गुरुवार, 9 मार्च 2017

किसलिए संस्कृत सीखना चाहिए?

मैं अपने इस लेख में संस्कृत के उस पक्ष की चर्चा करने जा रहा हूँ, जिसकी चर्चा समाज में  प्रायः वर्जित माना जाता है। वह है कामकला। अनादिकाल से स्त्रीपुरुष परस्पर आसक्त रहे हैं। अतएव दर्शन, साहित्य,पुराण आदि की तरह ही संस्कृत में कामकला से सम्बन्धित ढ़ेर सारी पुस्तकें लिखी गयी। वह भी क्यों भी नहीं कौटिल्य के अनुसार स्त्रीणाममैथुनं जरा अर्थात् मैथुन नहीं करने वाली स्त्री जल्दी ही बूढ़ी हो जाती है। काम की संतुष्टि मानसिक स्वास्थ्य का उत्तम प्रयोग है। चरक के अनुसार 16 वर्ष के पहले तथा 70 वर्ष के बाद व्यक्ति को मैथुन नहीं करना चाहिए। मजाक के रूप में कहूँ तो 10वीं शताब्दी से लेकर 15वीं शताब्दी तक आज की तरह मनोरंजन के लिए सिनेमा, टेलीविजन नहीं था। राजाओं के आमोद-प्रमोद के साधनों में आखेट एवं स्त्री से सम्भोग मुख्य थे। किसी स्त्री के साथ कैसे सम्भोग करें? सम्भोग करने की क्षमता कैसे बढ़ायें? स्त्रियों का श्रेणीकरण, मैथुन के पश्चात् आहार विहार आदि के लिए चिकित्सक और रतिशास्त्र विशेषज्ञ उनके लिए नित नये खोज में जुटे रहते थे। वह सारा अतिविस्तृत ज्ञान संस्कृत भाषा में उपलब्ध है। इन पुस्तकों में दिये गये उपायों का अपनाकर आप चरमसुख पा सकते हैं।  इसे जानने समझने के लिए आपको संस्कृत आना चाहिए। अन्यथा दीवालों पर लिखे इस्तहार के भ्रमजाल में फंसे रहेंगें। यह लेख युवाओं, युवतियों तथा नवविवाहित जोड़ों के लिए हैं। इस मार्गदर्शक लेख को पढें। यह प्रामाणित लेख है। लेख में जिन पुस्तकों का नाम दिया गया है, उसकी मूलप्रति खरीदें। देख लें कि उसमें संस्कृत है या नहीं। कामशास्त्र से सम्बन्धित संस्कृत में लिखी मूल पुस्तकों को पढ़ने के लिए आज से ही संस्कृत का प्रारम्भिक अध्ययन शुरु करें। केवल अनुवाद पढ़ने के अधिक लाभ नहीं मिलने वाला,क्योंकि आपको नहीं पता कि कि कौन सा अनुवाद प्रामाणिक है। संस्कृत के विना आपके लिए मेरा यह कामशास्त्र तथा वाजीकरण (घोड़े के समान अति वेगवान होकर स्त्री से सम्भोग कर उसे तृप्त करना) सम्बन्धित लेख मनोरंजक हो सकता है,ज्ञानप्रद नहीं। कई बार सामान्य सामाजिक धारणा के अनुसार संस्कृत भाषा को पूजा पाठ और ज्योतिष से ही जोड़कर देखा जाता है। जो भक्तिमार्गी हैं जो संस्कृत को अध्यात्म,  नैतिकता की भाषा मानते हैं, उन्हें इस लेख को पढकर निराशा होगी।
 इस लेख में मैं कतई यह नहीं कहूँगा कि संस्कृत आत्मसंयम सिखाने की भाषा है,वल्कि इसके विपरीत कि भौतिक विलास, मनोरंजन का चरमोत्कर्ष यदि पाना चाहते हैं तो संस्कृत भाषा सीखिये। यहाँ तो सुरापान (शराब पीना) से होने वाले लाभ को बताने वाला पुस्तक भी मिल जाएगा। ऐसी ही पुस्तक है-कादम्बरीस्वीकरण सूत्रम् । इस पुस्तक में  सुरापान करके मैथुन करने की विधि बतायी गयी है। आज तक संस्कृत भाषा को छोड़कर अन्य किसी भाषा का लेखक ने आपके लिए कामकला का प्रायोगिक सटीक वर्णन नहीं किया। सभी पुस्तकों का मूल आधार यही पुस्तकें हैं। उनके पास अधकचरा ज्ञान है,क्योंकि वे संस्कृत नहीं जानते। आपको केवल वात्स्यायन लिखित कामसूत्र के बारे में थोड़ी सी जानकारी ही पाते हैं। संस्कृत लेखकों की तरह और लोग अबतक धोखेबाज और चालबाज दोस्त को पहचानने का नुक्शा नहीं दिया। समस्या को विश्लेषण करने की क्षमता बढाने का उपाय नहीं सुझा पाया।
     हमें इस दुनियाँ में सुख चैन के साथ जीने की अभिलाषा है। ईश्वर प्रदत्त इन्द्रिय सुख भोगने की अभिलाषा है।यह शाश्वत है। हजारों वर्षों में मानव शरीर की बनावट नहीं बदली है। रति सुख की धारणा नहीं बदली।संस्कृत उसके लिए भी साहित्य उपलब्ध कराता है। हाँ, इस लेख को पढने के बाद फुटपाथ पर विकने वाला सस्ता साहित्य मत पढना। मैं विना सिर पैर वाला सस्ता ज्ञान नहीं देता। 
  कामशास्त्र की पुस्तकों में मुख्यतः 5 विषयों का वर्णन मिलता है। 1-स्त्री / पुरुष के अंगों से परिचय 2- स्त्री / पुरुष वशीकरण 3- रतिक्रीडा तथा उसके प्रकार 4- रतिज रोग और उसकी चिकित्सा 5- सौन्दर्यवर्धक औषधि।  अन्य भाषा की पुस्तक में परस्पर सम्बन्धित ये 5 विषय नहीं मिलते अतः वहाँ का ज्ञान अधूरा है।  
विषय विस्तार की दृष्टि से देखें तो कामशास्त्र की पुस्तकों में मुख्यतः 1- नायिका से प्रेम सम्बन्ध बढ़ाने (लड़की पटाने) का उपाय 2- स्त्री पुरूष के बीच सम्भोग कला का वर्णन जैसे- स्त्रियों को कामोन्मत्त कैसे बनाया जाय? चुम्बन, आलिंगन,ओठ चूसने, कुच मर्दन आदि की विधि। कुल मिलाकर (सम्भोग के छोड़कर) बाह्यरत को 11 भागों में बांटा गया है। 3-  नायिका (स्त्री) के प्रकार, परीक्षण, ऐसी निषिद्ध कन्या जिसके साथ सम्भोग नहीं करना चाहिए। नायिका के लिंगों की नाप जोख (लम्बाई गहराई) उसके अनुसार सम्भोग आदि 4-बाला, तरुणी,पौढा आदि को कैसे खुश करें ,उतका स्वभाव 5- वाजीकरण औषधियाँ, 6- स्त्री वशीकरण, सौन्दर्यवर्धक उवटन निर्माण एवं प्रयोग विधि 7- ऐसी स्त्री जिससे सम्भोग नहीं करना चाहिए। दूसरे पुरूष में आसक्त स्त्री, शीघ्र वश में आने वाली स्त्री आदि 8- आलिंगन, चुम्बन, नख दांत से क्षत करना, केश पकड़ कर चुम्बन लेने के प्रकार विधि आदि 9- मैथुन या संभोग करने के आसन। 

कामशास्त्र के ग्रन्थ                                ग्रन्थकार
कामसूत्र                                   वात्स्यायन
कादम्बरीस्वीकरण सूत्रम्          पुरुरव
अनंगरंग                                  कल्याणमल्ल
रतिरहस्य                                तेजोक के पुत्र
रसचन्द्रिका                             विश्वेश्वर
कामतन्त्र ग्रन्थ                        श्रीनाथ भट्ट
पौरुरव मनसिज सूत्र मंजरी       परुरवस्
स्मरदीपिका                            इम्मदी प्रौढ़ देवराय
इसमें भिन्न- भिन्न अंगों प्रत्यंगों में भिन्न - भिन्न पक्षों की तिथियों में मैथुन से सम्बन्धित क्रिया कलाप का वर्णन किया गया है।
स्मरदीपिका मंजरी                 मीननाथ
कादम्बरस्वीकरण कारिका        भरत
रतिमंजरी                                जयदेव
रतिकल्लोलिनी                       दीक्षित सामराज
कामकुंजलता                      ढुंढिराज शास्त्री के सम्पादन में कुल 12 पुस्तकों का संकलन
इन पुस्तकों का संक्षिप्त परिचय तथा वर्ण्यविषय क्रमशः प्रस्तुत करूँगा। तबतक में अनंगरंग के इन श्लोकों आनन्द लें।
स्निग्धा घनाः कुंचितनीलवर्णाः
           केशाः प्रशस्ताः तरुणीजनानाम्।
प्रेमप्रवृद्ध्यै विधिनैव मन्दं
           ग्राह्या जनैः चुम्बन-दानकाले।।
चुम्बन के समय विधि पूर्वक तरुणी के केश पर हाथ फेरने से प्रेम में वृद्धि होती है।

