स्वामी पराङ्कुशाचार्य का कृतित्व

स्वामी पराङ्कुशाचार्य                 
जन्म-                 10  मार्च    1865                                          
परमपद-             10 फरवरी   1980
जन्मस्थान-          महमत्पुर, विक्रमपुर,पटना
परमपद स्थल-      हुलासगंज, जहानाबाद
कार्यक्षेत्र-  गया, पटना,नालंदा ,जहानाबाद, अरवल,नवादा और औरंगाबाद,भागलपुर,बाढ
स्वामी पराङ्कुशाचार्य का सम्बन्ध उस मगध जनपद से है,जिसका उल्लेख अथर्ववेद, पंचविंश ब्राह्मण, (17.1.16) तैत्तिरीय ब्राह्मण (3.4.9) मनुसंहिता (10.47) गौतम धर्मशास्त्र, महाभारत आदि ग्रन्थों में मिलता है। मगध बौद्ध काल और परवर्ती काल में उत्तरी भारत का सबसे अधिक शक्तिशाली जनपद था।राजधानी गिरिब्रज थी। इसमें पटना और गया जिले शामिल थे। ऋषि चरक की जन्मस्थली, बृहद्रथजरासंध तथा अशोक यहाँ के राजा हुए तथा भगवान् बुद्ध को यहीं ज्ञान प्राप्त हुआ।
   स्वामी पराङ्कुशाचार्य एक समाज सुधारक और वैष्णव भक्त संत थे। जिस समय इनका जन्म हुआ, उस समय देश में संतों के द्वारा समाज सुधार का कार्य किया जा रहा था। देश में स्वतंत्रता आन्दोलन का विगुल 1857 में बज चुका था। इन्होंने सरौती,गया,बिहार को अपना कर्मक्षेत्र बनाया। संस्कृत विद्यालयों की स्थापना के द्वारा वंचित तबकों तक संस्कृत शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए आपने अनथक परिश्रम किया। आपकी जीवनी तथा समसामयिक सामाजिक स्थितियों से ज्ञात होता है कि सामाजिक न्याय दिलाने की दिशा में भक्ति और संस्कृत शिक्षा को आपने एक औजार की तरह प्रयोग में लाया। यही कारण है कि आपकी रचना में प्रपत्ति और शिक्षा का समन्वय देखने को मिलता है। आप संस्कृत के नदीष्ण विद्वान् नहीं थे, वरन् संस्कृत के प्रचारक और आश्रयदाता की भूमिका का निर्वाह किया। पुण्यतीर्थ गया उस समय भी कर्मकाण्ड का केन्द्र था। मगध के समकालीन विद्वान् कर्मकाण्ड ग्रन्थों की रचना कर खुद को श्रेष्ठ संस्कृत विद्वान् मान रहे थे। उसी समय सहजानन्द सरस्वती भी समाज सुधार के क्षेत्र में सक्रिय थे। इन सभी का प्रभाव आप पर पहुंचना स्वाभाविक था। आपका जन्म एक छोटे से ग्राम महमत्पुर में हुआ था। उत्तर भारत के मंदिरों को मुगलों ने नष्ट भ्रष्ट कर दिया था। इस क्षेत्र में भव्य और विस्तृत मंदिर नहीं थे। भक्ति हेतु आकर्षण का कोई महनीय केन्द्र नहीं था। आपने अपने गुरु राजेन्द्राचार्य के साथ दक्षिण प्रदेशों के मंदिरों को देखा और अभिभूत हो गये।बुद्धिजीवियों से निरंतर सम्पर्क के कारण अपने यहाँ हो रहे सामाजिक भेदभाव को पहचाना। उस समय शाकद्वीपीय ब्राह्मण भुमिहार ब्राह्मण को कमतर मानते थे। अकर्मण्य भुमिहार को कर्मण्य भुमिहार ब्राह्मण तक की यात्रा कराने में इन्हें कई अवरोधों का सामना करना पडा। संस्कृत नहीं पढना, कर्मकाण्ड नहीं कराना ही भुमिहारों की अकर्मण्यता थी। ये इसे हेय कर्म मानते थे। जातीय समकक्षता के लिए संस्कृत का ज्ञाता होना आवश्यक था। यही एक अस्त्र था, जिसके बलबूते सामाजिक विषमता को चुनौती दी जा सकती थी। संस्कृत अपनाने और प्रचार की पृष्ठभूमि अलग होने कारण आपकी परम्परा को संस्कृत की अन्य धारा से पृथक कर देखना अनिवार्य होगा। यही कारण है कि इनकी रचनाओं में स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए पुकार सुनाई नहीं देती। परन्तु इतना सत्य है कि इनके द्वारा स्थापित संस्कृत शिक्षा केन्द्रों से शिक्षित होकर अनेकों ने रोजगार के अवसर पाये।
  स्वामी पराङ्कुशाचार्य ने  दक्षिण बिहार विशेषतः मगध क्षेत्र में संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार हेतु संस्कृत में कर्मकाण्ड के ग्रन्थों का लेखन, जनजागरण तथा अनेक शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की। आपने मगही बोली में अर्चा गुणगान की रचना की । मगही बिहार राज्य के मगध क्षेत्र में बोली जाने वाली एक बोली है। दक्षिण भारत में प्रतिष्ठित देवविग्रह के स्वरुप तथा यहाँ द्रविड संस्कृत के मेल से उत्पन्न प्रपत्ति के सिद्धान्त को मगही में प्रतिष्ठित करने वाले एकमात्र संत रहे हैं। मेरा सौभाग्य कि मैं इनके साहित्यिक अवदान तथा मगध में संस्कृत को प्रतिष्ठा दिलाने में इनकी भूमिका पर चर्चा करुँगा। मगध,काशी  से होते हुए इनकी वाणी भारत के अन्य भूभाग तक पहुँच चुकी है तथा इसका प्रभाव अब देश विदेश में भी शीघ्र दिखने लगा है। आपके शिष्य रंगरामानुजाचार्य ने आपको विशेष प्रसिद्धि दिलायी। पराङ्कुशाचार्य दक्षिण भारत में उद्भूत रामानुजीय वैष्णव परम्परा के सन्त थे। अर्चा गुणगान में विष्णु के स्वरुप में पूजित होने वाले श्रीनिवास वेङ्कटेश एवं रङ्गनाथ के अंग प्रत्यंगों, करुणा, प्रपत्ति तथा उनके ऐश्वर्य का ठीक वैसा ही वर्णन किया जैसा कि यामुनाचार्य के आलवन्दार स्तोत्र में किया है। कृपालो हे कृपा करके प्रभो क्यों ना  चिताते हो। बहुत अपराध जन्मों से किया है मोह के वश हो पंक्ति में अपराधसहस्रभाजनं की प्रतिध्वनि सुनाई देती है। भक्तगण जब अर्चा गुणगान के पदों को गाते थे तो पराङ्कुशाचार्य प्रभु भक्ति में भावविभोर हो नृत्य करने लगते थे। इस क्षेत्र के हर गायक का सपना होता है कि इनके द्वारा रचित भक्ति पदों को अपने अंदाज में स्वर दें। ऐसा इसलिए भी कि इनके गीत क्षेत्रीय भाषाई विरासत को तो समेटे है ही गायकों को भीतर तक शान्ति का अनुभव कराता है। कई गीतकारों ने आपके सम्मान में गीतों की रचना की है एवं गायकों ने भी उसे स्वर दिया है। इस प्रकार के गीत हुलासगंज एवं इससे सम्बद्ध संस्थाओं के धार्मिक आयोजनों एवं यज्ञों में सुने जा सकते हैं।
