शुक्रवार, 31 अक्तूबर 2014

धन्वन्तरि

      हरिवंश पुराण के अनुसार समुद्र मन्थन से अब्जदेवता का आविर्भाव हुआ। धन्व ने इस देवता की भक्तिपूर्वक आराधना की। प्रसन्न होकर यही देवता धन्व का पुत्र धन्वन्तरि के रुप में अवतरित हुआ। यह अब्ज देवता सोम है। सोम के अधिष्ठातृ  देवता इन्द्र हैं। इन्द्र और विष्णु दोनों सहोदर भाई थे। महाभारत तथा अग्निपुराण में भी यही उल्लेख प्राप्त होता है। अर्थात् अब्ज देवता भी विष्णु ही थे, जिसके अवतार धन्वन्तरि हुए। पौराणिक उपाख्यानों में तथा महाभारत में यह भी लिखा है कि धन्वन्तरि अमृत से भरे हुए कलश को हाथ में उठाये हुए समुद्र से अवतीर्ण हो गये।
   धन्वन्तरि धन्व का बेटा था। उसे इतिहास और पुराण कोई समुद्र का बेटा नहीं कहता। समुद्र में से आविर्भूत धन्वन्तरि पहले कहां थे ? काशी में ही कैसे पहुंच गये ? इसका उल्लेख न पुराण में है न इतिहास में।
            छन्दोग्य उपनिषद में लिखा है कि वस्तुतः देवता और असुर एक ही वंश की संतान थे। विचारों के भेद ने दोनों दलों में भारी भेद उत्पन्न कर दिया। देवता आस्तिक थे और असुर नास्तिक। देव आत्मा में विश्वास करते थे और असुर भौतिक देह में ही। इसी विचार भेद ने विश्व का इतिहास बदल दिया। धन्वन्तरि ने लिखा कि वस्तुतः प्राण के मोह में ही असुर मारे गये।
      सुश्रुत संहिता के अनुसार धन्वन्तरि ने इन्द्र से आयुर्वेद प्राप्त किया था। परन्तु हरिवंश पुराण में महार्षि भारद्वाज से भी धन्वन्तरि का विद्या ग्रहण करने का उल्लेख है।
धन्वन्तरि के विद्याग्रहण और अष्टांग विभाग करने के सम्बन्ध में भिन्न-भिन्न उल्लेख परस्पर विरोधी नहीं है। वास्तविकता यह है कि धन्वन्तरि ने इन्द्र से भी पढ़ा और भरद्वाज से भी। आत्रेय ने भी प्रथम भरद्वाज से ज्ञान प्राप्त किया, और तदन्तर रसायन विज्ञान अध्ययन करने के लिये हिमालय के सम्राट इन्द्र के विद्यालय में नन्दनबन भी गये। एक ही व्यक्ति अनेक विषयों का उतना विशेषज्ञ नहीं होता जितनी योग्यता भिन्न-भिन्न विशेषज्ञों को अपने-अपने विषयों के विशेषज्ञ विद्वानों द्वारा ज्ञान प्राप्त करने की परिपाटी भारत के विद्वानों में प्राचीन काल से रही है।
            इस प्रकार हम यह जानते हैं कि भगवान धन्वन्तरि उन महापुरूषों में से थे जिन की व्यवस्थायें परिषदों में सिद्वांत बन गई। धन्वन्तरि ने शल्य शास्त्र पर जो महत्वपूर्ण गवेषणायें की थीं, उनके प्रपौत्र दिवोदास ने उन्हें और परिमार्जित कर सुश्रुत आदि शिष्यों को उपदेश किया। सुश्रुत संहिता का प्रथम अध्याय इस बात को भली भांति स्पष्ट करता है। ग्रंथ प्रारंभ करते हुए ही इस भाव को प्रस्तुत किया गया है, ‘यथोवाच भगवान् धन्वन्तरि। किन्तु इसमें सन्देह नहीं कि दिवोदास की योग्यता भी चोटी तक पहुंची इसीलिये उनके सम्मान के लिये उनके प्रपितामह का नाम ही उनकी उपाधि वन गया-दिवोदास धन्वन्तरि। फलतः दिवोदास का शल्य शास्त्रीय उपदेश भगवान धन्वन्तरि की विरासत ही है।
       महाराज दिवोदास से पूर्व भगवान् धन्वन्तरि अथवा उनके किसी शिष्य ने कोई ग्रन्थ लिखा था या नहीं, यह निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता। क्योंकि वैसा कोई ग्रन्थ अब उपलब्ध नहीं। फिर भी प्राचीन उल्लेखों के आधार पर प्रतीत होता है कि धन्वन्तरि-संहितानामक कोई ग्रन्थ अवश्य था। प्राचीन ग्रन्थों में धन्वन्तरिएवं ‘‘धान्वन्तर मतजैसे उल्लेख प्राप्त होते हैं। यह उसी संहिता का निर्देश देते प्रतीत होते है। परन्तु आज धन्वन्तरि के विज्ञान वैभव की बानगी महाराज देवोदास के उपदेशो में ही देखी जा सकती है।
पुराणों में भी कतिपय दिवोदासों का उल्लेख है। परन्तु यहां तो काशिराज दिवोदास की ही चर्चा करनी है। हरिवंश पुराण के 29 वें अध्याय में काश नामक राजा के वंश का वर्णन मिलता है। महाराज काश के ही वंश में धन्वन्तरि का जन्म हुआ था। दिवोदास भी इसी वंश के एक पुरूषरत्न थे। उक्तपुराण में काशी के राजवंश की परम्परा दी गई है।
                        प्रतीत होता है कि धन्वन्तरि के पिता ने परसीक पश्चिम ईराक तक विजय की। वह प्रदेश धन्व से छू गया हैं। इसलिये उनका विरूद धन्व ही रहा। किन्तु उनके बेटे ने धन्व के अन्त तक विजयश्री का डंका बजा दिया, इसलिये उसे धन्वन्तरि का गौरव प्रदान किया जाना उचित ही था। उल्हण ने अपनी सुश्रुत व्याख्या में धनुका अर्थ शल्य शास्त्र लिखा है।
            औरभ्र उर (बैबीलोन) के निवासी, तथा पारसी धर्म-ग्रंथ आवेस्ता में दिवोदास, सुश्रुत एवं करवीर्य करवीर पुर दृषद्वती या आमू (दरिया के तट पर) निवासी, तथा पारसी धर्मग्रंथ अवेस्ता में दिवोदास, सुश्रुत एवं करवीर्य आदि नामों की प्रतिच्छाया यह स्पष्ट करती कि धन्वन्तरि का विरूद भूमध्य के रेगिस्तानों को पार कर गया था।

