रविवार, 16 सितंबर 2018

मध्वाचार्य

मध्वाचार्य जीवन वृत्त  (1199-13030)
भक्ति आन्दोलन के प्रवर्तक द्वैतवादी मध्वाचार्य का जन्म कर्णाटक के पाजक नामक स्थान पर हुआ। यह उडुपी के समीप है। इनके पिता का नाम मध्वगेद भट्ट तथा गुरु का नाम अच्युतप्रेक्ष था। भारत के दार्शनिकों में से एक थे। इनका अन्य नाम पूर्णप्रज्ञ व आनंदतीर्थ भी हैं। मध्वाचार्य को वायु का तृतीय अवतार माना जाता है (हनुमान और भीम क्रमशः प्रथम व द्वितीय अवतार थे)। मध्वाचार्य ने गोदावरी के तटवर्ती भाग में रहने वाले शोभनभट्ट जैसे अनेक वेदान्तयों को अपना शिष्य बनाया। उन्होंने तत्ववाद का प्रवर्तन किया जिसे द्वैतवाद के नाम से जाना जाता है। द्वैतवाद, वेदान्त की तीन प्रमुख दर्शनों में एक है।
मध्वाचार्य लिखित ग्रन्थ
मध्वाचार्य ने सैंतीस ग्रन्थों की रचना की। इन्होने द्वैत दर्शन के ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखा और अपने वेदांत के व्याख्यान की तार्किक पुष्टि के लिये एक स्वतंत्र ग्रंथ 'अनुव्याख्यान' भी लिखा। श्रीमद्भगवद्गीता और 10 उपनिषदों पर टीकाएँ, महाभारत के तात्पर्य की व्याख्या करनेवाला ग्रंथ महाभारततात्पर्यनिर्णय तथा श्रीमद्भागवतपुराण पर टीका ये इनके मुख्य ग्रंथ है। ऋग्भाष्य (ऋग्वेद 1.1- 40) के चालीस सूक्तों पर भी एक टीका लिखी । ऐसा लगता है कि ये अपने मत के समर्थन के लिये प्रस्थानत्रयी की अपेक्षा पुराणों पर अधिक निर्भर है।
मध्वाचार्य के सिद्धान्त
       वैष्णव सम्प्रदाय के आचार्यों के सिद्धान्त को समझने के लिए शंकराचार्य के अद्वैत सिद्धान्त को जानना आवश्यक हो जाता है। वैष्णव सम्प्रदाय के सभी आचार्यों ने अद्वैत सिद्धान्त का खण्डन करने के साथ-साथ एक दूसरे के सिद्धान्त का भी खण्डन करते हैं। श्री मध्वाचार्य ने प्रस्थानत्रयी ग्रंथों से अपने द्वैतवाद सिद्धांत का विकास किया। यहाँ इन्होंने शंकराचार्य के अद्वैतवाद तथा रामानुज के विशिष्टाद्वैतवाद का खण्डन किया है। ये जीव और जगत् को मिथ्या न मानकर सत्य मानते हैं। मध्व जीवात्मा एवं परमात्मा की विशेषताओं में साम्य मानते हैं। यह `सद्वैष्णव´ भी कहा जाता है, यह श्री रामानुजाचार्य के श्री वैष्णवत्व से अलग है।
मध्वाचार्य ने 'पाँच भेदों' की स्थापना की, जो `अत्यन्त भेद दर्शनम्´ भी कहा जाता है। उसकी पांच विशेषतायें हैं-
(क) भगवान और व्यक्तिगत आत्मा का पार्थक्य, (ईश्वर और जीव)
(ख) परमात्मा और पदार्थ का पार्थक्य,             (ईश्वर और जड जगत्)
(ग) जीवात्मा एवं पदार्थ का पार्थक्य,                (जीव और जगत्)
(घ) एक आत्मा और दूसरी आत्मा में पार्थक्य तथा (जीव और जीव)
(ङ) एक भौतिक वस्तु और अन्य भौतिक वस्तु में पार्थक्य। (जड और जड)
मध्व दर्शन के अनुसार समस्त जीव एक दूसरे से भिन्न है। यह परमात्मा से भी भिन्न है।
अत्यन्त भेद दर्शनम्  का वर्गीकरण पदार्थ रूप में इस प्रकार भी किया गया है :
(अ) स्वतंत्र
(आ) आश्रित
स्वतंत्र वह है जो पूर्ण रूपेण स्वतंत्र है। जो भगवान या सनातन सत्य है। लेकिन जीवात्मा और जगत् भगवान पर आश्रित हैं। इसलिये भगवान उनका नियंत्रण करते हैं। परमात्मा स्वतंत्र हैं। इसलिए उनका वर्गीकरण असम्भव है। आश्रित तत्त्व सकारात्मक एवं नकारात्मक रूप में विभाजित किये जाते हैं। सकारात्मक को भी चेतन (जैसे आत्मा) और अचेतन (जैसे वे पदार्थ) में वर्गीकृत किया जा सकता है।
अचेतन तत्त्व को परिभाशित करने के पहले मध्वाचार्य स्वतंत्र और आश्रित के बारे में बताते हैं जो संसार से नित्य मुक्त हैं। इस विचारधारा के अनुसार विष्णु स्वतंत्र हैं जो विवेकी और संसार के नियन्ता हैं। उनकी शक्ति लक्ष्मी हंत जो नित्य मुक्त हैं। कई व्यूहों एवं अवतारों के रूपों में हम विष्णु को पा सकते हैं (उन तक पहुँच सकते हैं)। उसी प्रकार अत्यन्त आश्रित लक्ष्मी भी विष्णु की शक्ति हैं और नित्य भौतिक शरीर लिये ही कई रूप धारण कर सकती हैं। वह दुख-दर्द से परे हैं। उनके पुत्र ब्रह्मा और वायु हैं। `प्रकृति´ शब्द प्र = परे + कृति = सृष्टि का संगम है।
मध्वाचार्य ने सृष्टि और ब्रह्म को अलग माना है। उनके अनुसार विष्णु भौतिक संसार के कारण कर्ता हैं। भगवान प्रकृति को लक्ष्मी द्वारा सशक्त बनाते हैं और उसे दृश्य जगत में परिवर्तित करते हैं। प्रकृति भौतिक वस्तु, शरीर एवं अंगों का भौतिक कारण है। प्रकृति के तीन पहलुओं से तीन शक्तियाँ आविर्भूत हैं : लक्ष्मी, भू (सरस्वती-धरती) और दुर्गा। अविद्या (अज्ञान) भी प्रकृति का ही एक रूप है जो परमात्मा को जीवात्मा से छिपाती है।
मध्वाचार्य जी का विश्वास है कि प्रकृति से बनी धरती माया नहीं, बल्कि परमात्मा से पृथक सत्य है। यह दूध में छिपी दही के समान परिवर्तन नहीं है, न ही परमात्मा का रूप है। इसलिए यह अविशेष द्वैतवाद ही है।
मध्वाचार्य जी ने रामानुजाचार्य का आत्माओं का वर्गीकरण को स्वीकार किया। जैसे :--
(क) नित्य - सनातन (लक्ष्मी के समान)
(ख) मुक्त - देवता, मनुष्य, ॠषि, सन्त और महान व्यक्ति
(ग) बद्ध - बँधे व्यक्ति
मध्वाचार्य ने इनके साथ और दो वर्ग जोड़ा, जो मोक्ष के योग्य है और जो मोक्ष के योग्य नहीं है :
1. पूर्ण समर्पित लोग, बद्ध भी मोक्ष के लिए योग्य हैं।
2. जो मोक्ष के लिए योग्य नहीं हैं। वे हैं:
(क) नित्य संसारी : सांसारिक चक्र में बद्ध।
(ख) तमोयोग्य : जिन्हें नरक जाना है।
इस वर्गीकरण के अनुसार जीवात्मा का एक अलग अस्तित्व है। इस प्रकार एक आत्मा दूसरी आत्मा से भिन्न होती हैं। इसका अर्थ आत्मा अनेक हैं। जीवात्मा परमात्मा एवं प्रकृति से भिन्न होने से परमात्मा के निर्देश पर आश्रित है। उनके पिछले जन्मों के आधार (कर्मो) पर परमात्मा उन्हें प्रेरित करते हैं। पिछले कर्मो के अनुसार जीवात्मा कष्ट झेलते हैं, जिससे उनकी आत्मा पवित्र हो जाती है और जीवन-मरण से मुक्त होकर आनन्द का अनुभव करती हैं जो आत्मा की सहजता है। आनन्दानुभूति में जीवात्मा भिन्न होती है। लेकिन उनमें कोई वैमनस्य नहीं होता और वे पवित्र होकर परब्रह्म को प्राप्त कर लेते हैं। लेकिन वे परमात्मा के बराबर नहीं हो सकतीं। वे परमात्मा की सेवा के लायक हो जाती हैं। नवधा भक्ति मार्ग से आत्मा परमात्मा की कृपा से मुक्ति प्राप्त कर लेती है।


