इतनी यादें मत आया कर (हुलासगंज संस्मरण 1)


लिखना मेरा स्वभाव रहा है। बचपन से ही हर बात पर लेखनी चलाने का शौक। श्री स्वामी पराङ्कुशाचार्य के नाम से निर्मित संस्कृत उच्च विद्यालय तथा महाविद्यालय में मैं पढ़ चुका हूँ। यह जहानाबाद जिले के हुलासगंज में अवस्थित है। आज भी सोते जागते उठते बैठते हमेशा हुलासगंज की याद आती है। वे बीते दिन याद आते हैं,जब मैं कक्षा प्रथमा और मध्यमा में वहां पर रहा था। यह बुद्ध, महावीर, आर्यभट्ट, वाणभट्ट तथा वाग्भट्ट जैसे विद्वानों की कर्मस्थली रही है। यहाँ से 40 कि. मी. दूर गया हिन्दुओं का पवित्र प्राचीन तीर्थस्थल है। दूसरी ओर संसार को अपने ज्ञान से आलोकित करने वाला नालन्दा तथा पौराणिक आख्यानों को समेटे मगध की प्राचीन राजधानी राजगृह। अवलोकितेश्वर बुद्ध की प्रतिमा यहाँ के प्रत्येक गाँव में विखरे पडे हैं। इस प्रकार यह क्षेत्र आस्था, ज्ञान विज्ञान, कला,दर्शन तथा राजनीति का केन्द्र रहा है। 
       मगध क्षेत्र में वैष्णव संतों द्वारा संस्कृत के द्वारा सामाजिक क्रान्ति और अपने बचपन के बीते उन दिनों सोचते-सोचते सारे विचार एक साथ मिश्रित हो जाते हैं। कुछ सुखद घटनायें तो कुछ दुखद घटनायें मुझे आन्दोलित करतीं हैं। वहाँ के सन्तों का अनन्य स्नेह, उनके व्यक्तित्व का अनुकरण हममें रोमांच भर देता है। हुलासगंज से मेरा बौद्धिक कम, भावात्मक लगाव अधिक रहा है। आखिर वहीं मेरा बचपन बीता। जीवन की खट्टी मीठी यादें, मेरे बाल सखा, मेरे गुरु, मेरे उपास्य इष्टदेव, वहाँ का तत्कालीन प्राकृतिक वैभव सब मिलकर मुझे लिखने ही नहीं देता और लिखे विना रहने भी नहीं देता। मैं बेचैन हूँ, सब कुछ व्यतिक्रम। आपको भी इसी क्रम में पढ़ना पड़ेगा।

पृष्ठभूमि

मैं हुलासगंज का संस्मरण लिखूँ  इसके पूर्व रामानुज सम्प्रदाय का दक्षिण बिहार तक आगमन का संक्षिप्त इतिहास बताना जरुरी समझता हूँ। दक्षिण बिहार में राजेंद्र सुरी के शिष्य श्री स्वामी परांकुशाचार्य सर्वप्रथम भुमिहार वैष्णव संत हुए। इनकी कर्मभूमि मगध के वर्तमान चारों जनपद तथा पटना प्रमंडल के कुछ जनपद थी। राजेंद्र सुरी के गुरु रंगदेशिक स्वामी वृंदावन के महान श्रीवैष्णव संत थे। उत्तर भारत में रामानुज वैष्णव सम्प्रदाय के विस्तार का श्रेय इन्हीं राजेंद्र सुरी को जाता है। श्री परमहंस स्वामी राजेन्द्र सूरि जी महाराज की जीवनी नामक एक पुस्तक श्री परांकुश संस्कृत संस्कृति संरक्षा परिषद्, हुलासगंज, गया, बिहार से प्रकाशित है। कृष्णप्रपन्नाचारी द्वारा लिखित दिव्यचरितामृतम् पुस्तक में गुरु परम्परा का विस्तृत इतिहास उपलब्ध है।
उत्तर भारत में रामानुज सम्प्रदाय की स्थापना
