लघुसिद्धान्तकौमुदी (विभक्त्यर्थ - प्रकरणम्)


यहाँ से विभक्त्यर्थ प्रकरण (कारक) प्रारम्भ होता है। सुबन्त तथा तिङन्त प्रकरण में शव्दों के निर्माण की प्रक्रिया बताई गयी। शब्दों (सुप् तिङ्) के योग से वाक्य का निर्माण होता है। आपने सुबन्त प्रकरण में अजन्तपुँल्लिङ्ग आदि छः प्रकरणों से सु आदि की प्रत्यय तथा विभक्ति संज्ञा तथा उन इक्कीस विभक्तियों के तीनों वचनों को जान लिया। इन विभक्तियाँ का अर्थ इस कारक (विभक्त्यर्थ) प्रकरण में बताया जायेगा। अतः इस प्रकरण को विभक्त्यर्थप्रकरण भी कहा जाता हैं। करोति इति कारकः के अनुसार कारक शब्द का एक अर्थ कर्ता भी है। किन्तु यहाँ का कारक शब्द पारिभाषिक है। साक्षात् क्रियान्वयित्वं कारकत्वम् अर्थात् जिसका क्रिया के साथ सीधा सम्बन्ध हो अथवा क्रियाजनकत्वं कारकत्वम् अर्थात् जो क्रिया का जनक है, उसे कारक कहते है।

८९१ प्रातिपदिकार्थलिङ्गपरिमाणवचनमात्रे प्रथमा
नियतोपस्‍थितिकः प्रातिपदिकार्थः । मात्रशब्‍दस्‍य प्रत्‍येकं योगः । प्रातिपदिकार्थमात्रे लिङ्गमात्राद्याधिक्‍ये परिमाणमात्रे संख्‍यामात्रे च प्रथमा स्‍यात् । प्रातिपदिकार्थमात्रे – उच्‍चैः । नीचैः । कृष्‍णः । श्रीः । ज्ञानम् । लिङ्गमात्रे – तटःतटीतटम् । परिमाणमात्रे – द्रोणो व्रीहिः । वचनं संख्‍या । एकःद्वौबहवः ।।

अर्थ-  प्रातिपदिकार्थ (व्यक्ति एवं जाति) मात्र में, लिंग ज्ञान के लिए, मात्रा जानने तथा वचन के अर्थ में प्रथमा विभक्ति होती है। 
प्रत्येक पद के अर्थ को प्रातिपदिकार्थ कहते हैं। जिस पद की व्यापक उपस्थिति हो उसे प्रातिपदिकार्थ कहते है।  ये प्रातिपदिकार्थ 5 होते हैं। स्वार्थ (व्यक्ति या जाति) द्रव्य (वस्तु) लिंग, संख्या तथा कारक। यहाँ प्रतिपदिकार्थ से स्वार्थ (व्यक्ति या जाति) द्रव्य (वस्तु) का ग्रहण किया गया है। किसी के नाम से किसी व्यक्ति, वस्तु या जाति को बोध हो रहा हो वह प्रतिपदिकार्थ है। मात्र शब्द का प्रातिपदिकार्थ लिंग, परिमाण और वचन इस सबके साथ योग है। अतः सूत्र का अर्थ इस प्रकार होगा- प्रातिपदिकार्थ मात्र, लिंग मात्र, परिमाण मात्र और वचन मात्र में प्रथमा विभक्ति होती है।
प्रातिपदिकार्थ मात्र (जाति और व्यक्ति) का उदाहरण- उच्‍चैः । नीचैः । कृष्‍णः । श्रीः । ज्ञानम् ।
लिङ्ग मात्र  का उदाहरण तटः (पुल्लिंग), तटी (स्त्रीलिंग), तटम् (नपुंसक लिंग) । यहाँ तट शब्द का लिंग नियत (सुनिश्चत) नहीं है। मानवःफलम् का लिंग निश्चित है। जिसका लिंग अनिश्चित और जिसका निश्चित है, दोनों में प्रथमा विभक्ति होगी।  
परिमाण मात्र का उदाहरण द्रोणो व्रीहिः । परिमाण अर्थ में द्रोण शब्द से प्रथमा विभक्ति हुई।

