शनिवार, 28 जनवरी 2017

प्रतिपलं तव संस्मरणम् (हुलासगंज संस्मरण)

प्रातः 4:00 बजे उठकर मंदिर जाकर वेंकटेश सुप्रभातम्  का सामूहिक पाठक करना। पाठ याद करने के लिए बैठ जाया करते थे। सुबह छात्रों को जगाने का काम छात्रावास के छात्रावास अधीक्षक श्री शिवकुमार शर्मा जी कराते थे। शिवकुमार शर्मा जी का कठोर अनुशासन था। प्रातः 4:00 बजे से लेकर रात्रि 9:00 बजे तक जब तक कि छात्र सोना जाएहर एक पर उनकी पैनी दृष्टि होती थी। प्रातः कालीन नित्यक्रिया कर घर से लाये जलपान को करना और दैनिक  आवृत्ति के लिए बैठ जाना। उच्च विद्यालय परिसर में समय-समय पर घंटी बजाई जाती थी। प्रत्येक घंटी का समय के साथ अलग अलग तात्पर्य होता था। यदि 4:00 बजे की घंटी है तो यह जागरण के लिए होती थी। 9:00 बजे की घंटी भोजन करने के लिए ,10:00 बजे की घंटी स्कूल जाने के लिए, स्कूल के प्रत्येक कालांश के लिए घंटी बजती रहती थी। अध्यापक बदलते रहते थे और अंतिम घंटी 4:00 बजे की बजती थी। तब हम सायंकालीन विद्यालयीय प्रार्थना कर अपने छात्रावास परिसर को चले जाते थे। 4:30 पुनः घंटी बजती थी अमनिया करने के लिए। चावल की साफ सफाई को अमनिया कहा जाता था। यह प्रक्रिया प्रतिदिन की थी। हमलोग इसका अभ्यस्त हो चुके थे।घंटी समय और दिनचर्या का साहचर्य हो चुका था। हम इसके अभिन्न अंग बन चुके थे। एक दिन की घटना है हम लोग हम चारों भाई महाविद्यालय के छात्रावास में सोए हुए थे, तभी आश्रम में स्थित उच्च विद्यालय के छात्रावास की ओर से जोर जोर से आवाज आ रही थी आग लग गई है। महाविद्यालय के छात्रों के साथ हमलोग उस दिशा की ओर दौड पडे। वहां पहुंच कर देखा, स्थिति अत्यंत ही भयावह थी।  उच्च विद्यालय के छात्रावास में कुल 3 कक्ष थे। इसके साथ ही भोजनालय भी लगा हुआ था। मिट्टी की दीवारें और घास फूस से निर्मित छप्पर वाले इस छात्रावास में आग इतनी तेजी से फैली कि किसी को संभलने का मौका ही नहीं दिया। उच्च विद्यालय के छात्रावास से आग की ऊँची लपटें निकल रही थी। कक्षा 6 से 8 तक के छात्र बदहवास इधर उधर भाग रहे थे। कोई अपनी जली किताबें, वर्तन आदि को देखकर रो रहा था तो कोई भयावह मंजर को देखकर भयभीत था। सभी छात्रों के कपड़े रजाई सब कुछ जल चुके थे। उच्च विद्यालय के अध्यापक श्री शिवकुमार शर्मा जी की तत्परता से कोई हताहत नहीं हुआ। सभी सुरक्षित बाहर निकल चुके थे। आग किसने लगायी या कैसे लगी इसपर कयास ही लगते रहे। कुछ दिनों तक उच्च विद्यालय का बरामदा छोटे बचेचों का छात्रावास बना रहा। महाविद्यालय के छात्र भी फूस से निर्मित छात्रावास को छोडकर महाविद्यालय के कक्ष में रहने आ गये। जल्द ही हम उस घटना को भूल गये। हम पूर्ववत् अपनी दिनचर्या में लग गये।
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