भारतीय ज्ञान-परम्परा की निरन्तरता में शब्दकोशों का योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण रहा है। शब्दकोश केवल शब्दों और उनके अर्थों का संग्रह मात्र नहीं होते, अपितु भाषा, साहित्य, संस्कृति तथा ज्ञान-विज्ञान के संरक्षण, संवर्धन और प्रसार के सशक्त माध्यम भी हैं। प्रत्येक शब्द अपने साथ किसी समाज की सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक अनुभव, बौद्धिक विकास तथा भाषिक परम्परा को semete रहता है। इस दृष्टि से शब्दकोश किसी भी भाषा की जीवंतता, समृद्धि और विकास का विश्वसनीय दर्पण माना जाता है।
संस्कृत विश्व की सर्वाधिक प्राचीन, वैज्ञानिक एवं समृद्ध भाषाओं में से एक है। भारतीय ज्ञान-परम्परा, दर्शन, साहित्य, आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, व्याकरण तथा विविध शास्त्रों का विशाल भण्डार इसी भाषा में सुरक्षित है। संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन, अनुवाद तथा व्यवहारिक प्रयोग में एक प्रामाणिक शब्दकोश की भूमिका सदैव केन्द्रीय रही है। यद्यपि संस्कृत का साहित्य अत्यन्त व्यापक एवं समृद्ध है, तथापि सामान्य जन, विद्यार्थी, अध्यापक, शोधार्थी तथा अनुवादक प्रायः इस कठिनाई का अनुभव करते हैं कि किसी हिन्दी शब्द के लिए उपयुक्त एवं प्रसंगानुकूल संस्कृत प्रतिशब्द सहजता से उपलब्ध नहीं हो पाता। अनेक हिन्दी शब्दों के भिन्न-भिन्न अर्थ तथा उनके अनुरूप संस्कृत में उपलब्ध विविध पर्यायों के कारण उपयुक्त शब्द का चयन और भी चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
इन्हीं आवश्यकताओं की पूर्ति तथा देववाणी संस्कृत को आधुनिक प्रौद्योगिकी के माध्यम से अधिक सुगम, सुलभ एवं व्यवहारोपयोगी बनाने के उद्देश्य से इस हिन्दी–संस्कृत डिजिटल शब्दकोश का निर्माण किया गया है। इसकी परिकल्पना विशेष रूप से विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के विद्यार्थियों, भाषा-शिक्षार्थियों, अध्यापकों, शोधार्थियों तथा संस्कृत-प्रेमियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर की गई है, ताकि संस्कृत अध्ययन को अधिक सरल, रुचिकर और प्रभावी बनाया जा सके।
वर्तमान डिजिटल युग में ज्ञान एवं सूचना तक त्वरित पहुँच समय की अनिवार्य आवश्यकता बन गई है। पारम्परिक मुद्रित शब्दकोश निःसन्देह अत्यन्त उपयोगी एवं प्रामाणिक हैं, किन्तु उनका आकार प्रायः बड़ा तथा भार अधिक होने के कारण उन्हें सदैव साथ रखना अथवा किसी आवश्यक शब्द को शीघ्रता से खोज पाना सहज नहीं होता। इसके विपरीत डिजिटल शब्दकोश कुछ ही क्षणों में वांछित शब्द तथा उसके उपयुक्त संस्कृत प्रतिशब्द उपलब्ध करा देता है। परिणामस्वरूप अध्ययन, अध्यापन, अनुवाद एवं दैनिक व्यवहार में न केवल समय और श्रम की बचत होती है, बल्कि संस्कृत भाषा का प्रयोग भी अधिक सरल, सहज और प्रभावी बन जाता है।