वचन को संख्‍या कहते हैं। वचन का उदाहरण । एकः, द्वौ, बहवः ।

८९२ सम्‍बोधने च
प्रथमा स्‍यात् । हे राम ।

सम्बोधन अर्थ में प्रथमा हो। उदाहरण- हे कृष्ण। 
इति प्रथमा ।
यहाँ प्रथमा विभक्ति की विवेचना पूर्ण हुई।
विशेष-

सम्बोधन में प्रथमा- सम्बोधन को कारक के अन्तर्गत नहीं माना जाता है। इसके लिए प्रथमा विभक्ति का उपयोग किया जाता है। यहाँ उदाहरण में हे कृष्ण दिया गया। यह अकारान्त पुल्लिंग का उदाहरण है। इकारान्त, उकारान्त आदि पुल्लिंग, स्त्रीलिंग एवं नपुंसक लिंग के सम्बोधन में आंशिक रूप परिवर्तन हो जाता है। अतः शब्दरूप में सम्बोधन का भी शब्दरूप लिखा जाता है।
संस्कृत में क्रिया अथवा व्यापार को ही मुख्य माना जाता है। इस भाषा में क्रिया के आधार पर ही कारक निश्चित होते हैं। क्रियान्वयित्वं कारकत्वम्। इस नियम के कारण पचति, खेलति, पठति आदि में काल, पुरूष तथा वचन निश्चित हैं, अतः उसी के अनुसार कारक का प्रयोग होता है। कर्तृवाच्य में क्रिया का सम्बन्ध कर्ता के साथ होता है अतः कर्ता में प्रथमा विभक्ति होती है, जबकि कर्म वाच्य में क्रिया के साथ कर्म का सम्बन्ध होता है अतः वहाँ पर कर्ता में प्रथमा विभक्ति नहीं होती। यही स्थिति भाववाच्य की भी है। वाच्य के बारे में अधिक जानकारी के लिए संस्कृत शिक्षण पाठशाला पर क्लिक करें।
८९३ कर्तुरीप्‍सिततमं कर्म
कर्तुः क्रियया आप्‍तुमिष्‍टतमं कारकं कर्मसंज्ञं स्‍यात् ।।
क्रिया के द्वारा कर्ता का सबसे अधिक इच्छित कारक की कर्म संज्ञा हो। 
कर्म कारक में द्वितीया विभक्ति होती है। 
८९४ कर्मणि द्वितीया
अनुक्ते कर्मणि द्वितीया स्‍यात् । हरिं भजति । अभिहिते तु कर्मादौ प्रथमा – हरिः सेव्‍यते । लक्ष्म्या सेवितः ।।
अनुक्त कर्म में द्वितीया हो।

विशेष-  उक्त का अर्थ प्रधान या मुख्य होता है। क्रिया के साथ जिसका प्रधान, मुख्य या साक्षात् सम्बन्ध होता है, वह मुख्य कहा जाता है । क्रिया के साथ जिसका गौण सम्बन्ध हो उसे अनुक्त कहा जाता है। उक्त मुख्य। अनुक्त = गौण। बालकः हरिं भजति में  भजन इस क्रिया का बालक के साथ मुख्य या साक्षात् सम्बन्ध है अतः यह उक्त होकर इसमें प्रथमा विभक्ति तथा हरिं अनुक्त होने से इसमें द्वितीया विभक्ति हुई।
अभिहित मुख्य। जहाँ कर्म की प्रधानता होगी वहाँ कर्म में प्रथमा विभक्ति होती है। कर्म वाच्य में कर्म उक्त होता है। अतः हरिः लक्ष्म्या सेवितः में हरिः में प्रथमा विभक्ति हुई। 
सामान्य नियम के अनुसार हिन्दी में "को" जिस शब्द के अंत में हो उसमें  द्वितीया विभक्ति लगाना चाहिए।
जैसे- राम सीता को बुलाता है। रामः सीतां आह्वयति। यहाँ क्रिया के द्वारा कर्ता राम को इच्छित है- सीता को बुलाना। अतः सीता में द्वितीया विभक्ति होगी। सबसे इच्छित में द्वितीया विभक्ति का दूसरा उदाहरण- राम दूध के साथ भात खाता है। इसमें राम दूध तथा भात दोनों खा रहा हैपरन्तु इन दोनों में से इच्छित है -भात (ओदन) खाना। अतः इसमें द्वितीया विभक्ति होकर रामः पयसा ओदनं खादति बनेगा। 