वरवरमुनि स्वामी (उन्हें मामला मुनि, राम्या जमत्री भी कहा जाता था) ने समस्त भारत को आठ भागों में बांटकर आठ पीठों की स्थापना की। सभी पीठों की अध्यक्षता उनके ही शिष्यों ने की। यह कंडदै अन्नान ही थे, जिन्होंने उत्तर भारत के वृंदावन में, गोवर्धन पीठ के कार्यभार को लिया। यही कारण है कि इस पीठ को अन्नान पीठ भी कहा जाता है। उत्तर भारत में रामानुज सम्प्रदाय का प्रसार वैष्णव संतों की विविध शाखा के माध्यम से हुआ तथापि मुख्य द्वार वृंदावन के गोवर्धन पीठ को माना जाता है। दक्षिण भारत से उत्तर भारत (वृन्दावन) तक रामानुज सम्प्रदाय की गुरु शिष्य परम्परा तथा वृन्दावन से दक्षिण बिहार तक की परम्परा को जानने का मुख्य स्रोत तनया है। 
रामानुज परम्परा में तनया का विशेष महत्व है,यूँ तो इसका गायन गुरु के सश्रद्ध नमन के लिए किया जाता है,परन्तु इससे आचार्य शिष्य परम्परा को समझने में भी अत्यन्त सहायता मिलती है। वन्दे गुरु परम्पराम्। ऐतिह्य साक्ष्य के लिए यहाँ गुरु परम्परा उद्धृत है।
वाधूलवंश कलशाम्बुधिपूर्णचन्द्रं श्री श्रीनिवासगुरूवर्यपदाव्जभृङ्गम्।
श्रीवाससूरी तनयं विनयोज्जवलन्तं श्रीरंगदेशिकमहं शरणं प्रपद्ये।।
भारद्वाजान्वावय धृततनुममलम् वैष्णवेषु अग्रगण्यम् ।
श्रीमत्रंगार्यवर्यांमलपदकमले न्यस्तविश्वात्मभारम् ।।
तद्पादाम्भोज भृङ्गम् तद्मृत कृपया प्राप्तसंमंत्र- राजम्।
श्रीमत् राजेन्द्रसूरि वरगुणनिलयं धामराशिमश्रयेऽहम्।।
कौडिण्यगोत्र सरसीरूह बालभानुम्।
 श्रीरंगदेशिक पदाब्जरसैक भृङ्गम्।।
श्रीराजेन्द्रसूरि चरणाश्रितमप्रमेयम्।
 श्रीमत् पराङ्कुशगुरूं शरणं प्रपद्ये ।
राजेन्द्राचार्य / परमहंस सूरि का वृन्दावन में आगमन
श्री राजेन्द्रयतीन्द्रपादयुगले सद्भक्तिमानवहम्
राजेन्द्र सूरी परमहंस का जन्म 22 मार्च 1853 मंगलवार को नैमिषारण्य से 67 KM उत्तर पूर्व मिश्र की मिठौली नामक ग्राम जिला खीरी, उत्तर प्रदेश में हुआ। इनके पिता का नाम अयोध्या मिश्र था। माँ के द्वारा संतों की सेवा में यथोचित सत्कार की कमी से खिन्न होकर ये वृन्दावन चले गये। दक्षिण से ब्रज में आए आये रंगदेशिक स्वामी के पढ़ने-लिखने की व्यवस्था श्रीनिवासाचार्य ने की । उस समय गद्दी पर श्रीनिवासाचार्य विद्यमान थे। श्रीरंगदेशिक स्वामी का जैन परिवार से सम्बन्ध तथा श्री राधाकृष्ण जैन की पुत्री से विधिवत् इनके विवाह की कथा प्रचलित है। दूसरे कथानक के अनुसार श्रीवैष्णव शास्त्रों की भक्ति और विद्वानों से प्रभावित होकर, दो धनी भाइयों, राधा-कृष्ण (लक्ष्मीदास) और मथुरा के गोविंद दास, श्री रंगादेशिक स्वामी के अनुयायी बन गए।  