संस्कृत - साहित्य, काव्यशास्त्र एवं छन्द परिचय (2019 के अनुसार )

डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर जीवनी
जन्म, माता - पिता -
डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर का जन्म आषाढ़ कृष्ण नवमी संवत् 1976 तदनुसार 31 जुलाई 1918 को महाराष्ट्र के नागपुर में हुआ था। इनके पितामह का नाम श्री वामन गोपाल वर्णेकर, पिता का नाम श्री भास्कर राव वर्णेकर तथा माता का नाम अन्नपूर्णा बाई वर्णेकर था। इनके पिता भवन निर्माण के ठेकेदार थे। ये महाराष्ट्र के सतारा जिले के वर्णे नामक गाँव के मूल निवासी थे, जहाँ से बीसवीं शताब्दी में नागपुर में आकर रहने लगे।
पारिवारिक सदस्य - 
    श्रीधर भास्कर वर्णेकर के पांच भाई तथा एक बहन वत्सला हुए। वर्णेकर जी के 3 पुत्र तथा दो पुत्रियां हैं।  पुत्र चंद्रगुप्त वर्णेकर का जन्म 1947 ईस्वी में हुआ । श्री चंद्रगुप्त वर्णेकर इलेक्ट्रॉनिकक्स से एम. ई. करने के पश्चात् पीएचडी की उपाधि ग्रहण की। अमेरिका में 2 वर्ष तक प्रोफेसर रहने के पश्चात् वर्तमान में वे गोदिया के इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रोफेसर हैं । ये संस्कृत में विशेष अभिरुचि के कारण संस्कृत का उत्तम अध्ययन, वैदिक गणित का अध्यापन तथा सांस्कृतिक कार्यों में अग्रसर रहते हैं।
बाल्यावस्था एवं शिक्षा -
डॉ. श्रीधर भास्कर वर्णेकर बचपन से ही अत्यधिक प्रतिभा संपन्न थे। इसी प्रतिभा के परिणामस्वरूप उन्होंने 13 वर्ष की अल्पायु में रघुवंश महाकाव्य के अनेक शब्द कंठस्थ कर लिए थे। वर्णेकर जी जब इतवारी मोहल्ले में रहते थे, तब उनके पड़ोस में काशी के वेदांताचार्य श्री हनुमन्त शास्त्री केवले रहने के लिए आए। हनुमान शास्त्री बधिर होने के कारण कहीं बाहर न जा कर घर पर ही रहते थे। वह व्याकरणाचार्य थे। सन् 1931 के आसपास सभी जगह महात्मा गांधी के आंदोलन की धूम मची थी। स्कूल कॉलेज बंद थे। ऐसे समय में वर्णेकर जी अपने पिताजी के कहने पर बड़े भाई श्री प्रभाकर जी के साथ शास्त्री जी के यहां संस्कृत सीखने जाने लगे। श्री हनुमन्त शास्त्री केवले से पारम्परिक पद्धति से अमरकोश तथा लघु सिद्धांत कौमुदी का अध्ययन किया। इस प्रकार प्राचीन शिक्षण पद्धति से ही संस्कृत शिक्षण का आरंभ हुआ। शास्त्री जी ने कुछ भी लिखने पर प्रतिबंध लगा रखा था। केवल सुनकर ही सब कुछ याद रखना होता था। इतना अध्ययन होने के पश्चात् वर्णेकर जी ने बंगाल संस्कृत एशोसियेशन संस्था द्वारा संचालित व्याकरण प्रथम की परीक्षा उत्तीर्ण किया। आपके गुरु व्याकरण तथा वेदान्त के अध्यापन में ही लगे रहते थे। काव्य शिक्षण के प्रति वे उदासीन रहते थे। अतः संस्कृत काव्य के अध्ययन के लिए उन्होंने मुझे  नागपुर संस्कृत कॉलेज में अध्ययन के लिए भेजा। वहां श्री सावलापुरकर एवं श्री वराड पांडे शिक्षक थे। नागपुर संस्कृत कॉलेज में रघुवंशमहाकाव्यम् तथा कुमार संभवम् से प्रथम बार परिचय हुआ। बचपन से ही सुभाषित पद्यों को याद करने की इनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति था अतः रघुवंशमहाकाव्यम् तथा कुमार संभवम् की मधुरता से मोहित होकर स्वेच्छा से वह इसके कतिपय सर्ग कंठस्थ कर लिया। कालिदास के श्लोक गायन के अवसर पर उस प्रकार की पद्य रचना करने की प्रेरणा का उदय होने लगा। उन दिनों वर्णेकर ने मराठी भाषा में लिखित समर्थ रामदास के चरित ग्रन्थ का अध्ययन किया। प्रतिदिन स्नान के बाद समर्थ रामदास द्वारा लिखित दासबोध का पाठ अप्रतिम श्रद्धा से साथ करते थे। इस प्रकार राम दास के प्रति श्रद्धा से वशीभूत होकर अनायास ही रामदास की स्तुति परक मालिनी वृत्त में संस्कृत श्लोक लिखकर अपने कवि जीवन का श्रीगणेश किया। इस प्रकार सप्तम कक्षा में के छात्र डॉ. वर्णेकर की कविता का आरम्भ श्री समर्थ रामदास की स्तुति से हुआ।
डॉ. वर्णेकर जी सन् 1927 ईस्वी में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ प्रथम परिचय हुआ। संघ के व्याख्यान में  शिवाजी के चरित के विषय मे अनेक ऐतिहासिक कथाओं का श्रवण कर शिवाजी के प्रति असीम श्रद्धा हो गयी। संघ के कार्य में अण्णा  सोहनी नामक तरुण कार्यकर्ता नागपुर में थे। उनसे डॉ. वर्णेकर का परिचय हुआ। वे ऐतिहासिक कथा सुनाने में प्रवीण थे। उन्होंने शिवाजी के चरित से जुड़े अनेक प्रकार के वीर और अद्भुत कथा सुनाया करते थे। नागपुर में ही दादा शास्त्री कायरकर नामक कीर्तन कला में निपुण व प्रख्यात थे। वे अपने कीर्तन में महाराष्ट्र के इतिहासिक कथाओं को अत्यन्त रोचकता के साथ वर्णन करते थे। उनसे भी इन्होंने शिवाजी के बारे में बार- बार सुना। 1930 ईस्वी में शिवाजी के 300 वें जन्मोत्सव के अवसर पर आनन्द पत्रिका में शिवाजी पर सचित्र विशेषांक प्रकाशित हुए। उसे इन्होंने अनेक बार पढ़ा। इस प्रकार शिवाजी से सम्बद्ध अनेक प्रेरक प्रसंगों ने इन्हें प्रभावित किया।
1936 से 1938 तक धनाभाव के कारण उच्च अध्ययन के लिए  नागपुर के एक अंध विद्यालय में शिक्षक की नौकरी स्वीकार कर ली। विद्यालय के रूग्न में विद्यार्थियों के लिए पैदल चलकर ही औषधि लेने जाते थे। उन दिनों रामकृष्ण आश्रम में एक डॉ. होम्योपैथी का धर्मार्थ चिकित्सालय चलाते थे। वहां पंक्ति में नंबर आने तक दो-तीन घंटे तक प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। पंक्ति में बैठे बैठे-बैठे रामकृष्ण परमहंस की समस्त पुस्तकों का अध्ययन कर लिया।   इस कारण उनकी परिचर्या आदि में सेवा आदि में अधिक समय लग जाने के कारण संस्कृत का अध्ययन लगभग स्थगित हो गया। 1938 में नागपुर विश्वविदद्यालय से मैट्रिक की परीक्षा किसी प्रकार उत्तीर्ण किया।
1938 ईस्वी में इंटर की परीक्षा देनी थी। डॉ. वर्णेकर  उस समय धंतोली के डांगे के घर पर कुछ विद्यार्थियों के साथ रहते थे। इंटर की परीक्षा के प्रपत्र का शुल्क रु.35 था, परंतु अंतिम समय तक रु.30 रूपये की व्यवस्था हो पाई शेष रु.5 चचेरे भाई ने दिए। वर्णेकर जी ने कृतज्ञता पूर्वक यह कहते हैं कि यदि वे 5 रुपए नहीं मिले होते तो जीवन के 2 वर्ष व्यर्थ ही चले जाते। इसी वर्ष इन्होंने मदोर्मिमाला तथा शिवराजस्तवन पुस्तक लिखी। आगे की शिक्षा में गो. नी. दांडेकर की माता जी एवं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के भी भिशीकर जी आदि ने पर्याप्त सहायता की ।
डॉ. वर्णेकर जी 14 वर्ष की अल्पायु मैं निर्दोष काव्य रचना करने लगे थे, किंतु ध्यान आकर्षित करने योग्य उनकी प्रथम काव्य रचना मंगलाष्टक थी जिस की प्रशंसा महामहोपाध्याय मिरासी जैसे महान संस्कृतज्ञ ने भी की है। श्री राम बहादुर बाड़ेगांवकर ने इस मंगलाष्टक में 21 व्याकरण की त्रुटियों के होने का दावा किया, उनमें एक स्थान पर स्तुन्वन्ति के स्थान पर स्तुवन्ति का सुझाव दिया। डॉ. वर्णेकर जी ने तुरंत एवं यं ब्रह्मावरुनेन्द्ररूद्र यह पंक्ति सुना कर यह किस प्रकार शुद्ध है यह दिखा दिया तथा अन्य कई शब्दों की संगति इसी प्रकार सूत्रों से सिद्ध की। श्री इस पर वाडेकरगांवकर जी अत्यंत प्रसन्न हुए और वर्णेकर जी की शिक्षा का दायित्व स्वयं स्वीकार किया। उसके पश्चात बनर्जी वाडेगांवकर जी के यहां प्रत्येक अपराह्न सिद्धांत कौमुदी सीखने जाने लगे।
