पावसः गानम्

पश्यतु दृश्यमहो रमणीयम् ॥

श्याम-श्यामला विहसति वसुधा,

प्रियागमनकाले इव मुग्धा।

पवनदूत-ज्ञापित-संदेशम्,

मेघानन-कमनीयम्॥

 

नभसि विलोकय श्यामं जलदम्,
भुवनप्रथित-जलमद्भुतफलदम् 

धान्यवपनव्यस्ताः खलु कृषकाः,
कार्यमिदं महनीयम्॥

 

काचिद् वनिता विरहे दीना,
हृदये स्थापित-स्वप्न-नवीना।
अयने नयने क्षिपति समुत्सुका/समुत्सुक-

मनसि प्रियं प्रति स्वीयम्॥

 

लेखकः- सूर्यदेव पाठक 'पराग'

समीक्षा

लेखक सूर्यदेव पाठक 'पराग' जी द्वारा रचित यह नव-संस्कृत गीत पारंपरिक शास्त्रीय क्लिष्टता से दूर आधुनिक भावबोध, प्रकृति-चित्रण और मानवीय संवेदनाओं का एक उत्कृष्ट मेल है। 'पराग' जी मूलतः भोजपुरी-हिंदी के वरिष्ठ गीतकार हैं, इसलिए उनके इस संस्कृत गीत में लोकगीतों जैसी सरलता, आंतरिक लय और गेयता कूट-कूट कर भरी है।

व्याकरण तथा साहित्यिक (काव्यशास्त्रीय) दृष्टिकोण से इस गीत की विस्तृत समीक्षा निम्नलिखित बिंदुओं के अंतर्गत की जा सकती है:

1. संरचनात्मक एवं व्याकरणिक समीक्षा (Structural & Grammatical Analysis)

यह गीत 'आधुनिक या नव-संस्कृत' (Modern Sanskrit Poetry) की शैली में लिखा गया है। इसमें महाकवि कालिदास जैसी रूढ़िवादी व्याकरणिक जटिलता के स्थान पर सरलता और प्रवाह को प्राथमिकता दी गई है।

• पदों का सजीव अन्वय: गीत में "श्याम-श्यामला विहसति वसुधा" तथा "धान्यवपनव्यस्ताः खलु कृषकाः" जैसे वाक्यों का अन्वय (शब्द-क्रम) अत्यंत स्वाभाविक है। क्रिया और कर्ता का संबंध स्पष्ट है।

• विभक्तियों का सुचारु प्रयोग: "प्रियागमनकाले इव मुग्धा" और "नभसि विलोकय श्यामं जलदम्" जैसे पदों में सप्तमी और द्वितीया विभक्ति का सार्थक और व्याकरण सम्मत प्रयोग हुआ है।

• अंतिम चरण के दोनों पाठों (समुत्सुका / समुत्सुक) का शास्त्रीय विश्लेषण:

कवि ने यहाँ दोनों विकल्प रखकर अपनी सूक्ष्म दृष्टि का परिचय दिया है। दोनों ही स्थितियाँ व्याकरण सम्मत हैं, परंतु उनके अर्थ इस प्रकार बदलते हैं:

1. विकल्प क (समुत्सुका - पदच्छेद पाठ): यदि हम "अयने नयने क्षिपति समुत्सुका, मनसि प्रियं प्रति स्वीयम्" पढ़ते हैं, तो 'समुत्सुका' सीधे 'वनिता' (स्त्रीलिंग कर्ता) का विशेषण बनता है। यहाँ 'मनसि' (सप्तमी विभक्ति, एकवचन) स्वतंत्र होकर "अपने मन के भीतर" का अर्थ देता है। यह पाठ अत्यंत सरल, प्रवाहपूर्ण और व्यावहारिक है।

2. विकल्प ख (समुत्सुक-मनसि - समस्त पद पाठ): यदि हम इसे हाइफ़न के साथ "समुत्सुक-मनसि" पढ़ते हैं, तो यहाँ बहुव्रीहि समास घटित होता है—“समुत्सुकं मनः यस्याः सा, तस्यां वनितायाम्” (उत्सुक मन वाली उस स्त्री में)। तब यह पद 'मन' का विशेषण बनकर 'मन के भीतर की गहरी छटपटाहट' को दर्शाता है। शास्त्रीय काव्य की दृष्टि से यह प्रयोग बहुत गंभीर और चमत्कारिक है।

यह गीत इस बात का आदर्श उदाहरण है कि बिना किसी क्लिष्टता (कठिनाई) के भी संस्कृत व्याकरण के उच्च नियमों का पालन कैसे किया जा सकता है।

• शीर्षक की सार्थकता: 'पावसः गानम्' में 'पावस' (वर्षा ऋतु) शब्द का प्रयोग ही अत्यंत काव्यात्मक है। यह सीधे पाठक को प्रकृति के सबसे रसमय रूप से जोड़ता है।

