यामा जाती हैं।) — [यहाँ 'ते' स्त्रीलिङ्ग द्विवचन का सर्वनाम है]
  • ताः पिपीलिकाः चलन्ति। (वे सब चींटियाँ चलती हैं।)

💡 अभ्यास: अन्य धातुओं के साथ सर्वनाम का प्रयोग

आइए, आपके अभ्यास के लिए क्रीड्, पूज्, सेव्, दह् और वद् क्रियापदों (लट् लकार) के साथ 'तद्' सर्वनाम के कुछ और सरल वाक्य सीखते हैं। छात्र इनका उच्चारण और लेखन का अभ्यास करें:

(क) क्रीड् (खेलना) धातु

  • सः क्रीडति। (वह खेलता है।)
  • तौ क्रीडतः। (वे दोनों खेलते हैं।)
  • ते क्रीडन्ति। (वे सब खेलते हैं।)

(ख) पूज् (पूजा करना) धातु

  • सा पूजयति। (वह पूजा करती है।)
  • ते पूजयतः। (वे दोनों पूजा करती हैं।)
  • ताः पूजयन्ति। (वे सब पूजा करती हैं।)

(ग) सेव् (सेवा करना) धातु

  • सः सेवते। (वह सेवा करता है।)
  • तौ सेवेते। (वे दोनों सेवा करते हैं।)
  • ते सेवन्ते। (वे सब सेवा करते हैं।)

(घ) दह् (जलना/जलाना) धातु

  • तत् दहति। (वह जलता है।)
  • ते दहतः। (वे दोनों जलते हैं।)
  • तानि दहन्ति। (वे सब जलते हैं।)

(ङ) वद् (बोलना) धातु

  • सः वदति। (वह बोलता है।)
  • तौ वदतः। (वे दोनों बोलते हैं।)
  • ते वदन्ति। (वे सब बोलते हैं।)
✍️ अभ्यास कार्य (Exercises)
प्रश्न 1: सर्वनाम पदों के साथ सही क्रियापद का मिलान कीजिए (Match the Pronouns with Correct Verbs):
सर्वनाम पद (क)क्रियापद (ख)
1. सः (वह - पुं.)(क) वदन्ति
2. तौ (वे दोनों)(ख) क्रीडति
3. ते (वे सब)(ग) पूजयतः

प्रश्न 2: कोष्ठक में दी गई धातुओं के लट् लकार (वर्तमान काल) के सही रूप से रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:
  1. सा बालिका ईश्वरम् .................... । (पूज्) (संकेत: सा एकवचन है)
  2. तौ बालकौ क्रीडाङ्गणे .................... । (क्रीड्) (संकेत: तौ द्विवचन है)
  3. तानि पत्राणि अग्नौ .................... । (दह्) (संकेत: तानि बहुवचन है)
  4. ते नराः सत्यम् .................... । (वद्) (संकेत: ते बहुवचन है)
  5. सः भक्तः गुरुं .................... । (सेव् - सेवते / सेवेते / सेवन्ते)
प्रश्न 3: रेखांकित क्रियापदों को कर्ता (सर्वनाम) के वचन के अनुसार शुद्ध करके वाक्य दोबारा लिखिए (Correct the Verbs):
  1. तौ खगौ वृक्षं कूजति।
    • शुद्ध वाक्य: ............................................................
  2. ताः पिपीलिकाः मार्गे चलतः।
    • शुद्ध वाक्य: ............................................................
  3. सः मोहनः पत्रं लिखन्ति।
    • शुद्ध वाक्य: ............................................................


🔑 उत्तरमाला (Answer Key - केवल शिक्षक/जाँच के लिए)

  • प्रश्न 1: 1-(ख), 2-(ग), 3-(क)।
  • प्रश्न 2: (1) पूजयति, (2) क्रीडतः, (3) दहन्ति, (4) वदन्ति, (5) सेवते।
  • प्रश्न 3: (1) तौ खगौ वृक्षं कूजतः, (2) ताः पिपीलिकाः मार्गे चलन्ति, (3) सः मोहनः पत्रं लिखति।

सर्वनाम शब्द: एतद् तथा इदम् (Pronouns: This)

प्यारे बच्चो! पिछले पाठ में हमने दूर की वस्तु या व्यक्ति के लिए 'तद्' (वह) सर्वनाम का प्रयोग सीखा था। आइए, अब हम पास की वस्तुओं या व्यक्तियों के लिए प्रयोग होने वाले दो महत्वपूर्ण सर्वनाम शब्दों को सीखते हैं:
  1. एतद् (यह - This) — जो वस्तु हमारे बिल्कुल पास या समीप हो।
  2. इदम् (यह - This) — जो वस्तु हमारे सामने प्रत्यक्ष उपस्थित हो।


1. 'एतद्' (यह) सर्वनाम शब्द के रूप

'एतद्' शब्द के प्रथमा विभक्ति के रूप तीनों लिंगों और वचनों में इस प्रकार चलते हैं:
लिंग (Gender)एकवचन (Singular)द्विवचन (Dual)बहुवचन (Plural)
पुल्लिङ्ग (Masculine)एषः (यह)एतौ (ये दोनों)एते (ये सब)
स्त्रीलिङ्ग (Feminine)एषा (यह)एते (ये दोनों)एताः (ये सब)
नपुंसकलिङ्ग (Neuter)एतत् (यह)एते (ये दोनों)एतानि (ये सब)

📝 वाक्यों में व्यावहारिक अनुप्रयोग (Examples):

  • पुल्लिङ्ग: एषः चषकः अस्ति। (यह गिलास है।)
  • स्त्रीलिङ्ग: एषा दोला अस्ति। (यह झूला है।)
  • नपुंसकलिङ्ग: एतत् पुस्तकम् अस्ति। (यह पुस्तक है।)
  • बहुवचन (पुल्लिङ्ग): एते बालकाः खेलन्ति। (ये सब लड़के खेलते हैं।)


2. 'इदम्' (यह) सर्वनाम शब्द के रूप

'इदम्' शब्द के प्रथमा विभक्ति के रूप तीनों लिंगों और वचनों में इस प्रकार चलते हैं:
लिंग (Gender) [1, 2] एकवचन (Singular)द्विवचन (Dual)बहुवचन (Plural)
पुल्लिङ्ग (Masculine)अयम् (यह)इमौ (ये दोनों)इमे (ये सब)
स्त्रीलिङ्ग (Feminine)इयम् (यह)इमे (ये दोनों)इमाः (ये सब)
नपुंसकलिङ्ग (Neuter)इदम् (यह)इमे (ये दोनों)इमानि (ये सब)

📝 वाक्यों में व्यावहारिक अनुप्रयोग (Examples):

  • पुल्लिङ्ग: अयम् सिंहः अस्ति। (यह शेर है।)
  • स्त्रीलिङ्ग: इयम् मक्षिका अस्ति। (यह मक्खी है।)
  • नपुंसकलिङ्ग: इदम् गृहम् अस्ति। (यह घर है।)
  • द्विवचन (स्त्रीलिङ्ग): इमे बालिके पठतः। (ये दोनों लड़कियाँ पढ़ती हैं।)


💡 मुख्य अंतर और याद रखने योग्य बातें (💡 Quick Summary)

  • तद् बनाम एतद्: दूर की वस्तु के लिए 'सः' (वह) और पास की वस्तु के लिए 'एषः' (यह) का प्रयोग होता है।
  • रूपों में समानता: ध्यान दें कि एतद् और इदम् दोनों के स्त्रीलिंग द्विवचन और नपुंसकलिङ्ग द्विवचन में 'एते' और 'इमे' रूप एक समान बनते हैं। वाक्य में इनका अर्थ संज्ञा पद को देखकर समझा जाता है।

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises)

प्रश्न 1: उचित सर्वनाम पद (एषः / एषा / एतत्) से रिक्त स्थान भरिए:
  1. .................... कलिका विकसति। (संकेत: कलिका स्त्रीलिंग है)
  2. .................... वृक्षः फलति। (संकेत: वृक्षः पुल्लिंग है)
  3. .................... मित्रम् आगच्छति। (संकेत: मित्रम् नपुंसकलिंग है)
प्रश्न 2: सही विकल्प पर (✓) का चिह्न लगाइए:
  1. 'इदम्' सर्वनाम का पुल्लिङ्ग बहुवचन रूप क्या है?
    • (क) इमौ
    • (ख) इमे
    • (ग) इमाः
  2. 'एताः महिलाः' में रेखांकित शब्द 'एताः' कौन-सा लिंग है?
    • (क) पुल्लिङ्ग
    • (ख) स्त्रीलिङ्ग
    • (ग) नपुंसकलिङ्ग

🔑 उत्तरमाला (Answer Key)

  • प्रश्न 1: (1) एषा, (2) एषः, (3) एतत्।
  • प्रश्न 2: (1) ख - इमे, (2) ख - स्त्रीलिङ्ग।

प्रश्नवाचक सर्वनाम 'किम्' (कौन/क्या) शब्द का प्रयोग (Use of Interrogative Pronoun 'Kim')

प्यारे बच्चो! अभी तक आपने संज्ञा, सर्वनाम तथा क्रिया शब्दों को आपस में जोड़कर सरल वाक्य बनाना सीख लिया है। आइए, अब हम बातचीत में प्रश्न पूछना सीखते हैं। संस्कृत में प्रश्न पूछने के लिए 'किम्' (कौन / क्या - Who/What) सर्वनाम शब्द का प्रयोग किया जाता है।
संज्ञा और सर्वनाम की तरह ही, 'किम्' शब्द के रूप भी तीनों लिंगों और वचनों में अलग-अलग होते हैं:

1. 'किम्' शब्द का लिंग एवं वचन रूप


सर्वनाम किम् (कौन) शब्द-

एकवचन द्विवचन बहुवचन

 कः       कौ      के -   पुल्लिंग

 का       के      काः -  स्त्रीलिंग

 किम्     के      कानि –  नपुंसकलिंग



लिंग (Gender)एकवचन (Singular)द्विवचन (Dual)बहुवचन (Plural)
पुल्लिङ्ग (Masculine)कः (कौन - एक)कौ (कौन - दो)के (कौन - सब)
स्त्रीलिङ्ग (Feminine)का (कौन - एक)के (कौन - दो)काः (कौन - सब)
नपुंसकलिङ्ग (Neuter)किम् (क्या - एक)के (क्या - दो)कानि (क्या - सब)

2. 'किम्' शब्द से प्रश्न और उत्तर निर्माण (उदाहरण)

याद रखने योग्य नियम: जिस लिंग और वचन का हमारा कर्ता (संज्ञा) होता है, प्रश्न पूछते समय 'किम्' शब्द का रूप भी उसी लिंग और वचन का लगाया जाता है।
आइए, नीचे दी गई तालिका से प्रश्न और उनके उत्तरों के माध्यम से इसे समझें:

क्रमप्रश्न (Question)उत्तर (Answer)स्पष्टीकरण (Grammar Tip)
1का बालिका नृत्यति ?
(कौन लड़की नाचती है?)
सा बालिका नृत्यति।
(वह लड़की नाचती है।)
बालिका स्त्रीलिङ्ग एकवचन है, इसलिए 'का' और 'सा' का प्रयोग हुआ।
2काः बालिकाः हसन्ति ?
(कौन सब लड़कियाँ हँसती हैं?)
ताः बालिकाः हसन्ति।
(वे सब लड़कियाँ हँसती हैं।)
बालिकाः स्त्रीलिङ्ग बहुवचन है, इसलिए 'काः' और 'ताः' का प्रयोग हुआ।
3के बालिके नृत्यतः ?
(कौन दो लड़कियाँ नाचती हैं?)
ते बालिके नृत्यतः।
(वे दोनों लड़कियाँ नाचती हैं।)
बालिके स्त्रीलिङ्ग द्विवचन है, इसलिए 'के' और 'ते' का प्रयोग हुआ।
4के कपोताः पश्यन्ति ?
(कौन सब कबूतर देखते हैं?)
ते कपोताः पश्यन्ति।
(वे सब कबूतर देखते हैं।)
कपोताः पुल्लिङ्ग बहुवचन है, इसलिए प्रश्न में 'के' और उत्तर में 'ते' आया।
5कः छात्रः नमति ?
(कौन छात्र नमस्कार करता है?)
सः छात्रः नमति।
(वह छात्र नमस्कार करता है।)
छात्रः पुल्लिङ्ग एकवचन है, इसलिए 'कः' और 'सः' का प्रयोग हुआ।
6कः साधकः अस्ति ?
(कौन साधक है?)
सः साधकः अस्ति।
(वह साधक है।)
पुल्लिङ्ग एकवचन का उदाहरण।
7कौ बालकौ पततः ?
(कौन दो लड़के गिरते हैं?)
तौ बालकौ पततः।
(वे दोनों लड़के गिरते हैं।)
बालकौ पुल्लिङ्ग द्विवचन है, इसलिए 'कौ' और 'तौ' का प्रयोग हुआ।
8काः बालिकाः भ्रमन्ति ?
(कौन सब लड़कियाँ घूमती हैं?)
ताः बालिकाः भ्रमन्ति।
(वे सब लड़कियाँ घूमती हैं।)
स्त्रीलिङ्ग बहुवचन का उदाहरण।

💡 व्यावहारिक उदाहरण (Practical Example)

जब आपसे कोई हिंदी में पूछता है— "कौन कुत्ता दौड़ रहा है?" तो आप उत्तर देते हैं— "वह कुत्ता दौड़ रहा है।"
संस्कृत में इसे इस प्रकार कहेंगे:
  • प्रश्न: कः कुक्कुरः धावति?
  • उत्तर: सः कुक्कुरः धावति।

✍️ अभ्यास कार्य: प्रश्न-उत्तर निर्माण (Exercise: Question & Answer Formation)
प्रश्न 1: नीचे दिए गए प्रश्नों को ध्यान से पढ़िए और संकेत के आधार पर उचित उत्तर लिखिए (Write the correct Answers):
(संकेत: उत्तर में 'तद्' सर्वनाम— सः / तौ / ते / सा / ताः का प्रयोग करें)
  1. प्रश्न: का बालिका नृत्यति ? (कौन लड़की नाचती है?)
    • उत्तर: ................................................................................। (उत्तर: सा बालिका नृत्यति।)
  2. प्रश्न: काः बालिकाः हसन्ति ? (कौन सब लड़कियाँ हँसती हैं?)
    • उत्तर: ................................................................................। (उत्तर: ताः बालिकाः हसन्ति।)
  3. प्रश्न: के बालिके नृत्यतः ? (कौन दो लड़कियाँ नाचती हैं?)
    • उत्तर: ................................................................................। (उत्तर: ते बालिके नृत्यतः।)
  4. प्रश्न: के कपोताः पश्यन्ति ? (कौन सब कबूतर देखते हैं?)
    • उत्तर: ................................................................................। (उत्तर: ते कपोताः पश्यन्ति।)
  5. प्रश्न: कः छात्रः नमति ? (कौन छात्र नमस्कार करता है?)
    • उत्तर: ................................................................................। (उत्तर: सः छात्रः नमति।)
  6. प्रश्न: कः साधकः अस्ति ? (कौन साधक है?)
    • उत्तर: ................................................................................। (उत्तर: सः साधकः अस्ति।)
  7. प्रश्न: कौ बालकौ पततः ? (कौन दो लड़के गिरते हैं?)
    • उत्तर: ................................................................................। (उत्तर: तौ बालकौ पततः।)
  8. प्रश्न: काः बालिकाः भ्रमन्ति ? (कौन सब लड़कियाँ घूमती हैं?)
    • उत्तर: ................................................................................। (उत्तर: ताः बालिकाः भ्रमन्ति।)

प्रश्न 2: वाक्य परिवर्तन कीजिए (उलट-पुलट अभ्यास):
(नीचे दिए गए उत्तरों को देखकर उनके लिए सही प्रश्नवाचक वाक्य (Question) बनाइए)
  1. उत्तर: सः कुक्कुरः धावति। (वह कुत्ता दौड़ रहा है।)
    • प्रश्न: ................................................................................? (उत्तर: कः कुक्कुरः धावति?)
  2. उत्तर: सा महिला पचति। (वह महिला पकाती है।)
    • प्रश्न: ................................................................................? (उत्तर: का महिला पचति?)
  3. उत्तर: तानि फलानि पतन्ति। (वे सब फल गिरते हैं।)
    • प्रश्न: ................................................................................? (उत्तर: कानि फलानि पतन्ति?)


🔑 उत्तरमाला (Answer Key - केवल शिक्षक/स्वयं की जाँच के लिए)

  • प्रश्न 1 के पूर्ण उत्तर:
    1. सा बालिका नृत्यति। 2. ताः बालिकाः हसन्ति। 3. ते बालिके नृत्यतः। 4. ते कपोताः पश्यन्ति। 5. सः छात्रः नमति। 6. सः साधकः अस्ति। 7. तौ बालकौ पततः। 8. ताः बालिकाः भ्रमन्ति। [1, 2]
  • प्रश्न 2 के पूर्ण उत्तर:
    1. कः कुक्कुरः धावति? 2. का महिला पचति? 3. कानि फलानि पतन्ति?