इसी समय कर्नल कुकडे वर्णेकर जी को समाचार पत्र व पुस्तकें पढ़ कर सुनाने के लिए 10 रूपये मासिक देते थे। इसी से 1 वर्णेकर जी का 1941 ईस्वी में संस्कृत विषय में एम.तक का शिक्षण संभव हो सका। इसी समय अवधि में वर्णेकर जी को कमल ताई की संस्कृत विषय की ट्यूशन भी प्राप्त हो गई। बाद में कमल ताई की शादी वर्णेकर के साथ हुई। इसके बाद वर्णेकर नागपुर के ही धनवटे नेशनल कॉलेज में प्राध्यापक हो गए। 1965 ईस्वी में उन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय से अर्वाचीन संस्कृत साहित्य का इतिहास पर डी. लिट की उपाधि प्राप्त की। इसकी रोचक कथा है। संक्षेप में यह उपाधि तृतीय परीक्षक के नियुक्ति पर मिली। इन्होंने नागपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग में नियुक्त होकर विभागाध्यक्ष बने। इनकी संगीत में अभिरुचि बहुत पूर्व से थी, परंतु वह संगीत को विधिवत् सीख नहीं पाए थे। स्वयं शिक्षक होने के कारण विद्यार्थियों के मध्य सीखना संभव नहीं था। वह बाहर से संगीत ध्वनि सुनकर समाधान मान लिया करते थे। जब चतुर संगीत विद्यालय स्थापित हुआ है तब उसमें नित्य जाया करते थे। लगभग 1 माह तक विद्यालय में गए परंतु संगीत विद्यालय अधिक दूरी पर स्थित होने के कारण व शिक्षण छूट गया ।
1976 के आसपास कन्याकुमारी में स्वामी विवेकानंद केंद्र की स्थापना हुई। तब वर्णेकर जी को एक माह तक संस्कृत में व्याख्यान देने के लिए आमंत्रित किया गया। 1 दिन वहां मद्रास के गुरुग दास नामक गायक वहां आए वर्णेकर जी ने उनका भजन सुना। उस संगीत की मोहिनी इनके अंतःकरण पर इतनी थी कि वह रात्रि सो नहीं सके। अगले दिन प्रातः काल समुद्र के किनारे घूमने जाने पर उन्हें नागपुर के भैयाजी बझलवार मिले। वे स्कूल के बच्चों को धुमाने लाए थे। वहीं वर्णेकर ने उन्हें प्रणाम कर कहा भैया जी आप मेरे गुरु और मैं आपका शिष्य हुआ । नागपुर में आप मुझे संगीत सिखाएंगे। नागपुर वापस आने पर उन्होंने संगीत की ट्यूशन की। उस समय वर्णेकर जी नाट्य गीत, कीर्तन आदि गाते थे। फिर भी संगीत के सात सुरों का भेद समझ नहीं आया था। 58 वर्ष की आयु में सीखना प्रारंभ किया। विलंब से ही परंतु हारमोनियम और तानपुरा लेकर संगीत सीखने लगे। इस प्रकार उन्होंने जीवन का एक और दृढ़ निश्चय पूरा किया।
आपने  1950 में संस्कृत भाषा प्रचारिणी सभा से साप्ताहिक संस्कृतम् भवितव्यम् संस्कृत पत्रिका का आरम्भ किया था। इसके आप प्रथम सम्पादक थे। यह पत्रिका आज भी निरंतर प्रकाशित हो रही है। इसी प्रकार राष्ट्र शक्ति मराठी साप्ताहिक तथा योग प्रकाश मराठी मासिक के सम्पादक रहे।
नागपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभागाध्यक्ष पद से डॉ. वर्णेकर जी ने 1979 ईस्वी में अवकाश ग्रहण कर लिया। आपने अन्य संस्थाओं के विभिन्न पदों  को तथा पुरस्कारों को भी गौरवान्वित किया, जिसकी सूची साथ में दी गयी है। चैत्र शुक्ल सप्तमी विक्रम संवत् 2057 सोमवार दिनांक 10 अप्रैल 2000 ईस्वी को  नागपुर में वर्णेकर जी का निधन हो गया । विगत वर्ष आपकी जन्म शती मनायी गयी। इस अवसर पर आपका अभिनन्दन ग्रन्थ श्रीधरीयम् का विमोचन भी हुआ। प्रज्ञा भारतीयम् सत्यानंदम् में आपकी जीवनी स्फुट रूप से प्रकाशित हुई।
कृतित्व
डॉ. वर्णेकर की कृतियां इस प्रकार हैं-
शिवराज्योदयम् महाकाव्यम् - 68 सर्गों में लिखित तथा 1972 में प्रकाशित इस महाकाव्य में 4 हजार श्लोक हैं।
मदोर्मिमाला -   स्फुटकाव्य चतुःशती
मन्दस्मितम् मदोर्मिमाला उत्तरार्ध
 शतक काव्य
स्वातंत्र्यवीरशतकम् (विनायकवैजयन्ती)
जवाहरतरंगिणी (भारतरत्नशतकम्) 
वात्सल्यरसायनम् (श्रीकृष्णबाललीलाशतकम्) - यह 8 अंकी गीति नाट्य है। कृष्ण की बाल लीलाओं का दार्शनिक विवेचन किया गया है।
श्रीरामकृष्णपरमहंसीयम् (युगदेवताशतकम्)
मातृभूलहरी
सत्यशतकम्
रागकाव्य
तीर्थभारतम् - गीति काव्य ।
श्रीरामसंगीतिका - यह गीति नाट्य है। राम के चरित्र को गीतों की 12 विधियों के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
श्रीकृष्णसंगीतिका
विविध गीताएं
श्रमगीता - गाँधी जी से प्रेरित होकर 118 पद्यों में श्रम की महत्ता को वर्णित किया।
संघगीता - इसमें संघ की महत्ता का वर्णन किया है।
ग्रामगीतामृतम् - इसमें 41 अध्याय है, जिसमें ग्राम कुटुम्ब, भू वैकुण्ठ, आदर्श जनतंत्र शासन और शोषण रहित समाज का वर्णन किया गया है। 
प्रशस्ति एवं स्तोत्र काव्य
कालिदासरहस्यम् -
अध्यात्मशिवायनम्
प्रार्थनास्तोत्रम्
श्रीगजाननप्रार्थनास्तोत्रम्
दृश्य काव्य
विवेकान्दविजयम् (महानाटकम्)
शिवराज्याभिषेकम्
सम्पादन
संस्कृत वाङ्मय कोश - 
अन्य रचनायें
महाभारतकथा- इसमें तीन भागों में महाभारत की कथा वर्णित है।
प्रश्नावली विमर्श - संस्कृत आयोग के प्रश्नावली के उत्तर के लिए निबन्ध लिखे गये।
अर्वाचीन संस्कृत साहित्य - मराठी में लिखित प्रबन्ध साहित्य।
भारतीय विद्या -     हिन्दी में लिखित प्रबन्ध साहित्य।
धारित पद एवं विशिष्ट कार्य
     1.   अध्यक्ष, भोसला वेदशास्त्र महाविद्यालय, नागपुर ।
     2.   अध्यक्ष योगाभ्यासी मंडल नागपुर
     3.   संस्कृत विश्व परिषद अखिल भारतीय प्रचार मंत्री 1952 से 1956 तक इस निमित्त अखिल भारत में
      संस्कृत व्याख्यान के लिए प्रवास। (इसकी स्थापना कन्हैयालाल मुंशी ने की थी।)
     4.   भारत शासन की वैज्ञानिक एवं तकनीकी परिभाषा समिति के सदस्य
     5.    कार्यवाह, संस्कृत भाषा प्रचारिणी सभा, नागपुर
     6.   अध्यक्ष, महाराष्ट्र संस्कृत परिषद्
     7.   उपाध्यक्ष, संस्कृत विद्यापीठ समिति, महाराष्ट्र शासन द्वारा नियुक्त
     8.   सचिव, अखिल भारतीय विद्या परिषद का नागपुर अधिवेशन
     9.   सचिव, अखिल भारतीय शिक्षा परिषद का नागपुर अधिवेशन
     10.    संयोजक, अखिल भारतीय संस्कृत कथा स्पर्धा, यूनेस्को द्वारा प्रवर्तित 1953 ।
     11.    संस्कृत विद्यालय पाठशाला पुनर्गठन समिति सदस्य 1953
     12.    प्रमुख मंत्री, संस्कृत विश्व परिषद्, नागपुर अधिवेशन 1954
     13.    महाराष्ट्र शासन की स्थाई संस्कृत समिति सदस्य 1973 से 1983 तक  
     14.   नागपुर, कोल्हापुर, रायपुर, ग्वालियर, इंदौर, हैदराबाद आदि विश्वविद्यालयों के संस्कृत अभ्यास मंडल,    
         विद्वत् सभा, पाठ्यपुस्तक समिति आदि की सदस्यता
15.  अध्यक्ष, संस्कृत अभ्यास मंडल रायपुर विश्वविद्यालय
16.   अध्यक्ष, विवेकानंद केंद्र, कन्याकुमारी, नागपुर विभाग
17.   अध्यक्ष, विश्व हिंदू परिषद्, विदर्भ विभाग
18.    अध्यक्ष, हस्तलिखित ग्रंथालय, नागपुर विश्वविद्यालय
19.    अध्यक्ष, अखिल भारतीय संस्कृत परिषद्, पांडिचेरी
20.    अध्यक्ष, रजत जयंती अधिवेशन, स्वाध्याय मंडल, गुजरात 1957
21.   अध्यक्ष, उत्कल संस्कृत परिषद् 1958
22.    अध्यक्ष, केरलीय संस्कृत परिषद् 1967
23.     अध्यक्ष, अखिल भारतीय संस्कृत परिषद् नाशिक अधिवेशन 1988
24.      अध्यक्ष, संत साहित्य प्रतिष्ठान, नागपुर
25.     अध्यक्ष, महाराष्ट्र योग सम्मेलन अकोला अधिवेशन 1989
26.     साहित्य अकादमी जनरल काउंसिल तथा संस्कृत समिति की सदस्यता 1973 से 10 वर्षों तक
27.      संस्थापक संपादक, राष्ट्र शक्ति मराठी साप्ताहिक पत्रिका नागपुर 1956 से 60 तक
28.     संपादक, साहित्य विभाग, दैनिक तरुण भारत मराठी, नागपुर 1956 - 60 तक
29.     संपादक, योग प्रकाश मराठी मासिक पत्रिका (योगविषयक)
30.    आकाशवाणी द्वारा आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन 1961 से 1982 तक में संस्कृत काव्य गायन
31.    1983 में न्यूयार्क में विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित संस्कृत परिषद में भारत का प्रतिनिधित्व
32.    विश्व हिंदू परिषद अमेरिका द्वारा आयोजित ऑरलैंडो फ्लोरिडा के अधिवेशन में प्रमुख वक्ता 1983
33.    संपादक, सत्यानन्दम् संस्कृत पत्रिका, जादवपुर
34.    संस्थापक, सदस्य विश्व संस्कृत प्रतिष्ठानम्