इसके अतिरिक्त आधुनिक विज्ञान, सूचना प्रौद्योगिकी, प्रशासन, banking, चिकित्सा तथा समकालीन जीवन से सम्बन्धित अनेक हिन्दी, तद्भव एवं विदेशी मूल के शब्दों के उपयुक्त संस्कृत प्रतिशब्द पारम्परिक कोशों में या तो उपलब्ध नहीं हैं अथवा अत्यन्त सीमित रूप में प्राप्त होते हैं। ऐसी स्थिति में समयानुकूल नवीन शब्दों, पारिभाषिक शब्दावली तथा व्यवहार में प्रचलित अभिव्यक्तियों का समावेश अनिवार्य हो जाता है। डिजिटल शब्दकोश का सबसे बड़ा लाभ यही है कि इसमें आवश्यकता के अनुसार नवीन प्रविष्टियों, पारिभाषिक शब्दों तथा आवश्यक संशोधनों को निरन्तर सम्मिलित एवं अद्यतन (Update) किया जा सकता है। फलतः यह न केवल संस्कृत की पारम्परिक शब्द-संपदा के संरक्षण का कार्य करता है, बल्कि आधुनिक भाषिक आवश्यकताओं के अनुरूप उसके सतत् विकास एवं विस्तार का भी प्रभावी माध्यम बनता है।
इन्हीं उद्देश्यों को दृष्टिगत रखते हुए प्रस्तुत हिन्दी–संस्कृत डिजिटल शब्दकोश का निर्माण किया गया है। इसमें हिन्दी के प्रचलित एवं व्यवहारोपयोगी शब्दों के लिए यथासम्भव प्रामाणिक संस्कृत प्रतिशब्दों का संकलन किया गया है। जहाँ किसी हिन्दी शब्द के एकाधिक अर्थ या प्रयोग प्रचलित हैं, वहाँ उनके अनुरूप विविध संस्कृत पर्याय प्रस्तुत किए गए हैं, जिससे उपयोगकर्ता प्रसंग, अर्थ तथा प्रयोग की अपेक्षा के अनुसार सर्वाधिक उपयुक्त शब्द का चयन कर सके।
शब्दकोश की विशेषताएँ
प्रस्तुत हिन्दी–संस्कृत डिजिटल शब्दकोश की एक प्रमुख विशेषता इसका संतुलित एवं व्यावहारिक स्वरूप है। इसके निर्माण में यह विशेष ध्यान रखा गया है कि यह न तो इतना विशाल हो कि सामान्य उपयोगकर्ता के लिए दुरूह एवं समयसाध्य बन जाए और न ही इतना संक्षिप्त कि उसकी व्यावहारिक आवश्यकताओं की समुचित पूर्ति न कर सके। शब्दों का चयन उनकी उपयोगिता, प्रचलन तथा शैक्षिक महत्त्व को दृष्टिगत रखते हुए किया गया है, जिससे यह अध्ययन, अध्यापन, अनुवाद तथा दैनिक व्यवहार—सभी के लिए समान रूप से उपयोगी सिद्ध हो सके।
यह केवल शब्दों एवं उनके अर्थों का संकलन मात्र नहीं है, बल्कि प्रत्येक प्रविष्टि के साथ व्याकरणिक जानकारी भी व्यवस्थित रूप से प्रदान की गई है। संज्ञा शब्दों के साथ उनका लिंग, विशेषण, सर्वनाम एवं अव्यय जैसे पद-प्रकारों का स्पष्ट निर्देश तथा आवश्यकतानुसार क्रियापदों के साथ उनकी मूल औपदेशिक धातु, उपसर्गयुक्त धातु, नामधातु, णिच् आदि व्याकरणिक संकेत भी दिए गए हैं। इससे उपयोगकर्ता शब्द के केवल अर्थ से ही नहीं, बल्कि उसके शुद्ध व्याकरणिक स्वरूप एवं प्रयोग से भी परिचित हो सकता है।
यह शब्दकोश विशेष रूप से विद्यालयों एवं महाविद्यालयों के विद्यार्थियों, भाषा-शिक्षार्थियों, अध्यापकों, शोधार्थियों, अनुवादकों तथा संस्कृत-प्रेमियों की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर विकसित किया गया है। गृहकार्य, निबन्ध-लेखन, संस्कृत अनुवाद, भाषण-लेखन, शोधकार्य तथा अन्य शैक्षिक गतिविधियों में उपयुक्त एवं प्रसंगानुकूल संस्कृत शब्दों के चयन के लिए यह एक सरल, सुबोध एवं प्रामाणिक डिजिटल संदर्भ-स्रोत के रूप में उपयोगी सिद्ध होगा।
