इस भाग में सार्वभौम संस्कृत प्रचार संस्थानम्, वाराणसी के संस्थापक, प्रसिद्ध मनीषी पंडित वासुदेव द्विवेदी शास्त्री जी द्वारा रचित कतिपय गीत दिए गए हैं। पंडित वासुदेव द्विवेदी जी आधुनिक संस्कृत जगत के उन महान राष्ट्रभक्त कवियों और युगद्रष्टाओं में शीर्षस्थ हैं, जिन्होंने संस्कृत को जन-आंदोलन बनाकर घर-घर पहुँचाने में अपना संपूर्ण जीवन समर्पित कर दिया। आपने संस्कृत भाषा को कठिन व्याकरण के बंधनों से मुक्त कर उसे अत्यंत सरल, सुबोध और व्यावहारिक रूप दिया ताकि सामान्य जन भी इसे आसानी से आत्मसात् कर सके। आपके द्वारा रचित प्रसिद्ध गीतिकाव्यों में 'संस्कृत-गीत-लहरी' राष्ट्रभक्ति, समाज-सुधार और भाषा-गौरव से ओत-प्रोत मधुर गीतों का एक अत्यंत लोकप्रिय संकलन है। इसके अतिरिक्त आपके गीतों और कविताओं का एक अनूठा संग्रह 'सार्वभौम-पद्य-पुष्पांजलिः'है, जिसमें समकालीन राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक समरसता को बहुत ही सरल भाषा और गेय छंदों में पिरोया गया है। इसी श्रृंखला में 'संस्कृत-प्रचार-गीतिका' आपके उन ओजस्वी गीतों का संकलन है जो देश-विदेश में संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए जन-जागरण का मुख्य माध्यम बने।
📖 रचनाकार परिचय:
पंडित वासुदेव द्विवेदी शास्त्री का जीवन-वृत्त यहाँ पढ़ें ➔
🎵 इस भाग में संकलित गीत (सीधे जाने के लिए क्लिक करें):
१. स्वागत-गीतम्
महामहनीय मेधाविन्, त्वदीयं स्वागतं कुर्मः।
गुरो गीर्वाणभाषायाः, त्वदीयं स्वागतं कुर्मः।।
दिनं नो धन्यतममेतत्, इयं मङ्गलमयी वेला।
वयं यद् बालका एते, त्वदीयं स्वागतं कुर्मः॥
न काचिद् भावना भक्तिः, न काचित् साधना शक्तिः।
परं श्रद्धा-सुमाञ्जलिभिः, त्वदीयं स्वागतं कुर्मः।
किमधिकं ब्रूमहे श्रीमन् निवेदनमेतदेवैकम्।
न बाला विस्मृतिं नेयाः त्वदीयं स्वागतं कुर्मः॥
२. सैन्य-गीतम्
सादरं समीहतां वन्दना विधीयताम्।
श्रद्धया स्वमातृभूसमर्चना विधीयताम्॥
आपदो भवन्तु वा विद्युतो लसन्तु वा।
आयुधानि भूरिशोऽपि मस्तके पतन्तु वा।
धीरता न हीयतां वीरता विधीयताम्
निर्भयेन चेतसा पदं पुरो निधीयताम् ॥१॥
प्राणदायिनीयं त्राणदायिनीयम्।
शक्तिमुक्तिभक्तिदा सुधाप्रदायिनीयम्।
एतदीयवन्दने सेवनेऽभिनन्दने।
साभिमानमात्मनो जीवनं प्रदीयताम्॥२॥
३. भारतीयैकता-साधकं संस्कृतम्
भारतीयैकता-साधकं संस्कृतम्
भारतीयैकता-साधकं संस्कृतम्
भारतीयत्व-सम्पादकं संस्कृतम्
ज्ञान-पुञ्ज-प्रभादर्शकं संस्कृतम्
सर्वदानन्द-सन्दोहदं संस्कृतम्।।1।।
विश्वबन्धुत्व-विस्तारकं संस्कृतम्
सर्वभूतैकता-कारकं संस्कृतम्
सर्वत:शान्तिसंस्थापकं संस्कृतम्
पञ्चशील-प्रतिष्ठापकं संस्कृतम्।।2।।
त्याग-सन्तोष-सेवाव्रतं संस्कृतम्
विश्वकल्याण-निष्ठायुक्तं संस्कृतम्
ज्ञान-विज्ञान-सम्मेलनं संस्कृतम्
भुक्ति-मुक्ति-द्वयोद्भावनं संस्कृतम्
नगरे-नगरे ग्रामे-ग्रामे विलसतु संस्कृत-वाणी।
सदने-सदने जन-जनवदने जयतु चिरं कल्याणी।।4।।
४. मातृ-भूमि-वन्दना
मातृभूमे नमो मातृभूमे नमः ।
मातृभूमे नमो मातृभूमे नमः ॥
मातृभूमे नमो मातृभूमे नमो ।
अग्रतस्ते नमः पृष्ठतस्ते नमः
ऊर्ध्वतस्ते नमश्चाऽप्यधस्ते नमः
वामतस्ते नमो दक्षिणे ते नमो ।
ते गिरिभ्यो नमस्ते नदीभ्यो नमः
ते वनेभ्यो नमो जनपदेभ्यो नमः
ते कणेभ्यो नमस्ते अणुभ्यो नमो ।
प्राणदे त्राणदे देवि शक्तिप्रदे
ऋद्धिदे सिद्धिदे भुक्ति-मुक्तिप्रदे
सर्वदे ! सर्वदा देवि ! तुभ्यं नमो ।





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