मुखे मुखं बाहुयोगे स्वबाहुं
             जंघाद्वये जंघयुगं निविश्य।
गच्छेत् पतिश्चेदिति कौर्मकं स्यात्
             उर्ध्वोरुयुग्मं परिवर्तिताख्यम्।
स्त्री के मुख में अपन मुख बाहु में बाहु, जंघाओं में जंघा लपेटकर रमण करें। यह कूर्मासन है। दोनों जंघाओं को ऊपर करके सम्भोग किया जाय तो यह परिवर्तितासन होगा।

शनिवार, 4 मार्च 2017

संस्कृत कैसे सीखें


           
संस्कृत का स्वरूप और भेद

अक्सर लोग आकर कहते हैं- मैं संस्कृत पढ़ना चाहता हूं। मैं पूछता हूं - आप संस्कृत क्यों पढ़ना चाहते हैं? उनका उत्तर होता है ताकि मैं हिंदू धर्म ग्रंथों को पढ़ सकूँ। लोग कहते हैं मुझे प्राचीन ज्ञान विज्ञान को जानने की उत्सुकता है- जैसे गीता, रामायण, पुराण, वेद,उपनिषद् आदि। कितने उत्साह के साथ लोग संस्कृत सीखने आते हैं। थोड़े दिनों में उनका उत्साह कम पड़ जाता है। कारण कि वे संस्कृत भाषा की बनावट को नहीं समझे होते हैं। उन्हें यह नहीं पता कि संस्कृत भाषा किन- किन प्रक्रिया से गुजर कर अपने स्वरुप को पाती है। किस प्रकार की तैयारी चाहिए? कितना समय लग सकता है? संस्कृत सीखने के लिए वर्तमान में कौन कौन संसाधन उपलब्ध है? क्या घर बैठे विना किसी व्यक्ति की सहायता से संस्कृत सीखी जा सकती है? अनेक उत्तर हैं, जिसका समाधान यहाँ प्रस्तुत है। वाकई संस्कृत सीखना बहुत ही मजेदार है। यदि थोडा भी संस्कृत आ जाय तो हम इससे बहुत आनन्द ले सकते हैं। जानकारी जुटा सकते हैं और जीवन में आने वाले हर संकट का समाधान ढूंढ सकते है। विना अधिक खर्च किये स्वरोजगार कर सकते है। लोगों को रोजगार उपलब्ध करा सकते हैं आदि। आइए, यदि आप इनमें से किसी भी उद्येश्य के लिए संस्कृत सीखना चाहते हैं तो संस्कृत भाषा में शब्द निर्माण की प्रक्रिया एवं इसके वाक्य विन्यास को समझें। बताता चलूँ कि कुछ मूल शब्द तथा प्रत्ययों के संयोग से संस्कृत में नये शब्द बन जाते हैं। इसके बारे में हम आगे विस्तार से चर्चा करेंगें।
हिंदी तथा अन्य भाषाओं की तरह संस्कृत भाषा अलग-अलग कालखंडों में अलग-अलग स्वरूप को धारण करती रही है। कालखण्ड तथा प्रकृति को देखते हुए संस्कृत भाषा के दो स्वरुप हैं-
1- वैदिक संस्कृत 2- लौकिक संस्कृत
वैदिक संस्कृत का व्याकरण और शब्दकोश लौकिक संस्कृत से पृथक् है। वेद से लेकर ब्राह्मण और उपनिषद् की भाषा वैदिक है। बाल्मीकि रामायण, पुराण एवं बाद के अन्य साहित्य ग्रंथों की रचना लौकिक संस्कृत में की गई है। लोकिक संस्कृत का लिखित तथा मौखिक दो स्वरूप हैं। दोनों प्रकार की भाषा में मौलिक अन्तर यह है कि लिखित में व्याकरण का तथा अप्रचलित या प्रौढ भाषा का प्रयोग बहुतायत किया जाता है। इसको सीखने के लिए आपको ज्यादा मेहनत करनी होगी। मौखिक संस्कृत या बोलचाल में प्रयोग आने वाले संस्कृत के लिए कम से कम शब्दों एवं व्याकरण ज्ञान तथा ज्यादा अभ्यास की आवश्यकता है। इसे सीखने की पद्धति भी अलग है। यहाँ मैं लिखित संस्कृत सीखने हेतु टिप्स दे रहा हूँ।
अध्ययन से पूर्व की तैयारी तथा सहायक उपकरण--
1- संस्कृत भाषा में लिखे ग्रंथों को पढ़ने के लिए सबसे पहले आपके पास एक शब्दकोश होना चाहिए ताकि आप संस्कृत का अर्थ जान सकें।
संस्कृत एक संश्लिष्ट भाषा है, जिसमें प्रत्येक अक्षर, प्रत्येक पद आपस में जुड़ जाते हैं। आपस में जुड़े शब्दों को कभी-कभी तो पहचाना जा सकता है, परंतु कभी-कभी वह अपने मूल स्वरुप से इतने हुए भिन्न हो जाते हैं कि पहचान करना वाकई कठिन होता है।
2- प्रारम्भ में आप संस्कृत की पाठ्य पुस्तकें लें। कक्षा 6 से 8 तक के बच्चों के लिए लिखी गयी पुस्तकें बेहद उपयोगी हो सकती है। बाजार में कई ऐसी पुस्तकें आ चुकी है, जो संस्कृत सीखने में सहायक है। पुस्तक खरीदते समय यह ध्यान रखें कि उसमें अभ्यास करने की व्यवस्था हो। लेख के अंत में पुस्तकों की सूची उपलब्ध करा दी गयी है ।
3- रामायण, पुराण या संस्कृत भाषा में प्रकाशित होने वाली साप्ताहिक, पाक्षिक या दैनिक पत्रिका।
4- एक ऐसा जानकार व्यक्ति जो आवश्यकता पडने पर फोन या अन्य द्वारा आपको मदद कर सके।
5- राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली, संस्कृतभारती तथा अन्य अनेक संस्थायें पत्राचार द्वारा संस्कृत सिखाने का कोर्स चलाती है, जो दो वर्ष से लेकर 4 वर्ष तक की होती है।
6- राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली देश भर में अनौपचारिक संस्कृत शिक्षण केन्द्र स्थापित किया है। यहाँ प्रत्येक कार्यदिवसों में दो- दो घंटे की कक्षा लगती है। जिसके माध्यम से संस्कृत सीखना आसान है।
7- बोलचाल में प्रयोग होने वाली संस्कृत भाषा को सीखाने के लिए संस्कृतभारती का प्रशिक्षण केन्द्र देश के लगभग प्रत्येक जनपद में स्थापित है। दिल्ली तथा वाराणसी के राजघाट में सालों भर 15-15 दिनों की आवासीय कक्षा सतत संचालित होते रहती है। संस्कृतभारती के प्रान्त कार्यालयों द्वारा वर्ष में एक बार आवासीय संस्कृत प्रशिक्षण शिविर लगाया जाता है,जहाँ आप मात्र 10 दिनों में कार्यसाधक संस्कृत बोलना सीख जाते हैं। संस्कृत सीखने की उपयोगी पुस्तकें तथा अनेक शैक्षणिक गतिविधि भी यहाँ संचालित होते हैं।
8- उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ, उत्तरांचल आदि राज्यों में स्थापित संस्कृत अकादमी तथा अन्य स्वयंसेवी संस्था भी समय समय पर संस्कृत सीखाने हेतु अल्पकालीन कक्षाओं का संचालन करती है।
आपको ऐसे व्याकरण की पुस्तक की आवश्यकता होगी, जिसमें सन्धि, समास, कारक, सुबन्त और तिङन्त की प्रक्रिया, सुबन्त और तिङन्त का प्रत्यय दिया गया हो। क्रिया को तिङन्त तथा शेष को सुबन्त कहा जाता है। आगे हम इसकी और चर्चा करेंगें।
नोट--देवनागरी लिपि का ज्ञान होने से इस लिपि में पाठ्यसामग्री तथा पाठ्योपकरण अधिक मात्रा में मिलते है। इंटरनेट का उपयोग करने वाले मित्रों के लिए लेख के अंत में संस्कृत बोलने तथा पढने में मददगार लिंक दिये गये हैं। संस्कृत का शुद्ध उच्चारण सीखने के लिए किसी दोस्त का मदद लें।
संस्कृत पत्रिका या पुस्तक पढना शुरु करें-
अब आपके पास संस्कृत सीखने का सहायक उपकरण मौजूद है। अपना पाठ्यपुस्तक खोलें।
बालकः,बालिका,पुष्पम् आदि शब्दकोष के आगे बढें। फिर कर्ता के साथ क्रिया पदों के प्रयोग का अभ्यास शुरु करें। पिकः कूजति। बालकौ पठतः। 
अब सर्वनाम के साथ क्रिया का प्रयोग आरम्भ होता है। सः कौशलः पठति( वर्तमान काल ), सा लता गायति, धीरे-धीरे तीनों काल तथा तीनों लिंग के प्रयोग मिलेंगें। एषः बालकः। एषा बालिका अस्ति। एतत् पुष्पम्।
