रविवार, 9 जुलाई 2017

गुरु पूर्णिमा- ज्ञान तथा अनुशासन का पर्व

महर्षि व्यास के जन्म दिन आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को मनाया जाने वाला यह गुरु पूर्णिमा पर्व हिन्दुओं के लिए जितना महत्व पूर्ण है, उतना ही बौद्धों और सिखों के लिए भी। इसी दिन भगवान बुद्ध ने सारनाथ में प्रथम उपदेश दिया था। आज के दिन से ही धर्मोपदेशक संत चातुर्मास व्रत का शुभारम्भ करते हैं।
गुरु शब्द संज्ञा और विशेषण दोनों रूपों में प्रयुक्त होता है। विशेषण के रूप में गुरु शब्द का अर्थ होता है, भारी, महान् अथवा विशेष। वाराणसी में लोग एक दुसरे को गुरु कहते हैं। का हो गुरु। वृहस्पति तथा मीमांसक प्रभाकर को गुरु के नाम (संज्ञा) से पुकारा जाता है। विभिन्न संप्रदायों के प्रवर्तक आचार्य, धर्मोपदेशक अथवा किसी कला में निष्णात व्यक्ति को गुरु शब्द से संबोधित किया जाता है। गृणाति उपदिशति वेदशास्त्राणि यद्वा गीर्यते स्तूयते शिष्यवर्गैः व्याख्या के अनुसार गुरु उसको कहते हैं, जो वेद शास्त्रों का गृणन अर्थात् उपदेश देता है तथा शिष्यों के द्वारा स्तुत होता है। मनुस्मृति (2.142) सहित अन्य स्मृति ग्रन्थों में गुरु शब्द पर विस्तृत प्रकाश डाला गया है। यहाँ कहा गया है कि जो ब्राह्मण गर्भाधान आदि संस्कारों को यथाविधि करता है और अन्न से पोषण करता है, वह गुरु कहलाता है।
निषेकादीनि कर्माणि य: करोति यथाविधि ।
संभावयति चान्नेन स विप्रो गुरुरुच्यते।। मनु
याज्ञवल्क्य के अनुसार-
स गुरुर्यः क्रियाः कृत्वा वेदमस्मै प्रयच्छति ।
उपनीय ददद्वेदमाचार्यः स उदाहृतः ।।
एकदेशमुपाध्याय ऋत्विग्यज्ञकृदुच्यते ।
एते मान्या यथापूर्वमेभ्यो माता गरीयसी।।
वह गुरु जो गर्भाधान से लेकर उपनयन तक सारे संस्कार सम्पादित कर वेद पढाता है, उसे गुरु कहते हैं। यदि कोई केवल उपनयन करके वेद पढाये तो उसे आचार्य कहते हैं। वेद का कोई एक अंश पढाने वाले को उपाध्याय तथा यज्ञ कराने वाले को ऋत्विक् कहते हैं । इन चारों में से अंत से पूर्व उत्तरोत्तर मान्य हैं। अर्थात् सबसे ऊँचा गुरु, उसके बाद आचार्य पुनः उपाध्याय और अंत में ऋत्विक् का स्थान आता है । माता इन सभी से श्रेष्ठ है, अर्थात् माता का स्थान गुरु से भी ऊँचा है।
मनु ने भी आचार्य, उपाध्याय और ऋत्विक् की परिभाषायें की तथा उनमें क्रम स्थापित किया है-
उपाध्यायान् दशाचार्य: आचार्याणां शतं पिता ।
सहस्रं तु पितृन् माता गौरवेणातिरिच्यते ।।
एक आचार्य दश उपाध्यायों से बडा है। एक पिता, सौ आचार्यों से बड़ा है। एक माता, हजार पिताओं से भी बडी है, क्योंकि उसका गौरव इन सबसे अधिक है। गुरु होने का ही नाम है गौरव। गुरोर्भाव: गौरवम् ।
कूर्म पुराण में गुरु की बृहत्तम सूची मिलती है, जिसके अनुसार-
उपाध्यायः पिता ज्येष्ठो भ्राता चैव महीपतिः।
मातुलः श्वशुरस्त्राता मातामहपितामहौ।
बन्धुर्ज्येष्ठः पितृव्यश्च पुंस्येते गुरवः स्मृताः।
माता मातामही गुर्वी पितुर्मातुश्च सोदरा।
श्वश्रूः पितामही ज्येष्ठा धात्री च गुरवः स्त्रियाम्।
इत्युक्तो गुरुवर्गोऽयं पितृतो मातृतो द्विजाः।
अनुवर्त्तनमेतेषां मनोवाक्कायकर्मभिः।
गुरून् दृष्ट्वा समुत्तिष्ठेदभिवाद्य कृताञ्जलिः।। कूर्मपु०, उपविभाग, अध्याय 11 ।