बुधवार, 12 सितंबर 2018

हरितालिका पूजा विधि एवं व्रत कथा

आज हरितालिका व्रत है। इसे कुछ लोग इसे हरतालिका, कुछ लोग तीज भी कहते हैं। इसका सही नाम हरितालिका है। यह एक पौराणिक व्रत है। अवैधव्यकामा स्त्रियाँ इसे करती हैं, उन्हें इसकी शुभकामनायें।
               जिज्ञासावश आज मैंने इस व्रत के बारे में विशेष अध्ययन शुरु किया, ताकि इसकी प्राणाणिकता व स्रोत पता कर सकूँ। आभासी दुनियां में संस्कृत उद्धरण नहीं मिल सका। पाण्डुलिपियों की पड़ताल की तो पता चला कि यह व्रत कथा हरिवंश पुराण, स्कन्द पुराण, लिंग पुराण तथा भविष्योत्तर पुराण में आयी है। हरितालिका व्रतोद्यापन की पाण्डुलिपि भी मिली। अलग- अलग पाण्डुलिपियों की पुष्पिका से यही सूचना मिली। हरिवंश पुराण तथा लिंग पुराण पलटकर देख लिखा। दोनों मुद्रित पुस्तक में यह कथा नहीं मिली। सोचा, लघुतम मार्ग अपनाया जाया। रूद्रधर कृत वर्षकृत्य निकाला। यहाँ भविष्योत्तर पुराणोक्त हरितालिका व्रत कथा मिल गयी। भविष्योत्तर पुराण तथा स्कन्द पुराण की कथा एक सी है। व्रत विधि वर्णन श्लोक सं. 120 के बाद फलों आदि के नाम में परिवर्तन देखने को मिलता है। सम्भवतः यह स्थानभेद के प्रभाव के कारण पाठभेद हो,क्योंकि पूजा में ऋतुदेशोद्भवैः ऋतु तथा स्थान विशेष में पैदा होने वाले फूलों एवं फलों से पूजन का विधान है। मिथिला में भविष्योत्तर पुराणोक्त हरितालिका व्रत का चलन है।  
वैसे मैं सोचता हूँ। इस प्रकार की व्रत कथायें स्कन्द पुराण में बहुतायत क्यों होती हैआभासी दुनियां में कथा के मूल उत्स स्रोत पुराणों के मूल उद्धरण को रखा जाना चाहिए। अतः आज अपने ब्लॉग पर प्राणाणिक सामग्री उपलब्ध करने की कोशिश में हूँ।
करक चतुर्थी (करवा चौथ) पर प्रामाणिक व्रत कथा इसी ब्लॉग पर उपलब्ध करा चुका हूँ।
     हमारे देश में महिलाओं के लिए एक व्रत हैं, जिसे पत्नी अपने पति की लंबी उम्र के लिए करती है। इस व्रत को हरितालिका या तीज कहा जाता है। संस्कृत में सखी को तालि कहते हैं। हरिता तालिभिः या सा हरितालिका अर्थात् पार्वती। इस व्रत के नाम में ही इस की कथा छिपी हुई है। यह भाद्र पद के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हस्त नक्षत्र में मनाई जाती है।  हरितालिका तीज का व्रत निर्जला किया जाता है। अगले दिन सूर्योदय के पश्चात् अन्न और जल ग्रहण किया जाता है। प्रातः काल सूर्योदय से पूर्व ही जागकर नित्य नैमित्तिक कर्मों को पूर्णकर श्रद्धा व भावपूर्ण होकर संकल्प लेना चाहिए कि आज मैं कामना सिद्धि के लिए इस व्रत का पालन करूंगी। 

कैलास शिखर पर बैठी हुई पार्वती जी शिव जी से कहती हैं हे महेश्वर! हमे कोई गुप्त व्रत पूजन बतलाइये जो सरल हो और फल अधिक हो। हमने किस व्रत दान से आप को पतिरूप में प्राप्त किया यह सब बतलाइये।
शिवजी ने पार्वती जी से कहा कि जिस व्रत के प्रभाव से तुमने मेरा आधा आसन प्राप्त किया है, वह मैं तुम्हें बतलाता हूँ।
                            भाद्रे मासि सिते पक्षे तृतीया हस्तसंयुते।
                             तदनुष्ठानमात्रेण सर्वपापात् प्रमुच्यते।।
भाद्र मास में हस्त नक्षत्र से युक्त शुक्ल पक्ष तृतीया को उसका अनुष्ठान मात्र करने से स्त्रियां सभी पापों से मुक्त हो जाती हैं। 
पूजा विधि
हरितालिका तीज के दिन महिलाएं निर्जला व्रत रखती है। इस दिन शंकर-पार्वती की बालू या मिट्टी की मूति बनाकर पूजन किया जाता है। घर साफ-सफाई कर तोरण-मंडप आदि सजाया जाता है। एक पवित्र चौकी पर शुद्ध मिट्टी में गंगाजल मिलाकर शिवलिंग, रिद्धि-सिद्धि सहित गणेश, पार्वती व उनकी सखी की आकृति बनाएं। इसके बाद देवताओं का आवाहन कर पूजन करें। इसमें पूरी रात जागकर संकीर्तन किया जाता है।
हरतालिका तीज की व्रत कथा
जिनके दिव्य केशों पर मंदार (आक/ अकवन) के पुष्पों की माला, मस्तक पर चंद्रमा और कंठ में मुण्डों की माला पड़ी हुई है, जो पार्वती दिव्य वस्त्रों से तथा भगवान शंकर दिगंबर वेश धारण किए हैं, उन दोनों भवानी शंकर को नमस्कार करता हूं।
कैलाश पर्वत के सुंदर शिखर पर पार्वती ने महादेव  से पूछा -हे महेश्वर! मुझसे आप वह गुप्त से गुप्तवार्ता कहिए जो सबके लिए सब धर्मों से भी सरल और महान फल देने वाली हो। हे नाथ! यदि आप भली-भांति प्रसन्न है तो आप उसे मेरे सम्मुख प्रकट कीजिए। हे जगन्नाथ! आप आदि, मध्य और अंत रहित हैं । आपकी माया का कोई पार नहीं है। आपको मैंने कैसे प्राप्त किया? कौन से व्रत, तप या दान के पुण्य फल से मैं  आपकी पत्नी बनी। हे प्रभु! इस व्रत को मैंने कैसे किया था? आपसे वह सब मुझे सुनने की इच्छा है, सो कृपा करके कहिए।
 महादेव बोले- हे देवी ! सुनो मैं तुम्हारे सम्मुख उस व्रत को कहता हूं, हे प्रिये ! जिस व्रत के प्रभाव से तुमने मेरा आधा आसन प्राप्त किया। जो परम गुप्त है जिसे तारा गणों में चंद्रमा, ग्रहों में सूर्य, वर्णों में ब्राह्मण, देवताओं में गंगा, पुराणों में महाभारत, वेदों में साम और इंद्रियों में मन श्रेष्ठ है, पुराण और वेद का जो सर्वस्व है, जिसका वर्णन आगम ग्रन्थों में आया है। हे प्रिये! उसी का मैं तुमसे वर्णन करता हूं। उसे तुम एकाग्र मन से सुनो। भाद्रपद (भादो) मास के शुक्ल पक्ष की हस्त नक्षत्र, सोमवार संयुक्त तृतीया (तीज) के दिन इस व्रत का अनुष्ठान करने मात्र से सभी कामनाओं को पाया जाता है। हे देवि ! सुनो तुमने हिमालय पर्वत पर इसी महान व्रत को किया था जो मैं तुम्हें सुनाता हूं।