इस शब्दकोश के माध्यम से संस्कृत की शास्त्रीय परम्परा और आधुनिक जीवन की व्यावहारिक आवश्यकताओं के मध्य एक सुदृढ़ सेतु स्थापित करने का प्रयास किया गया है। इसमें संस्कृत भाषा की व्याकरणिक शुद्धता एवं पारम्परिक मर्यादा को अक्षुण्ण रखते हुए समकालीन जीवन में प्रचलित हिन्दी, तद्भव, देशज तथा आवश्यक विदेशी मूल के शब्दों के उपयुक्त संस्कृत प्रतिशब्दों के साथ आधुनिक पारिभाषिक शब्दावली का भी यथासम्भव समावेश किया गया है। हमारा विश्वास है कि यह प्रयास संस्कृत को केवल अध्ययन की भाषा तक सीमित न रखकर व्यवहार, संप्रेषण तथा अभिव्यक्ति की एक समर्थ एवं जीवंत भाषा के रूप में प्रतिष्ठित करने में सहायक सिद्ध होगा।
शब्दकोश निर्माण पद्धति
इस शब्दकोश के निर्माण में शब्दों के चयन एवं उनके संस्कृत प्रतिशब्दों के निर्धारण के लिए प्रामाणिकता, व्यवहारिकता तथा भाषिक उपयोगिता—इन तीनों सिद्धान्तों का समन्वित रूप से अनुसरण किया गया है। प्रत्येक प्रविष्टि का चयन संस्कृत साहित्य, पारम्परिक कोश-परम्परा तथा आधुनिक हिन्दी के प्रचलित व्यवहार को आधार बनाकर किया गया है, जिससे शब्दकोश शास्त्रीय दृष्टि से प्रमाणिक होने के साथ-साथ व्यवहारोपयोगी भी बन सके।
जहाँ किसी हिन्दी शब्द के एकाधिक अर्थ अथवा प्रयोग प्रचलित हैं, वहाँ उसके अनुरूप अनेक संस्कृत पर्याय प्रस्तुत किए गए हैं। इसका कारण यह है कि भाषा में शब्द का चयन सदैव प्रसंग, शैली तथा अभिप्रेत अर्थ पर निर्भर करता है। अतः किसी एक हिन्दी शब्द के लिए दिए गए सभी संस्कृत पर्याय प्रत्येक सन्दर्भ में समान रूप से उपयुक्त हों, ऐसा आवश्यक नहीं है। उपयोगकर्ता को प्रसंग, अर्थ एवं अभिव्यक्ति की आवश्यकता के अनुसार उपयुक्त पर्याय का चयन करना अपेक्षित है।
शब्दों के चयन में लोक-प्रचलित एवं व्यवहारोपयोगी हिन्दी शब्दों को विशेष प्राथमिकता प्रदान की गई है। इस उद्देश्य से कठिन एवं अल्पप्रचलित तत्सम शब्दों की अपेक्षा दैनिक जीवन में प्रचलित हिन्दी, तद्भव तथा देशज शब्दों को मुख्य प्रविष्टियों के रूप में स्थान दिया गया है, जिससे सामान्य उपयोगकर्ता उन्हें सहजता से खोज सके। जहाँ किसी शब्द के एक से अधिक रूप प्रचलित हैं, वहाँ मानक हिन्दी रूप को ही आधार बनाया गया है; उदाहरणार्थ घुड़सवार को मानक रूप मानते हुए उसी के अन्तर्गत संस्कृत प्रतिशब्द दिए गए हैं।
शब्द-संग्रह का विस्तार केवल साहित्यिक शब्दावली तक सीमित नहीं रखा गया है। इसमें दैनिक व्यवहार में प्रयुक्त क्रियाओं, समकालीन जीवन में प्रचलित देशज, आगत एवं विदेशी मूल के शब्दों तथा विविध ज्ञान-विषयों से सम्बन्धित आवश्यक पारिभाषिक शब्दावली को भी यथासम्भव सम्मिलित किया गया है। साथ ही साहित्य, व्याकरण, दर्शन, आयुर्वेद, गणित, ज्योतिष, काव्यशास्त्र, अलंकार, नाटक, महाकाव्य, पुराण, स्मृति, संगीत, छन्दशास्त्र, वनस्पति विज्ञान तथा अन्य आधुनिक विषयों के उपयोगी शब्दों को भी इस शब्द-संग्रह में स्थान दिया गया है, जिससे यह शब्दकोश परम्परा और आधुनिकता—दोनों का संतुलित प्रतिनिधित्व कर सके।
साहित्य एवं पारम्परिक शास्त्रीय शब्दावली के अतिरिक्त इस शब्दकोश में सूचना प्रौद्योगिकी, प्रशासन, बैंकिंग एवं वित्त, चिकित्सा विज्ञान, गृह-उपकरण, वस्त्र-परिधान, पाक-कला तथा अन्य समकालीन विषयों से सम्बन्धित आवश्यक पारिभाषिक एवं व्यवहारोपयोगी शब्दों का भी यथासम्भव समावेश किया गया है। इस प्रकार यह शब्दकोश संस्कृत की पारम्परिक शब्द-संपदा को आधुनिक जीवन की भाषिक आवश्यकताओं से जोड़ते हुए अध्ययन, अध्यापन, अनुवाद तथा व्यवहार—सभी के लिए एक उपयोगी संदर्भ-स्रोत के रूप में विकसित किया गया है।
