संस्कृत- शिक्षण- पाठशाला 1




                             ध्वनिवर्णाः पदं वाक्यमित्यास्पदचतुष्टयम्।
यस्याः सूक्ष्मादिभेदेन वाग्देवीं तामुपास्महे।। सरस्वतीकण्ठाभरणम् 1.1

आत्म निवेदन/ कथ्य/ भूमिका
     किसी भी भाषा के दो स्वरूप होते हैं। 1. लिखित 2. बोलचाल / भाषिक या सम्पर्क भाषा। चुंकि मैं यहाँ आपसे लिखित रूप में सम्पर्क कर रहा हूँ, अतः इस पाठ के माध्यम से आप लिखित संस्कृत सीख सकेंगें। इस पाठ्यक्रम को सीखने के बाद आप संस्कृत भाषा एवं देवनागरी लिपि में लिखी संस्कृत की पुस्तकें पढ़कर आसानी से समझ सकेंगें। आप संस्कृत में अपना भाव या विचार लिख सकेगें। मेरे इस पाठशाला के साथ अभ्यास हेतु आप किसी अन्य पुस्तक की भी सहायता ले सकते हैं। यहाँ पर अभी सतत पाठ का विस्तार हो रहा है। अतः निरंतर क्रम में परिवर्तन दिखेगा। 

पाठ- 1
लिपि शिक्षण
संस्कृत भाषा को लिखने के लिए देवनागरी लिपि का प्रयोग किया जाता है। अतः संस्कृत सीखने से पहले हमें देवनागरी लिपि के वर्णमाला का ज्ञान होना आवश्यक हो जाता है। यहाँ मैं आपको सबसे पहले वर्णमाला से परिचय करा रहा हूँ।
 देवनागरी में दो प्रकार के वर्ण होते हैं।
1. स्वर वर्ण   2. व्यंजन वर्ण
स्वर वर्ण
अ इ उ ऋ ऌ ए ऐ ओ औ
ध्यातव्य- ए ऐ ओ औ को संयुक्त स्वर भी कहा जाता है,क्योंकि ये वर्ण दो स्वर के मेल से बनते हैं। संस्कृत में अ इ उ ऋ वर्णों का ह्रस्व, दीर्ध और प्लुत ये तीन भेद होते हैं। अतः व्याकरण में अ (अवर्ण) का अर्थ आ भी होता है। इसी प्रकार इ उ ऋ को भी समझना चाहिए।
व्यंजन वर्ण
क ख ग घ  च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म य र ल व श ष स ह ये व्यंजन वर्ण हैं। पाणिनि ने 14 माहेश्वर सूत्रों में इन वर्णों को कहा है। वहाँ पर वर्णों के क्रम में थोड़ा सा परिवर्तन है। संस्कृत सीखने के इच्छुक लोगों को चाहिए कि वे माहेश्वर सूत्र को याद कर लें, ताकि संस्कृत व्याकरण सीखना आसान हो सके। 
 व्यंजन में स्वर वर्ण को जब मिलाया जाता है तब वह उच्चारण करने योग्य होता है। अनुस्वार तथा विसर्ग को अयोगवाह कहा जाता है। इसका प्रयोग ( लिखने तथा बोलने में ) केवल स्वर वर्णों के साथ ही होता है। दो व्यंजन वर्णों को आपस में मिलने पर एक संयुक्त व्यंजन का निर्माण होता है।

व्यंजन वर्णों के संयोग के कारण इसके लिखावट (आकृति) में परिवर्तन
 
1. कहीं-कहीं दो व्यंजनों के मेल को पहचानना आसान होता है। जैसे स् + व् + अ = स्व । कभी- कभी व्यंजनों के मेल से बने अक्षर में इतना परिवर्तन हो जाता कि पहचानना कठिन हो जाता है। जैसे- क् + ष् + अ = क्ष  त् + र् + अ = त्र ज् + ञ् + अ =  ज्ञ  इत्यादि। जहाँ दो व्यंजन वर्णों के मेल से उसकी आकृति में बहुत अधिक अंतर आ जाता हैऐसे  श् + र् + अ =  श्र  घ् + न् + अ = घ्न  जैसे वर्ण को पहचानना चाहिए।
2. इस लिपि मे र एक ऐसा वर्ण हैजो किसी अन्य व्यंजन के साथ मिलने पर तीन तरह से परिवर्तित हो जाता है। कभी यह वर्ण के ऊपरकभी मध्य में कभी नीचे जुड़ता है। जैसे- वर्ण में ऊपर वाला र् को देखें-  व + र्  +   = वर्ण,  क्रम में मध्य वाला र् को देखें- व + र् + ण = क्रमवर्ण में ऊपर वाला र् को देखें- व + र् + ण = वर्णघ्राण में नीचे वाला र् को देखें- घ् + र् +आ + ण = घ्राण 
3. संस्कृत भाषा में कहीं कहीं तीन या इससे अधिक व्यंजन वर्ण भी आपस में जुड़ते हैं। जैसे- ओष्ठ्य । व्यंजन वर्णों के आकृति परिवर्तन को समझने के लिए देवनागरी यूनीकोड टाइपिंग (टंकन) अत्यधिक सहायता करता है।
अभ्यास
1. द्वद्धभ्रपर्णदुग्ध शब्द में व्यंजन तथा स्वर को अलग- अलग कर लिखें।
2. 10 ऐसे संयुक्त व्यंजन को लिखें,जो दो व्यंजन को मिलने पर भी आसानी से पहचाना जा सकता है। 
3. 10 ऐसे संयुक्त व्यंजन को लिखें,जो दो व्यंजन को मिलने पर स्वरूप में परिवर्तन हो जाता है। 
वर्ण संयोग
स्वर तथा व्यंजन के मेल से शब्द बनते हैं। जैसे- ज्+ अ+ य्+ ए+ श्+ अ  इन वर्णों के आपस में जुड़ने पर जयेश शब्द बनता है।
जब कोई स्वर व्यंजन में जोड़ा जाता है तो उसे मात्रा के रूप में दिखाया जाता है। क् में आ की मात्रा जुड़ने पर काक् में इ जुड़ने पर कि आदि शब्द बनते हैं। अ अक्षर की कोई भी मात्रा नहीं होती है। बल्कि यह हलन्त  चिह्न के हटने से पता चलता है।
हम शब्दों को ढ़ूढ़ने के लिए शब्दकोश का प्रयोग करते है। यहाँ पर वर्ण क्रम से शब्द रखे होते हैं। यहाँ आरम्भिक अक्षर महत्वपूर्ण होता हैजो हमें शब्दों को खोजने में मदद करता है। संस्कृत या हिन्दी जैसी भाषा में शब्दों का अंतिम वर्ण लिंग (पुल्लिंगस्त्रीलिंगनपुंसक लिंग) को पहचानने में सहयोग करता है। संस्कृत में शब्दों का स्वरूप अधिकांश विभक्ति तथा वचन में  परिवर्तित हो जाता है। शब्दों  के अंतिम वर्ण तथा लिंग के कारण संस्कृत शब्दों के स्वरूप में परिवर्तन  देखा जाता है। क्रिया में भी बहुत कुछ ऐसा होता हैजिसकी चर्चा हम आगे यथास्थान करेंगें। दो शब्दों या पदों के मेल तो सन्धि कहा जाता है। इस सन्धि के नियम आगे के पाठ में दिया गया है । सन्धि आदि नियमों में प्रत्याहारों का उपयोग किया जाता है। वर्णों के संक्षेपीकरण का प्रत्याहार कहा जाता है। प्रत्याहार बनाने के लिए माहेश्वर सूत्र का एक आरम्भ का अक्षर तथा एक अंतिम (हलन्त) अक्षर लिया जाता है। इन दोनों के बीच में आने वाले वर्ण का बोध उस प्रत्याहार से होता है। जैसे अक् प्रत्याहार कहने पर अ इ उ ऋ ऌ का बोध होता है।
पाठ-2
संस्कृत के शब्दों से परिचय (शब्द विचार)
संस्कृत में जब हम कोई वाक्य बोलते हैं तो इसमें संज्ञा, सर्वनाम,क्रिया, विशेषण तथा अव्यय इन पाँच प्रकार के शब्दों का प्रयोग करते हैं। यहाँ शब्द के अंत में आने वाले स्वर तथा हल् संज्ञा वर्णों से भी परिचय कराया जाएगा। इसमें सबसे पहले संज्ञा के साथ वर्तमान काल की क्रिया का प्रयोग करेंगें। इसके आगे तीनों वचनों तथा पुरुषों का, पुनः तीनों लिंगों का प्रयोग करेंगें । इसी प्रकार  क्रमशः भूतकाल एवं भविष्यत् काल का प्रयोग करेंगें। पाँचों प्रकार के शब्दों का संक्षिप्त परिचय यहाँ दिया जा रहा है। 
संज्ञा
किसी के नाम को संज्ञा कहते हैंजैसे – रामःहिमालयःहरिःभानुः गंगा आदि। इसके लिए प्रथमा                 विभक्ति  का प्रयोग किया जाता है।
सर्वनाम
कई सर्वनाम का प्रयोग संज्ञा के स्थान पर होता है। इसमें भी प्रथमा विभक्ति होती है। इसकी कुल संख्या 35 है। संज्ञा (नाम) जिस लिंग और वचन का होता हैसर्वनाम का प्रयोग भी उसी लिंग एवं वचन में किया जाता है।सर्वविश्वउभउभयडतरडतमअन्यअन्यतरइतरत्वत्त्वनेमसमसिमपूर्वपरअवरदक्षिणउत्तर,अपरअधरस्वअन्तरत्यद्यद्एतद्इदम्अदस्एकद्वियुष्मद्अस्मद्भवतुकिम् । इनके तीनों लिंगों में रूप होते हैं। इदम् , एतद् , तद्, अदस्, यद्, किम् तथा अनिश्चयवाचक एवं निश्चयवाचक सर्वनाम का प्रयोग विशेषण अर्थ में भी होता है।  जैसे- सः पुरूषः, सा स्त्री। एषः रामः, एषा गीता । आगे के अध्याय में हम सर्वनाम के भेद तथा प्रयोग पर चर्चा करेंगें। एक रोचक श्लोक द्वारा समझें-
का लोकमाता किमु देहमुख्यं रते किमादौ कुरुते मनुष्यः ।
को दैत्यहन्ता वद वै क्रमेण गौरीमुखं चुम्बति वासुदेवः ।।
विशेषण
जो शब्द संज्ञा और सर्वनाम शब्दों की विशेषता बताता हैउसे विशेषण कहते हैंजैसे- लघुः एकः आदि। विशेषण के द्वारा जिसकी विशेषण बतायी जाती है, उसे विशेष्य कहते हैं। विशेष्य के लिए जिस लिंग, वचन तथा विभक्ति का प्रयोग किया जाता है, विशेषण में भी वही लिंग, वचन तथा विभक्ति का प्रयोग होता है। जैसे बालकः सुन्दरः अस्ति। बालिका सुन्दरी अस्ति। पुष्पं सुन्दरम् अस्ति। 
कुछ संख्यावाची विशेषण जैसे- शत, विंशति, त्रिंशत् आदि के नियत लिंग होते है। इनके वचन भी विशेष अर्थ में ही बदलते हैं। 
युष्मद् तथा अस्मद् में विकल्प से खञ् ,अण् तथा छ प्रत्यय लगते हैं । इससे मामकीन, मामकीना, त्वदीय, त्वदीया आदि बनते हैं। सर्वनाम के बाद लगने वाले प्रत्ययों पर यथा प्रसंग विस्तार पूर्वक चर्चा करेंगें।
 संख्यावाची शब्दों के बारे में अधिक जानने के लिए चटका लगायें।
क्रिया
जिन शब्दों से किसी काम का करना या होना जाना जाता हैउसे क्रिया कहते हैं। संस्कृत में  इसके लिए धातु शब्द का प्रयोग किया गया है। इसमें प्रत्यय लगाकर धातुरूप बनाते हैं। कार्य को करने या होने की स्थिति(समय) को हम मुख्यतः वर्तमान कालभूतकाल और भविष्यत् काल के रूप में तीन भागों में बांटते हैं। लकार समय का वाचक है। अतः काल या समय के सिए यहाँ लकार शब्द का भी प्रयोग किया जाता है।  समय को विभाजित कर दिखाने के लिए लट् लङ् आदि 10 लकार बनाये गये हैं। इसमें से 5 लकारों का प्रयोग मुख्य रूप से किया जाता है।  जैसे पठतिहसतिखेलतिअपठत्पठिष्यतिपठतु आदि। आज्ञा देने, परामर्श करने प्रश्न पूछने, आशीर्वाद देने आदि के लिए यहाँ तीन अलग-अलग लकारों का प्रयोग होता है। 