इसके बाद विभक्ति प्रयोग सीखें । जैसे- अहं लेखं लिखामि। सः दूरभाषेण वार्तां करोति। पिता मोहनाय पुस्तकं क्रीणाति। आदि। यहाँ समस्या हर विभक्ति के पदों में परिवर्तन होते रहने की है। हम हिंदी में राम ने कहा, राम का भाई है लिखते हैं। यहां राम शब्द कभी भी परिवर्तित नहीं होता, लेकिन जब हम संस्कृत में किसी विभक्ति का प्रयोग करते हैं तो वहां प्रत्येक पद पर शब्द के स्वरुप में परिवर्तन हो जाता है। यहां हमें कठिनाई होती है। हमें विभक्तियों को समझना पड़ेगा। तीनों वचन तथा सात विभक्ति मिलाकर संस्कृत में सु औ जस् आदि कुल 21 विभक्तियाँ होती है। इस प्रकार पुलिंग और स्त्रीलिंग के 21-21 रूप देखने को मिलते है। यदि सम्बोधन को भी जोड़ दिया जाय तो कुल संख्या 24 हो जाएगी। हर स्वर वर्ण वाले अक्षरों के स्वरुप में अलग अलग ढंग का परिवर्तन हो जाता है। राम,हरि और पितृ के स्वरुप में अलग अलग परिवर्तन हो जाता है। हिंदी या अन्य भाषाओं में स्त्रीलिंग या पुलिंग शब्द के स्वरूप (विभक्ति) में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं होताजबकि संस्कृत में हो जाता है। आपको यदि शब्द रूप के निर्माण प्रक्रिया की थोडी जानकारी हो जाती है तो शब्दरूप याद करने की आवश्यकता नहीं रहेगी। यह विल्कुल आसान है। वैसे पुस्तकों को पढते रहने से बार बार वे शब्द आपके पास आयेंगें और हिन्दी की तरह आप इसका अर्थ समझने लगेगें। मनुष्यस्य शरीरे, मानवस्य शरीरे, मम शरीरे, भ्रातुः अंगे अलग-अलग शब्द वाले वाक्य होने के बाबजूद अर्थ समझने में कठिनाई नहीं होगी। अभ्यास मुख्य है। यही स्थिति क्रिया पदों के भी साथ है। यहां पर एक लकार (काल ) का यूं तो तीनों पुरूष तथा तीनों वचन मिलाकर 9 भेद होते हैं, जबकि आत्मनेपद और परस्मैपद के रूप अलग अलग होते हैं। कभी-कभी प्रत्यय लगने से क्रिया पदों के अनंत भेद हो जाते हैं। आरम्भ में वर्तमान काल, भूत काल, भविष्यत् काल के लिए क्रमशः लट् लकार, लङ् लकार तथा लृट् लकार का अभ्यास करें। पुनः कुछ और लकार। इसे समझने के लिए अभ्यास की आवश्यकता है।
इसके साथ प्रश्न वाचक शब्दों का प्रयोग सीखें। यथा- त्वं किं करोषि। इयं राधा कुत्र गच्छति। विद्यालये अवकाशः कदा भविष्यति। आदि।
संख्यावाची, विशेष्य- विशेषण तथा कुछ अधः, उच्चैः.शनैःयदा-तदा जैसे अव्यय शब्दों के प्रयोग सीख लेने पर आप संस्कृत लिख सकते हैं। आपको वाच्य परिवर्तन भी सीखना चाहिए। इसके कुछ सामान्य नियम है। कर्तृ, कर्म और भाववाच्य में कर्ता के अनुसार क्रिया में परिवर्तन हो जाता है। पठति की जगह पठ्यते। आदि। आप इतना कुछ मात्र एक माह में सीख सकते हैं। मूल संस्कृत इतना ही है। प्रतिदिन संस्कृत में लिखी कथा पढनी चाहिए। हितोपदेश जैसे पुस्तक की भाषा सरल है। इनको पढते रहने से शब्दकोष में निरन्तर बृद्धि होती है। शब्दों का संस्कार मस्तिष्क में आकार लेगा।
इसके आगे सन्धि, समास, उपसर्ग तथा तद्धित,कृदन्त, णिजन्त आदि प्रत्यय से संस्कृत भाषा जटिल हो जाती है। परन्तु जब उसे अलग-अलग कर दिया जाता है तो वही सरल हो जाता है। मूल संस्कृत का अभ्यास करना आसान है। अब आगे-
संस्कृत पुस्तकों को पढने के लिए अब दो अन्य सहायक उपकरण का और सहयोग लें। वह है रेडियो और टेलीविजनDD न्यूज पर संस्कृत में प्रतिदिन समाचार आता है। शनिवार तथा रविवार को DD न्यूज पर वार्तावली कार्यक्रम। रेडियो चैनल पर भी संस्कृत में प्रतिदिन समाचार आता है। आप नियमित सुनना शुरु करें। इससे आपमें शब्द संस्कार बढेंगें। नित्य नये शब्दों से परिचय होगा। चुंकि रेडियो और टेलीविजन पर जो समाचार आता है,उसकी भाषा प्रौढ होती है। वह पहले लिखा जाता है फिर उसे समाचार वाचक पढता है।
साहित्यिक या प्रौढ संस्कृत भाषा
आखिर संस्कृत में ऐसा क्या होता है कि हम पुस्तक में लिखे शब्दों को डिक्शनरी में ढूंढने की कोशिश करते हैं, परंतु वैसा शब्द डिक्शनरी में बहुत ही कम मिल पाता है। इसका कारण है संधि, समास तथा प्रत्ययों के प्रयोग। अस्य महोदयस्य के स्थान पर महोदयस्यास्य प्रयोग मिलने लगता है। इस प्रकार से संधि और समास के द्वारा बने नये शब्द शब्दकोष में नहीं होते। वहाँ मूल शब्द दिये होते हैं। अब पुस्तकों की सहायता से यह समझने की कोशिश करें कि संधि में दो वर्ण आपस में कैसे मिल जाते हैं? जैसे तस्य अर्थस्य = तस्यार्थस्य, रघुवंशस्यादावेव = रघुवंशस्य आदौ एव इसमें विद्या अलग है आलय अलग है। सन्धि अर्थात् दो शब्दों के मेल को समझने में लगभग 15 दिन लगता है। कभी कभी कुछ अप्रचलित शब्द मेरे शब्द सामने आते हैं, संधि होने के कारण हम उसे नहीं पाते हैं जैसे बटवृक्षः धावति। अब आप सोच रहे होंगे कहीं भला वटवृक्ष दौड़ सकता है। नहीं बट वृक्ष तो दौड ही नहीं सकता। यहां कुछ और खेल हो गया है। बटो ऋक्षः दोनों मिलकर वटवृक्ष शब्द बन गया है। इस प्रकार कई वर्णों को एक साथ जोड़ कर जब नया शब्द बनता है तो हमें कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इसके लिए हमें मूल शब्द को पहचानना होगा और उसके बाद संधि की जानकारी करनी। दो सार्थक पद के आपस में मिलने ,आपस में जुड़ने को समास कहा जाता है। समास में भी कभी-कभी तो मूल शब्द को पहचानना आसान होता है लेकिन कहीं कहीं कुछ शब्द या तो बीच के गायब हो जाते या आरंभ के गायब हो जाते हैं। इस प्रकार संस्कृत एक कठिन भाषा के रुप में हमारे सामने उपस्थित हो जाती है। जब तक हम क्रमिक अध्ययन नहीं करेंगे । संस्कृत को समझना हमारे लिए कठिन होगा। अब बाल्मीकि रामायण जैसे सरल काव्य को पढ़ना चाहिए और वहां पर पद परिवर्तन को ध्यान रखना चाहिए। इस प्रकार धीरे- धीरे कर शब्दकोश बढता जाता है और हम व्याकरण के नियमों से परिचित होते जाते हैं। जैसे-जैसे हम व्याकरण तथा शब्दों के समूह से परिचित होते हैं। संस्कृत हमारे लिए सरल हो जाती है। संस्कृत के साथ यही है यह अनेकों संस्कारों से अनेकों प्रक्रियाओं से गुजर कर सामने आती है। यही इसकी खूबी भी है और यही खामी भी। इसमें एक शब्द को कहने के लिए सैकड़ों शब्द मौजूद है। काव्य लिखने वाले साहित्यकार तमाम पर्यायवाची शब्दों के प्रयोग करते हैं और हमें नए पाठकों को उसे पढने में कठिनाई आने लगती है। एक और समस्या है। जब हम पढ़ना शुरु करते हैं संस्कृत पद्य को पढ़ते हैं। संस्कृत का अधिकांश साहित्य पद्य में लिख है। मुझे उसका अर्थ जल्दी से समझ में नहीं आता, क्योंकि संस्कृत में किसी पद को आगे पीछे कहीं भी रखा जाए उसके अर्थ में परिवर्तन नहीं होता। पद्यकार किसी शब्द को कहीं भी रखकर संधि समास युक्त कर देते हैं। उसे समझना आसान नहीं रह जाता। इसीलिए संस्कृत अध्ययन आरंभ करते समय यह ध्यान रखना चाहिए पद्य के अपेक्षा गद्य को आरंभ में पढ़ा जाए, ताकि हम आसानी से समझ सकें। संस्कृत में एक अच्छा यह है कि यहां जो भी शब्द है और जिसके लिए प्रयोग हुआ है, वह उस वस्तु के गुण और धर्म को देखकर नामकरण होता है। शब्द का अर्थ जानते ही उस वस्तु के वारे में सारी जानकारी मिल जाता है। पुनः उस वस्तु को समझने के लिए किसी अलग से व्याख्या की आवश्यकता नहीं पड़ती। यही अच्छाई है। लेकिन यदि वैसे ही शब्द वैसे ही गुण धर्म किसी दूसरे में भी पाए जाए तो उसके लिए भी वही शब्द प्रयोग में आते हैं। प्रसंग के अनुसार हमें इसका अर्थ समझना पड़ता है। जैसे जो दो बार जन्म लेता है उसे द्विज कहते हैं। यह ब्राह्मण के लिए और चिड़ियों के लिए भी प्रयुक्त होता है। इस प्रकार हम आपसे चर्चा करते रहेंगे और सलाह देते रहेंगे कि संस्कृत को आसानी से कैसे समझा जाए। पढा जाए। इसके वाक्य विन्यास कैसे होते हैं। शब्दों का निर्माण कैसे होता है? यदि यह समझ में आ गया तो संस्कृत को समझिए आ गया .
संस्कृत सीखने के लिए अधोलिखित लिंक उपयोगी है-
http://www.samskritashikshanam.in/all_courses.php   ( संस्कृतशिक्षणम् )