रंगदेशिक स्वामी अपने स्वसुर श्रीराधाकृष्ण के साथ श्रीरंगनाथ भगवान् के दर्शन करने गए। गोदाम्मा की तीसरी इच्छा थी कि वे  वृन्दावन में वास करें। श्रीरंगनाथ भगवान् से मंदिर स्थापना की अनुमति प्राप्त कर उनकी मूर्ति की व्यवस्था की गयी । मद्रास से 40 कि.मी. दूर पेरुम्बदूर में भगवान् श्रीरंगनाथ की प्राण-प्रतिष्ठा का कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। इसी के बाद स्वसुर राधाकृष्ण के साथ विधि विधान से अर्चना पूजन करते हुए श्रीरंगदेशिक स्वामी  श्रीरंगनाथ जी को लेकर वृन्दावन आ पहुँचे। सर्वप्रथम वृन्दावन पहुँचकर अक्रूर घाट के पास भतरोंड़ बगीची में पश्चात् प्रतिष्ठा होने तक लक्ष्मीनारायण मंदिर में रहे। दोनों भाईयों (श्रीलक्ष्मीचंद तथा गोविंद) के सहयोग से रंगदेशिक स्वामी तमिलनाडु में श्रीविल्लिपुत्तुर के अंदल मंदिर की शैली का अनुसरण करते हुए  7 वर्ष में मंदिर बनवाया। गोदारंगमन्नार भगवान साक्षात् लक्ष्मी-नारायण के अवतार हैं। । मंदिर का काम 1845 में शुरू हुआ और इस मंदिर की स्थापना  25/10/1851 को श्रीरंगदेशिक स्वामी के हाथों से हुई थी। 7 परकोटों में जड़ा हुआ मंदिर तथा सुवर्ण-इन्द्रासन आदि दर्शकों को चमत्कृत कर देते हैं। साठ फुट ऊँचा सोने का खम्भा देखते ही बनता है। कहा जाता है कि उस समय मंदिर निर्माण में 45 लाख रूपये खर्च हुए थे। मंदिर में श्री गोदा रंगमन्नार भगवान विग्रह विराजित है । महत्वपूर्ण मान्यताए देवताओं अंदल, रंगनाथ स्वामी, और गरुड़ (भगवान के पार्षद) की हैं। मंदिर अब श्री रंग मंदिर, वृंदावन के रूप में जाना जाता है।
रंगदेशिक स्वामी के शिष्य का नाम परमहंस सुरी है। परमहंस सूरी सैकडों शिष्यों के साथ विचरण करते हुए तरेत पधारे। यहाँ रहते हुए आश्रम की स्थापना की। इनके अनेकों प्रभावशाली शिष्यों में दो प्रमुख संत हुए 1-परांकुशाचार्य 2- वासुदेवाचार्य। वासुदेवाचार्य कान्यकुब्ज ब्राह्मण थे,जबकि परांकुशाचार्य भूमिहार ब्राह्मण।

श्रीस्वामी परांकुशाचार्य जी 
श्रीस्वामी परांकुशाचार्य जी का जन्म 10 मार्च 1865 तदनुसार फाल्गुन शुक्ल त्रयोदशी शुक्रवार संवत् 1921 को नौवतपुर के समीप अवस्थित महमत्पुर गॉंव के कौण्डिन्य गोत्रीय आथर्वणिक ब्राह्मण कुल में श्री रामधीन शर्मा एवं श्रीमती रामसखी देवी के द्वितीय पुत्र के रूप में हुआ।  बचपन में आप पारसनाम से पुकारे जाते थे। समयानुसार बभनलई ग्राम के भारद्वाजगोत्रीय श्री नरसिंह नारायण शर्मा की पुत्री के साथ परिणय सूत्र में बंधकर आपका गृहास्थाश्रम में प्रवेश हुआ तथा एक पुत्ररत्न भी प्राप्त हुआ। इस तरह से गृहास्थाश्रम के मुख्य उद्देश्य पितृ ऋण से आप मुक्त हुए। बचपन से ही संगीत के माध्यम से रामचरित मानस की सस्वर प्रस्तुति में आपकी अभिरूचि थी। एक दिन स्वामी परमहंस सूरि जी के स्वागत में गॉंव मे मानस प्रस्तुति का आयोजन हुआ। प्रस्थान के पूर्व स्वामी परमहंससूरि जी ने आपके बड़े भाई श्रीजुदागी शर्मा से आपको अपने लिया मांगा। घर गृहस्थी के कारण प्रारंभ में भाई को संकोच तो हुआ परंतु उन्होंने अपनी स्वीकृति देते हुए कहा कि पारस भी आपका ही है।