शब्दकोश के परिमार्जन एवं मानकीकरण में पाणिनीय व्याकरण के सिद्धान्तों का यथासम्भव अनुसरण किया गया है। शब्दों के चयन, प्रमाणीकरण एवं संस्कृत प्रतिशब्दों के निर्धारण के लिए अमरकोश, आप्टे संस्कृत–हिन्दी कोश, अभिधानचिन्तामणि, त्रिकाण्डशेष, हारावली, निरुक्त, निघण्टु, शब्दकल्पद्रुम तथा वाचस्पत्यम् जैसे पारम्परिक कोशों एवं ग्रन्थों का परामर्श लिया गया है। आधुनिक पारिभाषिक शब्दावली के लिए भारत सरकार के वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग (CSTT) द्वारा प्रकाशित शब्द-संग्रहॉं, संस्कृतभाषी की व्यावहारिक संस्कृत शब्दावली तथा अन्य प्रमाणभूत आधुनिक स्रोतों का भी आवश्यकतानुसार उपयोग किया गया है। शास्त्रीय एवं आधुनिक स्रोतों के इस समन्वित दृष्टिकोण ने शब्दकोश को प्रामाणिकता, व्यावहारिकता और समकालीन उपयोगिता—तीनों दृष्टियों से समृद्ध बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
डिजिटल स्वरूप एवं निरन्तर विकास
डिजिटल युग की आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखते हुए इस शब्दकोश को मोबाइल फ़ोन, टैबलेट तथा अन्य डिजिटल उपकरणों पर सरलतापूर्वक उपयोग करने योग्य बनाया गया है। इसकी तीव्र खोज (Search) सुविधा, देवनागरी यूनिकोड आधारित टंकण तथा सुव्यवस्थित शब्द-प्रविष्टियाँ उपयोगकर्ता को कम समय में वांछित शब्द एवं उसके उपयुक्त संस्कृत प्रतिशब्द तक पहुँचने में सहायता प्रदान करती हैं। इस प्रकार यह शब्दकोश अध्ययन, अध्यापन, अनुवाद तथा दैनिक व्यवहार में एक सरल, त्वरित एवं विश्वसनीय डिजिटल संदर्भ-स्रोत के रूप में उपयोगी सिद्ध होता है।
इस डिजिटल शब्दकोश का उद्देश्य केवल किसी मुद्रित शब्दकोश को इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्रस्तुत करना नहीं है, बल्कि आधुनिक तकनीक की सहायता से संस्कृत-अध्ययन, हिन्दी–संस्कृत अनुवाद तथा व्यावहारिक संस्कृत के प्रयोग को अधिक सरल, सुलभ एवं प्रभावी बनाना है। इसी दृष्टि से इसकी संरचना ऐसी रखी गई है कि उपयोगकर्ता न्यूनतम समय में अधिकतम उपयोगी एवं प्रामाणिक जानकारी प्राप्त कर सके।
डिजिटल माध्यम की सबसे बड़ी विशेषता उसका निरन्तर विकसित होते रहने का स्वभाव है। अतः यह शब्दकोश भी एक सतत् विकासशील परियोजना (Ongoing Project) है। समय-समय पर इसमें नवीन शब्दों, आधुनिक पारिभाषिक शब्दावली, आवश्यक संशोधनों तथा उपयोगकर्ताओं के सार्थक सुझावों का समावेश किया जाता रहेगा, जिससे इसकी प्रामाणिकता, उपयोगिता एवं समकालीनता निरन्तर बढ़ती रहे और यह संस्कृत-अध्ययन का एक अधिकाधिक समृद्ध एवं विश्वसनीय डिजिटल संसाधन बन सके।
ऐप में उपलब्ध सुविधाएँ
डिजिटल युग की आवश्यकताओं को दृष्टिगत रखते हुए इस शब्दकोश को पूर्णतः ऑफलाइन (Offline) उपयोग के लिए विकसित किया गया है। यह 32-बिट तथा 64-बिट—दोनों प्रकार के एंड्रॉयड उपकरणों का समर्थन करता है, जिससे अधिकांश मोबाइल उपकरणों पर इसका सहज उपयोग किया जा सकता है।