८९५ अकथितं च
अपादानादिविशेषैरविविक्षतं कारकं कर्मसंज्ञं स्‍यात् ।
जहाँ अपादान आदि कारक विशेष रूप से विवक्षित नहीं हों, वहाँ कर्म संज्ञा होती है।
अकथित का अर्थ होता है- जो कहा नहीं गया। वृत्ति में अकथित को स्पष्ट किया गया कि जहाँ अपादान आदि कारक विवक्षित था परन्तु कहा नहीं गया। इसका अर्थ है कि कुछ धातुओं का कर्म अकथित= अप्रधान या गौण होता है। जिस वाक्य में दो कर्म हो तथा उसमें से एक कर्म अकथित= गौण हो, उसमें द्वितीया विभक्ति होती है। अप्रधान कर्म में  द्वितीया विभक्ति होती है। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस गौण कर्म का प्रयोग कभी अकेला नहीं किया जाता, अपितु सदैव मुख्य कर्म के साथ गौण कर्म प्रयुक्त होता है। 
इस प्रकार अभी तक आपने जाना कि कर्तुरीप्‍सिततमं कर्म से इप्सित = मुख्य कर्म में द्वितीया होती है तथा अकथितं च गौण कर्म  में द्वितीया विभक्ति होती है। अधोलिखित 16 धातुओं में गौण तथा मुख्य दोनों कर्म लगे होते हैं। इन धातुओं का जो अर्थ होता है, उस अर्थ वाले अन्य धातुओं के अभिहित कर्म में भी द्वितीया विभक्ति होती है।  
            दुह् - याच् - पच् - दण्‍ड् रुधि -प्रच्‍छि- चि- ब्रू- शासु- जि- मथ्- मुषाम् ।
            कर्मयुक् स्‍यादकथितं तथा स्‍यात् नी- हृ- कृष्- वहाम् ।। १ ।।


1. दुह् ( दुहना) , 2. याच् ( मांगना) 3. पच् ( पकाना) ,4. दण्ड् ( दण्ड देना) , 5. रुधि ( रोकना), 6. प्रच्छि ( पूछना) ,7. चि ( चुनना/एकत्र करना), 8. ब्रू ( कहना/बोलना), 9. शास् ( शासन करना), 10. जि ( जीतना), 11. मथ् ( मंथन करना), 12. मुष् (चुराना), 13. नी ( ले जाना), 14. हृ ( ले जाना) , 15. कृष् ( खींचना) और 16. वह् ( ढ़ोना) 
उदाहरण ;
गां दोग्‍धि पयः । बलिं याचते वसुधाम् । तण्‍डुलानोदनं पचति । गर्गान् शतं दण्‍डयति । व्रजमवरुणद्धि गाम् । माणवकं पन्‍थानं पृच्‍छति । वृक्षमवचिनोति फलानि । माणवकं धर्मं ब्रूते शास्‍ति वा । शतं जयति देवदत्तम् । सुधां क्षीरनिधिं मथ्‍नाति । देवदत्तं शतं मुष्‍णाति । ग्राममजां नयति हरति कर्षति वहति वा । अर्थनिबन्‍धनेयं संज्ञा । बलिं भिक्षते वसुधाम् । माणवकं धर्मं भाषते अभिवत्ते वक्तीत्‍यादि ।।
इति द्वितीया ।
किसी क्रिया में कौन, किसको तथा क्या लगाकर प्रश्न पूछें। यथा :-
इस प्रकार प्रश्न पूछने पर क्या और किसको वाला उत्तर कर्म संज्ञक होगा।