        परांकुशाचार्य के व्यक्तित्व और कृतित्व को समझने के समकालीन घटनाक्रम, क्षेत्र की शैक्षणिक स्थिति को जानना भी आवश्यक है।  कोलकाता, रांची, गया तथा वाराणसी आदि मगध का निकटवर्ती संस्कृत शिक्षा का क्षेत्र था। यहाँ पर संस्कृत की स्थिति पर दृष्टिपात करना आवश्यक होगा, क्योंकि मगध क्षेत्र के लोग इन्हीं विद्या के केंद्रों में जाकर उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। वे इन विद्या केंद्रों से प्रभावित हो रहे थे। इस कालखंड में एक और ईसाई मिशनरियों के द्वारा शिक्षा सुधार लाया जा रहा था।  कोलकाता, वाराणसी आदि स्थानों में नए-नए विश्वविद्यालय स्थापित हो रहे थे।  अंग्रेजों द्वारा स्थापित शिक्षा केंद्र तथा एक भारतीय संत के द्वारा शिक्षा केंद्र की स्थापना में मौलिक अंतर यह था कि जहां अंग्रेज भारतीय रीति रिवाज परंपरा को समझकर भारतीयों पर शासन करने के लिए शिक्षा केंद्र स्थापित किये, वहीं भारतीय संत के द्वारा वंचितों को मुख्यधारा से जोड़ने का जद्दोजहद दिखता है।
ईस्ट इंडिया कंपनी द्वारा स्थापित सुप्रीम कोर्ट कोलकाता में जूनियर जज पर तैनात विलियम जोंस 1783 में कोलकाता आये। उन्होंने कोलकाता में संस्कृत व्याकरण और काव्य की बारीकियों को पढ़ कर जाना। विलियम जोंस कानून, दर्शन, धर्म, राजनीति, नैतिकता, अंकगणित, चिकित्सा विज्ञान आदि विषयों की गहन जानकारी के लिए संस्कृत विद्या का अध्ययन कर रहे थे। इसी समय हेनरी टॉमस कोलब्रुक तथा नैथे नीयल हॉलहेड संस्कृत भाशा सीखकर संस्कृत ग्रंथों का अनुवाद कर रहे थे। यह सभी भारतीय विरासत को समझने के प्रयास में लगे थे। इसी समय जोन्स ने इनसे मिलकर एशियाटिक सोसाइटी ऑफ बंगाल का गठन किया तथा वहीं से एशियाटिक रिसर्च शोध पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया। श्रीमती योगमाया देवी बिहार के संस्कृत शिक्षा में स्त्रियों के लिए अलग पाठ्यक्रम बनाए जाने तथा बिहार संस्कृत कन्वोकेशन में महिला प्रतिनिधि को शामिल कराने के लिए संघर्ष कर रही थी। बिहारी छात्राओं की सफलता नामक लेख में सरस्वती देवी लिखती है कि 1931 के अप्रैल में योगमाया देवी ने महिलाओं में संस्कृत के प्रचार के लिए अलग कोर्स बनाने की मांग बिहार लेजिस्लेटिव असेंबली में की थी। बिहार संस्कृत एसोसिएशन की संचालिका सभा में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की भी मांग की। जिस समय पंडित ईश्वरदत्त शास्त्री के सभापतित्व में वाराणसी में आयोजित अखिल भारतीय संस्कृत छात्र संघ का अधिवेशन हो रहा था और महिलाओं को संस्कृत शिक्षा में अधिकार दिलाने के लिए लड़ाई लड़ी जा रही थी, उस समय भूमिहार ब्राह्मण भी संस्कृत शिक्षा से बंचित थे। इससे यह तो स्पष्ट हो चुका है कि उस समय स्त्रियों तक संस्कृत शिक्षा नहीं पहुंच पा रही थी। वैष्णव संतो द्वारा स्थापित संस्कृत के शिक्षा केंद्रों में भी स्त्रियों के लिए संस्कृत शिक्षा देने हेतु कोई व्यवस्था नहीं की गई, इस प्रकार संस्कृत शिक्षा से एक बहुत बड़ा वर्ग उपेक्षित रह गया। ईसाई मिशनरियों का बहुत बड़ा केंद्र रांची था। वे पलामू,हजारीबाग सहित अन्य आदिवासी बहुल क्षेत्रों में अंग्रेजी शिक्षा के प्रसार में निरंतर लगे हुए थे। फादर कामिल बुल्के भी भारत में मिशनरी स्कूलों में अध्यापन के लिए पधारे थे परंतु संयोग ऐसा कि वह राम के चरित्र से प्रभावित होकर भारत ही नहीं अपितु संपूर्ण विश्व में प्रचलित रामकथाओं का संकलित करने में अपना जीवन अर्पित कर दिया। फादर कामिल बुल्के भी संस्कृत की शिक्षा ग्रहण किये। हरिनारायण शर्मा ने अपने भूखंड पर दानापुर के कैंट रोड पर मुस्तफापुर,खगौल में 1901 में वेद रत्न विद्यालय की स्थापना की गई। बाद में इसे देबघर स्थानान्तरित कर यहाँ वेदरत्न उच्च विद्यालय की स्थापना की गयी। आप आर्य समाज के अनुयाई तथा आयुर्वेद के ज्ञाता थे । यहां से संस्कृत विद्या प्राप्त कर अनेकों विद्वानों ने शिक्षा पाई। इन सभी घटनाक्रमों से तरेतपाली तथा सरौती का शिक्षणकेन्द्र असम्बद्ध दिखता है, क्योंकि पराङ्कुशाचार्य एक प्रपत्ति के साधक थे,जिसके लिए संस्कृत शिक्षा अनिवार्य है। जातीय समकक्षता पाने में संस्कृतविद्या सहायक थी। तबतक शिक्षा का माध्यम संस्कृत ही हुआ करता था, इनके द्वारा गुरुकुल में बालकों को संस्कृत शिक्षा दी जाती थी, ताकि वे जगह जगह जाकर कर्मकाण्ड करा सकें। भारतीय समाज में महिलाओं द्वारा कर्मकाण्ड कराने की परम्परा नहीं थी इस कारण से भी संस्कृत शिक्षा में आधी आवादी उपेक्षित रह गयी। कुल मिलाकर परांकुशाचार्य एक शिक्षाविद् न होकर एक धार्मिक संत थे, जो एक वर्ग विशेष में संस्कृत को पहुंचाने का सार्थक कार्य कर रहे थे। अतः इस परिधि में रहकर इनके व्यक्तित्व तथा कृतित्व पर विचार करना चाहिए।
          पराङ्कुशाचार्य दक्षिण भारत के आलवार परम्परा से थे,जहाँ ज्ञान के स्थान पर भक्ति का अधिक महत्व था। इन्होंने अपनी भक्ति और कर्मसाधना से ईश्वर को प्रत्यक्ष किया। स्वयं पराङ्कुशाचार्य ने स्कूली शिक्षा प्राप्त नहीं की थी,परन्तु सूर, कबीर,मीरा आदि मध्यकालीन भक्त संतों की तरह इन्होंने भी भक्तिभाव से ओत प्रोत लगभग 65 पदों की रचना की हैं। इनके द्वारा लिखित अधोलिखित पुस्तकें श्री स्वामी पराङ्कुशाचार्य  संस्कृत संस्कृति संरक्षा परिषद् , हुलासगंज, जहानाबाद से प्रकाशित हैं।                 

