धातु-परिचय: कृदन्त एवं तिङन्त क्रियापद व्यवस्था

१. धातु एवं क्रियापद का मौलिक वर्गीकरण

संस्कृत वाङ्मय में वाक्य का प्राण क्रिया को माना गया है। महाभाष्यकार पतंजलि के अनुसार "क्रियाप्रधानम् आख्यातम्" अर्थात् वाक्य में मुख्य अर्थ क्रिया का ही होता है। पाणिनीय व्याकरण में क्रिया के मूल स्रोत को 'धातु' कहा जाता है, जिससे तिङ् और कृत् प्रत्ययों के योग से विभिन्न प्रकार के क्रियापदों का निर्माण होता है।

१.१ धातु का स्वरूप: क्रियावाचक प्रातिपदिक (भूवादयो धातवः - अष्टाध्यायी १.३.१)

पाणिनीय अष्टाध्यायी के प्रथम अध्याय के तृतीय पाद का पहला सूत्र धातु संज्ञा का निर्धारण करता है:

• सूत्र: भूवादयो धातवः (अष्टाध्यायी - १.३.१)
अर्थ: 'भू' आदि शब्द (जो पाणिनीय धातुपाठ में पठित हैं) यदि वे 'क्रिया' (action/doing/being) को प्रकट करते हैं, तो उनकी धातु संज्ञा होती.है।

क) क्रियावाचकता ही मुख्य लक्षण है

केवल धातुपाठ में लिखे होने से ही कोई शब्द धातु नहीं बनता, बल्कि उसका क्रियावाचक होना अनिवार्य है। उदाहरण के लिए, धातुपाठ में 'भू' (होना), 'पठ्' (पढ़ना), 'गम्' (जाना) आदि क्रिया के वाचक हैं। यदि 'भू' शब्द पृथ्वी (संज्ञा) के अर्थ में प्रयुक्त हो, तो उसकी धातु संज्ञा नहीं होगी, बल्कि प्रातिपदिक संज्ञा होगी। अतः 'क्रियावाचित्वं धातुत्वम्' - क्रिया को बताने वाले स्वभाव को ही धातु कहते हैं।

ख) धातुपाठ की व्यवस्था

महर्षि पाणिनि ने संस्कृत की लगभग २००० धातुओं को १० गणों (जैसे भ्वादि, अदादि, जुहोत्यादि आदि) में विभाजित किया है। इन मूल धातुओं को व्याकरण की भाषा में 'उपदेश' कहा जाता है। मूल रूप में ये क्रियापद नहीं होते, बल्कि क्रिया के अमूर्त भाव (Root concepts) होते हैं। इनमें जब तक प्रत्यय नहीं जुड़ते, तब तक इनका वाक्य में प्रयोग नहीं किया जा सकता ("नापदं प्रयुञ्जीत" - बिना पद बनाए शब्द का प्रयोग न करें)।

१.२ तिङन्त क्रियापद: लकरार्थ में तिङ् प्रत्यय का अनुप्रयोग और उनकी सीमाएँ

जब इन मूल धातुओं से काल (Time) और मनोभाव (Mood) को दर्शाने के लिए १० लकारों के स्थान पर प्रत्यय लगाए जाते हैं, तो उन्हें तिङन्त क्रियापद कहते हैं।

• सूत्र: तिङ्शित्सार्वधातुकम् (अष्टाध्यायी - ३.४.११३) तथा लः कर्मणि च भावे चाकर्मकेभ्यः (अष्टाध्यायी - ३.४.६९)
  • अनुप्रयोग: व्याकरण में मूल १८ तिङ् प्रत्यय (तिप्, तस्, झि, सिप्, थस्, थ, मिप्, वस्, मस् — त, आताम्, झ, थास्, आथाम्, ध्वम्, इट्, वहि, महि) निश्चित किए गए हैं। ये १८ प्रत्यय तीनों पुरुषों (प्रथम, मध्यम, उत्तम) और तीनों वचनों (एकवचन, द्विवचन, बहुवचन) में बँटे हैं।
  • उदाहरण: पठ् + तिप् = पठति (वह पढ़ता है)। यहाँ 'पठति' एक पूर्ण, स्वतंत्र आख्यात या तिङन्त क्रियापद है।

तिङ् प्रत्ययों की सीमाएँ (Limitations of Tiṅ Affixes)

यद्यपि तिङन्त क्रियापद वाक्य को पूर्ण करने के मुख्य साधन हैं, तथापि भाषा की अभिव्यक्ति में इनकी कुछ सीमाएँ हैं। इन सीमाओं के कारण ही पाणिनि को 'कृत् प्रत्ययों' की व्यवस्था करनी पड़ी:

  • १. लिंग भेद का अभाव (Gender Insensitivity): तिङ् प्रत्ययों की सबसे बड़ी सीमा यह है कि ये त्रिलिंगात्मक नहीं होते। 'पठति' का प्रयोग बालक के लिए भी होगा (बालकः पठति), बालिका के लिए भी (बालिका पठति) और मित्र के लिए भी (मित्रं पठति)। तिङ् रूप देखकर कर्ता के लिंग का पता नहीं लगाया जा सकता।
  • २. एक वाक्य में एक ही मुख्य तिङ् क्रिया की बाध्यता: नियम के अनुसार एक साधारण वाक्य में एक ही तिङ् (मुख्य क्रिया) हो सकती है। यदि कर्ता एक ही समय में एक साथ कई क्रियाएँ कर रहा है (जैसे: वह जाकर, खाकर, हँसकर सोता है), तो 'जाकर', 'खाकर', 'हँसकर' जैसी सहायक क्रियाओं को व्यक्त करने में तिङ् प्रत्यय पूरी तरह असमर्थ हैं।
  • ३. विशेषण बनने में असमर्थता (Inability to act as Participles): तिङ् प्रत्ययान्त पद कभी भी किसी संज्ञा का विशेषण नहीं बन सकते। यदि हमें कहना हो "पढ़ते हुए बालक को देखो", तो हम तिङ् रूप 'पठति' का प्रयोग नहीं कर सकते। वहाँ क्रिया को विशेषण बनाने की सीमा आ जाती है।
  • ४. कारक और वचनों के बंधनों की जटिलता: तिङ् प्रत्यय पुरुष और वचन से कड़े बंधे होते हैं। यदि कर्ता बहुवचन है, तो क्रिया को अनिवार्य रूप से बहुवचन (पठन्ति) होना पड़ेगा। भाषा को सरल और संक्षिप्त बनाने के लिए जहाँ कर्ता के वचन बदलने पर भी क्रिया अपरिवर्तित रहे (जैसे अव्यय रूप), वहाँ तिङ् काम नहीं आते।

निष्कर्ष (धातु परिचय के दृष्टिकोण से)

धातु से क्रियापद बनाने की यात्रा में तिङ् प्रत्यय जहाँ वाक्य को काल और पुरुष का ढांचा देते हैं, वहीं अपनी उपर्युक्त सीमाओं (लिंगहीनता, एक-वाक्य-एक-तिङ् नियम) के कारण सीमित हैं। इसी बिंदु पर कृत् प्रत्यय (जैसे क्त्वा, णमुल्, शतृ, क्तवतु) तिङ् प्रत्ययों के पूरक और सुदृढ़ विकल्प बनकर सामने आते हैं, जो धातुओं को अव्यय, विशेषण और नए स्वतंत्र क्रियापदों में बदल देते हैं।

१.३ कृदन्त क्रियापद की भूमिका: तिङ् के अतिरिक्त वाक्य पूर्ण करने, विशेषण बनने और अव्यय क्रियापद के रूप में कृत् प्रत्ययों की महत्ता

संस्कृत व्याकरण में धातुओं से पद बनाने के दो ही मार्ग हैं—तिङ् और कृत्। जैसा कि आचार्य पाणिनि ने सूत्र दिया है:

• सूत्र: कृदतिङ् (अष्टाध्यायी - ३.१.९३)
अर्थ: धातुओं से विहित वे प्रत्यय जो 'तिङ्' (१८ आख्यात प्रत्ययों) से भिन्न हैं, वे कृत् प्रत्यय कहलाते हैं।

तिङ् प्रत्ययों की अपनी कुछ सीमाएँ हैं (जैसे लिंग का बोध न कराना, एक वाक्य में एक ही तिङ् का होना आदि)। इन सीमाओं को लांघकर भाषा को अधिक लचीला, संक्षिप्त और अभिव्यंजक बनाने में कृदन्त क्रियापदों की भूमिका अत्यंत क्रांतिकारी है। धातु परिचय के दृष्टिकोण से इसकी महत्ता को तीन मुख्य रूपों में समझा जा सकता है:

क) स्वतंत्र रूप से वाक्य पूर्ण करने की भूमिका (तिङ् के सुदृढ़ विकल्प)

लौकिक संस्कृत में यह एक बहुत बड़ी भ्रांति है कि वाक्य को केवल 'तिङ्' (लकार) से ही पूर्ण किया जा सकता है। कृत् प्रत्ययों में कुछ प्रत्यय ऐसे हैं जो बिना किसी लकार के, अकेले ही वाक्य की मुख्य क्रिया बनकर वाक्य को पूर्ण अर्थ प्रदान करते हैं।

  • भूतकाल में (क्तवतु प्रत्यय): लङ् (अनद्यतन भूत) या लुङ् लकार के जटिल रूपों (जैसे अगात्, अपात्) के स्थान पर महर्षि पाणिनि ने 'क्तक्तवतू निष्ठा' (अष्टाध्यायी - १.१.२६) सूत्र से निष्ठा संज्ञक प्रत्ययों का विधान किया। 'क्तवतु' प्रत्ययान्त पद वाक्य को पूर्ण क्रियापद का बल देते हैं।
    उदाहरण: सः विद्यालयं गतवान् (वह विद्यालय गया)। यहाँ गतवान् (गम् + क्तवतु) मुख्य क्रियापद है, जो बिना तिङ् प्रत्यय के वाक्य को पूर्ण कर रहा है।
  • चाहिए या योग्यता के अर्थ में (कृत्य प्रत्यय): विधिलिङ् लकार के विकल्प के रूप में तव्यत्, अनीयर् और यत् प्रत्यय (कृत्य प्रत्यय) स्वतंत्र क्रियापद की भूमिका निभाते हैं।
    उदाहरण: मया ग्रन्थः पठनीयः (मुझे ग्रन्थ पढ़ना चाहिए)। यहाँ पठनीयः (पठ् + अनीयर्) मुख्य क्रियापद है।