उपसर्ग- प्रादि का क्रिया (धातु) के साथ योग होने पर वह उपसर्ग कहा जाता है। धातु के साथ उपसर्ग का योग होने पर धातु के अर्थ में परिवर्तन हो जाता है। कुछ परस्मैपद की धातु के साथ उपसर्ग का योग होने पर वह आत्मनेपद की धातु तथा कुछ आत्मनेपद की धातु परस्मैपद में परिवर्तित हो जाती है। जैसे- क्रीड धातु परस्मैपद की धातु है। इसका रूप चलता है – क्रीडति, क्रीडतः क्रीडन्ति। परन्तु क्रीड धातु के पूर्व अनु, परि तथा आ उपसर्ग लगने पर यह धातु आत्मनेपद की हो जाती है। इसका रूप अनुक्रीडते, परिक्रीडते, आक्रीडते  रूप बनता है। एक अलग लेख में उपसर्गों के बारे में विस्तार पूर्वक जानकारी दी गयी है।
अव्यय
जिन शब्दों का स्वरूप हमेशा एक ही तरह बना रहता हैअर्थात् जिनका सभी वचनोंलिंगों, विभक्तियों तथा वचनों में कोई परिवर्तन नहीं होता है, उसे अव्यय कहते हैं।
अकारान्त शब्द
जिस शब्द के अंत में अ अक्षर होता हैउसे अकारान्त कहते हैं। इसी प्रकार जिस शब्द के अंत में इ अक्षर होता हैउसे इकारान्त कहते हैं जैसे- रात्रि। किसी भी वर्ण के आगे कार लगाने का अर्थ वह अक्षर होता है। संस्कृत में तीनों लिंगों के शब्द होते है।
अकारान्त पुल्लिंग शब्द
बक                   छात्र                  हस्त                  ओष्ठ
हंस                   चन्द्र                  सेवक                  
अध्यापक            पिक                 श्रमिक
संस्कृत में बकःहंसःअध्यापकः आदि ः लगाकर शब्द बनायें।
अभ्यास-
1. शब्दकोश को देखकर पुल्लिंगवाची अकारान्त 10 शब्दों को लिखियेजो किसी का नाम हो।
2. पुल्लिंगवाची पाँच शरीर के अंग के नाम लिखिएजो अकारान्त हो।
3. पुल्लिंगवाची पाँच पक्षियों के नाम लिखिए।
4. प्रतिदिन उपयोग में आने वाली अकारान्त पुल्लिंगवाची 10 वस्तुऔं के नाम लिखिए।
क्रिया
संस्कृत में क्रिया को धातु कहा जाता है। 
उदाहरण-
पठ                    खाद
चल                   लिख
वद                    पा
हस
इन धातुओं के वर्तमान काल (लट् लकार) प्रथम पुरुष एकवचन में इस प्रकार रूप बनता है। 
पठतिचलति,वदति,हसति,खादति,लिखति,पिबति। 
                                                    
                                             पाठ- 3
वचन
जिस शब्द से एक व्यक्ति या वस्तु का ज्ञान होता है। उसे एकवचनजिससे दो व्यक्ति या वस्तु का ज्ञान होता है। उसे द्विवचन तथा जिससे दो से बधिक व्यक्ति या वस्तु का ज्ञान होता है। उसे बहुवचन कहते है। अपवाद स्वरूप कुछ शब्दों के वचन निश्चित होते हैं। जैसे- पुल्लिंग दार (पत्नी) अक्षत, लाज शब्द बहुवचन में ही प्रयोग किये जाते हैं। स्त्रीलिंग शब्द अप् (जल) सुमनस् (फूल) वर्षा, सिकता (रेत) शब्द सदा बहुवचन में ही प्रयुक्त होते हैं। एकवचनं त्वौत्सर्गिकं बहुवचनं चार्थबहुत्वापेक्ष्यम् नियम के अनुसार जहाँ वचन का निर्णय नहीं हो सके वहाँ एकवचन का ही प्रयोग करना चाहिए।
संस्कृत में तीन वचन होते है।
1.         एकवचन
2.         द्विवचन
3.         बहुवचन
 एकवचन          द्विवचन         बहुवचन
बालकः            बालकौ         बालकाः  
अब इस पाठ में हम कर्ताक्रिया और वचन को जोड़कर वाक्य बनाने के अभ्यास करेंगें। सरल अभ्यास के लिए अधोलिखित वाक्य को देेंखें-
         एकवचन     द्विवचन         बहुवचन
कर्ता-   बालकः        बालकौ          बालकाः
क्रिया - खेलति         खेलतः           खेलन्ति 
वाक्य इस तरह बनेगा -  बालकः खेलतिबालकौ खेलतःबालकाः खेलन्ति । इसी तरह छात्र और पठखग और कूज आदि के साथ वाक्य बनायें।
 पुरुष
पुरुष तीन होते हैं- 1. प्रथम पुरुष 2. मध्यम पुरुष तथा 3. उत्तम पुरुष
मध्यम पुरुष में युष्मद् (तुम) शब्द का प्रयोग होता है। उत्तम पुरुष में अस्मद् (मैं) शब्द का प्रयोग होता है। इसको छोड़ कर शेष सभी शब्दों के लिए प्रथम पुरुष का प्रयोग होता है। प्रथम पुरुष में तुम के लिए संस्कृत में भवत् (आप) शब्द का प्रयोग होता है। प्रथमा विभक्ति के तीनों वचनों में अस्मद् (मैं) युष्मद् (तुम) तथा भवत् (आप) शब्द का रूप इस प्रकार है। इसके ठीक सामने क्रिया दिखायी जा रही है ।
कर्ता                                            क्रिया                                                पुरुष
एकवचन     द्विवचन       बहुवचन      एकवचन     द्विवचन       बहुवचन
भवान्         भवन्तौ         भवन्तः        पठति        पठतः           पठन्ति        प्रथम पुरुष       
त्वम्           युवाम्          यूयम्            पठसि       पठथः           पठथ          मध्यम पुरुष
अहम्           आवाम्        वयम्            पठामि      पठावः         पठामः        उत्तम पुरुष   
 इसी पाठ में हम अकारान्त पुल्लिंग शब्द को पहचान चुके हैं। यह भी देख चुके हैं कि कर्ता जिस वचन तथा पुरूष का होता है, क्रिया भी उसी वचन तथा पुरूष की होगी। इस आधार पर अलग- अलग क्रिया पदों के साथ वाक्य बनाना सीखिये।  
 आप जानते होंगें कि संस्कृत भाषा में किसी भी शब्द के साथ उसकी कारक (विभक्ति) साथ में ही जुड़ा रहता है, जबकि हिन्दी में हम विभक्ति को अलग से लिखते हैं। जब किसी शब्द के साथ विभक्ति जुड़ती है तो उसके स्वरूप में परिवर्तन हो जाता है। शब्दों के स्वरूप में परिवर्तन हो जाने का मुख्य कारण इन शब्दों का अंतिम वर्ण तथा लिंग होता है। इसलिए संस्कृत में अंतिम वर्ण अ, ,, ई आदि स्वर वर्ण तथा व्यंजन वर्ण के आधार पर इनके कई विभक्तियों में अलग- अलग शब्द रूप बनते हैं। अतः बालक शब्द की तरह हरि शब्द का रूप नहीं चलता है,क्योंकि बालक शब्द के अंतिम में अ अक्षर है, जबकि हरि में इ । मैं यहाँ पर तीनों लिंग के अलग- अलग अंतिम स्वर तथा व्यंजन वाले शब्दों से परिचय करा रहा हूँ। आप इनका शब्द रूप देख लें।
लिंग-
जिससे पुरूष शब्द का बोध होता हैउसे पुल्लिंग कहते है। जिससे स्त्री शब्द का बोध होता हैउसे स्त्रीलिंग तथा जिससे नपुंसक का बोध होता है. उसे नपुंसक लिंग कहते हैं।
1.     पुल्लिंग             जैसे- बालकहरिभानुपितृलिह्सः आदि
2.     स्त्रीलिंग            जैसे-  बालिकागौरीउज्जयिनीश्रीसा आदि
3.     नपुंसकलिंग       जैसे- ज्ञानअक्षरअंगमौन,दधिधातृतत् आदि
विशेषः- संस्कृत में शब्दों का लिंग होता है न कि वस्तु का। जैसे- स्त्री का पर्यायवाची दार शब्द पुल्लिंग है। नपुंसक लिंग में प्रयुक्त शरीर का पर्याय तनु शब्द स्त्रीलिंग है। एक ही वस्तु के लिए पुल्लिंगस्त्रीलिंगनपुंसक लिंग के शब्द का प्रयोग किया जाता है। अधिक जानकारी के लिए लिंगानुशासन पर चटका लगायें।
इकारान्त पुल्लिंग शब्द
हरिमुनि,  कपि,  अग्निगिरिनिधिविधिपतिसखिऋषिकवि आदि
ईकारान्त पुल्लिंग शब्द
संस्कृत में अधिकांश ईकारन्त शब्द स्त्रीलिंगवाची होते हैं। ईकारान्त पुल्लिंग शब्द बहुत कम हैं।
उदाहरण-  सुधीप्रधीग्रामणीनीयवक्रीसुधीसुखी,  
उकारान्त पुल्लिंग शब्द
ऋतु,  गुरुप्रभुशम्भुइक्षु,, तनु,लधुरेणुराहुबाहुविभुविष्णुभीरुभिक्षुशत्रुरिपुशम्भुकेतुपशु,           शिशु आदि
ऊकारान्त पुल्लिंग शब्द
हूहूखलपूवर्षाभूआत्मभू आदि।
ऋकारान्त पुल्लिंग शब्द
वक्तृभर्तृअध्येतृजेतृद्ष्टृपठितृ , स्तोतृहोतृ आदि।
यह शब्द किसी भी धातु से तृन और तृच् प्रत्यय लगाकर बनाया जाता हैइस प्रत्यय का सामान्य अर्थ होता है- वाला। सम्बन्ध वाचक नप्तृभातृजामातृदुहितृ  आदि का धातु के अर्थ के साथ वाला अर्थ नहीं लगेगा।
ओकारान्त पुल्लिंग शब्द
गो
ऐकारान्त पुल्लिंग शब्द
रै
औकारान्त पुल्लिंग शब्द
ग्लौ
आकारान्त स्त्रीलिंग शब्द
सामान्यतः पुल्लिंग शब्द के अन्त में आ प्रत्यय (टाप्डाप् और चाप्) लगाने पर वह शब्द स्त्रीलिंग हो जाता है। कुछ शब्द केवल स्त्रीलिंगवाची ही होते हैं
जैसे- कथाउषाछायाआज्ञाआत्मजाइच्छाजिज्ञासाचिन्ताउमाउपमाजिह्वानिन्दा,भाषा आदि । एकोनविंशतिः 19 से लेकर नव नवतिः तक के सभी संख्यावाची शब्द स्त्रीलिंग होते हैं। संस्कृत में सर्वनाम शब्द भी होते है। इसका भी स्त्रीलिंग होता है।
स्वर तथा व्यंजन वर्णान्त पुल्लिंगस्त्रीलिंग तथा नपुंसक शब्दों को विस्तार पूर्वक जानने तथा समझने के लिए लघुसिद्धान्तकौमुदी (अजन्तपुल्लिंगतः अजन्तनपुंसकलिंगपर्यन्तम्) पर क्लिक करें। यहाँ शब्द रूपों के  निर्माण के नियम बताये गये हैं तथा उपयोगी लिंक भी दिये गये हैं ।
इकारान्त स्त्रीलिंग शब्द
बुद्धिगतिशुद्धि ,भक्ति, रुचिशक्तिश्रुतिरुचिस्मृतिशान्तिनीतिरात्रिजातिमति
ईकारान्त स्त्रीलिंग शब्द
 गौरीजानकीपृथ्वीकौमुदीसावित्रीगायत्रीनलिनीलक्ष्मीश्रीस्त्रीनदी
उकारान्त स्त्रीलिंग शब्द 
तनु, (शरीर) रेनु, (धूल) हनु (ठुड्डी)
ऊकारान्त स्त्रीलिंग शब्द
चमू, (सेना)  रज्जूकर्कन्धू (बेर)
ऊकारान्त स्त्रीलिंग शब्द
मातृयातृ (देवरानी) दुहुतृ (लड़की)
अकारान्त नपुंसकलिंग शब्द
मित्रवनअरण्यमुखकमलकुसुमपुष्पनक्षत्रपत्रजलगगनशरीरपुस्तकज्ञान
इकारान्त नपुंसकलिंग शब्द
अस्थिअक्षि, (आँख) दधि
उकारान्त नपुंसकलिंग शब्द
दारुजानु, (घुटना) तालुमधु
ऋकारान्त नपुंसकलिंग शब्द
कर्तृनेतृधातृ