यथा- कृषकः गां दुग्धं दोग्धि।
८९६ स्‍वतन्‍त्रः कर्ता
क्रियायां स्‍वातन्‍त्र्येण विविक्षतोऽर्थः कर्ता स्‍यात् ।।
क्रिया के करने में जो स्वतन्त्र होता है, उसे कर्ता कहते हैं।
स्वतन्त्र शब्द की व्युत्पत्ति है- स्वम्=आत्मा तन्त्रम्=प्रधानम् । अर्थात् जिसकी प्रधानता हो। अब प्रश्न उठता है कि  किसमें प्रधानता हो? उत्तर आता है कार्य को करने में। निष्कर्ष यह हुआ कि कार्य अथवा व्यापार को करने में जिसकी प्रधनता हो, जिसके विना कार्य का होना सम्भव नहीं हो सकता वह कर्ता है। करने वाला है। कार्य को करने वाले को कर्ता कहा जाता है। वह कार्य का आश्रय है।

स्वातन्त्र्यं नाम व्यापाराश्रयत्वम् । एवञ्च व्यापाराश्रयः कर्ता इति फलितोऽर्थः ।
८९७ साधकतमं करणम्
क्रियासिद्धौ प्रकृष्‍टोपकारकं करणसंज्ञं स्‍यात् ।।

क्रिया की सिद्धि में सबसे अधिक उपकारक (सहायक) की करण संज्ञा हो। 
८९८ कर्तृकरणयोस्‍तृतीया
अनभिहिते कर्तरि करणे च तृतीया स्‍यात् । रामेण बाणेन हतो वाली।।
अनुक्त कर्ता और करण में तृतीया हो।
पूर्व में अनुक्त का अर्थ गौण कहा जा चुका है । तृतीया विभक्ति दो स्थानों पर होती है। 1. जिस वाक्य में कर्ता गौण हो, उसमें तृतीया विभक्ति होती है। 2. क्रिया को पूर्ण करने सबसे अधिक सहयोगी की । प्रकृत प्रसंग में यह जानना आवश्यक है कि कहाँ पर कर्ता मुख्य हो जाता है और कहाँ पर गौण। हमने अबतक पढ़ कर जाना कि कर्त्ता दो प्रकार का होता है ।1. स्वतन्त्रः कर्त्ता सूत्र में कहा गया कर्ता।  उदाहरण- बालकः दूरभाषां पश्यति । यहाँ पश्यति क्रिया का आश्रय बालक है । अतः बालकः कर्ता है। यह वाक्य कर्तृवाच्य का उदाहरण है । यहाँ कर्ता मुख्य है। कर्तृवाच्य में कर्ता मुख्य (प्रधान) होता है। इस सूत्र से हमें ज्ञात होता है कि क्रिया के करने में कर्ता गौण भी होता है। जहाँ कर्ता गौण या अनुक्त होगा वहाँ कर्ता में तृतीया विभक्ति होगी।
इति तृतीया ।
८९९ कर्मणा यमभिप्रैति स सम्‍प्रदानम्
दानस्‍य कर्मणा यमभिप्रैति स सम्‍प्रदानसंज्ञः स्‍यात् ।।
दान आदि कर्म के द्वारा कर्ता जिसे चाहता है, वह सम्प्रदान संज्ञक हो।
सम्यक् प्रदान सम्प्रदानम्, इस व्युत्पति के अनुसार जिसको ठीक तरह से दे दिया जाय, बाद में वापस लेने के लिए न दिया जाय, उसकी सम्प्रदान संज्ञा होती है। जैसे- विप्राय गां ददाति से विप्र को गाय हमेशा के लिए दी गई, इसीलिए विप्र की सम्प्रदान संज्ञा होती है किन्तु रजकस्य वस्त्रं ददाति में धोबी को कपड़ा वापस लेने के लिए ही दिया जाता है। इसलिए रजक की सम्प्रदान संज्ञा नहीं होती है। अतः रजकस्य वस्त्रं ददाति होता है।