ख) विशेषण रूपी क्रियापद बनने की भूमिका (Participles)

तिङ् प्रत्ययान्त रूप कभी विशेषण नहीं बन सकते, किन्तु कृत् प्रत्यय धातुओं को 'विशेषण-क्रियापद' में बदल देते हैं। जब कोई कर्ता मुख्य क्रिया को करते हुए साथ में कोई दूसरी क्रिया भी लगातार कर रहा हो, तब शतृ (परस्मैपद) और शानच् (आत्मनेपद) प्रत्यय उस कर्ता के विशेषण के रूप में प्रयुक्त होते हैं। इनके रूप कर्ता के लिंग, विभक्ति और वचन के अनुसार बदलते हैं।

  • उदाहरण १: गच्छन् बालकः पतति (जाता हुआ बालक गिरता है)। यहाँ गच्छन् (गम् + शतृ) बालक की गतिमान अवस्था को दिखाने वाला क्रियापरक विशेषण है।
  • उदाहरण २: शयानं शिशुं पश्य (सोए हुए बच्चे को देखो)। यहाँ शयानम् (शीङ् + शानच्) शिशु का विशेषण क्रियापद है।

ग) अव्यय क्रियापद के रूप में महत्ता (Linguistic Flexibility)

संस्कृत का एक कड़ा नियम है कि एक साधारण वाक्य में एक ही मुख्य तिङ् क्रिया हो सकती है। यदि एक ही कर्ता कई क्रियाएँ एक के बाद एक कर रहा है, तो पाणिनि ने क्त्वा, ल्यप्, और तुमुन् जैसे कृत् प्रत्ययों का विधान किया है। 'कृन्मेजन्तः' (अष्टाध्यायी - १.१.३९) तथा 'क्त्वातोसुन्कसुनः' (अष्टाध्यायी - १.१.४०) सूत्रों से ये कृदन्त पद अव्यय बन जाते हैं।

  • अपरिवर्तनीय रूप: अव्यय होने के कारण इनके रूप कर्ता के बदलने पर भी नहीं बदलते (जैसे: बालकः पठित्वा गच्छति, बालिकाः पठित्वा गच्छन्ति)। इसमें 'पठित्वा' का रूप स्थिर रहता है।
  • वाक्य का विस्तार: ये प्रत्यय वाक्य में उप-वाक्यों (Subordinate clauses) को जोड़कर भाषा को संक्षिप्त करते हैं। यदि कृत् प्रत्यय न होते, तो "वह खाकर, पीकर, पढ़कर सोता है" के लिए हमें चार अलग-अलग तिङ् वाक्यों की आवश्यकता पड़ती। कृत् प्रत्ययों की सहायता से यह सः खादित्वा, पीत्वा, पठित्वा च स्वपिति जैसी सरल संरचना में समाहित हो जाता है।

धातु-परिचय के लिए कृदन्त का निष्कर्ष तालिका

कृत् प्रत्यय वर्ग मुख्य प्रत्यय धातु पर प्रभाव वाक्य में भूमिका
अव्यय कृदन्त क्त्वा, ल्यप्, तुमुन्, णमुल् रूप स्थिर हो जाता है पूर्वकालिक और निमित्तवाचक सहायक क्रियाएँ
विशेषण कृदन्त शतृ, शानच् रूप तीनों लिंगों में चलता है कर्ता की वर्तमान निरंतरता (सातत्य) दर्शाना
तिङन्त-विकल्प क्तवतु, तव्यत्, अनीयर् मुख्य क्रियापद का बल काल (भूत) और मनोभाव (चाहिए) में स्वतंत्र वाक्य पूर्ति

इस प्रकार, कृत् प्रत्ययों का निरूपण धातुओं की उस बहुआयामी शक्ति को प्रकट करता है, जिसके बिना संस्कृत भाषा की वाक्य-रचना अत्यंत दुरूह और सीमित हो जाती।

२. क्रिया की आवृत्ति, पौनःपुन्य और सातत्य (Repetitive Actions)

संस्कृत भाषा में जब कोई कर्ता किसी क्रिया को बार-बार दोहराता है, या उसमें निरंतरता (Continuity) और अत्यंत गहरा जुड़ाव होता है, तो महर्षि पाणिनि ने आख्यात (तिङ्) के अतिरिक्त कृदन्त प्रत्ययों के माध्यम से इसकी विशिष्ट अभिव्यक्ति की व्यवस्था की है। इस प्रक्रिया को व्याकरण में 'आभीक्ष्ण्य' (पौनःपुन्य या बार-बार होना) कहा जाता है।

२.१ 'आभीक्ष्ण्ये णमुल् च' (अष्टाध्यायी ३.४.२२)

• सूत्र: आभीक्ष्ण्ये णमुल् च (अष्टाध्यायी - ३.४.२२)
पदच्छेद: आभीक्ष्ण्ये (सप्तम्यन्त), णमुल् (प्रथमान्त), च (अव्यय)।
अनुवृत्ति: इस सूत्र में पूर्व सूत्र से 'समानकर्तृकयोः पूर्वकाले' (अष्टाध्यायी - ३.४.२१) की अनुवृत्ति आती है।

सूत्र का अर्थ और व्याख्या: 'अभीक्ष्ण' का भाव ही 'आभीक्ष्ण्य' कहलाता है, जिसका अर्थ है—किसी क्रिया का बार-बार होना (Repetition/Frequency)। यह सूत्र विधान करता है कि जब दो क्रियाओं का कर्ता एक ही हो (समानकर्तृक) और उनमें से एक क्रिया बार-बार घटित हो रही हो, तो उस आवृत्ति वाचक धातु से णमुल् प्रत्यय होता है।

सूत्र में प्रयुक्त 'च' पद अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह 'च' समुच्चयार्थक है, जो पूर्व सूत्र से क्त्वा प्रत्यय को भी यहाँ खींच लाता है। अर्थात्, क्रिया की बार-बार आवृत्ति दिखाने के लिए धातु से णमुल् और क्त्वा दोनों प्रत्ययों का विकल्प से प्रयोग किया जा सकता है।

२.२ क्त्वा प्रत्ययान्त द्वित्व रूप

जब 'आभीक्ष्ण्ये णमुल् च' सूत्र से 'च' के बल पर क्त्वा प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है, तो क्रिया की आवृत्ति दर्शाने के लिए उस पद को दो बार बोला या लिखा जाता है।

  • प्रत्यय स्वरूप: धातु से 'क्त्वा' प्रत्यय जुड़ने पर 'क्' की इत्संज्ञा होकर लोप होता है और 'त्वा' शेष बचता है।
  • अव्यय संज्ञा: 'क्त्वातोसुन्कसुनः' (अष्टाध्यायी - १.१.४०) सूत्र से क्त्वा प्रत्ययान्त शब्दों की अव्यय संज्ञा होती है, जिससे इनके रूप तीनों लिंगों और वचनों में समान रहते हैं।

प्रकृति-प्रत्यय विभाग एवं उदाहरण

  1. पीत्वा पीत्वा: पा (पाने/पीना) + क्त्वा
  2. हसित्वा हसित्वा: हस् (हँसने/हँसना) + क्त्वा (यहाँ 'इट्' का आगम होता है)
  3. खादित्वा खादित्वा: खाद् (भक्षणे/खाना) + क्त्वा

व्यावहारिक वाक्य प्रयोग

  • उदाहरण १: वह पानी पी-पीकर खाता है।
    संस्कृत: सः जलं पीत्वा पीत्वा खादति। (यहाँ पानी पीने की क्रिया बार-बार हो रही है)
  • उदाहरण २: वह हँस-हँस कर लोटपोट हो रहा है।
    संस्कृत: सः हसित्वा हसित्वा विलुठति।

२.३ णमुल् प्रत्ययान्त द्वित्व रूप

जब आवृत्ति के अर्थ में मुख्य रूप से णमुल् प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है, तब भी पद का द्वित्व होता है।

  • प्रत्यय स्वरूप: णमुल् प्रत्यय में 'ण्' (चुटू सूत्र से) और 'ल्' (हलन्त्यम् सूत्र से) की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। केवल 'अम्' शेष बचता है।
  • विशेष कार्य (वृद्धि): 'अचो ञ्णिति' (अष्टाध्यायी - ७.२.११५) सूत्र से धातु के अंतिम अच् (स्वर) को या उपधा-अकार को वृद्धि (जैसे: आ, ऐ, औ) हो जाती है।
  • अव्यय संज्ञा: 'कृन्मेजन्तः' (अष्टाध्यायी - १.१.३९) के नियम से णमुल् प्रत्ययान्त पद भी अव्यय बन जाते हैं।

प्रकृति-प्रत्यय विभाग एवं उदाहरण

  1. पायं पायं: पा + णमुल् → पा + अम् (आकारान्त होने से 'युक्' का आगम होकर) = पायं पायं
  2. हासं हासं: हस् + णमुल् → ह् (अ को वृद्धि 'आ') स् + अम् = हासम् → हासं हासं
  3. खादं खादं: खाद् + णमुल् → खाद् + अम् = खादम् → खादं खादं

व्यावहारिक वाक्य प्रयोग

  • उदाहरण १: वह पानी पी-पीकर खाता है।
    संस्कृत: सः जलं पायं पायं खादति।
  • उदाहरण २: वह हँस-हँस कर लोटपोट हो रहा है।
    संस्कृत: सः हासं हासं विलुठति।

२.४ 'सर्वस्य द्वे' (अष्टाध्यायी ८.१.१) नियम: पदों के द्वित्व होने की पाणिनीय प्रक्रिया