इन पुस्तकों में से जो पुस्तकें उपलब्ध हो इनसे संस्कृत सीखें।

प्रकाशक/लेखक                                   पुस्तक नाम
1- राष्ट्रिय संस्कृत संस्थान, नई दिल्ली             दीक्षा
2- उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ           सरल संस्कृतम्
3- संस्कृतभारती                                      सरला,सुगमा
4- इन्दिरा चरण पाण्डेय                             संस्कृत शिक्षण समीक्षण       
5- इन्द्रपति उपाध्याय                               संस्कृत सुबोध               
6- उमेश चन्द्र पाण्डेय                               संस्कृत रचना                  
7- ए0 0 मैग्डोनल                                 संस्कृत व्याकरण प्रवेशिका     
8- कपिलदेव द्विवेदी                                 प्रौढ़ रचनानुवाद कौमुदी      
9- कपिलदेव द्विवेदी                                 संस्कृत शिक्षा                
10- कमलाकान्त मिश्र                              संस्कृत गद्य मन्दाकिनी           
11- कम्भम्पाटि साम्बशिवमूर्ति                     संस्कृत शिक्षणम्             
12- कृष्णकान्त झा                                   सन्धि प्रभा                   
13- के0 एस0 पी0 शास्त्री                           संस्कृत दीपिका                
14- गी0 भू0 रामकृष्ण मोरेश्वर                    माला संस्कृत येते गमक दुसरे   
15- चक्रधर नौटियाल                               नवीन अनुवाद चंद्रिका          
16- चक्रधर नौटियाल                               बृहद् अनुवाद चन्द्रिका         
17- जगन्नाथ वेदालंकार                             सरल संस्कृतसरणिः             
18- जयन्तकृष्ण हरिकृष्ण दवे                      सरल संस्कृत शिक्षक            
19- जयमन्त मिश्र                                    संस्कृत व्याकरणोदयः          
20- अरविन्द आन्ताराष्ट्रिय शिक्षा केन्द्र            संस्कृतं भाषामहै                     
21- लोकभाषा प्रचार समिति, पुरी               संस्कृत शब्दकोषः            
22- भागीरथि नन्दः                                  विलक्षणा संस्कृतमार्गदर्शिका   
23- भि0 वेलणकर                                   संस्कृत रचना                  
24- यदुनन्दन मिश्र                                   अनुवाद चन्द्रिका               
25- रमाकान्त त्रिपाठी                               अनुवाद रत्नाकरः                       
26- रवीन्द्र कुमार पण्डा                             संलापसरणिः                  
27- राकेश शास्त्री                                              सुगम संस्कृत व्याकरण          
28- राजाराम दामोदर देसाई                       संस्कृत प्रवेशः               
29- राम बालक शास्त्री                              वाणी वल्लरी                  
30- राम शास्त्री                                       संस्कृत शिक्षण सरणी         
31- रामकृष्ण मोरेश्वर धर्माधिकारीमला          संस्कृत येते (मराठी भाषी के लिए )              
32- रामचन्द्र काले                                   हायर संस्कृत ग्रामर            
33- रामजियावन पाण्डेय                           व्यावहारिक संस्कृतम्
            (पत्र,समाचार,कार्यालय टिप्पणी,प्रारूपण आदि लिखने हेतु)                     
34- रामदेव त्रिपाठी                                 संस्कृत शिक्षिका              
35- रामलखन शर्मा                                  संस्कृत सुबोध               
36- वाचस्पति द्विवेदी                                संस्कृत शिक्षण विधि                  
37- वात्स्यायन धर्मनाथ शर्मा                       बिना रटे संस्कृत व्याकरण बोध
38- वासुदेव द्विवेदी शास्त्री                          कौत्सस्य गुरुदक्षिणा           
39- वासुदेव द्विवेदी शास्त्री                          दो मास में संस्कृत           
40-वासुदेव द्विवेदी शास्त्री                           बाल कवितावलिः                
41- वासुदेव द्विवेदी शास्त्री                          बाल निबन्ध माला              
42- वासुदेव द्विवेदी शास्त्री                          बाल संस्कृतम्                 
43- वासुदेव द्विवेदी शास्त्री                          बालनाटकम्                    
44- वासुदेव द्विवेदी शास्त्री                          भारतराष्ट्रगीतम्               
45- वासुदेव द्विवेदी शास्त्री                          संस्कृत क्यों पढ़ें ? कैसे पढें
46- वासुदेव द्विवेदी शास्त्री                          संस्कृत गौरव गानम्           
47- वासुदेव द्विवेदी शास्त्री                          संस्कृत प्रहसनम्               
48- वासुदेव द्विवेदी शास्त्री                          सरल संस्कृत गद्य संग्रह          
49- वासुदेव द्विवेदी शास्त्री                          सरल संस्कृत पद्य संग्रह          
50- वासुदेव द्विवेदी शास्त्री                          सुगम शब्द रूपावलिः         
51- वेणीमाधव शास्त्री जोशी                       बाल संस्कृत सारिका            
52- शिवदत्त शुक्ल                                   संस्कृत अनुवाद प्रवेशिका      
53- शैलेजा पाण्डेय                                  संस्कृत सुबोध               
54- श्यामचन्द्र                                        संस्कृत व्याकरण सुप्रभातम्    
55- श्रीपाद दामोदर सातवलेकर                   संस्कृत पाठ माला              
56- श्रीपाद दामोदर सातवलेकर                  संस्कृत स्वंय शिक्षक           
इस लेख से जुडी आपकी जिज्ञासा आमंत्रित है। 

