पुरस्कार का नाम
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वर्ष 1992
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विश्वभारती
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श्री विद्यानिवास मिश्र, गोरखपुर
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विशिष्ट
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डॉ0
रामकरण शर्मा,दिल्ली
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विशिष्ट
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डॉ0
गोपाल दत्त पाण्डेय, वाराणसी
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विशिष्ट
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डॉ0
कपिल देव द्विवेदी,वाराणसी
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वेदपण्डित
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श्री चिन्तामणि दीक्षित महाड़कर, वाराणसी
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वेदपण्डित
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श्री रवि मुरलीधर ताम्बे, वाराणसी
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वेदपण्डित
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श्री मोहनप्रसाद उपाध्याय,वाराणसी
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वेदपण्डित
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श्री इन्द्रनारायण झा, वाराणसी
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वेदपण्डित
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डॉ0
केशव प्रसाद मिश्र, देवरिया
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वेदपण्डित
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श्री बनवारी लाल शास्त्री, मुरादाबाद
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वेदपण्डित
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डॉ0
श्री किशोर मिश्र,वाराणसी
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वेदपण्डित
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श्री शालिग्राम दामोदर त्रिवेदी, वाराणसी
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वेदपण्डित
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श्री सुरेश चन्द्र त्रिपाठी, कानपुर
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वेदपण्डित
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श्री वीरेश्वर शास्त्री द्रविड़, वाराणसी
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नामित
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प्रो0
सत्य प्रकाश सिंह , अलीगढ़
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नामित
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प्रा0
काशीनाथ मिश्र, पटना
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नामित
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डॉ0
सुश्री विमला कर्णाटक, वाराणसी
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विशेष
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डॉ0
जनार्दन गंगाधर रटाटे, वाराणसी
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विशेष
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डॉ0
किशोर नाथ झा, वाराणसी
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विशेष
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डॉ0
शीतला प्रसाद उपाध्याय, वाराणसी
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विशेष
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डॉ0
भास्कराचार्य त्रिपाठी, भोपाल
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विशेष
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डॉ0
राजकिशोर मणि त्रिपाठी, गोरखपुर
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विशेष
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प्रो0
महेश तिवारी, दिल्ली
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विविध
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श्री हरिहरानन्द, बलिया
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विविध
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डॉ0
कृष्णदत्त शर्मा, गाजियाबाद
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विविध
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डॉ0
रामकिशोर शुक्ल, जयपुर
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विविध
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प्रो0
राजेन्द्र मिश्र, शिमला
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विविध
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डॉ0
रमाकान्त शुक्ल, नई दिल्ली
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विविध