आपके मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि 'आभीक्ष्ण्ये णमुल् च' सूत्र केवल प्रत्यय लगाता है, लेकिन इन शब्दों को दो बार (पीत्वा पीत्वा / पायं पायं) लिखने का आदेश कौन सा सूत्र देता है? यहाँ पाणिनीय प्रक्रिया इस प्रकार काम करती है:

• सूत्र: सर्वस्य द्वे (अष्टाध्यायी - ८.१.१)
सम्बद्ध सूत्र: नित्यवीप्सयोः (अष्टाध्यायी - ८.१.४)
  • द्वित्व की शास्त्रीय प्रक्रिया: अष्टाध्यायी के आठवें अध्याय का प्रथम सूत्र है 'सर्वस्य द्वे' जो अधिकार सूत्र है। इसके साथ जब 'नित्यवीप्सयोः' या आभीक्ष्ण्य (बार-बार होना) का प्रसंग आता है, तो यह नियम संपूर्ण पद को द्वित्व (double) करने का निर्देश देता है।
  • चूँकि 'पीत्वा' या 'पायं' शब्द से आवृत्ति (पौनःपुन्य) का अर्थ स्वतः तब तक पूरी तरह संप्रेषित नहीं होता जब तक उसे दोहराया न जाए, अतः 'सर्वस्य द्वे' नियम के सामर्थ्य से भाषा में 'पीत्वा पीत्वा' और 'पायं पायं' जैसे प्रामाणिक रूप सिद्ध होते हैं।

धातु परिचय हेतु सारांश तालिका

मूल धातु विहित प्रत्यय सिद्ध पद (द्वित्व के बाद) वाक्यात्मक अर्थ
पा (पाने) क्त्वा / णमुल् पीत्वा पीत्वा / पायं पायं पी-पीकर (लगातार/बार-बार)
हस् (हसने) क्त्वा / णमुल् हसित्वा हसित्वा / हासं हासं हँस-हँस कर (आवृत्ति के साथ)
खाद् (भक्षणे) क्त्वा / णमुल् खादित्वा खादित्वा / खादं खादं खा-खाकर (अत्यंत चाव से बार-बार)

३. पूर्वकालिक एवं उद्देश्यवाचक क्रियापद (Sequential & Purpose-Driven Actions)

३.१ पूर्वकालिक अव्यय (क्त्वा और ल्यप्)

संस्कृत वाक्य-संरचना में जब एक ही कर्ता (समान कर्ता) एक के बाद एक कई क्रियाएँ करता है, तो मुख्य क्रिया (Principal action) से पहले समाप्त होने वाली क्रियाओं को पूर्वकालिक क्रिया (Sequential/Prior Action) कहा जाता है। पाणिनि व्याकरण में इसके लिए क्त्वा और ल्यप् प्रत्ययों का विधान किया गया है, जो धातुओं को अव्यय क्रियापद में बदल देते हैं

क) मूल नियम और पाणिनीय सूत्र

• सूत्र: समानकर्तृकयोः पूर्वकाले (अष्टाध्यायी - ३.४.२१)
पदच्छेद: समानकर्तृकयोः (षष्ठ्यन्त/सप्तम्यन्त द्विवचन), पूर्वकाले (सप्तम्यन्त एकवचन)।
सूत्रार्थ: जहाँ दो या दो से अधिक क्रियाओं का आश्रय (कर्ता) एक ही हो, वहाँ बाद में होने वाली क्रिया (मुख्य क्रिया) की अपेक्षा पूर्वकाल (पहले के समय) में समाप्त होने वाली क्रिया वाचक धातु से क्त्वा प्रत्यय होता है।

अव्यय संज्ञा सूत्र: क्त्वातोसुन्कसुनः (अष्टाध्यायी - १.१.४०) – इस सूत्र से क्त्वा प्रत्ययान्त शब्दों की अव्यय संज्ञा होती है। इनके रूप लिंग, विभक्ति या वचन के कारण कभी नहीं बदलते।

ख) उपसर्ग-रहित धातुओं में 'क्त्वा' का अनुप्रयोग

जब धातु के पूर्व में कोई उपसर्ग नहीं लगा होता, तब 'समानकर्तृकयोः पूर्वकाले' सूत्र से सीधे क्त्वा प्रत्यय जोड़ा जाता है। प्रत्यय का 'क्' भाग इत्संज्ञक होकर लुप्त हो जाता है और केवल 'त्वा' शेष रहता है।

  • १. इट्-आगम सहित (सेट् धातु): कुछ धातुओं में प्रत्यय जुड़ते समय 'इट्' (इ) का आगम होता है।
    खादित्वा: खाद् (भक्षणे) + क्त्वा → खाद् + इ + त्वा = खादित्वा (खाकर)
    हसित्वा: हस् (हसने) + क्त्वा → हस् + इ + त्वा = हसित्वा (हँसकर)
  • २. इट्-आगम रहित (अनिट् धातु): कुछ धातुओं में सीधे प्रत्यय जुड़ता है और धातु के स्वर या व्यंजन में संधि-कार्य होता है।
    पीत्वा: पा (पाने) + क्त्वा → पी + त्वा = पीत्वा (पीकर) (यहाँ 'घुमास्था...' सूत्र से आ-कार को ई-कार होता है)
    भुक्त्वा: भुज् (पालनाभ्यवहारयोः) + क्त्वा → भुक् + त्वा = भुक्त्वा (खाकर)
    गत्वा: गम् (गतौ) + क्त्वा → ग + त्वा = गत्वा (जाकर) (म-कार का लोप)

व्यावहारिक वाक्य प्रयोग:

  • हिन्दी: वह खा-पीकर सो गया।
  • संस्कृत: सः खादित्वा पीत्वा च सुप्तवान्। (यहाँ खाने और पीने दोनों क्रियाओं का कर्ता 'सः' ही है, और ये दोनों क्रियाएँ सोने से पहले पूर्ण हो चुकी हैं।)

ग) सोपसर्ग धातुओं में 'ल्यप्' का अनुप्रयोग

यदि धातु से पूर्व कोई उपसर्ग (जैसे प्र, वि, उप, अनु आदि) जुड़ा हो, तो पाणिनि नियम के अनुसार 'क्त्वा' प्रत्यय के स्थान पर ल्यप् प्रत्यय का आदेश हो जाता है।

• सूत्र: समासेऽनञ्पूर्वे क्त्वो L्यप् (अष्टाध्यायी - ७.१.३७)
सूत्रार्थ: उपसर्ग सहित धातु का जब समास (कृदन्त समास) होता है, बशर्ते वह नञ् (न/अ) से भिन्न हो, तो क्त्वा के स्थान पर ल्यप् आदेश हो जाता है।
  • प्रत्यय स्वरूप: ल्यप् प्रत्यय में 'ल्' (लशक्वतद्धिते सूत्र से) और 'प्' (हलन्त्यम् सूत्र से) की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। केवल 'य' शेष बचता है।
  • अव्यय संज्ञा सूत्र: तद्धितश्चासर्वविभक्तिः (अष्टाध्यायी - १.१.३८) के साहचर्य और 'मव्ययस्य' नियमों से ल्यप् प्रत्ययान्त पद भी सदा अव्यय ही होते हैं।

प्रकृति-प्रत्यय विभाग एवं रूप-सिद्धि

  • विज्ञाय: वि (उपसर्ग) + ज्ञा (जानना) + ल्यप् → वि + ज्ञा + य = विज्ञाय (विशेष रूप से जानकर)
  • उपगम्य: उप (उपसर्ग) + गम् (जाना) + L्यप् → उप + गम् + य = उपगम्य (पास जाकर) (यहाँ 'अनुदात्तोपदेश...' सूत्र से म-कार का लोप होता है)
  • प्रदाय: प्र (उपसर्ग) + दा (देना) + ल्यप् → प्र + दा + य = प्रदाय (देकर)
  • विहस्य: वि (उपसर्ग) + हस् (हँसना) + ल्यप् → वि + हस् + तुक् (त्) + य = विहस्य (विशेष रूप से हँसकर)

व्यावहारिक वाक्य प्रयोग:

  • हिन्दी: वह जल के विषय में जानकर जाता है।
    संस्कृत: सः जलं विज्ञाय गच्छति।
  • हिन्दी: गुरु के पास जाकर शिष्य पढ़ता है।
    संस्कृत: शिष्यः गुरुम् उपगम्य पठति।

धातु परिचय के लिए तुलनात्मक सारांश तालिका

मूल धातु उपसर्ग विहित प्रत्यय निष्पन्न अव्यय पद हिन्दी अर्थ वाक्य में भूमिका
खाद् - क्त्वा खादित्वा खाकर उपसर्ग-रहित पूर्वकालिक क्रिया
पा - क्त्वा पीत्वा पीकर उपसर्ग-रहित पूर्वकालिक क्रिया
ज्ञा वि ल्यप् (क्त्वा स्थाने) विज्ञाय जानकर सोपसर्ग पूर्वकालिक क्रिया
गम् उप ल्यप् (क्त्वा स्थाने) उपगम्य पास जाकर सोपसर्ग पूर्वकालिक क्रिया

३.२ उद्देश्यवाचक क्रियापद (तुमुन् प्रत्यय)

संस्कृत वाक्य-संरचना में जब एक क्रिया किसी दूसरी मुख्य क्रिया के निमित्त, प्रयोजन अथवा उद्देश्य (Purpose) के लिए की जाती है, तो उसे उद्देश्यवाचक क्रिया कहा जाता है। हिन्दी भाषा में इसके लिए "के लिए" (जैसे: खाने के लिए, पढ़ने के लिए, जाने के लिए) चिह्नों का प्रयोग होता है। पाणिनि व्याकरण में इस निमित्तार्थक भाव को व्यक्त करने के लिए तुमुन् प्रत्यय का विधान किया गया है।

