सोमवार, 3 मार्च 2014

रक्षाबंधन

           दिन काफी चढ़ आए। सूर्य की रोशनी घर में प्रवेश कर गयी थी। शशि अभी नहाई नहीं है। वह सुबह उठते ही जल्दी-जल्दी बालों को संभालकर मूंह हाथ धो ली। आज ही रक्षाबन्धन है। भाई बहन का पर्व। पवित्र और जिम्मेदारी का प्रतीक राखी। वह अपने भाई को बांधकर मिठाई खिलाएगी। शशि घर के बाहर गोबर मिटृी मिलाकर आंगन लीप रही है। सहसा माँ जोरों से चिल्लाती है, तुम अभी तक आँगन नहीं लीप पायी घ् क्या कर रही हो। घर में झाड़ू देना है। फर्श वाले घर में पोछे भी लगाने हैं। मम्मी कह रही ह,ै तुम्हे पता नहीं, धूप लगने से गोबर का लीपन चटककर फट जाता है। सवेरे उठकर क्यों नहीं लीपी ? जब इतने दिन निकल आए तो आँगन धीरे-धीरे लीप रही है। लगता है हाथ में मेंहदी रचायी है और आज पिया के घर जाएगी।
            शशि कुछ नहीं कहती। ससुराल का नाम उसे अजीब सा लगता है। फिर आज के दिन तो सौतेली माँ भी इस तरह नहीं डाँटती। हमारे घर में मानो दुश्मनों का बसेरा हो। जब देखो शिर पर सवार रहते है। काम में ढि़लाई करो तो ससुराल के ताने देते रहते हैं। लगता है ईश्वर लड़की को सिर्फ ससुराल के लिए ही बनाते हैं। तभी तो जवान होने से पहले उसे रोटी बनाना, सिलाई सिखना, और बर्तन मलना, घर में झाड़ू पांेछा करना सिखाया जाता है। चन्द्रकला दादी चिल्ला रही है। गाय पूरे आँगन में घूम कर मिटृी उखाड़ रही है और ये जाने किसकी याद में डूबी है। अंधी है क्या? अरे गाय को क्यांे नहीं भगाती हो? अकेला शशि क्या क्या करे। उसके घर में एक बहन माँ तथा दो भाई और भी तो हैं लेकिन अभी से शाम तक इसे ही भोजन भी बनाना होगा बर्तन साफ करने होंगें।
            अभी आधा से ज्यादा आँगन लीपना बाकी है। शशि मन ही मन सोचती है। कौन पागल इस पर्व को बनाया होगा? गाय यदि मुझे मार बैठे तो? लड़के मजूबत होते हैं उन्हंे तो अवश्य ही गाय की देखभाल करना चाहिए। जो मुझे इतनी भी सुरक्षा नहीं दे सकता तो फिर इस पर्व से क्या मतलब!
            सहसा एक शीशा खच् से उसके अंगुली में धस जाता है। खून बहने लगता है। शशि तो डर गयी विच्छू तो नहीं? लेकिन खून देखकर मन में संतोष हो गया कि शीशे गड़े हैं। क्या होगा? रोज तो हाथ जल ही जाता है। कौन मेरी सुधि लेता है। वह बिना कुछ परवाह किए फिर लीपने लगती है। वह और भी सोचती है उसे आज सोचना अच्छा लगता है। मन होता है खूब सोचूँ उसमें उसे आज आनन्द लगता है।
            दिल बहलाने के लिए उसके कोई हम उम्र के नहीं हैं। वह करे भी तो क्या करे? वह तो जैसे कोई पालतू तोता हो पिंजरे में बंद। तोते की तरह उसे भी एक दिन अपने पति की भाषा सीखनी होगी। वह जो खाएगा, वही खिलाएगा। उसकी  रुचि ही हमारे जीवन का लक्ष्य होगा। मुझे लोग उसी के नाम से जानेंगें। जिस नाम को लेकर मुझे आज तक मेरी सहेली, मेरे माता पिता, भाई तथा अध्यापिका बुलाई। वह छूट जाएगा। कृत्रिम नाम होगा मेरा मिस.................। क्यों लड़कियों की इच्छा