पुरस्कार एवं सम्मान
साहित्य अकादमी पुरस्कार - 1974  शिवराज्योदयम् महाकाव्य हेतु प्रदान किया गया।  
कालिदास पुरस्कार  - 1983 श्रीराम संगीतिका पुस्तक पर मध्य प्रदेश संस्कृत अकादमी द्वारा दिया गया ।
कुवलयानंद योग पुरस्कार, पुणे  1985  
राष्ट्रपति पुरस्कार 1989
महाराष्ट्र गौरव पुरस्कार  1990
क्षमादेवी राव पुरस्कार  1990
डॉक्टर हेडगेवार प्रज्ञा पुरस्कार 1990
वाङ्मय चूड़ामणि पुरस्कार वाराणसी 1991
श्रीमंत पेशावे पुरस्कार पुणे 1992
जीजामाता पुरस्कार 1992
विवेकानंद पुरस्कार 1992  
ज्ञानपीठ द्वारा विशिष्ट संस्कृत विषयक पुरस्कार 1993
उत्तर प्रदेश संस्कृत अकादमी पुरस्कार 1994  
काशी स्वाध्याय मंडल तथा अखिल भारतीय तीर्थ पुरोहित संघ द्वारा प्रदत सुरभारती कण्ठाभरण उपाधि 1977
हडसन अमेरिका वासी भारतीय समाज द्वारा भारत पुत्र उपाधि से सम्मानित 1983
सत्यानंद ज्ञानपीठ, जादवपुर कोलकाता द्वारा प्रदत्त तथा शंकराचार्य काम कांची कामकोटि पीठाधीश्वर द्वारा समर्पित प्रज्ञाभारती उपाधि।

वेंकटराम राघवन (पद्म भूषण(19081979)
वेंकटराम राघवन् का जन्म 22 अगस्त 1908 को तमिलनाडु  के तंजौर जिले के तिरुवायुर में हुआ था। इनके पिता का नाम वेंकटराम अय्यर तथा माता का नाम मीनाक्षी था। आपने 1930 में 3 कॉलेज पुरस्कार और 5 विश्वविद्यालय पदक के साथ प्रेसीडेंसी कॉलेजमद्रास से स्नातक किया। आपने महामहोपाध्याय प्रोफेसर एस कुप्पुस्वामी शास्त्री से संस्कृत भाषा, साहित्य, तुलनात्मक दर्शन और भारतीय दर्शन के साथ में एम. ए किया। 1934-1935  मद्रास विश्वविद्यालय से महामहोपाध्याय कुप्पुस्वामी शास्त्री के अधीन श्रृंगार प्रकाश पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त किया। आपने  संस्कृत भाषण और लेखन के लिए भी पदक और पुरस्कार जीते।
सरस्वती महल पांडुलिपि पुस्तकालय में कुछ समय तक पर्यवेक्षण का कार्य करने के बादअल्मा मेटरमद्रास विश्वविद्यालय के अनुसंधान विभाग से जुड़े।  वहाँ शोध विद्वान् (Research Scholar) पर नियुक्त होकर प्रोफेसर के पद तक पहुंचे। संस्कृत विभागमद्रास विश्वविद्यालय से आप दिसंबर 1968 में संस्कृत विभाग के प्रोफेसर और विभागाध्यक्ष के रूप में सेवानिवृत्त हुए। । इस प्रकार आप 1935 से 1960 तक मद्रास विश्वविद्यालय से जुड़े रहे।
 व्यक्तित्व
आपने मुक्तक काव्यखंडकाव्यकथा, काव्यशास्त्र, अन्योक्ति, सुभाषित आदि की रचना की। जिसमें यूरोप के यात्रा का अनुभवआधुनिक जीवन की समस्याएंपश्चिमी काव्य धारा का संपर्क देखने को मिलता है। पारंपरिक रचना बंध तथा रसास्वाद की भूमि पर भी आपकी रचना अवस्थित है। स्तोत्र काव्य में कामाक्षी मातृका स्टमक मीनाक्षी सुप्रभातम उल्लेखनीय हैराघवन के काव्य में देश तथा विश्व में हो रहे परिवर्तनों के प्रति सजगता है। विभिन्न विचारधाराओं का समावेश है। अंग्रेजी की स्वच्छंदतावादी कविता की प्रेरणा भी है। कहीं-कहीं आत्म अनुभूतियों की गहनता और कहीं निसर्ग के सौंदर्य के प्रति ललक का भाव है।  संस्कृत कविता को नए मुहावरे और नई शैली से अलंकृत करने में भी आपका योगदान है। संस्कृत में 1960 से लेकर 1980 तक राघवन् युग माना जाता है। जिसमें संस्कृत गद्य का क्रांतिकारी विकास हुआ। आपने 1969 में 1 आर्मीनियाई कहानी का संस्कृत में अनुवाद किया। यह संकलन के रूप में भी प्रकाशित हुआ। इसके अतिरिक्त आंध्रदेश्यहास्यकथाः 1964 में भी प्रकाशित हुआ।
आप संस्कृत के कई हस्तलिखित ग्रंथों का प्रकाशन किया है। ऑल इंडिया ओरियन्टल कॉन्फ्रेंस के श्रीनगर अधिवेशन तथा विश्व संस्कृत सम्मेलन के नई दिल्ली अधिवेशन के अध्यक्ष रहे । आप कवि कोकिलसकल कला कलापविद्वत्कविन्द्र तथा पद्म भूषण की उपाधियों से विभूषित हुए ।
कृतित्व
            आपने 1953-58 में यूरोप के 13 देशों का दौरा कियाजिसमें संस्कृत और संबद्ध अध्ययनों के विश्वविद्यालय केंद्रोंसंस्थानोंसंग्रहालयपुस्तकालयों का दौरा किया। यूरोप में 20,000 संस्कृत की अप्रकाशित पांडुलिपियों की एक सूची तैयार की । अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेने के अलावाआपने 1962-63 में दो बार पाण्डुलिपि की खोज में नेपाल के काठमांडू की  यात्रा की। आपने पूर्व एशिया के देशोंऑस्ट्रेलियामॉरीशसकनाडा और मैक्सिको आदि देशों की भी यात्रा की। 
आपकी कविता परंपरा में आधुनिकता का समागम है। आपने लगभग 120 से अधिक पुस्तकों और 1200 लेखों को लिखा,जिसमें अलंकार शास्त्र विषय पर 25 ग्रंथों का लेखन किया ।
1954 में SANSKRIT और ALLIED INDO-LOGICAL STUDIES नामक एक पुस्तक प्रकाशित की।     कृतियां
खण्डकाव्य/ गीतिकाव्य/ लघुकाव्य
          गोपहम्पनः(1947), देववन्दीवरदराजः(1948),महात्मा (1948), उच्छ्वसितानि (1978), प्रमैव योगः (1978), प्रतीक्षा (1976), वाग्वादिनी सहस्रतन्त्री (1969), पुलकितमेति कश्चित्कविःसर्वधारी, महीपो मनुनीतिचोलः, फाल्गुनषोडशी स्तुतिः, किं प्रियं कालिदासस्य, नरेन्द्रो विवेकानन्दः, श्लिष्टप्रकीर्णक, किमिदं तव कार्मणम्, कालः कविः, संक्रान्तिमहः, कविर्ज्ञानी ऋषिः, विश्वभिक्षुस्तवः, कामकोटिकार्मण,गृहीतमिवान्तरंगम्, कावेरी,शब्दः (नृत्यगीत) वैवर्तपुराणम्, ब्रह्मपत्रदम्मविभूतिः, स्वराज्यकेतु, अभ्रमभ्रमभ्रविलायम् (यात्रावृत्तांत)।
स्तोत्रकाव्य
              श्रीकामाक्षीमातृकास्तवः 1979, श्रीमीनाक्षीसुप्रभातम्1979,
महाकाव्य
            मुत्तुस्वामी दीक्षितचरितम्, 1955
रूपक
      विमुक्ति, रासलीला, कामशुद्धि, पुनरुन्मेष, लक्ष्मीस्वयंवर, आषाढस्य प्रथमदिवसे, महाश्वेता, प्रतापरुद्रविजय, अनारकली
प्रेक्षणक (ओपेरा)
                    विकटनितम्बा, अवन्तिसुन्दरी, विज्जिका
संस्कृत विषयों पर अंग्रेजी में लिखित पुस्तकें