क) मूल नियम और पाणिनीय सूत्र

• सूत्र: तुमुन्ण्वुलौ क्रियायां क्रियार्थायाम् (अष्टाध्यायी - ३.३.१०)
पदच्छेद: तुमुन्-ण्वुलौ (प्रथमा द्विवचन), क्रियायाम् (सप्तम्यन्त एकवचन), क्रियार्थायाम् (सप्तम्यन्त एकवचन)।
सूत्रार्थ: जब उपपद (समीपवर्ती पद) में ऐसी क्रिया हो जो 'क्रिया के लिए क्रिया' (क्रियार्था क्रिया) हो, अर्थात् जो दूसरी मुख्य क्रिया का उद्देश्य या फल हो, तो उस भविष्यत् काल की अर्थवाची धातु से तुमुन् और ण्वुल् प्रत्यय होते हैं। यहाँ उद्देश्य को प्रकट करने के लिए 'तुमुन्' मुख्य प्रत्यय है।

अव्यय संज्ञा सूत्र: कृन्मेजन्तः (अष्टाध्यायी - १.१.३९) – इस सूत्र के नियमानुसार जिन कृदन्त शब्दों के अंत में 'म्' (मकार) आता है, वे अव्यय कहलाते हैं। चूँकि तुमुन् में 'तुम्' शेष रहता है जिसका अंत मकार से होता है, अतः इसके रूप भी तीनों लिंगों और वचनों में सदा एकसमान (अपरिवर्तनीय) रहते हैं।

ख) प्रत्यय का स्वरूप और संधि-कार्य

तुमुन् प्रत्यय में 'उ' (उपदेशेऽजनुनासिक इत् से) और 'न्' (हलन्त्यम् सूत्र से) की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। धातु के पीछे केवल 'तुम्' जुड़ता है। धातु की प्रकृति के अनुसार यहाँ निम्नलिखित शास्त्रीय कार्य होते हैं:

  • १. इट्-आगम सहित (सेट् धातु):
    खादितुम्: खाद् (भक्षणे) + तुमुन् → खाद् + इ + तुम् = खादितुम् (खाने के लिए)
    पठितुम्: पठ् (व्यक्तायां वाचि) + तुमुन् → पठ् + इ + तुम् = पठितुम् (पढ़ने के लिए)
    हसितुम्: हस् (हसने) + तुमुन् → हस् + इ + तुम् = हसितुम् (हँसने के लिए)
  • २. गुण-कार्य और अनिट् व्यवस्था:
    गन्तुम्: गम् (गतौ) + तुमुन् → गम् + तुम् = गन्तुम् (जाने के लिए) (यहाँ म-कार को न-कार आदेश होता है)
    पातुम्: पा (पाने) + तुमुन् → पा + तुम् = पातुम् (पीने के लिए)
    शयितुम्: स्वप्/शीङ् धातु के संदर्भ में सोने के लिए शयितुम् पद बनता है।
    भोक्तुम्: भुज् (पालनाभ्यवहारयोः) + तुमुन् → भोक् + तुम् = भोक्तुम् (भोजन करने/खाने के लिए) (यहाँ 'चोः कुः' सूत्र से ज-कार को ग-कार और फिर क-कार होता है)

ग) व्यावहारिक वाक्य प्रयोग

उद्देश्यवाचक कृदन्त पद वाक्य की मुख्य क्रिया (तिङ्) के सहायक के रूप में आते हैं और कर्ता के पुरुष या वचन बदलने पर भी अपने रूप को बदलते नहीं हैं।

  • वाक्य १ (एकवचन कर्ता के साथ):
    हिन्दी: वह खाने के लिए बैठता है।
    संस्कृत: सः खादितुम् (या भोक्तुम्) उपविशति।
  • वाक्य २ (बहुवचन कर्ता के साथ - अव्यय रूप का सातत्य):
    हिन्दी: वे सब पढ़ने के लिए विद्यालय जाते हैं।
    संस्कृत: ते पठितुम् विद्यालयं गच्छन्ति। (यहाँ कर्ता 'ते' बहुवचन है और मुख्य क्रिया 'गच्छन्ति' भी बहुवचन है, किन्तु उद्देश्यवाचक पद 'पठितुम्' अपरिवर्तित रहा।)
  • वाक्य ३ (समानकर्तृक प्रसंग):
    हिन्दी: राम जल पीने के लिए नदी पर गया।
    संस्कृत: रामः जलं पातुम् नदीं गतवान्।

धातु परिचय के लिए सारांश तालिका

मूल धातु विहित प्रत्यय निष्पन्न अव्यय पद हिन्दी अर्थ मुख्य उद्देश्यपरक वाक्य प्रयोग
खाद् तुमुन् खादितुम् खाने के लिए सः खादितुम् इच्छति।
पा तुमुन् पातुम् पीने के लिए सः जलं पातुम् गच्छति।
गम् तुमुन् गन्तुम् जाने के लिए सः गृहं गन्तुम् उद्यतः अस्ति।
पठ् तुमुन् पठितुम् पढ़ने के लिए अहं पठितुम् उपविशामि।

४. वर्तमानकालिक निरंतरता एवं विशेषण क्रियापद (Continuous Actions)

संस्कृत वाक्य-रचना में जब कोई क्रिया वर्तमान काल में जारी हो (Continuous action) और वह मुख्य क्रिया के साथ-साथ चल रही हो, तब महर्षि पाणिनि ने तिङ् प्रत्यय के बिना क्रिया की निरंतरता को व्यक्त करने के लिए शतृ और शानच् प्रत्ययों का विधान किया है।

ये प्रत्यय धातुओं को 'विशेषण-क्रियापद' (Participles) में बदल देते हैं। इसका अर्थ यह है कि ये पद वाक्य में क्रिया का अर्थ तो देते ही हैं, साथ ही कर्ता के लिंग, वचन और विभक्ति के अनुसार अपने रूप को भी बदलते हैं।

४.१ शतृ प्रत्यय (परस्मैपद धातुओं के लिए)

परस्मैपद की धातुओं (जैसे पठ्, गम्, खाद्, हस् आदि) से वर्तमान काल में निरंतरता का बोध कराने के लिए शतृ प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है।

• सूत्र: लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे (अष्टाध्यायी - ३.२.१२४)
सूत्रार्थ: लट् लकार (वर्तमान काल) के स्थान पर शतृ और शानच् प्रत्यय होते हैं, बशर्ते वे प्रथमा विभक्ति से भिन्न (अप्रथमा) किसी अन्य विभक्ति वाले शब्द के सामानाधिकरण (विशेषण) के रूप में प्रयुक्त हो रहे हों।
विशेष नोट: सूत्र 'तौ सत्' (अष्टाध्यायी - ३.२.१२७) से इन दोनों प्रत्ययों की 'सत्' संज्ञा होती है।
  • प्रत्यय स्वरूप: शतृ प्रत्यय में 'श्' (लशक्वतद्धिते सूत्र से) और 'ऋ' (उपदेशेऽजनुनासिक इत् से) की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। धातु के पीछे केवल 'अत्' शेष बचता है, जो पुल्लिंग रूपों में 'न्' (अन्) के रूप में दिखाई देता है।

क) प्रकृति-प्रत्यय विभाग एवं रूप-सिद्धि (पुल्लिंग एकवचन)

  • गच्छन्: गम् (गतौ) + शतृ → गच्छत् → गच्छन् (जाता हुआ / जाते हुए)
  • हसन्: हस् (हसने) + शतृ → हसत् → हसन् (हँसता हुआ / हँसते हुए)
  • खादन्: खाद् (भक्षणे) + शतृ → खादत् → खादन् (खाता हुआ / खाते हुए)

ख) क्रिया-विशेषण रूप में द्वित्व (जाते-जाते, हँसते-हँसते)

जब वर्तमानकालिक निरंतरता में अत्यंत तीव्रता या सातत्य दिखाना हो (जैसे "वह जाते-जाते रुक गया"), तो 'सर्वस्य द्वे' (अष्टाध्यायी - ८.१.१) नियम से शतृ प्रत्ययान्त पद को दो बार लिखा जाता है।

ग) व्यावहारिक वाक्य प्रयोग

  • वाक्य १ (सामान्य निरंतरता):
    हिन्दी: वह जाते-जाते रुक गया।
    संस्कृत: सः गच्छन् गच्छन् रुद्धवान् (या अतिष्ठत्)।
  • वाक्य २ (लिंग और वचन के अनुसार परिवर्तन):
    पुल्लिंग: पठन् बालकः गच्छति (पढ़ता हुआ बालक जाता है)।
    स्त्रीलिंग: पठन्ती बालिका गच्छति (पढ़ती हुई बालिका जाती है - यहाँ 'उगितश्च' सूत्र से ङीप् प्रत्यय होता है)।

४.३ क्रिया-विशेषण रूप में द्वित्व: चलते-चलते या जाते-जाते रुक जाने की संगति

जब वर्तमानकालिक कृदन्त प्रत्यय (शतृ) से युक्त पद वाक्य में किसी क्रिया की अत्यंत तीव्रता, सातत्य अथवा क्रिया के मध्य में ही किसी अन्य घटना के घटित होने को दर्शाते हैं, तो वहाँ क्रिया-विशेषणपरक भाव उत्पन्न होता है। लोकभाषा हिन्दी में इसे 'जाते-जाते', 'चलते-चलते' या 'हँसते-हँसते' के रूप में दुहराया जाता है। संस्कृत व्याकरण में इस प्रकार के प्रयोगों की पाणिनीय संगति अष्टाध्यायी के विशिष्ट नियमों पर आधारित है।

क) द्वित्व विधान संगति और मुख्य सूत्र

शतृ प्रत्ययान्त पद (जैसे गच्छन्, चलन्) जब वाक्य में दोहराए जाते हैं, तो उनके द्वित्व (double) होने की प्रक्रिया निम्नलिखित सूत्रों के सामंजस्य से सिद्ध होती है:

• अधिकार सूत्र: सर्वस्य द्वे (अष्टाध्यायी - ८.१.१)
सम्बद्ध सूत्र: नित्यवीप्सयोः (अष्टाध्यायी - ८.१.४)

सूत्रार्थ और संगति: 'नित्यवीप्सयोः' सूत्र स्पष्ट करता है कि 'नित्यता' (तदात्वे क्रियाप्रबन्धः - अर्थात् किसी क्रिया का लगातार जारी रहना या बीच में न टूटना) और 'वीप्सा' (व्याप्तुम् इच्छा - प्रत्येक अवयव में क्रिया का संबंध होना) प्रकट करने के लिए पद का द्वित्व होता है।