1. ध्रुव प्रह्लाद चरित्र
2. सुदामा चरित्र
3. राम और हिंसा
4. राम रहस्य
5. सांप्रदायिक प्रश्नोत्तर
6. एक ही नारायण उपास्य क्यों?
7. सीताराम परिचय एवं मानस शंका समाधान
8. अर्चागुणगान
9. राजेन्द्र सूरी जी महाराज की जीवनी (4 खंड)
10. नारायणवली श्राद्ध पद्धति

परांकुशाचार्य की कुछ रचनायें मगही बोली है। एक भाषिक बोली में काव्यसर्जना कर इन्होंने इस बोली को पहचान दिलाने का कार्य किया। इनके साहित्य में मगही शब्दों का भरपूर प्रयोग करने साथ ही इन्होंने अपने साहित्य में मगही तथा संस्कृत शब्दों में संतुलन भी बनाये रखा,जिससे हर भाषाभाषी को इनके साहित्य का सहजबोध होता है। इन्होंनें स्वयं तो मगही में रचना की ही, इसके अतिरिक्त मगध के लोकगीत को अपने कृतित्व के द्वारा उर्वरा भूमि भी प्रदान की। स्वामी परांकुशाचार्य की जीवन लीला तथा वैकुण्ठगमन का प्रसंग बनाकर अनेकों लोकगीत रचित हैं, यथा- स्वामी जी कैलन वैकुण्ठ पयनवां स्वामी जी लोक महनवां ना। वस्तुतः आप संतशिरोमणि तो थे ही मगध और मगही के गौरव पुरुष भी थे। इनके जीवनी पर आधारित एक पुस्तक स्वामी परांकुशाचार्य चरितामृतम् प्रकाशित है।  
       बचपन में हुलासगंज में अध्ययन के समय मैं भी श्रीनिवास प्रताप दिनकर पद का नित्य गायन करता था। गया,जहानाबाद,औरंगाबाद,नवादा,अरवल,पटना सहित अनेक जनपदों में त्यौहारों तथा धार्मिक उत्सव के समय आपके द्वार रचित पदों को गाने की परम्परा है। आपसे प्रेरित होकर लक्ष्मी स्वामी ने मगही में भावपूर्ण गेय पदों से युक्त लक्ष्मी विलास रस नामक पुस्तक को लिखा। इस सबके बाबजूद आश्चर्य है कि भक्ति रचनाओं के द्वारा मगही साहित्य को जीवन्त बनाये रखे इस महापुरुष की रचनाओं की ओर अबतक मगही साहित्य के इतिहास लेखक और समीक्षक की दृष्टि इस ओर क्यों नहीं पड सकी? 1960-62 के बीच महाकवि योगेश द्वारा मगही का पहला महाकाव्य गौतम लिखा गया,जबकि इसके अनेकों वर्ष पूर्व पराङ्कुशाचार्य जी ने मगही में रचना की थी। मगही को चाहने वाले उन 2 करोड़ लोगों को इनके जन्म दिन पर इन्हें अवश्य याद करना चाहिए।  

                            अर्चा गुणगान :

1. श्रीनिवास  भगवान की स्तुति

1.    श्रीनिवास प्रताप दिनकर भ्राजता सब लोक मे ।
सो दीन जन के तारने प्रभु आवते भूलोक में ।
वह कृपा चितवन नाथ की जन को सनाथ बनावता ।
वारीश करूण ऊमड़ घुमड़ अघ सकल दूर दहावता ।
प्रभु दिव्य दक्षिण हस्त में ज्यों अस्त्रराज विराजहीं ।
त्यों तेजमय अतिपाञ्चजन्यसु वामकर वर गाजहीं ।
है कान्तिमत सुन्दर पीताम्बर अति विचित्र किनारियॉ ।
सो काछनी कटि में सुहावनी सबन के मन हारियॉ ।
वनमाल औ मनिमाल अगनित पुष्प मोतिन लर रहे ।
पुनि तैसेहीं भगवान के भगवान माला बन रहे।
औ श्रवण कुण्डल मुकुट भूषण गणन मे बहु मणिगणा ।
ज्यों श्याम घन में दामिनी बहु चन्द्र रवि तारे गना ।
प्रभु दिव्य दक्षिण हस्त से निज चरण शरण बतावहीं ।
ना भव तुम्हारे जानु लो सो बाम से दिखलावहीं ।
वह ज्योति जगमग जासु दस दिसि विदिसहु छायी महा ।
सो देखते दर्शक गनो के भागते अघतम महा ।
फणिराज पंकज रूप धर कर दिव्य आसन सोहहीं ।
हो दल अनेको पादतल सो लखित मुनि मन मोहहीं ।
व्यूह पर वैभवन व्यापेहुॅ कौन पाते यत्न से।
भगवान अर्चा रूप धरकर जनन से मिल सुगम से ।
पर्ण फल जल पुष्प से सेवा सुलभ अति प्रेम से ।
इसके लिये यह तन मिला लख व्यास के उपदेश से ।
भूधर समान न और भूधर भूमि पर पाते कहीं ।
सदग्रंथ में जब देखते इनके सुयश सर्वत्र हीं ।
है धन्य कुधर शिखर अहो त्रैलोक नायक को धरे ।
ले साथ में आकाश गंगा धार झरझर झरझरे ।
औ अनंता अलवार के पावन सरोवर हैं जहॉ ।
है मुक्ति की ईच्छा जिसे वैकुंठ में रहते तहां ।
भाष्यकार स्वयं जिन्हें बन ससुर गुरू सेवा किये ।
सब दास को शिक्षा दिये अरू आप पावन यश लिये ।
हैं धन्य नर जो देखते पल स्वप्न में उस ठाम को ।
सो देव हैं नर नर नहीं हैं नरन में भगवान को ।
भव भीति का न डर कभी जो मन बसे हरि गीतिका ।
आशा बड़ी युग चरण की है  है कृपा परिपालिका ।
है प्रणतपाल कृपालु हरि के चरण धर जीवन लहो ।
सो दीन बंधु कृपालुता बश द्रवित होंगे ही अहो ।

2. श्रीनिवास भगवान की उदारता

श्रीनिवास भगवान  हमहि अपने अपनाये जी।
ग्रथन में यह  मिलत सबन में ..
नरतन सुर दुर्लभ भारत में
देकर के भगवान हमहि
वैष्णव बनवाये जी।। श्रीनिवास भगवान  ……
पञ्चरात्र से शास्त्र मनोहर
गीता के ज्ञान अति सुन्दर
ऐसे वचन  सुनाय सुगम
मारग बतलाये जी ।। श्रीनिवास भगवान ……
भाष्यकार के चरण लगाकर
भगवत जन के सुहृद बनाकर
इनकर सेवा देकर सुलभ
उपाय बताये जी ।। श्रीनिवास भगवान………
दीन हीन लख कृपा किये प्रभु
आरत हर गुण प्रकट किये हरि
युगल चरण अति सुन्दर
सिद्ध उपाय बताये जी ।। श्रीनिवास भगवान……