The Number Of Rasas (1975)
Rtu In Sanskrit Literature (1972)
Some concepts of Alankara Sastra.
Sanskrit and Allied Indological Studies in Europe.
Sanskrit and Allied Indian Studies in U.S.
The Social Play in Sanskrit.
Love in the Poems and Plays of Kalidasa.
Modern Sanskrit Writings.
Srngaramajari of Akbarshah.
Agamadambara of Jayanta.
सम्पादन
न्यू कैटलस कैटलोरम (एनसीसी) के 5 भाग का सम्पादन, प्रकाशन
जर्नल ऑफ़ ओरिएंटल रिसर्चजर्नल ऑफ़ द म्यूज़िक एकेडमीमद्रासएवं साहित्य अकादमी की पत्रिका संस्कृत प्रतिभा के सम्पादक।
भोज कृत श्रृंगार प्रकाश का अनुवाद ,1963 ( काव्य और नाटक से संबंधित। यह ग्रन्थ 36 अध्यायों में विभक्त है।)
इसके अतिरिक्त आपने संस्कृत में अनेक मूल एवं  आलोचनात्मक ग्रन्थों को लिखा। आपने तमिल में भी कहानियां तथा संस्कृतिक लेख लिखे।
सम्मान पुरस्कार
 1962 में साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में पद्मभूषण पुरस्कार मिला।
 1966 में संस्कृत के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
1969 में जवाहरलाल नेहरू फाउन्डेशन, नई दिल्ली ने श्रृंगार प्रकाश की पाण्डुलिपियों के सम्पादन के लिए फैलोशिप दिया।
1971 में कैनबराऑस्ट्रेलिया में ओरिएंटलिस्टों की 28 वीं अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस में भाग लिया।
1998 में हार्वर्ड ओरिएंटल सीरीज के वॉल्यूम 53 के रूप में प्रकाशित किया गया था।
श्री कांची शंकराचार्य द्वारा उनकी काव्य रचनाओं के लिए कवि-कोकिल की उपाधि और शाला-कला-कल्प को उनकी बहुमुखी उपलब्धि के लिए सम्मानित किया गया।
विशिष्ट शोध के लिए एशियाटिक सोसायटीबॉम्बे द्वारा 1953 केन गोल्ड मेडल से सम्मानित।
संगीत
एक संगीतज्ञ के रूप मेंउन्होंने कर्नाटक संगीत में विशेषज्ञता हासिल की। वह 1944 से अपनी मृत्यु तक संगीत अकादमीमद्रास के सचिव थे। आप ने सन् 1958 में मद्रास में संस्कृत रंगमंच की स्थापना की। संस्कृत भाषा, भारतीय संस्कृति के विविध पहलुओं के पोषण और प्रचार के लिए आपकी पत्नी पत्नी श्रीमती शारदा राघवन द्वारा (Dr.v.raghavan center for performing arts) की स्थापना 1974 में की। यह केंद्र 1998 में पंजीकृत किया गया।  यह एक गैर-लाभकारी संगठन है।  ट्रस्ट की गतिविधियों को परिवार के संसाधनोंसंस्कृति मंत्रालय, भारत के शासन और कुछ निजी स्रोतों तथा से संरक्षण दिया जाता है।
विरासत
उनकी जन्मशताब्दी पर अगस्त 2008 में समारोह आयोजित किए गए थे। इस अवसर पर स्मृति कुसुमंजलि पुस्तक का विमोचन किया गया।
  
