सोमवार, 17 अक्तूबर 2011

वैदिक सूक्त



सायनाचार्य का दूसरा नाम विद्यारण्य है। इन्होंने ऋग्वेद, शुक्लयजुर्वेद, अर्थवेद तथा सारे ब्राहमण ग्रन्थों पर भाष्य लिखे। धर्म के तीन स्तम्भ होते है। 1 तत्व ज्ञान 2 सदाचार 3 कर्मकाण्ड। लौकिक छन्दों की तरह गण व्यवस्था वैदिक साहित्य में नहीं है। यहॉ चार-चार अक्षर के एक छन्द होते है तथा बढ़ते क्रम में यह अडतालिस अक्षरों का छन्द वेद में प्राप्त होता है।
ऋग्वेद का प्राचीनतम विभाजन अष्टक के रूप में प्राप्त होता है। बाद में अनुवाक, अध्याय, सूक्त, एवं मंत्र के रूप में विभाजित किया गया । सम्पूर्ण वेद दस संहिताओं में विभक्त किया गया। मण्डल और सूक्त के रूप में आज ज्यादा प्रचलित है, जबकि गुरू-शिष्य परम्परा में अष्टक क्रम ज्यादा प्रभावी है।
दार्शनिक एवं नैतिक आधारों का निर्माण ऋग्वेद में हुआ है। यज्ञ में पढ़े जाने वाले मंत्र समूह को शस्त्र कहा जाता है। होता शस्त्र पढ़ता है। वेद के यज्ञों में चमासाध्वर्यु शब्द अध्वर्यु के द्वारा प्रयुक्त होने वाले विभिन्न प्रकार के चमस को उपलब्ध कराता है। यहीं शाब्द बाद में विकृत होकर चमचा के रूप में प्रतिष्ठित हो गया।
नासादीय सूक्तों में सष्टि की परिकल्पना एवं वैचारिक आधार प्राप्त होता है। रक्त संबन्धों में विवाह का निषेध यम यमी संवाद में प्राप्त होता है। जिस देश में जुआ और लॉटरी का प्रचलन ज्यादा हो वहॉ अक्ष सूक्त को बार-बार पढ़ने की आवश्कता है। यह सूक्त इस प्रकार के कार्यो का निषेध करते हुए इसके परिणाम की ओर ध्यान आकर्षित करता है। संज्ञान सूक्त संगठन के सूक्त है। ऋग्वेद के दसवे मंण्डल में बहुत अधिक सूक्त आये है। ऋग्वेद में भक्ति भी है परन्तु यह प्रेमा भक्ति नहीं है बल्कि पिता पुत्र की बीच संबन्ध रूपी भक्ति है। पिता-पुत्र के कल्याण हेतु सर्वदा सन्नद्ध रहता है। गतिशील समाज की निर्मिति का आकर्षक चित्र ऋग्वेद से प्राप्त होता है।
वेद के दो सम्प्रदाऍ प्राप्त होते है। 1 ब्राहमण सम्प्रदाय 2 आदित्य सम्प्रदाय। शिव संकल्प सूक्त में मनोविज्ञान का आधार प्राप्त होता है। रथ और सारथी रूपकों का उपमान शिवसंकल्प सूक्त में प्रथम बार प्राप्त होता है।मेध सूक्त में विभिन्न प्रकार के उद्योगों एवं व्यवसायों का वर्णन प्राप्त होता है। यज्ञ वेदी के निर्माण में यज्ञवल्क्य का अनुपम योगदान है। इससे ज्ञात होता है कि याज्ञवल्क्य कलात्मक अभिरूचि के व्यक्ति थे। स्मृतियों ने वेदों के धर्म को आगे बढ़ाया, वेदोखिलो धर्ममूलम्‌।