विशेष पाठ: अव्यय 'किं' का प्रयोग (Use of Invariable 'Kim')

पिछले पाठ में आपने पढ़ा कि जब हम किसी व्यक्ति या वस्तु के बारे में पूछते हैं (जैसे— कौन लड़का?, कौन लड़की?), तब सर्वनाम 'किम्' (कः, का, किम्) का रूप कर्ता के लिंग और वचन के अनुसार बदल जाता है।
लेकिन, संस्कृत में 'किम्' (किं) का प्रयोग एक अव्यय पद के रूप में भी होता है। आइए, इसके नियमों और सुंदर उदाहरणों को समझते हैं:
📌 अव्यय 'किं' के मुख्य नियम:

  1. रूप नहीं बदलता: जब 'किं' शब्द अव्यय की तरह प्रयोग होता है, तब कर्ता चाहे लड़का हो, लड़की हो, एक हो या अनेक— 'किं' का रूप कभी नहीं बदलता। यह सभी लिंगों और वचनों में हमेशा एक समान ('किं') ही रहता है।
  2. प्रयोग में अंतर (सर्वनाम बनाम अव्यय):
    • सर्वनाम 'किम्' का प्रयोग सामान्य प्रश्न या किसी का नाम/पहचान जानने की जिज्ञासा के लिए होता है (जैसे— कः बालकः? = कौन लड़का?)।
    • अव्यय 'किं' का प्रयोग अक्सर 'क्या' के अर्थ में, किसी बात पर बल देने के लिए, आक्षेप (तर्क) करने या विशेष जिज्ञासा प्रकट करने के लिए किया जाता है (जैसे— किं कुक्कुरः धावति? = क्या कुत्ता दौड़ रहा है?)।

जैसे - किं किं न साधयति कल्पलतेव विद्या ।

संस्कृते सकलं शास्त्रं संस्कृते सकला कला ।

संस्कृते सकलं ज्ञानं संस्कृते किं न विद्यते॥

किं करिष्यन्ति वक्तारः श्रोता यत्र न विद्यते।

नग्नक्षपणके देशे रजकः किं करिष्यति॥

न हि कश्चिद्विजानाति किं कस्य श्वो भविष्यति।

यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम्

लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति॥

क्षमावशी कृतिर्लोके क्षमया किं न साध्यते ।

शान्तिखङ्‌गः करे यस्य किं करिष्यति दुर्जनः ॥

कवयः किं न पश्यन्ति किं न कुर्वन्ति योषितः ।

मद्यपाः किं न जल्पन्ति किं न खादन्ति वायसाः ।

कृते प्रयत्ने किं न लभेत ।

बुभुक्षितः किं न करोति पापम् ।

किम् शब्द का वाक्य में प्रयोग- 

क्या कुत्ता दौ़ड़ रहा है? किं कुक्कुरः धावति।

आप उत्तर देते हैं- हाँ, कुत्ता दौड़ रहा है । आम्, कुक्कुरः धावति ।

अथवा आपका उत्तर होता है- नहीं, कुत्ता नहीं दौड़ रहा है । , कुक्कुरः धावति ।


आगे आप इसी तरह कुत्र, कथम् आदि अन्य प्रश्न वाचक शब्दों से वाक्य बनाना सीखेंगें।

इनमें से सर्व, त्यद्, यद्, एतद्, इदम्, अदस्, एक तथा द्वि शब्दों के प्रथमा विभक्ति की रूप देखकर अभ्यास पुस्तिका में लिखें तथा उसे याद कर लें।

सर्वनाम शब्दों के शब्दरूप के लिए संस्कृत अभ्यास पर चटका लगाकर एक अन्य कड़ी पर जायें । 
यहाँ पुनः एक साथ अकारान्त पुल्लिंग शब्द, युष्मद् (तुम) शब्द तथा अस्मद् (मैं)  के तीनों पुरुष एवं वचन तथा प्रथमा विभक्ति का तथा लिख् धातु (क्रिया) के वर्तमान काल (लट् लकार) तीनों पुरुष तथा तीनों वचनों का रूप दिया जा रहा है।
अकारान्त पुल्लिंग वेद शब्द का रूप।

विभक्ति एकवचनम्        द्विवचनम्           बहुवचनम्

प्रथमा     वेदः                  वेदौ                वेदाः

द्वितीया   वेदम्                 वेदौ                वेदान्

तृतीया   वेदेन                 वेदाभ्याम्        वेदैः

चतुर्थी    वेदाय                वेदाभ्याम्        वेदेभ्यः

पञ्चमी    वेदात् / वेदाद्     वेदाभ्याम्        वेदेभ्यः

षष्ठी       वेदस्य               वेदयोः             वेदानाम्

सप्तमी    वेदे                   वेदयोः             वेदेषु

सम्बोधन  वेद                 वेदौ                वेदाः












सर्वनाम युष्मद् शब्द का रूप। इसका तीनों लिंग में समान रूप चलता है।

विभक्ति एकवचनम्        द्विवचनम्     बहुवचनम्

प्रथमा     त्वम्                युवाम्               यूयम्

द्वितीया   त्वाम् / त्वा     युवाम् / वाम्      युष्मान् / वः

तृतीया   त्वया               युवाभ्याम्          युष्माभिः

चतुर्थी    तुभ्यम् / ते        युवाभ्याम् / वाम् युष्मभ्यम् / वः

पञ्चमी    त्वत् / त्वद्       युवाभ्याम्          युष्मत् / युष्मद्

षष्ठी       तव / ते            युवयोः / वाम्     युष्माकम् / वः

सप्तमी    त्वयि               युवयोः              युष्मासु

सर्वनाम अस्मद् शब्द का रूप। इसका तीनों लिंग में समान रूप चलता है। इसमें सम्बोधन नहीं होता है।

विभक्ति एकवचनम्        द्विवचनम्   बहुवचनम्

प्रथमा   अहम्                 आवाम्              वयम्

द्वितीया   माम् / मा           आवाम् / नौ    अस्मान् / नः

तृतीया मया                  आवाभ्याम्         अस्माभिः

चतुर्थी  मह्यम् / मे          आवाभ्याम् / नौ  अस्मभ्यम् / नः

पञ्चमी  मत् / मद्            आवाभ्याम्         अस्मत् / अस्मद्

षष्ठी     मम / मे              आवयोः / नौ      अस्माकम् / नः

सप्तमी  मयि               आवयोः             अस्मासु

तकारान्त पुल्लिंग सर्वनाम भवत् शब्द का रूप।

विभक्ति एकवचनम्        द्विवचनम्           बहुवचनम्

प्रथमा     भवान्             भवन्तौ              भवन्तः

द्वितीया  भवन्तम्           भवन्तौ              भवतः

तृतीया   भवता             भवद्भ्याम्           भवद्भिः

चतुर्थी    भवते               भवद्भ्याम्           भवद्भ्यः

पञ्चमी    भवतः             भवद्भ्याम्           भवद्भ्यः

षष्ठी       भवतः             भवतोः              भवताम्

सप्तमी    भवति             भवतोः              भवत्सु

सम्बोधन  भवन्             भवन्तौ              भवन्तः

क्रियापदों के पुरुष तथा वचन (Person and Number in Verbs)
पिछले पाठों में आप 'वचन' और 'पुरुष' का परिचय पढ़ चुके हैं। संस्कृत व्याकरण में क्रिया का सही प्रयोग करने के लिए पुरुष और वचन को समझना बहुत जरूरी है।  आइए, अब देखते हैं कि वर्तमान काल (लट् लकार) में इन पुरुषों और वचनों के अनुसार क्रियापद (Verb Forms) किस प्रकार बनते हैं।
क्रियापद बनाने के लिए धातु के अंत में विशेष प्रत्यय जोड़े जाते हैं।
1. लट् लकार (वर्तमान काल) का धातु-रूप ढाँचा
किसी भी धातु को तीनों पुरुषों और तीनों वचनों में बदलने के लिए लट् लकार (Present Tense) में निम्नलिखित प्रत्यय जोड़े जाते हैं:
पुरुषएकवचन  द्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुष-ति-तः-न्ति
मध्यम पुरुष-सि-थः-थ
उत्तम पुरुष-आमि-आवः-आमः
2. पिछले पाठ की धातुओं के उदाहरण
आइए, पिछले पाठ की धातुओं को इस तालिका के अनुसार समझें:
(क) पठ् (पढ़ना) धातु के रूप
पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषपठति (एक पढ़ता है)पठतः (दो पढ़ते हैं)पठन्ति (सब पढ़ते हैं)
मध्यम पुरुषपठसि (तुम पढ़ते हो)पठथः (तुम दोनों पढ़ते हो)पठथ (तुम सब पढ़ते हो)
उत्तम पुरुषपठामि (मैं पढ़ता हूँ)पठावः (हम दोनों पढ़ते हैं)पठामः (हम सब पढ़ते हैं)
(ख) चल् (चलना) धातु के रूप
पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषचलतिचलतःचलन्ति
मध्यम पुरुषचलसिचलथःचलथ
उत्तम पुरुषचलामिचलावःचलामः
(ग) लिख् (लिखना) धातु के रूप
पुरुषएकवचनद्विवचनबहुवचन
प्रथम पुरुषलिखतिलिखतःलिखन्ति
मध्यम पुरुषलिखसिलिखथःलिखथ
उत्तम पुरुषलिखामिलिखावःलिखामः
3. अभ्यास के लिए अन्य धातुओं के संक्षिप्त रूप
इसी प्रकार अन्य सभी धातुओं के रूप बनते हैं। छात्र स्वयं अभ्यास करें:
वद् (बोलना): वदति, वदतः, वदन्ति | वदसि, वदथः, वदथ | वदामि, वदावः, वदामः
हस् (हँसना): हसति, हसतः, हसन्ति | हससि, हसथः, हसथ | हसामि, हसावः, हसामः
खाद् (खाना): खादति, खादतः, खादन्ति | खादसि, खादथः, खादथ | खादामि, खादावः, खादामः
पा/पिब् (पीना): पिबति, पिबतः, पिबन्ति | पिबसि, पिबथः, पिबथ | पिबामि, पिबावः, पिबामः
कूज् (कूजना/चहकना): कूजति, कूजतः, कूजन्ति | कूजसि, कूजथः, कूजथ | कूजामि, कूजावः, कूजामः
मुख्य बिंदु (याद रखने योग्य बातें)
  • संस्कृत में क्रिया का रूप इस बात पर निर्भर नहीं करता कि काम करने वाला लड़का है या लड़की। (जैसे- सः पठति = वह पढ़ता है, सा पठति = वह पढ़ती है। दोनों में 'पठति' ही रहेगा)।
  •  संस्कृत में क्रियापद का रूप कर्ता के लिंग (स्त्रीलिंग या पुल्लिंग) बदलने से नहीं बदलता। जैसे— सः पठति (वह पढ़ता है) और सा पठति (वह पढ़ती है) दोनों में क्रिया 'पठति' ही रहेगी।
क्रियापदों का वाक्यों में प्रयोग (Use of Verbs in Sentences)
आइए, पहले पढ़ी गई धातुओं का तीनों पुरुषों और तीनों वचनों में वाक्यों के माध्यम से प्रयोग सीखें।
नियम: जिस पुरुष और वचन का कर्ता (Subject) होता है, क्रियापद भी उसी पुरुष और वचन का लगाया जाता है।

1. पठ् (पढ़ना) धातु के वाक्य

  • प्रथम पुरुष:
    • एकवचन: बालकः पठति। (लड़का पढ़ता है।)
    • द्विवचन: बालकौ पठतः। (दो लड़के पढ़ते हैं।)
    • बहुवचन: बालकाः पठन्ति। (सब लड़के पढ़ते हैं।)
  • मध्यम पुरुष:
    • एकवचन: त्वं पठसि। (तुम पढ़ते हो।)
    • द्विवचन: युवां पठथः। (तुम दोनों पढ़ते हो।)
    • बहुवचन: यूयं पठथ। (तुम सब पढ़ते हो।)
  • उत्तम पुरुष:
    • एकवचन: अहं पठामि। (मैं पढ़ता हूँ।)
    • द्विवचन: आवां पठावः। (हम दोनों पढ़ते हैं।)
    • बहुवचन: वयं पठामः। (हम सब पढ़ते हैं।) 

2. खाद् (खाना) धातु के वाक्य

  • प्रथम पुरुष:
    • एकवचन: गजः खादति। (हाथी खाता है।)
    • द्विवचन: गजौ खादतः। (दो हाथी खाते हैं।)
    • बहुवचन: गजाः खादन्ति। (सब हाथी खाते हैं।)
  • मध्यम पुरुष:
    • एकवचन: त्वं खादसि। (तुम खाते हो।)
    • द्विवचन: युवां खादथः। (तुम दोनों खाते हो।)
    • बहुवचन: यूयं खादथ। (तुम सब खाते हो।)
  • उत्तम पुरुष:
    • एकवचन: अहं खादामि। (मैं खाता हूँ।)
    • द्विवचन: आवां खादावः। (हम दोनों खाते हैं।)
    • बहुवचन: वयं खादामः। (हम सब खाते हैं।)

3. चल् (चलना) धातु के वाक्य

  • प्रथम पुरुष:
    • एकवचन: अश्वः चलति। (घोड़ा चलता है।)
    • द्विवचन: अश्वौ चलतः। (दो घोड़े चलते हैं।)
    • बहुवचन: अश्वाः चलन्ति। (सब घोड़े चलते हैं।)
  • मध्यम पुरुष:
    • एकवचन: त्वं चलसि। (तुम चलते हो।)
    • द्विवचन: युवां चलथः। (तुम दोनों चलते हो।)
    • बहुवचन: यूयं चलथ। (तुम सब चलते हो।)
  • उत्तम पुरुष:
    • एकवचन: अहं चलामि। (मैं चलता हूँ।)
    • द्विवचन: आवां चलावः। (हम दोनों चलते हैं।)
    • बहुवचन: वयं चलामः। (हम सब चलते हैं।) 

4. लिख् (लिखना) धातु के वाक्य

  • प्रथम पुरुष:
    • एकवचन: छात्रः लिखति। (छात्र लिखता है।)
    • द्विवचन: छात्रौ लिखतः। (दो छात्र लिखते हैं।)
    • बहुवचन: छात्राः लिखन्ति। (सब छात्र लिखते हैं।)
  • मध्यम पुरुष:
    • एकवचन: त्वं लिखसि। (तुम लिखते हो।)
    • द्विवचन: युवां लिखथः। (तुम दोनों लिखते हो।)
    • बहुवचन: यूयं लिखथ। (तुम सब लिखते हो।) 
  • उत्तम पुरुष:
    • एकवचन: अहं लिखामि। (मैं लिखता हूँ।)
    • द्विवचन: आवां लिखावः। (हम दोनों लिखते हैं।)
    • बहुवचन: वयं लिखामः। (हम सब लिखते हैं।) 

5. वद् (बोलना) धातु के वाक्य

  • प्रथम पुरुष:
    • एकवचन: शुकः वदति। (तोता बोलता है।)
    • द्विवचन: शुकौ वदतः। (दो तोते बोलते हैं।)
    • बहुवचन: शुकाः वदन्ति। (सब तोते बोलते हैं।)
  • मध्यम पुरुष:
    • एकवचन: त्वं वदसि। (तुम बोलते हो।)
    • द्विवचन: युवां वदथः। (तुम दोनों बोलते हो।)
    • बहुवचन: यूयं वदथ। (तुम सब बोलते हो।) 
  • उत्तम पुरुष:
    • एकवचन: अहं वदामि। (मैं बोलता हूँ।)
    • द्विवचन: आवां वदावः। (हम दोनों बोलते हैं।)
    • बहुवचन: वयं वदामः। (हम सब बोलते हैं।)

6. पा/पिब् (पीना) धातु के वाक्य

  • प्रथम पुरुष:
    • एकवचन: वानरः पिबति। (बंदर पीता है।)
    • द्विवचन: वानरौ पिबतः। (दो बंदर पीते हैं।)
    • बहुवचन: वानराः पिबन्ति। (सब बंदर पीते हैं।)
  • मध्यम पुरुष:
    • एकवचन: त्वं पिबसि। (तुम पीते हो।)
    • द्विवचन: युवां पिबथः। (तुम दोनों पीते हो।)
    • बहुवचन: यूयं पिबथ। (तुम सब पीते हो।) 
  • उत्तम पुरुष:
    • एकवचन: अहं पिबामि। (मैं पीता हूँ।)
    • द्विवचन: आवां पिबावः। (हम दोनों पीते हैं।)
    • बहुवचन: वयं पिबामः। (हम सब पीते हैं।) 

7. हस् (हँसना) धातु के वाक्य

  • प्रथम पुरुष:
    • एकवचन: कन्या हसति। (लड़की हँसती है।)
    • द्विवचन: कन्ये हसतः। (दो लड़कियाँ हँसती हैं।)
    • बहुवचन: कन्याः हसन्ति। (सब लड़कियाँ हँसती हैं।)
  • मध्यम पुरुष:
    • एकवचन: त्वं हससि। (तुम हँसते हो।)
    • द्विवचन: युवां हसथः। (तुम दोनों हँसते हो।)
    • बहुवचन: यूयं हसथ। (तुम सब हँसते हो।) 
  • उत्तम पुरुष:
    • एकवचन: अहं हसामि। (मैं हँसता हूँ।)
    • द्विवचन: आवां हसावः। (हम दोनों हँसते हैं।)
    • बहुवचन: वयं हसामः। (हम सब हँसते हैं।)

8. कूज् (कूजना/चहकना) धातु के वाक्य

  • प्रथम पुरुष:
    • एकवचन: कोकिला कूजति। (कोयल चहकती है।)
    • द्विवचन: कोकिले कूजतः। (दो कोयलें चहकती हैं।)
    • बहुवचन: कोकिलाः कूजन्ति। (सब कोयलें चहकती हैं।)
  • मध्यम पुरुष:
    • एकवचन: त्वं कूजसि। (तुम चहकते हो।)
    • द्विवचन: युवां कूजथः। (तुम दोनों चहकते हो।)
    • बहुवचन: यूयं कूजथ। (तुम सब चहकते हो।) 
  • उत्तम पुरुष:
    • एकवचन: अहं कूजामि। (मैं चहकता हूँ।)
    • द्विवचन: आवां कूजावः। (हम दोनों चहकते हैं।)
    • बहुवचन: वयं कूजामः। (हम सब चहकते हैं।) 








लिख् धातु के लट् लकार का धातुरूप (कर्ता, परस्मैपद)

 पुरुष               एकवचनम्         द्विवचनम्           बहुवचनम्

प्रथम पुरुष         लिखति              लिखतः              लिखन्ति

मध्यम पुरुष       लिखसि             लिखथः             लिखथ

उत्तम पुरुष         लिखामि            लिखावः           लिखामः

                                            पाठ- 7 

इदम्,  एतद्अदस् तथा तद् सर्वनाम शब्द हैं। निकटवर्ती वस्तु का बोध कराने के लिए 'इदम्' शब्द का तथा अत्यन्त निकटवर्ती वस्तु के लिए 'एतत्' शब्द का का व्यवहार होता है। दूर की प्रत्यक्ष वस्तु के लिए 'अदस्' शब्द का, और परोक्ष (आँख से न दिखने वाली वस्तु) के लिए 'तद्' शब्द का व्यवहार होता है । इन शब्दों का तीनों लिंगों में शब्दरूप याद कर लें। यहाँ पुल्लिंग, प्रथमा विभक्ति का शब्दरूप दिया जा रहा है ताकि आप वाक्य बना सकें।

शब्द      एकवचन     द्विवचन     बहुवचन

इदम्      अयम्                इमौ            इमे

एतद्      एषः                  एतौ            एते

अदस्    असौ                अमू           अमी

तद्        सः                तौ           ते

संज्ञा (नाम) सर्वनाम तथा क्रिया का प्रयोग।

त्वं शिक्षकः असि । त्वं युवकः असि । त्वं राजेन्द्रः असि । अहं दूतः अस्मि । अहं दासः अस्मि । अहं नृपः अस्मि। आवां मृगे स्वः अयं देवः अस्ति । इमौ देवौ स्तः । इमे देवाः सन्ति । एषः बालकः अस्ति । एतौ बालकौ स्तः । एते पथिकाः सन्ति । अयं गजः गच्छति। अमू पिबतः।

अधोलिखित क्रिया पदों के साथ  एक वाक्य बनायें-

गच्छतिश्रृणोमि, वदामि, पठामि, लिखसि, पिबावः, खादामः, पश्यामिनयावः, इच्छामि, चलसि, वसामि, जानामि, पृच्छामि, पचामि, उपविशानि, ददासि, कथयामि, हसथः स्मरसि, नृत्यतः, गायामि, तिष्ठन्ति, क्षिपति, अटन्ति, भ्रमामः, नमति, जीवामि, यच्छामि, धावामःरोदथ, क्रीड़ामि, क्रीणामि, तरामि, धारयामि, बिभेमि

अधोलिखित वाक्य को एकवचन में लिखें ।

जैसे- इमौ शिक्षकौ स्तःअयं शिक्षकः अस्ति । इमौ शुकौ गायतः। अयं शुकः गायति ।

इमे मनुष्याः सन्ति। इमे बालकाः गच्छन्ति । इमे साधकाः खादन्ति । इमे शिक्षका: हसन्ति। इमे रक्षकाः जल्पन्ति । इमे वीराः रक्षन्ति । इमे धीराः भ्रमन्ति ।

अधोलिखित वाक्य में अयम्, इमौ, इमे को रिक्त स्थान में भरें

....... शिक्षकः नमति । .......बान्धवाः खेलन्ति। ..... विद्यालयः अस्ति । .... सेवकः चलति । ....हस्तः अस्ति। । ..... कर्णः श्रृणोति । ..... केशाः पतन्ति । 

'इदम्' 'एतत्' 'अदस्' तथा 'तद्' शब्द के व्यवहार के लिए यह श्लोक याद कर लें।

इदमस्तु सन्निकृष्टं, समीपतरवर्ति चैतदोरूपम् ।

अदसस्तु विप्रकृष्टं तदिति परोक्षे विजानीयात् ।।

 आप जानते होंगें कि संस्कृत भाषा में किसी भी शब्द के साथ उसकी कारक (विभक्ति) साथ में ही जुड़ा रहता है, जबकि हिन्दी में हम विभक्ति को अलग से लिखते हैं। जब किसी शब्द के साथ विभक्ति जुड़ती है तो उसके स्वरूप में परिवर्तन हो जाता है। शब्दों के स्वरूप में परिवर्तन हो जाने का मुख्य कारण इन शब्दों का अंतिम वर्ण तथा लिंग होता है। इसलिए संस्कृत में अंतिम वर्ण अ, , ई आदि स्वर वर्ण तथा व्यंजन वर्ण के आधार पर इनके कई विभक्तियों में अलग- अलग शब्द रूप बनते हैं। अतः बालक शब्द की तरह हरि शब्द का रूप नहीं चलता है,क्योंकि बालक शब्द के अंतिम में अ अक्षर है, जबकि हरि में इ । अतः संस्कृत में हमें अकारान्त, इकारान्त, उकारान्त आदि पुल्लिंग शब्द, आकारान्त, इकारान्त, ईकारान्त आदि स्त्रीलिंग शब्द के रूप को जानना आवश्यक है। मैं यहाँ पर तीनों लिंग के अलग- अलग अंतिम स्वर तथा व्यंजन वाले शब्दों से परिचय करा रहा हूँ। आप इनका शब्द रूप देख लें।