3.  श्रीनिवास भगवान के अर्चा रूप का उद्देश्य

श्रीनिवास आश्रित हित अपना अर्चा रूप बनाते हैं।
द्रवित हृदय से आये गिरि पर  वेङ्कटनाथ कहाते हैं।
व्रात जनों के रक्षण हित रक्षा कङ्कण  बन्धवाते हैं।
शरणागत पर प्रेममयी शीतल अ‍ँखिया दिखलाते हैं।
दक्षिण  कर से सब प्रकार युग चरण उपाय बताते हैं।
त्यों वामे करसे भव के लघु तरतर भाव बताते  हैं।
अन्य  हाथ में शङ्ख सुदर्शन धर ऊँचे दिखलाते हैं।
डरो नहीं तुम डरो नहीं तुम डरो नहीं हम  आते हैं।
मैं हूँ अखिल लोक के नायक मुकुट पहन बतलाते हैं।
देखो वेद पुराण  सूत्र गण मेरे ही गुण  गाते हैं।

4. वेङ्कटेश भगवान  का स्वरूप वर्णन


वेङ्कट  गिरि पर स्वामी वैकुण्ठ से ही आये।
श्री श्रीनिवास  जन को यह भाव हैं बताये।।
है हस्त कमल सुन्दर दक्षिण अधो अपाने।
करके उपाय सर्वोपरि चरण को दिखाये।।
है शङ्ख चक्र धर के प्रतिद्वन्द को हटाते।
तैसे ही वाम करसे भव नाप को बताते।।
जो दिव्य मुकुट माथे त्रैलोक्य नाथ नाते।
है  दास  को  यहॉ से वैकुण्ठ को ले जाते।।
यह गिरि समान गिरिवर ब्रह्माण्ड में न पाते।
इनके समान जनहित तिहु लोक में न आते।।
वह दीन वचन सुनकर हरि दूर से ही धाते।
भगवान कृपा करके हर रूप भी दिखाते।।

5. श्रीवेङ्कटेश भगवान एवं आळवार संत

वेङ्कट गिरिपर भगवान जी.. आये अधम उधारन।
भू योगीश्वर महत भट्टवर.. भक्तिसार अगवान जी।।आये
कुलशेखर श्रीयोगी वाहन.. भक्तचरण रजमान  जी ।आये
जामातृ परकाल वीरवर.. जिनसे लुटाये भगवान जी। आये
भाष्यकर यामुन  मुनि योगी.. राममिश्र परधान  जी। आये
स्वामी पुण्डरीक लोचन वर.. कृपा किये जनजान जी।आये
नाथमुनिहुँ शठकोप मुनीश्वर.. विष्वकसेन परधान जी। आये
माता श्री लक्ष्मी महारानी.. दया करो जन जान जी।आये
दीनहिं के हित भूतल आये.. जानत परम सुजान जी।आये

6. वेङ्कटेश भगवान का भजन

मन श्रीनिवास भज रे।टेक।
होय परम कल्याण तुम्हारे. चरणन जाय परे।
लक्ष्मीमाता पास खड़ी हैं. तब तुम काह डरे।
युगल चरणहिं उपाय तुम्हारे. सब दुःख दूर करे।
नारायण के ध्यान धरे से. सब विधि काज सरे।
दीनन हित वैकुण्ठ छाड़ि के. वेङ्कट गिरि पधरे।

7. रङ्गनाथ भगवान की स्तुति

मोहि रङ्गनाथ अपनाये। टेक।
परम दयालु कृपा करके प्रभु .अपने शरण बुलाये।
मन्त्रराज द्वय चरम मन्त्र को. सब विधि से सुनवाये।
सुन्दर चरण उपाय बताकर. अरचि राह दिखलाये।
ऐसी कृपा दीन पर करि हरि. दुरित दूर भगाये।
मोहि रङ्गनाथ अपनाये।

8. रङ्गनाथ भगवान की स्तुति   2

कृपालो हे कृपा करके प्रभो क्यों ना  चिताते हो।
बहुत अपराध जन्मों से किया है मोह के वश हो।
तुम्हारे देखते सबहीं बहिर अन्तर निवसते हैं।
करूणाकर करूण वश हो क्षमा कर दे तु सकते हो।
यही है दीन की आशा सतत लखते ही रहते हो।
हमारा कर्म तब देखो नरक बाइस बनाना हो।
निजी गुण को लखें भगवन अपर अपवर्ग लाना हो।
बचना जो बहुत श्रम से हटा दो ही क्षमा करके।
गुणन गण में वही है जो अविज्ञाता कहाते हो।

9. रङ्गनाथ भगवान की स्तुति   3

रङ्ग रइया ये करूणा नजर से चिताय
हो के करूणाकर जी ठाने निठुरइया
रङ्ग रइया ये हमनि के कवन उपाय ।।1
वेद सब तोहि नेति नेति कहि गावै
रङ्ग रइया ये प्रभु रूप अर्चा बनाय।।2
छोड़ दिव्य लोक अरू अवधि नगरिया
रङ्ग रइया ये रहले दक्षिण दिशि जाय।।3
बाहर भीतर रह के करे रखवरिया
रङ्ग रइया ये अब जनि रहतू भुलाय ।।4
दीन हीन दास तोर तुहीं मोर स्वामी
रङ्ग रइया ये कहु पग धरन उपाय।।5

10. रङ्गनाथ भगवान की स्तुति 4

अर्चारूप बनकर अपनी सुलभता दिखाओ रङ्ग रइया।
ईक्ष्वाकु पर कृपा किये प्रभु कुल से पुजायो ।।1
कौसल्या जब पाक बनाई अपने मन खायो।।2
पुनि दो बालक देख देख डेराई स्वरूप दिखाओ।।3
रघुपति से लङ्कापति पाये दखिन दिश आयो ।।4
गङ्गा कावेरी  की  गोदी तुमहीं मन भायो।।5
राग भोग सैया सुखदाई वितान बनायो।।6
पान किये योगी वाहन को सुतन में मिलायो।।7
यह  जन वत्सलता गुण तुम्हरे सुविरद बढ़ायो।।8
दीनन पर चरणों की छाया सदाहि बचायो।।9

11. रङ्गनाथ भगवान की स्तुति 5

दया दरसाये रङ्ग रइया
रङ्गनायकी के सङ्ग आके । दया
यह जन बत्सलता गुण तुम्हरे सुअर्चा बनाये।।दया
भाष्यकार के सब जन गण को चरण में लगाये।।दया
श्रीस्वामी कुरेश के बर दे दीनहुँ अपनाये।दया
सब कल्याण गण तुमरे । न गन हूँ गनाये।दया

12. रङ्गनाथ भगवान की स्तुति 6

देखन चलिये रङ्गवर की सवारी ।।टेक
सुरतरू वाहन अधिक सुहावन तापर रङ्गनाथ पगधारी।।देखन
आगे चतुर वेद पाठक गण पाछे प्रबन्ध सुरस ध्वनि न्यारी।।देखन
आलवार आचारिन वीथिन सबकी सन्निधियों  में अधिक तैयारी।।देखन
सब भक्तन  के घरनिन विविध भॉंति नैवेद्य संवारी।।देखन
द्वार द्वार सब चौके पूरी नीराजन  लिये हाथ में थारी।।देखन
आड़ा विविध ताल से बाजत तैसीन फिरीहुँ की पिहकारी।।देखन
महामेघ डंमर दो झलकत युगल काहली की ध्वनि भारी।।देखन
प्रति वीथिन में करूणाकर हरि दर्शन देहि दीनन हितकारी।।देखन