दक्षिण भारत की यात्रा
कुछ समय बीता और स्वामी परमहंससूरि जी तरेत स्थान से दक्षिण भारत की यात्रा पर निकल गये। इधर पारस जी का मन स्वामी जी में ही लगा रहता था। एक दिन पारस जी अस्वस्थ हुए और दिन- प्रतिदिन रोग बढ़ता ही गया। स्थिति ऐसी आ गयी कि सबलोग इनके जीवन से निराश होने लगे। इसी बीच अचानक स्वामी परमहंससूरि जी का तरेत में पदापर्ण हुआ। पारस उन्हें देखते ही स्वस्थ हो गये। इनकी अनेक रोचक कहानियां प्रसिद्ध हैं। 

श्रीस्वामी परांकुशाचार्य  और उनकी शिष्य परम्परा
हजारो गॉंव के लोग श्रीस्वामी जी से दीक्षा प्राप्त कर श्रीवैष्णव बने। श्रीस्वामी जी के संरक्षण में हजारों श्रीवैष्णव संस्कृत शिक्षा प्राप्त कर गृहस्थ जीवन अपनाते हुए अध्यापन आदि कार्य में लग गये। कुछेक शिष्यों ने विरक्त जीवन को चुना एवं  श्रीवैष्णव मत के प्रचार प्रसार में जीवन दानी हो गये। संवत् 2036 फाल्गुन कृष्ण नवमी को परांकुशाचार्य इहलोक की लीला पूर्ण कर परलोक सिधारे।  अधिक जानकारी के लिए श्रीस्वामी परांकुशाचार्य  पर चटका लगायें।  श्रीस्वामी जी के शिष्यों में रङ्गरामानुजाचार्य का महत्तम स्थान है, मेरे आप दीक्षा गुरु हैं। मेरी जीवन गाथा इन्हीं से जुडती है,अतः श्रीस्वामी रङ्गरामानुजाचार्य की जीवन गाथा यहॉं प्रस्तुत करना अपरिहार्य है।

  श्री स्वामी रङ्गरामानुजाचार्य का आविर्भाव एवं शिक्षा   
                                                                    

                    तनया                            
श्रीराजेन्द्रयतीन्द्रपादयुगले  सद्भक्तिमानन्वहम्
कौण्डिन्यकुले पराङ्कुशमुनिर्जातोमहाब्धौविधुः।
तत्पादाश्रित लब्धबोध निखिलं श्रीरङ्गरामानुजम्
श्रीमत्काश्यपवंशजं गुरूवरं भक्त्या सदासंश्रये।।
कश्यप कुल में प्रादुर्भूत श्री स्वामी रङ्गरामानुज की भक्ति का आश्रय लेता हूँ जो परमहंस स्वामी राजेन्द्र सूरि जी की भक्ति में प्रवीण पूर्णचंद्रमा की तरह अवतरित श्रीकौण्डिन्य गोत्रिय स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य जी के चरणाश्रित होकर समस्त वेदशास्त्र के ज्ञान में निष्णात हुए हैं।