हिन्दी में हम तद्भव तथा उर्दू शब्दों के प्रयोग कर लेते हैं। जिस दिन संस्कृत के तत्सम शब्द से हम परिचित होते जायेंगेंसंस्कृत सीखना आसान होता जाएगा। इसी प्रकार आप क्रमशः पुल्लिंगवाची,स्त्रीलिंगवाची,नपुंसक लिंगवाची हलन्त शब्द तथा तीनों लिंगों के स्वरान्त शब्दों को खोजें। यहां पर शब्दरूप देना संभव नहीं है। इसके लिए संस्कृत अभ्यास पर चटका लगाकर एक अन्य कड़ी पर जायें । इस लिंक पर सुबन्त के शब्दरूप एवं तिङन्त के धातुरूप दिये हैं। विस्तार के भय तथा अनावश्यक श्रम से बचने के लिए सर्वनाम शब्दों के रूप तथा प्रयोग यहाँ नहीं दिये जा रहे हैं। इस ब्लॉग पर आये लोगों को चाहिए कि वे संस्कृत अभ्यास पर क्लिक करके सभी प्रकार का रूपों तथा प्रत्ययों का अभ्यास करें। 
इस प्रकार आपके पास संस्कृत का बृहद् शब्दकोश जमा हो जाएगा। प्रत्ययों के प्रयोग से शब्दों के लिंग का निर्धारण होता है। संस्कृत में शब्दों के लिंग को जानने के लिए प्रत्यय के बारे में जानना सहायक होता है,जिसे हम आगे के पाठ में पढ़ेंगें। अभी तक हम वचन, प्रथम पुरूष, मध्यम पुरूष, उत्तम पुरूष तथा इसके लिए प्रयोग की जानी वाली क्रिया के बारे में जान चुके हैं। अलग- अलग शब्दों के लिंग के बारे में भी जान लिया। उसके शब्द रूपों को देखकर वर्तमान काल की क्रिया के साथ वाक्य बनाईये।

                                                      पाठ- 4
काल ( समय )
 जब हम किसी कार्य के होने या करने के बारे में बोलते हैं तो वह किसी न किसी समय से बंधा होता है।अतः किसी क्रिया को जिस समय में किया जाता है उसे काल कहते हैं। समय को हम मुख्यतः तीन भागों में बांटते हैं। 1. वर्तमान काल (जिस समय कार्य होते रहता है) 2. भूत काल (जब कोई काम हो चुका होता है) 3. भविष्यत् काल (जब कोई काम होने वाला हो)। यहाँ हम उसे मोटे अक्षर द्वारा प्रदर्शित करते हैं। लोट् और विधि लिंग लकार का प्रयोग विधान करने, आज्ञा देने आदि अर्थों में होता है। 
सबसे पहले हम लोट् लकार का प्रयोग करेंगें, पुनः  इस पाठ में हम तीन काल, तीन वचन, तीन पुरूष तथा तीन लिंग का एक- एक वाक्य बनाना सीखेंगें। लोट् तथा विधि लिङ् का भी वाक्य बनायेंगें। वर्तमान काल के लिए प्रयुक्त लट् लकार का रूप ऊपर के पाठ में आप पढ़ चुके हैं। बोलचाल में लोट् लकार का अधिक प्रयोग होते देखा जाता है, जबकि किसी घटनाक्रम के वर्णन में भूतकाल का प्रयोग होता है। इस पाठ के बाद मैं यहाँ संस्कृत के 10 लकारों के बारे में भी जानकारी दूँगा। संस्कृत के सामान्य अध्येता के लिए 5 लकार का ज्ञान पर्याप्त है। संस्कृत में काल के लिए लकार शब्द का भी प्रयोग होता है। इनके भेद अधोलिखित हैं। 
लट्-             वर्तमान काल
लङ्-             अद्यतन भूत
विधि लिङ्-    विधि, सम्भावना, इच्छा
लोट्-            आज्ञा देने
लृट्-             सामान्य भविष्य 
वद् धातु         लोट् लकार 


वदतु        वदताम्      वदन्तु
वद          वदतम्       वदत
वदानि     वदाव         वदाम
   
वद् धातु लृट् लकार-     सामान्य भविष्य                         
वदिष्यति           वदिष्यतः          वदिष्यन्ति                    
वदिष्यसि          वदिष्यथः          वदिष्यथ                       
वदिष्यामि         वदिष्यावः         वदिष्यामः 


वद् धातु लङ् लकार-  अद्यतन भूत

अवदत्       अवदताम्       अवदन्
अवदः        अवदतम्        अवदत

अवदम्       अवदाव         अवदाम 


वद् धातु विधि लिङ् लकार-    सम्भावना, इच्छा
वदेत्         वदेताम्       वदेयुः
वदेः          वदेतम्         वदेत

वदेयम्       वदेव          वदेम

लृङ्-            क्रियातिपत्ती (हेतु हेतु मद् भविष्य)
लिट्-           परोक्ष भूत
लुङ्-            सामान्य भूत
लुट्-            अनद्यतन भविष्य
आशीर्लिंङ् -   आशीर्वाद
 अभ्यास- इन पाँच लकारों का कर्ता के साथ वाक्य बनायें।
विशेष नियम- 
1.अभी तक हमने सामान्य नियम पढ़ा है कि जब किसी क्रिया का एक कर्ता हो तो क्रिया भी एकवचन का होती है तथा दो कर्ता होने पर क्रिया द्विवचन। दो कर्ताओं के बीच और शब्द के लिए च शब्द लिखते हैं। लेकिन जब एक वाक्य में संज्ञाओं को अलग-अलग समझी जाती है या सभी मिलकर एक विचार का रूप लेती है तब अनेक संज्ञा के लिए भी एकवचन क्रिया का ही प्रयोग किया जाता है। जैसे- पटुत्वं सत्यवादित्वं कथायोगेन बुध्यते।
2. अथवा के साथ जुड़े क्रियापदों के साथ एकवतन की क्रिया होती है। जैसे- सुरेशः महेशः राधा वा गच्छतु।
3. जब कर्ता भिन्न वचनों के होते हैं, तब  कर्ता के निकटतम  वचन के अनुसार क्रिया होती है। जैसे- त्वं वा अयं वा पुस्तकं गृह्णातु।
4. जब दो या दो से अधिक विभिन्न पुरूषों वाले कर्ता शब्द और द्वारा संयुक्त होते हैं तब इस प्रकार की क्रिया होगी-
    (क) उत्तम, मध्यम तथा प्रथम पुरूष के योग में उत्तम पुरूष की क्रिया।
    (ख)  मध्यम तथा प्रथम पुरूष के योग में मध्यम पुरूष की क्रिया।
    (ग) जब विभिन्न पुरूषों के दो या दो से अधिक कर्ता अथवा (वा) से जुड़े हों तो क्रिया का वचन तथा पुरूष निकटतम कर्ता के अनुसार होती है।
क्रियाओं के भेद
संस्कृत में तीन प्रकार के क्रियाओं के पद (शब्द) होते है। 1.परस्मैपद 2.आत्मनेपद और 3.उभयपद ।  इसमें कुछ धातु सकर्मक तथा कुछ धातु अकर्मक होता है। यह सकर्मकअकर्मक भी किर्या के दो भेद माने जाते हैं। धातुओं के बारे में संस्कृत शिक्षण पाठशाला 2 में विस्तार से चर्चा की गयी है । इसे 10 गणों में विभाजित किया गया है। संस्कृत सीखने के लिए शब्दों के रूपधातुओं के रूपसंख्यावाची शब्दसर्वनामउपसर्ग तथा अव्यय को जानना चाहिए। अबतक के पाठ का सारांश के अनुसार अधोलिखित तालिका को देखें।
विशेष-
लकारों की संख्या  दस है-लट् , लिट् , लुट् , लृट् , लेट् , लोट् , लङ् , लिङ् , लुङ् , लृङ् ।
लकारों के नाम याद रखने के लिए-
ल्  में क्रमशः अ इ उ ऋ ए ओ जोड़कर अंत में  ट् जोड़ दें । ये 6 टित् लकार हो जायेंगें।
इसी प्रकार ल्  में क्रमशः अ इ उ ऋ  जोड़कर अंत में  ङ् जोड़ने से 4 ङित् लकार हो जायेंगें।
इस प्रकार क्रमशः लट् लिट् लुट् लृट् लेट् लोट् लङ् लिङ् लुङ् लृङ् ॥
लिङ् लकार के दो भेद होते हैं :- आशीर्लिङ् और विधिलिङ् ।
धातु के साथ किस समय को कहने के लिए किस लकार को जोड़ा जाता है, इसके लिए निम्नलिखित श्लोक स्मरण कर लीजिए-
लट् वर्तमाने लेट् वेदे भूते लुङ् लङ् लिटस्तथा ।
विध्याशिषोर्लिङ्लोटौ च लुट् लृट् लृङ् च भविष्यति ॥
अर्थ-
लट् लकार-        वर्तमान काल में।
लेट् लकार-        केवल वेद में।
भूतकाल में -       लुङ् लङ् और लिट्।
विधि, निमंत्रण आदि में- लिङ् लकार।
आशीर्वाद में-      लिङ् और लोट् लकार।
भविष्यत् काल में लुट् लृट् एवं लृङ्
इस प्रकार विभिन्न प्रयोजनों तथा क्रियाओं में लकारों का प्रयोग किया जाता है।
वास्तव में ये दस प्रत्यय हैं, जो धातुओं से होते हैं। इन दसों प्रत्ययों के प्रारम्भ में " ल " है
(१) लट् लकार ( वर्तमान काल ) यथा- बालकः खेलति । बालक खेलता है।
(२) लिट् लकार ( अनद्यतन परोक्ष भूतकाल ) जो अपने साथ न घटित होकर किसी इतिहास का विषय हो ।
यथा- रामः रावणं ममार । राम ने रावण को मारा ।
(३) लुट् लकार ( अनद्यतन भविष्यत् काल ) जो आज का दिन छोड़ कर आगे होने वाला हो ।
यथा-- सः परश्वः विद्यालयं गन्ता । वह परसों विद्यालय जायेगा ।
(४) लृट् लकार ( सामान्य भविष्य काल ) जो आने वाले किसी भी समय में होने वाला हो ।
यथा- रामः इदं कार्यं करिष्यति ।  राम यह कार्य करेगा।
(५) लेट् लकार ( यह लकार केवल वेद में प्रयोग होता है, यह किसी काल में बंधा नहीं है।
(६) लोट् लकार ( ये लकार आज्ञा, अनुमति लेना, प्रशंसा करना, प्रार्थना आदि में प्रयोग होता है । यथा-  भवान् गच्छतु । आप जाइए । सः क्रीडतु । वह खेले ।  किमहं वदानि ।  क्या मैं बोलूँ ?
(७) लङ् लकार ( अनद्यतन भूत काल ) आज का दिन छोड़ कर किसी अन्य दिन जो हुआ हो ।
यथा- भवान् तस्मिन् दिने भोजनमपचत् ।  आपने उस दिन भोजन पकाया था।
(८) लिङ् लकार = इसमें दो प्रकार के लकार होते हैं :-- (क) आशीर्लिङ् ( किसी को आशीर्वाद देना हो ।
यथा-  भवान् जीव्यात् । आप जीओ । त्वं सुखी भूयात् ।  तुम सुखी रहो।
(ख) विधिलिङ् ( किसी को विधि बतानी हो ।
यथा-  भवान् पठेत् । आपको पढ़ना चाहिए। अहं गच्छेयम् । मुझे जाना चाहिए।
(९) लुङ् लकार ( सामान्य भूत काल ) जो कभी भी बीत चुका हो । यथा- अहं भोजनम् अभक्षत् । मैंने खाना खाया।
(१०) लृङ् लकार ( ऐसा भूत काल जिसका प्रभाव वर्तमान तक हो) जब किसी क्रिया की असिद्धि हो गई हो ।

यथा- यदि त्वम् अपठिष्यत् तर्हि विद्वान् भवितुम् अर्हिष्यत् । यदि तू पढ़ता तो विद्वान् बनता।
विभिन्न कालवाचक क्रिया के काल, पुरूष, वचन आदि परिवर्तन अभ्यास के लिए क्रियापद पर चटका लगाकर एक दूसरे लिंक पर जायें।
                                                        पाठ- 5
अब तक के अध्यायों में हम संस्कृत भाषा के वर्ण तथा शब्द के स्वरूप से भली भाँति परिचित हो गये। इसके बाद के अध्यायों में हम अधोलिखित वाक्य पर विचार  करेंगें।
1. वाक्यों में क्रिया का कारक के साथ सम्बन्ध/ समन्वय के लिए कारक विभक्ति तथा उपपद विभक्ति।
2. विशेष्य और विशेषण पर विचार
3. सम्बन्धी और सम्बन्धवाची शब्दों पर विचार (षष्ठी विभक्ति) 
4. अव्यय पर विचार
अतः वाक्य विचार में पहले कारक (विभक्ति) की चर्चा करेंगें। उपपद विभक्ति कारक विभक्ति से अलग होती है। जब कोई अव्यय पद का योग संज्ञा पद के साथ होता है तब उसे उपपद विभक्ति कहते है। इसके अनन्तर विशेष्य और विशेषण पर विचार तथा उसके बाद सम्बन्धी और सम्बन्धवाची शब्दों पर विचार करेंगें। विशेष्य और विशेषण लिए एक श्लोक है। यही नियम सम्बन्धी और सम्बन्धवाची शब्दों पर भी लागू होता है।
           यल्लिंगं यद्वचनं या च विभक्तिर्विशेषस्य ।