९०० चतुर्थी सम्‍प्रदाने
विप्राय गां ददाति ।।
विप्राय गां ददाति में दान क्रिया का कर्म गौ है। कर्ता इसके द्वारा विप्र को चाहता है अतः विप्र में चतुर्थी विभक्ति हुई।
९०१ नमस्‍स्‍वस्‍तिस्‍वाहास्‍वधालंवषड्येगाच्‍च
एभिर्योगे चतुर्थी । हरये नमः । प्रजाभ्‍यः स्‍वस्‍ति । अग्‍नये स्‍वाहा । पितृभ्‍यः स्‍वधा । अलमिति पर्याप्‍त्‍यर्थग्रहणम् । तेन दैत्‍येभ्‍यो हरिरलं प्रभुः समर्थः शक्त इत्‍यादि ।।
इति चतुर्थी ।
नमः, स्वस्ति (कल्याण), स्वाहा, स्वधा (कल्याण), अलम् (समर्थ), वषट् (स्वाहा) शब्दों के योग में चतुर्थी विभक्ति होती है।
हरये नमः- हरि को नमस्कार है।
प्रजाभ्‍यः  स्वस्ति- प्रजा का कल्याण हो।
अग्‍नये स्वाहा- अग्नि को यह अर्पण है।
पितृभ्‍यः स्‍वधा - पितरों  को यह अर्पण है ।
अलमिति  - यहाँ अलं शब्द से समर्थ अर्थ ग्रहण किया जाता है अतः दैत्‍येभ्‍यो हरिरलं में चतुर्थी विभक्ति हुई। यहाँ अवं का अर्थ- प्रभु, समर्थ, शक्त इत्‍यादि  है।

ध्यातव्य बातें- उपपदविभक्तेः कारकविभक्तिर्बलीयसी नियम के अनुसार पद को लेकर दो विभक्ति होती है उससे क्रिया के सम्बन्ध के कारण होने वाली विभक्ति बलवान होती है। अतः मुनित्रयं नमस्कृत्य जैसे स्थान पर नमः के साथ करोति आदि क्रिया पद के योग होने से पद को केन्द्र में रखकर होने वाली चतुर्थी विभक्ति नहीं होती। यहाँ द्वितीया विभक्ति हो जाती है।
९०२ ध्रुवमपायेऽपादानम्
अपायो विश्‍लेषस्‍तस्‍मिन्‍साध्‍ये यद् ध्रुवमवधिभूतं कारकं तदपादानं स्‍यात् ।।
अपाय (अलगाव) होने में जो साध्य है, उसकी अपादान-संज्ञा होती है।

जिससे अलगाव होता है उसे ध्रव कहा गया है। ध्रुव का अर्थ स्थिर नहीं है। यहाँ पर ध्रुव का अर्थ जिससे वियोग होता है, वह है। अतएव धावतोऽश्वात् पतति में पतन्-क्रिया चलते हुए घोड़े से होने पर भी घोड़े की अपादानसंज्ञा होती है।
निष्कर्षतः - अपाय, विश्लेष, विलगाव, पृथक् होना, अलग होना समानार्थी हैं। जिस किसी सुनिश्चित व्यक्ति या स्थान से अलग हुआ जाता है, वह अपादान कहलाता है। 
९०३ अपादाने पञ्चमी
ग्रामादायाति । धावतोऽश्वात्‍पततीत्‍यादि ।।
इति पञ्चमी ।