         श्री स्वामी रङ्गरामानुज जी का आविर्भाव वि. संवत् 1989 आश्विन शुक्ल एकादशी तदनुसार 10 अक्टूवर 1932 को धनिष्ठा नक्षत्र में वर्तमान जिला जहानाबाद के मिर्जापुर गॉंव में हुआ है। दीक्षा लेने के पूर्व इनके बचपन का नाम  श्री रूपदेव था। इनके पिता श्रीरामसेवक शर्मा जी के दो पुत्र हैं : श्री विशुनदेव शर्मा एवं श्री रूपदेव जी। गॉंव में तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई के बाद पारिवारिक परिस्थितिवश ये खेती एवं गोपालन में पिताजी की सहायता करने में लग गये। दिन में विश्राम की अवधि में गॉंव में ही स्थापित स्वामी श्री पराङ्कुशाचार्य पुस्तकालयसे पुस्तकें लेकर पढ़ते रहते थे। पढ़ाई लिखाई के प्रति अभिरूचि देखकर पिताजी ने इन्हें शकुराबाद के उच्च विद्यालय में भेज दिया। वहॉं के प्रधानाध्यापक श्री उदित नारायण शर्मा एवं संस्कृत शिक्षक श्री गिरिराज शर्मा की इनपर विशेष कृपा रहती थी। एक बार छुट्टी के दिनों में जब ये शकुराबाद से गॉंव मिर्जापुर आये हुए थे तब गॉंव में स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य की कथा चल रही थी। नित्य कथा सुनने में इनकी अभिरूचि देखकर गॉंव वालों ने स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य जी से इन्हें शिक्षा प्राप्ति हेतु सरौती ले जाने के लिये प्रार्थना की । करीब 15 वर्ष की अवस्था में ये सरौती आश्रम में आ गये एवं यहाँ के 82 वर्षीय स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य जी से दीक्षित होकर रङ्गरामानुज नाम प्राप्त किये। सरौती संस्कृत विद्यालय के छात्र के रूप में प्रथमा. मध्यमा. उपशास्त्री. शास्त्री के उपरान्त व्याकरण एवं न्याय में आचार्य की शिक्षा पूरी की। अलौकिक मेधा के कारण ये व्याकरण एवं न्याय में स्वर्णपदक से सम्मानित हुए। श्री मधुकांत जी से न्याय पढने हेतु दरभंगा जाना पड़ता था। कुछ काल वहॉं रहकर पुनः सरौती आ जाते थे। शिक्षा प्राप्त करने हेतु अन्य विद्वान से कालक्षेप करने के निमित्त श्रीवैष्णवों की सेवा के लिये प्रसिद्ध श्रीकिशोरी जी के पीरमुहानी पटना स्थित आश्रम में भी कुछ काल के लिये ये ठहरा करते थे। तरेत स्थान के यशस्वी एवं न्याय के ख्यातिलब्ध ज्ञाता श्री प्रसिद्धनारायण शर्मा से भी इन्होंने तरेत में ही रहकर न्याय के गूढ़ तत्वों को समझा था। इसतरह से न्याय में आचार्य की पढ़ाई पूरी हुई थी।
 सरौती स्वामी जी की चरण सेवा में रहते हुए श्रीमुख से वेदान्त की महत्ता के बारे सुनकर इन्होंने भी श्रीस्वामी जी से वेदान्त अध्ययन की जिज्ञासा प्रकट की।  इनकी अभिरूचि से प्रसन्न होकर स्वामी जी ने इनको उच्च शिक्षा हेतु बाराणसी भेज दिया। वारणसी में आपने श्री नीलमेघाचार्य से वेदान्त की तथा अन्य गुरुओं से ज्योतिष एवं मीमांसा की शिक्षा प्राप्त की। श्री नीलमेघाचार्य वेदान्त के ख्यातिलब्ध आचार्य थे। उनकी जीवनी यहाँ प्रस्तुत है।
श्रीवैष्णव दर्शन के शिक्षक  श्री नीलमेघाचार्य  (1901-1965)