इसके अनुसार उपाध्याय, पिता, ज्येष्ठ भ्राता, महीपति (राजा) मामा, माता आदि पूर्वोक्त गुरु की श्रेणी में आते हैं। इसके साथ ही पुरोहित तथा शिक्षक तथा मंत्रदाता भी गुरु कहलाते हैं। भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक पृष्ठभूमि में गुरु को पुरोधा आचार्य अथवा माध्यम कहा जाता है, जो शिक्षक अर्थात पढ़ाने का कार्य करता है। भारतीय शिक्षा परंपरा का विहंगम अवलोकन करने पर जो चित्र बरबस सम्मुख उपस्थित होता है, उसके अनुसार अध्यापक का चरित्र तथा उत्तम आदर्श समाज में उसके आदर का भाव उपस्थित किया। प्राचीन भारतीय वाङ्मय में बहुत ही रोचक ढंग से गुरु और शिष्य का संवाद  प्राप्त होता है। गुरु की अवधारणा उस समय और प्रासंगिक थी जब शिष्य, विद्या प्राप्ति के लिए उपनयन संस्कार के बाद गुरुकुल जाया करते थे। विद्या में पारंगत होने के पश्चात् समावर्तन संस्कार तथा इसके अनन्तर उनका गृहस्थ आश्रम में प्रवेश होता था। प्रत्येक व्यवस्था का सूत्रधार गुरु होते थे। विश्व के इतिहास में गुरु का अद्वितीय स्थान था, जिसके पीछे एक ऐतिहासिक परंपरा है। विभिन्न कालखंडों में गुरु के सामाजिक अवदान को देखकर उनके प्रति शिष्टाचार आदर और सेवा का विधान विभिन्न ग्रंथों में किया गया। युक्तिकल्पतरु में अच्छे गुरु का पहचान दिया गया है। भारत में वंश की दो परंपराएं मानी गई है। विद्या परंपरा और वंश परंपरा। विद्या परम्परा में भी शिक्षा और दीक्षा दो परम्पराओं का सूत्रपात हुआ। आज विशेषतः दीक्षा शाखा के लोग गुरु पूर्णिमा के अवसर पर अपने गुरु के पास जाकर पूजन करते हैं। 
विद्या परंपरा में गुरु शिष्य का संबंध, विभिन्न शास्त्र ग्रंथों के शाखाओं एवं उससे संबंधित आचार्य, उस विद्या शाखा में पढ़ने वाले शिष्यों की लंबी श्रृंखला आती है। चाणक्य नीति में किसका कौन गुरु हो सकता है, अर्थात् किससे कौन दक्षता प्राप्त कर सकता है, इसका विभाजन किया गया। यहां कहा गया है कि-
गुरुरग्निर्द्विजातीनां वर्णानां ब्राह्मणो गुरुः ।
पतिरेकोगुरुः स्त्रीणां सर्वेषामतिथिर्गुरुः।।
द्विजातियों का गुरु अग्नि, वर्णों का गुरु ब्राह्मण, स्त्रियों का गुरु पति और सभी का गुरु अतिथि होता है।
याज्ञवल्क्य स्मृति में उपनयन पूर्वक वेदाध्ययन कराने वाले आचार्य को गुरु कहा गया है।
उपनीय गुरुः शिष्यं महाव्याहृतिपूर्वकम् ।
वेदमध्यापयेदेनं शौचमाचारांश्च शिक्षयेत् ॥1.15॥
 शिष्यों में चरित्र एवं व्यक्तित्व के निर्माण का नैतिक उत्तरदायित्व गुरु पर था, अतः उस समय उस व्यक्ति को ज्ञान की दुकान लगाने वाला कहा गया जो ज्ञान को केवल जीविका के लिए उपयोग में लाता थे। उसे वणिक् अर्थात् व्यापारी कहा गया। यस्यागमः केवलजीविकायै तं ज्ञानपण्यं वणिजं वदन्ति।। (मालविकाग्निमित्रम,1/17)
सूत्र काल के आते आते गुरु का वह व्यापक स्वरूप सिमटकर एकाकी व्यक्तित्व पर आ गया तथा गुरु उसे माने जाने लगा, जो अंधकार से प्रकाश की ओर तथा असत् से सत् की ओर ले जाता है।
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।। 59।।
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् ।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।। 60।।.  
असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय।
गुरु की महिमा पर गुरु गीता जैसे स्वतंत्र ग्रन्थों का लेखन भी हुआ। गुरु गीता के रचयिता वेद व्यास हैं। यह स्कन्द पुराण का एक भाग है। इसमें कुल ३५२ श्लोक हैं। और पढ़िये गुरु गीता
गुरु परंपरा का विशेष पल्लवन तंत्र के ग्रंथों यथा वीर शैवागम में हमें प्राप्त होता है। यहां पर लिंगायत अपने गुरु का चुनाव करता है। चुनाव के समय एक उत्सव होता है, जिसमें पांच मठों के महंतों के प्रतिनिधि होते हैं.,,
वैदिक परंपरा में भी गुरु का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। वेद कण्ठस्थीकरण में उसके छंद और उच्चारण को यथावत याद रखना आवश्यक था। वहां गुरु अपने शिष्य को अपनी-अपनी वेद शाखा के अनुसार वेद मंत्रों को याद कराते थे। इस कालखंड में क्षत्रिय राजा जनक विदेह तथा अश्वपति कैकेय भी गुरु हुए। पौराणिक काल में गुरु की महत्ता तब और अधिक हो गई जब वेदव्यास का प्रादुर्भाव हुआ।  व्यास गद्दी पर विराजित होकर पौराणिक, पुराण कथाओं का वाचन करने लगे। व्यास द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र ग्रंथ के आधार पर विभिन्न धर्म शाखाओं का विस्तार हुआ। आषाढ शुक्ल पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा भी कहा जाता है। इसी दिन वेद का विभाजन करने वाले कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्म हुआ था। पौराणिक परम्परा में व्यास को आदि गुरु माना जाता है। वैदिक परंपरा के अनुसार ही भारत में उद्भूत बौद्ध तथा जैन धर्म शाखाओं पर भी इसका प्रभाव पड़ा। उस संप्रदाय में भी गुरु की महिमा को यथावत् स्वीकार किया गया। जब लिपि का उद्भव हुआ तथा लिखे गए ग्रंथों के द्वारा भी ज्ञान प्राप्त होने लगा तब भी गुरु महत्वशाली बनी रहे, क्योंकि लिपि ज्ञान के लिए भी किसी गुरु की आवश्यकता होती रही। आज के डिजिटल युग में जब लगभग सभी प्रकार की ज्ञान रश्मियां विविध प्रकार से उपलब्ध है, फिर भी गुरु की महत्ता कम नहीं हुई।                    प्राचीन भारत की शैक्षणिक संस्कृति अद्वितीय थी, जहां छात्र और शिक्षक एक साथ रहता थे। उस समय गुरु अपने शिष्य को केवल शिक्षित करता थे, बल्कि अपनी जीवन शैली को दिखाकर अच्छा चरित्र, व्यवहार और संस्कृति भी विकसित करता थे। शिक्षा के साथ अनुशासन का पाठ, समाज तथा राज्य के प्रति कर्तव्य का बोध भी कराया जाता था। वहाँ  शिक्षक छात्र के माता-पिता की भूमिका का भी निर्वाह करता था।  आप कल्पना कर सकते हैं कि वर्तमान दिन की स्थिति के विपरीत उस समय के शिक्षक का चरित्र काफी निर्दोष तथा प्रेरक था। गुरु पूर्णिमा को अनुशासन का पर्व भी कहा जाता है। यहाँ गुरु अपने अन्तेवासी को सुचरित का पाठ पढ़ते थे।  आज के प्रत्येक गुरु और शिष्य को तैत्तिरीय उपनिषद्, शिक्षावल्ली,एकादश अनुवाक्  के उन मंत्रों का अनुसरण करना चाहिए, जहाँ गुरु अपने शिष्य को यह निर्देश दिया है।
वेदमनूच्याचार्योन्तेवासिनमनुशास्ति।
सत्यं वद। धर्मं चर। स्वाध्यायान्मा प्रमदः। आचार्याय प्रियं धनमाहृत्य प्रजातन्तुं मा व्यवच्छेत्सीः। सत्यान्न प्रमदितव्यम्। धर्मान्न प्रमदितव्यम्। कुशलान्न प्रमदितव्यम्। भूत्यै न प्रमदितव्यम्। स्वाध्यायप्रवचनाभ्यां न प्रमदितव्यम्॥1॥ देवपितृकार्याभ्यां न प्रमदितव्यम्। मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। अतिथिदेवो भव। यान्यनवद्यानि कर्माणि। तानि सेवितव्यानि। नो इतराणि। यान्यस्माकँ सुचरितानि। तानि त्वयोपास्यानि॥2॥ नो इतराणि। ये के चारुमच्छ्रेयाँसो ब्राह्मणाः।