अपादान में पञ्चमी होती है।
(मुरारिः) ग्रामाद् आयाति।  यहाँ मुरारिः कर्ता तथा आयाति क्रिया है । मुरारि का गाँव से अलगाव हो रहा है गाँव से अलगाव होने के कारण गाँव ध्रुव है, अतः ग्राम की ध्रुवमपायेऽपादानम् से अपादानसंज्ञा और अपादाने पञ्चमी से उसमें पञ्चमी विभक्ति हुई- ग्रामादायाति। ग्रामाद् आयाति = गांव से आता है।
(अश्वारोही) धावतोऽश्वात् पतति। इस वाक्य में दौड़ता हुआ घोड़ा ध्रुव है अर्थात् दौड़ते  हुए घोड़े से अलगाव हो रहा है, अतः अश्व की अपादानसंज्ञा और पञ्चमी विभक्ति होकर अश्वात् हुआ। धावत् यह शतृ प्रत्ययान्त शब्द अश्वात् का विशेषण है अतः धावत् में भी पञ्चमी है। (अश्वारोही) धावतोऽश्वात् पतति = घुड़सवार दौड़ते हुए घोड़े से गिरता है।
९०४ षष्‍ठी शेषे
कारकप्रातिपदिकार्थव्‍यतिरिक्तः स्‍वस्‍वामिभावादिः सम्बन्‍धः शेषस्‍तत्र षष्‍ठी । राज्ञः पुरुषः । कर्मादीनापि सम्बन्‍धमात्रविवक्षायां षष्‍ठ्येव । सतां गतम् । सर्पिषो जानीते । मातुः स्‍मरति । एधोदकस्‍योपस्‍कुरुते । भजे शम्‍भोश्‍चरणयोः ।।
इति षष्‍ठी ।
कारक (प्रातिपदिकार्थ) से भिन्न स्व-स्वामि भाव आदि सम्बन्ध को शेष कहते हैं। उस शेष में षष्ठी विभक्ति होती है।
शेष अर्थात् बचा हुआ, प्रातिपदिकार्थ, कर्म, करण, अपादान, अधिकरण आदि संज्ञायें जहाँ नहीं हुई हों वह शेष है। शेष (सम्बन्ध) मुख्यतः 4 प्रकार के सम्बन्धों से जुड़ा है।
1.  स्वस्वामिभाव सम्बन्ध (एक स्वामी और दूसरा स्वयं) जैसे – राज्ञः पुरुषः।
2. अवयवाविभाव सम्बन्ध,  (एक वस्तु और दूसरी वस्तु) वृक्षस्य शाखा। डाल अंग है और वृक्ष अड़ी अवयवावयविभाव सम्बन्ध मानकर षष्ठी शेषे से षष्ठी विभक्ति हुई-वृक्षस्य शाखा। वृक्षस्य शाखा = वृक्ष की डाल।
3. जन्यजनकभाव सम्बन्ध,  (एक पैदा होने वाला और दूसरा पैदा करने वाला) पितुः पुत्रम्। पिता का पुत्र। पिता जनक है और पुत्र जन्य। जन्यजनकभावसम्बन्ध में षष्ठी हुईं पितुः पुत्रम्। पितुः पुत्रम् = पिता का पुत्र।
4. प्रकृतिविकृतिभाव सम्बन्ध (एक मूल वस्तु और दूसरा उसका दूसरा रूप) सुवर्णस्य कङ्णम्। सोना प्रकृति और उसे विकृत करके निर्मित कंगन विकृति है। प्रकृति-विकृतिभाव सम्बन्ध में षष्ठी शेषे से षष्ठी हुई- सुवर्णस्य कङ्णम्।
यह सम्बन्ध द्विष्ठ अर्थात् दो में एक साथ रहता है। क्रिया से सीधा सम्बन्ध नहीं होने के कारण षष्ठी को कारक नहीं माना जाता है।  इसके विधान में किसी संज्ञा की आवश्यकता नहीं होती है।
राज्ञः पुरूष। यहाँ राजा स्वामी है और पुरूष स्व है। स्वस्वामिभाव सम्बन्ध मानकर षष्ठी शेषे से राजन्- शब्द में पष्ठी हुई- राज्ञः पुरूषः। राज्ञः पुरूष = राजा का आदमी।