• विशेषण-विशेष्य का अनूठा अन्वय:

O दूसरे छंद में "भुवनप्रथित-जलमद्भुतफलदम्" पद पूरी तरह व्याकरण-सम्मत है। यहाँ 'भुवनप्रथित' (संसार-प्रसिद्ध) और 'अद्भुतफलदम्' (अद्भुत अन्न रूपी फल देने वाला) दोनों विशेषण 'जलम्' (नपुंसकलिंग, द्वितीया, एकवचन) के साथ पूरी तरह न्याय करते हैं।

• अंतिम चरण के दोहरे पाठ का व्याकरणिक वैभव:

कवि ने "समुत्सुका / समुत्सुक-" दोनों विकल्प देकर अपनी विद्वत्ता का परिचय दिया है:

1. 'समुत्सुका' (पदच्छेद पाठ): यह 'वनिता' (स्त्रीलिंग) का सीधा विशेषण है। तब 'मनसि' स्वतंत्र रूप से सप्तमी विभक्ति (मन में) का अर्थ देता है। यह पाठ सहज और गेय है।

2. 'समुत्सुक-मनसि' (समस्त पद पाठ): यहाँ बहुव्रीहि समास है—“समुत्सुकं मनः यस्याः सा, तस्यां (वनितायाम्)”। यह विरहिणी की आंतरिक छटपटाहट और मानसिक व्याकुलता को दर्शाने वाला एक उत्कृष्ट शास्त्रीय प्रयोग है।

शब्द शुद्धि: 'दीना' (विरह के कारण बेहाल) और 'नवीना' (नए सपने) शब्दों का प्रयोग स्त्रीलिंग कर्ता (वनिता) के सर्वथा अनुकूल है।

2. साहित्यिक एवं काव्यशास्त्रीय समीक्षा (Literary & Aesthetic Review)

साहित्यिक दृष्टिकोण से यह गीत अत्यंत समृद्ध, बिंब-प्रधान और रसमय है। शीर्षक "पावसः गानम्" (वर्षा का गीत) इस पूरी रचना की आत्मा को व्यक्त करता है। साहित्यिक धरातल पर यह गीत कालिदास के 'मेघदूतम्' की विरह-परंपरा और आधुनिक प्रगतिशील चेतना का एक अद्भुत संगम है।

क. रस और भाव-गांभीर्य (The Aesthetics of Rasa)

इस गीत में शृंगार रस और अद्भुत रस का सुंदर परिपाक हुआ है।

• संयोग शृंगार (प्रकृति में): पृथ्वी को एक 'मुग्धा नायिका' के रूप में चित्रित किया गया है जो अपने प्रिय (वर्षा/बादल) के आगमन पर मुस्कुरा रही है।

• विप्रलंभ (विरह) शृंगार (मानव में):  प्रकृति के इस चौतरफा उल्लास के बीच "काचिद् वनिता विरहे दीना" के माध्यम से विरह की पराकाष्ठा दिखाई गई है। जब पूरी प्रकृति उत्सव मना रही है, तब एक वनिता का विरह में होना शृंगार रस को अपनी चरम सीमा पर पहुँचा देता है। पूरी दुनिया बादलों को देखकर खुश है, पर वह विरहिणी अपनी आँखें रास्ते पर बिछाए है। यह विरोधाभास विप्रलभ शृंगार रस को और अधिक गहरा बनाता है। प्रकृति का उल्लास जहाँ एक ओर कृषकों को आनंदित कर रहा है, वहीं विरहिणी के भीतर उत्सुकता बढ़ा रहा है।

गीत में प्रकृति और मानव भावना का समानांतर चित्रण है, जो 'कालिदास' के 'मेघदूतम्' की परंपरा का स्मरण कराता है:

• प्रथम दो छंद (संयोग और उल्लास): यहाँ वर्षा ऋतु के आने से प्रकृति (वसुधा) का खिलना और कृषकों का धान बोने (धान्यवपन) में व्यस्त होना दिखाया गया है। यह उल्लास और सामाजिक चेतना का सुंदर समन्वय है।

• अद्भुत रस: किसानों के परिश्रम और बादलों द्वारा दिए जाने वाले 'अद्भुत फल' (अन्न) में अद्भुत रस की प्रतीति होती है।

ख. अलंकार योजना (Poetic Figures)

कवि ने बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के अलंकारों का सहज समावेश किया है:

उपमा और मानवीकरण (Personification): "विहसति वसुधा, प्रियागमनकाले इव मुग्धा" – यहाँ धरती का मानवीकरण किया गया है और उसकी तुलना नवविवाहिता मुग्धा नायिका से करते हुए 'इव' शब्द द्वारा पूर्णोपमा अलंकार की छटा बिखेरी गई है।