शंकर ने कहा- आर्यावर्त में हिमालय नामक एक महान पर्वत है। जहां अनेक सिंह, अनेक प्रकार के वृक्षों से सुशोभित, अनेक पक्षियों से गुंजित, अनेक मृग से सेवित है। जहाँ देवता, गन्धर्व सिद्ध, चारण और गुह्यक घूमते हैं। जहाँ सदा प्रसन्न रहने वाले गीत गाने में तत्पर गन्धर्व विचरण करते हैंजो सदैव बर्फ से ढके हुए तथा गंगा की कल कल ध्वनि से शब्दायमान रहता है। हे पार्वती! तुमने बाल्यकाल में उसी स्थान पर तप करते हुए 12 वर्ष तक अग्नि में रहकर (धूँआ पान करती हुई) अधोमुख होकर तप किया था। मेरे लिए 64 वर्षों तक पके फल तथा पत्ते खाकर मेरी आराधना की। तुम्हारे उस कष्ट को देखकर तुम्हारे पिता बार-बार दुःखित और चिंतित हुए।  मैं इस कन्या की शादी किससे करूं इस चिंता में तुम्हारे पिता बैठे थे कि देवर्षि नारद  वहां आए।  तुम्हारे पिता हिमालय ने देवर्षि नारद को अर्घ्य, पाद्य, आसन देकर सम्मान सहित बैठाया।
हिमालय ने कहा हे मुनीश्वर! आपके दर्शन से आज मेरा जन्म सफल हो गया। आज मेरा सभी कर्म सफल हो गया। जिससे मैं बहुत दुःखी था, वह मेरी चिंता दूर हो गयी। हे मुनिवर! यह कन्या मैं किसे दूँ, यह मुझे कहें।
नारद बोले- हे गिरिराज ! मैं विष्णु भगवान का भेजा हुआ यहां आया हूं। तुम मेरी बात सुनो- आप अपनी कन्या को उत्तम वर को दान करें।  ब्रह्मा ,इंद्र, शिव आदि देवताओं में विष्णु भगवान के समान कोई भी उत्तम नहीं है। इसीलिए मेरे मत से आप अपनी कन्या का दान भगवान विष्णु को ही दें।
 हिमालय बोले- यदि भगवान वासुदेव स्वयं ही कन्या को ग्रहण करना चाहते हैं। इस कार्य के लिए ही आपका आगमन हुआ है, तो मेरे लिए गौरव की बात है। मैं अवश्य उन्हें ही दूंगा। हिमालय का यह आश्वासन सुनते ही देवर्षि नारद  आकाश में अंतर्ध्यान हो गए। नारद शंख, चक्र, गदा, पद्म एवं पीतांबरधारी भगवान विष्णु के पास पहुंचे। नारद  ने हाथ जोड़कर भगवान विष्णु से कहा- प्रभु ! आपका विवाह कार्य निश्चित हो गया है। इधर हिमालय ने पार्वती  से प्रसन्नतापूर्वक कहा- हे पुत्री ! मैंने तुमको गरुड़ध्वज भगवान विष्णु को अर्पण कर दिया है।  पिता के इन बातों को सुनते ही पार्वती अपनी सहेली के घर गई और पृथ्वी पर गिर कर अत्यंत दुखी होकर विलाप करने लगी। उनके विलाप को देखते हुए सखी बोली हे देवी! तुम किस कारण से दुख पाती हो मुझे बताओ मैं अवश्य तुम्हारी इच्छा पूर्ण करूंगी।
 पार्वती बोली सखी! सुन मेरी जो मन की अभिलाषा है सुनाती हूं। मैं  महादेव का वरण करना चाहती हूं। मेरे इस कार्य को पिता ने बिगाड़ना चाहा है, इसीलिए मैं निःसंदेह इस शरीर का त्याग करूंगी। पार्वती के इन वचनों को सुनकर सखी ने कहा- हे देवी! जिस वन को तुम्हारे पिता ने नहीं देखा हो तुम वहां चली जाओ। तब हे पार्वती! तुम अपनी सखी का यह वचन सुन ऐसे ही वन को चली गई। पिता हिमालय ने तुमको  घर पर न पाकर सोचा कि मेरी पुत्री को कोई देव-दानव अथवा किन्नर हरण करके ले गया है। मैंने नारद  को वचन दिया था कि मैं पुत्री का भगवान विष्णु के साथ विवाह करूंगा। हाय, अब यह कैसे पूरा होगा? यह सोचकर वह बहुत चिंतातुर हो मूर्छित हो गए। तब सब लोग हाहाकार करते हुए दौड़े। मुरझा दूर होने पर गिरिराज से बोले-  हमें आप अपनी मूर्छा का कारण बताओ। हिमालय बोले- मेरे दुख का कारण यह है कि मेरी रत्न रूपी कन्या को कोई हरण कर ले गया है या सांप डस गया या किसी सिंह या व्याघ्र या राक्षस ने मार डाला है। वह न जाने कहां चली गई है। इस प्रकार कहकर कर गिरिराज दुःखित हो कर ऐसे कांपने लगे जैसे तीव्र वायु के चलने पर कोई वृक्ष कांपता है। तत्पश्चात् हे पार्वती ! तुम्हें साथियों सहित गिरिराज घने जंगल में ढूंढने निकले। सिंह, व्याघ्र, रीछ आदि हिंसक जंतुओं के कारण वन महाभयानक प्रतीत होता था। तुम भी सखी के साथ भयानक जंगल में घूमती हुई वन में एक नदी के तट पर एक गुफा में पहुंची । उस गुफा में तुम अपनी सखी के साथ प्रवेश कर गई, जहां तुम अन्न जल का त्याग करके बालू का लिंग बनाकर मेरी आराधना करती रही। उस समय पर भाद्रपद मास की हस्त नक्षत्र युक्त तृतीया के दिन तुमने मेरा विधि विधान से पूजन किया तथा रात्रि को गीत गायन करते हुए जागरण किया। तुम्हारे उस महाव्रत के प्रभाव से मेरा आसन डोलने लगा। मैं उसी स्थान पर आ गया जहां तुम और तुम्हारी सखी दोनों थी। मैंने आकर तुमसे कहा- हे वरानने ! मैं तुमसे प्रसन्न हूं। तुम मुझसे वरदान मांगो। तुमने कहा कि हे देव ! यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं तो आप महादेव  ही मेरे पति हो। मैं तथास्तु कहकर कैलाश पर्वत को चला गया। प्रभात होते ही तुमने मेरी उस बालू की प्रतिमा को नदी में विसर्जित कर दिया। सुबह तुमने वहां अपनी सखी सहित व्रत का पारायण किया। इतने में तुम्हारे पिता हिमवान भी तुम्हें ढूंढते-ढूंढते उसी घने वन में आ पहुंचे। उस समय उन्होंने नदी के तट पर 2 कन्याओं को देखा। वेह तुम्हारे पास आ गए और तुम्हें हृदय से लगा कर रोने लगे। बोले- बेटी तुम इस सिंह, व्याघ्र आदि से युक्त घने जंगल में क्यों चली आई। तुमने कहा- हे पिता ! मैंने पहले ही अपना शरीर शंकर  को समर्पित कर दिया था, किंतु आपने इसके विपरीत कार्य किया इसलिए मैं वन में चली आई। ऐसा सुनकर हिमवान् ने तुमसे कहा कि मैं तुम्हारी इच्छा के विरुद्ध कार्य नहीं करूंगा। तब वह तुम्हें लेकर घर को आए और तुम्हारा विवाह मेरे साथ करा दिया। हे प्रिये ! उसी व्रत के प्रभाव से तुमको मेरा आधा आसन प्राप्त हुआ है। इस व्रतराज को मैंने अभी तक किसी के सम्मुख वर्णन नहीं किया है।
हे देवी! तुमको सखी हरण करके ले गई थी इसलिए इस व्रत का नाम हरितालिका पड़ा।
पार्वती बोली- स्वामी आपने इस प्रकार का नाम तो बता दिया, किंतु मुझे इस व्रत को करने की विधि एवं फल भी बताइए। इसको करने से किस फल की प्राप्ति होगी?