स्थिति काल

 आयुर्वेद के  अंग

आयुर्वेद का अष्टांग विभाग करने का श्रेय कुछ प्राचीन ग्रंथकारों ने भरद्वाज को और कुछ ने धन्वन्तरि को दिया है। किन्तु सुश्रुत संहिता का कथन यह है कि स्वंय ब्रह्देव ने ही आयुर्वेद को आठ अंगो में विभाजित कर दिया था। वे आठ अंग वे है-
1.   शल्य
2.   शालाक्य
3.   कायचिकित्सा
4.   भूत विद्या
5.    कौमार भूत्य
6.   अगद तन्त्र
7.   रसायन तन्त्र
8.   वाजीकरण तन्त्र।
            धन्वन्तरि तथा अन्य महर्षियों ने इन आठ अंगो का विस्तार किया है सुश्रुत संहिता का प्रारंभिक गुरू सूत्र भी यही बतलाता है कि शल्य, शालाक्य आदि आयुर्वेंद के आठों अंग पृथक-पृथक पूर्व से थे ही, धन्वन्तरि ने उन्हें विस्तृत किया है।
            सुश्रुत संहिता एक व्यक्ति का नहीं, किन्तु धन्वन्तरि, दिवोदास और सुश्रुत इन तीन महापुरूषों के वैज्ञानिक जीवन का मूर्त रूप है। आज भले ही आयुर्वेद शल्यविज्ञान में शिथिल प्रतीत होता है, किन्तु इतिहास साक्षी है कि आयुर्वेद का वह विज्ञान प्राचीन काल में पराकाष्ठा तक पहुंचा हुआ था। पूषा के दांत, इन्द्र की भुजायें, और यज्ञ के ब्रह्ाा का कटा हुआ सिर जोड़ने वाले अश्विनी कुमार धन्वन्तरि से बहुत पूर्व स्वर्ग में ही विद्यमान थे। वह विज्ञान धन्वन्तरि जैसे प्रतिभाशाली महापुरूष की बुद्धि से विकसित विद्यमान थे। वह विज्ञान धन्वन्तरि जैसे प्रतिभाशाली महापुरूष की बुद्धि से विकसित होकर कई गुना समृद्ध हो गया था।

काशी से सम्बन्ध


            काशी जैसे समृद्ध साम्राज्य की नींव डालकर महाराज काश (काश्य) ने जो विशाल राष्ट्र निर्माण किया, भगवान् धन्वन्तरि ने विद्या एवं विज्ञान के अक्षय वैभव से सुसज्जित कर उसे वसुधा का स्वर्ग बना दिया। और महाराज दिवोदास ने इस स्वर्ग का अनूठा वैभव विश्व को वितरित करके अपने वंश के यश की धवल ध्वजा इतिहास के शिखर पर गाड़ दी। वह आज भी उनका परिचय दे रही है। भले ही भारत का प्राचीन इतिहास अन्धकार में चला गया हो, किन्तु दिवोदास और धन्वन्तरि उसके उज्जवल प्रकाश स्तम्भ है। प्रतिवर्ष उन्हीं की स्मृति में हम धन्वन्तरि त्रयोदशी (धन तेरस) का पर्व मानते हैं।