'चलते-चलते रुक गया' वाक्य में 'चलन् चलन्' पद कर्ता की गति की उस निरंतरता (नित्यता) को दिखाता है जिसके ठीक बीच में 'रुकने' की क्रिया संपन्न हुई। अतः 'सर्वस्य द्वे' के अधिकार से संपूर्ण शतृ-प्रत्ययान्त पद को दो बार कहने का नियम यहाँ पूर्णतः संगति पाता है।

ख) पद की व्याकरणिक स्थिति: विशेषण से क्रिया-विशेषण की ओर

यद्यपि शतृ प्रत्ययान्त पद मूलतः कर्ता के विशेषण होते हैं, किन्तु जब वे वाक्य में किसी मुख्य क्रिया की अवस्था या रीति (Manner of action) को स्पष्ट करते हैं, तब वे क्रिया-विशेषण (Adverbial participle) की तरह व्यवहार करने लगते हैं।

  • विभक्ति नियम: क्रिया-विशेषण पदों में पाणिनि नियम के अनुसार सामान्यतः प्रथमा या द्वितीया विभक्ति का प्रयोग संदर्भ के अनुसार स्थिर रहता है, तथा कर्ता के पुरुष या वचन का इस द्वित्व-पद के स्वरूप पर सीधा प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि यह मुख्य क्रिया की निरंतरता का द्योतक है।

ग) व्यावहारिक उदाहरण एवं वाक्य प्रयोग

  • १. चलते-चलते रुक जाना (गति की नित्यता):
    प्रकृति-प्रत्यय: चल् (चलने) + शतृ = चलत् → चलन् (पुल्लिंग एकवचन)।
    द्वित्व रूप: चलन् चलन्।
    वाक्य प्रयोग: सः मार्गे चलन् चलन् अकस्मात् अतिष्ठत् (या रुद्धवान्)।
    अर्थ: वह मार्ग में चलते-चलते अचानक रुक गया।
  • २. जाते-जाते देखना (मार्ग की निरंतरता):
    प्रकृति-प्रत्यय: गम् (गतौ) + शतृ = गच्छत् → गच्छन् (पुल्लिंग एकवचन)।
    द्वित्व रूप: गच्छन् गच्छन्।
    वाक्य प्रयोग: पथिकः गच्छन् गच्छन् मार्गपार्श्वे वृक्षान् पश्यति।
    अर्थ: राही जाते-जाते रास्ते के किनारे वृक्षों को देखता है।
  • ३. हँसते-हँसते बोलना (अवस्था का सातत्य):
    प्रकृति-प्रत्यय: हस् (हसने) + शतृ = hसत् → हसन् (पुल्लिंग एकवचन)।
    द्वित्व रूप: हसन् हसन्।
    वाक्य प्रयोग: शिशुः हसन् हसन् मधुरं वदति।
    अर्थ: बच्चा हँसते-हँसते मीठा बोलता है।

धातु परिचय हेतु सारांश विवरण

हिन्दी क्रिया-विशेषण रूप प्रयुक्त मूल धातु शतृ प्रत्ययान्त रूप पाणिनीय द्वित्व पद वाक्य में शास्त्रीय संगति
चलते-चलते चल् (गतौ) चलत् चलन् चलन् क्रिया की नित्यता (अष्टाध्यायी - ८.१.४)
जाते-जाते गम् (गतौ) गच्छत् गच्छन् गच्छन् मार्ग-क्रिया की निरन्तरता (अष्टाध्यायी - ८.१.४)
हँसते-हँसते हस् (हसने) हसत् हसन् हसन् रीति/अवस्थावाचक सातत्य (अष्टाध्यायी - ८.१.४)

४.२ शानच् प्रत्यय (आत्मनेपद धातुओं के लिए)

आत्मनेपद की धातुओं (जैसे सेव्, लभ्, शीङ्, उप-विश आदि) से वर्तमान काल में निरंतरता या सातत्य का बोध कराने के लिए शानच् प्रत्यय का विधान किया गया है।

• सूत्र: लटः शतृशानचावप्रथमासमानाधिकरणे (अष्टाध्यायी - ३.२.१२४)
सम्बद्ध सूत्र: आने मुक् (अष्टाध्यायी - ७.२.८२)
  • प्रत्यय स्वरूप: शानच् प्रत्यय में 'श्' (लशक्वतद्धिते से) और 'च्' (हलन्त्यम् से) की इत्संज्ञा होकर लोप होता है। केवल 'आन' शेष बचता है।
  • मुक्-आगम (मान): अकारान्त अङ्ग के बाद 'आन' आने पर सूत्र 'आने मुक्' (अष्टाध्यायी - ७.२.८२) से 'म्' का आगम होता है, जिससे यह 'मान' के रूप में बदल जाता है।

क) प्रकृति-प्रत्यय विभाग एवं रूप-सिद्धि (पुल्लिंग एकवचन)

  • शयानः: शीङ् (स्वप्ने/सोना) + शानच् → शे + आन → शयानः (सोता हुआ / सोते हुए)
  • उपविशमानः: उप + विश् (बैठना) + शानच् → उपविश + म् + आन = उपविशमानः (बैठता हुआ / बैठते हुए)
  • मोदमानः: मुद् (हर्षे/प्रसन्न होना) + शानच् → मोद + म् + आन = मोदमानः (प्रसन्न होता हुआ)

ख) व्यावहारिक वाक्य प्रयोग

  • वाक्य १ (सोते हुए क्रिया का सातत्य):
    हिन्दी: वह सोते हुए (सोता हुआ) खाता है।
    संस्कृत: सः शयानः खादति।
  • वाक्य २ (बैठते हुए देखना):
    हिन्दी: वह बैठते हुए देखता है।
    संस्कृत: सः उपविशमानः पश्यति।

धातु परिचय के लिए वर्तमानकालिक सातत्य तालिका

मूल धातु धातु का पद विहित प्रत्यय निष्पन्न पद (पुल्लिंग) स्त्रीलिंग रूप हिन्दी अर्थ
गम् परस्मैपद शतृ गच्छन् गच्छन्ती جاتا हुआ
हस् परस्मैपद शतृ हसन् हसन्ती हँसता हुआ
शीङ् (सोना) आत्मनेपद शानच् शयानः शयाना सोता हुआ / सोते हुए
उप-विश् आत्मनेपद शानच् उपविशमानः उपविशमाना बैठता हुआ / बैठते हुए

५. भूतकाल एवं विधि (चाहिए) के अर्थ में तिङ् का विकल्प

संस्कृत वाक्य-संरचना में भूतकाल (Past Tense) तथा विधि (चाहिए/Should) के अर्थ को प्रकट करने के लिए क्रमशः लङ् लकार (जैसे: अभवत्, अस्वपत्) तथा विधिलिङ् लकार (जैसे: पठेत्, गच्छेत्) जैसे आख्यात (तिङ्) पदों का विधान है। किन्तु भाषा को सरल, सुबोध और संक्षिप्त बनाने के लिए महर्षि पाणिनि ने कृदन्त प्रत्ययों के अंतर्गत ऐसे सुदृढ़ विकल्प दिए हैं, जो बिना किसी तिङ् प्रत्यय के भी स्वयं वाक्य के मुख्य क्रियापद की भूमिका निभाते हैं।

५.१ भूतकालिक कृदंत (क्तवतु/क्त)

भूतकाल की क्रिया को व्यक्त करने के लिए लङ्, लुङ् या लिट् लकारों के तिङन्त रूपों के स्थान पर क्तवतु (कर्तृवाच्य में) तथा क्त (कर्मवाच्य/भाववाच्य में) प्रत्ययों का स्वतंत्र क्रियापद के रूप में बहुतायत से प्रयोग होता है।

• संज्ञा सूत्र: क्तक्तवतू निष्ठा (अष्टाध्यायी - १.१.२६)
सूत्रार्थ: 'क्त' और 'क्तवतु' इन दोनों प्रत्ययों की व्याकरण में 'निष्ठा' संज्ञा होती है।
काल विधाता सूत्र: भूते (अष्टाध्यायी - ३.२.८४) तथा निष्ठातयोः के साहचर्य से भूतकाल के अर्थ में धातुओं से निष्ठा (क्त, क्तवतु) प्रत्यय होते हैं।

तिङ् के विकल्प के रूप में महत्ता: तिङ् प्रत्ययों में भूतकाल के रूप (जैसे: अगात्, अभूत्) थोड़े जटिल होते हैं, जबकि निष्ठा प्रत्यय लगाकर बने रूप अत्यंत सरल होते हैं। इनके रूप कर्ता या कर्म के लिंग और वचन के अनुसार चलते हैं।

क) क्तवतु प्रत्यय (कर्तृवाच्य - Active Voice)

इसमें 'क्' और 'उ' की इत्संज्ञा होकर लोप होता है, 'वत्' शेष बचता है जो पुल्लिंग प्रथमा एकवचन में 'वान्' हो जाता है।

  • सुप्तवान्: स्वप् (शये/सोना) + क्तवतु → सुप् (सम्प्रसारण होकर) + इ (आगम) + वान् = सुप्तवान् (सो गया)। (यह लङ् लकार के रूप अस्वपत् का सटीक विकल्प है)
  • गतवान्: गम् (गतौ/जाना) + क्तवतु → ग + वान् = गतवान् (चला गया)। (यह लङ् लकार के रूप अगच्छत् का सटीक विकल्प है)

ख) क्त प्रत्यय (कर्मवाच्य/भाववाच्य - Passive/Impersonal Voice)

इसमें 'क्' का लोप होकर केवल 'त' शेष बचता है। अकर्मक धातुओं से यह भाववाच्य में प्रयुक्त होता है।

  • सुप्तम्: स्वप् + क्त = सुप्तम् (सोया गया - भाववाच्य)
  • गतः: गम् + क्तः = तः → गतः (गया - कर्मवाच्य/भाववाच्य)