भगवान शंकर  बोले- इस स्त्री जाति के अति उत्तम व्रत की विधि सुनिए-  सौभाग्य की इच्छा रखने वाली स्त्रियां इस व्रत को विधि पूर्वक करें। केले के खंभों से मंडप बनाकर उसे वंदनवारों से सुशोभित करें। उसमें विविध रंगों के उत्तम रेशमी वस्त्र की चांदनी ऊपर ध्यान दें। चंदन आदि सुगंधित द्रव्यों का लेपन करके स्त्रियां एकत्र हो। शंख, भेरी, मृदंग आदि बजावे। विधि पूर्वक मंगलाचरण करके  गौरी शंकर की बालू निर्मित प्रतिमा स्थापित करें। भगवान शिव पार्वती  का गंध, पुष्प आदि से विधिपूर्वक पूजन करें। अनेकों नैवेद्यों का भोग लगावे। नारियल, सुपारी, लौंग, नींबू, अनार, नारंगी आदि फलों तथा फूलों को एकत्र करके धूप दीप आदि से पूजन करके कहे- हे कल्याण स्वरूप शिव ! हे मंगल रूप शिव! हे मंगल रूप माहेश्वरी ! हे शिवे ! शुभकामनाओं को देने वाली देवी ! कल्याण रूप तुम्हें नमस्कार है। कल्याण स्वरूप पार्वती हम तुम्हें नमस्कार करते हैं। भगवान शंकर  को सदैव नमस्कार करते हैं। हे ब्रह्म रूप में जगत का पालन करने वाली मां आपको नमस्कार है। हे सिंह वाहिनी! मैं सांसारिक भय से व्याकुल हूं। तुम मेरी रक्षा करो। हे महेश्वरी! मैंने इसी अभिलाषा से आप का पूजन किया है। हे पार्वती ! आप मेरे ऊपर प्रसन्न होकर मुझे सुख और सौभाग्य प्रदान कीजिए। इस प्रकार के शब्दों द्वारा उमा सहित शंकर  का पूजन करें। विधि पूर्वक कथा सुनकर गाय, वस्त्र, आभूषण आदि ब्राह्मणों को दान करें। सौभाग्य की कामना करने वाली स्त्रियां रात्री में जागरण करते हुए वाद्य यन्त्र बजाकर गीत गाते हुए रात्रि जागरण करे। इस प्रकार से व्रत करने वाले के सब पाप नष्ट हो जाते हैं।
मूल संस्कृत
तृतीया च परयुता ग्राह्या, यदा परदिने विधिवशान्नास्ति तदा पूर्वयुतापि ग्राह्या । तत्र प्रातः  तिलामलकेन केशान्‌ संशोध्य स्नात्वा पट्टवस्त्रं परिधाय वालुकामयीं उमामहेश्वरमूर्तिं विधाय, कदलीस्तम्भमण्डिते पीठे संस्थाप्य पूजयेत्‌ । अथ पूजाप्रयोग: । 
आचम्य नमोस्यां भाद्रे मासि शिक्ले पक्षे तृतीयायां तिथौ ममेह जन्मनि सप्तजन्माखण्डित-राज्यसुखसौभाग्यपुत्रपौत्राद्यभिवृद्धयर्थं श्रीउमामहेश्वरप्रीत्यर्थं हरितालिकाव्रताङ्गभूतं यथामिलितोपचारद्रव्यै: श्रीउमामहेश्वरप्रीत्यर्थं पूजनमहं करिष्ये । तदङ्गं गणपतिपूजनं कलशघण्टापूजनं करिष्ये । महागण० । वक्रतुण्ड० । कलशस्य० । वरुणाय० । अपवित्र:० पूजासम्भारान्‌ प्रोक्ष्य, ब्राह्मणद्वारा प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा ध्यायेत्‌ ।

पीतकौशेयवसनां हेमाभां कमलासनाम्‌ ।
भक्तानां वरदां नित्यं पार्वतीं चिन्तयाम्यहम्‌ ॥१॥

आवाहनम्
मन्दारमालाकुलितालकायै कपालमालाङ्कितशेखराय ।
दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नम: शिवायै च नम: शिवाय ॥२॥
श्रीउमामहेश्वराभ्यां नम: उमामहेश्वरौ ध्यायामि ॥
देवि देव समागच्छ प्रार्थयेऽहं जगन्मये ।
इमां मया कृतां पूजां गृहाण सुरसत्तमे ॥
आसनम्
भवानि त्वं महादेवि सर्वसौभाग्यदायिके ।
अनेकरत्नसंयुक्तमासनं प्रतिगृह्यताम् ॥ आसनं समर्पयामि ॥
सुचारु शीतलं दिव्यं नानागन्धसमन्वितम्‌ ।
पाद्यं गृहाण देवेशि महादेवि नमोऽस्तु ते ॥ पाद्यं समर्पयामि ॥ 
श्रीपार्वति महाभागे शङ्करप्रियवादिनि ।
अर्ध्यं गृहाण कल्याणि भर्त्रा सह पतिव्रते ॥ अर्ध्य समर्पयामि ॥
गङ्गाजलं समानीतं सुवर्णकलशे स्थितम्‌ ।
आचम्यतां महाभागे रुद्रेण सहितेऽनघे ॥ आचमनीयं समर्पयामि ॥
गङ्गासरस्वतीरेवापयोष्णीनर्मदाजलै: ।
स्नापितासि मया देवि तथा शान्तिं कुरुष्व मे ॥ स्नानीयं जलं समर्पयामि ॥
कामधेनुसमुद्भूतं दुग्धं चामृतमुत्तमम्‌ ।
स्नानार्थं च मयाऽऽनीतं गृहा० ॥ पयस्स्नानं समर्पयामि ॥
शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि एवं सर्वत्र ॥ 
गोदुग्धं विकृतं देवि दधिरूपं गुणान्वितम्‌ ।
स्नानार्थं च मया दत्तं स्वीकुरु त्वं जगत्प्रिये ॥ दधिस्नानं समर्पयामि ॥
गोघृतं च मयाऽऽनीतं देवानां हविरुत्तमम्‌ ।
पावनं सर्वलोकानां गृहाण सुरसुन्दरि ॥ घृतस्नानं समर्पयामि ॥
पुष्पेभ्य: सारमादाय मक्षिकाभि: कृतं मधु ।
स्नानार्थं च मया दत्तं गृहाण सुरपूजिते ॥ मधुस्नानं समर्पयामि ।
शर्करा च सिता श्रेष्ठा इक्षुसारसमुद्भवा ।
स्नानार्थं च मया दत्ता गृहाण परमेश्वरि ॥ शर्करास्नानं समर्पयामि ॥ गन्धोदकस्नानं समर्पयामि ॥
अभ्यङ्गार्थं मयाऽऽनीतं तैलं पुष्पादिवासितम्‌ ।
प्रयत्नेनार्जितम शुद्धं गृहा० ॥ सुगन्धतैलस्नानं० ॥
अङ्गोद्वर्तनकं देवि कस्तूर्या कुङ्कुमेन च।
अन्यै: सुगन्धद्रव्यैश्च निर्मितं प्रति० ॥ अङ्गोद्वर्तनकं स० ॥
नानातीर्थादाहृतं च तोयमुष्णं मया कृतम्‌ । स्नानार्थं च मया दत्तं गृह्यतां० ॥
उष्णोदस्नानं समर्पयामि ॥ पञ्चोपचारपूजां कृत्वा, अभिषेक: । महिम्न: पारन्ते० सुरास्त्वा० इत्यादिभि: । स्नानानन्तरेण आचमनीयं समर्पयामि ।
पार्वति प्रतिगृह्ण त्वमम्बिके शिववल्लभे ।