धारित पद
संस्कृत आयोग के सदस्य
केंद्रीय संस्कृत बोर्ड और इंडोलॉजी समिति के सदस्य
राष्ट्रीय संस्कृत संस्थानशिक्षा मंत्रालय के केंद्रीय प्रकाशन समिति के अध्यक्ष
साहित्य अकादमी के  संयोजक;
संस्कृत सलाहकार बोर्ड,नेशनल बुक ट्रस्ट के सदस्य
संगीत नाटक अकादमी कार्यकारी समिति के सदस्य,
कुछ समय के लिए संस्कृतऑल इंडिया रेडियो के विशेष सलाहकार;
कई पांडुलिपियों के पुस्तकालयों के लिए सलाहकार;
सदस्यन्यू संस्कृत डिक्शनरी बोर्ड और पुराण संपादकीय बोर्ड;
निदेशक / सचिवकुप्पुस्वामी शास्त्री अनुसंधान संस्थान और
सचिवसंगीत अकादमीमद्रास;
1951-59 तक अखिल भारतीय प्राच्य सम्मेलन के सचिव रहे।
1961 में आयोजित अखिल भारतीय प्राच्य सम्मेलन के 21 वें सत्र के दो बार अनुभाग अध्यक्ष और सामान्य अध्यक्ष;
सरकार द्वारा केंद्रीय संस्कृत संस्थान के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त।
प्रथम विश्व संस्कृत सम्मेलनशिक्षा मंत्रालय (1972) के अध्यक्ष (अकादमिक)
अध्यक्षसंस्कृत अध्ययन के अंतर्राष्ट्रीय संघएस।
संस्कृत विश्वविद्यालयवाराणसी द्वारा विद्या वाचस्पति (डी. लिट) की उपाधि
क्षमा राव (पंडिता)
आज आधुनिक संस्कृत साहित्य पर विचार करने से पहले पंडिता क्षमा राव का नाम लिया जाता है। पंडिता क्षमा राव एक लेखकनाटककार और संस्कृत के गद्य लेखक के रूप में जानी जाती हैं। इसके अलावालघु कथाओं की आधुनिक शैली को पहली बार संस्कृत में वर्गीकृत किया गया था। पण्डिता क्षमा राव समकालीन संस्कृत साहित्य की अग्रदूत है। इनका जन्म 4 जुलाई 1890 को हुआ। इनके पिता का नाम शङ्कर पाण्डुरंग पण्डित तथा माता का नाम उषा देवी था । 
  उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध मेंमराठी शोधकर्ता शंकर पांडुरंग (1840-1894) ने प्राचीन भारतीय साहित्य और संस्कृति के अध्ययन को अपने जीवन का केंद्र बनाया। उन्होंने अपने 54 साल के जीवनकाल में ऋग्वेदवेदान्त और तुकाराम के ग्रंथ सहित विभिन्न संस्कृत और प्राकृत ग्रंथों के संस्करणों को संपादित करके शोध के मानदंड बनें।
इनका पारिवारिक उपाधि ‘पण्डित’ था । शंकर पांडुरंग के चार बेटे और चार बेटियाँ थी । उनमेंवामन पंडित एक महान चित्रकार थे। अन्य तीनों कानूनचिकित्सा और अन्य क्षेत्रों में अपने काम के लिए प्रसिद्ध थे। लेकिन पंडिता  क्षमा राव ने अपने पिता की संस्कृत नैपुण्य विरासत को सम्हाला। । विद्वान् शंकर पाण्डुरंग आर्. जि. भण्डारकर से प्रभावित थे । 
    क्षमा के पिता बचपन में ही दिवंगत हो गये । क्षमा राव (1890-1954) ने थोड़े समय के लिए राजकोट में अपने चाचा बैरिस्टर सीताराम पंडित के साथ रही। वहीं उनकी शिक्षा की व्यवस्था हुई । प्रतिभासम्पन्ना क्षमा तीक्ष्ण बुद्धि की थी । ये मेट्रिक परीक्षा के संस्कृत-आङ्ग्ल भाषा में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त की । इसके बाद विल्सन् महाविद्यालय में प्रवेश लिया । जहाँ इनके गुरु महामहोपाध्याय भारतरत्न पी.वी. काणे थे । क्षमा राव के गुरुओं में विद्यालङ्कार  नगप्प शास्त्री प्रमुख थे । यहाँ इनका विद्याभ्यास  स्थगित हो गया । उस समय लड़कियों के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना  और डिग्री लेना संभव नहीं था।  माँ उषा बाई एक बहुत ही दयालु और समझदार महिला थी। पति के निधन के  बाद उन्होंने अपने घर में क्षमा की शिक्षा पर ध्यान दियाताकि उनके बच्चों को शैक्षिक क्षति का सामना न करना पड़े। वैज्ञानिक शोधकर्ता और जीवनी लेखक ल. रा. पंगारकर उस समय इन बच्चों को संस्कृत पढ़ाने जाते थे। क्षमा अत्यंत तीक्ष्ण और मेधावी थी। पूरे जोश में उसने कई विषय आत्मसात् कर ली।
     क्षमा राव का विवाह मुम्बई के डा. राघवेन्द्र राव नामक सुप्रसिद्ध चिकित्सक के साथ हुआ। उसी कारण से इनका उपनाम क्षमा राव हुआ।  शादी के बाद उनकी जिंदगी पूरी तरह से बदल गई। डॉ. राव का विद्वानों के बीच उठना बैठना था। उन्होंने विषाक्तता (टाइफाइड) की बीमारी पर विशेष शोध किया था। डॉ. राव एक प्रगतिशील विचारक थे। इसलिएअपनी पत्नी की बुद्धिमत्ता को जानते हुएउन्होंने घर पर उनकी शिक्षा के लिए एक विशेष संस्कृत विद्वान की व्यवस्था की । अब वह पूरी तरह से अंग्रेजी बोल और लिख रही थी। इसी तरह से उन्हें देश-विदेश जाना पड़ा। उन्होंने उसी समय फ्रेंचइतालवी सीखा। वह बहुभाषी बन गयी। पति के साथ विदेशों में घूमती हुई क्षमा का ज्ञान विस्तृत हुआ । वह मराठी, गुजराती, संस्कृत,  अंग्रेजी भाषा जानती ही थी। ये अनेक क्रीडाओं में भी निपुण थी। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि शंकर पांडुरंग में लड़कियों को सामाजिक सुधारों पर जोर देते हुए शिक्षा लेने की लालसा की थी। इसके लिए उन्होंने जस्टिस रानाडे और अन्य की मदद से लड़कियों के लिए एक स्कूल स्थापित किया।
     क्षमा के अध्ययन के समय देश में स्वतंत्रता संग्राम छिड़ा था । ये महात्मा गांधी द्वारा चलाये गये स्वातन्त्र्य संग्राम की सेनानी बनकर देश को परतंत्रता की बेड़ी से मुक्त कराने हेतु लोगों को प्रेरित की । इन्होंने अपनी कृतियों में  गान्धी के जीवन और विचारों को प्रमुखता से वर्णित की। ये गान्धी के साबरमती आश्रम को भी देखी ।
शङ्करजीवनाख्यानम् में अपने पिता की जीवनी लेखन से पण्डिता क्षमा ने संस्कृत साहित्य में नई विधा का सूत्रपात किया। उसके प्रस्ताव में श्रीनृसिंह केलकर ने मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा -
कथं हि न करिष्यन्ति कन्याभ्यः पितरः स्पृहाम्।  ऋणम् तत् पैतृकम् पुण्यमपाकुर्युर्तदीह ताः।।
पिता पुत्रियों की स्पृहा क्यों नहीं करेंगेक्योंकि वे भी पितृ ऋण को उतारने में पूर्ण रूप से समर्थ होती हैं। पण्डिता क्षमा गार्गी एवं मैत्रेयी की परंपरा को आगे बढाने वाली संस्कृत कवयित्री हैं। उन्होंने कथाओं को भी पद्य में लिखा । चरित काव्य के अंतर्गत क्षमा ने तुकारामचरित , रामदासचरित तथा ज्ञानेश्वर चरित को लिखा।
पण्डिता क्षमा राव ने 1920 से 30 तक अंग्रेजी में लिखा। आपकी रचनायें मराठी में भी उपलब्ध होती है। इसके बाद सत्याग्रह आन्दोलन से प्रभावित होकर संस्कृत में लिखना आरम्भ किया। इनकी अग्रलिखित रचनायें प्रकाशित हैं।
श्रीज्ञानेश्वरचरितम् (महाकाव्य) शङ्करजीवनाख्यानीयम्रामदासचरितम्,  तुकारामचरितम् मीरालहरी(खण्डकाव्यम्), सत्याग्रहगीता, उत्तरसत्याग्रहगीता उत्तरजयसत्याग्रहगीता,   स्वराज्यविजयः, कटुविपाकः (नाटक), महाश्मसानम् (नाटक), कथामुक्तावली 1955, कथापञ्चकम् (पद्यात्मक कथा), ग्राम ज्योति (पद्यात्मक कथा) विचित्रपरिषद् यात्रा, मायाजालम् (आख्यायिका)
पण्डिता क्षमा राव ने श्रीज्ञानेश्वरचरितम् (महाकाव्य) शङ्करजीवनाख्यानम्,  तुकारामचरितम्मीरालहरी तथा रामदासचरितम्  का अंग्रेजी में अनुवाद कर प्रकाशित किया।
उन्होंने संस्कृत साहित्य में नूतन विधाओं तथा विषयवस्तु का अवतरण किया । गांधी जी के सत्याग्रह से प्रभावित होकर उन्होंने सत्याग्रहगीता तथा उत्तरसत्याग्रहगीता नामक महाकाव्य की रचना की, जो 1932 में पेरिस से प्रकाशित हुआ। इसमें राष्ट्रीय आन्दोलन की घटनायें वर्णित हैं।
 ‘विचित्रपरिषद् यात्रा’ नामक लघु पुस्तक के अंत में संस्कृत प्रचार के विषय में वह इस प्रकार प्रार्थना की है-
संस्कृताधीतिनः सन्तु सर्वे भारतभूमिजाः ।
संस्कृतेनैव कुर्वन्तु व्यवहारं परस्परम् ॥
संस्कृतज्ञानमासाद्य संस्कृताचारवृत्तयः ।
सर्वतः संस्कृतीभूय सुखिनः सन्तु सर्वतः ॥
पंडिता क्षमा राव की कथाओं में भारत के गौरव की धारा परिलक्षित होती है। इन की कुछ कहानियां तो उनके प्रिय अनुष्टुप् छंद में निबद्ध है, जो कथापंचकम् (मुंबई 1930) में संकलित है। उनकी गद्य कथाओं में कुछ की कथावस्तु तत्कालीन परिस्थितियों से संबंधित है और कुछ में सामाजिक रूढ़ियों से त्रस्त नारी की या शोषित वर्ग की दुर्दशा और त्रासदी चित्रित है। इनकी अधिकांश कहानियां दुःखान्त है। कुछ कहानियों की कथावस्तु राष्ट्रीय आंदोलन से भी संबद्ध है । कथामुक्तावली (मुंबई 1954) में उनकी 15 गद्य कथाएं संकलित हैं। इनमें से कुछ दुःखान्त प्रेम कथाएं हैं, जहां प्रेमी प्रेमिका का मिलन बर्फ से दबकर मृत्यु के समय ही होता है। एक कहानी में पिता अपनी संतति का मुख देखने को तरस जाता है, क्योंकि उसने अपने पत्नी का परित्याग कर दिया था और पत्नी ने मरते समय यह प्रतिज्ञा की थी कि उसकी संतान को उसके पति को न दिखाया जाए। एक कहानी में एक मछुआरा साधु बन जाता है। बरसों जब वह अपने नगर आता है तो उसकी मां उसे पहचान लेती है, परंतु पड़ोसियों को जब मालूम पड़ता है कि यह तो मछुआरा है तो मां-बेटे दोनों का बहिष्कार कर दिया जाता है। खेटग्रामस्य चक्रोद्भवः जैसी कहानियों में गुजरात के खेड़ा जैसे गांव में बस के पहुंचने पर जो सामाजिक परिवर्तन होता है ,उसका मनोरम चित्रण गुजरात के ग्रामीण परिवेश से संबद्ध कथाओं में है। इसी प्रकार की सामाजिक परिवेश की कथावस्तु पर लिखी पंडिता क्षमा राव की कहानियां आधुनिक लघुकथा का अच्छा निदर्शन सिद्ध होती है। उसमें विषय की विविधता है और शैली भी शुद्ध और सुंदर है।
पंडिता क्षमा राव 1942 में सरस्वती चन्द्रिका उपाधि से विभूषित हुई।
Share:

न मृता, म्रियते न मरिष्यति वा (संस्कृत गीत)

 न मृता, म्रियते न मरिष्यति वा

सुरवागमृता सुखदा वरदा

द्विषतां नियतिं रचयिष्यति वा !! ध्रुवा ॥

 

निगमागमगीतिमयी रुचिरा.