 पाठ- 8 

पाठ-8: संख्या (गणनावाचक) शब्द (Numbers as Adjectives)

पिछले पाठों में आपने वचन का परिचय पढ़ा और जाना कि वचन से संख्या का भी बोध होता है। जब हम किसी वस्तु या व्यक्ति की गिनती (1, 2, 3, 4...) बताते हैं, तो उन्हें संख्यावाची शब्द कहते हैं।

📌 संख्यावाची शब्दों के मुख्य नियम:

  1. संख्या जब विशेषण बनती है: 1 से लेकर 18 तक के संख्यावाची शब्द वाक्यों में विशेषण (Adjectives) की तरह काम करते हैं। इसका मतलब है कि वे जिसकी विशेषता बता रहे हैं (कर्ता/संज्ञा), उसी के अनुसार अपना रूप बदलते हैं।

  2. लिंग का प्रभाव (1 से 4 तक): 'एक' (1), 'द्वि' (2), 'त्रि' (3) और 'चतुर्' (4)— इन चार संख्यावाची शब्दों के रूप तीनों लिंगों (पुल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसकलिंग) में अलग-अलग होते हैं।

  3. 5 और उसके बाद: पाँच (5) से लेकर आगे की सभी संख्याएँ तीनों लिंगों में एक समान रहती हैं।

1. संख्यावाची शब्दों के तीनों लिंगों में रूप (1 से 4 तक)

आइए, सबसे पहले 1 से 4 तक की संख्याओं के तीनों लिंगों के रूपों को इस सुंदर तालिका से समझते हैं:

संख्या

पुल्लिंग (Masculine)

स्त्रीलिंग (Feminine)

नपुंसकलिंग (Neuter)

1

एकः (बालकः)

एका (बालिका)

एकम् (फलम्)

2

द्वौ (बालकौ)

द्वे (बालिके)

द्वे (फले)

3

त्रयः (बालकाः)

तिस्रः (बालिकाः)

त्रीणि (फलानि)

4

चत्वारः (बालकाः)

चतस्रः (बालिकाः)

चत्वारि (फलानि)

विशेष: चूँकि 'एकः' हमेशा एक वस्तु के लिए आता है, इसलिए यह केवल एकवचन में होता है। 'द्वौ' हमेशा दो के लिए आता है, इसलिए यह केवल द्विवचन में होता है। 3 और उसके आगे की सभी संख्याएँ हमेशा बहुवचन में होती हैं।

2. संख्यावाची विशेषण के साथ वाक्य-प्रयोग (उदाहरण)

जैसा कि आपने सीखा, जिस लिंग और वचन का कर्ता होगा, संख्यावाची शब्द का लिंग और वचन भी वही होगा। आइए, इसके कुछ व्यावहारिक उदाहरण देखें:
(क) पुल्लिंग के उदाहरण (Masculine Examples)

एकः बालकः पठति। (एक लड़का पढ़ता है।) — यहाँ बालकः पुल्लिंग और एकवचन है, इसलिए संख्या 'एकः' लगी है।

एकः मयूरः नृत्यति। (एक मोर नाचता है।)

ध्रुवः एकः बालकः अस्ति। (ध्रुव एक लड़का है।)

एकः शिशुः रोदति। (एक बच्चा रोता है।)

द्वौ बालकौ खादतः। (दो लड़के खाते हैं।) — द्विवचन का उदाहरण

द्वौ वानरौ कूर्दतः। (दो बंदर कूदते हैं।)

द्वौ पुरुषौ गच्छतः। (दो पुरुष जाते हैं।)

त्रयः छात्राः पठन्ति। (तीन छात्र पढ़ते हैं।) — बहुवचन का उदाहरण

चत्वारः सिंहाः भ्रमन्ति। (चार शेर घूमते हैं।)

पञ्च जनाः वदन्ति। (पाँच लोग बोलते हैं।) — ध्यान दें: 'पञ्च' शब्द तीनों लिंगों में एक समान रहता है।

🔄 पुनः स्मरण (Let's Recall)

इस पाठ तक आते-आते आपने संस्कृत व्याकरण के बहुत से महत्वपूर्ण स्तंभ सीख लिए हैं। अब आप निम्नलिखित तत्वों को मिलाकर स्वयं छोटे-छोटे वाक्य बनाने में सक्षम हैं:
  1. कर्ता (संज्ञा/सर्वनाम) - जैसे: बालकः, त्वम्, अहम्, सः।

  2. संख्यावाची विशेषण - जैसे: एकः, द्वौ, त्रयः।

  3. क्रियापद (लट् लकार) - जैसे: पठति, खादतः, भ्रमन्ति।

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises)

प्रश्न 1: कोष्ठक में से सही संख्यावाची शब्द चुनकर वाक्य पूरे कीजिए:

  1. .................... बालिका लिखति। (एकः / एका / एकम्)

  2. .................... फले पततः। (द्वौ / द्वे)

  3. .................... बालकाः धावन्ति। (त्रयः / तिस्रः / त्रीणि)

  4. .................... पुष्पाणि विकसन्ति। (चत्वारः / चतस्रः / चत्वारि)

संस्कृत में संख्यावाची शब्द, उसका वचन, लिंग, शब्दरूप आदि के बारे में विस्तार से जानने के लिए संख्यावाची शब्द पर अवश्य क्लिक करें। आगे आप स्त्रीलिंग तथा नपुंसक लिंग का भी उदाहरण देखेंगें। 

पाठ-9: अकारान्त शब्द परिचय (Introduction to Akarant Words)

 पिछले पाठों में आपने संस्कृत के अनेक नियमों को जाना। आइए, अब हम संस्कृत भाषा के शब्दों की बनावट को एक बहुत ही आसान वैज्ञानिक तरीके से समझते हैं।

जब हम किसी शब्द को बोलते हैं, तो उसके सबसे अंत में जो आवाज़ (ध्वनि या अक्षर) सुनाई देती है, उसी के आधार पर उस शब्द का नाम तय होता है।

📌 नामकरण का जादुई नियम (-कार लगाने का अर्थ)

संस्कृत व्याकरण में किसी भी वर्ण (अक्षर) के आगे 'कार' लगाने का सीधा अर्थ वह अक्षर ही होता है। आइए इसे उदाहरण से समझते हैं:

·     अकारान्त: जिस शब्द के सबसे अंत में '' अक्षर होता है, उसे अकारान्त कहते हैं (जैसे— बालक)।

·     इकारान्त: जिस शब्द के सबसे अंत में '' अक्षर होता है, उसे इकारान्त कहते हैं (जैसे— रात्रि)।

·     इसी प्रकार उकारान्त (अंत में उ), आकारान्त (अंत में आ) आदि शब्द बनते हैं।

संस्कृत भाषा में ये शब्द तीनों लिंगों (पुल्लिङ्ग, स्त्रीलिङ्ग और नपुंसकलिङ्ग) में पाए जाते हैं।

 

1. अकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द (अ अंत वाले पुरुष जाति के शब्द)

आइए, सबसे पहले हम उन शब्दों को सीखते हैं जिनके अंत में '' की ध्वनि आती है और वे पुरुष जाति (पुल्लिङ्ग) का बोध कराते हैं।

मूल रूप में ये शब्द इस प्रकार दिखते हैं:

  • पक्षी और जीव: बक (बगुला), हंस (हंस), पिक (कोयल)
  • मनुष्य और सहायक: छात्र (विद्यार्थी), सेवक (नौकर), अध्यापक (शिक्षक), श्रमिक (मजदूर)
  • शरीर के अंग और प्रकृति: हस्त (हाथ), ओष्ठ (होंठ), चन्द्र (चाँद)

 

2. ः (विसर्ग) लगाकर शुद्ध शब्द बनाना

👉 ध्यान रखने योग्य विशेष बात: जब हम इन अकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दों का वाक्यों में प्रयोग करने के लिए प्रथमा विभक्ति (एकवचन) का रूप बनाते हैं, तो मूल शब्द के आगे '' (विसर्ग) लगाया जाता है। विसर्ग लगाने के बाद इनका उच्चारण '' की हल्की ध्वनि के साथ किया जाता है।

आइए, इसके शुद्ध रूप देखें:

  • बक + ः = बकः (बगुला)
  • हंस + ः = हंसः (हंस)
  • अध्यापक + ः = अध्यापकः (शिक्षक)
  • छात्र + ः = छात्रः (विद्यार्थी)
  • सेवक + ः = सेवकः (सेवक)
  • पिक + ः = पिकः (कोयल)

✍️ अभ्यास कार्य (Exercises)

प्यारे बच्चो! अब आप स्वयं शब्दकोश (Dictionary) या अपनी समझ के आधार पर नीचे दिए गए प्रश्नों को हल करने का प्रयास कीजिए:

प्रश्न 1: अपने संस्कृत शब्दकोश को देखकर पुल्लिङ्गवाची अकारान्त 10 ऐसे शब्दों को लिखिए, जो किसी व्यक्ति या जीव का नाम हो।
(
उदाहरण के लिए: रामः, कृष्णः...)

प्रश्न 2: पुल्लिङ्गवाची पाँच (5) शरीर के अंगों के नाम लिखिए, जो अकारान्त हों (जिनके अंत में '' आता हो)।
(
उदाहरण के लिए: हस्तः...)

प्रश्न 3: पुल्लिङ्गवाची पाँच (5) पक्षियों के नाम संस्कृत में विसर्ग लगाकर लिखिए।
(
उदाहरण के लिए: सुकः...)

प्रश्न 4: अपने आस-पास प्रतिदिन उपयोग में आने वाली 10 वस्तुओं के नाम लिखिए जो अकारान्त पुल्लिङ्गवाची हों।
(
उदाहरण के लिए: चषकः अर्थात गिलास...)

गूगल प्ले स्टोर से डाउनलोड करने के लिए हिन्दी संस्कृत शब्दकोश  पर क्लिक करें। इस

 ऐप में 10 हजार से अधिक शब्द है। असुविधा होने पर 7388883306 पर फोन करें ।

पाठ: इकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द परिचय (Introduction to Ikarant Masculine Words)

प्यारे बच्चो! पिछले पाठ में हमने अकारान्त (अ अक्षर से अंत होने वाले) शब्दों को सीखा था। आइए, अब हम उन शब्दों को सीखते हैं जिनके अंत में '' स्वर की ध्वनि आती है और वे पुरुष जाति का बोध कराते हैं। इन्हें व्याकरण में 'इकारान्त पुल्लिङ्ग' शब्द कहा जाता है।

🌟 प्रमुख इकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द और उनके उदाहरण:

  • हरि (विष्णु)
  • मुनि (ऋषि)
  • कपि (बंदर)
  • अग्नि (आग)
  • गिरि (पहाड़)
  • निधि (खजाना)
  • विधि (भाग्य / नियम)
  • ऋषि (महात्मा)
  • कवि (कवि)

1. सामान्य नियम और शब्दों का वर्गीकरण (मुनि / हरि के समान)

संस्कृत व्याकरण का सामान्य नियम यह है कि अधिकांश इकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दों के रूप 'मुनि' या 'हरि' शब्द के समान ही चलते हैं। यदि आप एक शब्द का रूप याद कर लेते हैं, तो नीचे दी गई श्रेणियों के सभी शब्दों के रूप आप बहुत आसानी से बना सकते हैं:

(क) प्रकृति और स्थानवाची शब्द:

  • अद्रि / गिरि (पहाड़)
  • उदधि / जलधि / अब्धि / वारिधि / पयोधि (समुद्र)
  • वह्नि / अग्नि (आग)

(ख) जीव और वस्तुवाची शब्द:

  • अहि (सर्प / साँप)
  • असि (तलवार)
  • पवि (वज्र)
  • मणि (रत्न / कीमती पत्थर)
  • कपि (बंदर)

(ग) मानव और देववाची शब्द:

  • यति (तपस्वी)
  • विरंचि (ब्रह्मा जी)
  • नृपति (राजा)
  • रवि (सूर्य देव)
  • अतिथि (मेहमान)
  • अरि / अराति (शत्रु / दुश्मन)
  • मुनि / ऋषि / कवि

(घ) अन्य संज्ञाएँ:

  • व्याधि (रोग / बीमारी)
  • उपाधि (पदवी / Degree)
  • विधि (नियम या कानून)
  • निधि (कोश / खजाना)

🧠 विशेष ज्ञान: '' को '' करने का नियम (णत्व विधान)

यद्यपि ऊपर दिए गए सभी शब्दों के रूप मूल रूप से 'मुनि' और 'हरि' के समान ही चलते हैं, लेकिन महर्षि पाणिनि के व्याकरण नियमों के अनुसार एक बहुत ही सूक्ष्म अंतर आता है:

नियम: जिस इकारान्त शब्द में पहले से '' या '' वर्ण मौजूद होते हैं (जैसे— हरि, रवि, गिरि, अरि, पाणि, मणि), उनमें तृतीया विभक्ति एकवचन और षष्ठी विभक्ति बहुवचन के प्रत्यय में '' के स्थान पर '' हो जाता है।

आइए, इस अंतर को ध्यान से देखें:

  • मुनि शब्द में (सामान्य रूप): तृतीया एकवचन में 'मुनिना' और षष्ठी बहुवचन में 'मुनीनाम्' बनता है।
  • हरि/पाणि/मणि में (णत्व रूप): यहाँ '' बदलकर '' हो जाता है; जैसे— हरिणा (हरीणाम्), पाणिना (पाणीणाम्), मणिना (मणीणाम्)

2. संयुक्त शब्दों का नियम (Compound Words Rule)

याद रखें कि संस्कृत में शब्द का रूप हमेशा उसके सबसे अंतिम अक्षर के आधार पर बनता है। इसलिए 'पति' शब्द के पहले यदि कोई उपसर्ग या अन्य शब्द जुड़कर बड़ा शब्द बनता है, तो उस पूरे संयुक्त शब्द का रूप भी मूल शब्द की तरह ही चलता है।

इसी नियम के आधार पर नीचे दिए गए सभी शब्दों के रूप एक समान चलेंगे:

  • भूपति, नरपति, लोकपति, गणपति, अधिपति आदि।

3. सामान्य नियम के अपवाद (Exceptions)

संस्कृत व्याकरण में कुछ ऐसे इकारान्त पुल्लिङ्ग शब्द भी हैं, जो संज्ञा होने पर भी सामान्य शब्दों (कवि या मुनि) की तरह नहीं चलते। ये अपवाद हैं:

  1. पति (केवल स्वतंत्र रूप में प्रयुक्त 'पति' शब्द का रूप अलग चलता है)।
  2. सखि (मित्र / सखा)।

(सुझाव: शब्दरूपों के इस बारीक अंतर को गहराई से समझने के लिए आप संस्कृत अभ्यास पर चटका (क्लिक) लगाकर रवि, पति तथा सखि शब्द के रूपों के अंतर को साक्षात् देख सकते हैं।)

 

4. हरि शब्द का रूप (प्रथमा विभक्ति)

वाक्यों में प्रयोग सीखने और उसकी शुरुआत करने के लिए आइए सबसे पहले 'हरि' शब्द का प्रथमा विभक्ति (तीनों वचनों) में शुद्ध रूप देखते हैं:

विभक्ति

एकवचन (Singular)

द्विवचन (Dual)

बहुवचन (Plural)

प्रथमा

हरिः (एक हरि)

हरी (दो हरि)

हरयः (सब हरि)

 

✍️ वाक्य बनाने का अभ्यास (Sanskrit Sentence Practice)

अब आप इसी 'हरि' शब्द के रूप के आधार पर कपि और ऋषि शब्द का प्रथमा विभक्ति रूप मन में सोचिए, और उनके साथ क्रिया शब्द (जैसे— कूर्दति, वसति) जोड़कर वाक्य बनाने का अभ्यास कीजिये:

व्यावहारिक उदाहरण (Examples):

  • एकवचन: हरिः गच्छति। (हरि जाता है।)
  • द्विवचन: हरी गच्छतः। (दो हरि जाते हैं।)
  • बहुवचन: हरयः गच्छन्ति। (सब हरि जाते हैं।)

📝 रिक्त स्थानों की पूर्ति कीजिए:

  1. कपि (बंदर) + कूर्द् (कूदना):

o   एकवचन: कपिः कूर्दति। (बंदर कूदता है।)

o   द्विवचन: कपी ....................। (उत्तर: कूर्दतः)

o   बहुवचन: .................... कूर्दन्ति। (उत्तर: कपयः)

  1. ऋषि (महात्मा) + वस् (रहना):

o   एकवचन: .................... वसति। (उत्तर: ऋषिः)

o   द्विवचन: ऋषी वसतः। (दो ऋषि रहते हैं।)

o   बहुवचन: ऋषयः ....................। (उत्तर: वसन्ति)

शब्दरूप के लिए संस्कृत अभ्यास पर चटका लगाकर रवि, पति तथा सखि शब्द के रूप को में अंतर को देखें। 


ईकारान्त पुल्लिंग शब्द
संस्कृत में अधिकांश ईकारान्त शब्द स्त्रीलिंगवाची होते हैं। ईकारान्त पुल्लिंग शब्द बहुत कम हैं।
उदाहरण-  सुधीप्रधीग्रामणीनीयवक्रीसुधीसुखी । 
उकारान्त पुल्लिंग शब्द
ऋतु,  गुरुप्रभुशम्भुइक्षु,, तनु,लधुरेणुराहुबाहुविभुविष्णुभीरुभिक्षुशत्रुशम्भुकेतुपशुमनु,   शिशु, साधुविधु (चन्द्र), पशु, शम्भु, वेण (बाँस ) भृगु, रिपु ( शत्रु ), ऊरु ( जाँघ ), जन्तु, मृत्यु, ऋतु, हेतु ( कारण ), तरु ( वृक्ष ), ऋतु, इषु (बाण), अंशु (किरण), वाहु, सेतु (पुल), सूनु (पुत्र), कटु, विन्दु ( बूंद ) बन्धु, वेपथु ( कँपकँपी ) राहु आदि
ऊकारान्त पुल्लिंग शब्द
हूहूखलपूवर्षाभूआत्मभू आदि।
ऋकारान्त पुल्लिंग शब्द
वक्तृ, कर्तृ, पितृ, देवृ (देवर), भर्तृअध्येतृजेतृद्ष्टृपठितृ , स्तोतृहोतृ, नेतृ, नप्तृ, विधातृ, आदि।
यह शब्द किसी भी धातु से तृन और तृच् प्रत्यय लगाकर बनाया जाता हैइस प्रत्यय का सामान्य अर्थ होता है- वाला। सम्बन्ध वाचक नप्तृभातृजामातृदुहितृ  आदि का धातु के अर्थ के साथ वाला अर्थ नहीं लगेगा। सम्बन्ध वाचक ऋकारान्त शब्द का रूप पितृ शब्द के समान चलता है।
ओकारान्त पुल्लिंग शब्द
गो
ऐकारान्त पुल्लिंग शब्द
रै
औकारान्त पुल्लिंग शब्द
ग्लौ
पाठ- 10 
आकारान्त स्त्रीलिंग शब्द
सामान्यतः पुल्लिंग शब्द के अन्त में आ प्रत्यय (टाप्डाप् और चाप्) लगाने पर वह शब्द स्त्रीलिंग हो जाता है। कुछ शब्द केवल स्त्रीलिंगवाची ही होते हैं
जैसे- कथाउषाछायाआज्ञाआत्मजाइच्छाजिज्ञासाचिन्ताउमाउपमाजिह्वानिन्दा,भाषा आदि । एकोनविंशतिः 19 से लेकर नव नवतिः तक के सभी संख्यावाची शब्द स्त्रीलिंग होते हैं। संस्कृत में सर्वनाम शब्द भी होते है। इसका भी स्त्रीलिंग होता है।
स्वर तथा व्यंजन वर्णान्त पुल्लिंगस्त्रीलिंग तथा नपुंसक शब्दों को विस्तार पूर्वक जानने तथा समझने के लिए लघुसिद्धान्तकौमुदी (अजन्तपुल्लिंगतः अजन्तनपुंसकलिंगपर्यन्तम्) पर क्लिक करें। यहाँ शब्द रूपों के  निर्माण के नियम बताये गये हैं तथा उपयोगी लिंक भी दिये गये हैं ।
इकारान्त स्त्रीलिंग शब्द
बुद्धिगतिशुद्धि ,भक्ति, रुचिशक्तिश्रुतिरुचिस्मृतिशान्तिनीतिरात्रिजातिमति
ईकारान्त स्त्रीलिंग शब्द
 गौरीजानकीपृथ्वीकौमुदीसावित्रीगायत्रीनलिनीलक्ष्मीश्रीस्त्रीनदी
उकारान्त स्त्रीलिंग शब्द 
तनु, (शरीर) रेनु, (धूल) हनु (ठुड्डी)
ऊकारान्त स्त्रीलिंग शब्द
चमू, (सेना)  रज्जूकर्कन्धू (बेर)
ऊकारान्त स्त्रीलिंग शब्द
मातृयातृ (देवरानी) दुहुतृ (लड़की)
अकारान्त नपुंसकलिंग शब्द
मित्रवनअरण्यमुखकमलकुसुमपुष्पनक्षत्रपत्रजलगगनशरीरपुस्तकज्ञान
इकारान्त नपुंसकलिंग शब्द
अस्थिअक्षि, (आँख) दधि को छोड़कर सभी इकारान्त नपुंसक लिंग के शब्द वारि के समान होते हैं।
उकारान्त नपुंसकलिंग शब्द
दारुजानु, (घुटना) तालुमधु
ऋकारान्त नपुंसकलिंग शब्द
कर्तृनेतृधातृ
 पाठ- 11 