सुवेषकारकं वासो लज्जाया वारणं परम्‌ ॥ वस्त्रं समर्पयामि ॥
पीततन्तुयुतां दिव्यां रक्तकौशेयसम्भवाम्‌ ।
मुञ्चन्मुक्तावलीयुक्तांकञ्चुकीं प्रति० ॥ कञ्चुकीं सम समर्पयामि ॥
उमाकान्त नमस्तुभ्यं रक्ष मां भवसागरात्‌ ।
उपवीतं सोत्तरीयं गृहाण जगदीश्वर ॥ यज्ञोपवीतं समर्पयामि ॥
कण्ठसूत्रं ताडपत्रं हरिद्रां कुङ्कुमाञ्जनम्‌ ।
सिन्दूरादि प्रदास्यामि सौभाग्यं देहि मेऽव्ययम्‌ । सौभाग्यद्रव्यं समर्पयामि ॥
कुङ्कुमागरुकर्पूरकस्तुरीरोचनायुतम्‌ ।
विलेपनं महादेवि गन्धं दास्यामि भक्तित: ॥ चन्दनं समर्पयामि ॥
रञ्जिता: कुङ्कुमाद्येन अक्षताश्चातिशोभना: ।
भक्त्या समर्पितास्तुभ्यं प्रसन्ना भव पार्वति ॥ अक्षतान्‌ समर्पयामि ॥
सेवन्तिकाबकुलचम्पकपाटलाब्जै: पुन्नागजातिकरवीररसालपुष्पै: ।
बिल्वप्रवालतुलसी दलमालतीभिस्त्वां पूजयामि जगदीश्वरि मे प्रसीद ॥ पुष्पाणि समर्पयामि ॥
॥ अथाङ्गपूजा ॥ पुष्प लेकर अर्पण करते चलें।
१. उमायै नम:पादौ पूजयामि ।
२. गौर्यै नम: जङ्घे पूजयामि ।
३. पार्वत्यै० जानुनी पू० ।
४. जगद्धात्र्यै० ऊरू पूज० ।
५. जगत्प्रतिष्ठायै० कटी पू० ।
६. शान्तिरूपिण्यै० नाभिं० ।
७. देव्यै नम: उदरं पू० ।
८. लोकवन्दितायै० स्तनौ० ।
९. कल्याण्यै० हस्तौ पू० ।
१०. काल्यै न० कण्ठं पू० ।
११. शिवायै० मुखं पू० ।
१२. भवान्यै न० नेत्रे पू० ।
१३. रुद्राण्यै० कर्णी पू० ।
१४. शर्वाण्यै० ललाटं० ।
१५. मङ्गलदात्र्यै० शिर:० ।
१६. पार्वत्यै न० सर्वाङ्गं० ।
॥ अथ पत्रपूजा ॥
१. दुर्गायै न० अपामार्गप० ।
२. कात्यायन्यै० दाडिमप० ।
३. मङ्गलायै० अर्कपत्रं० ।
४. सुभद्रायै० जातीपत्रं० ।
५. भवान्यै न० बदरीपत्रं० ।
६. शिववल्लभा० देवदारु० ।
७. अम्बिकायै० धत्तूरपत्रं० ।
८. पार्वत्यै न० भृङ्गिराजप० ।
९. कल्याण्यै० अगस्तिप० ।
१०. रुद्राण्यै० बिल्वपत्रं० ।
११. शिवायै न० शतपत्रं० ।
१२. दक्षयज्ञविध्वंसिन्यै० करवीरपत्रं० ।
१३. विन्ध्यवा सिन्यै० चम्पक०
१४. महिषासुरमर्दिन्यै० दूर्वापत्रं० ।
१५. परमेश्वर्यै० शमीप० ।
१६. वाराह्यै० तुलसीप० ।
१७. वृषभवाहिन्यै० अर्जुनपत्रं० ।
१८. भक्तवत्सलायै० विष्णुकान्तपत्रं० ।
देवद्रुमरसोद्‌भूत: कृष्णागरुसमन्वित: ।
आनीतोऽयं मया धूपो भवानि प्रति० ॥ धूपं समर्पयामि ॥
त्वं ज्योति: सर्वदेवानां तेजसां तेज उत्तमम्‌ ।
आत्मज्योति: परं धाम दीपोऽयं प्रति० ॥ दीपंद समर्पयामि ।
अन्नं चतुर्वि० नैवेद्यं० ॥ आचमनीयं समर्पयामि ॥
मलयाचलसम्भूतं कर्पूरेण समन्वितम्‌ ।
करोद्वर्तनकं चारु गृ० ॥ करोद्वर्तनं समर्पयामि ॥
नारिकेलं सनारिङ्गं कदली पनसं तथा ।
जम्बीरं श्रीफलं पूगं मातस्त्वं प्रति० ॥ फलं स समर्पयामि ॥
कर्पूरैलालवङ्गादिनागवल्लीदलैर्युतम्‌ ।
खदिरक्रमुकैर्युक्तं ताम्बूलं प्रति० ॥ ताम्बूलं समर्पयामि ॥
प्रजाफलप्रसिध्यर्थं तवाग्रे स्वर्णमीश्वरि ।
दक्षिणार्थं मया भक्त्या कल्पितं प्रति० ॥ दक्षिणां समर्पयामि ॥
आर्तिक्यं गिरिजे तुभ्यं मया दत्तं शिवप्रिये ।
तेन सन्तानवृद्धिं मे कुरु कल्याणकारके ॥ कर्पूरदीपं समर्पयामि आर्तिक्यदीपं समर्पयामि ॥
भवानि कमले देवि शङ्करप्राणवल्लभे ।
त्वमेव सर्वदेवानां पूजनीया सदाशिवा ॥ पुष्पाञ्जलिं समर्पयामि ॥
यानि कानि च० प्रदक्षिणां समर्पयामि ॥
नम: सर्वहितार्थायै जगत: सर्वहेतवे ॥
साष्टाङ्गोऽयं प्रणामोऽस्ति प्रणयेन मया कृत: ॥ नमस्कारान्‌ समर्पयामि ।
पुत्रान्देहि धनं देहि सौभाग्यं देहि सुव्रते ।
अन्यांश्च सर्वकामांश्च देहि देवि नमोऽस्तु ते ॥ प्रार्थनां समर्पयामि ॥
यस्य स्मृ० । अनेन मया कृतेन पूजनेन श्रीउमामहेश्वरौ प्रीये ताम्‌ । तत:वायनं दद्यात्‌ ॥ अद्य० र्थं पूजासाङ्गतासिध्यर्थं ब्राह्मणाय सौभाग्यद्रव्यसहितवायनप्रदानं तदङ्गं बाह्मणपूजनं च करिष्ये । गन्धा: पान्तु स्वस्त्यस्तु दी० ।
अन्नं सद्वंशपात्रस्थं सवस्त्रफलदक्षिणम्‌ ।
वायनं गौरि विप्राय ददामि प्रीतये तव ॥
सौभाग्यारोग्यकामानां सर्वसम्पत्समृद्धये ।
गौरीगिरीशतुष्टर्थं वायनं ते ददाम्यहम्‌ ॥
इदं सौभाग्यवायनं अमुकश० ददे । प्रति० प्र० । दानसाङ्गतासिध्यर्थं इमां दक्षि० । अनेन वायनदानेन श्रीउमामहेश्वरौ प्रीयेताम्‌ । रात्रौ पञ्चोपचारपूजां कृत्वा नृत्यगीतपुर:सरं जागरंणं कुर्यात्‌ । कथां श्रृणुयात्‌ । तत प्रभाते पञ्चोपचारपूजां कृत्वा दधिभक्तनैवेद्यं समर्प्य यान्तुदेवेति विसृज्य, नद्यां प्रक्षिपेत्‌ । स्वयं पारणां कुर्यात्‌ ।
॥ अथ हरितालिकाकथाप्रारम्भ: ॥
सूत उवाच ।
                   मन्दारमालाकुलितालकायै कपालमालाङ्कितशेखराय ।
                   दिव्याम्बरायै च दिगम्बराय नम: शिवायै च नम: शिवाय ।।
कैलासशिखरे रम्ये गौरी पृच्छति शङ्करम्‌ ।
गुह्याद्‌ गुह्यतरं गुह्यं कथयस्व महेश्वर ॥
सर्वेषां सर्वधर्मस्वमल्पायासेन यत्फलम्‌ ।
प्रसन्नोऽसि जगन्नाथ तथ्यं ब्रूहि जगत्प्रभो ॥
केन व्रतप्रभावेण तपोदानेन शङ्कर ।
अनादिमध्यनिधनो भर्त्ता त्वं च जगत्प्रभु: ॥