     पंडित को0नीलमेघाचार्य का जन्म फरवरी सन् 1901 में कोडिपाक्कम् ग्राम दक्षिणी अर्काट जिला मद्रास में हुआ था। इनके पिता का नाम वरददेशिकाचार्य था। इनकी प्रारंभिक शिक्षा तंजौर जिला के तिरुवैयार संस्कृत महाविद्यालय में हुई थी। सन् 1922 में इन्होंने मद्रास विश्वविद्यालय से व्याकरण शिरोमणि परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। बाद  के वर्षों में इन्होंने कोयियालम् स्वामी जी के आश्रम में श्री भाष्य और गीता भाष्य का अध्ययन किया। वहां से अध्ययन पूर्ण कर रीवा राजगुरु के विद्यालय में वर्षपुष्कर (अजमेर) की संस्कृत पाठशाला में वर्ष तथा रामानुजकूर शोलापुर में वर्ष तक वेदांत और व्याकरण का अध्यापन किये। पुनः तिरुपति के श्री वेंकटेश्वर ओरिएंटल कॉलेज में 10 वर्ष तक व्याकरण के अध्यापक रहे। वहां से वाराणसी में आकर रामानुज विद्यालय में 10 वर्ष तथा वृंदावन के वैष्णव संस्थान में वर्ष तक अध्यापन कर अंत में 1959 में वाराणसेय संस्कृत विश्वविद्यालय संप्रति संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में रामानुज वेदांत के प्राध्यापक नियुक्त होकर अंत समय तक यही कार्य करते रहे। ग्रीष्मावकाश में जब आप अपनी जन्मभूमि में विश्राम कर रहे थे 26 जून 1965 इसवी में आपका अकस्मात स्वर्गवास हो गया। तमिल के साथ ही साथ आपका संस्कृत और हिंदी भाषा पर पूरा अधिकार था। न्यायसिद्धांतञ्जनवेदार्थसंग्रहन्यासविंशतिन्यासतिलकयतिराजविंशति और परमपदसोपान का हिंदी अनुवाद आपने किया। इसके अतिरिक्त आपने अष्टश्लोकी,श्रीगुरुपरंपरा प्रभाव और वेदांतकारिकावली का संपादन किया है। अनेक पत्र-पत्रिकाओं में आपके विद्वता पूर्ण लेख प्रकाशित होते रहे हैं। आपने विष्णुसहस्त्रनामरहस्यत्रयसार और गीतार्थसंग्रह का भी हिंदी व्याख्या के साथ संपादन किया है। अपने जीवन के अंतिम काल में न्याय सिद्धांत जन पुस्तक के-परीक्षणों की टिप्पणी यह लिख चुके थे परंतु में परीक्षेत की टिप्पणी लिखते समय अकस्मात् परम पद को प्राप्त हो गए। वेदांत देशिक जो न्यायसिद्धांजन के रचयिता है, उन्होंने भी इस पुस्तक को पूर्ण नहीं कर सके। विडंबना है कि स्वयं वेदांतदेशिक अभाव का निरूपण नहीं कर सके और चल बसे। इसी प्रकार विशिष्टाद्वैत वेदांत के प्रगल्भ पंडित यामुनमुनि के ग्रंथ सिद्धित्रय के आत्मसिद्धिईश्वरसिद्धि और सम्वित्सिद्धि इन तीनों के प्रकरण अपूर्ण है। भट्ट पराशर के ग्रंथ तत्वरत्नाकर का प्रमेय प्रकरण भी अधूरा रह गया। नीलमेघाचार्य का पूरा जीवन भारतीय दर्शन विशेषकर रामानुज संप्रदाय के अध्ययन अध्यापन में व्यतीत हुआ। एक बार करपात्री जी के तरफ से श्रीवैष्णवों के विरोध में कुछ बात छपी थी तो श्रीनीलमेघाचार्य ने त्रिदंडी श्रीविष्वकसेनाचार्य की तरफ से एक पुस्तक का प्रणयन कर करपात्री जी को करारा उत्तर दिया था। काशी के विद्वत्तमंडली में इनका बहुत ही आदर सम्मान था। भाषा एवं विषय में बिना किसी अशुद्धि के किसी भी सभा मे धाराप्रवाह संस्कृत बोलकर विद्वानों प्रतिद्वन्दियों को अचंभित एवं श्रोताओं को मुग्ध किये रहते थे।