दमित की जाती है। उसके शादी की चर्चा हो रही है। पता नहीं वह कैसा होगा। यदि क्रोधी होगा तो हम पर झल्लाएगा। उसकी मम्मी कैसी होगी? मुझे पराए घर का जानकर नौकरानी की तरह काम लेगी और जेठानी आदि तो ........। कहेगी देखो! पढ़ी लिखी है। इन्हें टमाटर की चटनी बनानें नहीं आता परन्तु जीभ चलाने आता है। ननद तो राजकुमारी रहेगी। कहेगी भाभी यहाँ खाना लाकर देना। देवर कहेगा नाश्ता जल्दी दो स्कूल जाना। सहसा स्कूल की याद आते ही शशि चैक पड़ती है। आँगन करीब लीपा जा चुका है,लेकिन वह उठना नहीं चाहती। इच्छा है आज खूब सोचूँ। आज उसके मनपसंद यहाँ नहीं हैं। उसे मन नहीं लगता। वह अपने को कोसती है कि लड़कियाँ कितनी बेबस होती है।
            कल ही तो वे गए हैं और आज उसके बचपन का सहपाठी (बसंेे मिससवू) आया था। क्लर्क का काम मिल गया है, कुंवारा है। पापा उसी से शादी की चर्चा कर रहे हैं। वह नहीं नहीं कहता है। शशि उसे देखकर काँप उठती है। उसे याद है कि क्लास में वह कितना गुस्सैल था। भदृी गालियाँ बकता था। एक बार उसके शिर पर वह डेस्टर से मारा था। शशि फिर उसे देखती है। अब उसकी आँखे उससे मिल जाती है, वह हँस देता है। उसके आँखो में दरिंदगी भरी है। हंसी में उद्धतपना। शशि घृणा से मूँह फेर लेती है। उसे हम जिन्दगी की बहुत याद आएगी। आए भी क्यों नहीं। ऐन मौके पर वे बाहर चले जाते हैं। यदि इससे शादी तय हो गयी तो हमारा जीवन नर्क हो जाएगा। सुनते हैं घूस में शराब की बोतल माँगता है। रात को पीकर लौटेगा और रात भर तंग करेगा उसके शरीर में सिहरन पैदा हो जाता है काश! नारी को लोग उपभोग की वस्तु ही क्यों समझते हैं। क्या नारियांे का अपना कोई व्यक्तित्व नहीं होता। वे तो नारियों के हर इच्छा, हर आग्रह का इज्जत करते हैं। शशि सोचती है। दुनिया में उनके तरह और लोग क्यों नहीं सोचते।
            नीला पैंट और वाइट शर्ट पहन कर रमेश तैयार हो गया है। वह शशि से कहता है बहन जी कब तक रक्षा बंधेगी? मुझे और जगह जाना है। उषा भी आती होगी। उषा रमेश की मौसेरी बहन है। वह भी आ ही गयी। शशि को देखकर ईष्या हो रही है। यह भी ऐसे समय में आयी जब मेरी मंगनी तय हो रही है। कितनी बदसूरत है और यह रमेश उसी पर मरता है, लगता है वही सहोदर बहन है। सच है, आजकल घर वाले लोग ही एक दूसरे के पराए हैं। आज वह आँखों से देख रही है कि रमेश उससे कितना प्यार करता है। उपहार में घड़ी दे रहा है। कहाँ से लाया होगा इतना पैसा। पापा ही दिए होंगें। मुझे तो रुपये देते ही नहीं कहते हैं रुपए से लड़कियाँ बिगड़ जाती है।
            शशि का दूसरा भाई तो मानो पिशाच हो। वह तो सम्बन्ध को ही भूल गया। कितना दुव्र्यवहार किया था वह मुझसे। आज किस मूँह से वह हमसे राखी बंधवाएगा। कितना नाटकीय युग आ गया। भैया सैंया बनने को तैयार हो जाते हैं और...............।