           तल्लिंगं तद्वचनं सैव विभक्तिर्विशेषणस्यापि ॥

 पाठ- 6

कारक (विभक्ति)
अबतक हम संस्कृत के वर्णों तथा शब्दों के सभी स्वरूप से परिचित हो चुके हैं। हम उन शब्दों/ पदों के लिंग, अकारान्त, इकारान्त आदि स्वर और क्, ह् आदि व्यंजनान्त शब्दों के सभी लिंगों एवं विभक्तियों से परिचय पा चुके हैं। इस अध्याय में हम उन पदों से वाक्य बनाने पर विचार करेंगें। संस्कृत भाषा में वाक्य बनाना सीखेंगें। क्रिया के निष्पादन (जनकत्व) में कारण होने से सुबन्त पदों को कारक कहा जाता है। अथवा क्रिया की पूर्ति में जो सहायक होता हैउसे कारक कहते हैं। अथवा क्रिया के साथ जिसका सीधा सम्बन्ध होता है, उसे कारक कहते हैं। जैसे- बालकः पठति। इसमें पठति क्रिया में सहायक/ करने वाला राम हैइसीलिए राम कर्ता है।  संस्कृत में 6 कारक माने गए हैं।
कर्ता कर्म च करणं सम्‍प्रदानं तथैव च ।

अपादानाधिकरणमित्‍याहु: कारकाणि षट् ।। 
1.कर्ता 2.कर्म 3.करण 4.संप्रदान 5.अपादान 6.अधिकरण
सम्बन्ध तथा सम्बोधन का क्रिया से सीधा सम्बन्ध नहीं होने से इसे कारक नहीं माना गया है। इसका शब्द रूप बनता है। प्रत्येक कारक के लिए विभक्ति नियत है। हम वाक्यों के प्रयोग में उस कारक के स्थान पर विभक्तियों का प्रयोग करते हैं। जैसे कर्ता कारक के लिए प्रथमा विभक्ति। आप इस विधि को अपनाकर कारकों की पहचान कर सकते हैं । क्रिया से किसका सीधा सम्बन्ध है, इसे जांचने के लिए एक एक कर क्रमशः वाक्य लें। जैसे-
       वाक्य                                          प्रश्न                 उत्तर
1. रमेशः पुस्तकं पठति।                       कः पठति।             रमेशः
2. मृगः तृणं अत्ति।                               कं अत्ति।              तृणम्
2. बालकः लेखिन्या पत्रं लिखति।         केन लिखति            लेखिन्या       
3. पिता पुत्राय धनं ददाति।                कस्मै ददाति             पुत्राय
 इस प्रकार  उपर्युक्त वाक्य में कःलगाकर प्रश्न करने से जो उत्तर आता है उसे कर्ता कारक कहते हैं। इसी प्रकार कस्मात्, कस्य, कस्मिन् आदि प्रश्न के द्वारा वाक्य में निहित कारक को समझा जा सकता है। आप इस तालिका को पूरा करें। आप प्रत्येक वचन, लिंग और विभक्ति वाला वाक्य का निर्माण करें। उसकी एक- एक तालिका बनाकर अभ्यास कर सकते हैं-
वाक्य        प्रश्न              कारक/विभक्ति                
           1. कर्ता कारक -    प्रथमा विभक्ति  
मूल शब्द के अर्थ बोध में, लिंग ज्ञान के लिए, मात्रा जानने तथा वचन के अर्थ में प्रथमा विभक्ति होती है। जब तक हम किसी मूल शब्द में विभक्ति नहीं लगाते हैं तब तक उसका अर्थ ज्ञान नहीं हो पाता है। संज्ञा, सर्वनाम, विशेषण तथा अव्यय शब्दों के अर्थ ज्ञान के लिए मूल शब्द में प्रथमा विभक्ति लगाते हैं। किस शब्द का किस लिंग में प्रयोग होता है,यह जानकारी प्रथमा विभक्ति द्वारी होती है, जैसे केवल एक लिंग मानवः, फलम्। अनेक लिंग की जानकारी के लिए- तटः तटी तटम्। मात्रा का उदाहरण- प्रस्थो ब्रीहिः- आधा सेर चावल। संख्या का उदाहरण- एकः द्वौ, बहवः ।
सम्बोधन में प्रथमा- सम्बोधन को कारक के अन्तर्गत नहीं मान जाता। इसके लिए प्रथमा विभक्ति का उपयोग किया जाता है। किसी किसी शब्द का सम्बोधन में आंशिक रूप परिवर्तन हो जाता है। अतः शब्दरूप में सम्बोधन का भी शब्दरूप लिखा जाता है।
संस्कृत में क्रिया अथवा व्यापार को ही मुख्य माना जाता है। इस भाषा में क्रिया के आधार पर ही कारक निश्चित होते हैं। क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्। इस नियम के कारण पचति, खेलति, पठति आदि में काल, पुरूष तथा वचन निश्चित हैं, अतः उसी के अनुसार कारक का प्रयोग होता है। कर्तृवाच्य में क्रिया का सम्बन्ध कर्ता के साथ होता है अतः कर्ता में प्रथमा विभक्ति होती है, जबकि कर्म वाच्य में क्रिया के साथ कर्म का सम्बन्ध होता है अतः वहाँ पर कर्ता में प्रथमा विभक्ति नहीं होती। यही स्थिति भाववाच्य की भी है। वाच्य के बारे में एक अलग अध्याय में पृथक् से चर्चा की जाएगी। 

2. कर्म कारक -  द्वितीया  विभक्ति    

क्रिया के द्वारा कर्ता का जो सबसे अधिक इच्छित होता है उसमें द्वितीया विभक्ति होती है। (सामान्य नियम) जैसे- राम सीता को बुलाता है। रामः सीतां आह्वयति। यहाँ क्रिया के द्वारा कर्ता राम को इच्छित है सीता को बुलाना। अतः सीता में द्वितीया विभक्ति होगी। सबसे इच्छित में द्वितीया विभक्ति का दूसरा उदाहरण- राम दूध से साथ भात खाता है। इसमें राम दूध तथा भात दोनों खा रहा है, परन्तु इन दोनों में से इच्छित है भात (ओदन) खाना। अतः इसमें द्वितीया विभक्ति होकर रामः पयसा ओदनं खादति बनेगा। 
सामान्य नियम के अनुसार हिन्दी में "को" जिस शब्द के अंत में हो उसमें  द्वितीया विभक्ति लगाना चाहिए।
उपसर्ग के साथ क्रिया का योग होने पर नियम में परिवर्तन हो जाता हैं-
शीङ् (शयन करना), स्था (बैठना) आस् (रहना) इन तीन धातुओं के पूर्व यदि अधि उपसर्ग लगा हो तो इन क्रियाओं का आधार कर्म कारक होता है। जैसे- कुर्सी पर बैठता है = आसन्दं अधितिष्ठति। यहाँ कुर्सी आधार है।
 अव्यय के साथ क्रिया का योग होने पर नियम में परिवर्तन हो जाता हैं-
उभयतः (दोनों ओर), सर्वतः (सभी ओर), धिक्(धिक्कार), उपर्युपरि (ठीक ऊपर), अधोधः (ठीक नीचे) तथा अध्यधि (ठीक ऊपर) शब्दों का जिससे संयोग हो उसमें द्वितीया विभक्ति होती है।
उभयतः विद्यालयं बालकाः आदि
अभितः (चारों ओर या सब ओर), परितः (सब ओर), समया (समीप), निकषा (समीप), हा (हाय), प्रति (ओर) शब्द के योग में भी द्वितीया विभक्ति होती है।
अन्तरा ( बीच में) तथा अन्तरेण (विषय में, बिना, छोड़कर) के योग में द्वितीया विभक्ति होती है।

  अभ्यासः
अधोलिखित पदों के अनुसार वाक्य बनायें। 
पुल्लिङ्गम्       एकवचनम्      द्विवचनम्       बहुवचनम्
पाठः           सः पाठं पठति ।  सः पाठौ पठति । सः पाठान् पठति ।
श्लोकः                ----------- ------  -----------
मन्त्रः                 ----------- ------  -----------
प्रश्नः                  ----------- ------  -----------
ग्रन्थः                 ----------- ------  -----------
विषयः              ----------- ------  -----------
अध्यायः              ----------- ------  -----------
देवालयः        माता--------------गच्छति ।   माता देवालयं गच्छति ।  
ग्रामः                 ----------- ------  -----------
आपणः              ----------- ------  -----------
विदेशः              ----------- ------  -----------
प्रकोष्ठः              ----------- ------  -----------
विद्यालयः          ----------- ------  -----------
वित्तकोषः          ----------- ------  -----------
चिकित्सालयः     ----------- ------  -----------
महाविद्यालयः    ----------- ------  -----------
कार्यालयः          ----------- ------  -----------
                          स्त्रीलिङ्गम्      
एकवचनम्               द्विवचनम्       बहुवचनम्
पत्रिका            
छात्रः पत्रिकां पठति । छात्रः पत्रिके पठति । छात्रः पत्रिकाः पठति ।
वार्ता                 ----------- ------  ----------- ----------
कथा                  ----------- ------  ----------- ----------
गीता                 ----------- ------  ----------- ----------
कविता              ----------- ------  ----------- ----------
संहिता               ----------- ------  ----------- ----------
सूचना               ----------- ------  ----------- ----------
हास्यकणिका      ----------- ------  ----------- ----------
स्त्रीलिङ्गम्           एकवचनम्                  द्विवचनम्                       बहुवचनम्
अङ्कनी              छात्रा अङ्कनीं क्रीणाति ।  छात्रा अङ्कन्यौ क्रीणाति । छात्रा अङ्कनीः क्रीणाति ।
कूपी                  ----------- ------  -----------
घटी                  ----------- ------  -----------
लेखनी               ----------- ------  -----------
कर्तरी                ----------- ------  -----------
मार्जनी              ----------- ------  -----------
वेल्लनी              ----------- ------  -----------
दूरवाणी            ----------- ------  -----------
वर्णलेखनी          ----------- ------  -----------      
पुनःपूरणी          ----------- ------  -----------
नदी              बाला----------------तरति ।         
स्त्रीलिङ्गम्                 एकवचनम्                               
अष्टाध्यायी        छात्रा अष्टाध्यायीं पठति ।                        
सप्तदशी             -----------------   पुरी                              
सप्तशती             ----------- ------  नगरी                           
कादम्बरी           ----------- ------ देहली                           
अभ्यासदर्शिनी    ----------- ------ राजधानी                      
सिद्धान्तकौमुदी   ----------- ------ उज्जयिनी                      
कौशलबोधिनी    ----------- ------- वाराणसी                      
नपुंसकलिङ्गम्          तीनों वचनों में वाक्य बनायें                  
पुस्तकम्                   पिता पुस्तकं क्रीणाति ।                 
शास्त्रम्              सा---------------जानाति ।           
फलम्                ----------- ------  -----------
पर्णम्                 ----------- ------  -----------
पुष्पम्                ----------- ------  -----------
चित्रम्               ----------- ------  -----------
गृहम्                 ----------- ------  -----------
गीतम्                ----------- ------  -----------
काव्यम्              ----------- ------  -----------
राज्यम्              ----------- ------  -----------
मन्दिरम्            ----------- ------  -----------
नाटकम्             ----------- ------  -----------
फेनकम्              ----------- ------  -----------
कङ्कतम्           ----------- ------  -----------
करयानम्           ----------- ------  -----------
करवस्त्रम्           ----------- ------  -----------
कोष्ठक में दिये शब्द को द्वितीया विभक्ति  बनाकर रिक्त स्थान पूरा करें -
सेवकः ------------------ (आसन्दः) आनयति ।                     
मित्रं ------------------  (सन्देशः) प्रेषयति ।             
शोधार्थी ------------------  (लेखः) लिखति ।                       
अतिथिः ----------------- (पुष्पगुच्छः) स्वीकरोति ।             
वटुकः ------------------- (मन्त्रः) वदति ।                           
छात्रः ------------------ (सूचना) विस्मरति ।                       
निरीक्षकः ------------------ (कक्ष्या) आगच्छति ।                
गृहिणी ------------------  (कपाटिका) क्रीणाति ।                 
प्रमुखः------------------ (संस्था) सञ्चालयति ।                     
माता------------------ (पाकशाला) प्रविशति ।                    
सेविका------------------ (योजिनी) आनयति ।                    
शिशुः------------------- (अङ्गुली) स्पृशति ।                       
अधिकारी------------------ (दैनन्दिनी) उद्घाटयति । 
अग्रजः ------------------ (दूरवाणी) करोति ।                      
भ्राता ------------------ (घटी) क्रीणाति ।                            
विजेता ------------------ (पदकम्) धरति ।                     
अभिनेता------------------ (नाटकं) करोति ।            
भक्तः------------------ (पुष्पं) चिनोति ।                              
चित्रकारः ------------------  (चित्रं) रचयति ।                     
पण्डितः------------------- (शास्त्रं) जानाति ।                       
वैदेशिकः------------------  (देहली) आगच्छति ।                 
विदूषकः------------------ (हास्यकणिका) वदति ।               
ग्राहकः ------------------ (पत्रिका) क्रीणाति ।                     
पितामही ------------------ (कथा) श्रावयति ।                     
सा ------------------ (द्विचक्रिका) चालयति ।                      
नटी------------------ (शाटिका) धरति ।                             
विद्यार्थी------------------ (संहिता) पठति ।             
भवती ------------------ (शृङ्खला) आनयति ।                    
बालिका ------------------ (पाञ्चालिका) आनयति ।            
लुण्ठाकः ------------------ (छुरिका) प्रदर्शयति ।                   