 व्यंजनान्त शब्द

संस्कृत के अधिकांश व्यञ्जनान्त शब्द धातुओं से बनते हैं अतः इन शब्दों का कर्ता में बहुत कम प्रयोग देखने को मिलता है। धातु में प्रत्यय लगने के बाद बने व्यञ्जनान्त शब्दों का प्रयोग विशेषण तथा अन्य रूप में होता है। कुछ संख्यावाची शब्द तथा कुछ सर्वनाम शब्द व्यञ्जनान्त होते हैं। ऐसे व्यञ्जनान्त शब्द तथा उसके अर्थ यहाँ दिये जा रहे हैं।

व्यञ्जनान्त पुल्लिंग शब्द -

लिह् = चाटने वाला, चतुर् = चार, किम् = कौन, क्या, इदम् = यह, तद् वह, एतत् = यह, राजन् = राजा, पञ्चन् = पाँच, अस्मद् = मैं,  युष्मद् = तुम, पयोमुच् = जल को छोड़ने वाला बादल, सुपात् =  सुन्दर पैर वाला, भवत् =  आप, चन्द्रमस् = चन्द्रमा, अदस् = वह (दूर का)

व्यञ्जनान्त स्त्रीलिंग शब्द

उपानह् =  जूता, गिर् = वाणी, चतुर् = चार, वाच् = वाणी, अप् = जल । किम् = क्या, सर्वनाम त्यद्, तद्, यद्, एतत्।

व्यञ्जनान्त स्त्रीलिंग शब्द

वार् = जल, अहन् =  दिन, दण्डिन् = दण्ड वाला, चतुर् = चार, किम् = क्या, इदम् = यह, एतत् = यह (पास का)

हिन्दी में हम तद्भव तथा उर्दू शब्दों के प्रयोग कर लेते हैं। जिस दिन संस्कृत के तत्सम शब्द से हम परिचित होते जायेंगेंसंस्कृत सीखना आसान होता जाएगा। इसी प्रकार आप क्रमशः पुल्लिंगवाची,स्त्रीलिंगवाची,नपुंसक लिंगवाची हलन्त शब्द तथा तीनों लिंगों के स्वरान्त शब्दों को खोजें। 
यहां पर शब्दरूप देना संभव नहीं है। इसके लिए संस्कृत अभ्यास पर चटका लगाकर एक अन्य कड़ी पर जायें । इस लिंक पर सुबन्त के शब्दरूप एवं तिङन्त के धातुरूप दिये हैं। विस्तार के भय तथा अनावश्यक श्रम से बचने के लिए सर्वनाम शब्दों के रूप तथा प्रयोग यहाँ नहीं दिये जा रहे हैं। इस ब्लॉग पर आये लोगों को चाहिए कि वे संस्कृत अभ्यास पर क्लिक करके सभी प्रकार का रूपों तथा प्रत्ययों का अभ्यास करें। 
इस प्रकार आपके पास संस्कृत का बृहद् शब्दकोश जमा हो जाएगा। 

शब्दों का लिंग का निर्धारण


प्रत्ययों के प्रयोग से शब्दों के लिंग का निर्धारण होता है। संस्कृत में शब्दों के लिंग को जानने के लिए प्रत्यय के बारे में जानना सहायक होता हैजिसे हम आगे के पाठ में पढ़ेंगें। अभी तक हम वचन, प्रथम पुरुष, मध्यम पुरुष, उत्तम पुरुष तथा इसके लिए प्रयोग की जानी वाली क्रिया के बारे में जान चुके हैं। अलग- अलग शब्दों के लिंग के बारे में भी जान लिया। उसके शब्द रूपों को देखकर वर्तमान काल की क्रिया के साथ वाक्य बनाईये। कतिपय प्रयोग यहाँ दिये जा रहे हैं।

संज्ञा (कर्ता) शब्दों के साथ क्रिया का प्रयोग-

एकः बालकः रोदति। हरिः ब्रवीति। पितरौ हसतः। अंगं अस्ति । बकः कुप्यति । चन्द्रः  एति।  सेवकाः अश्नन्ति। अध्यापकाः पाठयन्ति । पिकौ ईर्ष्यतः। पितरौ वसतः। धनम् अस्ति । स्वप्नः विद्यते। आनन्दः अपेक्षते। 

संज्ञा तथा सर्वनाम शब्दों के साथ क्रिया का प्रयोग-

सः भानुः ददाति। सः अमरः कूर्दति। सा बालिका चोरयति। द्वे गौर्यौ कथयतः। एषा उज्जयिनी आपयति। तौ श्रमिकौ अर्जयतः। सर्वे जानन्ति । सः अस्ति। भवान् पृच्छतु । भवती शक्नोति। सः चिकित्सकः अस्ति। द्वे रूपे वर्तेते। बालिका त्रीणि अक्षराणि वेत्ति। ते नृत्यन्ति। अहम् अस्मि । अहम् नमामि। अहम् तिष्ठमि। अहं बालकः अस्मि। अहं बालिका अस्मि। आवां स्वः । आवां नयावः। वयं स्मः। वयं दण्डयामः। त्वं गच्छसि। त्वं पठसि। त्वं खादसि। यूवां वदथः। यूयं ….। एते मानवाः सन्ति।

सर्वनाम तथा अव्यय से अनिश्चयवाचक शब्द 

1. अनिश्चयवाचक शब्द बनाने के लिए प्रश्नवाचक विभक्तियुक्त किम्" शब्द के परे 'चित्', 'चनऔर 'अपिशब्द लगाकर वाक्य बनाया जा सकता है । यह चित् और चन प्रत्ययान्त शब्द अव्यय होता है और विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है। चित्” और चन” प्रत्यय लगाने से पहले किम्" शब्द में विशेष्य के अनुसार- लिङ्गवचन और विभक्ति लगा लें। इसके बाद उन रूपों के आगे चित्" और चन" प्रत्यय लगा लें।

 ये कौनक्याइत्यादि अर्थों के द्योतक होते हैं। 

जैसे - 

कोई आदमी - "कश्चित् मानवः एवं वदति" । 

"कश्चन पिता गृहं गच्छति" । 

किसी को "कश्चित् ( कञ्चन ) मानुषम्" । 

किसी वन में बिल्ली रहती है- "कस्मिंश्चित् गृहे बिडालः वसति"। 

किसी जंगल में शेर रहता है-  "कस्मिञ्चन वने सिंहः निवसति" । 

किसी बालिका का थैला है-कस्याश्चिद् बालिकायाः स्यूतः अस्ति"। 

कई बालिकायें जाती है - "काश्चन वालिकाः गच्छन्ति" । 

किसी बालिका के साथ वृद्धा का परिचय है- "कयाचिद् बालिकया सह वृद्धायाः परिचयः अस्ति" । 

किसी ग्राम की यह रीति है – “केषाश्चिद् ग्रामाणां इयं रीतिः । 

कश्चित् वदति । केचन जनाः आगतवन्तः । केचन जनाः में क्रिया को करने वाला जनाः है अतः प्रश्नवाचक किम् शब्द में भी वही लिंग तथा वचन होगा, जो कर्ता में है। अतः किम् पुल्लिंग शब्द के बहुवचन का रूप के + चन का प्रयोग किया गया।

2. आपने देखा कि अनिश्चयवाचक सर्वनाम 'किम्' शब्द से तीनों लिङ्गों में तथा सब विभक्तियों में चित्, चन, जोड़ने के बाद अनिश्चय वाचक सर्वनाम बनता है। इसी प्रकार अपि तथा स्वित् जोड़कर भी अनिश्चय वाचक सर्वनाम बनता है।  जैसे पुँल्लिङ्ग में कश्चित्, काचित्, किञ्चित्, कोऽपि, केचन, कयाचन, काश्चित् इत्यादि । इनके रूप निम्नलिखित होते हैं । कश्चित्, कौचित् , केचित्, कञ्चित्, काँश्चित्, केनचित्, काभ्याञ्चित्, कैश्चित्, कस्मैचित्, केभ्यश्चित् , कस्माच्चित्, कस्यचित्, कयोश्चित्, केषाञ्चित्, कस्मिंश्चित्, केषुचित् । ऐसे ही 'चन' लगाकर कश्चन आदि । अपि के साथ-कोऽपि, कावपि, केऽपि, कमपि, कानपि, केनापि, काभ्यामपि, कैरपि, कस्मा अपि, केभ्योऽपि २, कस्मादपि, कस्यापि, कयोरपि , केषामपि, केष्वपि । स्त्रीलिङ्ग और नपुंसक में भी 'चित्', 'चन' 'अपि' आदि लगाकर काचित्, काचन, कापि, किञ्चित्, किञ्चन, किमपि आदि रूप होते हैं ।

पाठ- 12 

वाक्य विचार

पदे न वर्णा विद्यन्ते वर्णेष्वयवा न च।
वाक्यात् पदानामत्यन्त प्रविवेको न कश्चन। (वाक्यपदीयं ब्रह्मकाण्डम् -73)

अब तक हमारा संस्कृत के शब्दों से परिचय हो चुका है। हम संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण, क्रिया, अव्यय,संख्यावाची शब्द तथा प्रादि उपसर्ग के बारे में, शब्दों के लिंग (पुल्लिंग, स्त्रीलिंग तथा नपुंसक लिंग) तथा वचन (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन) के बारे में संक्षेप में जान चुके हैं। इनके कतिपय उदाहरण भी देख चुके हैं।
 इस पाठ में हम उक्त सभी का क्रमशः संस्कृत में वाक्य बनाना सीखेंगे। सबसे पहले संज्ञा शब्द के साथ वर्तमान काल की क्रिया का प्रयोग करेंगें। इसके आगे तीनों वचनों तथा पुरुषों कापुनः तीनों लिंगों का प्रयोग करेंगें । संस्कृत शिक्षण पाठशाला 2 में क्रमशः भूतकाल एवं भविष्यत् काल का प्रयोग करेंगें। 
सर्वनाम

सर्वनाम शब्द को 6 भागो में विभाजित किया जाता है, यथा-

(1) पुरुषवाचक सर्वनाम

(2) संकेतवाचक सर्वनाम

(3) सम्बन्धवाचक सर्वनाम

(4) प्रश्नवाचक सर्वनाम

(5) अनिश्चयवाचक सर्वनाम

(6) निजवाचक सर्वनाम 

प्रश्नवाचक सर्वनाम तथा अव्यय

1.प्रश्न तथा सम्बन्धवाचक सर्वनामों का अर्थ प्रकट करने के लिए संस्कृत में क्रमशः किम् ( पु० कःस्त्री० कानपुं० किम् ) तथा यत् (पुं० यस्त्री० याः नपुं० यत् ) शब्दों का प्रयोग किया जाता है ।

जैसे - प्रश्नवाचक - त्वं किं पठसि युवां किं पठथः यूयं कि पठथ । त्वं कां नमसि युवां कां नमथः यूयं कां नमथ त्वं कः असि युवां कः स्थः यूयं के सन्ति ? भवान् कः अस्ति ? कः अश्वः अस्ति ? सः अश्वः अस्ति।

भवतः का प्रतिष्ठा   कस्मिन् देशे भवान् कथं जातः केन कृतम् का ते माता कः ते पिता कथं शास्त्राणां परिचयः 

तीनों कोष्ठक से एक-एक पद लेकर वाक्य बनायें।

शिक्षकाः आवां युवां शिक्षिकाः यूयं वयं जनाः

कुत्र किं कथं

सन्ति कुरुथ गायावः लिखथः आगच्छन्ति विहरन्ति

सापेक्षताबोधक सर्वनाम 

2.कई बार विद्यार्थियों को जो जो" कुछ ( Whatever ) इत्यादि भावों को प्रकट करने में बहुत कठिनता होती है। ऐसी अवस्था में 'यत्शब्द का दो बार प्रयोग करने से अनुवाद सरलता से किया जा सकता है। 

यत् ( जो-who, which ) शब्द का पुंल्लिङ्ग में यःयौये आदिस्त्रीलिङ्ग में यायेयाः आदि तथा नपुंसक में यत्येयानि आदि के रूप 'तत्शब्द के समान समझने चाहिए।

जैसे - यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् इत्यादि ।
युष्मद् तथा अस्मद् में विकल्प से खञ्अण् तथा छ प्रत्यय लगते हैं । इससे मामकीनमामकीनात्वदीयत्वदीया आदि बनते हैं। सर्वनाम के बाद लगने वाले प्रत्ययों पर यथाप्रसंग विस्तार पूर्वक चर्चा करेंगें।
इदम् एतद् तद्अदस्यद्किम् तथा अनिश्चयवाचक एवं निश्चयवाचक सर्वनाम का प्रयोग विशेषण अर्थ में भी होता है।  जैसे- सः पुरुषःसा स्त्री। एषः रामःएषा गीता । आगे के अध्याय में हम सर्वनाम के भेद तथा प्रयोग पर चर्चा करेंगें। एक रोचक श्लोक द्वारा समझें-
का लोकमाता किमु देहमुख्यं रते किमादौ कुरुते मनुष्यः ।
को दैत्यहन्ता वद वै क्रमेण गौरीमुखं चुम्बति वासुदेवः ।।
विशेषण
जिस शब्द से विशेष्य (संज्ञाके गुणअवस्थासंख्या तथा परिमाण आदि का बोध होता हो, वह विशेषण कहलाता है। जैसे- लघुः, एकः, भद्रः, तुङ्गः, कोमलः, वाचालः, मूर्खः, दुर्बलः, धनिकः, उदीच्यः, दाक्षिणात्यः आदि। 

विशेषण के मुख्यतया चार प्रकार से विभाग किये जा सकते हैं ।

(1गुणवाचक विशेषण । यथाः– “नीलं नभः, “रक्तं उत्पलम्" इत्यादि ।

(2अवस्थावाचक विशेषण । । यथाः– वाचालः बालकः।

(3परिमाणवाचक विशेषण। यथा- "स्वल्पं तोयम्", "प्रभूतं धनम्" "प्रचुरं दुग्धम्" इत्यादि ।

(4संख्यावाचक विशेषण । यह विशेषण दो प्रकार से विभक्त है। (कसंख्या बोधक। जैसे-एकद्वि, त्रिचतुरपञ्चन् इत्यादि । (ख) (पूरणवाचक) जैसे: - प्रथमः,द्वितीय:, तृतीयःइत्यादि ।
विशेषण के द्वारा जिसकी विशेषता बतायी जाती हैउसे विशेष्य कहते हैं। विशेषण विशेष्य के अनुसार ही गुणों वाला होता है। अर्थात् विशेष्य के लिए जिस लिंगवचन तथा विभक्ति का प्रयोग किया जाता हैविशेषण में भी वही लिंगवचन तथा विभक्ति का प्रयोग होता है। यह सामान्य नियम है। तद्धित तथा कृदन्त प्रत्यय के प्रकरण (संस्कृत के तद्धित प्रत्यय तथा संस्कृत शिक्षण पाठशाला 4) में विशेष्य एवं विशेषण का एक ही लिंग नहीं होने का विशेष नियम बताये गये हैं।

सामान्य नियम के लिए एक श्लोक याद कर लें-

यल्लिङ्गं यद्वचनं या च विभक्तिः विशेष्यस्य।

तल्लिङ्गं तद्वचनं सा च विभक्तिः विशेषणस्य।। 
 समान लिंग का उदाहरण- बालकः सुन्दरः अस्ति। बालिका सुन्दरी अस्ति। पुष्पं सुन्दरम् अस्ति। बालकः लघुः अस्ति। बालिका लघ्वी अस्ति। बालकः सुन्दरः में बालक विशेष्य तथा सुन्दरः  विेशेषण है। सुन्दरः शब्द बालक की विशेषता बताता है अतः बालकः (पुल्लिंग) के समान ही सुन्दरः में पुल्लिंग का प्रयोग हुआ। 
संख्यावाचक विशेषण
1 से 10 तक संख्यावाची शब्द का प्रयोग तीनों लिंगों में होता है।  कुछ संख्यावाची विशेषण जैसे- शतविंशतित्रिंशत् आदि के नियत लिंग होते है। इनके वचन भी विशेष अर्थ में ही बदलते हैं। गुणवाची अन्य विशेषण शब्दों का प्रयोग तथा उदाहरण आगे के पाठों में भी देखेंगें।
 संख्यावाची शब्दों के बारे में अधिक जानने के लिए चटका लगायें।
 वाक्य में विशेष्य और विशेषण

प्रश्न- श्वेतः अश्वः धावति में कौन विशेषण पद है ?

उत्तर - श्वेतः विशेषण पद है ।

प्रश्न- चतुरः काकः जलं पिबति में कौन विशेष्य पद है ?

उत्तर - काकः विशेष्य पद है ।

प्रश्न-  पुष्पं सुन्दरं अस्ति इस वाक्य में कौन विशेष्य तथा कौन विशेषण पद है ?

उत्तर - पुष्पं विशेष्य तथा सुन्दरं विशेषण पद है ।

प्रश्न-  अहं श्वेतम् अश्वं पश्यामि इस वाक्य में कौन विशेष्य तथा कौन विशेषण पद है ?

उत्तर - अश्वं विशेष्य तथा श्वेतम् विशेषण पद है ।

प्रश्न-  एतत् जलं पवित्रम् अस्ति इस वाक्य में कौन विशेष्य तथा कौन विशेषण पद है ?

उत्तर - जलं विशेष्य तथा पवित्रम् विशेषण पद है ।

प्रश्न-  वीराणां पुरुषाणां प्रशंसा सर्वत्र भवति इस वाक्य में कौन विशेष्य तथा कौन विशेषण पद है ?

उत्तर - पुरुषाणां विशेष्य तथा वीराणां विशेषण पद है ।

प्रश्न-  रामः भरतात् ज्येष्ठतरः आसीत् इस वाक्य में कौन विशेष्य तथा कौन विशेषण पद है ?