            उषा शशि से छोटी है। वह इसे फिर भी शशि ही कहती है। शशि दीदी नहा चुकी है क्या? चल अब तुम्हारे होने वाले तुम्हें देखने आए है। अच्छा से कपड़ा पहन ले। शशि को सहसा सदमा लगा क्या? उसे विश्वास ही नहीं आ रहा था कि मेरे कानों ने कुछ सुना। मैं तो अपना दिल अपना शरीर सब कुछ किन्हीं को दे दिया। अब वे इसके मालिक हैं। यह कौन है जो उनकी अनुमति लिए बिना उसे देखे। लेकिन नहीं, रमेश के घर वालों को क्या पता कि मैं दूसरों की हो चुकी हूँ। फिर लड़की को पसन्द करना कहाँ की बात है? क्या लड़की बाजारु वस्तु है जिसे पसन्द कर लोग उसे अपने घर ले जाऐं। कितना मानव सभ्यता का पतन हो चुका है। कितनी बेबस है यह नारियाँ। क्यों नहीं इसका विरोध होता है? आज शशि को उसके सामने जाना होगा। वह आँखें भरकर उसे देखेगा पसन्द करेगा और वह आँखें नीचे किए रहेगी। वह उसे देख नहीं सकती। नारी के लज्जाशीलता का प्रदर्शन भी करना होगा। बिना देखे पति मान लेगी। इसकी पसन्द इससे कोई नहीं पूछेगा।
            उषा आती है। अरे! इतनी देर कर दी। वह इसे घबरा डालती है। रक्षाबंधन के दिन पति मिलन कहाँ की तुक है। शशि को समझ में नहीं आता। वह चलती तो आगे है परन्तु लगता है पाँव पीछे जा रहे हैं। हृदय नहीं स्वीकारता, विवश है। मम्मी, उषा उसे लिए घर में दाखिल होती हैं। अपराधी की भांति शिर नीचे किए वह खड़ी है। निर्णय की प्रतीक्षा में। होने वाली सास को शंका। भले लड़की सुन्दर है परन्तु गूंगी होगी, पूछती है। बिटिया! क्या रोटी बना लेती हो। शशि लज्जा से सिर हिलाकर हाँ का इशारा कर देती है। किसी दूसरी बुढि़या से वह कान में कहती है देखो मेरी शंका सच हुई। बोलती नही माँ बाप सिखा दिया होगा। दूसरी कहती है अरे बहरी न हो। वह सास बीच में ही टोकती है पागल, अभी तो सुन कर ही न में उत्तर दी। नीचे जलपान की तैयारी हो रही है। शशि सोचती है नीचे चला जाऊँ। वह अपने पर शर्मिंदा है कि लोग मुझे अनपढ़, अंधी, बहरी, गूंगी क्या क्या समझ रहे हैं तभी तो कोई नही पूछती क्या क्या पढ़ी है बिटिया। चाय ले जाने के लिए शशि को उसकी ननद इशारा करती है। वह नीचे जाती है। आती है तो सास जी नाराज है। भोदूँ है। कुछ नहीं करने आता। ननद कहती है अच्छा आप क्या पढ़ रही है? शशि बताती है बीच में ही वह टोकती है। ये विषय तो मूर्ख पढ़ते हैं। कितना उजड्ड लड़की है। बोलने पर लगाम ही नहीं और अपने पर कितना घंमड है।

            सभी लोग नमस्ते कहकर जाने लगते हैं। शशि एक बार निगाह उठा कर देखती है। उसका दिल हलक होने लगा। राहत की साँस लेती है। उसके माँ पिता के सिर पर चिंता की गहरी लकीर स्पष्ट दिख रहा है। वह सतृष्ण उन्हें निहार रहे हैं, जैसे परमात्मा घर से बाहर जा रहे हो। शशि बर्तनों को उठा रही है और उसके पिता उसे दूर आँखो से ओझल होने के बाद भी उसकी ओर आशा से खड़े हैं कि शायद में वे फिर लौटेंगें। अंत में हार कर खटिया पर बैठकर सिर थाम लेते हैं। शशि खुशी से खिल उठती है। रक्षाबंधन में उसे विजय का सुख मिल रहा था। वह रक्षा करने वालो के धागे से बाँध रही थी। ताकि रक्षक भक्षक न बने।