13. रङ्गनाथ भगवान की स्तुति 7

रङ्ग न लगा श्रीरङ्ग का तुम नॉहक बना वेढंग का।
दशो दिशा में व्यर्थ ही धाया रङ्गपुरी में कबहु न आया
मिथ्या चाल कुरंग का।।तुम
कावेरी गङ्गा न नहाया वह पवित्र जल तनिक न पाया
भूला यम के दण्ड का। तुम
रङ्गनाथ पगतर न गिरा जो  चरणामृत नहि पान किया सो
लगहिं लात बजरङ्ग का । तुम
माता रङ्गनाथ को जानो  रङ्गावरहिं पिता कर मानो
वचन ये वेद वेदान्त का । तुम
त्रिगुणों के घेरा में पड़कर त्रिविध ताप ज्वाला में जलकर
जैसा हाल पतङ्ग का । तुम
श्री रङ्गेश चरण मन धर कर दीनबन्धु के नाम सुमिरकर
महिमा लहत सतसङ्ग का। तुम

14. रङ्गनाथ भगवान की स्तुति 8

रङ्गनाथ मम नाथ प्रभो अब ना तुम छोड़ो जी।
रक्षक पिता सखा भर्ता पति ज्ञाता भूति आधार रमापति
हौं शेषी गुरूदेव बहुत नाता जनि तोड़ो जी।।
भोक्ता ज्ञाता प्रेरक अन्तर कहत वेद इतिहास निरन्तर
प्रभु तुम दीन दयाल दया से मुख मत मोड़ो जी।।
स्वामी सेव्य अभद्र गुणाकर सब कारण तारण भव सागर
शुभ  गुण में अब आन निठुरता मत तुम जोड़ो जी।।

15. रङ्गनाथ भगवान की स्तुति 9

यही वर भावै रङ्गरइया।टेक
श्रीरङ्ग पुर के भीतर  हमको कुकुर्वा वनावै।
खाने को मोहि भक्तन के जूठन पत्तल ही चटावै।
प्यासे में कावेरी के पानी पीलाबैं।। यही
चतुरानन  गोपुर के आगे रेती पर सुतावैं। यही
जब प्रभु परिकरमा में आवैं पीछे से लगावैं। यही
मङ्गल गिरि पर आप विराजैं आगे में वैठावैं। यही
रङ्गनायकी रङ्गनाथ प्रभु अपना बनावै। यही
तुम स्वामी  हो अन्तर्यामी अपने अपनावैं। यही
यह तन रङ्गपुरी में छोड़ा के  चरण में लगावैं। यही
नित्य मुक्त वैष्णव गण सङ्ग में सेवन समुझावैं । यही

16. वरदराज भगवान की स्तुति 1

वरद रइया सब देले बनाय। टेक
चौरासी में भ्रमित श्रमित लख  कृपादृष्टि प्रभु करके चिताय। वरद
करूणा कर नर देह बनाय  भव से तरण कर सुलभ उपाय।वरद
अशरण शरण सुयश संभारे  हरि दोउ चरणन दिन्ह धराय।वरद
अस प्रभु मोहि दीन अपनाये तेहि कारण दीनबन्धु कहाय।वरद

17. वरद रइया मग देले दिखाय।टेक

भाष्यकर के सम्बन्धि बन तुम सोवहुँ भव भय को भगाय।वरद
नारायण के चरण शरण एक  भव से तरन कर सिद्ध उपाय।वरद
दृढ़पन करि हरि दिन्ह अभय वर  मा शुच पद प्रभु दिन्ह सुनाय।वरद
दीन जनन के तारण कारण सदा करे करि गिरि पर छाय।वरद

18. वरदराज भगवान की स्तुति 2

बना है विश्व में सबको  वरद के वरद हस्तों से ।
यही सब वेद गाते हैं  सकल मिल एकहीं स्वर से ।।
बना सुक वामदेवों को  वरद ही के बनाने से।
सुधारा बाल ध्रुव को भी वरद ने वरद हस्तों से।।
बना जैसे विभीषण को वरद के वरद हस्तों से।
अकिंचन दीन को सब दिन बनाये वरद हस्तों से।।
बने वैसे विदुर घरही  वरद के वरद हस्तों से।
बना उस गिद्ध को सबसे वरद के हस्त से जैसे।।

बनेगा दीन को वैसे वरद के वरद हस्तों से।।
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प्रतिपलं तव संस्मरणम् (हुलासगंज संस्मरण 2)


हुलासगंज में मैं 
26 जनवरी 1983 को पहुंचा था। 
मुझे याद है, उस दिन चारों ओर झण्डोत्तोलन हो रहा था। गाँव से पहले दरभंगा और फिर दरभंगा से डॉ. वेंकटेश शर्मा के साथ पटना पहुंचा। वही वेंकटेश शर्माजो मेरे बड़े भाई के मित्र और व्याकरण के दिग्गज विद्वान् हैं। उनकी शास्त्रार्श शैली अद्भुत थी। उस समय वे हुलासगंज संस्कृत महाविद्यालय के प्राचार्य पद का निर्वाह कर रहे थे। बाद में इनके साथ अनेक दुखद घटनायें जुडती चली गयी। मुझे याद हैजब मैं दरभंगा से पटना जाने वाली बस में अपने बड़े भाई महानंद झा जी के साथ जा रहा था। वेंकटेश शर्मा जी हमसे कुछ दूरी पर बस में खड़े थे। लंबे कद काठी के कारण उन्हें बस में पहचानना बिल्कुल आसान था। मैंने एक बार जोर से उनका नाम लेकर उन्हें पुकारा भी था। पटना में किसी परिचित के यहां वह पहुंचे और हम लोगों को वहीं छोड़ कर किसी काम से बाहर चले गए थे। दोपहर का समय था। उस घर का दृश्य आज भी मुझे याद है। बार-बार जोर से खांसने वाला खाट पर लेटा एक बूढ़ा व्यक्तिचारों ओर मक्खियों का अंबारकुछ छोटे- छोटे बच्चेजो अपने बर्तन में खाना खा रहे थे। बहुत गन्दा माहौल था,जिसे मैं 34 साल बाद भी नहीं भूल पाया। घंटे 2 घंटे बाद हम लोग वहां से विदा हुए और हुलासगंज आ पहुंचे। वहाँ से फतूहा, हिलसा, इस्लामपुर होते हुलासगंज तक आया था। हुलासगंज तक आने का बस ही एकमात्र साधन था। गया की ओर से आना हो या पटना की ओर से, बस ही एकमात्र सहारा है।