गुरुवार, 2 मार्च 2017

गया तीर्थ की ऐतिहासिकता

हिंदुओं के अनेक प्रकार के तीर्थ है। ब्रह्म पुराण के अनुसार तीर्थों चार प्रकार के होते हैं 1- ईश्वर द्वारा उत्पन्न 2- असुर से सम्बन्धित 3- ऋषियों से सम्बन्धित 4- राजाओं (मनुष्यों) द्वारा निर्मित। गया के तीर्थों का संबंध मृत मानवों अर्थात् पितरों के साथ है। गया एक ऐसा तीर्थ है, जहां लोग अपने पूर्वजों के मृत्यु का पर्व मनाने जाते हैं। गया पितृतीर्थ है। इस तीर्थ का संबंध मानवों के अतिरिक्त दानवों तथा देवताओं से भी रहा है। यह अत्यंत प्राचीन तीर्थ है। ऋग्वेद में सर्वप्रथम इसके बारे में संकेत प्राप्त होता है। ऋग्वेद के 2 सूक्तों के रचयिता प्लति के पुत्र गय थे। महाभारत तथा वायु पुराण में जिस गयासुर का वर्णन प्राप्त होता है, उसका मूल उत्स अथर्ववेद है। यहाँ असित एवं कश्यप के साथ गय नामक एक व्यक्ति वर्णित है। गय यहां पर ऐंद्रजालिक के रूप में वर्णित है। चुंकि असुर इंद्रजाल करने में सिद्धहस्त थे, अतः परवर्ती रचनाकारों ने गय को असुर (ऐंद्रजालिक) मानते हुए कथा को विस्तार दे दिया। और्णनाभ जो बुद्ध के पूर्ववर्ती थे ने इदम् विष्णुर्विचक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् के त्रेधा शब्द का अर्थ समारोहण,विष्णुपद एवं गयशीर्ष किया है। गयशीर्ष शब्द की चर्चा महाभारत के वनपर्व, विष्णुधर्मसूत्र, विष्णु पुराण तथा महाभारत में प्राप्त होता है। नारदीय पुराण में भी गयशीर्ष की चर्चा प्राप्त होती है। गयशीर्ष का नाम वनपर्व 87/ 11 एवं 95/9, विष्णु धर्मसूत्र 85/4 विष्णु पुराण 22/20 तथा महावग्ग 1/21/1 में आया है। जैन एवं बौद्ध ग्रंथों में राजा गय का राज्य गया के चारों ओर था ऐसा उल्लेख प्राप्त होता है। उत्तराध्ययन सूत्र में आया है कि वह राजगृह के राजा समुद्रविजय का पुत्र था और ग्यारहवां चक्रवर्ती हुआ। अश्वघोष के बुद्धचरितम् में ऋषि गय के आश्रम में बुद्ध का आना तथा उस संत ने निरंजना नदी के पुनीत तट पर अपना निवास बनाया और पुनः वह गया के कश्यप के आश्रम में, जो उरुबिल्व कहलाता था, का प्रसंग प्राप्त होता है। इस ग्रंथ में यह भी आया है कि वहां धर्माटवी भी थी, जहां 700 जटिल रहते थे। उन्हें बुद्ध ने निर्माण प्राप्ति में सहायता दी थी। विष्णु धर्मसूत्र में श्राद्ध के लिए विष्णुपद पवित्र स्थल कहा गया है।पद्म पुराण आदि 38/2-21, गरूड 1 अध्याय 82-86 आदि में गया के विषय में अनेक उद्धरण एवं कखानक प्राप्त होते हैं। इस प्रकार हम पाते हैं कि पौराणिक काल आते आते वेद की एक ऋचा किस प्रकार एक कथानक के रूप ले लेती है। संस्कृत का ग्रन्थ धार्मिक पर्यटन (तीर्थ) के माध्यम से किस प्रकार अर्थव्यवस्था को रप्तार देता है। भारत की एकता और अखण्डता में इसका कितना अहम योगदान है। यह धर्म के फलक को भी विस्तार देता है। पवित्र नदियों में स्नान का भी उतना ही महत्व है,जितना कि विशाल द्रव्य खर्च कर होने वाले यज्ञ यागादि का। ये तीर्थ विना भेदभाव के सभी के लिए उपलब्ध थे। अस्तु।

गया ईसा के कई शताब्दियों पूर्व एक समृद्धशाली नगर था। फाहियान के भारत आगमन के समय (चौथी शताब्दी) में यह नगर नष्टप्राय था, किंतु सातवीं शताब्दी में जब ह्वेनसांग यहां आया तो इसे भरा पूरा देखा। व्हेनसांग के अनुसार यहां ब्राह्मणों के 1000 कुल थे। प्राचीन पाली ग्रंथों एवं ललितविस्तर में भी गया के मंदिरों का उल्लेख प्राप्त होता है। कुल मिलाकर इतना स्पष्ट है कि बुद्ध के आविर्भाव के पूर्व गया तीर्थ अपने अस्तित्व में आ चुका था।
हजारों वर्षों से गया तीर्थ हिंदुओं के आस्था का केन्द्र रहा है। गया के बारे में विपुल मात्रा में साहित्य भी प्राप्त होते हैं। आज संपूर्ण गया 15 किलोमीटर में फैला है। इसके पूर्व में महानदी फल्गु अवस्थित है। यह सुखी नदी है। गड्ढा खोदकर लोग इसमें से जल प्राप्त करते हैं। इसका संबंध गायबाल जाति के लोगों से तथा गयासुर से भी जोड़ा जाता है। वायु पुराण के 106 अध्याय में इस नगर का नाम तथा इसके उत्पत्ति की कहानी प्राप्त होती है। गय नामक असुर से पीड़ित देवगन अपनी रक्षा हेतु ब्रह्मा के पास जाते हैं। ब्रह्मा उन्हें लेकर शिव के पास गये। शिव ने उन्हें विष्णु के पास जाने का सुझाव दिया। ब्रह्मा तथा शिव ने मिलकर विष्णु की स्तुति की। विष्णु प्रकट होकर सभी देवों से कहे कि आप लोग गयासुर के पास चलें। विष्णु ने गयासुर के कठिन तप का कारण पूछा गया से वरदान मांगा कि वह देवताओं, ऋषि तथा मंत्रों से भी अधिक पवित्र हो जाए। देवों ने तो अस्तु कहा और स्वर्ग चले गए। इस प्रकार एक लंबी कथा वहां प्राप्त होती है। गया के प्रमुख स्थान है- विष्णुपद,  बोधिवृक्ष, प्रेतशिला, फाल्गु नदी
गया के तीर्थ की संख्या तो बहुत अधिक है परंतु सभी तीर्थयात्री सभी तीर्थों की यात्रा नहीं करते हैं बल्कि इन्हीं तीन स्थलों की यात्रा करते हैं। विष्णुपद में भगवान विष्णु के पदचिन्ह स्थापित है। जिसका आकार लगभग 16 इंच लंबा है। इस मंदिर में सभी हिंदू मतावलंबी दर्शन करने जाते हैं। यहां कोई 45 वेदियां हैं। विस्तृत अध्ययन के लिए पढें-वायु पुराण (गया माहात्म्य)
प्राचीन ग्रन्थ जिसमें गया तीर्थ का वर्णन प्राप्त होता है-
1- तीर्थचिन्तामणि
2- तीर्थप्रकाश
3- तीर्थेन्दु शेखर
4- त्रिस्थली सेतु
5- त्रिस्थली सेतु सार संग्रह
गया श्राद्ध के लिए लिखित प्राचीन ग्रन्थ
ग्रन्थ ग्रन्थकार
1- गयाश्राद्धपद्धति ---- वाचस्पति
2- तीर्थयात्रातत्व --------- रघुनन्दन
3- गयाश्राद्धपद्धति ---------- माधव के पुत्र रघुनाथ
4- गयाश्राद्धविधि ---------- वाचस्पति