रूपक और विशेषण विपर्यय: "मेघानन-कमनीयम्" में बादलों को मुख का रूप दिया गया है। वहीं "स्थापित-स्वप्न-नवीना" पद नायिका के हृदय की अवस्था के लिए एक सुंदर विशेषण है।

अनुप्रास अलंकार: "श्याम-श्यामला", "धान्यवपनव्यस्ताः" में वर्णों की आवृत्ति से श्रुतिमाधुर्य उत्पन्न हुआ है।

ग. अलंकारों का सहज विन्यास (Poetic Figures)

• पूर्णोपमा और मानवीकरण: "विहसति वसुधा, प्रियागमनकाले इव मुग्धा" – धरती को एक लज्जालु, मुग्ध नववधू के रूप में चित्रित करना और 'इव' का प्रयोग करना उपमा और मानवीकरण का बेजोड़ उदाहरण है।

घ. बिंब और प्रतीक (Imagery and Symbols)

कवि ने दृश्यात्मक बिंबों का कमाल का ताना-बाना बुना है। आकाश में छाए काले बादल, खेतों में व्यस्त किसान, और रास्ते पर आँखें बिछाए बैठी व्याकुल नारी—ये सब आँखों के सामने एक जीवंत चित्र उपस्थित करते हैं। गीत दृश्यात्मक बिंबों से भरा हुआ है:

• सामाजिक बिंब: "धान्यवपनव्यस्ताः खलु कृषकाः, कार्यमिदं महनीयम्" – यह पंक्ति संस्कृत काव्य को केवल राजदरबारों या विरह-वर्णन से निकालकर श्रमसाध्य कृषक समाज से जोड़ती है, जो आधुनिक प्रगतिशील कविता का मुख्य लक्षण है।

• चेष्टा बिंब: "अयने नयने क्षिपति" (रास्ते पर आँखें बिछाना) एक अत्यंत सशक्त लोक-बिंब है, जिसे संस्कृत में बहुत खूबसूरती से ढाला गया है।

ङ. गेयता (Musicality)

• अंत्यानुप्रास (Rhyme): रमणीयम्-कमनीयम्, जलदम्-फलदम्, दीना-नवीना के कारण इसमें एक आंतरिक संगीत है। इसे कजरी या मल्हार जैसी लोकधुनों पर बहुत ही मधुरता से गाया जा सकता है।

च. छंद, लय और गेयता (Musicality)

गीत में अंत्यानुप्रास (Rhyme) का नियम बहुत कड़ाई और सुंदरता से निभाया गया है (रमणीयम्-कमनीयम्, जलदम्-फलदम्, दीना-नवीना)। अक्षरों का संतुलन ऐसा है कि इसे राग-रागिनियों (विशेषकर मल्हार या कजरी लोकधुनों) में बहुत ही मधुरता के साथ गाया जा सकता है।

छ. आधुनिक संस्कृत काव्य की प्रगतिशील चेतना

पारंपरिक संस्कृत कवि अक्सर राजाओं के वैभव या केवल विलासिता का वर्णन करते थे। प्राचीन काव्यों में वर्षा ऋतु का वर्णन केवल राजाओं-रानियों के आमोद-प्रमोद के लिए होता था। परंतु 'पराग' जी ने "धान्यवपनव्यस्ताः खलु कृषकाः, कार्यमिदं महनीयम्" लिखकर श्रमजीवी किसान को कविता के केंद्र में ला खड़ा किया है। किसानों के कार्य को 'महनीयम्' (महान/वंदनीय) कहना इस गीत को अत्यंत प्रगतिशील और आधुनिक बनाता है। यह पंक्ति को आधुनिक युग की प्रगतिशील और यथार्थवादी चेतना से जोड़ता है।

निष्कर्ष

सूर्यदेव पाठक 'पराग' जी द्वारा रचित "पावसः गानम्" आधुनिक संस्कृत गीति-काव्य का एक उत्कृष्ट मानदंड स्थापित करता है। व्याकरणिक रूप से पूरी तरह परिष्कृत होने के बाद अब यह रचना पूर्णतः निर्दोष और शास्त्रीय काव्य-मानकों पर खरी उतरती है। यह गीत सरल शब्दों में गंभीर व्याकरणिक संरचनाओं (जैसे बहुव्रीहि समास और विशेषण-विशेष्य सम्बन्ध) को समेटे हुए है। साहित्यिक दृष्टि से यह प्रकृति, लोक-जीवन (किसान के श्रम) और मानवीय संवेदनाओं (विरह की व्याकुलता) का एक संपूर्ण, सजीव और रसमय कोलाज है। यह रचना सशक्त रूप से प्रमाणित करती है कि देवभाषा संस्कृत केवल प्राचीन काल की भाषा नहीं, बल्कि आज के सामाजिक यथार्थ और समकालीन अनुभूतियों को भी उतनी ही तरलता एवं प्रासंगिकता से अभिव्यक्त करने में पूर्णतः सक्षम है।


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