3. करण कारक -  तृतीया विभक्ति     

कर्ता जिसकी सबसे अधिक सहायता से कार्य करता है उसे करण कहते हैं। जैसे- मोहनः लेखन्या लिखति। यहाँ पर मोहन लिखने में लिखने में लेखनी की सहायता से लिखता है,अतः लेखनी करण है। इसमें तृतीया विभक्ति होगी। तृतीया विभक्ति दो स्थानों पर होती हैं। 1. जहाँ कर्ता अनुक्त (अप्रधान) हो उस कर्ता में तथा 2. जिसकी करण कारक में । 
वाच्य परिवर्तन के अध्याय में उक्त तथा अनुक्त कर्ता के बारे में विशेष चर्चा होगी। यहाँ   उक्त तथा अनुक्त कर्ता के कतिपय उदाहरण दिया जा रहा है।
जिस क्रिया में कर्ता की प्रधानता होती है वहाँ कर्ता उक्त होता है तथा जिस क्रिया में कर्ता गौण होता है उसे अनुक्त कर्ता कहते हैं।

रामः रावणं अहनत् -    इस वाक्य में कर्ता उक्त (प्रधान ) है, अतः कर्ता में प्रथमा विभक्ति हुई।

रामेण रावणः अहन्यत - इस वाक्य में कर्ता अनुक्त (अप्रधान ) है, अतः कर्ता में तृतीया विभक्ति हुई।

रामेण रावणः हतः - इस वाक्य में कर्ता अनुक्त (अप्रधान ) है, अतः कर्ता में तृतीया विभक्ति हुई।

करण में तृतीया विभक्ति का उदाहरण-

बालकः चषकेण जलं पिवति।

विशेष नियम

कतिपय धातुओं के साथ साधकतम कारक (सबसे अधिक सहायक कारक) का योग होने पर में तृतीया विभक्ति के नियमों में परिवर्तन हो जाता है। कहीं पर कुछ विशेष शब्दों या अर्थों के कारण भी तृतीया विभक्ति होती है। जैसे-

1. दिवः कर्म च

दिव् (जुआ खेलना) धातु के साधकतम करण की विकल्प से कर्म और करण संज्ञा होती है। उदाहरण-

कृषकः अक्षैः दीव्यति। इसमें तृतीया विभक्ति हुई।

कृषकः अक्षान् दीव्यति। इसमें द्वितीया विभक्ति हुई।
सहयुक्तेऽप्रधाने
सह के योग में अप्रधान (प्रधान के सहायक) को तृतीया होती है। जैसे- अध्यापकेन सह शिष्यः आगतः। इसी प्रकार साकं समं और सार्धं के योग में भी तृतीया विभक्ति होती है।
पृथग्विनानानाभिस् तृतीया ऽन्यतरस्याम्
पृथक् , विना, नाना के योग में विकल्प से तृतीया होती है। वैकल्पिक पक्ष में द्वितीया अथवा पंचमी विभक्ति होगी। अहं दशदिनानि यावत् शुभ्रां शुभ्रेण शुभ्रात् पृथक् न निवसामि। इसी प्रकार विना, नाना के योग में तीनों विभक्तियाँ होगी।
येनाङ्गविकारः
जिस अंग विशेष में विकार हो उसमें तृतीया विभक्ति होती है। जैसे- मम नेता कर्णेन बधिरः अस्ति।
इत्थंभूतलक्ष्णे
जब कोई विशेष चिह्न से या जिस कारण से जाना जाय उसमें तृतीया विभक्ति होती है। जैसे- मम परिवेशी चतुःचक्रिकया धनिकः प्रतीयते।
हेतोः

जिस कारण से कोई कार्य होता है या किया जाता है, उसमें तृतीया विभक्ति होती है। जैसे- अध्ययनेन धनं मिलति। धनं परिश्रमेण मिलति। इसमें अध्ययन तथा परिश्रम कारण (हेतु)  है।
नोट-   अध्ययनार्थियों को इसके अतिरिक्त अन्य नियमों की भी जानकारी करनी चाहिए। 

4. सम्प्रदान कारक - चतुर्थी विभक्ति


जिसे संप्रदान संज्ञा होती होती उसे चतुर्थी विभक्ति होती है। इस पाठ में हम देखेंगें कि किसे-किसे सम्प्रदान सेज्ञा होती है। इसमें कुछ सामान्य नियम है और कुछ विशेष नियम।

सामान्य नियम-

1.कर्मणा यमभिप्रैति स सम्‍प्रदानम् ।

दान क्रिया के कर्म के द्वारा कर्ता जिसे सन्तुष्ट करना चाहता है, वह सम्प्रदान कहलाता है।

2.क्रियया यमभिप्रैति सोऽपि सम्पादानम्।

किसी विशेष क्रिया के द्वारा जो इच्छित व्यक्ति या वस्तु हो उसकी भी सम्प्रदान संज्ञा हो।

चतुर्थीं सम्प्रदाने

सम्प्रदान में चतुर्थी विभक्ति होती है।

उदाहरण- बालकाय पुस्तकं ददाति। बालक के लिए पुस्तक देता है। इस वाक्य में देना दान कर्म है। इस कर्म के द्वारा कर्ता बालक को सन्तुष्ट करना चाहता है अतः कर्मणा यमभिप्रैति सूत्र के नियम के अनुसार बालक की सम्प्रदान संज्ञा हुई। चतुर्थीं सम्प्रदाने से सम्प्रदान संज्ञक बालक में चतुर्थी विभक्ति होकर बालकाय हुआ।

क्रिया के द्वारा अभिप्रेत का उदाहरण- श्रमिकः रोटिकाय नगरे वसति। रोटी के लिए नगर में निवास करता है। इसमें निवास करना क्रिया विशेष है। इस निवास करने का विशेष प्रयोजन है- रोटी। यदि कहीं और रोटी मिल जाय तो वह नगर में निवास नहीं करेगा। अतः क्रिया विशेष के द्वारा इच्छित रोटिका में चतुर्थीं विभक्ति होकर श्रमिकः रोटिकाय नगरे वसति प्रयोग होगा। इसी प्रकार छात्रः शिक्षायै विद्यालयं गच्छति आदि प्रयोग होंगें।

विशेष नियम
(1) रुच्यर्थानां प्रीयमाणः
रुच् धातु और उसके अर्थ वाली अन्य धातुओं के योग में प्रसन्न होने वाला सम्प्रदान कहलाता है ।
उदाहरण-  मल्लाय घृतं रोचते। पहलवान को घी अच्छा लगता है। इस वाक्य में प्रसन्न होने (रुचने) वाला मल्ल है। इसकी सम्प्रदान संज्ञा होकर चतुर्थी विभक्ति हुई। अन्य उदाहरण देखें-
 धनिकेभ्यः रजतं रोचते। धनिकों को चांदी अच्छी लगती है।
विडालेभ्यः मूषकं रोचते। बिल्लियों को चूहा अच्छा लगता है।
मह्यं भक्तिः न रोचते। मुझे भक्ति अच्छी नहीं लगती है।
 (2) नमः स्वस्तिस्वाहास्वधालंवषड्योगाच्च  
नमः, स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा, स्वधा (कल्याण), अलम् (समर्थ), वषट् (स्वाहा) शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है।
भवते नमः- आपको नमस्कार है।
तुभ्यं स्वस्ति- आपका कल्याण हो।
रामाय स्वाहा- राम को यह अर्पण है।

ध्यातव्य बातें- उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिर्बलीयसी नियम के अनुसार पद को लेकर दो विभक्ति होती है उससे क्रिया के सम्बन्ध के कारण होने वाली विभक्ति बलवान होती है। अतः मुनित्रयं नमस्कृत्य जैसे स्थान पर नमः के साथ करोति आदि क्रिया पद के योग होने से पद को केन्द्र में रखकर होने वाली चतुर्थी विभक्ति नहीं होती। यहाँ द्वितीया विभक्ति हो जाती है।
(3) क्रुधद्रुहेर्ष्यासूयार्थानां यं प्रति कोपः
क्रुध= क्रोध करना, द्रुह = द्रोह करना,ईर्ष्या = ईर्ष्या करना, असूया = दूसरे के गुण में दोष निकालना, जलन करना इन धातुओं तथा इन धातुओं के समान अर्थ रखने वाले धातुओं के योग में जिसके ऊपर क्रोध किया जाता है, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है।
उदाहरण-
माता पुत्राय क्रुध्यति।  इस वाक्य में माता पुत्र के ऊपक क्रोध करती है,अतः पुत्र की सम्प्रदान संज्ञा एवं चतुर्थी सम्प्रदाने से चतुर्थी विभक्ति होती है। इसी प्रकार नेता जनताभ्यः द्रुह्यति। कर्मचारिणः मह्यं ईर्ष्यति। चौराः रक्षकाय असूयति। 

परन्तु जब क्रुध और द्रुह धातु उपसर्ग के साथ होता है तब जिसके प्रति क्रोध या द्रोह किया जाता है, उसकी कर्म संज्ञा होती है। जैसे- अध्यापकः शिष्यं अभिक्रुध्यति। यहाँ क्रुध के साथ अभि उपसर्ग लगे होने के कारण शिष्य में चतुर्थी विभक्ति नहीं होकर द्वितीया विभक्ति हुई।
(4)तादर्थ्ये चतुर्थी वाच्या (वार्तिक)
जिस प्रयोजन के लिए कोई कोई कार्य किया जाता है, उसमें चतुर्थी विभक्ति होती है।

शिशुः पठनाय गच्छति । छात्रः छात्रवृत्तये यतति। इन वाक्यों में शिशु और छात्र का जो प्रयोजन है पढ़ना, छात्रवृत्ति पाना। अतः इसमें  चतुर्थी विभक्ति हुई।
अन्य नियमों की जानकारी के लिए व्याकरण की मूल पुस्तक अष्टाध्यायी या सिद्धान्तकौमुदी का अध्ययन करें।

5. अपादान कारक - पञ्चमी विभक्ति

सामान्य नियम
९०३ अपादाने पञ्चमी
ग्रामादायाति । धावतोऽश्वात्‍पततीत्‍यादि ।।

अपादान में पञ्चमी होती है।
(मुरारिः) ग्रामाद् आयाति।  यहाँ मुरारिः कर्ता तथा आयाति क्रिया है । मुरारि का गाँव से अलगाव हो रहा है गाँव से अलगाव होने के कारण गाँव ध्रुव हैअतः ग्राम की ध्रुवमपायेऽपादानम् से अपादानसंज्ञा और अपादाने पञ्चमी से उसमें पञ्चमी विभक्ति हुई- ग्रामादायाति। ग्रामाद् आयाति = गांव से आता है।
(अश्वारोही) धावतोऽश्वात् पतति। इस वाक्य में दौड़ता हुआ घोड़ा ध्रुव है अर्थात् दौड़ते  हुए घोड़े से अलगाव हो रहा हैअतः अश्व की अपादानसंज्ञा और पञ्चमी विभक्ति होकर अश्वात् हुआ। धावत् यह शतृ प्रत्ययान्त शब्द अश्वात् का विशेषण है अतः धावत् में भी पञ्चमी है। (अश्वारोही) धावतोऽश्वात् पतति = घुड़सवार दौड़ते हुए घोड़े से गिरता है।
अपाय, विश्लेष, विलगाव, पृथक् होना, अलग होना समानार्थी हैं। जिस किसी सुनिश्चित व्यक्ति या स्थान से अलग हुआ जाता है, वह अपादान कहलाता है। जैसे- साइकिल से गिरता है। इसमें साइकिल अपादान है। जो अपादान होता है, उसमें पञ्चमी विभक्ति होती है। द्विचक्रिकात् पतति।

