📖 रचनाकार परिचय:
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🎵 इस भाग में संकलित गीत (सीधे जाने के लिए क्लिक करें):
- 1. वन्दे सदास्वदेशम्!
- 2. रौति कोकिलामदालसा रसालतरौ
- 3. अये प्रभाता रजनी!!
- 4. [यहाँ अगले गीत का नाम डालें]
५. वन्दे सदास्वदेशम्!
(साभार: 'वाग्वधूटी' पुस्तक से संकलित)
वन्दे सदास्वदेशम्!!
गङ्गा पुनाति भालं रेवा कटिप्रदेशम्
वन्दे सदा स्वदेशम्
एतादृशं स्वदेशम्!!
काशीप्रयागमथुरावृन्दाटवीविशालाः
द्वारावतीसुकाञ्चीविदिशादितीर्थमालाः
सम्भूषयन्ति कामं यस्य प्रशान्तवेषम्
वन्दे सदा स्वदेशम्
एतादृशं स्वदेशम्!!
सलिलं सुधामधुरितं पवनोऽपि गन्धवाही
चरितं विकल्पकलितं धर्मो दयावगाही
यत्प्राङ्गणं शबलितं कौतुहलैरशेषम्
वन्दे सदा स्वदेशम्
एतादृशं स्वदेशम्!!
६. रौति कोकिलामदालसा रसालतरौ
रौति कोकिलामदालसा रसालतरौ
गोपिता तमालतरौ रे!!
क्षणं पल्लवे निलीय
मञ्जरीरसं निपीय
स्तौति सम्मुखं वसन्तकं रसालतरौ
गोपिता तमालतरौ रे!!
नन्दनन्दनं विहाय
कीर्तिनन्दिनी सुखाय
वेत्ति नेषदप्यनामयं रसालतरौ
गोपिता तमालतरौ रे!!
मन्दमन्दगर्जनेन
भूरिभूरि वर्षणेन
मेघमालिका महीयते रसालतरौ
गोपिता तमालतरौ रे!!
मृगी शाद्वलं चिनोति
शिखी नर्तनं करोति
केकिनी च दुर्मनायते रसालतरौ
गोपिता तमालतरौ रे!!
अश्रुपातमाचरन्ति
वत्सकान्न लालयन्ति
अन्तरेण हरिं धेनवो रसालतरौ
गोपिता तमालतरौ रे!!
७. अये प्रभाता रजनी!!
अये प्रभाता रजनी!!
अये प्रभाता रजनी प्राच्यामुदयति दीधितिमाली!!
वहति सगन्धसमीरोऽमन्दम्
वितरति दिशि दिशि सुममकरन्दम्
विलसति सरसि सरसिजं रम्यं म्लायति ननु शेफाली।।
उदयति दीधितिमाली!!
देवायतने नदति मृदङ्गः
प्रतिशाखं प्रत्यटति विहङ्गः
गायति पिको विकचसहकारे नृत्यति शिखी कपाली।।
उदयति दीधितिमाली!!
उतिष्ठ न कुरु मृषा विलम्बम्
नभसि निभालय दिनकरबिम्बम्
श्रियेप्सितः स्यात्कथं दुरापो भव रे साहसशाली।।
उदयति दीधितिमाली!!
पुनरायाति न विगतः कालः
कं खलु जहाति कालव्यालः
द्रुतमनुकूलय जीवनलक्ष्यं त्वं गुणगणमणिमाली।।
उदयति दीधितिमाली!!
चिन्तय सकृदथ भारतदेशम्
जलधित्रयनगपतिपरिवेशम्
एतद्रजसा सज्जय भालं कलिता यदङ्कपाली।।
उदयति दीधितिमाली!!
"अये प्रभाता रजनी प्राच्यामुदयति दीधितिमाली!!" यह गीत प्रातःकालीन जागरण, आत्मबोध और कर्मप्रेरणा का सुंदर चित्रण करता है। प्रो. अभिराज राजेन्द्र मिश्र द्वारा रचित यह रचना प्रकृति के माध्यम से मानव चेतना को जागृत करने का संदेश देती है।
यह गीत प्रातःकाल के सौंदर्य और चेतना की ओर संकेत करता है, जिसमें रात्रि के अंत और सूर्य के उदय के माध्यम से नए दिन की शुरुआत का वर्णन किया गया है। यह रचना आत्मजागरण, राष्ट्रीय चेतना और आध्यात्मिक नवजागरण का प्रतीक है, जो मनुष्य को कर्म, ज्ञान और सेवा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।





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