मुख्य पृष्ठ पर उपलब्ध त्वरित खोज-सुविधा के माध्यम से उपयोगकर्ता इच्छित हिन्दी, संस्कृत अथवा हिंग्लिश (Roman) में शब्द टंकित करते ही उससे सम्बन्धित प्रविष्टियाँ तत्काल प्राप्त कर सकता है। ऐप में उपलब्ध द्वि-दिशात्मक (⇄) सुविधा द्वारा हिन्दी से संस्कृत तथा संस्कृत से हिन्दी—दोनों दिशाओं में शब्दों की खोज सरलतापूर्वक की जा सकती है। इससे अध्ययन, अनुवाद तथा व्यावहारिक प्रयोग अधिक त्वरित एवं सुविधाजनक हो जाता है।
उपयोगकर्ता अपनी आवश्यकता के अनुसार महत्त्वपूर्ण शब्दों को पसंदीदा शब्द सूची (Favourite List) में सुरक्षित रख सकता है, जिससे उन्हें भविष्य में पुनः शीघ्रता से देखा जा सके। इसके अतिरिक्त, पूर्व में खोजे गए शब्द खोज इतिहास (Search History) में भी सुरक्षित रहते हैं, जिससे बार-बार प्रयुक्त शब्दों तक पहुँच और भी सरल हो जाती है।
यह शब्दकोश सन् 2019 में प्रकाशित हिन्दी–संस्कृत शब्दकोश ऐप का परिमार्जित एवं उन्नत संस्करण है। इसमें अनेक नवीन शब्दों एवं पारिभाषिक प्रविष्टियों का समावेश किया गया है तथा व्याकरणिक सूचनाओं का भी पर्याप्त विस्तार किया गया है। पहली बार डाउनलोड करने के पश्चात् ऐप में उपलब्ध रिफ्रेश (Refresh) सुविधा के माध्यम से समय-समय पर उपलब्ध कराए जाने वाले अद्यतनों (Updates) को प्राप्त किया जा सकता है, जिससे नवीन शब्दावली एवं आवश्यक संशोधन उपयोगकर्ताओं तक निरन्तर पहुँचते रहें।
शब्दकोश में खोज-सुविधा
इस शब्दकोश में संस्कृत शब्दों के रूप, वर्तनी तथा व्याकरणिक संकेतों को शास्त्रीय मानकों के अनुरूप प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है। अतः हिन्दी से संस्कृत तथा संस्कृत से हिन्दी—दोनों प्रकार की खोज में संस्कृत शब्दों का लेखन यथासम्भव शुद्ध रूप में करना अपेक्षित है। उदाहरणार्थ सङ्गतः, काञ्चनम् तथा हण्डिका जैसे शब्दों की खोज करते समय वर्गीय पञ्चमाक्षरों (ङ्, ञ्, ण्, न्, म्) का यथास्थान प्रयोग करना चाहिए।
खोज को अधिक सरल एवं उपयोगकर्ता-अनुकूल बनाने के उद्देश्य से नुक्तायुक्त अक्षरों (जैसे— क़, ख़, ग़, ज़, फ़ आदि) तथा उनके सामान्य रूपों (क, ख, ग, ज, फ) दोनों के माध्यम से शब्द खोजे जा सकते हैं। इसी प्रकार संस्कृत शब्दों की खोज देवनागरी के साथ-साथ हिंग्लिश (Roman Transliteration) के माध्यम से भी की जा सकती है।
शब्द-प्रविष्टियों की संरचना
साथ ही विद्यार्थियों एवं सामान्य उपयोगकर्ताओं की सुविधा को दृष्टिगत रखते हुए कुछ कठिन प्रातिपदिकों के स्थान पर उनके व्यवहार में अधिक प्रचलित प्रथमा-विभक्ति रूपों को ही प्रविष्टि के रूप में स्वीकार किया गया है। उदाहरणार्थ स्वामिन्, वाजिन्, कर्तृ तथा छेत्तृ के स्थान पर क्रमशः स्वामी, वाजी, कर्ता तथा छेत्ता रूपों का प्रयोग किया गया है, जिससे शब्दों की खोज, अध्ययन एवं व्यावहारिक प्रयोग अधिक सरल एवं सुगम हो सके।