विशेष नियम

भीत्रार्थानां भयहेतुः

भयार्थक (जिससे डर मालूम हो) और त्राणार्थक (जिससे भय के कारण रक्षा करनी हो), उस कारक की अपादान संज्ञा होती है।

उदाहरण- बिडालात् विभेति। इसमें बिडाल से डरता है। 
आख्यतोपयोगे
जिनसे नियम पूर्वक विद्या ली जाती है, वह अपादान होता है।
जैसे-  विद्यालये गुरोः अधीते। 

6. अधिकरण कारक - सप्तमी विभक्ति

सामान्य नियम
आधारोऽधिकरणम् । सप्तम्याधिकरणे च
क्रिया के आधार को अधिकरण कहते हैं। अधिकरण में सप्तमी विभक्ति होती है। आधार तीन प्रकार के होते हैं।
1.    जिसके साथ आधेय का भौतिक सम्बन्ध बना हुआ हो, औपश्लेषिक आधार कहा जाता है।
2.   जिसके साथ आधेय का बौद्धिक सम्बन्ध बना हुआ हो, वैषयिक आधार कहा जाता है।
3.    जिसके साथ आधेय का व्याप्य- व्यापकभाव सम्बन्ध बना हुआ हो, अभिव्यापक आधार कहा जाता है।
उदाहरण-  वानरः वृक्षे निवसति। औपश्लेषिक आधार का उदाहरण है। मम अध्ययने रूचिः अस्ति। यहाँ वैषयिक आधार है। पुस्तके अक्षराणि सन्ति व्याप्य- व्यापकभाव रूपी आधार है।

षष्ठी विभक्ति- 

शेषे षष्ठी -  कारक के अतिरिक्त स्व स्वामी आदि संबंधों में षष्ठी विभक्ति होती है। 
क्रिया के साथ साक्षात् सम्बन्ध नहीं होने के कारण षष्ठी विभक्ति को कारक नहीं माना जाता है। संबंधों दो के बीच में होता है ।यह विभक्ति प्रायशः एक संज्ञा शब्द का दूसरे संज्ञा शब्द के साथ सम्बन्ध सूचित करता है।  यह संबंध अनेक प्रकार का होता है जैसे पिता पुत्र के बीच जन्य जनक भाव संबंध,  दो पदार्थों के बीच प्रकृति विकृति भाव संबंध,  कार्य कारण भाव संबंध,स्व स्वामी भाव संबंध आदि। 
यह षष्ठी विभक्ति जिसका संबंध होगा, उसमें होती है जैसे देवदत्तस्य पुत्रः यज्ञदत्तः अस्ति। इस वाक्य में देवदत्त का सम्बन्ध यज्ञदत्त से है अतः देवदत्त में षष्ठी विभक्ति हुई।

विशेष नियम

 जहां पर कर्म आदि कारकों की अविवक्षा तथा संबंध मात्र की विवक्षा हो वहां षष्ठी विभक्ति होती है। विवक्षा = बोलने की इच्छा । जैसे शतां गतं वाक्य में गम् धातु से नपुंसकत्व विशिष्ट भाव में क्त प्रत्यय हुआ । भाव में क्त होने से  तृतीया विभक्ति होकर शतेन गतम् वाक्य  होना चाहिए था परंतु इस वाक्य में तृतीया विभक्ति की अविवक्षा है और संबंध मात्र की विवक्षा होने से षष्ठी विभक्ति होती है। सम्बन्ध को विशेष रूप से प्रदर्शित करना चाहता है ।  इसे एक अन्य उदाहरण के द्वारा और अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। मोहनः सर्पिषो जानीते में सर्पिषः में षष्ठी विभक्ति है। वाक्य होना चाहिए सर्पिषा जानीते / भुंक्ते ।  मोहन को भूख तो लगी है लेकिन वह खा नहीं रहा है। जब उसे घी देने की लालच दी जाती है तो वह खाने को तैयार हो जाता है।  मोहन को अन्य खाद्य पदार्थ से सम्बन्ध नहीं है बल्कि घी से संबंध है, जिसके कारण वह भोजन करने को तैयार हो गया ।अतः भी सर्पष् में षष्ठी विभक्ति हो जाती है।
कर्तृकर्मणोः कृतिः  सूत्र से ज्ञात होता है कि षष्ठी भी कारक है। कृदन्त के योग में कर्ता एवं  कर्म में षष्ठी विभक्ति होती है।
इसके अतिरिक्त कृत्यानां कर्तरि वा, यतश्च निर्धारणे, नित्यपर्याय प्रयोगे सर्वासां विभक्तिदर्शनम् सूत्र को भी देखना चाहिए ।

 उपपद विभक्ति-  नमः, स्वस्ति, प्रति, सह, विना आदि शब्द पद कहे जाते हैं। कारक प्रकरण में कुछ विभक्तियां पदों के कारण निर्धारित होती है। यथा नमः के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है। सह के योग में तृतीया विभक्ति होती है। यदि किसी विभक्ति में पद तथा कारक दोनों विभक्ति प्राप्त हो तो कारक विभक्ति होती है। पदमासश्रित्योत्पनाविभक्तिः उपपदविभक्तिः। क्रियामाश्रित्योत्पन्ना विभक्तिः  कारकविभक्तिः। उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिः वलीयसी।

 अभ्यास के लिए  विभक्ति अभ्यास पर चटका लगायें। कारक, सन्धि, तिङन्त, कृदन्त शब्दों का विश्लेषण, निर्माण पदों को आपस में मिलाने परिचय आदि विभिन्न कार्यों के लिए संसाधनी पर क्लिक करें। इसे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किया गया। 

 पाठ- 7

विशेष्य और विशेषण पर विचार

यल्लिंगं यद्वचनं या च विभक्तिर्विशेषस्य ।
तल्लिंगं तद्वचनं सैव विभक्तिर्विशेषणस्यापि ॥

जो लिंग, वचन और विभक्ति विशेष्य में होती है, वही विंग वचन और विभक्ति विशेषण में भी होगा।
विशेषण की परिभाषा- जो विशेष्य की विशेषता बताता है, उसे विशेषण कहते हैं। अर्थात् जिसके द्वारा विशेष्य को दूसरे पदार्थ से अलग किया जाता है उसे विशेषण तथा जो अलग किया जाता है वह विशेष्य है।
जिसका क्रिया के साथ सीधा सम्बन्ध होता है वह प्रधान होता है। किसी भी वाक्य में विशेषण गौण या अप्रधान होता है और विशेष्य प्रधान। विशेषण का क्रिया के साथ सीधा सम्बन्ध नहीं होता है। विशेष्य और विशेषण में समानाधिकरण होता है।  महाभाष्यकार पतञ्जलि के शब्दों में न ह्युपाधेरुपाधिर्भवति, न विशेषणस्य विशेषणम् अर्थात् विशेषण का विशेषण नहीं होता। आपने पाठ 2 के विशेषण शीर्षक में संख्यावाची शब्दों के बारे में अधिक जानने के लिए चटका लगाकर पढ़ा होगा कि 1 से 18 तक की संख्या केवल विशेषण के रूप में, 20 से लेकर आगे की संख्या विशेष्य तथा विशेषण दोनों में प्रयुक्त होते हैं। इसी प्रकार उनका लिंग और वचन भी जान लिया होगा।
विशेषणों का रूप लगभग विशेष्य के अनुसार होते हैं, क्योंकि इनके लिंग में भी परिवर्तन हो जाता है। पाठ 2 सर्वनाम शीर्षक में आपने पढ़ा है कि इदम् , एतद् , तद्, अदस्, यद्, किम् सर्वनाम का प्रयोग विशेषण अर्थ में भी होता है। किम् शब्द में अपि, चित् एवं चन् प्रत्यय लगकर अनिश्चयवाचक सर्वनाम  एवं किम् को छोड़कर शेष सर्वनाम में एव लगाकर निश्चयवाचक सर्वनाम बनाया जाता है। यह भी विशेषण के रूप में प्रयुक्त होता है।
परिणाम वाची अल्प, अर्ध आदि शब्दों तथा अन्य सर्वनाम पदों में वतुप् आदि अनेक प्रकार के प्रत्यय लगते हैं। वे भी विशेषण होते हैं। उन विशेष शिक्षण सामग्री को कभी अन्यत्र दी जाएगी। 

पाठ- 8

अव्यय पर विचार

अब तक आपने जाना कि शब्द दो प्रकार के होते हैं- विकारी तथा अविकारी। विकारी शब्दों में संज्ञा, सर्वनाम विशेषण तथा क्रिया आते हैं। अविकारी शब्दों में क्रिया विशेषण, उपसर्ग, निपात, संयोजक, विस्मय सूचक शब्द आते हैं। विकारी शब्द वे हैं जिनके रूप, लिंग, वचन आदि में विकार (परिवर्तन) होता रहता है। अविकारी अर्थात् दिसमें परिवर्तन नहीं होता है। वे अव्यय शब्द है। अव्यय शब्द तीनों लिंगों, तीनों वचनों, सभी व्यक्तियों में एक जैसे रहते हैं। अब आगे- 
जैसा कि पहले ही कहा जा चुका है कि जिसके स्वरूप में परिवर्तन नहीं होता, उसे अव्यय कहते हैं। इसे अविकारी कहा जाता है, क्योंकि इसके मूल रूप में लिंग, वचन, पुरुष, कारक, काल इत्यादि के कारण कोई विकार उत्पत्र नहीं होता। च, वा, ह, एव अव्ययों का प्रयोग वाक्य के आरम्भ में नहीं होता है। 
          जो लोग कहते हैं कि संस्कृत में किसी पद को कहीं भी रखा जा सकता है अथवा रखने से अर्थ परिवर्तन नहीं होता है, उसे अव्यय प्रकरण को भली-भाँति पढ़ना चाहिए। उदाहरण के लिए अथ इस अव्यय को लें। इसे मंगल सूचक, उसके बाद और तब, प्रश्न पूछने, और तथा भी, सम्पूर्ण एवं सब अर्थ में, यदि ऐसा मानने पर, सन्देह, अनिश्चय, अथवा आदि अर्थ में प्रयुक्त होता है। अलग- अलग अर्थ में प्रयोग के लिए इसके स्थान का भी निर्धारण होता है कि यह वाक्य के आरम्भ में लगेगा या मध्य में अथवा किसी अन्य शब्द के साथ जुड़कर। और तथा भी अर्थ में प्रयुक्त अथ शब्द का प्रयोग देखें। संस्कृतमथ हिन्दीं पठामि। यदि इसे अथ संस्कृतं हिन्दीं पठामि बोला या लिखा जाय तो अर्थ परिवर्तित हो जाएगा। हम मिश्रित वाक्य के अध्याय में इस प्रकार के शब्दों पर विस्तार पूर्वक चर्चा करेंगें। 

अव्ययों की पहचान

1. प्रादि गण में आये शब्द अव्यय होते हैं।
2. चादिगण में कहे गये शब्द अव्यय होते हैं । यदि ये चादि के शब्द असत्व =  द्रव्य/ वस्तु नहीं हो तो। जैसे- पशु के दो अर्थ होते हैं (क) चौपाया जानवर, (ख) अच्छी तरह । द्रव्य वाचक चौपाया जानवर अव्यय नहीं होगा। चादि को आकृति से भी पहचाना जा सकता है कि इसका प्रयोग अव्यय के रूप में हुआ है या नहीं। 
3. कृदन्त के मकारान्त तथा एजन्त प्रत्यय जिसके अंत में हो वह अव्यय होता है। कृदन्त में णमुल्, खमुञ्, तुमुन् तथा कमुल् ये चार प्रत्यय मान्त होते है। जैसे- णमुल् (अम्) से बना ध्यायं ध्यायं,  खमुञ् (अम्) से बना चोरङ्कारम् , तुमुन् (तुम्) से बना पठितुम् । कमुल् का प्रयोग वेद में होता है। एजन्त प्रत्ययों का भी प्रयोग वेद में ही होता है।
4. क्त्वा, तोसुन् और कसुन् प्रत्यय जिसके अंत में हो वह शब्द अव्यय होता है। लोक में केवल क्त्वा का प्रयोग होता है। उदाहरण- क्त्वा से कृत्वा आदि, तोसुन् से उदेतोः (उदय होने तक) आदि ।
5. अव्ययीभाव समास वाले शब्द अव्यय होते है।
6. चित् और चन ये दोनों निपात किम् शब्द के विभक्तियों अंत में में जुड़कर अनिश्चिचितता को प्रकट करते हैं।
7. स्वर आदि शब्द तथा निपात अव्यय होते है। इसके कुछ प्रचलित शब्द नीचे दिये गये हैं 
 इस  अव्यय का शाब्दिक अर्थ है- 'जो व्यय न हो।
              सदृशं त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु ।

               वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥
इनके भेद सहित उदाहरण अधोलिखित हैं-
1. क्रिया विशेषण  -  दूरम्, दूरेण, अत्र, तत्र, परितः, चिरं, चिरेण आदि
2. उपसर्ग     -    प्र, परा, अप आदि 22 उपसर्ग, ये धातुओं से पहले जुड़कर धातु के अर्थ को बदल देते हैं।
3. निपात    -    खलु, नु, किल,किन्तु आदि। ये अर्थ पर बल देते हैं।       
4संयोजक -    च, वा, अथ जैसे अव्यय दो शब्दों को जोड़ने का काम करते हैं।                        
5. विस्मय सूचक- हा, हन्त, हे, भो, अहो आदि विस्मय या मन के विकार को सूचित करते हैं।         
6. प्रकीर्ण- उपर्युक्त के अतिरिक्त कुछ अन्य अव्यय गति, समय, स्थान, अवस्था ,दिशा आदि का संकेत देते हैं। जैसे- अद्य, ऊच्चैः, यावत् आदि।


अकस्मात् - अचानक
किञ्च - और


अग्रतः - आगे / सामने
किमिति- किस कारण से

इत्थम् -  इस प्रकार
अग्रे  -   पहले
किमुत -  कहना ही क्या
परम् -  परन्तु
किन्तु -  लेकिन
अचिरम् - शीघ्र
किम् -  क्यों / क्या
परश्वः -  परसों
किल -  सचमुच
अजस्रम् -  निरन्तर
कु -  बुरा
परितः – चारों ओर
क्वचित् -  कहीं
अतः - इसलिए
कुतः -  कहाँ से
पुनः -  फिर

अत्र -   यहां
कुत्र -  कहां
पुरा -  प्राचीन काल में

अथ इसके बाद
क्व - कहाँ
बहुधा -  बहुत प्रकार से

अथवा -  या
खलु इस प्रकार
पृथक् -  अलग

अद्य - आज
च - और
प्रत्युत -  के विपरीत

अधः - नीचे
चिरम् -  देर तक
प्रातः - सबेरे

अधुना अब
चिरात् बहुत दिनों में
प्रायः - हमेशा

अनिशम्- निरन्तर
जातु कभी भी
भूयः बार- बार

अन्तरा -  बीच में
झटिति -  शीघ्र
मा -  मत

अन्तरेण - विना
तत्र  -  वहां
मुधा -  व्यर्थ में

अन्यत्र दूसरी जगह
तथा -  तैसे
यत्र -  जहाँ

अन्यथा- दूसरे प्रकार से
तथापि - फिर भी
यत्र -  जहाँ

अपरेद्युः दूसरे दिन
तदा -  तब
यथा -  जैसे

अपि - भी
तर्हि तब, तो
यदा -  जब

अवश्यम् - जरूर/अवश्य
ततः – तब, इसके बाद
युगपत् - एक साथ

आम् - हाँ (स्वीकारोक्ति)
तावत् – तब तक
वा -   या / विकल्प

इव -  समान / सदृश
तिरः, तिर्यक् -  तिरछे
विना -  बिना /बगैर

इह -  यहाँ

वृथा -  व्यर्थ

ईषत् -  कुछ, थोड़ा
तु -  लेकिन,तो
शनैः -  धीरे

उच्चैः - ऊँचा
तूष्णीम् -  चुप
शीघ्रम् -  जल्दी

उत -  अथवा

श्वः - आने वाला कल

उभयतः दोनों ओर
धिक् -  धिक्कार
सपदि -  शीघ्र

उषा -  सुबह/ प्रातः

सम्प्रति - अब

ऋते - विना
न -  नहीं
सह -  के साथ

एकत्र एक जगह
नमः -  नमस्कार
साकम्/सार्धम् - के साथ

एकदा एक बार
निकषा - निकट
साक्षात् -  सामने

ओम् -  स्वीकार करना
नीचैः - नीचे
सु- अच्छा/अच्छी तरह

कथम् - कैसे
नूनम् - अवश्य
सुष्ठु -  अच्छा / ठीक

कदा -  कब
नो - नहीं
सदा -  हमेशा

कदापि -  कभी भी
नोचेत् - यदि नहीं तो















































इस प्रकरण में इस विषय पर विस्तारित सूची उपलब्ध कराने से विषय बोझिल हो जाएगा। अतः एक दूसरे पोस्ट में 
विस्तारपूर्वक लिखा जा रहा है। आप अव्ययों का अभ्यास पर चटका लगाकर वहाँ तक पहुँचें।

पाठ- 9

सन्धि

दो वर्णों के मेल को सन्धि कहते हैं। उच्चारण और लेखन के समय जब दो वर्ण आपस में मिलते हैं तब कभी उसके बीच में 1. एक नया अक्षर आ जाता है 2. दो वर्णों के मेल से एक नया वर्ण बन जाता है 3. कभी एक वर्ण दूसरे के समान हो जाता है। आइये, इस पाठ में हम देखते हैं कि किसी पद में या पद के भीतर दो वर्णों के मिलने से किस-किस प्रकार का परिवर्तन होता है। इस परिवर्तन या सन्धि को मुख्यतः 3 भागों में विभाजित किया जाता है। 1. स्वर सन्धि या अच् सन्धि 2. व्यञ्जन सन्धि या हल् सन्धि 3. विसर्ग संधि। स्वर सन्धि में ही हम पूर्वरूप और पररूप सन्धि के बारे में जानेंगें। इस संधि प्रकरण में प्रत्याहार (अनेक शब्द के लिए दो शब्द) शब्दों के प्रयोग किये गये हैं। अध्येताओं को सलाह दी जाती है कि वे इस पाठ के पूर्व प्रत्याहार के बारे में जान लें। स्वर सन्धि में  अधोलिखित प्रमुख नियम हैं। 
यण् सन्धि
इको यणचि 
इक् (इ उ ऋ लृ) के बाद यदि अच् (अ इ उ ऋ लृ ए ओ ए औ) का कोई असवर्ण स्वर हो तो इक् की जगह क्रम से य् व् र् तथा ल् हो जाते है। यहाँ हस्व स्वर से दीर्घ स्वर भी समझना चाहिए।
(क) यदि हस्व इ या दीर्घ ई के बाद इई को छोड़कर अन्य कोई स्वर वर्ण हो तो इ या ई की जगह य् होता है और वह ‘य्‘ आगे के स्वर से मिल जाता है।
उदाहरण-
                        इति + अत्र = इत्यत्र                           इ का य्
                        अति + आचारः = अत्याचारः
                        नदी + अत्र = नद्यत्र                        ई का य्
नदी + आवेगः = नद्यावेगः
 नदी + उद्धारः= नद्युद्धारः
(ख)  उ तथा ऊ के बाद उऊ को छोड़कर यदि कोई स्वर आगे रहे तो उऊ की
जगह व् हो जाता है।
अनु़ + अयः = अन्वयः                    उ का व्
सु़ + आगतम् = स्वागतम्
मधु़ +इदम् = मध्विदम्
मधु़ + ईशः= मध्वीशः
सरयू़+ अम्ब= सरय्वम्बु                 ऊ का व्
वधू़ + आसनम=वध्वासनम्
वधू़ + इच्छा= वध्विच्छा
   (ग) ऋ तथा   के बाद ऋऔर लृ को छोड़कर किसी स्वर में रहने पर ऋ,  के स्थान   
            में ‘र्‘ हो जाता है।
पितृ़ + अनुमतिः= पित्रनुमतिः       ऋ का र्
मातृ़ + आदेशः= मात्रादेशः
  (घ) लृ के बाद ऋऋ और लृ को छोड़कर कोई स्वर हो तो लृ का ‘ल्‘ हो जाता है।
लृ़ + आकृतिः= लाकृतिः              लृ का ल्


अयादि सन्धि

एचोऽयवायावः
एच् के आगे यदि कोई स्वर वर्ण होता है तो ए ओ ऐ औ को क्रमशः अय् अव् आय् आव् आदेश होता है। जैसे-

उदाहरण-
सन्धि विच्छेद                     प्रक्रिया

ने + अयनम्         न् ए  अयनम् , न्  अय् अयनम् = नयनम् को अय्
भो + अवनम्        ओ को अव् = भवनम्
नै + अकः             ऐ  को आय् = नायकः
पौ + अकः            औ को आव् = पावकः

गुण सन्धि

आद् गुणः
1. अ या आ के बाद  इ या ई वर्ण हो तो दोनों के स्थान पर ए 
2. अ या आ के बाद उ या ऊ वर्ण हो तो दोनों के स्थान पर ओ
3. अ या आ के बाद ऋ या ऋृ वर्ण हो तो दोनों के स्थान पर अर्
4. अ या आ के बाद  वर्ण हो तो दोनों के स्थान पर अल् हो जाता है। जैसे-
अ + इ = ए का उदाहरण,          मम + इव = ममेव ।
आ + इ = ए का उदाहरण,         गंगा + इव = गंगेव ।
अ + ई = ए का उदाहरण,          देव + ईश = देवेश ।
आ + ई = ए का उदाहरण,         रमा + ईश = रमेश ।
अ + उ = ओ का उदाहरण,          चन्द्र + उदय = चन्द्रोदय ।
अ + ऋ = अर् का उदाहरण,         राज + ऋषि = राजर्षि ।
अ +  = अल् का उदाहरण,          मम + ऌकार = ममल्कार ।
नोट- संस्कृत में अ इ उ ऋ वर्णों का ह्रस्व दीर्ध और प्लुत ये तीन भेद होते हैं। अतः व्याकरण में अ का अर्थ आ भी होता है। इसी प्रकार इ उ ऋ को भी समझना चाहिए।

दीर्घ सन्धि

अकः सवर्णे दीर्घः
 जब किसी ह्रस्व या दीर्घ अ, , , ऋ स्वर के बाद  ह्रस्व या दीर्घ अऋ स्वर आये तब दोनों स्वरों के
स्थान में एक दीर्घ स्वर हो जाता है-
उदाहरण-
  धन + अर्थः    = धनार्थ                  (अ + आ = आ)
  देव + आलयः = देवालयः               (अ + आ = आ)
  विद्या + अभ्यासः = विद्याभ्यासः      (अ + आ = आ)
  विद्या + आलयः = विद्यालयः           (अ + आ = आ)
  कवि + इन्द्रः = कवीन्द्रः                   (इ + इ = ई)
  कवि + ईश्वरः = कवीश्वरः                (इ + इ = ई)
  मही + इन्द्रः = महीन्द्रः                    (ई + इ = ई)
  लक्ष्मी + ईश्वरः = लक्ष्मीश्वरः             (ई + ई = ई)
  सु + उक्तिः    = सूक्तिः                     (उ + उ = ऊ)
  हिन्दू + उदयः = हिन्दूदयः                (ऊ + उ = ऊ)

  पितृ + ऋणम् = पितृणम्                 (ऋ + ऋ = ऋ)

वृद्धि सन्धि

वृद्धिरेचि
अवर्ण (अ या आ) के बाद  ए या ऐ वर्ण हो तो दोनों के स्थान पर वृद्धि (ऐ ,औ ) हो जाता है। 
उदाहरण-
अ + ए = ऐ का उदाहरण,          मम + एव = ममैव ।
 + ए = ऐ का उदाहरण,          प्रिया + एव = प्रियैव ।
अ + ओ = औ का उदाहरण,         तव + ओघः = तवौघः।
अ + ऐ = ऐ का उदाहरण,          राम + ऐश्वर्य = रामैश्वर्य ।
आ औ = औ का उदाहरण         महा + औत्सुक्यम्= महौत्सुक्यम् 
नोट- आपने देखा कि अ या आ के साथ ए या ऐ मिलने पर ऐ ही होता है । इसी प्रकार अ या आ के साथ ओ या औ मिलने पर औ ही होता है। कारण यह है कि जब दो स्वर आपस में मिलते हैं, उसका बढ़ना (बृद्धि होना) स्वाभाविक है। ह्रस्व वर्ण या दीर्घ वर्ण  के साथ दीर्घ वर्ण को मिलाने र भी वह दीर्ध ही हो सकता है। ऐ औ पहले से ही दीर्घ है।

पूर्वरूप सन्धि

एङः पदान्तादति
यदि किसी पद के अंत में ए या ओ हो और उसके आगे ह्रस्व अकार हो तो पहले और बाद वाला वर्ण मिलकर पूर्वरूप (पहले वाले वर्ण के समान ए या ओ) हो जाता है। यह संधि अवग्रह द्वारा ( ) सूचित होती है। जैसे-
ए + अ = ए का उदाहरण,          हरे + अव  = हरेऽव ।
ओ + अ = ओ का उदाहरण,        साधो + अत्र  = साधोऽत्र ।
नोट- ऽ चिह्न केवल यह प्रदर्शित करने के लिए लगाया जाता है कि यहाँ पहले अ था।