कर्मादीनामपि । कर्म आदि में भी सम्बन्धमात्र की विविक्षा करने पर षष्ठी होती है। सुवर्णस्य कङ्णम् = सोने का कंगन।
सतां गतम्। इस वाक्य में सत् शब्द से सम्बन्ध की विवक्षा करने पर षष्ठी हुई। यहाँ गमन-क्रिया करने वाला होने से सज्जन कर्ता है और वह अनुक्त भी है। अतः अनुक्त कर्ता में कर्तृकरणयो.. से तृतीया होना चाहिए, परन्तु जब गमन-क्रिया और सज्जन कर्ता में क्रिया- कर्तृभाव सम्बन्ध की विवक्षा की जाती है तो सम्बन्ध सामान्य में षष्ठी होकर सतां गतम् सिद्ध होता है। सतां गतम् = सज्जनों का गमन।  
सर्पिषो जानीते। इसमें सर्पिषः शब्द से सम्बन्ध की विवक्षा करने पर षष्ठी हुई। यहाँ पर घी के कारण भोजन में प्रवृत्त होता है, अतः सर्पिष (घी) करण था। इसलिए तृतीया प्राप्त थी किन्तु सम्बन्ध के रूप में विवक्षा करने के कारण षष्ठी हो जाती है। सर्पिषो जानीते = घी के लिए प्रवृत होता है।
मातुः स्मरति। माता का स्मरण करता है। यहाँ क्रिया-कर्मभाव सम्बन्ध की विवक्षा की गई अतः मातृ से षष्ठी हो गई। इसी तरह एधोदकस्योपस्कुरुते। लकड़ी जल का गुण ग्रहण करता है। इस वाक्य में कर्म दक की सम्बन्धत्वेन विवक्षा करने से षष्ठी हो गई- दकस्य। एधोदकस्य में एधश्च उदकं च यह समाहार द्वन्द्व है । अथवा एधस् शब्द सकारान्त नपुंसकलिङ्ग का है । एधश्च दकं च यह विग्रह होगा । दक शब्द उदक शब्द का पर्यावाची है। भजे शम्भोश्चणयोः। कर्म में सम्बन्ध की विवक्षा करने के कारण चरणयोः में षष्ठी हुई है।
विशेष-
यहाँ पर षष्ठी विधायक अधोलिकित कूत्र को भी याद रखना चाहिए-
कर्तृकर्मणोः कृति
कृत् के योग होने पर कर्ता और कर्म में षष्ठी होती है।
कृष्णस्य कृतिः। कृ धातु से क्तिन् प्रत्यय होकर कृतिः बना है। इसके योग में कर्ता कृष्ण में कर्तृकर्मणोः कृति से षष्ठी हुई।
कर्तृकर्मणोः कृतिः  सूत्र से ज्ञात होता है कि षष्ठी भी कारक है। कृदन्त के योग में कर्ता एवं  कर्म में षष्ठी विभक्ति होती है।
इसके अतिरिक्त कृत्यानां कर्तरि वायतश्च निर्धारणेनित्यपर्याय प्रयोगे सर्वासां विभक्तिदर्शनम् सूत्र को भी देखना चाहिए ।
९०५ आधारोऽधिकरणम्
कर्तृकर्मद्वारा तन्निष्‍ठक्रियाया आधारः कारकमधिकरणं स्‍यात् ।।
कर्ता और कर्म के द्वारा उनमें रहने वाली क्रिया का आधार की अधिकरण संज्ञा हो।
अधिकरण सीधे तौर पर क्रिया का आधार नहीं होता किन्तु कर्ता या कर्म द्वारा रहती है। जैसे देवदतः कटे आस्ते में आसन (रहना) क्रिया देवदत्त कर्ता के द्वारा कट में है और स्थाल्यां तण्डुलं पचति में पाक क्रिया तण्डुल कर्म के द्वारा स्थाली (पात्र) में है।