उत्तर - रामः विशेष्य तथा ज्येष्ठतरः विशेषण पद है

इसी प्रकार अधोलिखित विशेष्य-विशेषण को समझें ।

कृष्णः पीतम् अम्बरं धरति। (विशेष्य- अम्बरम्, विशेषण- पीतम्)

कृष्णः पीतम् अम्बरं धरति। (विशेष्य- अम्बरम्विशेषण- पीतम्)

भारवाहने अक्षमान् सैनिकान् विलोकयन् अवदत्। (विशेष्य- सैनिकान् , विशेषण- अक्षमान्)

मनोहरः सत्यनिष्ठः आसीत्। (विशेष्य- मनोहर:विशेषण- सत्यनिष्ठ:)

तव शरीरं सुन्दरम् अस्ति। (विशेष्य- शरीरम्विशेषण- सुन्दरम्)

रामायणे मानवतापोषकानि जीवनमूल्यानि वर्णितानि सन्ति। (विशेष्य- जीवनमूल्यानिविशेषण- मानवपोषकाणि)

विश्पला वीराङ्गना आसीत्। (विशेष्य- विश्पलाविशेषण- वीराङ्गना )

क्रिया

जिन शब्दों से किसी काम का करना या होना जाना जाता हैउसे क्रिया कहते हैं। संस्कृत में  इसके लिए धातु शब्द का प्रयोग किया गया है।  
उदाहरण- पठ्, खाद्, चल्, लिख्, वद्, पा, हस्, कूज्, आदि।

1. क्रिया को विभाजित कर दिखाने के लिए लट्, लङ् आदि 10 लकार बनाये गये हैं। इसमें से 5 लकारों का प्रयोग मुख्य रूप से किया जाता है।  जैसे पठतिहसतिखेलतिअपठत्पठिष्यतिपठतु आदि। आपको अभी केवल 5 लकार का ही रूप समझना है। आज्ञा देनेपरामर्श करने, प्रश्न पूछनेआशीर्वाद देने आदि के लिए यहाँ तीन अलग-अलग लकारों का प्रयोग होता है। 
3. धातुएँ तीन प्रकार की होती है। परस्मैपदी, आत्मनेपद तथा उभयपदी । जो धातुएं परस्मैपदी हैं, वे कर्तृवाच्य में परस्मैपदी रहती हैंआत्मनेपदी धातुएं कर्तृवाच्य में आत्मनेपदी ही रहती हैंइसी प्रकार कर्तृवाच्य में उभयपदी (परस्मैपद तथा आत्मनेपदधातुओं के साथ दोनों पदों की विभक्तियों का प्रयोग होता है।
विशेष

एक लकार के तीनों वचन तथा तीनों पुरुष मिलाकर नौ रूप होते है। किसी एक धातु के दस लकारों में नब्बे रूप बन जाते हैं। इस तरह प्रत्येक धातु के ९०-९० रूप बनते हैं। कुछ धातु परस्मैपदी होते हैं तो कुछ आत्मनेपदी। यदि कोई धातु उभयपदी अर्थात् परस्मैपदी और आत्मनेपदी दोनों हो तो रूप दो गुने हो जायेंगे। इस तरह परस्मैपदी के ९० रूप तथा आत्मेपदी के ९० रूप मिलाकर कुल १८० रूप होंगे। उसमें भी कई धातुओं में अनेक कार्यों में वैकल्पिक रूप बनते हैं। इस तरह रूपों की संख्या और बढ़ जाती हैं। फिर आगे णिजन्त में लगभग २००सन्नन्त में लगभग २००यडन्त में लगभग २०० यङ्लुङन्त में लगभग २०० करके एक धातु के हजार से भी ऊपर रूप बन जाते हैं। इसके बाद धातुओं से उपसर्ग भी लगते हैं। २२ उपसर्ग हैंउनमें अधिकतर धातु के साथ जुड़ते हैं। कहीं एक ही उपसर्ग धातु से जुड़ता है तो कहीं एक से अधिक दोतीन भी लगते हैं। कहीं वे ही उपसर्ग व्यत्यास अर्थात् आगे पीछे होकर लगते हैं। इस तरह एक धातु के लाखों भी रूप हो सकते हैं। एक धातु को अच्छी तरह से समझ लिया जाय तो हजारोंलाखों शब्दों को समझा जा सकता है। अतः मैने संस्कृत शिक्षण पाठशाला में धातु के लिए अलग से दो पोस्ट लिखा हूँ।  इसके बाद आपको संस्कृत शिक्षण पाठशाला 2 तथा संस्कृत शिक्षण पाठशाला 3 अवश्य पढ़ना चाहिए।

आपने जाना कि धातु को क्रिया कहा जाता है। आगे संस्कृत शिक्षण पाठशाला 4 में आप कृदन्त प्रत्ययों के बारे में पढ़ेंगे। धातुओं के साथ कृत् प्रत्यय के योग करने पर संज्ञाविशेषण या अव्यय पद बनते हैं।

1. साधारणतः कृत् प्रत्यय कर्ता (संज्ञा) अर्थ में होते हैं। 'तृच्', 'क्तिन्', 'ण्वुल्', 'ल्युट्आदि प्रत्यय कर्ता में होते हैं।

2.  'शतृ', 'शानच्', 'तव्यत्' , 'अनीयर्', 'यत्प्रत्यय का धातु के साथ योग होने पर विशेषणवाची पद बनते हैं।

3.  धातुओं से 'क्त्वा', 'ल्यप्' , 'तुमुन्प्रत्ययों के योग होने पर अव्ययवाची पद बनते हैं।

                                                        पाठ- 13    

विशेष्य और विशेषण पर विचार

यल्लिंगं यद्वचनं या च विभक्तिर्विशेषस्य ।
तल्लिंगं तद्वचनं सैव विभक्तिर्विशेषणस्यापि ॥

विशेष्यस्य हि यल्लिङ्गं विभक्तिर्वचनञ्च यत् ।

तानि सर्वाणि योज्यानि विशेषणपदेष्वपि ।। 


1. जो लिंग, वचन और विभक्ति विशेष्य में होती है, वही लिंग, वचन और विभक्ति विशेषण में भी होगा।
विशेषण की परिभाषा- जो विशेष्य की विशेषता बताता है, उसे विशेषण कहते हैं। अर्थात् जिसके द्वारा विशेष्य को दूसरे पदार्थ से अलग किया जाता है उसे विशेषण तथा जो अलग किया जाता है वह विशेष्य है।
  • जिसका क्रिया के साथ सीधा सम्बन्ध होता है वह प्रधान होता है। किसी भी वाक्य में विशेषण गौण या अप्रधान होता है और विशेष्य प्रधान। विशेषण का क्रिया के साथ सीधा सम्बन्ध नहीं होता है। 
  • विशेष्य और विशेषण में समानाधिकरण होता है। महाभाष्यकार पतञ्जलि के शब्दों में न ह्युपाधेरुपाधिर्भवति, न विशेषणस्य विशेषणम् अर्थात् विशेषण का विशेषण नहीं होता। 
  • आपने पाठ 2 के विशेषण शीर्षक में संख्यावाची शब्दों के बारे में अधिक जानने के लिए चटका लगाकर पढ़ा होगा कि 1 से 18 तक की संख्या केवल विशेषण के रूप में, 20 से लेकर आगे की संख्या विशेष्य तथा विशेषण दोनों में प्रयुक्त होते हैं। इसी प्रकार उनका लिंग और वचन भी जान लिया होगा।
  • विशेषणों का रूप लगभग विशेष्य के अनुसार होते हैं, क्योंकि इनके लिंग में भी परिवर्तन हो जाता है। पाठ 2 सर्वनाम शीर्षक में आपने पढ़ा है कि इदम् , एतद् , तद्, अदस्, यद्, किम् सर्वनाम का प्रयोग विशेषण अर्थ में भी होता है। 
  • किम् शब्द में अपि, चित् एवं चन् प्रत्यय लगकर अनिश्चयवाचक सर्वनाम  एवं किम् को छोड़कर शेष सर्वनाम में एव लगाकर निश्चयवाचक सर्वनाम बनाया जाता है। यह भी विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है।
  • परिणाम वाची अल्प, अर्ध आदि शब्दों तथा अन्य सर्वनाम पदों में वतुप् आदि अनेक प्रकार के प्रत्यय लगते हैं। वे भी विशेषण होते हैं। उन विशेष शिक्षण सामग्री को अन्यत्र भी दी जाएगी।
  • यदि किसी वाक्य में कोई विशेष्य पुंल्लिङ्ग हो और कोई स्त्रीलिङ्ग तो उनका साधारण विशेषण पुंल्लिङ्ग होगा और विशेष्य पदों की संख्या के अनुसार विशेषण का वचन होगा जैसे:– “सीता और राम सुन्दर हैं” – “सीता रामश्च सुन्दरौ । इस वाक्य में दो विशेष्य पद है। राम पुंल्लिङ्ग है और सीता स्त्रीलिङ्ग। इसलिए विशेषण पुंल्लिङ्ग का द्विवचन हुआ। इसी तरह पिता-माता च आगतौ"। उसकी नासिका तथा कान देखने में सुन्दर हैं- "सुदृश्याः तस्य नासिका कर्णौ च" इत्यादि ।
  • यदि वाक्यस्थ विशेष्य पदों में एक विशेष्य का लिङ्ग नपुंसक है तो इन विशेष्य पदों के विशेषण का लिङ्ग नपुंसक होगा और विशेष्य पदों के अनुसार उसका वचन अथवा एकवचन होगा। 
  • जैसेः - 
  1. सुन्दराणि (सुन्दरं वा) तस्य पिता माता कलत्रञ्च। 
  2. नदी और जल सुन्दर हैं" - "सुन्दरे (सुन्दरं वा) नदी जलञ्च। 
  3. उसके हाथ और मन कोमल हैं” । कोमलानि (कोमलं वा) तस्य हस्तौ मनश्च। 
  4. भारतवर्ष में नदी, जंगल और सागर वर्तमान हैं- "भारतवर्षे वर्तमानानि (वर्तमानं वा) नदी वनं सागरश्च" । तृणानि भूमिरुदकं वाक् चतुर्थी च सूनृता । एतान्यपि सतां गेहे नोच्छिद्यन्ते कदाचन ॥” 

  • कभी कभी "क्रिया विशेषण" संस्कृत में अनुवाद - करते समय विशेष्य का विशेषण हो जाता है। जैसेः "उसने हाथ जोड़ कर निवेदन किया" - "स कृताञ्जलिपुटः निवेदयामास। यहां पर कृताञ्जलिपुटःयह पद सः" इस पद का विशेषण है न कि निवेदयामास" इस क्रियापद का। इसी तरह उसने आश्चर्य से देखा - "सः सविस्मयः अपश्यत्इत्यादि ।
  • अव्यय पद का विशेषण एकवचनान्त और नपुंसक लिङ्ग होता है। जैसेः- शोभनं प्रातःमिथ्या न वक्तव्यम्इत्यादि ।
  • अधिक स्थानों में विशेषण निकटवर्ती विशेष्य के अनुसार लिंग, विभक्ति, तथा वचन वाला होता है। यथा- यस्य वीर्येण कृतिनो वयं च भुवनानि च।

अजहल्लिङ्ग विशेषण।

अर्थात् ये "अजहल्लिङ्ग विशेषण" हैं । जो शब्द समूह विशेषण रूप से प्रयुक्त होते हुए भी विशेष्य का समान लिङ्ग प्राप्त नहीं होता है उन्हें अजहल्लिङ्ग विशेषण कहते हैं ( न जहाति लिङ्गं यत्तद् अजहल्लिङ्गम् )

    पद, भाजन प्रभृति कितने ही विशेष्य पद कहीं कहीं विशेषण भाव से प्रयुक्त होते हैं; इन्हें अजहल्लिङ्ग विशेषण कहते हैं। साधारणतया इस शब्द समुदाय के आगे स्वरूप कौन”, ऐसा प्रश्न करने से उत्तर में जो विशेष्य पद आये, वही इस "अजहल्लिङ्ग विशेषण" का विशेष्य है। अधिकांश विशेष्य पद ही अजहल्लिङ्ग विशेषण भाव से व्यवहृत होते हैं। जैसे:-  जैसेः-राम मेरा स्नेह-भाजन है, “रामो मे स्नेहभाजनम्। यहां मेरा स्नेह-भाजन स्वरूप कौन" ? ऐसा प्रश्न करने से "राम" यह विशेष्य पद उत्तर में आता है, इसलिए यहां राम विशेष्य तथा स्नेहभाजन अजहल्लिङ्ग विशेषण हुआ। इसने अपना लिङ्ग नहीं छोड़ा । इसका जो लिङ्ग था वही है। राम विशेष्य के अनुसार इसका लिङ्ग नहीं बदला, इसी तरह 'आस्पद' 'भाजन' प्रभृति अजहल्लिङ्ग विशेषण, वास्तविक 'विशेष्य' पद के लिङ्ग से भिन्न होते हुए भी, अपने लिङ्ग का परित्याग नहीं करते हैं । जैसेः- गुरुजनभक्ति भाजन- "गुरुजना: भक्तिभाजनम्" मेरी माता दया की आधार है; "दयाधारो मे जननी" । यह मुख एक दूसरा चन्द्र है- "मुखमिदं द्वितीयश्चन्द्रः" । राजा धृतराष्ट्र मूल है- "मूलं राजा धृतराष्ट्रः" । स्नेहास्पद सीता के दुःख से प्रत्येक दुःखी हुआ- "स्नेहास्पदस्य सीतायाः दुःखेन सर्वे दुःखिताः" । 

विशेष्य विशेषण का उदाहरण-

लिङ्ग का उदाहरण - सः इमां स्त्रीं पश्यति । नदीषु गङ्गा पवित्रतमा अस्ति । तव गृहम् उत्तमम् अस्ति । इदं नगरम् अतिसुन्दरम् अस्ति । "बलवान सिंहः । "बलवती क्षुधा"। महद् दुःखम् । 

वचन का उदाहरण- "महान पुरुषः"; महान्तौ पुरुषो”; "महान्तः पुरुषाः। 

विभक्ति का उदाहरण -" "दुरात्मा रावणःदुरात्मना रावणेन"। दुरात्मनि रावणे" ।

 सर्वनामवाची 'इदम् और 'एतद्' के लिए विशेष नियम।

जिसके विषय में एक बार कुछ कहा जा चुका है और अब फिर उसी के विषय में कुछ कहा जाये तो वह अन्वादेश (पुनरुक्ति ) कहलाता है । इस 'अन्वादेश' कहते हैं। में वर्तमान, 'इदम् और 'एतद्' शब्द के स्थान में द्वितीया विभक्ति के सब वचन, तृतीया के एकवचन और पष्ठी तथा सप्तमी के द्विवचन में विकल्प से 'एन' आदेश हो जाता है। जैसेः- "यह बालक बुद्धिमान है, इसे वेद पढ़ाओ; “एषः बालकः बुद्धिमान्, एनं वेदम् अध्यापय


  पाठ- 14  

अव्यय पर विचार

अब तक आपने जाना कि शब्द दो प्रकार के होते हैं- विकारी तथा अविकारी। विकारी शब्दों में संज्ञा, सर्वनाम विशेषण तथा क्रिया आते हैं। अविकारी शब्दों में क्रिया विशेषण, उपसर्ग, निपात, संयोजक, विस्मय सूचक शब्द आते हैं। विकारी शब्द वे हैं जिनके रूप, लिंग, वचन आदि में विकार (परिवर्तन) होता रहता है। अविकारी अर्थात् दिसमें परिवर्तन नहीं होता है। वे अव्यय शब्द है। अव्यय शब्द तीनों लिंगों, तीनों वचनों, सभी व्यक्तियों में एक जैसे रहते हैं। अब आगे- 
जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि जिसके स्वरूप में परिवर्तन नहीं होता, उसे अव्यय कहते हैं। इसे अविकारी कहा जाता है, क्योंकि इसके मूल रूप में लिंग, वचन, पुरुष, कारक, काल इत्यादि के कारण कोई विकार उत्पत्र नहीं होता। च, वा, ह, एव अव्ययों का प्रयोग वाक्य के आरम्भ में नहीं होता है। 
          जो लोग कहते हैं कि संस्कृत में किसी पद को कहीं भी रखा जा सकता है अथवा रखने से अर्थ परिवर्तन नहीं होता है, उसे अव्यय प्रकरण को भली-भाँति पढ़ना चाहिए। उदाहरण के लिए अथ इस अव्यय को लें। इसे मंगल सूचक, उसके बाद और तब, प्रश्न पूछने, और तथा भी, सम्पूर्ण एवं सब अर्थ में, यदि ऐसा मानने पर, सन्देह, अनिश्चय, अथवा आदि अर्थ में प्रयुक्त होता है। अलग- अलग अर्थ में प्रयोग के लिए इसके स्थान का भी निर्धारण होता है कि यह वाक्य के आरम्भ में लगेगा या मध्य में अथवा किसी अन्य शब्द के साथ जुड़कर। और तथा भी अर्थ में प्रयुक्त अथ शब्द का प्रयोग देखें। संस्कृतमथ हिन्दीं पठामि। यदि इसे अथ संस्कृतं हिन्दीं पठामि बोला या लिखा जाय तो अर्थ परिवर्तित हो जाएगा। हम मिश्रित वाक्य के अध्याय में इस प्रकार के शब्दों पर विस्तार पूर्वक चर्चा करेंगें। 

अव्ययों की पहचान

1. प्रादि गण में आये शब्द अव्यय होते हैं।
2. चादिगण में कहे गये शब्द अव्यय होते हैं । इसे निपात भी कहा जाता है। यदि ये चादि के शब्द असत्व =  द्रव्य/ वस्तु नहीं हो तो। जैसे- पशु के दो अर्थ होते हैं (क) चौपाया जानवर, (ख) अच्छी तरह । द्रव्य वाचक चौपाया जानवर अव्यय नहीं होगा। चादि को आकृति से भी पहचाना जा सकता है कि इसका प्रयोग अव्यय के रूप में हुआ है या नहीं। 
3. कृदन्त के मकारान्त तथा एजन्त प्रत्यय जिसके अंत में हो वह अव्यय होता है। कृदन्त में णमुल्, खमुञ्, तुमुन् तथा कमुल् ये चार प्रत्यय मान्त होते है। जैसे- णमुल् (अम्) से बना ध्यायं ध्यायं,  खमुञ् (अम्) से बना चोरङ्कारम् , तुमुन् (तुम्) से बना पठितुम् । कमुल् का प्रयोग वेद में होता है। एजन्त प्रत्ययों का भी प्रयोग वेद में ही होता है।
4. क्त्वा, तोसुन् और कसुन् प्रत्यय जिसके अंत में हो वह शब्द अव्यय होता है। लोक में केवल क्त्वा का प्रयोग होता है। उदाहरण- क्त्वा से कृत्वा आदि, तोसुन् से उदेतोः (उदय होने तक) आदि ।
5. अव्ययीभाव समास वाले शब्द अव्यय होते है।
6. चित् और चन ये दोनों निपात किम् शब्द के विभक्तियों अंत में में जुड़कर अनिश्चिचितता को प्रकट करते हैं।
7. स्वर आदि शब्द तथा निपात अव्यय होते है। इसके कुछ प्रचलित शब्द नीचे दिये गये हैं 
 इस  अव्यय का शाब्दिक अर्थ है- 'जो व्यय न हो।
              सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु ।
               वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥
इनके भेद सहित उदाहरण अधोलिखित हैं-
1. क्रिया विशेषण  -  दूरम्, दूरेण, अत्र, तत्र, परितः, चिरं, चिरेण आदि
2. उपसर्ग     -    प्र, परा, अप आदि 22 उपसर्ग, ये धातुओं से पहले जुड़कर धातु के अर्थ को बदल देते हैं।
3. निपात       खलु, नु, किल,किन्तु आदि। ये अर्थ पर बल देते हैं।       
4. संयोजक -    च, वा, अथ जैसे अव्यय दो शब्दों को जोड़ने का काम करते हैं।                        
5. विस्मय सूचक- हा, हन्त, हे, भो, अहो आदि विस्मय या मन के विकार को सूचित करते हैं।         
6. प्रकीर्ण- उपर्युक्त के अतिरिक्त कुछ अन्य अव्यय गति, समय, स्थान, अवस्था ,दिशा आदि का संकेत देते हैं। जैसे- अद्य, ऊच्चैः, यावत् आदि।