ग) व्यावहारिक वाक्य प्रयोग

  • उदाहरण १ (क्तवतु - स्वतंत्र मुख्य क्रियापद):
    हिन्दी: वह खा-पीकर सो गया।
    संस्कृत: सः खादित्वा पीत्वा च सुप्तवान्। (यहाँ 'सुप्तवान्' बिना तिङ् के वाक्य पूर्ण कर रहा है)
  • उदाहरण २ (लङ् लकार का विकल्प):
    हिन्दी: वह घर गया।
    संस्कृत: सः गृहं गतवान्। (तिङन्त रूप सः गृहं अगच्छत् के समानार्थक)

५.२ कृत्य प्रत्यय (तव्यत्, अनीयर्, यत्)

'चाहिए' या 'योग्य' (Should/Ought to) के अर्थ में विधिलिङ् लकार के स्थान पर जिन कृत् प्रत्ययों का विधान किया गया है, उन्हें कृत्य प्रत्यय कहा जाता है। ये सदैव कर्मवाच्य या भाववाच्य में ही प्रयुक्त होते हैं।

• सूत्र: तव्यत्तव्यानीयरः (अष्टाध्यायी - ३.१.९६) तथा कृत्याश्च (अष्टाध्यायी - ३.१.९५)
सूत्रार्थ: धातुओं से चाहिए और योग्यता के अर्थ में तव्यत्, तव्य और अनीयर् प्रत्यय होते हैं। (यत्, ण्यत्, क्यप् भी कृत्य संज्ञक हैं)।
वाच्य नियम: तयोरेव कृत्यक्तखलर्थाः (अष्टाध्यायी - ३.४.७०) – कृत्य प्रत्यय केवल भाव (Impersonal) और कर्म (Passive) में ही होते हैं, कर्ता में नहीं। अतः इनके प्रयोग में कर्ता हमेशा तृतीया विभक्ति में होता है।

क) प्रकृति-प्रत्यय विभाग एवं रूप-सिद्धि

  • तव्यत् प्रत्यय: 'त्' का लोप होकर 'तव्य' शेष रहता है।
    गन्तव्यम्: गम् + तव्यत् = गन्तव्यम् (जाना चाहिए - नपुंसकलिंग प्रथमा एकवचन, भाववाच्य)।
    पठितव्यम्: पठ् + इ + तव्यत् = पठितव्यम् (पढ़ना चाहिए)।
  • अनीयर् प्रत्यय: 'र्' का लोप होकर 'अनीय' शेष रहता है।
    पठनीयम्: पठ् + अनीयर् = पठनीयम् (पढ़ने योग्य / पढ़ना चाहिए)।
    गमनीयम्: गम् + अनीयर् = गमनीयम् (जाने योग्य / जाना चाहिए)।

ख) व्यावहारिक वाक्य प्रयोग

  • उदाहरण १ (भाववाच्य में विधिलिङ् का विकल्प):
    हिन्दी: मुझे जाना चाहिए।
    संस्कृत (कृदन्त): मया गन्तव्यम् (या गमनीयम्)। (तिङन्त रूप अहं गच्छेयम् का विकल्प)।
  • उदाहरण २ (कर्मवाच्य में विधिलिङ् का विकल्प):
    हिन्दी: राम को ग्रन्थ पढ़ना चाहिए।
    संस्कृत (कृदन्त): रामेण ग्रन्थः पठितव्यः (या पठनीयः)। (तिङन्त रूप रामेण ग्रन्थः पठ्येत का सरल विकल्प)।

धातु परिचय के लिए तिङ्-विकल्प सारांश तालिका

मूल धातु विहित कृत् प्रत्यय निष्पन्न कृदन्त रूप वाच्य व्यवस्था वैकल्पिक तिङन्त (लकार) रूप
स्वप् (सोना) क्तवतु सुप्तवान् कर्तृवाच्य अस्वपत् (लङ् लकार)
गम् (जाना) क्तवतु गतवान् कर्तृवाच्य अगच्छत् (लङ् लकार)
गम् (जाना) तव्यत् गन्तव्यम् भाववाच्य गच्छेत् / गम्येत (विधिलिङ्)
पठ् (पढ़ना) अनीयर् पठनीयः / पठनीयम् कर्म / भाव पठेत् / पठ्येत (विधिलिङ्)

६. भाववाचक कृदन्त और क्रियाओं के नाम (Gerunds/Verbal Nouns)

संस्कृत भाषा में जब किसी क्रिया को उसके काल या पुरुष के बंधन से मुक्त करके केवल एक 'गतिविधि', 'भाव' या 'संज्ञा' (Noun) के रूप में व्यक्त करना हो, तो उसे भाववाचक कृदन्त कहते हैं। लोकभाषा में जब हम "खाना", "पीना", "पढ़ना" या "खेलना" शब्दों का प्रयोग किसी वाक्य की मुख्य क्रिया की तरह नहीं, बल्कि एक विषय या गतिविधि के नाम (जैसे: Eating, Drinking) की तरह करते हैं, तब पाणिनि व्याकरण में विशिष्ट भाव-प्रत्ययों का आश्रय लिया जाता है।

६.१ ल्युट् (अनम्) प्रत्यय का विधान

धातुओं से उनके शुद्ध क्रिया-भाव को संज्ञा रूप देने के लिए महर्षि पाणिनि ने मुख्य रूप से ल्युट् प्रत्यय का विधान किया है। इसके द्वारा निष्पन्न शब्द सदा नपुंसकलिंग एकवचन में प्रयुक्त होते हैं।

• सूत्र: नपुंसके भावे क्तः (अष्टाध्यायी - ३.३.११४) तथा ल्युट् च (अष्टाध्यायी - ३.३.११५)
सूत्रार्थ: धातु के अर्थ मात्र को प्रकट करने के लिए (अर्थात क्रिया के भाव को संज्ञा बनाने के लिए) धातु से नपुंसकलिंग में 'क्त' और 'ल्युट्' प्रत्यय होते हैं।
  • प्रत्यय स्वरूप और संधि-कार्य: ल्युट् प्रत्यय में 'ल्' (लशक्वतद्धिते से) और 'ट्' (हलन्त्यम् से) की इत्संज्ञा होकर लोप हो जाता है। केवल 'यु' शेष बचता है। इसके पश्चात् सूत्र 'युवोरनाको' (अष्टाध्यायी - ७.१.१) से 'यु' के स्थान पर 'अन्' (अनम्) आदेश हो जाता है।

प्रकृति-प्रत्यय विभाग एवं रूप-सिद्धि:

  • खादनम्: खाद् (भक्षणे) + ल्युट् → खाद् + अन् + सु (नपुंसकलिंग) = खादनम् (खाना / Eating)
  • पानम्: पा (पाने) + ल्युट् → पा + अन् → पानम् (पीना / Drinking)
  • हसनम्: हस् (हसने) + ल्युट् → हस् + अन् → हसनम् (हँसना / Laughing)
  • कूर्दनम्: कूर्द् (कूर्दने) + ल्युट् → कूर्द् + अन् → कूर्दनम् (कूदना / Jumping)
  • पठनम्: पठ् (व्यक्तायां वाचि) + ल्युट् → पठ् + अन् → पठनम् (पढ़ना / Reading)
  • क्रीडनम्: क्रीड् (विहारे) + ल्युट् → क्रीड् + अन् → क्रीडनम् (खेलना / Playing)

६.२ व्यावहारिक प्रयोग: वाक्यों में गतिविधियों का एक साथ चलना

जब किसी प्रसंग या उत्सव (जैसे पिकनिक, मेला आदि) में कई गतिविधियाँ संज्ञा के रूप में एक साथ चल रही हों, तो इन ल्युट्-प्रत्ययान्त पदों को आपस में 'च' (और) अव्यय से जोड़कर वाक्य की मुख्य क्रिया के साथ संबद्ध किया जाता है।

व्यावहारिक वाक्य प्रयोग:

  • हिन्दी वाक्य: पिकनिक में खाना-पीना, हँसना-कूदना, पढ़ना-खेलना सबकुछ साथ-साथ चल रहा था।
  • संस्कृत अनुवाद: आमोदयात्रायाम् (पिकनिक में) खादनं पानं, हसनं कूर्दनं, पठनं क्रीडनम् च सर्वं सहैव चलति स्म (या अचलत्)।

इस प्रयोग की व्याकरणिक विशेषता:

यहाँ 'खादनम्', 'पानम्' आदि पद किसी काल के अधीन नहीं हैं। ये वाक्य के उद्देश्य (Subject) या गतिविधियों की सूची की तरह व्यवहार कर रहे हैं, जिनकी मुख्य क्रिया अंत में प्रयुक्त 'चलति स्म' (चल रहा था) है। इस प्रकार ल्युट् प्रत्यय धातुओं को अत्यंत सहजता से संज्ञापदों में रूपांतरित कर देता है।

धातु परिचय के लिए भाववाचक संज्ञा तालिका

मूल धातु विहित प्रत्यय 'युवोरनाको' आदेश निष्पन्न संज्ञा पद व्यावहारिक हिन्दी अर्थ
खाद् ल्युट् अन् खादनम् खाने की क्रिया / खाना
पा ल्युट् अन् पानम् पीने की क्रिया / पीना
हस् ल्युट् अन् हसनम् हँसने की क्रिया / हँसना
कूर्द् ल्युट् अन् कूर्दनम् कूदने की क्रिया / कूदना

७. कृदन्त पदों में समाहार द्वन्द्व समास (Compound Verbal Forms)

७.१ 'चार्थे द्वन्द्वः' (अष्टाध्यायी २.२.२९) एवं समाहार नियम

संस्कृत व्याकरण में जब दो या दो से अधिक कृदन्त पदों (जो प्रत्यय लगकर संज्ञा या अव्यय बन चुके हैं) के अर्थ को एक समूह या समुदाय के रूप में दिखाना हो, तो वहाँ समाहार द्वन्द्व समास होता है।

• सूत्र: चार्थे द्वन्द्वः (अष्टाध्यायी - २.२.२९)
समाहार नियम: जब 'च' के अर्थ में विद्यमान सुबन्त पदों का समूह (समाहार) प्रधान होता है, तो वह समाहार द्वन्द्व कहलाता है।
लिंग और वचन विधान: द्वन्द्वश्च प्राणितूर्यसेनाङ्गानाम् (अष्टाध्यायी - २.४.२) आदि नियमों तथा स नपुंसकम् (अष्टाध्यायी - २.४.१७) एवं एकवद्भाव नियमों के सामर्थ्य से समाहार द्वन्द्व समास से बना समस्त पद सदा नपुंसकलिंग एकवचन में ही प्रयुक्त होता है।