मया प्राप्तोऽसि देवेश न जाने तत्सदाशिव ।
कथयस्व महादेव यद्यहं तव वल्लभा ॥
ईश्वर उवाच ॥
श्रृणु देवि प्रवक्ष्यामि तवाग्रे व्रतमुत्तमम् ।
येन व्रतप्रभावेण प्राप्तमर्धासनं प्रिये ॥
यद्‌ गुह्यं मम सर्वस्य कथयामि तव प्रिये ।
यथा ह्युडुगणे चन्द्रो ग्रहाणां भानुरेव च ॥
वर्णानां तु यथा विप्रो देवानां विष्णुरुत्तम: ।
नदीनां तु यथा गङ्गा पुराणानां तु भारतम्‌ ॥
वेदानां तु यथा साम इन्द्रियाणां मनो यथा ।
पुराणवेदसर्वस्वमागमेषु यथोदितम्‌ ॥
तदेकाग्रेण मनसा श्रृणुष्वेदं सनातनम्‌ ।
भाद्रे मासि सिते पक्षे तृतीया हस्तसोमयुक्‌ ॥१०॥
तस्यानुष्ठानमात्रेण सर्वान्‌ कामानवाप्नुयात्‌ ।
श्रृणु पूर्वं तु यद्देवि त्वया तस्यामनुष्ठितम्‌ ॥
तत्सर्वं कथयिष्यामि यथा वृत्तं हिमाचले ।
पार्वत्युवाच ॥
कथं पूर्वं मया चीर्णं व्रतानामुत्तमं व्रतम्‌ ॥
तत्सर्वं श्रोतुमिच्छामि त्वत्सकाशाद् वृषध्वज ।
ईश्वर उवाच ॥
अस्ति तत्र महान्‌ दिव्यो हिमवान्‌ पर्वतेश्वर: ॥
नानासिंहसमायुक्तो नानाद्रुमसमाकुल: ।
नानापक्षिगणैर्युक्तो नानामृगनिषेवित: ॥
यत्र देवा: सगन्धर्वा: सिद्धचारणगुह्यका: ।
विचरन्ति सदा हृष्टा गन्धर्वा गीततत्परा: ॥
स्फाटिकै: काञ्चनै: श्रृङ्गैर्मणिवैडूर्यमण्डितै: ।
भुजैर्लिखति चाकाशं चित्रको मन्दिरं यथा ॥
हिमेनापूरित: सर्वो गङ्गाध्वनिविराजित: ।
नृत्यन्त्यप्सरसो यत्रशोभमानो नगेश्वर: ॥
तत्र त्वं पार्वती बाल्ये आचरन्ती महत्तप: ।
द्वादशाब्दानि देवेशि धूमपानमधोमुखी ॥
भूत्वा त्वं मन्निमित्तेन मदाराधनतत्परा ।
संवत्सरचतुःषष्टि पक्वपर्णाशनं त्वया ॥
दृष्ट्वा तातेन ते कष्टं दु:खितश्चिन्तया भृशम्‌ ।
इत्येवं चिन्तयाविष्टो देवर्षिर्नारदोऽभ्यगात्‌ ॥२०॥
पाद्यार्घ्याचमनं स्थानं नारदाय ददौ गिरि: ।
हिमवानुवाच ॥
अद्य मे सफलं जन्म अद्यमे सफला: क्रिया: ॥
गतं चाद्य जडत्त्वं मे यज्जातं तव दर्शनम्‌ ।
गताद्य मानसी चिन्ता ययाहं दुःखितो भृशम्‌ ॥
कन्यारत्नमिदं कस्मै देयं तद ब्रहि मे मुने ।
नारद उवाच ॥
शृणु शैलेन्द्र मद्वाक्यं विष्णुना प्रेषितोऽस्म्यहम्‌ ॥
योग्यं योग्याय दातव्यं कन्यारत्नमिदं त्वया ।
वासुदेवसमो नास्ति ब्रह्माद्या ये सुरेश्वरा: ॥
चतुर्वर्गस्य दात्रे वै दीयतां मम सम्मतम्।
गिरिरुवाच ॥
वासुदेवसमो देव: कन्यां प्रार्थयते यदि ॥
तस्मै देया मया कन्या त्वदागमनगौरवात्‌ ।
इत्येवं गदितं श्रुत्वा वैकुण्ठं नारदो ययौ ॥
प्रीत: पीताम्बरधरं शङ्खचक्रगदाधरम्‌ ।
चतुर्भुजं वासुदेवं नमस्कृत्वाभ्यभाषत ॥
श्रृणु देव विवाहार्थं गन्तव्यं शैलजां प्रति ।
तेन दत्तं प्रतिग्राह्यं कन्यारत्नं सुशोभम्‌ ॥
हिमवांस्तु तदा गौरीमुवाचातीव हर्षित: ।
दत्तासि त्वं मया देवि देवराट्‌ गरुडध्वजे ॥
श्रुत्वा वाक्यं पितुर्देवी सख्या सार्धं वनान्तरम्‌ ।
गता ह्यनशनं ग्राह्यं तपस्तप्तुं सुदुःखिता ॥३०॥
सख्युवाच ॥
किमर्थं नगपुत्रि त्वं दु:खिता तप्यसे पुन: ।
को वा कामोऽभिलषित: सखि ज्ञातो न वै शुभे ॥
पार्वत्युवाच ॥
सखि श्रृणु महान्‌ कामो मनसा चिन्तितो मया ।
अल्पेन तपसा किं स प्राप्यते माद्दशै:खलु ॥
अतस्त्वया सह पुन:प्राप्ता तप्तुं वनान्तरम्‌ ।
सख्युवाच ॥
को वा कामोऽभिलषितो योऽल्पेन तपसा नरै: ॥
न प्राप्यते स मे ब्रूहि उपायञ्चिन्तयामि वै ।
पार्वत्युवाच ॥
कैलासशिखरासीनं देवदेवं वृषध्वजम्‌ ॥
भर्तृत्वेनैव मनसा कामेनाहं न संशय: ।
सोऽयं कामो महानद्य तातेन कृतमन्यथा ॥
तस्माद देहपरित्यागं करिष्ये तन्मनस्कका ।
पार्वत्या वचनं श्रुत्वा सखीवचनमब्रवीत्‌ ॥
नगपुत्रि महद्भाग्यं प्रार्थिता विष्णुना यत: ।
स सेव्यो दैवतै: सर्वैर्महेन्द्रादिपुरोगमै: ॥
यस्यैकगुणलेशेन गुणवन्तो भवन्ति हि ।
सगुणानामनन्तत्वादनन्त इति विश्रुत: ॥
देवानां कन्यका भद्रे स्वकीयां चेष्टदेवताम्‌ ।
सम्पूज्य यस्य दास्यन्ता: प्रार्थयन्ति दिवानिशम्‌ ॥
अतिभाग्यवशाद देवि माहिष्यं प्राप्यते त्वया ।
किञ्च या पायसं त्यक्त्वा भिक्षार्थं गम्यतेऽन्यत: ॥४०॥
प्राप्यापि कामदं देवं प्रार्थ्यते कामदाहक: ।
अस्ति काचित्‌ क्वचिद देवि त्रिलोक्यां त्वद्विना प्रिये ॥
नरोत्तमाय दत्तासि तव पित्रा शुभं कृतम्‌ ।
मा शोचस्व निवर्त्तस्व न जानासि गुणांस्तयो: ॥
भ्रामितास्यथवा केन श्रृणुष्वेकमनानघे ।
किरीटी केशवो देवो जटी मृत्युञ्जयोऽनघे ॥
केशव: सुमुखो भद्रे स च भीममुख:सदा ।
सुपङक्ती रक्तदन्तश्च विपङ्क्ती दीर्घदंष्ट्रक: ॥
रत्नकुण्डलवान्‌ विष्णुर्नागकुण्डलवान्‌ शिव: ।
विष्णु: कमलनेत्रश्च ज्वलन्नेत्र: सदाशिव: ॥
चतुर्भुजधरो विष्णु: स वै द्शभुजो महान्‌ ।
श्रीवत्सं लाञ्छनं विष्णो: शिवस्य ब्रह्मण: शिर: ॥
पीताम्बरधरो विष्णु: स च चर्माम्बर: सदा ।
पद्मपाणिर्युवा विष्णु: स वृद्ध: शूलपाणिधृक् ॥
अम्लानपद्ममालास्यो मुण्डमालाप्रिय: स च ।
कण्ठेऽस्य कौस्तुभं रत्नं तस्य कण्ठे विषं सदा ॥
वाहनं गरुडो देवि जरठोक्षा शिवस्य च ।
शेषपर्यङ्कशायी स्याच्चिताभस्मशय: स च ॥