       रङ्गरामानुजाचार्य जी तिंगल मत के श्रीवैष्णव थे अतः तिंगल मतावलम्बी होने के कारण प्रारंभ में शंका थी कि बडगल समर्थक श्री नीलमेघाचार्य इन्हें श्रीवैष्णव विशिष्टाद्वैत दर्शन के अध्ययन हेतु शायद स्वीकार न करें। संयोगवश एक बार तरेत स्थानाधीश स्वामी श्रीवासुदेवाचार्य जी काशी में पधारे। तरेत स्वामी  जी भी रङ्गरामानुजाचार्य पर अत्यंत स्नेह रखते थे, अतः उन्होंने इनसे इनकी पढ़ाई लिखाई की जानकारी ली। जब रङ्गरामानुजाचार्य जी ने श्री नीलमेघाचार्य से श्रीवैष्णवदर्शन पढ़ने की जिज्ञासा प्रकट करते हुए अपनी शंका से भी उनको अवगत कराया तब श्रीस्वामी जी तुरत ही इनको साथ लेकर श्रीनीलमेघाचार्य जी के पास पहुँच गये। प्रारंभ में श्रीनीलमेघाचार्य जी ने बताया कि तिंगल एवं बडगल में सिद्वान्ततः मतभेद के कारण अच्छा होगा कि ये किसी तिंगल मत के विद्वान से ही श्रीवैष्णव दर्शन पढ़ें।  तरेत स्वामी जी ने अनुरोध किया कि आप नीलमेघ हैं और मेघ बिना भेदभाव के पृथ्वी पर जल वर्षाता है। आप  कृपा करके अपनी ज्ञान की वर्षा इनपर कीजिये। श्रीनीलमेघाचार्य जी ने रङ्गरामानुजाचार्य को अपना विद्यार्थी स्वीकारते हुए कुछ आवश्यक नियमों के पालन से इन्हें अवगत कराया : 
1. नित्य द्वादश तिलक लगाकर आना होगा। 
2. प्रतिदिन प्रातः बिना अन्न ग्रहण किये फलाहार रहकर ही पढ़ने के लिये आना होगा। पढ़ाई के बाद ही           अन्न ग्रहण करना होगा। 
3. बडगल परंपरा के  पाठ से ही नित्य पढ़ाई प्रारंभ भी होगी तथा समाप्त भी होगी।  परंपरा पाठ के समय      बारम्बार जमीन पर आठों अंग से लेटकर साष्टांग करना तथा पुनः खड़ा होकर साष्टांग करते रहना होगा। 
4. परंपरा पाठ के बाद ही नित्य पढ़ाई शुरू होगी।

विद्यार्थियों के साथ स्वयं श्री नीलमेघाचार्य जी भी इन नियमों का पालन करते थे। प्रारंभ के चार छः दिन श्रीरूपदेव जी को शारीरिक कष्ट का अनुभव हुआ परन्तु शीघ्र ही ये इसके अभ्यासी हो गये तथा 1957 से 1962 तक इन्होंने श्रीनीलमेघाचार्य जी से रहस्यत्रय सार’ ‘अधिकरण सारावली’  ‘न्याय सिद्धाञ्जन तथा श्रीभाष्य का अध्ययन किया।