तेषां त्वयाऽऽसनेन प्रश्वसितव्यम्। श्रद्धया देयम्। अश्रद्धयाऽदेयम्। श्रिया देयम्। ह्रिया देयम्। भिया देयम्। संविदा देयम्। अथ यदि ते कर्मविचिकित्सा वा वृत्तविचिकित्सा वा स्यात्॥3॥ ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तत्र वर्तेरन्। तथा तत्र वर्तेथाः। अथाभ्याख्यातेषु। ये तत्र ब्राह्मणाः संमर्शिनः। युक्ता आयुक्ताः। अलूक्षा धर्मकामाः स्युः। यथा ते तेषु वर्तेरन्। तथा तेषु वर्तेथाः। एष आदेशः। एष उपदेशः। एषा वेदोपनिषत्। एतदनुशासनम्। एवमुपासितव्यम्। एवमु चैतदुपास्यम्॥ 4॥

वेदाध्ययन कराने के बाद आचार्य शिष्य को उपदेश देते हैं।
 सत्य बोलो। धर्म का आचरण करो। स्वाध्याय से प्रमाद नहीं करो। आचार्य के लिए प्रिय धन लाकर संतान परंपरा का छेदन नहीं करो। सत्य से प्रमाद नहीं करना चाहिए। धर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए। कुशल कर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए। ऐश्वर्य देने वाले कर्म से प्रमाद नहीं करना चाहिए। अध्ययन और अध्यापन से प्रमाद नहीं करना चाहिए।1। देव कार्य और पितृ कार्य से प्रमाद नहीं करना चाहिए । माता देवता होती है। पिता देवता होते हैं। आचार्य देवता होते हैं ।अतिथि देवता होते हैं। जो निर्दिष्ट शिष्टाचार रूप कर्म है ,वही तुम्हारे लिए कर्तव्य है। हम आचार्यों के जो शुभ चरित्र है, उन्हीं की उपासना तुम्हें करनी चाहिए। 2। उस के विपरीत का नहीं । जो कोई हमसे श्रेष्ठ ब्राह्मण हैं, उन्हें आसन के द्वारा श्रम निवृत्त करना चाहिए। श्रद्धा से देना चाहिए और अश्रद्धा से नहीं। विभूति के अनुसार देना चाहिए। लज्जा पूर्वक देना चाहिए। भय मानते हुए देना चाहिए। मैत्री आदि कार्य के निमित्त से देना चाहिए। यदि तुम्हें कर्म में संदेह हो या लोक व्यवहार के विषय में संदेह हो। 3। तो वहां पर जो भी विचारशील कर्म में पूर्ण रुप से तत्पर, स्वेच्छा से कर्मपरायण, सरल बुद्धि एवं धर्माभिलाषी ब्राह्मण हों, उस कर्म या आचार्य प्रसंग में वह जैसा व्यवहार करें वैसे ही तुम भी करो। इसी प्रकार जिन पर संशय संयुक्त दोष लगाया गया हो, उनके प्रति, वहां जो विचारशील, कर्म में सर्वथा नियुक्त, दूसरों की प्रेरणा के बिना ही स्वतः कर्म परायण, सरल हृदय एवं धर्माभिलाषी ब्राह्मण हो, वह जैसा व्यवहार करें वैसा तुम करो। यह आदेश है। यह उपदेश है। यह वेद का रहस्य है । यह अनुशासन है। इसी प्रकार उपासना करनी चाहिए। एसा ही आचरण करना चाहिए।4।
         गुरु की महिमा को जानने के बाद  ऐसे लोग जो गुरु पद के लिए वर्जित हैं, उनका पहचान करना भी आवश्यक है।  कालिका पुराण, तंत्रसार, चिंतामणि जैसे ग्रथों में क्षय रोगी, कुनखी, श्यामदंतक,  बहरा अंधा, कुसुम जैसी आंखों वाला, गंजा (खल्वाट) और दंतुल व्यक्ति को गुरु होने के अयोग्य माना गया।
अभिशप्तमपुत्रञ्च सन्नद्धं कितवन्तथा।
क्रियाहीनमकल्पाङ्गं वामनं गुरुनिन्दकम्॥
सदा मत्सरसंयुक्तं गुरुं मन्त्रेषु वर्जयेत्।
            गुरुर्मन्त्रस्य मूलं स्यान्मूलशुद्धौ सदा शुभम्॥
 इससे स्पष्ट है कि गुरु पद को वह धारण कर सकता है जो अपने विद्या, चरित्र और बुद्धि के साथ ही स्वस्थ और आकर्षक शरीर से पुष्ट हो। आज भी भारत के हिंदुओं में यह परंपरा जीवित है। प्रत्येक व्रत तथा संस्कार करने के पूर्व वह किसी गुरु से दीक्षित होता है अन्यथा उसके द्वारा संपादित शुभ कर्म का पुण्य फल उसे प्राप्त नहीं होता है।
                                                                               जगदानन्द झा 9598011847
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