रघुनाथकथामहिता मधुरा

पुनरद्य दशाननकर्मरतान्

घननादमुखान् निहनिष्यति वा ॥ १॥

 

नरपाल भगीरथ सङ्कलिता -

सुरसिन्धुरियं गगनाद्गलिता ।

विशदाश्रममव्यविनाश परान्

अभिशप्तजनान् गमयिष्यति वा ॥ २ ॥

 

इयमार्षतपोनिधि सञ्चयिनी

विपदां शमनी वसुधोज्जयिनी

इयमञ्चितसंस्कृति कीर्तिकथा

पुनरद्य भुवं मदयिष्यति वा ॥ ३ ॥

 

अमृतादधिकं परिपोषकरी

सुकृतादधिकं भवदोषहरी

पदबन्धरसामृत-चारुचयै-

श्चितिनीरसतां रसयिष्यति वा!

न मृता, म्रियते न मरिष्यति वा ! ! ॥ ४॥

 

लेखकः- डॉ. मिश्रोऽभिराजराजेन्द्रः

Share:

संस्कृत शिक्षा का उद्देश्य एवं लाभ


हम यहाँ विचार करेंगे कि वर्तमान संस्कृत शिक्षा का उद्देश्य क्या है? नौकरी के लायक संस्कृत शिक्षा में सुधार करने के खतरे क्या है?  संस्कृत का सामाजिक योगदान या प्रासंगिकता क्या हैं ? 

     आज भी संस्कृत विद्यालयों का पाठ्यक्रम ऐसा है कि जिसे पढ़कर शिक्षा क्षेत्र को छोड़कर अन्य क्षेत्र में रोजगार पाना मुश्किल होता है। शिक्षा क्षेत्र में भी रोजगार के बहुत ही कम अवसर उपलब्ध हैं। आज शिक्षा का नाम लेते ही रोजगार उसके साथ स्वतः जुड़ जाता है। पहले बच्चों द्वारा गलत काम करने पर हर कोई टोकता था, कहता था तुम पढ़े लिखे हो। परन्तु आज समाज में शिक्षा के प्रति वह सोच नहीं रहा। क्या मान लिया जाय कि शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य रोजगार ही है ? शिक्षा का उद्देश्य भौतिक विकास मात्र है ? 
 देश में पारंपरिक संस्कृत विद्यालयों तथा विश्वविद्यालयों की स्थापना शास्त्र संरक्षण को ध्यान में रख कर की गई। हजारों वर्षों से सिंचित ज्ञान संपदा को हम यूं ही भुला नहीं सकते। यह मानव सभ्यता के विकास का सबसे प्रामाणिक लिखित साक्ष्य हैं। कोई भी देश केवल आर्थिक उन्नति से ही महान नहीं होता, बल्कि जिसका गौरवमय अतीत होजिसके पास गर्व करने लायक संपदा उपलब्ध हो, वह महान कहलाता है। जिस प्रकार हम अपने भौतिक धरोहरों की रक्षा करते हैं, उसी प्रकार आचार - व्यवहार, कला, सांस्कृतिक विकास आदि ज्ञानरूपी धरोहर की सुरक्षा करने के लिए संस्कृत विद्यालयों की स्थापना की गई। संस्कृत शिक्षा केवल भाषाबोध तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमें भारतीय सामाजिक ताना-बाना, यहां की परंपरा, रिश्ते, आचार-व्यवहार को समझने में मदद करती है । यह अन्तर्मन के विकास की कुँजी है। अन्तःकरण या अन्तर्मन के विकास को समझना इतना कठिन भी नहीं है। संतुष्टि उसमें से एक तत्व है।  मनसि च परितुष्टे कोर्थवान् को दरिद्रः ।
भारतीयों की जीवन पद्धति संस्कृत ग्रंथों की भित्ति पर ही खड़ी है। संस्कृत ग्रंथों ने हमें सदियों से पाप- पुण्य की सीख देकर सद्मार्ग पर चलना सिखाया। यहाँ व्यक्ति किसी राजदण्ड के भय से नहीं, अपितु अन्तरात्मा तक पैठ बना चुका पाप के भय से नियंत्रित रहते हैं। यह विद्या उच्च नैतिक मानदंड के पालन हेतु प्रेरित करता आया है, जिसके फलस्वरूप हमारे जीवन में पुलिस और न्यायालय का हस्तक्षेप अत्यल्प रहा। संस्कृत के ग्रंथों ने ही सदियों से ललित कलाओं द्वारा मानव को मनोरंजन का साधन भी उपलब्ध कराया। आरोग्य हो या विधि-व्यवस्था सभी क्षेत्र में संस्कृत ग्रंथों का अतुलनीय योगदान रहा है। भाषा विज्ञान, ध्वनि विज्ञान, तर्क पूर्वक निर्णायक स्थिति तक पहुंचाने में संस्कृत ग्रंथ ने नींव का कार्य किया है, जिसके बलबूते हम आज इस स्थिति तक पहुंच सके हैं। 
मैंने उपशास्त्री कक्षा में मनुस्मृति के द्वितीय अध्याय का अध्ययन किया । तब इस ग्रन्थ में वर्णित भूगोल तथा सांस्कृतिक चेतना को ठीक से समझ नहीं सका था। अब जब पुनः इसे पढ़ता हूँ तब इन ग्रन्थों की उपादेयता समझ में आती है, जो रोजी रोटी से कहीं आगे तक का संदेश देता है। सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के लिए यह ग्रन्थ हमें बार बार प्रेरित करता है कि एतान्द्विजातयो देशान्संश्रयेरन्प्रयत्नतः । एक भूभाग की सीमा रेखा खींची गयी है और कहा गया कि इस देश में प्रयत्न पूर्वक निवास करे। यह संदेश हममें जीवट उत्पन्न करता है । इस भूभाग से बेदखल किये जाने के हरेक कुचक्र से सावधान रहने का संदेश भी देता है। मनुस्मृति ग्रन्थ से सरस्वती नदी के विनशन अर्थात् उसके विनाश की सूचना भी हमें मिलती है। हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्यं यत्प्राग्विनशनादपि । विनशन का एक अन्य अर्थ नदी का वह मुहाना होता है, जहाँ से डेल्टा क्षेत्र शुरू होता है। यहाँ जाकर नदी बिखर जाती हो, या किसी कारण से समाप्त हो जाती है। सरस्वती का पूरा अवशेष आज भी मिलते हैं। ऋग्वेद से लेकर मनु के समय तक सरस्वती और दृषद्वती नामक नदी का अस्तित्व रहा होगा। ऋग्वैदिक ऋषि इसकी स्तुति करते रहे- प्रणो देवी सरस्वती वाजेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु। इसका संगम परिणत नामक स्थान पर होता है, जिसे वर्तमान में यह पहचान लिया गया है । वह सूरतगढ़ का मानक थेड़ी स्थान है। सरस्वती के विनशन होने से इसी दूरी मापी जा चुकी है। सम्पूर्ण श्लोक देखें-

सरस्वतीदृषद्वत्योर्देवनद्योर्यदन्तरम् ।

तं देवनिर्मितं देशं ब्रह्मावर्तं प्रचक्षते ॥ १७॥

सरस्वती और दृषद्वति इन दोनों नदियों के मध्यभाग को ब्रह्मावर्त देश कहा गया है । देवनदी का अर्थ होता है देवता द्वारा निर्मित। यह द्व तथा निर्मित शब्द नदी तथा देश प्राशस्त्य को कहता है ॥ १७ ॥

कुरुक्षेत्रं च मत्स्याश्च पञ्चालाः शूरसेनकाः।

एष ब्रह्मर्षिदेशो वै ब्रह्मावर्तादनन्तरः॥ १९ ॥

 मत्स्यादि बहुवचनान्त शब्द देश विशेष वाचक हैं । पञ्चाल कान्यकुब्ज देश को कहा गया है। शूरसेनक मथुरादेश को कहा गया है । यह ब्रह्मर्षि देश ब्रह्मावर्त से थोड़ा छोटा है ॥ १९॥

हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्यं यत्प्राग्विनशनादपि ।

प्रत्यगेव प्रयागाच्च मध्यदेशः प्रकीर्तितः॥२१॥

उत्तर दिशा में अवस्थित हिमवान् (हिमालय) तथा दक्षिण दिशा में अवस्थित विन्ध्य पर्वत है। इन दोनों के मध्य विनशन अर्थात् सरस्वती के अन्तर्धान होने वाले देश से जो के पूर्व और प्रयाग से जो पश्चिम भूभाग है, वह मध्यदेश के नाम से देश कहा गया है ॥ २१ ॥

आ समुद्रात्तु वै पूर्वादासमुद्रात्तु पश्चिमात् ।

तयोरेवान्तरं गिर्योरार्यावर्तं विदुर्बुधाः ॥ २२ ॥

पूर्व समुद्र से लेकर पश्चिम समुद्र तक हिमालय तथा विन्ध्य के मध्य को पण्डित लोग आर्यावर्त देश जानते हैं । यहाँ आङ् उपसर्ग मर्यादा अर्थ में है। इसका अर्थ हुआ कि समुद्र के मध्य द्वीपों में आर्यावर्तता नहीं है अपितु आर्य अत्र यहाँ रहे । बार बार उत्पन्न लेते रहे है। २२॥