अकस्मात् - अचानक
किञ्च - और


अग्रतः - आगे / सामने
किमिति- किस कारण से

इत्थम् -  इस प्रकार
अग्रे  -   पहले
किमुत -  कहना ही क्या
परम् -  परन्तु
किन्तु -  लेकिन
अचिरम् - शीघ्र
किम् -  क्यों / क्या
परश्वः -  परसों
किल -  सचमुच
अजस्रम् -  निरन्तर
कु -  बुरा
परितः चारों ओर
क्वचित् -  कहीं
अतः - इसलिए
कुतः -  कहाँ से
पुनः -  फिर
अलम् –व्यर्थ, समर्थ
अत्र -   यहां
कुत्र -  कहां
पुरा -  प्राचीन काल में
इति- यह, क्योंकि  
अथ इसके बाद
क्व - कहाँ
बहुधा -  बहुत प्रकार से
इत्थम् – इस प्रकार  
अथवा -  या
खलु इस प्रकार, निश्चय से
पृथक् -  अलग

एव - ही

अद्य - आज
च - और
प्रत्युत -  के विपरीत

एवम् – इस प्रकार

अधः - नीचे
चिरम् -  देर तक
प्रातः - सबेरे
उपरि – ऊपर 
अधुना अब
चिरात् बहुत दिनों में
प्रायः - हमेशा
किल – वास्तव में, सम्भावना
अनिशम्- निरन्तर
जातु कभी भी
भूयः बार- बार
पुरा - पहले
अन्तरा -  बीच में
झटिति -  शीघ्र
मा -  मत

अन्तरेण - विना
तत्र  -  वहां
मुधा -  व्यर्थ में

अन्यत्र दूसरी जगह
तथा -  तैसे
यत्र -  जहाँ

अन्यथा- दूसरे प्रकार से
तथापि - फिर भी
यत्र -  जहाँ

अपरेद्युः दूसरे दिन
तदा -  तब
यथा -  जैसे

अपि - भी
तर्हि तब, तो
यदा -  जब

अवश्यम् - जरूर/अवश्य
ततः तब, इसके बाद
युगपत् - एक साथ

आम् - हाँ (स्वीकारोक्ति)
तावत् तब तक
वा -   या / विकल्प

इव -  समान / सदृश
तिरः, तिर्यक् -  तिरछे
विना -  बिना /बगैर

इह -  यहाँ

वृथा -  व्यर्थ

ईषत् -  कुछ, थोड़ा
तु -  लेकिन,तो
शनैः -  धीरे

उच्चैः - ऊँचा
तूष्णीम् -  चुप
शीघ्रम् -  जल्दी

उत -  अथवा

श्वः - आने वाला कल

उभयतः दोनों ओर
धिक् -  धिक्कार
सपदि -  शीघ्र

उषा -  सुबह/ प्रातः

सम्प्रति - अब

ऋते - विना
न -  नहीं
सह -  के साथ

एकत्र एक जगह
नमः -  नमस्कार
साकम्/सार्धम् - के साथ

एकदा एक बार
निकषा - निकट
साक्षात् -  सामने

ओम् -  स्वीकार करना
नीचैः - नीचे
सु- अच्छा/अच्छी तरह

कथम् - कैसे
नूनम् - अवश्य
सुष्ठु -  अच्छा / ठीक

कदा -  कब
नो - नहीं
सदा -  हमेशा

कदापि -  कभी भी
नोचेत् - यदि नहीं तो



















































उदाहरण-
यदा मोहनः भ्रमणाय गृहात् गच्छति, तदा अश्वः अपि गच्छति । तत्र मोहनः धावति। यत्र ते गच्छन्ति, अश्वः अपि तत्र गच्छति। त्वं कुत्र गच्छसि? त्वं किं पठसि ? युवां कुत्र गच्छथः ?

1. दो शब्दों को जोड़कर वाक्य बनाने के लिए "और" "तथाइत्यादि संयोजक अव्ययों के स्थान पर '' अथवा 'आप' का प्रयोग किया जाता है। जैसे- "रामः श्यामश्च तत्रागच्छताम्" ।  

2. संस्कृत में च, तथा के योग से बनने वाले दोनों शब्दों की एक ही विभक्ति होती है । इसलिए 'राम और श्याम का' इसकी संस्कृत होगी रामस्य श्यामस्य च" ।

3. उपमा दिखाने के लिए यथा" "इव" इत्यादि शब्दों का प्रयोग किया जाता है। 3. उपमा के दो अंश होते हैं, उपमान और उपमेय । जैसेः "चन्द्र इव मुखं” “पद्ममिव करः" । जिसके साथ तुलना की जाती है उसे उपमान कहते हैं, जैसे:- चन्द्र, पद्म इत्यादि । जिसकी तुलना की जाती है वह उपमेय होता है अर्थात् जिस शब्द के पीछे 'तरह' 'समान' इत्यादि पदों का प्रयोग किया जा सकता है वह उपमान होता है। जिसका सम्बन्ध क्रिया के साथ होता है पद की जो विभक्ति हो, वही विभक्ति उपमान पद की होती है। इसी प्रकार विशेषण के लिङ्ग विभक्ति तथा वचन उपमेय के लिङ्ग और विभक्ति तथा वचन के अनुसार होते हैं । जैसेःमुँह चन्द्रमा के समान सुन्दर है" । इस उदाहरण में 'मुख' और 'चन्द्र' इन दोनों पदों की विभक्ति प्रथमा है। इसी प्रकार 'मनोहर' इस विशेषण पद के लिङ्ग विभक्ति और वचन उपमेय मुखम्' के अनुसार हैं । इसलिए उसका अनुवाद है मुखं चन्द्र इव मनोहरम्

अनुवाद देखें- 

" वह हरि के समान के पण्डित है"; "स हरिरिव पण्डितःवह राम के सदृश एक बालक को प्यार करता है"; तरह स राममिव कश्चित् बालकमाद्रियतेमैं प्रतिदिन हरि के समान एक बालक के साथ घूमने जाता हूँ"; "अहं प्रत्यहं हरिणा इव केनचिद् बालकेन बालकेन सह भ्राम्यामि"। "शिक्षक मेरे समान एक दरिद्रबालक को पुस्तकें देता है”; “शिक्षकः मह्यमिव एकस्मै दरिद्राय बालकाय पुस्तकानि ददाति "राम पहाड़ के समान ऊँचे पेड़ से गिर पड़ा"; "रामः पर्वतात् इव उन्नतात् कुतश्चिद् वृक्षात् पतितः। तुम्हारे जैसे बालक की उन्नति नहीं होगी"; "तव इव बालकस्य उन्नतिर्न भविष्यति ।

अधोलिखित वाक्य का संस्कृत में अनुवाद करें

1. हरि का मन पत्थर जैसा है । 2. अतिथि को भगवान् की तरह समझो । 3.. श्याम की तरह लोगों ने यह किया । 4. उस जैसे शिष्ट बालक को राम प्रतिदिन चित्र देते हैं । 5. मैं शेर की तरह भानु से डरता हूं । 6. उसकी तरह मेरी उन्नति हो । 7. मैं पुत्र की तरह स्नेह करता हूँ । 

4. 'एव' निश्चयार्थक (अवधारणार्थक) अव्यय है । जिस के साथ इसका सम्बन्ध होता है; यह उसके अर्थ में निश्चय का ज्ञान कराता है । यह 'इव' की तरह उपमावाचक नहीं है । जैसेः– “राम ही दयालु है" "राम एव दयालुः" यहां "राम इव दयालुःयह नहीं हो सकता।

5. 'एव' और 'अपि' ये दोनों अव्यय विशेष के बाद और विशेष्य के पहले प्रयुक्त होते हैं। जैसे:- इसी नगर में राम रहता है" - "अस्मिन्नेव नगरे रामो वसति"आज कल प्रत्येक गांव में समाचारपत्र देखा जा सकता है" - "साम्प्रतं सर्वस्मिन्नेव ग्रामे संवादपत्रं दृश्यते" । "सोऽपि अमुना सह क्रोडति" ।यद्ययं केनाप्युपायेन म्रियते

6. यदि वाक्य के द्वारा प्रश्न पूछना हो तो वाक्य के आरम्भ में 'अपि' या 'किम्' लगाया जाता है। जैसे:- क्या वह देखा गया है ?" "अपि दृष्टोऽसौ ?" “क्या वह अब तक जीवित है ? " - "अपि स साम्प्रतमपि जीवति ?" 'क्या हमारे गुरुजन सकुशल हैं ?” “अपि कुशलिनः मे गुरुजनाः ?'  "ये ही क्या महात्मा विश्वामित्र हैं ?" “किमयं महात्मा विश्वामित्र: ?” "क्या तुम्हारी माता ही गृह के सम्पूर्ण कार्यों को देखती है ?” “अपि ते माता एव गृहस्य सर्वं कार्यं पश्यति ?"

अधोलिखित वाक्य को संस्कृत में अनुवाद करें-

1. वह क्या मुझ से स्नेह करता है ? 2. ये ही क्या भगवती वासंती है ! 2. इसी श्राश्रम में क्या महर्षि बाल्मीकि रहते हैं ? 3. ये ही क्या गोदावरी नदी है ? 4. इन्हीं का नाम क्या राजा दुष्यन्त है

इस प्रकरण में इस विषय पर विस्तारित सूची उपलब्ध कराने से विषय बोझिल हो जाएगा। अतः एक दूसरे पोस्ट में 
विस्तारपूर्वक लिखा जा रहा है। आप अव्ययों का अभ्यास पर चटका लगाकर वहाँ तक पहुँचें।

  पाठ- 15    

उपर्युक्त नियमों को जानने तथा अभ्यास करने के बाद अधोलिखित अशुद्ध तथा शुद्ध वाक्य को देखें। जिन कारणों से वाक्य को अशुद्ध कहा गया, उन कारणों को खोजें।

अशुद्ध वाक्य

शुद्ध वाक्य

अयम् तपस्या करोति ।

अयं तपस्यां करोति ।

अयं मम लेखनी सन्ति ।

इयं मम लेखनी अस्ति ।

अयं पुस्तक मम अस्ति ।

इदं पुस्तकं मम अस्ति ।

अलं विवादात् ।

अलं विवादेन ।

असौ कर्णात् वधिरः वर्तते ।

असौ कर्णेन वधिरः वर्तते ।


अहं गच्छति ।

अहं गच्छामि ।

अहम् अत्र स्थामि ।

अहम् अत्र तिष्ठामि ।

आकाशे चन्द्रम् शोभते ।

आकाशे चन्द्रः शोभते ।

आगच्छ भवान्।

आगच्छतु भवान् ।

आत्मा अमरा भवति ।

आत्मा अमरः भवति ।

सुदर्शनस्य नाम राजा आसीत्

सुदर्शनो नाम राजा आसीत् ।

एष पुस्तकम् अस्ति ।

एतत् पुस्तकम् अस्ति ।

ऐक्यः हि बलः ।

ऐक्यं हि बलम् ।

इदं वायुः वहति ।

अयं वायुः वहति ।

इदं विशाला नाम नगरम् ।

इयं विशाला नाम नगरी |

इदं समुद्रम् अस्ति ।

अयं समुद्रः अस्ति । 

इयम् पुस्तकम् अस्ति ।

इदं पुस्तकम् अस्ति । 

इयं वस्तु मम अस्ति ।

इदं वस्तु मम अस्ति ।

इयं शकुन्तला सीता च सन्ति ।

इयं शकुन्तला सीता च स्तः ।

एते तस्य पुस्तकाः अस्ति ।

एतानि तस्य पुस्तकानि सन्ति ।

एते विद्यालय: सन्ति ।

एषः विद्यालयः अस्ति ।

कण्टकात् एव कण्टकम् ।

कण्टकेनैव कण्टकम् ।

कृष्णस्य सर्वतः गोपाः सन्ति ।

कृष्णं सर्वतः गोपाः सन्ति ।

के आगच्छति

के आगच्छन्ति ?

को अर्थः कुपुत्रात् ।

कोऽर्थः कुपुत्रेण ?

गुरून् नमः ।

गुरवे नमः ।

गुरुः शिष्ये क्रुध्यति ।

गुरुः शिष्याय क्रुध्यति ।

ग्रामतः कियत् छात्राः आयातः ।

ग्रामतः कियन्तः छात्राः आयान्ति ।

ग्रामस्य उभयतः नदी वहति ।

ग्रामम् उभयतः नद्यो वहतः ।

ग्रामस्य निकषा नदी वहन्ति ।

ग्रामं निकषा नदी वहति ।

चत्वारः प्रश्नान् उत्तरं देहि ।

चतुर्णां प्रश्नानाम् उत्तरं देहि ।

चत्वारः स्त्रियः आगच्छन्ति

चतस्रः स्त्रियः आगच्छन्ति । 

चत्वारि बालिकाः गच्छन्ति ।

चतस्रः बालिकाः गच्छन्ति ।

छात्रौ आगच्छति ।

छात्रौ आगच्छतः ।

छात्राः शिक्षकेन संस्कृतं पठन्ति ।

छात्राः शिक्षकात् संस्कृतं पठन्ति ।

छात्रेभ्यः गुरुः नमस्करोति ।

छात्राः गुरुं नमस्कुर्वन्ति ।

ज्ञानस्य विना जीवनं विफलम् ।

ज्ञानं विना जीवनं विफलम् ।

ज्ञानस्य समं न हि कश्चित् !

ज्ञानेन समं न हि किञ्चित् । 

तत् अबला कुत्र गच्छति ।

सा अबला कुत्र गच्छति ?

ततः तपस्विनाः आयाति ।

ततः तपस्विनः आयान्ति ।

तम् पुस्तकं देहि ।

तस्मै पुस्तकं देहि ।

त्वाम् कुशलं भूयात् ।

तुभ्यं कुशलं भूयात् ।

तस्य पत्नी कर्कशः वर्तते ।

तस्य पत्नी कर्कशा वर्तते ।

तस्य पुत्री मेघावी असि ।

तस्य पुत्री मेधाविनी अस्ति ।

तस्य मने विकारम् नास्ति ।

तस्य मनसि विकारः नास्ति ।

तस्य हृदौ पापः अस्ति ।

तस्य हृदि पापम् अस्ति ।

तिस्रः पुस्तकानि मया पठितानि ।

त्रीणि पुस्तकानि मया पठितानि ।

तिस्रः बालकाः धावन्ते ।

त्रयः बालकाः धावन्ति ।

ते कथं न शृणोति ।

ते कथं न शृण्वन्ति ।

ते पाण्डिताः सन्ति ।

ते भोजनं कुर्वन्ति ।

ते भोजनः करन्ति ।

ते पण्डिताः सन्ति ।

तौ गृहं गच्छन्ति ।

तौ गृहं गच्छतः ।

त्वं कथं हसति ।

त्वं कथं हससि ?

त्वं किम् पठति ।

त्वं किं पठसि ?

त्वं तं वस्त्राणि ददातु ।

त्वं तस्मै वस्त्राणि देहि ।

त्रयः फलानि पतन्ति ।

त्रीणि फलानि पतन्ति ।

दीनस्य प्रति दयां कुरु ।

दीनान् प्रति दयां कुरु ।

धिक् कामुकाय ।

धिक् कामुकम् ।

धिक् तस्मै पापिने ।

धिक् तं पापिनम् ।

नमः देवी सरस्वती ।

नमः देव्यै सरस्वत्यै ।

नमो भगवन्तं वासुदेवम् ।

नमो भगवते वासुदेवाय ।

नारायणः सर्पेण बिभेति ।

नारायणः सर्पात् बिभेति ।

नास्ति मे मरणस्य भयः ।

नास्ति मे मरणात् भयम् ।

नेतारः पदं स्पृहयन्ति ।

नेतारः पदाय स्पृहयन्ति ।

पतिना सह सीता वनं गतवान् ।

पत्या सह सीता वनं गतवती ।

पुत्रस्य सह पिता गच्छति ।

पुत्रेण सह पिता गच्छति ।

पुत्रस्य समम् आगतः माता ।

पुत्रेण समम् आगता माता ।

पुस्तकेभ्यः छात्रः ज्ञायते ।

पुस्तकैः छात्रः ज्ञायते । 

प्राते भ्रमणं कुरु ।

प्रातः भ्रमणं कुरु ।

ब्राह्मणं धनं दद्यात् ।

ब्राह्मणेभ्यः धनं दद्यात् ।

इन वाक्यों को सही करें-

1. अहं रामस्य इव विद्वान् । 2. शिक्षकः त्वां पुत्रस्य इव पश्यति । 3. तव इव बालकाय पुस्तकं पारितोषिकं यच्छामि । 4. हरिः श्यामं व्याघ्रस्य इव भीतः । 5. बालक: मम इव जनेन सह याति । 6. रामस्य इव मे किमपि दुःखं नास्ति ।

  पाठ- 16   

युष्मद् , अस्मद् तथा सर्वनाम शब्दों का विशेष प्रयोग

आपने पूर्व के पाठ में संस्कृत मूल शब्दों जैसेः- मैं, हम 'अस्मत्' तू, तुम - 'युष्मद्' । वह- 'तद्' । जो -'यद्' । यह, ये-'इदम्' 'एतद्' । वह -'अदस् कौन, क्या- 'किम्' । सब  - 'सर्व' । आप - 'भवत्' । दो-- 'द्वि' । एक - 'एक' से परिचय पा लिया है। इन शब्दों के विविध प्रयोग से यहाँ परिचय कराया जा रहा है।

आपने यह भी जाना कि जिस विशेष्य पद के स्थान में सर्वनाम प्रयुक्त होता है वह उसी के लिङ्ग और वचन में प्रयुक्त होता है। यदि सर्वनाम किसी का विशेषण हो तो विशेष्य के लिङ्ग, विभक्ति और वचन सर्वनाम के भी होते हैं ।

जैसे:- राम के विरह से कौशल्या बड़ी दुःखी हुई ; “राज्ञी कौशल्या राम-विरहाद्दुःखमनुभवति स्म। 

वह स्वप्न में भी राम को - देखती थी; “सा स्वप्नेऽपि राममेव दृष्टवती' । 

यहाँ "वह" कौशल्या के लिए प्रयुक्त हुआ, अतः वह स्त्रीलिङ्ग है, उस सीता का दुःख, सीतायाः दुःखम्" । इसमें तस्याःपद सीतायाः" इस पद विशेषण है। इसलिए वह स्त्रीलिङ्ग और षष्ठी का एकवचन है।

नियम -1 सम्बन्धवाचक सार्वनामिक विशेषण

तद्, यद्, युष्मद्, अस्मद् अन्य प्रभृति त्यदादि सर्वनाम पदों के आगे ईय (छ) प्रत्यय लगाकर संस्कृत में उन्हें विशेषण की तरह प्रयुक्त किया जाता है। जैसे: - उसका बेटा; “तस्य पुत्रःइसके स्थान में तदीयः पुत्रः' । इसी तरह आपकी बुद्धि कभी नहीं चकराती; "भवतः ( भवदीया) बुद्धिः प्रतिहता न भवति"अस्माकं (अस्मदीया) बुद्धिः न प्रसरति"मम ( मदीया) प्रकृतिः”  "तव (त्वदीयानि) पुस्तकानि सुन्दराणि। "मदीयौ मातापितरौ।  “अस्मदीयः शिक्षकः" । सा हि युष्मदीया भगिनी" । भगवान् खलु अस्मदीयः पिता। "अन्यदीयं वस्त्रं न परिधेयम्" । युष्मद् और अस्मद् शब्दों से अण तथा ईन ( ख ) प्रत्यय लगाकर तावक, मामक, यौष्माक, आस्माक एवं यौष्माकीण, आस्माकीन आदि शब्द बनते हैं। ये ही सम्बन्धवाचक सार्वनामिक विशेषण कहलाते हैं ।