हुलासगंज में  हमारे दो भाई कुलानंद झा और महेश झा संस्कृत शिक्षा प्राप्त करने के लिए पहले से ही वहां रह रहे थे। हम लोगों का सामान महाविद्यालय परिसर के छात्रावास में तथा रात्रि शयन आश्रम परिसर में बने उच्च विद्यालय छात्रावास में होता था। छात्रावास मिट्टी की दीवार और घास फूस से छाए हुए छप्पर से बने थे। उस समय महेश झा के दो प्रमुख मित्र थे। घनश्याम शर्मा और मृत्युंजय शर्मा घनश्याम शर्मा मोटे हृष्ट पुष्ट थे और मृत्युंजय बिल्कुल दुबले और मंद आवाज वाले। मृत्युंजय आज भी हुलासगंज से जुड़े हैंजबकि घनश्याम के बारे में कोई खास जानकारी नहीं मिल पा रही है। अस्तु

उस समय स्वामी जी रमाना पर गए हुए थे। संतों के बाहर जाने को रमाना कहा जाता है। एक गांव से दूसरे गांव, दूसरे गांव से तीसरी गांव अहर्निश घूमते रहना। घूमते रहना। रमण करते रहनासंतों का स्वभाव होता है। स्वामी जी से काफी दिनों तक  मेरी मुलाकात  नहीं हो पाई। एक दिन पता चला कि स्वामी जी आज हुलासगंज आने वाले हैं । मुख्य द्वार के बाहर सभी छात्र उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। मैं भी पंक्तिबद्ध हो खडा हो गया। स्वामी जी घोड़े से पधारे। सभी छात्रों के साथ मैंने उन्हें साष्टांग प्रणाम किया। मुझे नहीं याद है कि स्वामी जी के साथ मेरी बातचीत कब हुई। समय बीतता चला गया। वहाँ के छात्र श्वेत कटिवस्त्र तथा कौपीन पहनते थे। मुझे याद नहीं मुझे सर्वप्रथम कब और किसने अंगवस्त्र के लिए कटिवस्त्र दिया। कभी-कभी स्वामी जी छात्रों को कटिवस्त्र बांटा करते थे। एक धोती को बीच से फाड़कर एक कटिवस्त्र बनता था। 12 से 15 वर्ष के आयु के बच्चों के लिए यह वस्त्र पर्याप्त होता था। महेश को अच्छा कटिवस्त्र मिल जाया करता था। स्वामी जी उसे अधिक स्नेह करते थे। बच्चे कटिवस्त्र के नीचे हाफ पैंट पहने रहते थे। कक्षा में हमलोग धोती पहनते थे। इस प्रकार वहां के पोशाक में अधोवस्त्र के लिए कटिवस्त्र तथा ऊपर के शरीर को ढ़कने के लिए शर्ट या अन्य कोई वस्त्र पहना जा सकता था। 
हम नियत दिनचर्या का पालन करते हुए धीरे-धीरे उस व्यवस्था में घुल मिल गये। मेरा नामांकन श्री स्वामी परांकुशाचार्य संस्कृतोच्च विद्यालय के प्रथमा प्रथम वर्ष कक्षा  में हो गया। कक्षा 7-8 को प्रथमा कहा जाता है। इस विद्यालय में उस समय प्रधानाध्यापक श्री नन्द कुमार शर्मा सहित पाँच अन्य अध्यापक थे। भागलपुर निवासी श्री शिवनन्दन शर्मा साहित्य के अध्यापक थे  । वे हमें रघुवंशमहाकाव्यम् तथा अमरकोश पढ़ाते थे। उन्होंने ही श्लोकों का शुद्ध उच्चारण करना सिखाया। उचैली, गया निवासी श्री नरेश शर्मा हितोपदेश पढ़ाते थे।  श्री नन्द कुमार शर्मा ज्योतिष की पुस्तक शिशुबोध तथा आयुर्वेद की पुस्तक स्वस्थेतिवृत्तम् पढ़ाते थे। मोकर, पटना निवासी श्री अनिल शर्मा लघुसिद्धान्तकौमुदी पढ़ाते थे। अध्यापन के लिए योग्य छात्र नहीं मिलने के कारण वे लघुसिद्धान्तकौमुदी के अजन्तपुल्लिँगप्रकरण तक ही पढ़ाने में सक्षम थे। जब हमलोग इसे आगे पढ़ने के लिए तैयार हो गये तब वे मेरे बड़े भैया श्री विमलेश झा विमल से हलन्तपुँल्लिङ्ग प्रकरण पढ़ना आरम्भ किये। रुस्तमपुर, जहानाबाद निवासी श्री राम ध्यान सिंह इतिहास, भूगोल, सामाजिक अध्ययन विषय पढ़ाते थे। जिस दिन इन्हें पढ़ाने की इच्छा नहीं होती होती थी, उस दिन नदी किनारे शहर बसने के कारण पर निबंध लिखने को बोल देते थे। रुस्तमपुर हुलासगंज से 6 किलोमीटर दूर गांव है। ये प्रतिदिन पैदल वहाँ से आते जाते थे। सर्दी के मौसम में छात्रों के पैसे से मूली खाने का इन्हें शौक था। इनके पास पैसे की तंगी हमेशा बनी रहती थी। छात्रों से उधारी भी लिया करते थे। झुनाठी, पटना निवासी श्री वीरेन्द्र शर्मा गणित तथा अंग्रेजी पढ़ाते थे। प्रथमा कक्षा में रहते आप अंग्रेजी के शब्दों की स्पेलिंग तथा उसका हिन्दी अर्थ याद कराते रहे। ये काफी गुस्सा करते थे। पाठ याद नहीं करने अथवा किसी प्रकार की गलती के लिए इनका डंडा (सपाका) तैयार रहता था। दो चार छात्र इनके डंडे की व्यवस्था में प्रतिदिन नियुक्त होता था। श्री शिवकुमार शर्मा संस्कृत उच्च विद्यालय में आधुनिक विषय के अध्यापक थे। उन्होंने बहुत श्रम पूर्वक ट्रांसलेशन सिखाया। मध्यमा (कक्षा 9-10) कक्षा में उन्होंने अर्थशास्त्र पढ़ाया था। आज भी उसके कतिपय सिद्धान्त याद हैं। उनके इतना समर्पित अध्यापक विरले ही होते हैं। कक्षा के भीतर और बाहर वे स्वभाव से अत्यंत ही कठोर, अनुशासनप्रिय थे । उनकी अनुमति के बिना एक भी पत्ता नहीं हिलता था। अध्यापन कार्य के अतिरिक्त ये छात्रावास की व्यवस्था, खेती बाड़ी, निर्माण कार्य, भोजन बनाने, वर्तन धोने, सब्जी काटने आदि में छात्रों की पारी लगाने आदि का काम करते थे। प्रतिदिन रात्री में दो छात्र इनका हाथ पांव दबाते थे। विद्यालय में शैक्षणिक वातावरण था। प्रतिदिन कक्षायें नियमित संचालित होती थी। प्रातः 10 बजे सामुहिक प्रार्थना होती थी। सायं काल समाहारः साम्नां श्लोक से हयग्रीव की स्तुति के बाद कक्षाओं का समापन होता था। मध्यमा कक्षा में जाने के बाद मैं शिक्षक के निर्देश पर प्रथमा के छात्रों को पढ़ा देता था।   