कृष्णसारस्तु चरति मृगो यत्र स्वभावतः।

स ज्ञेयो यज्ञियो देशो म्लेच्छदेशस्त्वतः परः ॥ २३ ॥

कृष्णसार मृग जहाँ स्वाभाविक रूप से रहते है। न कि बल पूर्वक कहीं से लाया गया,जैसा कि चिड़ियाघर में आजकल लाया जाता है। वह यज्ञ करने योग्य  देश जानना चाहिए । अन्य म्लेच्छदेश यज्ञ करने योग्य नहीं हैं।॥ २३ ॥

एतान्द्विजातयो देशान्संश्रयेरन्प्रयत्नतः।

शूद्रस्तु यस्मिन्कस्मिन्वा निवसेद्वृत्तिकर्शितः ॥ २४ ॥

अन्यदेश में उत्पन्न हुआ द्विजाति भी यज्ञार्थ और पुण्य के लिए इस देश में निवास करें। । शूद्र वृत्ति के लिए अन्य देश में भी निवास करें॥ २४ ॥
जिस दिन संस्कृत का अध्ययन और अध्यापन बंद होगा, उसी दिन भारतीय देवी-देवता, तीर्थ आदि की अस्मिता खतरे में पड़ जाएगी। हम अपनी भौगोलिक सीमा तथा सांकृतिक चेतना को खो देंगें। यह एक ऐसी विद्या है, जो भले ही उत्पादक न दिख रही हो, परंतु सामाजिक ताना बाना को बनाए रखने और उसे सुदृढ़ करने में इसकी महती आवश्यकता है। यह भाषा धर्म (धैर्य, क्षमा, अपरिग्रह , चोरी नहीं करना आदि सद्गुण) का मूल स्रोत है। इसके साहित्य अपनी कथानकों, नायकों के चरितों के द्वारा समाज को शिक्षित करते रहा है। अब कालिदास के रघुवंशम् ही एक उदाहरण लीजिये, जिसमें स्त्रियों का स्वतंत्र अभिज्ञान तथा उच्च नैतिक मानदण्ड वर्णित है।
का त्वं शुभे कस्य परिग्रहो वा किं वा मदभ्यागमकारणं ते ।
हे शुभे! तुम कौन हो? तुम किसकी भार्या हो? मेरे निकट तुम्हारे आने का कारण क्या है?
आचक्ष्व मत्वा वशिनां रघूणां मनः परस्त्रीविमुखप्रवृत्ति ।।
यह मानकर बोलो कि इन्द्रिय निग्रही रघुवंशियों के मन की प्रवृत्ति दूसरे की स्त्री के प्रति विमुख होता है। (रघुवंशम्)
विमर्श- कस्य परिग्रहो के पूर्व वाक्य का त्वं शुभे से ज्ञात होता है कि स्त्रियों का स्वतंत्र अभिज्ञान स्थापित था। इसमें असफल रहने पर ही पुरूष की पहचान से स्त्री पहचानी जाती थी। अपनी इन्द्रियों पर पुरूष का इतना नियंत्रण होता था कि वे स्त्री को देखकर चलायमान नहीं होता था। पुनः उस समय के समाज में बलात्कार, स्त्री अधिकारों के हनन का प्रश्न ही नहीं था। कोई कानून शास्ता न होकर व्यक्ति स्वयं होते थे। उच्च चारित्रिक आदर्श, स्त्रियों की स्वतंत्रता, न्यूनतम कानून, न्यूनतम पुलिस यदि चाहिए तो संस्कृत पढ़िए। महिलाओं को सच्चा सम्मान संस्कृत पढ़कर ही दिया जा सकता है। महाभारत से लेकर भारवि का किरातार्जुनीयम्, विशाखदत्त का मुद्राराक्षस हमें गुप्तचरी विद्या के पाठ पढ़ाते हैं।  जो संस्कृत नहीं पढ़े होते वे स्त्री को स्वतंत्र देख पुरूष और स्त्री के बीच के सम्बन्ध को चोर निगाह से देखते हैं।
संस्कृत साहित्य में प्रकृति वर्णन विपुल मात्रा में हुआ है। इसके अध्ययन करने से अध्येता सहज रूप से प्रकृति प्रेमी हो जाता है। वह जल, वायु, पृथ्वी, अंतरिक्ष को प्रदूषण मुक्त करने में अग्रेसर होता है। वह द्यौः शान्तिः, अंतरिक्ष शान्तिः की बात करने लगाता है। इसी भाषा से अन्य भारतीय भाषाओं की उत्पत्ति हुई है। यह क्षेत्रीय भाषा को भाषाई प्रदूषण से बचाती है। लोक कला, लोक संस्कृति को सुरक्षा कवच देती है। प्राचीन साहित्यिक व सामाजिक विचारों का इन भाषाओं पर व्यापक प्रभाव पड़ा। यही भाषा हमें एक राष्ट्र के रूप में जोड़ती है। भाषा के बारे में लाखों सफाई दी जाय कि भाषा केवल ज्ञान का वहन करती है परन्तु यह सच है कि यह किसी समुदाय विशेष के आचार-व्यवहार का भी वहन करती है। सनातनियों के द्वारा जब कोई धार्मिक आयोजन किया जाता है तब समाचार पत्र उसे सर्वधर्म समभाव लिखता है,जबकि मुस्लिमों के आयोजन को कौमी एकता। संस्कृत में तलाक शब्द या इसका पर्यायवाची शब्द नहीं मिलता।

संस्कृत शिक्षा प्रणाली में आधुनिक विषयों के समावेश के खतरे

पारंपरिक संस्कृत विद्यालयों में विशेषतः शास्त्रों का शिक्षण होता है। यदि हम वर्तमान प्रतियोगी परीक्षा पर आधारित पाठ्यक्रम को विद्यालयों में लागू करते हैं तो शास्त्र शिक्षण का पक्ष गौण हो जाएगा। धीरे-धीरे इन विद्याओं का हस्तक्षेप बढ़ता जाएगा। अंततः शास्त्रों की शिक्षा समाप्त हो जाएगी। ज्ञान आधारित शिक्षा को सूचना आधारित शिक्षा में परिवर्तित होते देर नहीं लगेगी। ज्ञानार्जन के स्थान पर रोजगार प्राप्ति मात्र लक्ष्य शेष बचेगा। उतना और वही अध्ययन लक्ष्य होगा, जितने से रोजगार मिल जाय। इस प्रकार हम अपने पूर्वजों द्वारा संचित और प्रवर्तित विशाल बौद्धिक संपदा से वंचित हो जाएंगे। किसी भी राष्ट्र के लिए यह शुभ नहीं कहा जा सकता कि वह अपने गौरवमय अतीत को बोध कराने वाली, मानव मन में सौन्दर्य की सृष्टि करने वाली तथा अपनी दार्शनिक ज्ञान संपदा को खो दे। कवितायें एक ओर मानव को सौन्दर्य बोध कराने का कार्य करती है तो दूसरी ओर उसमें मानवोचित संवेदना को भी जागृत करती है। व्यावसायोन्मुखी शिक्षा के कारण मानवीय संवेदना की कमी होती जा रही है, जो कि किसी भी सभ्य समाज के लिए खतरे की घंटी है। आज मार्ग में चोटिल हुए, अभावग्रस्त, रोगग्रस्त मानव के लिए जो संवेदना चाहिए, वह कम होती जा रही है। भ्रष्टाचार, अनैतिकता रोके नहीं रुक रही।
संस्कृत भाषा में मानव को संस्कारित करने के लिए रामायण, महाभारत जैसे असंख्य ग्रन्थ लिखे गये हैं। मंदिर, राजप्रासाद आदि लोकहितकारी कला के नमूने हैं, स्वास्थ्य रक्षण के लिए योग, आयुर्वेद जैसी असंख्य विद्याएं हैं, जो हमारे अंतर्मन तथा वाह्य शरीर को विकसित करती ही है, साथ में जीवन को भी सुगम बनाती है।

वर्तमान में ज्ञानार्जन और रोजगार के बीच समन्वय स्थापित करने हेतु किये जा रहे प्रयास

विगत कुछ वर्षों में संस्कृत शिक्षा को सरल और रोजगारोन्मुख बनाने के उद्देश्य से कई राज्यों में माध्यमिक संस्कृत शिक्षा बोर्ड का गठन किया गया। इसके पाठ्यक्रम भी निर्धारित किए गए। कक्षा 10 तक तीन प्रश्न पत्र (संस्कृत व्याकरण, साहित्य आदि) विषयों के साथ गणित, विज्ञान, अंग्रेजी आदि आधुनिक विषयों का समावेश किया गया है, ताकि वहां से उत्तीर्ण छात्र विभिन्न प्रकार की प्रतियोगी परीक्षाओं में सम्मिलित होकर नौकरी पा सकें। उत्तर प्रदेश माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद् का पाठ्यक्रम अत्यंत पुराना है। इसमें भी बदलाव किए जा रहे हैं। इसमें मैं भी काफी प्रयास किया। सूचना के सहज प्रसार के लिए वेबसाइट का निर्माण कराया। कोमल मति के बालक दृश्य श्रव्य उपकरणों के माध्यम से संस्कृत सीख सकें, इसके भी अनेक प्रकार की पाठ्यचर्या निर्मित की जा रही है। इन संस्थाओं को तकनीक से समुन्नत किया जा रहा है, ताकि छात्र वेबसाइट के माध्यम से परीक्षा परिणाम को जान सकें। सूचनाओं का आदान प्रदान सुलभ हो सके। उपाधि की समकक्षता, परीक्षा की मान्यता आदि की सूचना रोजगार प्रदाता को आसानी से उपलब्ध हो ताकि रोजगार के अवसर अधिक से अधिक संस्थाओं में उपलब्ध हो सकें। प्राविधिक संस्कृत शैक्षिक उपकरण निर्माण कार्यशाला कानपुर से प्रेरणा लेकर देश की विभिन्न संस्थायें इस प्रकार का आयोजन करने लगी लगी है। कई अणुशिक्षण का निर्माण हुआ है। संस्कृत व्याकरण के लिए अनेक संसाधन निर्मित किये गये तथा किये जा रहे हैं। लघु चलचित्र, गीत संगीत द्वारा संस्कृत भाषा को जन जन तक पहुँचाया जा रहा है।

क्या हम बदलाव के लिए तैयार हैं?