नियम -2 

यद्, अदस्, इदम्, एतद्, युष्मद्, अस्मद् प्रभृति सर्वनाम  के आगे तुल्य, समान आदि सादृश्यवाचक शब्द रहने पर दृश (दृश्+टक्) तथा दृक् (दृश्+क्किप्) शब्दों का योग करके उनके लिङ्ग, विभक्ति तथा वचन उपमेय के अनुसार करने चाहिए ।

जैसे:- आपके समान बालक- "भवादृशः बालकः। यहाँ भवत् से दृश् लगाकर भवादृश् बनाया गया है।  "वह तुम्हारे समान बुद्धिमान् है ; “स (युष्मादृक्) युष्मादृश बुद्धिमान्' यह तुम्हारे जितना बलवान् है"; "स (त्वादृक् ) त्वादृशः धनवान्"मेरे जैसा आलसी" ; - मादृशः अलसः । हमारे जैसा और बालक आया है"; "अस्मादृशः (अस्मादृक्) कश्चित् बालकः समायातः।  “मैं उस जैसी (वैसी ) एक पुस्तक लाया हूँ- "अहं तादृशं किमपि पुस्तकं आनीतवानस्मिआप जैसा रमणी को यह शोभा देता है- "भवादृश्याः रमण्याः एतत् शोभते। वह हमारे जैसा है";- "स हि अस्मादृशः । वह मेरे जैसा है"; "स खलु मादृशःराम तुम्हारे जैसा है'; -रामः युष्मादृशः। "बालक तुम्हारे जैसा है- "बालकः युष्मादृशः

नियम -3

इन, तुम और आप इत्यादि शब्दों के स्थान में अधिक सम्मान दिखाने के लिए, समीपस्थ के लिए अत्रभवत्" और दूरस्थित व्यक्ति के लिए 'तत्रभवत् शब्द का व्यवहार किया जाता है। जैसे:- "भवानेव जनाति देवीं विनोदयितुम् ' के स्थान पर "अत्रभवानेव जानाति देवीं विनोदयितुम् इस प्रकार कहना अधिक सम्मान दिखाने के लिए है । सा किल दुःखिता सती एवमुवाच" इसके स्थान पर "तत्रभवती दुःखिता एवमुवाच इत्यादि । तत्र भवान् पाणिनिः प्रोवाच।

  पाठ- 17   

निषेधवाचक वाक्य बनाने के लिए न अव्यय का प्रयोग

त्वम् स्थूलः न असि । युवाम् स्थूलौ न स्थः । यूयम् स्थूलाः न स्थ । त्वम्  निर्दयः न असि । युवाम् निर्दयौ न स्थः । यूयम् निर्दयाः न स्थ ।

प्रश्नवाचक सर्वनाम, विभक्ति प्रयोग तथा अव्यय

किम् ( कौन, क्या आदि who, which, what ) इसके पुंल्लिङ्ग में कः, कौ, के आदि, स्त्रीलिङ्ग में का, के, का: आदि एवं नपुंसक में किम्, के, कानि आदि प्रश्नवाचक सर्वनाम होते हैं। इसके रूप 'तत्' के समान ही होते हैं । 

सः वामहस्तेन लिखति । त्वं केन हस्तेन लिखसि ? अहं दक्षिणहस्तेन लिखामि । अहं केनापि पादेन न चलामि। त्वं कथं पठसि ? अहं पुस्तकेन चलामि । त्वं कथम् आकर्णयसि ? अहं कर्णाभ्याम् आकर्णयामि । त्वं केन सह खेलसि ? अहं कृष्णेन सह खेलामि ।

कः कं नमति ? कौ कं नमतः ? के कं नमन्ति ? कः कं रक्षति ? कः कौ रक्षति ? कः कान् रक्षति ? कः केन सह खेलति ? कः काभ्यां सह खेलति । कः कैः सह खेलति । देवः कस्मै आशीर्वादान् यच्छति ? देवः काभ्याम् आशीर्वादात् यच्छति ? देवः केभ्यः आशीर्वादान् यच्छति ? देवः कस्मात् सद्गुणान् इच्छति ? देवः काभ्यां सद्गुणान् इच्छति ? देवः केभ्यः सद्गुणान् इच्छति ? देवे कस्य भक्तिः अस्ति ? देवे कयोः भक्तिः अस्ति ? देवे केषां भक्तिः अस्ति ? कस्मिन् विनयः अस्ति ? कयोः बुद्धिः अस्ति ? केषु भक्तिः अस्ति ?

समय तथा स्थान सूचित करने में सर्वनाम शब्दों के साथ प्रत्ययों का प्रयोग

समय को सूचित करने के लिए सर्वनाम के सप्तमी विभक्ति के स्थान पर दा तथा र्हि का प्रयोग किया जाता है। स्थान अर्थ में सप्तमी के स्थान पर त्र और पंचमी के स्थान पर तस् प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। समय सूचित करने का उदाहरण- हर समय खेलना शोभा नहीं देता-सर्वस्मिन् काले क्रीडा न शोभते' इस उदाहरण में 'सर्वस्मिन् काले" के स्थान पर सर्वदा का प्रयोग किया जा सकता है। इसी तरह "एक समय' – “एकदा"; "उस समय" तदा" । स्थानार्थ का उदाहरण - 'त्र' जैसे:-  "सब जगह श्री कृष्ण है"; "सर्वस्मिन् स्थाने श्रीकृष्णस्तिष्ठति" यहाँ "सर्वत्र श्रीकृष्णस्तिष्ठति" का प्रयोग किया जा सकता है। सर्व + स्मिन् के स्थान पर सर्व + त्र।  इसी तरह "यस्मिन् स्थाने" – “यत्र ", "उस स्थान में तत्र", "इस स्थान में" अत्र”, “किस स्थान में” “कुत्र" इत्यादि ।

प्रकार सूचित करने के लिए सर्वनाम शब्दों से थाच्' का प्रयोग किया जाता है और यह अव्यय होता है- "जिस प्रकार का बीज उस प्रकार फल"; "यथा बीजं तथा फलम्"। यद् + था = यथा, तद् + था = तथा।  जिस प्रकार जिस प्रकार की (जैसी) बात, उस प्रकार का ( वैसा) कार्य"- " यथा वाचस्तथा क्रियाः" । हेत्वर्थ में जैसे:-  "राम क्यों जाय": "कुतः रामः गच्छेत्। इसी तरह यतः ततः आदि का भी प्रयोग किया जा सकता है।

संस्कृत शिक्षण पाठशाला के तद्धित प्रत्यय में इस प्रकार के अनेक प्रत्यय दिये गये हैं। यहाँ उनमें से कतिपय प्रयोग लिखे गये हैं। आप अधिक जानकारी आगे के पाठ में पा सकते हैं।

सर्वनाम शब्दों का समास में शब्दरूप में परिवर्तन हो जाता है

तृतीया आदि तत्पुरुष तथा द्वन्द्व समास में सर्वनाम शब्द गौण रूप से प्रयुक्त होते हैं। अर्थात् समास हो जाने के बाद इनके रूप सर्वनाम शब्दों के समान नहीं होते हैं । बहुव्रीहि समास का उदाहरण - प्रियः सर्वो यस्य तस्मै प्रियसर्वाय । यहाँ प्रिय शब्द मुख्य होकर सर्वाय हो गया। अतः प्रियसर्वस्मै नहीं हुआ । तृतीया-तत्पुरुष समास का उदाहरण -  मासेन पूर्वाय मासपूर्वाय (मासपूर्वस्मै नहीं हुआ ) । किन्तु द्वन्द्व समास के प्रथमा बहुवचन में विकल्प से सर्व शब्द की तरह रूप होते हैं । यथाःवर्णाश्रमेतराः, वर्णाश्रमेतरे इत्यादि । 

चित् तथा चन प्रत्ययों का पुनः अभ्यास-

जैसे - किसी ग्राम की यह रीति है – “केषाश्चिद् ग्रामाणां इयं रीतिः । आजकल किसी किसी शहर में हैजा होने लगता है—'केषुचित् नगरेषु अधुना विसूचिकायाः प्रादुर्भावः' । कोई दयालु स्त्री किसी दरिद्र बालक को कोई कपड़ा देती है—“काचित् दयावती स्त्री कस्मैचित् दरिद्राय बालकाय किश्चित् वस्त्रं ददाति" ।                                     

                                      एक अनुरोध- 

सन्धि के नियमों को जानने के लिए संस्कृत शिक्षण पाठशाला 7 (सन्धि) पर क्लिक करें। एक अलग बिंडो खुलेगा।
इतने पाठ पढ़ लेने के बाद आगे के पाठ के लिए संस्कृत शिक्षण पाठशाला 2 पर चटका लगाकर उस लिंक को खोलें।

विषय सूची

लिपि परिचय                पाठ 1

संस्कृत के शब्दों से परिचय (शब्द विचार) पाठ 2

संज्ञा                 

सर्वनाम            

विशेषण

क्रिया (परिचय)               पाठ 3

प्रादि/ उपसर्ग    

अव्यय                         पाठ 4

वचन                           पाठ 5

पुरुष                           पाठ 6  

क्रिया (अभ्यास) 

सर्वनाम

लिंग-

संज्ञा के साथ क्रिया का प्रयोग

सर्वनाम के साथ क्रिया का प्रयोग

संज्ञा (नाम) तथा सर्वनाम शब्द का लिंग एवं वचन

सर्वनाम तद् शब्द का वाक्य में प्रयोग-

क्रियापदों के पुरुष तथा वचन

क्रियापदों का वाक्यों में प्रयोग

इदम्,  एतद्, अदस् तथा तद् सर्वनाम शब्दरूप पाठ- 7 

संज्ञा (नाम) सर्वनाम तथा क्रिया का प्रयोग

क्रिया पदों के साथ  एक वाक्य बनायें

वाक्य को एकवचन में लिखें

संख्या (गणनावाचक) शब्द पाठ- 8



50 टिप्‍पणियां:

  1. श्लाघनीयं कार्यमिदं संस्कृतभाषाभिवर्धनार्थं निश्चप्रचं सिद्धिप्रदायकं भविष्यतीति।

    जवाब देंहटाएं
  2. आप के प्रयास सराहनीय है महोदय बहुत सुन्दर कार्य का आरंभ किया है आपने आपका चिंतन संस्कृत के लिए अद्भुत है जो आपको सभी से विशेष दर्शाता है। संस्कृत भाषा के उत्थान के लिए यह कदम अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
    जयतु संस्कृतं जयतु भारतं

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. संस्कृत कठीण भाषा है,और सिर्फ पंडित बाणानेके लिए है,ऐसा बचपन से हि मन में डर पैदा कर देते है।
      आपका प्रयास सराहनीय है।

      हटाएं
    2. विगत 100 - 200 वर्षों में देश और विदेश के विद्वानों ने ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध किया है कि संस्कृत केवल भारत या इसके किसी एक भूभाग की भाषा नहीं रहा है। इसका पुष्ट प्रमाण हमें साहित्यिक तथा दार्शनिक स्रोतो से भी मिलता है। इस भाषा में भारत में और भारत के बाहर रहने वाले तमाम जातियों, सम्प्रदायों के लोगों ने अपना योगदान दिया है। इस भाषा में पाकिस्तान, ईरान, ईराक, अरब, मिस्र, श्रीलंका, दावा, सुमात्रा बाली, चीन के कुछ भूभाग की सभ्यता, ज्ञान विज्ञान, इतिहास को अपने शब्दों में व्यक्त किया। ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रंथ खेटकौतुकम् को कौन नहीं जानता। दुर्भाग्य है कि आज की जनता ब्राह्मणों द्वारा कराये जाने वाले कर्मकाण्ड मात्र से से परिचित है। इसमें गणित, रसायन, भूगर्भ, आदि वे तमाम विषय उपलब्ध है, जिसे हम अध्ययन करते हैं। मैं पूछता हूँ क्या यह देश विना किसी कानून के, व्यापारिक नियमों के, चिकित्सा के हजारों वर्षों तक रहा? यहाँ भी किसी राजा का राज्य था। वहाँ विधि व्यवस्था थी। व्यापार होते थे। राजा कर लेता था। चिकित्सा व्यवस्था थी। यातायात के साधन थे। विशाल भवन बनते थे। उसकी तकनीक थी। वह सब कुछ था, जो आज हम देख रहे हैं। जीवन को सरल और सुखमय बनाने के लिए हजारों वर्ष पूर्व भी लोग अनुसंधान में लगे थे। 300 वर्षों में एकाएक बमने शून्य से शिखर तक की यात्रा नहीं कर ली। आधारभूत ज्ञान वही थे। इसी संस्कृत भाषा में लिखे गये थे। आज हमने उसी में और थोड़ा सा परिष्कार कर लिया है। चाहे वह कृषि, वानिकी, अंतरिक्ष, औषध या अन्य कोई क्षेत्र हौ। हजारों वर्षों तक इस ज्ञान विज्ञान को तिरस्थायी बनाने में संस्कृत भाषा का योगदान अतुलनीय है। यदि कोई संस्कृत को किसी वर्ग या क्षेत्र विशेष की भाषा कहता है तो प्रथम दृष्ट्या वह अज्ञानी है। वह भारतीय मनीषियों को अपमानित करने का काम तो कर ही रहा है साथ ही अल मामून से लेकर अलबैरूनी तक को अपमानित करता है।

      हटाएं
  3. पदों में वचन तथा विभक्ति बताना

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. अपना प्रश्न स्पष्ट करें। आप कोई पद लिख दें। मैं उसका वचन और विभक्ति बता दूँगा। आप कोई भी शब्दरूप देखें, शब्दरूप के ऊपर एकवचन, द्विवचन और बहुवचन लिखा रहता है। शब्दरूप के वायीं ओर उसकी विभक्ति लिखी रहती है। जैसे-
      एकवचन द्विवचन बहुवचन
      प्रथमा बालकः बालकौ बालकाः
      द्वितीया बालकम् बालकौ बालकान्
      तृतीया बालकेन बालकाभ्याम् बालकैः
      चतुर्थी बालकाय बालकाभ्याम् बालकेभ्यः
      पञ्चमी बालकात् बालकाभ्याम् बालकेभ्यः
      षष्ठी बालकस्य बालकयोः बालकानाम्
      सप्तमी बालके बालकयोः बालकेषु
      संबोधन हे बालक हे बालकौ हे बालकाः

      हटाएं
  4. उत्तर
    1. पहले आप देखेॆ कि कृत् प्रत्यय से बना शब्द स्वरान्त है या हलन्त। कृदन्त से बने शब्द प्रायः तीनों लिंगों (पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंग) में होते हैं। जैसे कृ धातु से ण्वुल् प्रत्यय करने पर कारक बनता है। इसके अनन्तर आप प्रसंगानुकूल कारकः, कारिका या कारकम् इन तीनों लिंगों में से किसी एक लिंग में इसका प्रयोग करते हैं। एक और उदाहरण देखें- प्रियंवद और प्रियंवदा शब्द कृदन्तीय खच् प्रत्यय से बना है। अब आप जान चुके होंगें कि जबतक हमें उसकी लिंग और अंतिम अक्षर के बाद में जानकारी नहीं होती है तब तक हम किसी भी शब्द का रूप नहीं चला सकते। आप अपने प्रश्न को स्पष्ट करें तथा सम्पूर्ण लेख को सावधानी से पुनः पढ़ें । इसमें स्थान- स्थान पर सम्बन्धित प्रकरण पर लिंक लगा है। जैसे लिंगानुशासन का लिंक लगा हुआ है। उस लिंक तक जायें।

      हटाएं
  5. अपने आप में संस्कृत में कौन सा पुरुष होगा

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. अपने आप के लिए अहम् शब्द का प्रयोग होता है, अपने आप के लिए उत्तम पुरुष का प्रयोग होगा। अपने आप शब्द का संस्कृत में अनुवाद स्वयं होता है। यह किसी भी पुरुष के साथ प्रयोग किया जाता है। जैसे सीता स्वयं वदति। त्वं स्वयं पठसि। अहं स्वयं पठामि।

      हटाएं
  6. अपने आप के लिए संस्कृत में अस्मद् शब्द का प्रयोग होता है। इसमें उत्तम पुरुष होगा। इसका रूप इस प्रकार चलता है-
    एकवचन द्विवचन बहुवचन
    प्रथमा अहम् आवाम् वयम्
    द्वितीया माम् / मा आवाम् / नौ अस्मान् / नः
    तृतीया मया आवाभ्याम् अस्माभिः
    चतुर्थी मह्यम् / मे आवाभ्याम् / नौ अस्मभ्यम् / नः
    पञ्चमी मत् / मद् आवाभ्याम् अस्मत् / अस्मद्
    षष्ठी मम / मे आवयोः / नौ अस्माकम् / नः
    सप्तमी मयि आवयोः अस्मासु

    जवाब देंहटाएं
  7. शोभनम् संस्कृतं शिक्षितुं सम्यक् प्रयासः।

    जवाब देंहटाएं
  8. उत्तर
    1. मैं किसी विद्यालय में नहीं पढ़ाता हूँ। अधिकांश समय ऑनलाइन संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा देने में लगाता हूँ, क्योंकि इसकी पहुँच किसी स्कूल से कहीं अधिक है।

      हटाएं
    2. बहुशोभनोऽयं प्रयासो भवता विहित:।

      हटाएं
  9. जगदानंद जी, नमश्कार। बहुत अच्छा है। आपका ईमेल एड्रेस बतादिगिएगा। कियोटो जापानी से। धन्यवाद्।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. मेरा ईमेल- jagd.jha@gmail.com
      आप इस मेल पर मुझसे सम्पर्क कर सकते हैं। आपसे फोन पर बात कर खुशी हुई। आप संस्कृत भाषा तथा माध्यमिक (शून्यवाद) दर्शन के प्रतिष्ठापक, महायान बौद्ध दर्शन के प्रमुख आचार्य नागार्जुन विरचित माध्यमिका कारिका के अध्ययन के लिए संस्कृत सीखना चाहते हैं। इनकी अन्य कृतियों में विग्रहव्यावर्तिनी प्रमुख है।
      न सन् नासन् न सदसत् न चाप्यनुभयात्मकम्।
      चतुष्कोटिर्विनिर्मुक्त तेत्वं माध्यमिका विदु:॥
      नमस्कार

      हटाएं
  10. अवसर शब्द का अर्थ पुस्तकों में यह भी मिलता है और वह भी। सही अर्थ क्या है?
    इसे ऐसे भी पूछ सकते हैं कि अदस् शब्दरूप एतत् शब्द का पर्याय है या तंत्र शब्द का?
    उत्तर की प्रतीक्षा में ...