इस शब्दकोश की प्रत्येक प्रविष्टि को व्याकरणिक दृष्टि से स्पष्ट, व्यवस्थित एवं उपयोगकर्ता-अनुकूल बनाने का प्रयास किया गया है। प्रत्येक संज्ञा शब्द के साथ उसका व्याकरणसम्मत लिंग—[पुं.], [स्त्री.] अथवा [नपुं.]—कोष्ठक में अंकित किया गया है। विशेषण, सर्वनाम, अव्यय आदि पदों का भी पृथक् निर्देश दिया गया है, जिससे शब्द के स्वरूप एवं प्रयोग को समझने में सुविधा हो।
जहाँ किसी हिन्दी शब्द के एक से अधिक संस्कृत प्रतिशब्द उपलब्ध हैं, वहाँ उन्हें स्पष्टता की दृष्टि से पाइप चिह्न (|) द्वारा पृथक्-पृथक् प्रदर्शित किया गया है, ताकि उपयोगकर्ता प्रसंगानुसार उपयुक्त पर्याय का चयन कर सके। क्रियार्थक शब्दों के लिए भाववाचक कृदन्त रूपों का प्रयोग किया गया है तथा प्रत्येक क्रियापद के साथ कोष्ठक में उसकी मूल औपदेशिक धातु, उपसर्गयुक्त धातु अथवा नामधातु का उल्लेख किया गया है। धातुओं के निरूपण में धातुपाठ के मानक रूपों का अनुसरण किया गया है, जिससे शब्दों का व्याकरणिक आधार भी स्पष्ट हो सके।
विशेषण, सर्वनाम तथा अव्यय आदि अन्य पद-प्रकारों का भी पृथक् निर्देश किया गया है। अनुवाद एवं प्रयोग की सुविधा के लिए विशेषणों को उनके प्रचलित प्रथमा-विभक्ति के विसर्गान्त रूपों में प्रस्तुत किया गया है। क्रियापदों के लिए लट्-लकार के रूपों (जैसे— पठति, लिखति) के स्थान पर व्याकरणसम्मत भाववाचक कृदन्त (Verbal Noun) रूपों (जैसे— पठनम्, लेखनम्) का प्रयोग किया गया है। ऐसे कृदन्त रूपों के साथ लिंग का कोई निर्देश नहीं दिया गया है, क्योंकि वे क्रियाभाव का बोध कराते हैं।
प्रत्येक क्रियापद के साथ कोष्ठक में उसकी मूल औपदेशिक धातु, उपसर्गयुक्त धातु तथा जहाँ अपेक्षित हो वहाँ नामधातु का भी स्पष्ट उल्लेख किया गया है। धातुओं के निरूपण में धातुपाठ के मानक औपदेशिक रूपों का अनुसरण किया गया है। साथ ही ध्वन्यात्मक अथवा संज्ञा-शब्दों से निष्पन्न धातुओं के साथ [नामधातु] का पृथक् संकेत भी दिया गया है, जिससे उनकी प्रकृति, व्युत्पत्ति तथा व्याकरणिक स्वरूप का यथार्थ ज्ञान प्राप्त हो सके।
उपसंहार
आशा है कि प्रस्तुत हिन्दी–संस्कृत डिजिटल शब्दकोश विद्यार्थियों, अध्यापकों, शोधार्थियों, लेखकों, अनुवादकों तथा संस्कृत-प्रेमियों के लिए एक प्रामाणिक, विश्वसनीय एवं उपयोगी संदर्भ-स्रोत सिद्ध होगा। हमारा विश्वास है कि यह संस्कृत भाषा के अध्ययन, अध्यापन, अनुवाद, लेखन तथा व्यावहारिक प्रयोग को अधिक सरल, सुगम और प्रभावी बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा के संरक्षण एवं संवर्धन में भी अपना विनम्र योगदान देगा।
यह डिजिटल शब्दकोश एक सतत् विकासशील परियोजना है। अतः विद्वानों, अध्यापकों तथा उपयोगकर्ताओं से प्राप्त होने वाले सुझावों, संशोधनों एवं उपयोगी परामर्शों का हार्दिक स्वागत है। प्राप्त सुझावों पर यथोचित विचार करते हुए समय-समय पर आवश्यक संशोधन एवं अद्यतन किए जाते रहेंगे, ताकि यह शब्दकोश निरन्तर अधिक समृद्ध, प्रामाणिक एवं व्यवहारोपयोगी बनता रहे। इस शब्दकोश के APP का निःशुल्क उपयोग करने के इच्छुक व्यक्ति इस ब्लॉग पोस्ट के कमेंट में आवश्यक जानकारी उपलब्ध करा दें अथवा मुझे फोन करें।





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