कई बार हम कार्य करने में असफल होते हैं फिर भी वह असफलता दूसरों के लिए मार्गदर्शिका होती है। हमें शिक्षा सुधार तथा रोजगार के अवसर सृजित करने हेतु नित्य नये प्रयोग को करते रहने की आवश्यकता है। हमें स्वयं के ज्ञान को अद्यतन रखना होगा। इस क्षेत्र में कार्य करने वालों की संख्या अल्प है, जबकि लक्ष्य विस्तृत। हमें अपने हितों की सुरक्षा के लिए सजग रहना होगा। अतः कुछ लोग शिक्षण, कुछ लोग संगठन और कुछ लोग प्रबोधन का कार्य करें। सभी लोगों में सामंजस्य हो। इससे परिणाम पाना सरल होगा। कई बार हम अंग्रेजी तथा तकनीकी शिक्षा के बढ़ते दायरे को देखकर समय को कोसते हैं। हमें उनके सांगठनिक स्वरूप तथा कार्य पद्धति से सीख लेने की आवश्यकता है। वे योजनाबद्ध तरीके से कार्य करते हैं। वे बढ़ती नगरीय संस्कृति, गांव से शहर की ओर पलायन को  ध्यान में रखकर नई आवासीय कॉलोनियों के इर्द-गिर्द अपने विद्यालय हेतु भूमि की व्यवस्था कर लेते हैं। उस क्षेत्र में अनेक संगठन कार्यरत हैं। एक संगठन अपने विद्यालयों की शाखा का विस्तार अनेकों शहर में करते हैं। वहां सामूहिक चेतना कार्य करती है। संस्कृत क्षेत्र में भी जिन शिक्षण संस्थाओं का संचालन संगठन द्वारा किया जा रहा है, उनकी स्थिति अच्छी है। जैसे आर्य समाज द्वारा संचालित विद्यालय। जब हम किसी समूह या संगठन के तहत विद्यालयों का संचालन करते हैं तो उसकी एक भव्य रूपरेखा होती है, भविष्य की चिंता होती है, जिसमें प्रचार, शिक्षा सुधार, प्रतिस्पर्धा,पूंजी निवेश होते रहता है। संगठित संस्था द्वारा विद्यालयों की श्रृंखला शुरु करने से दीर्घकालीन नीति बनाने, समसामयिक समस्या का हल ढूंढने, सामाजिक परिवर्तन लाने में सुविधा होती है। कुल मिलाकर केवल संस्कृत शिक्षा के पाठ्यक्रम मात्र में सुधार  कर देने से रोजगार के अवसर नहीं बढ़ सकते। संस्थाओं को सांगठनिक रूप देने, प्रतिस्पर्धी माहौल तैयार करने एवं पूंजी निवेश के उपाय ढूंढने से काफी हद तक बदलाव देखा जा सकता है।

नोट- मेरा यह लेख संस्कृतसर्जना ई-पत्रिका में प्रकाशित हो चुका है।
Share:

अनुवाद सुविधा

ब्लॉग की सामग्री यहाँ खोजें।

लोकप्रिय पोस्ट

जगदानन्द झा. Blogger द्वारा संचालित.

मास्तु प्रतिलिपिः

इस ब्लॉग के बारे में

संस्कृतभाषी ब्लॉग में मुख्यतः मेरा
वैचारिक लेख, कर्मकाण्ड,ज्योतिष, आयुर्वेद, विधि, विद्वानों की जीवनी, 15 हजार संस्कृत पुस्तकों, 4 हजार पाण्डुलिपियों के नाम, उ.प्र. के संस्कृत विद्यालयों, महाविद्यालयों आदि के नाम व पता, संस्कृत गीत
आदि विषयों पर सामग्री उपलब्ध हैं। आप लेवल में जाकर इच्छित विषय का चयन करें। ब्लॉग की सामग्री खोजने के लिए खोज सुविधा का उपयोग करें

समर्थक एवं मित्र

सर्वाधिकार सुरक्षित

विषय श्रेणियाँ

ब्लॉग आर्काइव

Recent Posts

लेखानुक्रमणी

लेख सूचक पर क्लिक कर सामग्री खोजें

अभिनवगुप्त (1) अलंकार (3) आधुनिक संस्कृत गीत (16) आधुनिक संस्कृत साहित्य (5) उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान (1) उत्तराखंड (1) ऋग्वेद (1) ऋषिका (1) कणाद (1) करवा चौथ (1) कर्मकाण्ड (47) कहानी (1) कामशास्त्र (1) कारक (1) काल (2) काव्य (18) काव्यशास्त्र (27) काव्यशास्त्रकार (1) कुमाऊँ (1) कूर्मांचल (1) कृदन्त (3) कोजगरा (1) कोश (12) गंगा (1) गया (1) गाय (1) गीति काव्य (1) गृह कीट (1) गोविन्दराज (1) ग्रह (1) छन्द (6) छात्रवृत्ति (1) जगत् (1) जगदानन्द झा (3) जगन्नाथ (1) जीवनी (6) ज्योतिष (20) तकनीकि शिक्षा (21) तद्धित (11) तिङन्त (11) तिथि (1) तीर्थ (3) दर्शन (19) धन्वन्तरि (1) धर्म (1) धर्मशास्त्र (14) नक्षत्र (2) नाटक (4) नाट्यशास्त्र (2) नायिका (2) नीति (3) पतञ्जलि (3) पत्रकारिता (4) पत्रिका (6) पराङ्कुशाचार्य (2) पर्व (2) पाण्डुलिपि (2) पालि (3) पुरस्कार (13) पुराण (3) पुस्तक (1) पुस्तक संदर्शिका (1) पुस्तक सूची (14) पुस्तकालय (5) पूजा (1) प्रतियोगिता (1) प्रत्यभिज्ञा शास्त्र (1) प्रशस्तपाद (1) प्रहसन (1) प्रौद्योगिकी (1) बिल्हण (1) बौद्ध (6) बौद्ध दर्शन (2) ब्रह्मसूत्र (1) भरत (1) भर्तृहरि (2) भामह (1) भाषा (2) भाष्य (1) भोज प्रबन्ध (1) मगध (3) मनु (1) मनोरोग (1) महाविद्यालय (1) महोत्सव (2) मुहूर्त (1) योग (5) योग दिवस (2) रचनाकार (3) रस (1) रामसेतु (1) रामानुजाचार्य (4) रामायण (4) रोजगार (2) रोमशा (1) लघुसिद्धान्तकौमुदी (46) लिपि (1) वर्गीकरण (1) वल्लभ (1) वाल्मीकि (1) विद्यालय (1) विधि (1) विश्वनाथ (1) विश्वविद्यालय (1) वृष्टि (1) वेद (6) वैचारिक निबन्ध (26) वैशेषिक (1) व्याकरण (46) व्यास (2) व्रत (2) शंकाराचार्य (2) शरद् (1) शैव दर्शन (2) संख्या (1) संचार (1) संस्कार (19) संस्कृत (15) संस्कृत आयोग (1) संस्कृत कथा (11) संस्कृत गीतम्‌ (50) संस्कृत पत्रकारिता (2) संस्कृत प्रचार (1) संस्कृत लेखक (1) संस्कृत वाचन (1) संस्कृत विद्यालय (3) संस्कृत शिक्षा (6) संस्कृत सामान्य ज्ञान (1) संस्कृतसर्जना (5) सन्धि (3) समास (6) सम्मान (1) सामुद्रिक शास्त्र (1) साहित्य (7) साहित्यदर्पण (1) सुबन्त (6) सुभाषित (3) सूक्त (3) सूक्ति (1) सूचना (1) सोलर सिस्टम (1) सोशल मीडिया (2) स्तुति (2) स्तोत्र (11) स्मृति (12) स्वामि रङ्गरामानुजाचार्य (2) हास्य (1) हास्य काव्य (2) हुलासगंज (2) Devnagari script (2) Dharma (1) epic (1) jagdanand jha (1) JRF in Sanskrit (Code- 25) (3) Library (1) magazine (1) Mahabharata (1) Manuscriptology (2) Pustak Sangdarshika (1) Sanskrit (2) Sanskrit language (1) sanskrit saptaha (1) sanskritsarjana (3) sex (1) Student Contest (2) UGC NET/ JRF (4)