पररूप सन्धि

एङि पररूपम्
अकारान्त उपसर्ग के बाद ए या ओ से प्रारंभ होने वाली धातु हो तो पहले  और बाद वाला वर्ण मिलकर पररूप (बाद वाले वर्ण के समान) हो जाता है।  जैसे-
 अ + ए = ए का उदाहरण,          प्र + एजते =  प्रेजते ।
अ + ओ = ओ का उदाहरण,          उप + ओषति = उपोषति ।

प्रकृतिभाव सन्धि

ईद्देद्द्विवचनं प्रगृह्यम् , प्लुतप्रगृह्या अचि नित्यम्

द्विवचन में रहने वाले ईकारान्त, ऊकारान्त तथा एकारान्त शब्दों के बाद कोई स्वर आने पर यथावत् स्वरूप (प्रकृतिभाव) रह जाता है। अर्थात् इनमें संधि नहीं होती है।
उदाहरण-
हरी + इमौ = हरी इमौ
भानू + उमौ = भानू उमौ

यमुने + इति = यमुने इति


स्वर वर्णों में होने वाली प्रमुख सन्धियों की जानकारी देने के बाद व्यंञ्जन वर्णों के बीच होने वाली सन्धियों को बताया जा रहा है।

श्चुत्व सन्धि

स्तोः श्चुना श्चुः

सकार तथा तवर्ग का श् या चवर्ग से साथ योग होने पर सकार के स्थान पर शकार तथा तवर्ग के स्थान पर चवर्ग होता है। ध्यातव्य है कि सकार तथा तवर्ग का शकार तथा चवर्ग के साथ पूर्व या पर में कहीं भी योग होगा को स् को श् तथा तवर्ग के स्थान पर यथासंख्य चवर्ग आदेश होगा।
उदाहरण-
रामस् + चिनोति में स् को श् आदेश हुआ,    रामश्चिनोति बना।
सत् + जनः         में त् को ज् आदेश हुआ,    सज्जनः बना।
 शार्ङ्गिन् + जय   में न् को ञ् आदेश हुआ,     शार्ङ्गिञ्जय बना।

ष्टुत्व सन्धि

ष्‍टुना ष्‍टुः
सकार तथा तवर्ग का षकार तथा टवर्ग के साथ योग होने पर सकार के स्थान पर षकार तथा तवर्ग के स्थान पर  टवर्ग हो। 
इस सूत्र में भी सकार और तवर्ग का षकार और टवर्ग के साथ यथासंख्य योग होने पर यथासंख्य कार्य का नियम लागू नहीं होता है। अर्थात् सकार या तवर्ग का यदि षकार या टवर्ग के साथ (आगे या पीछे) योग हो तो स् के स्थान में ष् और तवर्ग के स्थान में टवर्ग हो जाता है।
रामस्+ षष्ठः में सकार तथा षकार का योग होने पर स् को ष् आदेश हुआ। रामष्षष्ठः रूप बना।
पेष् + ता      में तकार को टकार आदेश होकर = पेष्टा
तत् + टीका   में तकार को टकार आदेश होकर = तट्टीका
चक्रिन् + ढौकसे में नकार को णकार आदेश होकर = चक्रिण्ढौकसे रूप बनेगा।

जश्त्व सन्धि

झलां जशोऽन्‍ते
पदान्त में झल् के स्थान पर जश् हो जाता है । 
वाक् + ईशः में क् का जश्  ग्  हुआ । वाग् + ईशः = वागीशः रूप बना।
तत् रूपम् में तकार को दकार होकर तद्रूपम् बनेगा।

चर्त्व  सन्धि

खरि च
खर् वर्ण बाद में हो तो झल् को चर् हो। अर्थात् वर्गों के तृतीय वर्ण के बाद यदि वर्ग का प्रथम, द्वितीय वर्ण एवं श, , स हो तो वह तृतीय वर्ण अपने वर्ग का प्रथम वर्ण हो जाता है।
उदाहरण- दिग् + पालः = दिक्पालः
              विपद् + कालः = विपत्कालः

अनुस्वार सन्धि

मोऽनुस्वारः
किसी पद के अंत में म् हो तथा उसके बाद हल् (व्यंजन वर्ण) हो तो म् के स्थान में अनुसार हो जाता है।
उदाहरण- हरिम् + वन्दे = हरिं वन्दे
 किम् + वा = किं वा
सम् + गच्छध्वमे = संगच्छध्वम्
नियम-(2)  नश्चापदान्तस्य झलि
अपदान्त न् तथा म् के बाद यदि झल् वर्ण आता है तो न् के स्थान में अनुस्वार हो जाता है।
उदाहरण- यषान् + सि = यषांसि

परसवर्ण सन्धि

अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः
अनुस्वार के बाद यय् प्रत्याहार का वर्ण हो तो अनुस्वार के स्थान में उसके आगे वाले वर्ण के वर्ग का पच्चम वर्ण हो जाता है।
उदाहरण-
अं + कितः = अङ्कितः
अं + चितः = अञ्चितः
कुं + ठितः = कुण्ठितः
शां + तः =  शान्तः

सं + तोषः = संतोषः 

लत्व सन्धि

तोर्लि
नियम- तवर्ग के बाद ल् आए तो त वर्ग का ल् हो जाता है। स्थानेऽन्तरतमः के अनुसार अनुनासिक न् के बाद ल् के आने पर सानुनासिक लकार (ल्ँ) होता है। जैसे

यथा- तत्+लीनः = तल्लीनः           (त्+ल् = ल्ल्) 
यथा- कश्चिद्+लभते = कश्चिल्लभते (द्+ल् = ल्ल्)
यथा- महान्+लाभः = महाल्ँलाभः ( अनुनासिक न्+ल् = ल्ँल)

इतनी ही सन्धियों का मुख्य रूप से प्रयोग होता है । सन्धि के बारे में अधिक जानने के लिए इसी ब्लाग के लघुसिद्धान्तकौमुदी सन्धि प्रकरण पर क्लिक करें। विस्तार के भय से अन्य नियम नहीं दिये जा रहे हैं। 
एक अनुरोध- 
इतने पाठ पढ़ लेने के बाद आगे के पाठ के लिए संस्कृत शिक्षण पाठशाला 2 पर चटका लगाकर उस लिंक को खोलें।

11 टिप्‍पणियां:

  1. श्लाघनीयं कार्यमिदं संस्कृतभाषाभिवर्धनार्थं निश्चप्रचं सिद्धिप्रदायकं भविष्यतीति।

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  2. आप के प्रयास सराहनीय है महोदय बहुत सुन्दर कार्य का आरंभ किया है आपने आपका चिंतन संस्कृत के लिए अद्भुत है जो आपको सभी से विशेष दर्शाता है। संस्कृत भाषा के उत्थान के लिए यह कदम अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
    जयतु संस्कृतं जयतु भारतं

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    1. संस्कृत कठीण भाषा है,और सिर्फ पंडित बाणानेके लिए है,ऐसा बचपन से हि मन में डर पैदा कर देते है।
      आपका प्रयास सराहनीय है।

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    2. विगत 100 - 200 वर्षों में देश और विदेश के विद्वानों ने ऐतिहासिक तथा पुरातात्विक साक्ष्यों के आधार पर सिद्ध किया है कि संस्कृत केवल भारत या इसके किसी एक भूभाग की भाषा नहीं रहा है। इसका पुष्ट प्रमाण हमें साहित्यिक तथा दार्शनिक स्रोतो से भी मिलता है। इस भाषा में भारत में और भारत के बाहर रहने वाले तमाम जातियों, सम्प्रदायों के लोगों ने अपना योगदान दिया है। इस भाषा में पाकिस्तान, ईरान, ईराक, अरब, मिस्र, श्रीलंका, दावा, सुमात्रा बाली, चीन के कुछ भूभाग की सभ्यता, ज्ञान विज्ञान, इतिहास को अपने शब्दों में व्यक्त किया। ज्योतिष के प्रसिद्ध ग्रंथ खेटकौतुकम् को कौन नहीं जानता। दुर्भाग्य है कि आज की जनता ब्राह्मणों द्वारा कराये जाने वाले कर्मकाण्ड मात्र से से परिचित है। इसमें गणित, रसायन, भूगर्भ, आदि वे तमाम विषय उपलब्ध है, जिसे हम अध्ययन करते हैं। मैं पूछता हूँ क्या यह देश विना किसी कानून के, व्यापारिक नियमों के, चिकित्सा के हजारों वर्षों तक रहा? यहाँ भी किसी राजा का राज्य था। वहाँ विधि व्यवस्था थी। व्यापार होते थे। राजा कर लेता था। चिकित्सा व्यवस्था थी। यातायात के साधन थे। विशाल भवन बनते थे। उसकी तकनीक थी। वह सब कुछ था, जो आज हम देख रहे हैं। जीवन को सरल और सुखमय बनाने के लिए हजारों वर्ष पूर्व भी लोग अनुसंधान में लगे थे। 300 वर्षों में एकाएक बमने शून्य से शिखर तक की यात्रा नहीं कर ली। आधारभूत ज्ञान वही थे। इसी संस्कृत भाषा में लिखे गये थे। आज हमने उसी में और थोड़ा सा परिष्कार कर लिया है। चाहे वह कृषि, वानिकी, अंतरिक्ष, औषध या अन्य कोई क्षेत्र हौ। हजारों वर्षों तक इस ज्ञान विज्ञान को तिरस्थायी बनाने में संस्कृत भाषा का योगदान अतुलनीय है। यदि कोई संस्कृत को किसी वर्ग या क्षेत्र विशेष की भाषा कहता है तो प्रथम दृष्ट्या वह अज्ञानी है। वह भारतीय मनीषियों को अपमानित करने का काम तो कर ही रहा है साथ ही अल मामून से लेकर अलबैरूनी तक को अपमानित करता है।

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  3. पदों में वचन तथा विभक्ति बताना

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    1. अपना प्रश्न स्पष्ट करें। आप कोई पद लिख दें। मैं उसका वचन और विभक्ति बता दूँगा। आप कोई भी शब्दरूप देखें, शब्दरूप के ऊपर एकवचन, द्विवचन और बहुवचन लिखा रहता है। शब्दरूप के वायीं ओर उसकी विभक्ति लिखी रहती है। जैसे-
      एकवचन द्विवचन बहुवचन
      प्रथमा बालकः बालकौ बालकाः
      द्वितीया बालकम् बालकौ बालकान्
      तृतीया बालकेन बालकाभ्याम् बालकैः
      चतुर्थी बालकाय बालकाभ्याम् बालकेभ्यः
      पञ्चमी बालकात् बालकाभ्याम् बालकेभ्यः
      षष्ठी बालकस्य बालकयोः बालकानाम्
      सप्तमी बालके बालकयोः बालकेषु
      संबोधन हे बालक हे बालकौ हे बालकाः

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  4. उत्तर
    1. पहले आप देखेॆ कि कृत् प्रत्यय से बना शब्द स्वरान्त है या हलन्त। कृदन्त से बने शब्द प्रायः तीनों लिंगों (पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंग) में होते हैं। जैसे कृ धातु से ण्वुल् प्रत्यय करने पर कारक बनता है। इसके अनन्तर आप प्रसंगानुकूल कारकः, कारिका या कारकम् इन तीनों लिंगों में से किसी एक लिंग में इसका प्रयोग करते हैं। एक और उदाहरण देखें- प्रियंवद और प्रियंवदा शब्द कृदन्तीय खच् प्रत्यय से बना है। अब आप जान चुके होंगें कि जबतक हमें उसकी लिंग और अंतिम अक्षर के बाद में जानकारी नहीं होती है तब तक हम किसी भी शब्द का रूप नहीं चला सकते। आप अपने प्रश्न को स्पष्ट करें तथा सम्पूर्ण लेख को सावधानी से पुनः पढ़ें । इसमें स्थान- स्थान पर सम्बन्धित प्रकरण पर लिंक लगा है। जैसे लिंगानुशासन का लिंक लगा हुआ है। उस लिंक तक जायें।

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  5. अपने आप में संस्कृत में कौन सा पुरुष होगा

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  6. अपने आप के लिए संस्कृत में अस्मद् शब्द का प्रयोग होता है। इसमें उत्तम पुरुष होगा। इसका रूप इस प्रकार चलता है-
    एकवचन द्विवचन बहुवचन
    प्रथमा अहम् आवाम् वयम्
    द्वितीया माम् / मा आवाम् / नौ अस्मान् / नः
    तृतीया मया आवाभ्याम् अस्माभिः
    चतुर्थी मह्यम् / मे आवाभ्याम् / नौ अस्मभ्यम् / नः
    पञ्चमी मत् / मद् आवाभ्याम् अस्मत् / अस्मद्
    षष्ठी मम / मे आवयोः / नौ अस्माकम् / नः
    सप्तमी मयि आवयोः अस्मासु

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  7. शोभनम् संस्कृतं शिक्षितुं सम्यक् प्रयासः।

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