नोट- साक्ष्य तथा सामग्री मिलने के साथ- साथ लेख में निरन्तर परिवर्तन होता रहेगा।


शनिवार, 25 फ़रवरी 2017

स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य जी महाराज

स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य जी महाराज        (1921-2036)
श्रीस्वामी जी का अवतार स्थल महमत्पुर गॉंव हैं जो विक्रम नौवतपुर के समीप अवस्थित है। 10 मार्च 1865 तदनुसार फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी शुक्रवार संवत् 1921 कुंभ के सूर्य में मघा नक्षत्र में नौवतपुर के समीप अवस्थित महमत्पुर गॉंव के कौण्डिन्य गोत्रीय आथर्वणिक ब्राह्मण कुल में श्री रामधनी शर्मा एवं श्रीमति रामसखी देवी के द्वितीय पुत्र के रूप में आप अवतरित हुए। वचपन में आप 'पारस' नाम से पुकारे जाते थे।  बभनलई ग्रा म के भारद्वाजगोत्रीय श्री नरसिंह नारायण शर्मा की पुत्री के साथ परिणय सूत्र में बंधकर आपका गृहास्थाश्रम में प्रवेश हुआ तथा एक पुत्ररत्न भी प्राप्त हुआ। इस तरह से गृहस्थाश्रम के मुख्य उद्देश्य पितृ ऋण से आप मुक्त हुए।
स्वामी परमहंससूरि से मिलन
वचपन से ही संगीत के माध्यम से रामचरित मानस की सस्वर प्रस्तुति में आपकी अभिरूचि थी। एक दिन स्वामी परमहंस सूरि जी के स्वागत में गॉंव मे मानस प्रस्तुति का आयोजन हुआ। आपकी जब बारी आयी तो जनकपुर फुलवारी में भगवान राम एवं सीता जी के प्रथम मिलन प्रसंग "श्याम गौर किमि कहौं बखानी । गिरा अनयन नयन बिनु बानी …………बरनत छवि जहॅ तहॅ सब लोगू। अवसि देखिअहिं देखन जोगू।।" की प्रस्तुति से आपने परमहंससूरि जी को मुग्ध कर दिया। प्रस्थान के पूर्व स्वामी परमहंससूरि जी ने आपके बड़े भाई श्रीजुदागी शर्मा से आपको अपने लिया मांगा। घर गृहस्थी के कारण प्रारंभ में भाई को संकोच तो हुआ परंतु उन्होंने अपनी स्वीकृति देते हुए कहा कि पारस भी आपका ही है। कुछ समय बीता और स्वामी परमहंससूरि जी तरेत स्थान से दक्षिण भारत की यात्रा पर निकल गये। इधर पारस जी का मन स्वामी जी में ही लगा रहता था। एक बार पारस जी अस्वस्थ हुए और प्रतिदिन रोग बढ़ता ही
गया।चारमाह से शय्याबद्ध रहते हुए स्थिति ऐसी आ गयी कि सबलोग इनके जीवन से निराश हो गये। इनकी मॉं निराश होकर ऑसू बहाती हुई भगवान से निरोग होने के लिए प्रार्थनाा करती रहतीं। मॉं की स्थिति देखकर पारसजी ने उनसे कहा 'मुझे परमहंस स्वामी जी के शरण में दान कर देने से मेरा रोग
हट जायेगा।' असहाय मॉं ने पारस के प्रस्ताव पर अपनी स्वीकृति दे दी। इसी बीच अचानक स्वामी परमहंससूरि जी का तरेत में पदापर्ण हुआ। पारस जी ने अपने पिता से स्वामी जी के दर्शन की ईच्छा प्रकट की। पिता ने तरेत ठाकुरवारी जाकर स्वामी परमहंससूरि जी को पारस की मरणासन्न स्थिति से
अवगत कराया। स्वामी जी शीघ्र ही महमत्पुर पहुॅच गये एवं पारस जी के शरीर को अपने करकमल के स्पर्श से रक्षाकवच में बांध कर यह कहते हुए तरेत लौट गये 'पारस ठाकुरवारी आ जाओ'। मरणासन्न स्थिति वाला ठाकुरवारी जायेगा। यह सुनकर सब आश्चर्यचकित हो गये परंतु चमत्कार जैसा ही हुआ और पारस जी ने शीघ्र ही मरणशय्या छोड़ दिया तथा लड़खड़ाते ठाकुरवारी पहुॅच गये। "प्रभु पहिचानि परेउ धरि चरना" और स्वामी परमहंससूरि जी ने पारस जी को श्रीवैष्णव धर्म के पंचसंस्कार से दीक्षित कर 'पराङ्कुशाचार्य' नाम दे दिया। बाद में यही स्वामी पराङ्कुशाचार्य हो गये तथा "सरौती के स्वामी जी" के नाम से विख्यात हुए। दैवसंयोग से पिता परमपद हुए। पत्नी तथा पुत्र भी शनैः शनैः संसार छोड़ते गये। पारिवारिक बंधन ढ़ीला पड़ गया और जीवित मॉं पहले ही इन्हें परमहंस स्वामी जी की शरणागति में दान कर चुकी थी।
दिव्यदेश भ्रमण एवं भगवदचरित का अवगाहन
परमहंस स्वामी जी की पदछाया में रहते हुए पैंतीस वर्ष की अवस्था में श्रीपराङ्कुशाचार्य जी परमहंस स्वामी जी के साथ दक्षिण भारत के श्रीवैष्णव दिव्यदेश के दर्शन के लिये प्रस्थान कर गये। जहॉं पाञ्चरात्र शास्त्र विधि का पालन करते हुए पूर्ण परम्परा का निर्वाह होता हो एवं तदनुसार मंदिर में भगवान की पूजा होती हो उसे दिव्य देश कहते हैं। इस यात्रा का पहला लक्ष्य श्रीजगन्नाथ पुरी था। पहला चार्तुमास वहीं बीता। आंध्रप्रदेश के सिहाचलम अहोविलम मंगलगिरि तथा तिरूपति तिरूमला के दिव्यदेश का दर्शन करने में दूसरा चातुर्मास रास्ते में ही बीता। वहॉं से तमिलनाडु के मद्रास कांचीपुरम श्रीरंगम तथा आळवार तिरूनगरी के समीपस्थ स्थित सभी दिव्यदेश का दर्शन पूरा करने में तीसरा एवं चौथा
चातुर्मास रास्ते में बीता तथा पांचवा मुम्बई में बीता। वहॉं से छठे वर्ष में द्वारिका विन्दुसरोवर पुष्कर आदि की यात्रा पूरी हुई एवं सातवें वर्ष पुनः वृन्दावन का दर्शन करते तरेत पाली लौट आये। इस यात्रा में तिरूमला वेङ्कटेश भगवान तथा कांची के वरदराज भगवान एवं श्रीरंगम के रंगनाथ भगवान से विशेष सम्बन्ध बन गया। आळवार तिरूनगरी से लेकर श्रीरंगम तथा कांचीपुरम तक आळवार तथा पूर्वाचार्यों की भूमि होने के कारण श्रीवैष्णव परम्परा को गहराई से समझने का अवसर मिला जो सदा के लिये इनके मानसपटल पर अंकित हो गया। इसी स्वानुभूत आनन्द का बीज बाद में अर्चागुणगान रूपी सौरभपूर्ण कमल के रूप में प्रस्फुटित हुआ। रंगनाथ. वरदराज़ तथा वेङ्कटेश भगवान के दिव्यदेश की महिमा रूपी बाग बाटिका एवं वन में आळवार एवं पूर्वाचार्यों रूपी विहंगों के विहार करते सुमधुर वाणी से प्रफुल्लित हो श्रीपराङ्कुशाचायजी जीवन भर भगवद चरित के बाग बाटिका को दत्तचित्त माली की तरह
सींचते रहे। इनके जीवन के बाद के वर्षों में प्रत्येक वर्ष इन दिव्यदेशों की अनेकों बार अनगिनत यात्राएँ हुईं तथा इस तरह से श्रीपराङ्कुशाचार्य जी स्वयं एक चलन्त एवं जीवन्त तीर्थपुरी हो गये। ये जहॉं रहते समीपस्थ भक्तों को नित्य नवीन भगवदचरित के ही फूल के सुगंध एवं मृदु फल के सुस्वाद का आनन्द मिलते रहता।
सरौती ठाकुरवारी
ई सन् 1910 की बात है। यातायात के साधन में प्रायः घोड़ा या बैल का ही प्रयोग होता था। व्यापारी लोग बैल के माध्यम से सामान एक जगह से दूसरे जगह ले जाते थे। एक दिन एक व्यापारी 'श्रीराम लक्ष्मण एवं सीता जी' के प्रस्तर विग्रह बेचने सरौती पहुॅचा। गॉंव के भक्तों में 'श्रीराघवेन्द्र सरकार' को गॉंव में ही रखने का विचार आया। पैसा चन्दा कर विग्रह खरीद लिये गये। श्रीराघव जी नामक एक भक्त ने कुछ जमीन ठाकुर जी के नाम दे दी। ठाकुरवारी के लिये मिट्टी एवं खपड़ा के दो तीन घर बनाये गये। ठाकुर जी की प्राणप्रतिष्ठा के लिये सुयोग्य संत का अन्वेषण होने लगा तथा तरेत के परमहंस स्वामी जी से इस पुनीत कार्य के लिये निवेदन किया गया। परमहंस स्वामी जी पधारे तथा अपने नियमवश गॉंव के बाहर ही बगीचा में ठहर गये। उन्होंने ने ही वृन्दावन से याज्ञिक तथा पुजारी आदि की व्यवस्था कर दी