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डॉ0
कुॅवर लाल जैन, दिल्ली
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विविध
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डॉ0
ज्ञानचन्द्र शास्त्री, हरिद्वार
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विविध
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डॉ0
भगीरथ प्रसाद त्रिपाठी, वाराणसी
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विविध
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स्वामी काशिकानन्द गिरि, वाराणसी
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विविध
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श्री धर्मदत्त चतुर्वेदी, वाराणसी
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विविध
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डॉ0
विश्म्भरदयाल अवस्थी, बॉदा
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विविध
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डॉ0
कैलाशनाथ द्विवेदी, जालौन
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विविध
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डॉ0
आशाराम त्रिपाठी, लखनऊ
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विविध
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डॉ0
इच्छाराम द्विवेदी, मैनपुरी
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विविध
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डॉ0
सुद्युम्न आचार्य, बलिया
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विविध
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डॉ0
इन्द्रदेव द्विवेदी
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विविध
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आचार्च भास्करानन्द लोहनी, लखनऊ
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विविध
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डॉ0
जी0एस0आर0 कृष्ण मूर्ति , लखनऊ
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विविध
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डॉ0
रामनारायण मिश्र, इलाहाबाद
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विविध
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श्री वीरेन्द्रमुनि सरस्वती, लखनऊ
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उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान पुरस्कार 1992
अक्षय तृतीया
वैशाख शुक्ल तृतीया की तिथि का नाम अक्षय तृतीया है। इस समय ग्रीष्म ऋतु के अनाज- जौ, गेहूँ आदि तैयार होकर घरों में आ जाते हैं । हमारे देश की प्राचीन प्रथाओं के अनुसार दान के बाद भोजन का नियम है । आज के दिन जौ के दान का बड़ा महत्त्व माना जाता है। 'यवोऽसि धान्यराजोऽसि' अर्थात् - 'तुम जौ हो, तुम धान्यों के राजा हो।' श्रीमद्भागवत में श्री कृष्ण ने उद्धव से कहा है कि – 'औषधीनामहं यवः' अर्थात् - औषधीय पौधों में 'यव' मेरा स्वरूप है । इससे यव के औषधीय गुण को समझा जा सकता है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश में यह अनुभूतियाँ कितने महत्त्व की हैं, इसकी व्याख्या अत्यन्त मधुर और राष्ट्रहित की दृष्टि से उपयोगी है। मान्यता है कि इसी तिथि से सतयुग का आरंभ हुआ था। इस दिन किए गए दान, जप आदि के फल का क्षय नहीं होता। इसी तिथि को नर-नारायण, परशुराम और हयग्रीव का अवतार हुआ। यह तिथि यदि सोमवार, कृतिका या रोहिणी नक्षत्र के साथ पड़ती है तो और भी उत्तम मानी जाती है। व्रत के रूप में अक्षय तृतीया का विशेष माहात्म्य है। प्रसिद्ध तीर्थ बदरीनाथ के कपाट इसी तिथि को खुलता है। इस दिन जल से पूर्ण पात्र, पंखा, जौ का सत्तू, गुड़, दही आदि वस्तुओं का दान दिया जाता है।
अक्षय तृतीया की कथा
बहुत प्राचीन काल में हैहय नरेश
कार्तवीर्य अर्जुन ने परशुराम के पिता जमदाग्नि के पास कामधेनु गाय देखी जो मनुष्य
की सभी अभि- लाषाओं को पूर्ण करती थी। कार्तवीर्य ने गाय उनसे माँगी और उनके मना
करने पर उसने उन्हें मार डाला । संयोगवश उस समय परशु- राम वहाँ नहीं थे। वह जब
कहीं से वापस लौटे तब उन्होंने अपनी माता से सारा हाल सुना। इससे उनका क्रोध भड़क
उठा। उन्होंने महिष्मती नगर में पहुँचकर कार्तवीर्य को ललकारा और उसकी प्रसंख्य
सेना सहित उसका संहार किया। उसके अन्य साथी परशुराम से बदला लेने के लिए दौड़
पड़े। इक्कीस बार उन्होंने इस धरती के बड़े-बड़े क्षत्रिय योद्धाओं का विनाश किया
और उनके द्वारा किए जाने वाले उम्र कर्मों से अनेक पीड़ितों को बचाया।
जनकपुर
के सीता स्वयंवर में श्री राम के द्वारा शिव का धनुर्भंग सुनकर परशुराम दौड़ पड़े
परन्तु श्री राम के शील-सौजन्य से प्रसन्न होकर उन्होंने अपना धनुष और वाण श्री
राम को समर्पण करके संन्यस्त जीवन व्यतीत करने का संकल्प ले लिया। आसाम राज्य की