श्री राम ध्यान सिंह को छोड़कर सभी शिक्षक आवासीय परिसर में रहते थे अतः कक्षायें सुचारु चला करती थी। प्रतिपद तथा अष्टमी तिथि को विद्यालय में अवकाश होता था। वहाँ की शिक्षा व्यवस्था सुदृढ़ थी। सप्ताहांत में प्रत्येक कक्षा के छात्र एकत्र होकर श्लोकान्त्याक्षरी प्रतियोगिता किया करते थे।  प्रत्येक कक्षा में 12 से 15 आवासीय छात्र थे। कुछ स्थानीय छात्र भी वहाँ पढ़ने आते थे। प्रतिदिन प्रातः 4 बजे जागरण की घंटी बजने के साथ सभी छात्र मंदिर प्रांगण में इकट्ठा होकर वेंकटेश सुप्रभातम् का गायन किया करते थे। इसकी ध्वनि हुलासगंज से 3 किलोमीटर दूर लाट गांव तक सुनाई पड़ती थी। हमलोग लाट गाँव जाया करते थे। यहाँ लाट नामक एक विशाल पथ्थर का स्तम्भ था, जो कि खेत में लम्बवत् पड़ा था। इसे हमलोग अपने हाथों से नापा करते थे। कहा जाता था कि इसे पहले सिरे से दूसरे सिरे तथा दूसरे सिरे से पहले सिरे तक नापने पर कभी भी समान माप नहीं मिलता। इसे रात में कोई राक्षस ले जा रहा था, प्रातः कुम्भकार द्वारा घड़ा बनाने की आवाज सुनकर इस शिलाखण्ड को वहीं छोड़ गया। हुलासगंज बराबर तथा नागार्जुनी पहाड़ी से घिरा हुआ है। इस इलाके में इस प्रकार का विशाल शिलाखण्ड मिलना आश्चर्य की बात नहीं है। जब मैं विद्यालय के प्रथम तल पर खड़े होकर दक्षिण दिशा की ओर देखता था तो वहाँ से बराबर की पहाड़ी साफ - साफ दिखती थी। राजगीर भी वहाँ से दिखाई देता था।चर्चा वेंकटेश सुप्रभातम् की कर रहा था। इसी मंदिर प्रांगण में प्रत्येक दिन रात्रीकालीन आरती में भगवान् लक्ष्मी नारायण की स्तुति करने तथा् तनयन पढ़ने के लिए सभी अध्यापक, छात्र तथा संत एकत्र होते थे। इसके बाद भोजन करने जाते थे। प्रत्येक अष्टमी तथा प्रतिपद् की रात्री को स्तोत्र पाठ करने हमलोग मंदिर में एकत्र होते थे। इन स्तोत्रों में आलवन्दार स्तोत्र मुख्य था। स्तोत्र पाठ का फल यह हुआ कि मैं संस्कृत छन्दों को आसानी से समझने लगा। श्लोकों की यति को समझना मेरे लिए आसान हो गया।
छात्रों में ऐसे शिक्षकों के लिए उपनाम रखने की परंपरा रही है। हम लोग भी अपने अध्यापकों के उपनाम रख लिए थे, जो आपसी बातचीत में प्रयोग किए जाते थे। श्री शिवकुमार शर्मा की दाँतें बाहर की ओर निकली हुई थी। हम लोगों ने उनका नाम बसुला रखा। श्री नरेश शर्मा के हाथ टेढ़े थे। वे कहा करते थे कि हाथों में गोली लगने के कारण ऐसा हो गया। उनकी अनेक मधुर स्मृतियां आज भी याद है। अध्यापकों की योग्यता, कक्षाध्यापन की शैली आदि पर आगे यथासमय लिखता रहूँगा। श्री शिवकुमार शर्मा जी ने मेरी प्रातः कालीन ड्यूटी में मुख्य द्वार से घुड़साल तक की सड़क और उस भूभाग पर प्रातः प्रातः झाड़ू लगाने का काम आबंटित किया। महेश झा उच्च विद्यालय परिसर के ठीक सामने के रास्ते पर झाड़ू लगाते थे। मुझे याद है कि वह नारियल का झाड़ू नहीं था। झाडू का आकार छोटा होने के कारण काफी झुककर सफाई करनी पड़ती थी। झाडू लगाते अंग्रेजी के अध्यापक का चेहरा सामने आ जाता था। मन में हमेशा भय बना रहता था कि कहीं ये कान पकड़कर विद्यालय के प्रथम तल से नीचे न फेंक दे। जब वे गुस्सा होते थे तब दाँत भींचकर कान में नाखून दबा देते थे। 
हुलासगंज प्राकृतिक वैभव से परिपूर्ण था। मंदिर परिसर के पार्श्वभाग, महाविद्यालय परिसर में कास उगे हुए थे। उस समय उच्च विद्यालय मंदिर परिसर में ही था। उसके पीछे कुछ आम के पेड़ थे।  यहां के एक संत, जिनका नाम कमलनयन शर्मा था वानिकी का काम देखा करते थे। यही गोपालन भी करते थे। उस समय कहा जाता था कि इन्हें हनुमान की सिद्धि प्राप्त है। संत कमलनयन शर्मा की यथाप्रसंग विस्तृत चर्चा करूंगा। अभी बस इतना ही कि उन्होंने आश्रम से संबन्धित सम्पूर्ण भूभाग को वनाच्छादित कर रखा था। यहां काजू ,अमरुद, आम, नीबू, नारियल आदि के बागान थे। मैं जिस क्षेत्रफल पर झाड़ू लगाता था, वहां काजू के दो अमरुद के वृक्ष थे। उसी के बीच में एक हैंडपंप लगा था, जिस पर छात्र  भोजन करने के बाद अपनी थाली की सफाई, स्नान, कपडों की धुलाई आदि किया करते थे। उस समय तक हुलासगंज में शौचालय का निर्माण नहीं हुआ था। हम लोग शौच के लिए आश्रम परिसर से काफी दूर खुले में जाया करते थे। जिन बर्तनों में भोजन बनाया जाता था, उसकी सफाई बडे छात्र तथा छोटे छात्र सब्जी काटने से लेकर हर छोटा बडा काम किया करता था। हमारी दिनचर्या अत्यंत ही नियमित और अनुशासनबद्ध थी। 