    जवाब देंहटाएं
  11. मैं अपने इस लेख में सर्वनाम शब्दों पर विस्तार पूर्वक नहीं लिख पाया अतः आपको लेख से समाधान नहीं मिला होगा। आपके प्रश्न का उत्तर इस प्रकार है-
    आपका प्रश्न है- अवसर शब्द का अर्थ--- । मैं इसे अदस् शब्द का अर्थ मानकर उत्तर दे रहा हूँ । अदस् शब्द का हिन्दी में अर्थ होता है - वह । यह त्यद् तथा तद् शब्द का पर्याय है। इस पर्याय को आगो मैं श्लोक से स्पष्ट कर रहा हूँ। एतद् शब्द का अर्थ होता है- वह । यह त्यदादि गण का है। अन्य सर्वनाम संज्ञक शब्दों के अर्थ इस प्रकार हैं- त्यद् (वह), तद् (वह), यद्(जो), एतद् (वह), इदम् (यह), अदस् (वह), युष्मद् (तुम), अस्मद् (मैं), भवत् (आप)
    इनमें से इदम्, एतद्, अदस् तथा तद् शब्द के अर्थ को स्पष्ट रूप से समझने के लिए इस श्लोक को याद कर लें-
    इदमस्तु सन्निकृष्टे समीपतरवर्ति चैतदो रूपम्।
    अदसस्तु विप्रकृष्टे तदिति परोक्षे विजानीयात् ॥
    इदम् = (यह), निकटवर्ती व्यक्ति या पदार्थ के लिए
    एतद् = (वह), अत्यन्त पास वाली पदार्थ के लिए
    अदस् = (वह), दूर में स्थित पदार्थ के लिए
    तद् = (वह), परोक्ष पदार्थ के लिए

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. कृपया एक लेख सर्वनाम पर भी प्रकाशित करें।

      हटाएं
    2. सर्वनाम पर अब काफी मात्रा में सामग्री उपलब्ध करा दी गई है। यह सामग्री एक साथ नहीं दी जा सकती। इससे सीखने में असुविधा होती है। सरल से कठिन की ओर ले जाने के लिए आरम्भ में सर्वनाम से परिचय कराया गया। इसके बाद युष्मद्, अस्मद् तथा भवत् शब्द से वाक्य बनाने की सामग्री दी गयी। संख्यावाची एक तथा द्वि शब्द के बाद एतद्, तद् आदि सर्वनाम दिये गये। प्रश्नवाची सर्वनाम किम्, यत् के नियम व प्रयोग क्रमशः आगे दिया गया। युष्मद् अस्मद् के विभक्ति में होने वाले ते, मे आदि नियम को भी यथा स्थान समाहित किया गया है। कुल मिलाकर सर्वनामवाची शब्दों के बारे में थोड़ा-थोड़ा कर कई स्थानों पर लिखा गया है।

      हटाएं
  12. Priya Shri jha ,I have a small query.Please reply ,I shall be grateful to you.Please tell me why in the Sanskrit dictionaries the sequence of letters (vowels and consonants) is not according toMaheshwar sutras which is the most logical order ?

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. शब्दकोश में वर्णों के क्रम का आधार वर्णमातृका है जबकि माहेश्वर सूत्र के वर्णसमाम्नाय का प्रयोजन भिन्न होने से वर्णसमाम्नाय तथा वर्णमातृका के क्रम तथा संख्या में भौतिक अंतर है। प्रत्याहार के प्रयोजन से उपदिष्ट वर्णसमाम्नाय से वर्णमातृका अधिक प्राचीन है। ऋक् प्रातिशाख्य, वाजसनेय प्रातिशाख्य में वर्णमातृका के उपदेश प्राप्त होते हैं। प्रातिशाख्यों में पदों के अनुवृत्ति का क्रम तो मिलता है,परन्तु यहाँ प्रत्याहार का अभाव है। पाणिनि के वर्णसमाम्नाय, जिसे माहेश्वर सूत्र कहा जाता है,इसके प्रयोजन पर महाभाष्य में चर्चा की गयी है। उक्त से स्पष्ट है कि वर्णमातृका ही अक्षर क्रम के लिए सर्वथा उपयुक्त है, न कि प्रत्याहार की सिद्धि के लिए उपदिष्ट माहेश्वर सूत्र।
      वर्णों की संख्या का विस्तृत विवेचन टिप्पणी अनुच्छेद में किया जाना सम्भव नहीं है फिर भी स्रोत पर जाकर आधिक खोजा जा सकता है-
      वर्णमातृका
      वर्णमातृका वर्णसमाम्नाय से प्राचीन है, यह बात पतञ्जलि के महाभाष्य में किमर्थो वर्णानामुपदेशः? इस प्रश्न के द्वारा प्रत्याहार-प्रयोजन में पहले सिद्ध हो चुकी है। आप सोच रहे होंगे कि वर्णमातृका और वर्णसमाम्नाय में क्या अन्तर है? सामान्यतः वर्णमातृका में वर्ण दो प्रकार के होते हैं- स्वर और व्यञ्जन, जिन्हें वर्णसमाम्नाय में अच् और हल् - इन दो प्रत्याहारों से समझा जाता है। वर्णमातृका में इक्यावन वर्ण हैं, जिनमें अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ लृ ए ऐ ओ औ अं अः - ये सोलह स्वर और पैंतीस व्यजन हैं। व्यजनों में सात वर्ग हैं, जिनमें कवर्ग से लेकर पवर्ग तक पाँच-पाँच वर्गों के पाँच वर्ग स्पर्श-संज्ञक हैं।

      वृत्तिसमवायार्थ उपदेश:
      वृत्तिसमवायार्थों वर्णानामुपदेशः । किमिदं वृत्तिसमवायार्थ इति।
      वृत्तये समवायो वृत्तिसमवायः । वृत्त्यर्थो वा समवायो वृत्तिसमवायः ।
      वृत्तिप्रयोजनो वा समवायो वृत्तिसमबायः | का पुनर्वृत्तिः। शास्त्रप्रवृत्तिः ।
      अथ कः समवायः। वर्णानामानुपूर्व्येण संनिवेशः। अथ क उपदेशः ।
      उच्चारणम्‌। कुत एतत्‌। दिशिरुच्चारणक्रियः | उच्चार्य हि वर्णानाह-उपदिष्टा इमे वर्णा इति |
      अनुबन्धकरणार्थश्च
      अनुबन्धकरणार्थश्च वर्णानामुपदेशः अनुवन्धानासङ्ख्यामीति । न ह्यनुपदिश्य वर्णाननुबन्धाः शक्या आसक्तुम् । स एष वर्णानामामुपदेशो वृत्तिसमवायार्थश्चानुबन्धकरणार्थश्च । वृत्तिसमवायश्चानुवन्धकरणं प्रत्याहारार्थम् । प्रत्याहारो वृत्त्यर्थः।।
      इष्टबुद्धयर्थश्च
      इष्टबुद्धयर्थश्च वर्णानामुपदेशः-इष्टान्वर्णान्भोत्स्यामहे' इति । न ह्यनुपदिश्य वर्णानिष्टा वर्णाः शक्या विज्ञातुम् । इष्टबुद्धयर्थश्चेति चेदुदात्तानुदात्तस्वरितानुनासिकदीर्घप्लुतानामप्युपदेशः
      इष्टबुद्धयर्थश्चेति चेदुदात्तानुदात्तस्वरितानुनासिकदीर्घप्लुतानामुप्यपदेशः कर्तव्यः । एवं गुणा अपि हि वर्णा इष्यन्ते ।
      (वा०) वृत्ति समवाय के लिये वर्णों का उपदेश है।
      बृत्ति समवाय क्या चीज है ?
      बृत्ति के लिये समवाय वृत्तिसमवाय है, वृत्ति का उपकारक समयाय वृत्ति समवाय है अथवा वृत्ति का प्रयोजक समवाय वृत्तिसमवाय है।
      वृत्ति क्या चीज हैं ? शास्त्र की प्रवृत्ति ।
      समवाय क्या पदार्थ है ?
      वर्णों का क्रम से रखना ।
      उपदेश क्याक है ?
      उच्चारण ।
      यह कैसे ?
      दिश् धातु उच्चारणार्थक है । उच्चारण करके ही तो कहता है इन वर्णों का उपदेश हो गया ।

      हटाएं
  13. आपने लिखा है कि सर्वनाम की संख्या ३५ है परंतु इसकी सूची लिखते समय शक्यता तद् सर्वनाम लिखना रह गया है। देखकर जो सही लगे वह सुधार करने की कृपा करें।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आभार। सुधार कर दिया गया है। इसकी संख्या को अलग- अलग प्रदर्शित करके लिख दिया गया।

      हटाएं
  14. मैं नियमित रूप से गीता पढ़ता हूं. और गीता के 6 अध्यायों को कंठस्त कर लिया है. वर्तमान में मैं 7 वें अध्याय को याद कर रहा हूं. गीता के श्लोकों को स्वयं के उद्योग से व्याख्या कर के समझने की परम हार्दिक लालसा है. तत्पश्चात ईश्वर की कृपा हुई तो सभी भारतीय संस्कृत ग्रंथों को पढ़ने की कोशिश होगी. मेरा दृढ़ विश्वास है कि जब तक आप संस्कृत नहीं सीखते, आप अपने अतीत को समझ नहीं सकते. इन दिनों लोग व्हाट्सएप मैसेज के जरिए बेतुके दावे करते हैं और जो इन संदेशों को पढ़ते हैं न केवल इन संदेशों पर विश्वास करते है, बल्कि उनकी प्रामाणिकता की पुष्टि किए बिना उन्हें फैलाते भी है जिसके कारण हमारा सनातन धर्म समाज कट्टरता,उजड्डता,मूढ़ता,अवैज्ञानिक स्वभाव का शिकार हो रहा है. मैं उस भीड़ का हिस्सा नहीं बनना चाहता. इसलिए मैं अपने अतीत को अपने प्रयासों से समझना चाहता हूं और हमारे समाज में व्याप्त मूढ़ता का मुकाबला करना चाहता हूं. अतः आशा है आप संस्कृत सीखने मे मेरा मार्गदर्शन करेंगे. सधन्यवाद kamleshagrawal73@yahoo.com

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. श्रीमद्भगवद्गीता हो या वाल्मीकि रामायण, पुराण हो या संस्कृत साहित्य का कोई भी ग्रंथ, इनके अर्थों को समझने के लिए व्याकरण के नियम और शब्दकोश की आवश्यकता होती है। संस्कृत शिक्षण पाठशाला में उन सारे तत्वों को समाहित किया गया है, जिससे आप संस्कृत में लिखे धार्मिक साहित्य ग्रंथों को समझ सकते हैं। इसका एक लाभ और होगा। वह यह कि दर्शन, कृषि, चिकित्सा, राजनीति, ललित कला, इतिहास आदि विषयों पर लिखित संस्कृत साहित्य को भी आप समझ सकते हैं।

      हटाएं
  15. अगर इसका पीडीएफ है तो कृप्या लिंक भेजने का कष्ट करें 🙏

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. इस पाठ का PDF अभी नहीं बना है। मेरे जीवित रहने तक या ब्लॉग रहने तक इसका PDF नहीं बना सकता। एक बार PDF बन जाने के बाद उसमें विस्तार या संशोधन का अवसर समाप्त हो जाता है। PDF बनाना ही होता तो ब्लॉग पर न लिखकर पुस्तक लिखा होता। इस पाठ को पढ़ने वाले यहाँ प्रश्न पूछ सकते हैं। उसका समाधान पा सकते हैं। पाठ में भी समाधान लिखा दिया जाता है, जबकि PDF में वह सुविधा समाप्त हो जाती है। कुल मिलाकर किसी अध्यापक से सीधे सम्वाद स्थापित करने पढ़ने तथा अध्यापक के मृत्यु होने के कारण उसके लिखे को पढ़ने में जो अन्तर है, वही अन्तर यहाँ आकर पढ़ने तथा PDF को पढ़ने में है।

      हटाएं
    2. कितना महत्वपूर्ण है आपका यह उद्यम ! संस्कृत जितना संरचित भाषा है ! प्रणाम ! प्रणाम ! प्रणाम !

      हटाएं
  16. kwachit; kadachit; kechana; kaschana; kwachit; kinchana; kasminchit;kamschan; ityadayaha pada prayogam katham bhavet iti ahm na janami mahoday. bhavan krupaya pada prayogam krutwa pathayamaha, iti mama prarthana. Dhanyavadaha Mahodaya

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. चित्, चन आदि प्रत्यय लगाकर बनने वाले शब्द तथा उसके प्रयोग को लिख दिया हूं। आप पुनः ब्लॉग पर पधार कर देख ले।

      हटाएं
  17. Shree man ji se nivedan hai ki hame jitane bhi संस्कृत के नपुंसक लिंग के जितने भी शब्द है वो भी अपलोड करें और हमे gmail pr sent karne ki कृपा करें ।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. आपने बहुत मासूम सी बात लिख दी है। जब आप डिजिटल रूप में अध्ययन करने आते हैं, तब पुस्तक वाला संस्कार हटाकर आना चाहिए। यहाँ संस्कृत अभ्यास का लिंक दिया गया है। इसके माध्यम से आप मनचाहा शब्दरूप पा सकते हैं।

      हटाएं
  18. बहु सम्यक् रीत्या कृतमस्ति, धन्यवादाः महोदय I

    जवाब देंहटाएं
  19. सर इसका pdf लिंक provide कीजिए plz🙏
    और सर कृदंत प्रकरण भी समझा दिजिए ही🙏

    जवाब देंहटाएं
  20. उत्तर
    1. इस पाठ का PDF अभी नहीं बना है। मेरे जीवित रहने तक या ब्लॉग रहने तक इसका PDF नहीं बना सकता। एक बार PDF बन जाने के बाद उसमें विस्तार या संशोधन का अवसर समाप्त हो जाता है। PDF बनाना ही होता तो ब्लॉग पर न लिखकर पुस्तक लिखा होता। इस पाठ को पढ़ने वाले यहाँ प्रश्न पूछ सकते हैं। उसका समाधान पा सकते हैं। पाठ में भी समाधान लिखा दिया जाता है, जबकि PDF में वह सुविधा समाप्त हो जाती है। कुल मिलाकर किसी अध्यापक से सीधे सम्वाद स्थापित करने पढ़ने तथा अध्यापक के मृत्यु होने के कारण उसके लिखे को पढ़ने में जो अन्तर है, वही अन्तर यहाँ आकर पढ़ने तथा PDF को पढ़ने में है।

      हटाएं
  21. परिश्रमेण में कौन सी विभक्ति और कौन सा वचन है।

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. परिश्रम शब्द के तृतीया विभक्ति एकवचन में परिश्रमेण रूप बनताा है।

      हटाएं
  22. अदन्ति में कौन सा धातु है?

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. अद् धातु है। परस्मैपद, लट् लकार प्रथम पुरूष, बहुवचन में अदन्ति रूप बनता है। इसका प्रयोग कर्तृ वाच्य में होगा।

      हटाएं
  23. लता गृहस्य गच्छति correct the error in sanskrit
    Answer please sir

    जवाब देंहटाएं
    उत्तर
    1. यह वाक्य सही है। आप क्या कहना चाहते हैं? लता गृहस्य गच्छति वाक्य का हिन्दी में अनुवाद इस प्रकार होगा- घर की लता (किसी महिला का नाम) जाती है।

      हटाएं

अनुवाद सुविधा

ब्लॉग की सामग्री यहाँ खोजें।

लोकप्रिय पोस्ट

© संस्कृतभाषी | जगदानन्द झा. Blogger द्वारा संचालित.

मास्तु प्रतिलिपिः

इस ब्लॉग के बारे में

संस्कृतभाषी ब्लॉग में मुख्यतः मेरा
वैचारिक लेख, कर्मकाण्ड,ज्योतिष, आयुर्वेद, विधि, विद्वानों की जीवनी, 15 हजार संस्कृत पुस्तकों, 4 हजार पाण्डुलिपियों के नाम, उ.प्र. के संस्कृत विद्यालयों, महाविद्यालयों आदि के नाम व पता, संस्कृत गीत
आदि विषयों पर सामग्री उपलब्ध हैं। आप लेवल में जाकर इच्छित विषय का चयन करें। ब्लॉग की सामग्री खोजने के लिए खोज सुविधा का उपयोग करें

समर्थक एवं मित्र

सर्वाधिकार सुरक्षित

विषय श्रेणियाँ

ब्लॉग आर्काइव

Recent Posts

लेखानुक्रमणी

लेख सूचक पर क्लिक कर सामग्री खोजें

अभिनवगुप्त (1) अलंकार (3) आधुनिक संस्कृत गीत (17) आधुनिक संस्कृत साहित्य (5) आयुर्वेद (1) उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान (1) उत्तराखंड (1) ऋग्वेद (1) ऋषिका (1) कणाद (1) करवा चौथ (1) कर्मकाण्ड (50) कहानी (1) कामशास्त्र (1) कारक (1) काल (2) काव्य (23) काव्यशास्त्र (27) काव्यशास्त्रकार (1) किरातार्जुनीयम् (3) कुमाऊँ (1) कूर्मांचल (1) कृदन्त (3) कोजगरा (1) कोश (13) क्त्वा (1) गंगा (1) गया (1) गाय (1) गीति काव्य (2) गृह कीट (1) गोविन्दराज (1) ग्रह (1) छन्द (6) छात्रवृत्ति (1) जगदानन्द झा (3) जगन्नाथ (1) जीवनी (6) ज्योतिष (20) तकनीकि शिक्षा (21) तद्धित (11) तिङन्त (11) तिथि (1) तीर्थ (3) दर्शन (19) धन्वन्तरि (1) धर्म (1) धर्मशास्त्र (14) नक्षत्र (2) नाटक (4) नाट्यशास्त्र (3) नाथ पंथ (8) नायिका (2) नीति (3) न्याय शास्त्र (1) पतञ्जलि (3) पत्रकारिता (4) पत्रिका (6) पराङ्कुशाचार्य (2) पर्व (2) पाण्डुलिपि (2) पालि (3) पुरस्कार (13) पुराण (3) पुस्तक (1) पुस्तक संदर्शिका (1) पुस्तक सूची (14) पुस्तकालय (5) पूजा (1) प्रतियोगिता (7) प्रत्यभिज्ञा शास्त्र (1) प्रत्यय (1) प्रशस्तपाद (1) प्रहसन (1) प्रौद्योगिकी (1) बिल्हण (1) बौद्ध (6) बौद्ध दर्शन (3) ब्रह्मसूत्र (1) भरत (1) भर्तृहरि (2) भामह (1) भारतीय दर्शन (1) भाषा (3) भाषा प्रौद्योगिकी (1) भाष्य (1) भोज प्रबन्ध (1) मगध (3) मनु (1) मनोरोग (1) महाविद्यालय (1) महोत्सव (2) मुहूर्त (1) मेघदूतम् (1) योग (5) योग दिवस (2) रघुवंशम् (6) रचनाकार (3) रस (1) रामसेतु (1) रामानुजाचार्य (4) रामायण (4) रोजगार (2) रोमशा (1) लघुसिद्धान्तकौमुदी (46) लिपि (1) वर्गीकरण (1) वल्लभ (1) वाल्मीकि (1) विद्यालय (1) विधि (1) विश्वनाथ (1) विश्वविद्यालय (1) वृष्टि (1) वेद (6) वैचारिक निबन्ध (32) वैशेषिक (1) व्याकरण (53) व्यास (2) व्रत (2) शंकाराचार्य (2) शब्दकोश (3) शरद् (1) शैव दर्शन (2) श्लोक चक्र (1) श्लोकसंधानम् (3) श्लोकान्त्याक्षरी (4) संख्या (1) संचार (1) संस्कार (19) संस्कृत (16) संस्कृत आयोग (1) संस्कृत ऐप (2) संस्कृत कथा (11) संस्कृत गीतम्‌ (54) संस्कृत टूल्स (1) संस्कृत पत्रकारिता (2) संस्कृत प्रचार (2) संस्कृत लेखक (1) संस्कृत वाचन (1) संस्कृत विद्यालय (3) संस्कृत शिक्षा (6) संस्कृत सामान्य ज्ञान (1) संस्कृतसर्जना (5) सन्धि (3) समास (6) सम्मान (1) सामुद्रिक शास्त्र (1) साहित्य (8) साहित्यदर्पण (1) सुबन्त (6) सुभाषित (3) सूक्त (3) सूक्ति (1) सूचना (1) सोलर सिस्टम (1) सोशल मीडिया (2) स्तुति (2) स्तोत्र (11) स्मृति (12) स्वामि रङ्गरामानुजाचार्य (2) हास्य (1) हास्य काव्य (2) हुलासगंज (2) Devnagari script (2) Dharma (1) epic (1) jagdanand jha (1) JRF in Sanskrit (Code- 25) (3) Library (1) magazine (1) Mahabharata (1) Manuscriptology (2) Online Sanskrit Game (1) Pustak Sangdarshika (1) Sanskrit (2) Sanskrit Competition (1) Sanskrit language (1) sanskrit saptaha (1) sanskritsarjana (3) sex (1) Shlokantyakshari (2) Shlokasandhanam (1) Student Contest (2) UGC NET/ JRF (4)