गन्धर्वध्वनिना हृष्टो भूतानां रोदनेन स: ।
विष्णुर्भोगी स योगी च कथं चकमसे शिवम्‌ ॥५०॥
पार्वत्युवाच ॥
न जानासि विमूढा त्वं योगिनं शूलपाणिनम्‌ ।
यस्याज्ञा सात्विको विष्णुस्त्रिलोकीं पाति नान्यथा ॥
राजसेन स्वरूपेण ब्रह्मा सृष्टिं विधास्यति ।
तामसेन स्वरूपेण रुद्रोऽत्ति सकलं रुषा ॥
गुणातीतस्य वै शम्भौ: को वेत्ति महिमां शुभाम्‌ ।
यस्याज्ञा कमठो भूत्वा विष्णु: पृथ्वीं दधार वै ॥
पुन: स शूकरो भूत्वा तां च दन्ते दधार वै ।
यद्दत्तान्‌ भुञ्जते भोगान्‌ विष्णुर्भोगीति वक्ष्यते ॥
सहस्त्रकमलै: पूर्वं विष्णुनाऽऽराधित: शिव: ।
विकुण्ठं स श्रियं तेजस्तेन दत्तं निजं क्षणात्‌ ॥
इन्द्रादीनां तु यो दाता स देवो न श्रुतस्त्वया ।
यद्दत्तं देवराज्यं तु इन्द्रो वै भुञ्जते सुखम्‌ ॥
कुबेरेणापि महती श्रीरवाप्ता वरानने ।
वरुणेन जलेशत्वं शेष:पातालसंस्थितिम्‌ ॥
सूर्यस्तपति यद्भीत्या वायुर्वाति दिवानिशम्‌ ।
यम: संयमनीशत्वं स देव: किं न वेत्स्यसि ॥
यस्याज्ञया स्वकालेऽपि मेघा वर्षन्ति सर्वत: ।
पावक: सर्वदेवानां वदनं भविताऽनघे ॥
पितर: पितृलोकत्वं मत्पिता पर्वतेशताम्‌ ।
चन्द्रो ह्युडुगणेशत्वं समुद्रो वै गभीरताम्‌ ।
यस्याज्ञया स्वकाले वै वर्त्तन्त्यादेशवर्तिन: ॥
वृष्टि: शीतं च घर्मश्च स्वकाले च गमागम: ।
शक्राद्या अपि दिक्पाला: स्वदिशं पालयन्ति ते ॥
येषु कृत्येषु ये देवा योजितास्ते तु तत्परा: ।
अन्यथा करणे तेषां स च दण्डं विधास्यति ॥
परात्परा: स वै देवो निर्गुण: सगुणोऽपि स: ।
निराकारश्च साकारो योगी भोगी स एव हि ॥
केवलो निर्गुण: साक्षी क्षरश्चाक्षर एव स: ।
को वेद तस्य तद्रूपं यद ब्रह्मेति प्रचक्षते ॥
ब्रह्माद्या देवता: सर्वा ऋषयश्च तपोधना: ।
योगिगो ज्ञाननिष्ठा ये यदर्थे त्यक्तबन्धना: ॥
तेऽपि तस्य न जानन्ति स्वरूपं सखि शूलिन: ।
अतस्तं चकमेऽहं वै शूलिनं तं पर्ति शुभे ॥
सख्युवाच ॥
सम्यक्कामोऽभिलषितस्तदर्थे त्यक्तजीविता ।
यत्र वै निश्चिता बुद्धि: स कामो भवति ध्रुवम्‌ ॥
ममापि च महद्भाग्यं यतस्त्वत्कर्मकारिका ।
किञ्चिद्विज्ञप्तुमिच्छामि यदि त्वं श्रूयसे वच: ॥
अम्बिकापूजनं कार्यं तन्मया कामदं श्रुतम्‌ ।
तवेष्टकर्त्री या देवी सापि पूज्या प्रयत्नत: ॥७०॥
मयि चानुग्रहो देवि मयि प्रीतिरनुत्तमा ।
अनुज्ञादानमात्रेण निजं सफलतां नय ॥
करिष्याम्यहमप्येतद गौर्या: पूजनमुत्तमम्‌ ।
तथेति संमतं कृत्वा नीतासि त्वं महद्वनम्‌ ॥
पिता निरीक्षयामास हिमवांस्तु गृहे गृहे ।
केन नीता त्वसौ पुत्री देवदानवकिन्नरै: ॥
सत्यं कृतं च ऋषिणा किं दास्ये गरूड्ध्वजे ।
इत्येवं चिन्तयाविष्टो मूर्छितो निपपायात ह ॥
हाहा कृत्वा ततो लोका: प्रधावन्ति गिरिं प्रति ।
आगत्य मुनय: सर्वे पप्रच्छुस्तं हिमाचलम्‌ ॥
किमर्थं मूर्छतां प्राप्त: कथयस्व हृदि स्थितम्‌ ।
गिरिरुवाच ॥
सदर्थं दुःखसम्भ्रान्त: कन्यारत्नं हृतंमम ॥
दृष्टा वा कालसर्पेण सिंहव्याघ्रेण वा हता ।
न जाने क्व गता पुत्री केन दुष्टेन वा हृता ॥
पतित: शोकसन्तप्तो वातेनेव तरुर्यथा ।
निर्गतो गिरिराजस्तु दुहिताया गवेषणो ॥
महादेव उवाच ॥
गत्वाऽथ विपिनं घोरं सिंहशार्दूलसङ्कुलम्‌ ।
व्याघ्रसिंहैश्च भल्लूकैर्युध्यमानैमहागजै: ॥
तस्मिन्वने महाघोरे व्रजन्ती सखिभिर्युता ।
दृष्ट्वा तत्र नदी रम्यां वनमध्ये गुहान्तरे ॥८०॥
उपविष्टाऽऽलिभि:साकमन्नाहारविवर्जिता ।
संस्थाप्य वालुकापिण्डं पार्वत्या सहितं मम ॥
हरतनक्षत्रसंयुक्ता मासि भाद्रे सिता जया ।
तत्र वाद्येन गीतेन रात्रौ जागरणं कृतम्‌ ॥
तेन व्रतप्रभावेण त्वासनं चलितं मम ।
प्राप्तोऽहं देवि तत्रैव यत्र त्वं सखिभि:सह ॥
प्रकरोषि मम प्रीत्या मदाराधनमुत्तमम्‌ ।
गुरुपदिष्टविधिना तेन तुष्टो भृशं मुदा ॥
प्रसन्नोऽस्मि वरं ब्रूहि मया पोक्तं वरानने ।
प्रसन्नोऽसि यदा देव ददस्व मनसेप्सितम्‌ ॥
सर्वज्ञस्य न चाज्ञातं किञ्चदस्ति महीतले ।
महादेव उवाच ॥
व्रतमेतद्धि कुरु ते या नारी दृढमानसा ॥
प्राप्यापि सकलान्‌ कामानन्ते ब्रह्मणि लीयते ।
इत्युत्क्वा च ततो देवि कैलासमहमागत: ॥
तत: प्रभातसमये नद्यामेव विसर्जनम् ।
पारणं तु तत: कृत्वा यत्प्राप्तं वनमध्यगम्‌ ॥
पुनस्तत्रैव सुप्तासि सख्या सार्द्धं सरित्तटे ।
हिमवानपि तत्रैव सम्प्राप्तस्त्वदगवेषणे ॥
अन्विष्यंस्त्वां चतुर्दिक्षु ह्यन्नपानविवर्जित: ।
सुप्तं द्दष्टं नदीतीरे दूरत: कन्यकाद्वयम्‌ ॥९०॥
उत्थायोत्सङ्गमानीय रुदन्तीं त्वामुवाच ह ।
सिंहव्याघादिभिर्दुष्टै: सेवितं हि महावनम्‌ ॥
पुत्रि प्राप्ता किमर्थं त्वं प्रियं किं करवाणि ते ।
पार्वत्युवाच ।
श्रृणु तात मया ज्ञातं मां दास्यसि च शूलिने ॥
तदन्यथा कृतं तात तेनाहं वनमागता ।
तथेत्युक्तं हिमवता नीतासि त्वं गृहं प्रति ॥
तेन प्रोक्तोऽस्म्यहं देवि विवाहार्थं त्वया सह ।
पार्वत्युवाच ॥
किं कृतं गिरिणा तत्र विवाहोऽभूत्कथं मम ॥
त्वयाऽव किं कृतं नाथ श्रोतुमिच्छामि विस्तरात्‌ ॥
ऋषय: सप्त भोदेवि त्वदर्थे प्रेषिता मया ॥