जिस में वस्तु स्थित रहें, वह आधार है। आधार में रहने वाली वस्तु आधेय होती है। जैसे बरतन में चावल। चावल के लिए बरतन आधार है, बरतन में रहने वाला चावल आधेय हुआ। इस सूत्र से आधार की अधिकरण संज्ञा होती है। 
९०६ सप्‍तम्‍यधिकरणे च
अधिकरणे सप्‍तमी स्‍यात्चकाराद्दूरान्‍तिकार्थेभ्‍यः । औपश्‍लेषिको वैषयिकोऽभिव्‍यापकश्‍चेत्‍याधारस्‍त्रिधा । कटे आस्‍ते । स्‍थाल्‍यां पचति । मोक्षे इच्‍छास्‍ति । सर्वस्‍मिन्नात्‍मास्‍ति । वनस्‍य दूरे अन्‍तिके वा ।।
इति सप्‍तमी ।
अधिकरण में सप्तमी विभक्ति होती है तथा दूर और समीप अर्थ वाचक शब्दों में सप्तमी विभक्ति होती है।
आधार के तीन भेद हैं- औपश्लेषिक, वैषयिक और अभिव्यापक।
औपश्लेषिक आधार- कटे आस्ते । स्थाल्यां पचति। जहाँ आधार का कर्ता आदि से संयोग आदि सम्बन्ध होता है वहाँ औपश्लेषिक आधार होता है। यहाँ पर कट और स्थाली की अधिकरण संज्ञा होकर सप्तम्यधिकरणे च से सप्तमी विभक्ति  हो जाती है।
उप=समीपे श्लेषः संयोगादिसम्बन्धः उपश्लेषः। उपश्लेषसम्बन्धी आधार औपश्लषिक आधार। जहाँ आधार का आधेय के साथ संयोग आदि सम्बन्ध हो वहाँ औपश्लेषिक आधार होता है। जैसे- कटे आस्ते। चटाई पर है। यहाँ पर कट का बैठने वाले के साथ संयोगसम्बन्ध है, अतः कटे आस्ते में औपश्लेषिक-आधार है। इसी प्रकार स्थाल्यां पचति में भी समझना चाहिए।
वैषयिक आधार- मोक्षे इच्छास्ति।
विषय का अर्थात् विषयता-सम्बन्ध से आधार। यह आधार बुद्धिस्थ होता है। जैसे- मोक्षे इच्छास्ति। मोक्ष के विषय में इच्छा है। यहाँ पर मोक्ष का विषय है। इसी प्रकार शास्त्रे रूचिः, नारायणे भक्तिः आदि में भी समझना चाहिए।
अभिव्यापक आधार- सर्वस्मिन्नात्मास्ति।
जहाँ आधार के प्रत्येक स्थल पर आधेय की स्थिति हो वहाँ अभिव्यापक आधार समझना चाहिए। जैसे- सर्वस्मिन् आत्मा अस्ति। आत्मा सर्वत्र, सभी में है अर्थात् ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ आत्मा नहीं हो। यहाँ पर व्यापकता अर्थात् अभिव्यापक है। इसलिए अभिव्यापक सम्बन्ध को लेकर सप्तमीविभक्ति हुई- सर्वस्मिन्नात्मास्ति इसी प्रकार तिलेषु तैलम्, दुग्धे घृतम् आदि भी समझना चाहिए।

वनस्य दूरे। ग्रामस्य समीपे। सप्तम्यधिकरणे च इस सूत्र में चकार के पढ़ने से यह अर्थ निकाला गया है कि इस सूत्र के पहले दूरान्तिकार्थेभ्यो द्वितीया च से जिन शब्दों से द्वितीया का विधान किया गया, उन्हीं शब्दों से सप्तमी भी हो। ऐसे दूर और अन्तिक वाचक दूर और समीप शब्दों से सप्तमी विभक्ति हुई- वनस्य दूरे। ग्रामस्य समीपे। 

इति विभक्‍त्‍यर्थाः ।।
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