७.२ व्यावहारिक उदाहरण

जब भूतकालिक कृदन्त या क्रियापरक संज्ञाएँ आपस में मिलकर एक ही संयुक्त क्रिया-व्यापार या अवस्था के समूह को दर्शाती हैं, तो उनके समाहार द्वन्द्व के रूप इस प्रकार बनते हैं:

१. कृताकृतम् (कर करके और न करके / आधा-अधूरा कार्य)

  • लौकिक विग्रह: कृतं च अकृतं च, तयोः समाहारः = कृताकृतम्
  • व्याकरण: कृ (करणे) + क्त = कृतम्। न कृतम् = अकृतम्। दोनों निष्ठा पदों का समाहार द्वन्द्व होकर नपुंसकलिंग एकवचन रूप सिद्ध होता है।
  • वाक्य प्रयोग: सः कार्यं कृताकृतम् कृत्वा गतः। (वह कार्य को करके-अनकरके अर्थात् आधा-अधूरा छोड़कर ही चला गया।)

२. शयितोत्थितम् (सोना और उठना / सोकर उठने की निरंतर क्रिया)

  • लौकिक विग्रह: शयितं च उत्थितं च, तयोः समाहारः = शयितोत्थितम्
  • व्याकरण: स्वप्/शीङ् धातु से क्त प्रत्यय होकर 'शयितम्' (सोया हुआ) तथा उद् + स्था + क्त से 'उत्थितम्' (उठा हुआ) बनता है।
  • वाक्य प्रयोग: ज्वरकारणात् तस्य शयितोत्थितम् कष्टकरं जातम्। (बुखार के कारण उसका सोना और उठना कष्टप्रद हो गया है।)

७.३ 'आख्यातमाख्यातेन क्रियासातत्ये' (अष्टाध्यायी २.१.७२)

जब दो तिङन्त क्रियापद (आख्यात) आपस में जुड़कर किसी क्रिया की निरंतरता (क्रियासातत्य) या तात्कालिक अवस्था को प्रकट करते हैं, तो महर्षि पाणिनि ने उनके लिए मयूरव्यंसकादि गण के अंतर्गत एक विशेष समास विधान किया है।

• सूत्र: आख्यातमाख्यातेन क्रियासातत्ये (अष्टाध्यायी - २.१.७२)
सूत्रार्थ: क्रिया की निरंतरता (सातत्य) अर्थ प्रकट हो रहा हो, तो एक आख्यात (तिङ् क्रियापद) का दूसरे आख्यात के साथ समास होता है, और वह तत्पुरुष (मयूरव्यंसकादि) समास के अंतर्गत अव्यय समस्त पद की तरह व्यवहार करता है।

खादताशिखतम् के स्थान पर प्रामाणिक पाणिनीय उदाहरण:

१. पिबतखादता (पीने और खाने की निरंतर क्रिया)

  • लौकिक विग्रह: पिबत च खादत च इति सततम् प्रवृत्तिः = पिबतखादता
  • व्याकरण: पा (पीना) धातु का लोट् लकार मध्यम पुरुष बहुवचन रूप 'पिबत' तथा खाद् (खाना) का रूप 'खादत' है। इन दो आख्यातों का क्रिया की निरंतरता में समास होकर महाभाष्यकार के अनुसार 'पिबतखादता' (अव्ययवद् रूप) बनता है।
  • वाक्य प्रयोग: उत्सवे पिबतखादता प्रावर्तत। (उत्सव में लगातार पीना और खाना चलता रहा।)

२. उत्पचविपचा (लगातार पकाने की क्रिया)

  • लौकिक विग्रह: उत्पच च विपच च इति सततम् प्रवृत्तिः = उत्पचविपचा
  • व्याकरण: उद् + पच् (लोट् मध्यम पुरुष एकवचन 'उत्पच') तथा वि + पच् ('विपच') का क्रियासातत्य अर्थ में समास होता है।
  • वाक्य प्रयोग: यज्ञशालायाम् उत्पचविपचा अभवत्। (यज्ञशाला में लगातार भोजन पकाने की क्रिया चलती रही।)

३. छिन्धिभिन्दी (काटने और तोड़ने की तीव्र क्रिया)

  • लौकिक विग्रह: छिन्धि च भिन्धि च इति सततम् प्रवृत्तिः = छिन्धिभिन्दी
  • व्याकरण: छिद् (काटना) धातु का लोट् मध्यम पुरुष एकवचन 'छिन्धि' तथा भिद् (तोड़ना) का 'भिन्धि' रूप है।
  • वाक्य प्रयोग: युद्धक्षेत्रे छिन्धिभिन्दी अभवत्। (युद्धक्षेत्र में लगातार काटने और तोड़ने की मारामारी चलती रही।)

धातु परिचय हेतु समाहार एवं आख्यात-समास तालिका

समस्त पद समास का प्रकार विग्रह स्वरूप प्रकट होने वाला क्रिया-भाव
कृताकृतम् समाहार द्वन्द्व कृतं च अकृतं च किसी कार्य की दुविधा या अधूरी अवस्था
शयितोत्थितम् समाहार द्वन्द्व शयितं च उत्थितं च सोने और जागने का दैनिक चक्र
पिबतखादता आख्यात-समास पिबत च खादत च खान-पान की अनवरत गतिविधि
छिन्धिभिन्दी आख्यात-समास छिन्धि च भिन्धि च काटने-तोड़ने की आक्रामक निरंतरता

८. धातु-परिचय के अनिवार्य पूरक तत्व

८.१ १० गण व्यवस्था: भ्वादि से चुरादि तक धातुओं का विभाजन

महर्षि पाणिनि ने संस्कृत भाषा की लगभग २००० मूल धातुओं को उनकी प्रकृति, विकरण (प्रत्यय और धातु के बीच आने वाला तत्व) तथा रूपात्मक समानताओं के आधार पर १० मुख्य गणों में विभाजित किया है। प्रत्येक धातु के परिचय में उसके गण का उल्लेख करना परम आवश्यक है:

  • १. भ्वादिगण (भू आदि): यह सबसे बड़ा गण है। इसमें 'भू' (होना) पहली धातु है। इसमें सूत्र 'कर्तरि शप्' (अष्टाध्यायी - ३.१.६८) से 'शप्' (अ) विकरण लगता है। (जैसे: पठति, भवति)।
  • २. अदादिगण (अद् आदि): इसमें 'अद्' (खाना) पहली धातु है। सूत्र 'अदिप्रभृतिभ्यः शपः' (अष्टाध्यायी - २.४.७२) से यहाँ विकरण 'शप्' का लुक (लोप) हो जाता है। (जैसे: अत्ति, वक्ति)।
  • ३. जुहोत्यादिगण (हु आदि): इसमें 'हु' (दान और हवन) पहली धातु है। सूत्र 'जुहोत्यादिभ्यः श्लुः' (अष्टाध्यायी - २.४.७५) से यहाँ विकरण का 'श्लु' (लोप होकर धातु को द्वित्व) हो जाता है। (जैसे: जुहोति, ददाति)।
  • ४. दिवादिगण (दिव् आदि): इसमें 'दिव्' (क्रीड़ा/चमकना) पहली धातु है। सूत्र 'दिवादिभ्यः श्यन्' (अष्टाध्यायी - ३.१.६९) से यहाँ 'श्यन्' (य) विकरण लगता है। (जैसे: दीव्यति, नृत्यति)।
  • ५. स्वादिगण (सु आदि): इसमें 'सु' (अभिषव/रस निकालना) पहली धातु है। सूत्र 'स्स्वादिभ्यः श्नुः' (अष्टाध्यायी - ३.१.७३) से यहाँ 'श्नु' (नु) विकरण जुड़ता है। (जैसे: सुनोति, आप्नोति)।
  • ६. तुदादिगण (तुद् आदि): इसमें 'तुद्' (व्यथा देना) पहली धातु है। इसमें सूत्र 'तुदादिभ्यः शः' (अष्टाध्यायी - ३.१.७७) से 'श' (अ) विकरण लगता है, किन्तु इसमें धातु के स्वर को गुण-कार्य नहीं होता। (जैसे: तुदति, लिखति)।
  • ७. रुधादिगण (रुध् आदि): इसमें 'रुधँ' (आवरण/रोकना) पहली धातु है। सूत्र 'रुधादिभ्यः श्नम्' (अष्टाध्यायी - ३.१.७८) से यहाँ धातु के भीतर उपधा में 'श्नम्' (न) का आगम होता है। (जैसे: रुणद्धि, भिनत्ति)।
  • ८. तनादिगण (तन् आदि): इसमें 'तनुँ' (विस्तार करना) पहली धातु है। सूत्र 'तनादिकृञ्भ्यः उः' (अष्टाध्यायी - ३.१.७९) से यहाँ 'उ' विकरण लगता है। (जैसे: तनोति, करोति)।
  • ९. क्र्यादिगण (क्री आदि): इसमें 'क्रीञ्' (द्रव्य विनिमय/खरीदना) पहली धातु है। सूत्र 'क्र्यादिभ्यः श्ना' (अष्टाध्यायी - ३.१.८१) से यहाँ 'श्ना' (ना) विकरण जुड़ता है। (जैसे: क्रीणाति, जानाति)।
  • १०. चुरादिगण (चुर् आदि): इसमें 'चुरँ' (चोरी करना) पहली धातु है। सूत्र 'सत्यापपाश...चुरादिभ्यो णिच्' (अष्टाध्यायी - ३.१.२५) से यहाँ स्वार्थ में 'णिच' (इ) प्रत्यय लगता है, जिसके बाद शप् होता है। (जैसे: चोरयति, कथयति)।
  • ८.२ पद-व्यवस्था: परस्मैपद, आत्मनेपद और उभयपद का निर्धारण