दृष्टास्ते नगराजेन पप्रच्छ मुदितानन: ।
कुत आगमनं जातं यूयं देवेन प्रेषिता: ॥
अन्यथा महतां प्रासिर्जडानं वै कथं भवेत्‌ ।
ऋषय ऊचु: ॥
नगराज वयं तावच्छङ्कराज्ञाविधायिन: ॥
त्वत्समीपे तु कन्याथे दीयतां यांद रोचते ।
महादेवोयदा मत्त: कन्यां प्रार्थयते तदा ॥
कन्यया च कृतं सम्यक यदर्थे दुष्करं तप: ।
अतस्तेन प्रसादोऽस्या: कत्तव्य: शूलपाणिना ॥
ऋषिभिर्भहुभिर्गीतं स देवो भक्तवत्सल: ।
इति श्रुत्वा गता विप्रा महादेवस्य सन्निधौ ॥१००॥
तदवृत्तान्तं समाकर्ण्य आजगाम महेश्वर: ।
आजग्मुस्तत्र वे सर्वे देवा इन्द्रपुरोगमा: ॥
पातालादागत: शेष: क्षीराब्धिशयनाद्विभु: ।
यत्र यत्र स्थिता देवा गन्धर्वा: सिद्धचारणा: ॥
ते तत्स्थानात्समाजग्मुस्तन्महोत्सवसम्भ्रमा: ।
विष्णुनाऽथ धृतं छत्रं श्वेतं चार्कशतप्रभम्‌ ॥
इद्रो वै चामरे दिव्ये कुबेर: कोशधारक: ।
स्वफणामणिभि: शेषो दीपमालां बिभर्त्तिस स: ॥
सहसयोजनायामं तेनाकारि सुमण्डपम्‌ ।
एकस्तम्भमयं प्रोच्चं योजनानां शतादहो ॥
ब्रह्मबृहस्पती देवौ मन्त्राशीर्भि: समूचतु: ।
जयशब्दैस्तथा देवा ऋशयश्च तपोधना: ॥
नृत्यन्त्यप्सरसस्तत्र गन्धर्वा ललितं जगु: ।
वाद्यानां ध्वनिवन्मेघो मन्दं मन्दं च गर्जति ॥
अवाकिरच्चतुर्द्दिक्षु तुषारकुसुमानि स: ।
देवकन्या नागकन्या लाजाभि: कृतमङ्गला: ॥
सरस्वती रमादेवी शच्याद्या दैवतस्त्रिय: ।
स्वर्णपात्रे निधायाशु पुष्पचन्दनमक्षतान्‌ ॥
दधिदूर्वाश्च सिद्धार्थान्‌  हरिद्रारत्नदीपकान्‌ ।
नीराजनं प्रकुर्वन्ति गिरिजाया: शिवस्य च ॥११०॥
पुष्पवृष्टिं प्रकुर्वन्ति देवा: सव्यापसव्यत: ।
महोत्सव: सम्प्रवृत्तो हिमालयगिरौ तदा ॥
गिरिणा च तदा तस्मै दत्तं जामातृतोषकम्‌ ।
गजानां दशसाहस्त्रमश्वानां नियुतं तथा ॥
अनर्ध्याणि च रत्नानि ददौ तस्मै गिरि: स्वयम्‌ ।
मुक्तानां दशकोटयश्च शतकोटयश्च विद्रुमा: ॥
हाटं कोटिकोटयस्तु पारिबर्हं ददौ गिरि: ।
असङ्ख्यातास्तु वै दास्यो मन:सन्तुष्टिकारका: ॥
मैनाकस्त्वत्प्रियार्थं वै गिरिण प्रेषित: स्वयम्‌ ।
एवं गिरिजया सार्द्धं कैलासमहमागत: ॥
आगत्य देवता: सर्वा: स्वे स्वे स्थाने स्थाने समादिशम्‌ ।
महादेव उवाच ।
तेन व्रतप्रभावेण सौभाग्यमतुलं त्वया ॥
प्राप्तमर्द्धासनं देवि सा सखी विजयाऽभवत्‌ ।
अद्यारभ्य व्रतं देवि कस्याग्रे न निवेदितम्‌ ॥
यद्‌गोप्यं हृदगतं देवि यन्नोक्तं नन्दिने मया ।
 तदुक्तं त्वत्समीपे तु त्वत्सौभाग्यविमोहित: ॥
तदारभ्य व्रतस्यास्य श्रृणु देवि यथाऽभवत्‌ ।
आलिभिर्हरिता यस्मात्तस्मात्सा हरितालिका ॥
पार्वत्युवाच ॥
श्रुतं पूर्वं कृतं नाथ विधिं चास्य वद प्रभो ।
किं पुण्यं किं फलं चास्य कैश्च वा क्रियते नरै: ॥१२०॥
महादेव उवाच ।
श्रृणु देवि विधिं वक्ष्ये नारीणां व्रतमुत्तमम्‌ ।
कर्तव्यं तु प्रयत्नेन यदि सौभाग्यमिच्छति ॥
तोरणादिप्रकर्तव्यं कदलीस्तम्भमण्डितम्‌ ।
आच्छाद्य पट्टवस्त्रैश्च नानावर्णविचित्रकै: ॥
चन्दनादिसुगन्धेन लेपयेत्तं च मण्डपम्‌ ।
शङ्खभेरीमृदङ्गैश्च वादयेद बहु वाद्यकान्‌ ॥
नानामङ्गलसंरम्भ: कर्तव्यो मम सद्मनि ।
स्थापयेत्प्रतिमां तत्र पार्वत्या सहितस्य मे ॥
नानाकारैश्च नैवेद्यैर्नानाभक्ष्योपहारकै: ।
नानोपचारताम्बूलैरुपवाससजागरै: ॥
नारिकेलै: पूगफलैर्दाडिमै: पनसादिभि: ।
बीजपूरै: सनारिङ्गै: फलैरन्यैरुपासयेत्‌ ॥
ऋतुदेशोद्भवे: सर्वै: फलैश्च विविधै: शुभै: ।
गन्धाक्षतैस्तथा पुष्पैर्धूपैर्दीपैर्मनोरमै: ॥
पूर्वोक्तेन विधानेन पूजयेदुमया सह ।
कथां श्रुत्वैकचित्तेन दद्याद्दानानि भूरिश: ॥
आचार्याय प्रदातव्यं वस्त्रं धेनुहिरण्यकम्‌ ।
अन्येभ्यो भूयसीं दद्यात्स्त्रोभ्यो वा भूषणादिकम्‌ ॥
ततो वाद्येन गीतेन सा निशा कौतुकादिना ।
नयेदतन्द्रिता देवि यदि सौभाग्यमिच्छति ॥१३०॥
तस्मिन्नहनि या नारी भोजनं कुरुते यदि ।
सप्त जन्म भवेद्वन्ध्या बैधव्यं च पुन: पुन: ॥
दारिद्यं पुत्रशोकं च कर्कशा दुःखभागिनी ।
पतेत्सा नरके घोरे नोपवासं करोति या ॥
पय: पानादहिर्मत्सी फलाहारे च मण्डुकि: ।
शर्करागुडखाद्यादिभक्षणात्तु पिपीलिका ॥
श्रृङ्गिपिष्टं तथान्यं वै पञ्चखाद्यादिकं तथा ।
क्षुधार्ता याश्च भक्षन्ति मूषक्यस्ता भवन्ति हि ॥
दधि भक्षति मार्जारी या स्त्री विज्ञानसंयुता ।
फलं भक्षति या नारी सा भवेद्वानरी ध्रुवम्‌ ॥
राजतं काञ्चनं ताम्रं वेणुजं वापि मृन्मयम्‌ ।
सम्पुटीकृत्य तन्मध्ये फलानि विविधानि च ॥
हरिद्रां कुङ्कुमं चैव अञ्जनादि प्रकल्पयेत ॥
वस्त्राण्याभरणादीनि ताम्बूलं सहिरण्यकम्‌ ॥
दानं च द्विजवर्याय दद्यादन्ते च पारणा ॥
एवं विधिं या कुरुते च नारी भर्त्रा समं सा रमते सुखेन ।
भोगाननेकान्‌ भुवि भुज्यमाना सायुज्यमन्ते लभते हरेण ॥
अश्वमेधसहस्त्राणि वाजपेयशतानि च ।
कथाश्रवणमात्रेण तत्पुण्यं लभते नर: ॥
एतत्ते कथितं देवि तवाग्रे त्रत मुत्तमम्‌ ।
कोटियज्ञकृतं पुण्यमस्यानुष्ठानमात्रत: ॥
 इति श्रीस्कन्दपुराणे उमामहेश्वरसंवादे हरितालिकाकथा समाप्ता ॥