उत्तरी पूर्वी सीमा पर, जहाँ से ब्रह्मपुत्र नद भारत में
प्रवेश करता है, वहाँ एक परशुराम कुंड है, वहीं
उन्होंने अपने परशु का त्याग किया। यह भी अनुमान है कि इसी कुंड को खोदकर परशुराम
ने ब्रह्मपुत्र को भारत भूमि में लाने का स्तुत्य प्रयत्न किया । जयन्ती मनाने का
विधान भी संभवतः तभी से प्रचलित हुआ होगा। अक्षय तृतीया उन्हीं पराक्रमी परशुराम
के शौर्य, सेवा और संयम की कथा सुनाती है ।
तर्पण विधि

येऽअग्निजिह्नाऽउत वा यजत्राऽआसद्यास्मिन्वर्हिषि मादयद्ध्वम्॥ (शु. यजु. 33।53)
ये तर्पणेऽत्रा विहिताः सावधाना भवन्तु ते॥
देवतर्पण
ऊँ प्रजापतिस्तृप्यताम्। ऊँ देवास्तृप्यन्ताम्। ऊँ छन्दांसि तृप्यन्ताम्।
ऊँ वेदास्तृप्यन्ताम्। ऊँ ऋषयस्तृप्यन्ताम्। ऊँ पुराणाचार्यास्तृप्यन्ताम्।
ऊँ गन्धर्वास्तृप्यन्ताम्। ऊँ इतराचार्यास्तृप्यन्ताम्। ऊँ संवत्सरः सावयवस्तृप्यताम्। ऊँ देव्यस्तृप्यन्ताम्। ऊँ अप्सरसस्तृप्यन्ताम्।
ऊँ देवानुगास्तृप्यन्ताम्। ऊँ नागास्तृप्यन्ताम्। ऊँ सागरास्तृप्यन्ताम्।
ऊँ पर्वतास्तृप्यन्ताम्। ऊँ सरितस्तृप्यन्ताम्। ऊँ मनुष्यास्तृप्यन्ताम्।
ऊँ यक्षास्तृप्यन्ताम्। ऊँ रक्षांसि तृप्यन्ताम्। ऊँ पिशाचास्तृप्यन्ताम्।
ऊँ सुपर्णास्तृप्यन्ताम्। ऊँ भूतानि तृप्यन्ताम्। ऊँ पशवस्तृप्यन्ताम्।
ऊँ वनस्पतयस्तृप्यन्ताम्। ऊँ ओषधयस्तृप्यन्ताम्।ᅠऊँᅠभूतग्रामश्चतु-
र्विधस्तृप्यताम्।
ऊँ पुलस्त्यस्तृप्यताम्। ऊँ पुलहस्तृप्यताम्। ऊँ क्रतुस्तृप्यताम्।
ऊँ वसिष्ठस्तृप्यताम्। ऊँ प्रचेतास्तृप्यताम्। ऊँ भृगुस्तृप्यताम्।
ऊँ नारदस्तृप्यताम्॥
दिव्य मनुष्य तर्पण-
ऊँ सनातनस्तृप्यताम्॥2॥ ऊँ कपिलस्तृप्यताम्॥2॥
ऊँ आसुरिस्तृप्यताम्॥2॥ ऊँ वोढुस्तृप्यताम्॥2॥
ऊँ पञ्चशिखस्तृप्यताम्॥2॥
दिव्य पितृ तर्पण-
स्वधा नमः।3॥ ऊँ सोमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः॥3॥ ऊँ यमस्तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः।3॥ ऊँ अर्यमा तृप्यताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तस्मै स्वधा नमः।3॥ ऊँ अग्निष्वात्ताः पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्यः स्वधा नमः।3॥ ऊँ सोमपाः पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्यः स्वधा नमः।3॥ ऊँ बर्हिषदः पितरस्तृप्यन्ताम् इदं सतिलं जलं (गङ्गाजलं वा) तेभ्यः स्वधा नमः।3॥
मनुष्य पितृ तर्पण
ॐ आयन्तु नः पितरः सौम्यासोऽग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानैः ।
अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान् । (शुक्ल. मज. 19।58)
असुं यऽ ईयुरवृका ᅠऋतज्ञास्ते नोऽवन्तु पितरो हवेषु॥ (यजु. 19। 49)
तेषां वयं सुमतो यज्ञियानामपि भद्रे सौमनसे ᅠस्याम॥ (यजु. 19। 50)
अस्मिन्यज्ञे स्वधया मदन्तोऽधिब्रुवन्तु तेऽवन्त्वस्मान्॥ (यजु. 19। 58)
स्वधास्थ तर्पयत मे पितघ्घ्न्। (यजु. 2। 34)
स्वधा नमः प्रतिपतामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधा नमः।
अक्षन्पितरोऽमीमदन्त पितरोऽतीतृपन्त पितरः पितरः शुन्धध्वम्। (यजु. 19। 36)
इसके बाद द्वितीय गोत्र मातामह आदि का तर्पण करे, यहाँ भी पहले की ही भांति निम्नलिखित वाक्यों को तीन-तीन बार पढ़कर तिलसहित जल की तीन-तीन अञ्जलियाँ पितृतीर्थ से दे। यथा -
स्वधा नमः॥3॥
पत्न्यादि तर्पण
पिशाचा गुह्मकाः सिद्धाः कूष्माण्डास्तरवः खगाः ॥
जलेचरा भूनिलया वाय्वाधाराश्च जन्तवः ।
नरकेषु समस्तेषु यातनासु च ये स्थिताः ।
तेषामाप्यायनायैतद् दीयते सलिलं मया ॥
येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः ।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु ये चास्मत्तोयकाङि्क्षणः ॥
ऊँ आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं देवर्षिपितृमानवाः ।
तृप्यन्तु पितरः सर्वे मातृमातामहादयः ॥
अतीतकुलकोटीनां सप्तद्वीपनिवासिनाम् ।
आब्रह्मभुवनाल्लोकादिदमस्तु तिलोदकम् ॥
येऽबान्धवा बान्धवा वा येऽन्यजन्मनि बान्धवाः ।
ते सर्वे तृप्तिमायान्तु मया दत्तेन वारिणा ॥
वस्त्र निष्पीडन
ते गृह्णन्तु मया दत्तं वस्त्रानिष्पीडनोदकम्॥
भीष्म तर्पण
गङ्गापुत्राय भीष्माय प्रदास्येऽहं तिलोदकम्।
अपुत्राय ददाम्येतत्सलिलं भीष्मवर्मणे॥
अर्घ्यदान-
स बुध्न्या ऽउपमा ऽअस्य व्विष्ठाः सतश्च योनिमसतश्च व्विवः॥ (शु. य. 13।3)
ऊँ ब्रह्मणे नमः। ब्रह्माणं पूजयामि॥
ऊँ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रोधा निदधे पदम्।
समूढमस्यपाँ सुरे स्वाहा॥ (शु.य. 5।15)
ऊँ विष्णवे नमः। विष्णुं पूजयामि॥
ऊँ नमस्ते रुद्र मन्यव ऽउतो त ऽइषवे नम :।
बाहुभ्यामुत ते नमः॥ (शु. य. 16।1)
ऊँ रुद्राय नमः। रुद्र्रं पूजयामि॥
ऊँ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो नः प्रचोदयात्॥ (शु.य. 36।3)
ऊँ सवित्रो नमः। सवितारं पूजयामि॥
ऊँ मित्रास्य चर्षणीधृतोऽवो देवस्य सानसि।ᅠद्युम्नं चित्राश्रवस्तमम्॥ (शु. य. 11।62)
ऊँ मित्रााय नमः। मित्रं पूजयामि॥
ऊँ इमं मे व्वरुण श्रुधी हवमद्या च मृडय। त्वामवस्युराचके॥ (शु. य. 21।1)
ऊँ वरुणाय नमः। वरुणं पूजयामि॥
मनसस्पत ऽइमं देव यज्ञँ स्वाहा व्वाते धाः॥ (शु. य. 2।21)