लघुसिद्धान्तकौमुदी (चुरादिप्रकरणम्)


अथ चुरादयः

चुर स्‍तेये ।। १ ।।
६९७ सत्‍यापपाशरूपवीणातूलश्‍लोकसेनालोमत्‍वचवर्मवर्णचूर्ण चुरादिभ्‍यो णिच्
एभ्‍यो णिच् स्‍यात् । चूर्णान्‍तेभ्‍यः ’प्रातिपदिकाद्धात्‍वर्थे’ इत्‍येव सिद्धे तेषामिह ग्रहणं प्रपञ्चार्थम् । चुरादिभ्‍यस्‍तु स्‍वार्थे । पुगन्‍तेति गुणः । सनाद्यन्‍ता इति धातुत्‍वम् । तिप्‍शबादि । गुणायादेशौ । चोरयति ।।
६९८ णिचश्‍च
णिजन्‍तादात्‍मनेपदं स्‍यात्‍कर्तृगामिनि क्रियाफले । चोरयते । चोरयामास । चोरयिता । चोर्यात्चोरयिषीष्‍ट । णिश्रीति चङ् । णौ चङीति ह्रस्‍वः । चङीति द्वित्‍वम् । हलादिः शेषः । दीर्घो लघोरित्‍यभ्‍यासस्‍य दीर्घः । अचूचुरत्अचूचुरत ।। कथ वाक्‍यप्रबन्‍धे ।। २ ।। अल्‍लोपः ।।

सूत्रार्थ - णिजन्त धातुओं से आत्मनेपद का विधान होता है, क्रिया का फल यदि कर्ता को प्राप्त हो रहा हो तो।

विशेष 

अभी तक आपने स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले से क्रिया का फल कर्ता को प्राप्त होने पर आत्मनेपद अन्यथा परस्मैपद का विधान होते देखा। क्रिया का फल कर्ता को प्राप्त होने पर णिचश्च सूत्र से णिजन्त धातु से आत्मनेपद का विधान होता है । क्रिया का फल कर्ता को प्राप्त नहीं होने पर परस्मैपद होता है। इस प्रकार णिजन्त प्रकरण में धातु के णिजन्त होने के बाद णिचश्च से परस्मैपद और आत्मनेपद हो जाता है। फलतः धातुओं के रूप परस्मैपद और आत्मनेपद दोनों में चलता है।

चोरयते। चुर् धातु से सत्‍यापपाशरूपवीणातूलश्‍लोकसेनालोमत्‍वचवर्मवर्णचूर्ण चुरादिभ्‍यो णिच् से णिच् प्रत्यय हुआ। चुर् + णिच् हुआ। णिच् में णकार की इत्संज्ञा चुटू से तथा चकार की इत्संज्ञा हलन्त्यम् से होकर तस्य लोपः से लोप हुआ। चुर् + इ में आर्धधातुक णिच् का इकार परे रहते 'पुगन्तलघूपधस्य च' से उपधा उकार को गुण होकर चोरि बना। इससे लट् आया। लट् के स्थान पर णिचश्च से आत्मनेपद का विधान हुआ। कर्ता अर्थ में लट् के स्थान पर आत्मनेपदसंज्ञक '' प्रत्यय आया। तिङ् शित् सार्वधातुकम् से त की सार्वधातुकसंज्ञा, कर्त्रर्थक सार्वधातुक परे होने पर कर्तरि शप् से शप्, अनुबन्धलोप करके चोरि + अ + त बना। सार्वधातुकार्धधातुकयोः से सार्वधातुक शप् का अकार परे रहते चोरि के इकार को गुण करके चोरे + अत बना। एचोऽयवायावः से चौरे के एकार को अय् आदेश होने पर चोर् + अय् + अत बना। वर्णसम्मेलन होने पर चोरयत बना। चोरयत में तकारोत्तरवर्ती अन्त्य अच् अकार की अचोऽन्त्यादि टि से टिसंज्ञा हुई और टित त के अकार को टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व होकर चोरयते रूप सिद्ध हुआ।

६९९ अचः परस्‍मिन्‍पूर्वविधौ
अल्‍विध्‍यर्थमिदम् । परनिमित्तोऽजादेशः स्‍थानिवत् स्‍यात्‍स्‍थानि भूतादचः पूर्वत्‍वेन दृष्‍टस्‍य विधौ कर्तव्‍ये । इति स्‍थानिवत्‍वान्नोपधावृद्धिः । कथयति । अग्‍लोपित्‍वाद्दीर्घसन्‍वद्भावौ न । अचकथत् ।। गण संख्‍याने ।। ३ ।। गणयति ।।
७०० ई च गणः
गणयतेरभ्‍यासस्‍य ई स्‍याच्‍चङ्परे णौ चादत् । अजीगणत्अजगणत् ।।
इति चुरादयः ।।
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