थी। ई सन् 1912 में ठाकुर जी अपने ठाकुरवारी में विराज गये तथा विधिवत नित्य पूजा का शुभारंभ हो गया। परमहंस स्वामी जी ने एक 'यमुना गाय' . प्रसाद पकाने का एक बड़ा टोकना. ठाकुर जी के लिये एक पर्दा. तथा श्रीरामप्रपन्नाचार्य नामके एक पुजारी ठाकुर जी को अपनी तरफ से भेंट स्वरूप अपिर्त किये। ई सन् 1915 में परमहंस स्वामी जी का महाप्रयाण हो गया। श्रीपराङ्कुशाचर्य जी उदास रहने लगे। परमहंस स्वामी जी के श्रीवासुदेवाचार्य नाम के एक अन्य शिष्य जो 'नासिक स्वामी जी' के नाम से प्रसिद्ध थे कालान्तर में तरेत के स्थानाधीश बनाये गये।
           श्रीपराङ्कुशाचर्य जी पूर्व से ही गान एवं वादन विद्या में कुशल थे। इनका अधिकांश समय भगवान के भजन कीर्तन में ही बीतने लगा। सरौती के भक्तों को ठाकुरवारी के लिये एक अच्छे व्यवस्थापक की खोज थी। ये लोग मुकामा स्वामी जी के सम्मिलित प्रयास से श्रीपराङ्कुशाचर्य जी के पास पहुँचे तथा उन्हें सरौती लाने में सफल हो गये। श्रीपराङ्कुशाचर्य जी अब 'सरौती स्वामी जी' के नाम से जाने जाने लगे। पहले का ठाकुरवारी गॉंव से बाहर था तथा ठाकुर जी के पूवाभिमुखी होने के कारण गॉंव ठाकुर जी की पीठ की तरफ पीछे पड़ जा रहा था। कुछ भक्तों के मन में इसे गॉंव की प्रगति के लिये बाधक होने का भान होने लगा। इन लोगों ने श्रीस्वामी जी से अपनी मनसा प्रकट की। पहले
वाले ठाकुरवारी के पास ही ई सन् 1930 में तरेत स्थान की तरह यहॉं भी उत्तराभिमुख नये ठाकुरवारी का निर्माण हुआ तथा इस बार का ठाकुरवारी मिट्टी का न होकर ईंट एवं छत में लोहे की शहतीर आदि से पटाई करके विस्तृत जगमोहन के साथ पक्का बना। राघवेन्द्र सरकार अब नये ठाकुरवारी में पधारे.। यही ठाकुरवारी आज भी विराजमान है। समय बीतने के साथ श्रीस्वामी जी श्रीवैष्णव परम्परा में प्रगाढ़ होते गये तथा प्रतिवर्ष दक्षिण भारत के तिरूमला तिरूपति. कांचीपुरम. तथा श्रीरंगम की यात्रा अवश्य करने लगे। धीरे धीरे तिरूमला तिरूपति के वेंकटेश भगवान से अधिक जुड़ गये। फलतः ई सन् 1968 के वैशाख शुक्लपक्ष में सरौती में भी श्रीवेंकटेश भगवान के विग्रह को विधिवत प्राणप्रतिष्ठा के साथ पधरवाया
गया। नये विग्रह पूर्व से विराजते हुए राघवेन्द्र सरकार के साथ उसी गर्भगृह में उसी वेदी पर लक्ष्मणजी की वाईं ओर विराज कर भक्तों को दर्शन लेगे। दर्शन की यही व्यवस्था आज भी यहॉं विराजमान है।
भारत में मुगलों ने हिन्दु मन्दिरों तथा हिन्दु संस्कृति को सर्वाधिक दिव्यचरितामृत स्वामीश्रीपराङ्कुशाचार्य जी महाराज 106 क्षति पहुँचायी। हिन्दु मन्दिरों को तोड़फोड़ कर नष्ट किया गया तथा गॉंव के गॉंव हिन्दुओं को जबरन मुसलमान बनाया गया। मुगलों के अत्याचार ने सर्वाधिक उत्तर भारत को प्रभावित किया। दक्षिण में भी श्रीरंगम की व्यवस्था को इनलोगों ने नष्ट ही कर दिया था तथा हजारों की संख्या में यहॉं श्रीवैष्णव जन भगवान रंगनाथ की रक्षा में अपनी जान गंवा दिये थे। उत्तर भारत में ऊँचे शिखर के साथ दूर से दिखने वाले मन्दिर को आसानी से चिह्नित कर नष्ट किया जाता था। परिणाम स्वरूप यहॉ नये मन्दिरों के निर्माण में सावधानी बरती जाने लगी तथा मन्दिर भी आवासीय घरों की तरह बिना
शिखर के बनने लगे। इसी शैली पर तरेत तथा सरौती के ठाकुरवारी भी बने थे। गर्भगृह के ऊपर मात्र एक बंगलानुमा संरचना बना दी जाती थी तथा उसमें सार्वजनिक प्रवेश वर्जित रहता था। श्रीस्वामी जी के ई सन् 1980 में महाप्रयाण के बाद सरौती के भक्त गण 1990 के दशक में सरौती के ठाकुरवारी में भी गर्भगृह के ऊपर शिखर आदि जोड़कर इसका जीर्णोद्धार किया।
ठाकुरजी के गर्भगृह के प्रवेश द्वार पर श्रीस्वामी जी की प्रतिमा भी स्थापित की गयी। इसतरह से श्रीस्वामी जी के काल के धरोहर संरचना में काफी परिवर्तन कर दिया गया।
मातृ प्रेम
श्रीस्वामी जी अपनी मॉं से अंत तक जुड़े रहे। श्रीस्वामी जी महमत् पुर जाते थे परन्तु अपने घर नहीं जाते थे। मॉं वृद्धा हो गयीं थीं। मॉं को जब एकबार इनके आगमन का पता चला तो लड़खड़ाते दीवार के सहारे इनके ठहराव स्थल पर पहुँच गयीं एवं बोलीं 'मॉं को क्यों भूल गये बेटा'। श्रीस्वामी जी ने मॉं को साष्टांग प्रणाम कर घर पहुँचाया तथा इसके बाद जब कभी भी इस क्षेत्र में आते तो अपनी मॉं का दर्शन अवश्य करते थे। मॉं जब परमपद कर गयीं तो स्वयं आचार्य बनकर इन्होंने नारायणवलि संपन्न
कराया। रघुनाथपुर निवासी श्रीराजदेव शर्मा जी ने बताया कि श्रीस्वामी जी कहा करते थे 'गऊ एवं मॉँ मेें कोइे दोष नहीं होता है।' स्वामी जी ने अपनी मॉं का श्राद्ध बिन्दुसरोवर में भी किया था।
श्रीस्वामी जी के धार्मिक कृत्य एवं पुस्तकों का प्रणयन
श्रीवैष्णव मत में संस्कार करने के अतिरिक्त श्रीस्वामी जी गॉंवों में 'श्रीमद्भागवत्' तथा 'हरिवंश' की कथा सुनाया कराते थे। श्रीस्वामी जी की कृपा से अनेकों निःसंतान लोगों को 'हरिवंश' की कथा सुनने से संतान की प्राप्ति हुई है। भक्तों के बीच श्रीस्वामी जी ने कथा सुनाने में 'भागवत सप्ताह' का बंधन नहीं रखा। सुविधानुसार वे सबको एक दो या तीन दिनों की भागवत कथा सुनाया करते थे। इनके पास भागवत की संस्कृत मूल वाली ही पुस्तक सदा विराजमान रहती थी। श्रीस्वामी जी ने अपने आध्यात्मिक अनुभव का लाभ अपने तक सीमित नहीं रखकर निम्नांकित पुस्तकों का प्रणयन किया जिससे भक्तगण भी
पूर्णतया लाभान्वित हुए तथा होते रहेंगे।
1। ब्रह्ममेध संस्कार एवं नारायण वलि पद्धति। 2। अर्चागुणगान।3श्रीपरमहंस स्वामी राजेन्द्रसूरि जी महाराज की संक्षिप्त जीवनी प्रथम भाग। 4।साम्प्रदायिक पश्नोत्तर स्त्री एवं मंत्र परमहंस स्वामी जी की जीवनी द्वितीय भाग। 5। राम रहस्य एवं हिंसा।परमहंस स्वामी जी की जीवनी तृतीय भाग 6। महाप्रयाण परमहंस स्वामी जी की जीवनी चतुर्थ भाग। 7। श्रीसीताराम परिचय एवं मानस शंका समाधान। 8। एक नारायण ही उपास्य क्यों। 9। ध्रुव प्रह्लाद चरित्र । 10। सुदामा चरित्र।
जब भी स्वामीजी बालाजी के दर्शन को जाते थे तो वहॉं बीसो मन लड्डू का भोग लगवा कर स्थानीय मठों में बॉंटते थे तथा सरौती लाते थे। तिरूमला के संत लोग स्वामी जी की श्रद्धा देखकर अवाक् रहते थे तथा इस बात का उल्लेख करते थे कि स्वामी जी के चश्मा रखने वाले कवर में साक्षात लक्ष्मी बसती हैं। पता नहीं एक छोटे चश्मे के खोल से कितने रूपये स्वामी जी खर्च करते रहते थे क्योंकि लड्डू भोग में ही उस जमाने में पन्द्रह सोलह हजार रूपए लगा देते थे। बाकी श्रीवैष्णव संत के सम्मान के खर्च अलग ही रहता था। सरौती लौटने पर समस्त श्रीवैष्णव गॉंवों मे श्री स्वामी जी बालाजी के लड्डू का प्रसाद निश्चित रूप से उपलब्ध कराते रहते थे।
श्रीस्वामी जी के बारे में भक्तों के संस्मरण सुमन
आथर्वणं सुमनसां प्रवरमहान्तं कौन्डिन्यवंशमनधं करूणालयन्तम्।।
राजेन्द्रदेशिकपदे विनिवेशयन्तं श्रीमत् पराङ्कुडामुनिं प्रणतोऽस्मि नित्यम्।।
श्री रंगदेशिक स्वामी के चरणाश्रित परमहंस स्वामी श्री राजेन्द्रसूरि जी के पदछाया में रहने वाले अथर्ववेदी पुण्यवान कौडिन्य ऋषि के अथरव कुल के पुष्प सा सुकोमल गुरू स्वामी पराङ्कुश जी की सदा वन्दना करता हूँ। सरौतीस्वामी जी ने हजारो गॉंवों को श्रीवैष्णव मत में समाश्रित कर लाखों भक्तों का उद्धार किया। इनके सभी भक्तों के अपने अपने दिव्य संस्मरण हैं। सबों को एकत्रित करना संभव नहीं है। कुछेक संस्मरण सुमन ही यहॉं अर्पित हो सके हैं।