प्रातः 4:00 बजे उठकर मंदिर जाकर वेंकटेश सुप्रभातम्  का सामूहिक पाठ करना। पाठ याद करने के लिए बैठ जाया करते थे। सुबह छात्रों को जगाने का काम छात्रावास के छात्रावास अधीक्षक श्री शिवकुमार शर्मा जी कराते थे। शिवकुमार शर्मा जी का कठोर अनुशासन था। प्रातः 4:00 बजे से लेकर रात्रि 9:00 बजे तक जब तक कि छात्र सो नहीं जाएहर एक पर उनकी पैनी दृष्टि होती थी। प्रातः कालीन नित्यक्रिया कर घर से लाये जलपान को करना और दैनिक आवृत्ति के लिए बैठ जाना। उच्च विद्यालय परिसर में समय-समय पर घंटी बजाई जाती थी। प्रत्येक घंटी का समय के साथ अलग अलग तात्पर्य होता था। यदि 4:00 बजे की घंटी है तो यह जागरण के लिए होती थी। 9:00 बजे की घंटी प्रातःकालीन भोजन करने के लिए10:00 बजे की घंटी स्कूल जाने के लिए, स्कूल के प्रत्येक कालांश के लिए घंटी बजती रहती थी। अध्यापक बदलते रहते थे और अंतिम घंटी 4:00 बजे की बजती थी। तब हम सायंकालीन विद्यालयीय प्रार्थना कर अपने छात्रावास परिसर को चले जाते थे। 4:30 पुनः घंटी बजती थी अमनिया करने के लिए। चावल की साफ सफाई को अमनिया कहा जाता था। यहाँ के भण्डार गृह में भूसा युक्त चावल रखा था। प्रतिदिन दो छात्र भूसे से चावल अलग करते उच्च विद्यालय के प्रथम तल पर लम्बवत् फैलता था, ताकि छात्र इसकी दोनों तरफ बैठकर अमनिया कर सकें। यह प्रक्रिया प्रतिदिन की थी। कभी कभी गेहूँ की भी अमनिया की जाती थी। सर्दियों के रात के भोजन में रोटी का प्रबन्ध होता था। रोटी बनाने के लिए भी बारी- बारी से छात्रों को लगाया जाता था। अपनी दैनिक आवश्यकताओं के लिए कार्य करने का हमलोग अभ्यस्त हो चुके थे। समय और दिनचर्या का साहचर्य घंटी के साथ हो चुका था। हम इसके अभिन्न अंग बन चुके थे। 
एक दिन की घटना है । हम चारों भाई (महेश, कुलानन्द,महानन्द और मैं) महाविद्यालय के छात्रावास में सोए हुए थे, तभी आश्रम में स्थित उच्च विद्यालय के छात्रावास की ओर से जोर जोर से आवाज आ रही थी, आग लग गई है। महाविद्यालय के छात्रों के साथ हमलोग उस दिशा की ओर दौड़ पडे। वहां पहुंच कर देखा, स्थिति अत्यंत ही भयावह थी।  उच्च विद्यालय के छात्रावास में कुल 3 कक्ष थे। इसके साथ ही भोजनालय भी लगा हुआ था। मिट्टी की दीवारें और घास फूस से निर्मित छप्पर वाले इस छात्रावास में आग इतनी तेजी से फैली कि किसी को संभलने का मौका ही नहीं दिया। उच्च विद्यालय के छात्रावास से आग की ऊँची लपटें निकल रही थी। कक्षा 6 से 8 तक के छात्र बदहवास इधर उधर भाग रहे थे। कोई अपनी जली किताबें, बर्तन आदि को देखकर रो रहा था तो कोई भयावह मंजर को देखकर भयभीत था। सभी छात्रों के कपड़े, रजाई सब कुछ जल चुके थे। उच्च विद्यालय के अध्यापक श्री शिवकुमार शर्मा जी की तत्परता से कोई हताहत नहीं हुआ। सभी सुरक्षित बाहर निकल चुके थे। आग किसने लगायी या कैसे लगी इसपर कयास ही लगते रहे। कोई कहता कि छात्रावास के पार्श्वभाग से किसी ने आल लगायी तो किसी का तर्क था कि बिजली के शार्टशर्किट से आग लगी। अंततः आग लगने के कारण को खोजा नहीं जा सका। अंततः निर्णय हुआ कि इस मिट्टी और घास से निर्मित छात्रावास को पक्के भवन में बदला जाय। मुझे अभी भी याद है कि मेरे सहपाठी उचौली निवासी अवधेश शर्मा की लघुसिद्धान्तकौमुदी आधी जल गयी थी। कुछ दिनों तक छोटे बच्चों का छात्रावास उच्च विद्यालय का बरामदा बना रहा। महाविद्यालय का दो कक्षों का छात्रावास भी फूस से निर्मित था। भय के कारण महाविद्यालय के छात्र भी घास से निर्मित छात्रावास को छोडकर महाविद्यालय के पक्के कक्ष में रहने आ गये। उस समय तक महाविद्यालय में कुल 4 कमरे बने हुए थे। उनमें से एक कक्ष में महाविद्यालय के अध्यापक डॉ. वेङ्कटेश शर्मा, श्री विमलेश झा तथा श्री रामचन्द्र मिश्र रहते थे। शेष कक्ष या बरामदे में पढ़ाई होती थी। जल्द ही हम आग लगने की घटना को घटना को भूल गये। हम पूर्ववत् अपनी दिनचर्या में लग गये।
हुलासगंज में रहनेवाले अधिकांश छात्र गया, जहानाबाद, औरंगाबाद तथा पटना के निवासी थे। उच्च विद्यालय के अध्यापक श्री शिवनन्दन शर्मा के कारण कुछ भागलपुर के छात्र भी वहाँ रहकर अध्ययन करते थे। इक्के दुक्के छात्र नबादा तथा नालन्दा जनपद के थे। 1985 तक गया जिले के अन्तर्गत ही जहानाबाद तथा अरवल जिला आता था। अगस्त 1986 में गया से अलग होकर जहानाबाद जिला बना तथा अगस्त 2001 में जहानाबाद से अलग होकर अरवल जिला बना। इन जनपदों के विभिन्न गांवों से आकर पढ़ने वाले छात्रों के साथ रहते हुए दक्षिण बिहार का भूगोल, रहन सहन आदि से मैं भलीभाँति परिचित हो गया था। कक्षा 6 से वहाँ रहने के कारण मगही बोली ठीक उसी प्रकार बोलना सीख गया था जैसा कि उस क्षेत्र के स्थानीय छात्र बोला करते थे। कभी -कभी मेरे मगही उच्चारण में भी मैथिली भाषा का टोन पहचान लिया जाता था। 
आश्रम में बहुतायत में फलदार वृक्ष लगे थे। इसका कतिपय संस्मरण आज भी याद है। अल्पावधि की छुट्टियों में यहाँ के आसपास के जनपदों के छात्र अपने घर चले जाते थे। दूरस्थ जनपद का रहने के कारण मैं दीपावली, होली, नवरात्र आदि के अवकाश में घर नहीं जा पाता था। जाड़े में बेर फलता है। मंदिर परिसर के पीछे बेर का पेड़ था। बाल स्वभाव के कारण हमलोग संत कमलनयन दास से छिपकर बेर तोड़ लेते थे। एक दिन संत कमलनयन दास कहीं से घूमते बेर के पास पहुँचे तथा उसकी तना झुका देखकर समझ गये कि हमलोगों में से किसी ने बेर तोड़ा है। गुस्से में आकर संत कमलनयन ने उस पेड़ को काट डाला। वे यहीं नहीं रूके। स्वामी जी के सम्मुख ही हमलोगों से मगही में कहा कि जाओ अब पेड़ और झुक गया है। अब बेर तोड़ने में असुविधा नहीं होगी। वे परम दयालु संत भी थे। उनके लगाये नींबू के पेड़ से नींबू तोड़कर हमलोगों के बीच बांटा जाता था। उसे हमलोग अचार बनाते थे। काजू के सरस फूल को चूसना उन्होंने ही सिखाया। ग्रीष्मवकाश में हमें खट्टे मीठे आम मिल जाते थे। श्राद्ध में ब्राह्मण भोजन 
गांव से शिर पर धान की बोरी लाना
माध्यमिक विद्यालय के छात्रावास के लिए तार का पेड़ काटा जाना
महाविद्यालय परिसर पर वृक्षारोपण तथा कटीले तार से घेराबन्दी

महाविद्यालय परिसर में सब्जी की खेती





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