    धातुओं से तिङ् प्रत्यय जोड़ते समय वे १८ प्रत्ययों में से किस वर्ग में जाएँगी, इसका निर्धारण पाणिनीय पद-व्यवस्था से होता है। प्रत्येक धातु के सामने उसका पद लिखना अनिवार्य होता है:

    • परस्मैपद (Parasmaipada): जिन धातुओं के रूप 'तिप्, तस्, झि...' प्रत्यय लगकर बनते हैं, वे परस्मैपद कहलाती हैं। इसका मूल नियम है—'शेषात् कर्तरि परस्मैपदम्' (अष्टाध्यायी - १.३.७८), अर्थात् आत्मनेपद के नियमों से बची हुई धातुओं से परस्मैपद होता है। (जैसे: पठति, गच्छति)।
    • आत्मनेपद (Ātmanepada): जिन धातुओं के रूप 'त, आताम्, झ...' प्रत्यय लगकर बनते हैं, वे आत्मनेपद कहलाती हैं। इसके मुख्य पाणिनीय नियामक सूत्र निम्नलिखित हैं:
      • अनुदात्तङित आत्मनेपदम् (अष्टाध्यायी - १.३.१२): जिस धातु के उपदेश में अनुदात्त स्वर या 'ङ्' की इत्संज्ञा हुई हो, उससे आत्मनेपद होता है। (जैसे: शीङ् → शेते, सेव् → सेवते)।
      • भावकर्मणोः (अष्टाध्यायी - १.३.१३): भाववाच्य और कर्मवाच्य के वाक्यों में सभी धातुओं से अनिवार्य रूप से आत्मनेपद के ही प्रत्यय लगते हैं।
    • उभयपद (Ubhayapada): कुछ धातुएँ दोनों पदों में चलती हैं। इनका पद-निर्धारण इस पाणिनीय सूत्र से होता है:
      • स्वरितञितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले (अष्टाध्यायी - १.३.७२): जिस धातु के उपदेश में स्वरित स्वर या 'ञ्' की इत्संज्ञा हुई हो, उससे तब आत्मनेपद होता है जब क्रिया का फल सीधे कर्ता को मिल रहा हो (कर्त्रभिप्राय)। यदि क्रिया का फल किसी अन्य को मिले, तो उसी धातु से परस्मैपद हो जाता है। अतः ये धातुएँ उभयपदी कहलाती हैं। (जैसे: कृ धातु → करोति / कुरुते; यज् धातु → यजति / यजते)।

    धातु परिचय हेतु व्यावहारिक निदर्शन तालिका

    मूल धातु (उपदेश रूप) धातु का अर्थ निर्धारित गण पद व्यवस्था लट् लकार रूप (प्रथम पुरुष एकवचन)
    भू (सत्तायाम्) होना भ्वादि (१) परस्मैपद भवति
    शीङ् (स्वप्ने) सोना अदादि (२) आत्मनेपद शेते
    कृ (करणे) करना तनादि (८) उभयपद करोति / कुरुते
    चुर् (स्तेये) चुराना चुरादि (१०) उभयपद चोरयति / चोरयते

    ८.३ सेट्, अनिट् और वेट् व्यवस्था: प्रत्यय लगाते समय 'इट्' (इ) आगम के नियम

    संस्कृत व्याकरण में जब धातुओं के पीछे अर्धधातुक प्रत्यय (जैसे क्त्वा, तुमुन्, क्तवतु, तव्यत् आदि) लगाए जाते हैं, तो कुछ धातुओं और प्रत्ययों के बीच में 'इट्' (इ) का आगम होता है, जबकि कुछ में नहीं होता। धातु परिचय ग्रंथ में प्रत्येक धातु की पहचान इस 'इट्' आगम के आधार पर तीन श्रेणियों में की जाती है: सेट्, अनिट् और वेट्।

    क) त्रिविध शास्त्रीय व्यवस्था

  • १. सेट् (स + इट् = इट् सहित): जिन धातुओं के साथ प्रत्यय जोड़ते समय 'इट्' का आगम अनिवार्य रूप से होता है, उन्हें सेट् धातु कहते हैं।
    उदाहरण: हस् + क्त्वा = हसित्वा। यहाँ 'हस्' और 'त्वा' के बीच में 'इ' का आगम हुआ है। उसी प्रकार खाद् + तुमुन् = खादितुम्
  • २. अनिट् (अन् + इट् = इट् रहित): जिन धातुओं के साथ प्रत्यय जोड़ते समय 'इट्' का आगम कभी नहीं होता, उन्हें अनिट् धातु कहते हैं।
    उदाहरण: पा + क्त्वा = पीत्वा। यहाँ 'पा' और 'त्वा' के बीच कोई 'इ' नहीं आया। उसी प्रकार गम् + तुमुन् = गन्तुम्
  • ३. वेट् (वा + इट् = विकल्प से इट्): जिन धातुओं के साथ प्रत्यय जोड़ते समय 'इट्' का आगम विकल्प से (अर्थात् इच्छा होने पर हो भी सकता है और नहीं भी) होता है, उन्हें वेट् धातु कहा जाता है।
    उदाहरण: नश् (नष्ट होना) + क्त्वा = नशित्वा (इट् सहित) अथवा नंष्ट्वा (इट् रहित)। यहाँ दोनों रूप शुद्ध माने जाते हैं।
  • ख) मुख्य पाणिनीय सूत्र एवं नियम

    • मूल आगम सूत्र: आर्धधातुकस्येड्वलादेः (अष्टाध्यायी - ७.२.३५)
    सूत्रार्थ: 'वल्' प्रत्याहार (य् को छोड़कर सभी व्यंजन जैसे त, थ, व, म आदि) से शुरू होने वाले आर्धधातुक प्रत्ययों के परे रहते अंग को 'इट्' (इ) का आगम होता है। यह मूल रूप से सभी धातुओं को सेट् बनाने का नियम है।
    • निषेध सूत्र (अनिट् नियम): एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् (अष्टाध्यायी - ७.२.१०)
    सूत्रार्थ: जो धातुएँ अपने 'उपदेश' (मूल रूप) में एकाच् (एक स्वर वाली) हों और साथ ही अनुदात्त स्वर वाली हों, उन्हें वलादि आर्धधातुक प्रत्यय परे होने पर भी 'इट्' का आगम नहीं होता। इसी सूत्र के बल पर 'पा' (पीत्वा) और 'गम्' (गत्वा) जैसी धातुएँ अनिट् सिद्ध होती हैं।

    विकल्प सूत्र (वेट् नियम): उतो वृद्धिर्लुकि हलि के साहचर्य में स्वरतिसूतिसूयतिधूञ्युदितो वा (अष्टाध्यायी - ७.२.४४) आदि सूत्रों से उदित् (जिनके अंत में 'उ' की इत्संज्ञा हुई हो) धातुओं में विकल्प से 'इट्' होता है।

    धातु परिचय हेतु 'इट्' व्यवस्था सारांश तालिका

    मूल धातु धातु की श्रेणी प्रत्यय प्रयोग निष्पन्न कृदन्त पद 'इ' आगम की स्थिति
    हस् (हसने) सेट् हस् + क्त्वा हसित्वा अनिवार्य 'इ' आगम
    खाद् (भक्षणे) सेट् खाद् + तुमुन् खादितुम् अनिवार्य 'इ' आगम
    पा (पाने) अनिट् पा + क्त्वा पीत्वा 'इ' आगम का पूर्ण निषेध
    गम् (गतौ) अनिट् गम् + तव्यत् गन्तव्यम् 'इ' आगम का पूर्ण निषेध
    नश् (अदर्शने) वेट् नश् + क्त्वा नशित्वा / नंष्ट्वा 'इ' आगम विकल्प से

    निष्कर्ष एवं उपसंहार

    पाणिनीय व्याकरण की यह समग्र समीक्षा स्पष्ट करती है कि संस्कृत भाषा में क्रियापदों का विन्यास केवल तिङन्त (लकार व्यवस्था) तक ही सीमित नहीं है। तिङ् प्रत्ययों की अपनी कुछ प्राकृतिक सीमाएँ हैं, जैसे—लिंग भेद का सर्वथा अभाव होना, एक वाक्य में एक ही मुख्य क्रिया का आबद्ध होना तथा क्रिया को विशेषण या संज्ञा रूप देने में सर्वथा असमर्थ होना।

    महर्षि पाणिनि ने अष्टाध्यायी में कृत् प्रत्ययों की रचना करके क्रिया की अभिव्यक्ति को अभूतपूर्व विस्तार और क्रांतिकारी लचीलापन प्रदान किया है। हमने देखा कि:

    • 'आभीक्ष्ण्ये णमुल् च' और 'सर्वस्य द्वे' नियमों से क्त्वा और णमुल् प्रत्ययों का द्वित्व रूप क्रिया की आवृत्ति (बार-बार होना) को कितनी सहजता से प्रकट करता है।
    • शतृ-शानच् प्रत्यय वर्तमान काल की निरंतरता को दर्शाते हुए क्रिया को कर्ता के विशेषण में रूपांतरित कर देते हैं, तथा ल्युट् प्रत्यय क्रिया को शुद्ध संज्ञा का रूप (Gerunds) दे देता है।
    • समास के क्षेत्र में, समाहार द्वन्द्व और 'आख्यातमाख्यातेन क्रियासातत्ये' जैसे नियम दो अलग-अलग क्रिया-भावों को एक ही समस्त पद में पिरोकर भाषा को संक्षिप्त और अत्यंत अभिव्यंजक बनाते हैं।
    • अंत में, सेट्, अनिट् और वेट् की 'इ' आगम व्यवस्था धातुओं के आर्धधातुक रूपांतरण को गणितीय सटीकता प्रदान करती है।

    अतः, किसी भी धातु के वैज्ञानिक परिचय (धातु-परिचय) में इन कृदन्त और आख्यात नियमों का सम्यक् ज्ञान होना अनिवार्य है। कृत् प्रत्यय तिङन्त के पूरक और सुदृढ़ विकल्प दोनों हैं, जिनके बिना संस्कृत वाक्य-रचना और लोक-व्यवहार सर्वथा दुरूह हो जाता।

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