पंडित श्रीमाधव शर्मा जी द्वारा संग्रहित संस्मरण
विद्याज्ञानवयः पूज्यं श्रीपराङ्कुशमाश्रितम्।
शिष्योपशिष्यान् पाठयन्तं माधवार्यं नमाम्यहम्।।
श्रीमाधव शर्मा जी का जन्म ई सन् 1921 में जलालपुर गॉंव में हुआ था। बचपन में ही सरौती स्वामी जी से श्रीवैष्ण्व संस्कार से सुसंस्कृत हो खैरा संस्कृत विद्यालय में पढ़ने आ गये थे। इनको पंडित गदाधार जी का स्नेह प्राप्त था। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा खैरा में हुई तथा खैरा विद्यालय बंद हो जाने के बाद ये पंडित गदाधर जी के साथ पटना गये और वहीं से व्याकरण में आचार्य की शिक्षा पूरी की। गृहस्थजीवन स्वीकार करते हुए सकूराबाद भवन निर्माण में निपुणता वास्तुकला के ज्ञान सम्बन्धि एक घटना है। सरौती ठाकुरवारी में 18 फीट लंबा एवं 18 फीट चौड़ा जगमोहन का निर्माण होना था। श्रीस्वामी जी ने 12 पत्थर के पाये के सहारे अपने निर्देश में इसका निर्माण कराया। गया से एक कारीगर फर्श में संगमरमर लगाने आया था परन्तु वह देर से काम करके ज्यादा समय लगाकर ज्यादा मजदूरी का लालची हो गया था। श्रीस्वामी जी ने सरौती के पास से ही किसी अब्दुल नामके कारीगर को बुलाया और अपनी
देखरेख में संगमरमर विछाने का काम पूरा कराया। इसीतरह से जगमोहन के ऊपर एक बंगला बनना था परन्तु किसी कारीगर को उसकी छावनी कैसे की जाय समझ मे नहीं आर हा था। श्रीस्वामी बाहर गये हुए थे। सरौती लौटने पर उन्होंने स्वयं ही उसका उपाय निकाल कर छावनी का कार्य पूरा कराया।
घोड़े की सवारी
सरौती स्वामी जी एक बार अपने गुरू परमहंस स्वामी जी के साथ भारत यात्रा पर थे। महाराष्ट्र में किसी भक्त ने परमहंस स्वामी जी को एक घोड़ा समर्पित किया। परमहंस स्वामी जी तो पैदल ही चलते थे इसलिये घोड़े का उपयोग दिव्यचरितामृत स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य जी महाराज 124
मात्र सामान वगैरह ढ़ोने में हो रहा था। एक दिन परमहंस स्वामी जी ने पराङ्कुशाचार्य जी को घोड़े पर बांह पकड़ कर बैठा दिया और कहा कि डरने की कोई बात नहीं है। उसदिन से घुड़सवारी करना श्रीस्वामी जी को अपने गुरू का प्रसाद हो गया एवं सरौती स्थानाधीश के रूप में ये 'घोडावाले स्वामी' जी के नाम से भी प्रसिद्ध हो गये थे। रात के समय को अनावश्यक सो कर या जाग कर व्यतीत करने से बचने के लिये श्रीस्वामी जी अधिकांशतः रात में ही चलते थे। इसका दूसरा पक्ष यह भी था कि दिन में भक्तों के बीच रहकर उनको लाभान्वित करते थे। इनके घोड़े की विशेषता थी कि जब श्रीस्वामी जी रात में राह भूल जाते थे तो अपने घोड़ा पर ही छोड़ देते थे और स्वयंमेव ईच्छित स्थल पर पहुँच जाते थे। घोड़े की दूसरी विशेषता थी कि जब श्रीस्वामी जी अपने गंतव्य स्थल पर पहुँचते थे तो घोड़ा 'धैवत ध्वनि' से गॉंववाले को श्रीस्वामी जी के आगमन की सूचना दे देता था।
नये घोड़े का नियंत्रण ओड़विगहा गॉंव की एक अनोखी घटना है। एक भक्त नया घोड़ा खरीदा था। संयोग से श्रीस्वामी जी वहॉं पधार गये और उसने श्रीस्वामी जी को घोड़े पर चढ़कर आशीर्वाद देने का निवेदन किया। श्रीस्वामी जी जैसे ही घोड़े पर सवार हुए कि वह वायु गति से भागने लगा। सभी कसनी आदि विखरने की स्थिति में आ गये। लोगों को लगा कि आज श्रीस्वामी जी को घोड़ा से
गिरकर अवश्य ही गंभीर चोट लगेगी परन्तु ऐसा कुछ नहीं हुआ। घोड़ा थककर जब रूका तो लोगों ने देखा कि श्रीस्वामी जी उसके गर्दन के पास चिपके हुए हैं। घोड़ा से उतरकर श्रीस्वामी जी ने अपने गुरू बड़ेमहाराज परमहंस स्वामी के आशीर्वाद का स्मरण किया।
प्रेत का कल्याण
एक बार रात्रि में घोड़ा पर सवार होकर श्रीस्वामी जी नहर किनारे किसी गॉंव को जा रहे थे। वहॉं एकान्त में एक फूस की झोपड़ी दिखी। श्रीस्वामी जी के साथ पैदल चलने वाले विद्याथी का दल कुछ दूर पीछे छूट चुका था। फूस की झोपड़ी से एक महिला बीमार बच्चे को गोद में लेकर आई और श्रीस्वामी जी से उसके लिये दवा मांगने लगी। इन्होंने बच्चे को घोड़ा के समीप लाने को संत का इसी तरह से उपचार हुआ करता है। ऐसा देखा जाता था कि जब कभी भी बड़े महाराज परमहंस स्वामी जी को अपने शरीर पर वायुदोष उत्पन्न होने का आभास होता था तो वे ऊंचे स्वर में भजन गाते थे। इससे शरीर पर कुपित वायुदोष शांत हो जाता था।
आयुर्वेद
वर्षात के चार माह साधु संत एक ही स्थान पर टिक जाते हैं और इसे चातुमास करना कहा जाता है। श्रीस्वामी जी भी सरौती में चार माह रहकर आयुवेदिक रस रसायन चूर्णादि औषधियों का भी निर्माण कराते थे। इसके लिये आयुर्वेद की पुस्तके पहले से ही मंगा कर रखते थे। सहयोगियों को ककहरा की तरह आयुर्वेद के गूढ़ तत्वों को बताते थे। सरौती में 'रसराज सुन्दरम' 'निघन्टु रत्नाकर' 'पारद संहिता' 'सुश्रुत संहिता' 'चरक वाग्भट संहिता' 'वैद्यकशब्द निघन्टु' 'सम्पूर्ण मदनपाल निघन्टु' 'अष्टाकर रहस्य' 'धनवन्तरि भावप्रकाश' 'सम्पूर्ण भैषज्य रत्नावली' 'माधव निदान' 'शार्गंधर संहिता' 'चिकित्सा चन्द्रोदय' 'भैषज्य रत्नावली' आदि पुस्तकें से लोगों को पढ़ाते थे। वैद्यों को अथवा रोगियों को औषधियॉं निःशुल्क बांटी जाती थी। मिर्जापुर के च्यवन बाबू श्रीस्वामी जी की देखरेख में बारह वर्षों में 'मकरध्वज' नामकी एक दवा बनाये थे जो मरनासन्न व्यक्ति को भी कुछ देर के लिय पुनः होश में लाने में सामर्थ्य थी।
जिसका आयुर्वेद की पुस्तकों में उल्लेख नहीं था वैसी दवायें भी श्रीस्वामी जी अपनी मनीषा से बनवाते थे। आठ दस तरह के नमक के रस से सरौती में 'मदनविलास' नामकी एक ऐसी ही औषधि बनती थी जो विषम अपच में भी लाभ करती थी। बाहर भ्रमण के अन्तराल साथ के विद्यार्थियों को रास्ते में मिलने वाली जड़ी बूटी की पहचान कराते हुए उनके गुणदोष से अवगत कराते चलते थे।
   115 वर्ष की लम्बी अवधि वाले जीवन के अंतिम तीन वर्ष श्रीस्वामी जी ने हुलासगंज 'श्रीलक्ष्मी नारायण' मन्दिर में ही भगवान के लीला गुणों के स्मरण  करने में बिताये। श्रीस्वामी जी महाराज नम्माळवार के अंश से ही अवरित थे। जिस कमरे में हुलासगंज आश्रम में ये रहते थे उस कमरे के ठीक सामने दरवाजा पर एक बकुला वृक्ष विद्यमान था। यह वृक्ष आज भी है। हुलासगंज की अंतिम तीन वर्षों की अवधि में प्रायः ये ऑंखें बंद किये रहते थे। जब भगवदप्रसाद सामने आये तो ऑंखे खोल उसे ग्रहण

करते थे। अपने महाप्रयाण के तीन दिन पूर्व अपने भक्तों को 'श्रीमन्नारायण' का कीर्तन करने को कहा। द्वयमंत्र की अनुगुंज में स्वामी जी स्तोत्र रत्न के पद 21 गुनगुनाते रहे। अंततः 10 फरवरी सन् 1980 तदनुसार वि संवत् 2036 फाल्गुन कृष्ण नवमी रविवार अनुराधा नक्षत्र मकर के सूर्य की गोधूलि वेला में दिव्यपार्षदों के साथ भगवान स्वयं आकर श्रीस्वामी जी महाराज को वैकुण्ठ लोक ले गये।
साभार-- दिव्यचरितामृतम्