         एक गृहस्थ वैष्णव परिवार के दो पुत्र एवं एक पुत्री के अभिभावक थे तथा परिवार के भरण पोषण के लिये धन की निरन्तर आवश्यकता पड़ती थी। इसी कारण से सरौती स्वामी जी रङ्गरामानुजाचार्य को श्रीनीलमेघाचार्य जी को भुगतान करने हेतु प्रतिमाह कुछ धनराशि उपलब्ध करा दिया करते थे। इसके अतिरिक्त श्रीरूपदेव जी के स्वयं के खर्च के लिये आवश्यक राशि अलग से भेजते रहते थे।
श्री स्वामी रङ्गरामानुजाचार्य पर रोग का आक्रमण
        एक बार कर्मकाण्ड कराने पंडित श्रीमाधव जी के सहायक के रूप में रङ्गरामानुजाचार्य सोन नदी के पश्चिम वरूही गॉंव गये थे। वहीं ये ज्वर से पीड़ित हो गये तथा पालकी की सवारी से इन्हें सरौती लाया गया। सरौती आने पर ज्वर के साथ विषम चेचक के चपेट में आ गये। महीनों उपचार के बाद स्वस्थ हुए।
बचपन से त्यागी एवं सहिष्णु प्रवृति के होने के कारण काशी अध्ययन की अवधि में भोजन एवं अन्य सुविधायों से श्रीस्वामी रङ्गरामानुजाचार्य जी उदासीन रहे। साथ रहने वाले छात्रों को भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करते थे। फलस्वरूप प्रायः भोजन में कमी हो जाती थी। कभी दाल पीकर सो जाना तथा कभी भूखे रह जाना इनका स्वभाव हो गया था। जाड़े में एक ही कम्बल को आधा विछाकर आधा ओढ़कर अपना काम चला लिया करते थे। शरीर कमजोर होने से स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर हुआ तथा इन्हें टी बी रोग ने धर दबोचा। ये काशी छोड़कर तरेत आ गये। सरौती स्वामी जी को जब यह ज्ञात हुआ तो विशेष व्यवस्था से इन्हें सरौती बुला लिये। सरौती ठाकुरवारी के तत्कालीन  व्यवस्थापक सरौती गॉंव के प्रपन्न श्रीवैष्णव श्री रघुराज जी को पटना भेजकर पटना के प्रसिद्ध डा टी एन बनर्जी से तीन वर्षों तक इनकी टी बी का उपचार कराया। शुरू के नौ महीने पटना में ही रहे तथा जब रोग के ठीक होने के लक्षण दिखने लगे तो ये पुनः सरौती वापस आ गये। यहॉं एक कमरे में शांत चित्त से शय्यासीन रहे तथा श्रीस्वामी जी ने इनकी सेवा सुश्रुषा की उचित व्यवस्था कर दी। जब श्रीस्वामी जी सरौती में रहते थे तो नित्य प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में 3 बजे चुपचाप इनके कमरे में आकर इनकी नाड़ी की गति का निरीक्षण कर लौट जाते थे। करीब तीन वर्षों के बाद स्वस्थ होने पर सरौती ठाकुरवारी के स्थानीय संस्कृत विद्यालय में ये अध्यापक के रूप में कार्यरत हो गये। 
श्री स्वामी रङ्गरामानुजाचार्य और इनका योगदान
        स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य जी का इनपर बहुत ही स्नेह रहता था। 101 वर्षीय श्रीस्वामी जी चाहते थे कि श्रीस्वामी रङ्गरामानुजाचार्य जी सरौती स्थान के संचालन में सहायता करे तथा इसकी जिम्मेदारी भी लें परन्तु त्यागी प्रवृति के होने के कारण इन्होंने श्रीस्वामी जी के चरणों में निवेदन कर इस तरह के कार्य से अपने को वंचित रखा। तत्पश्चात् श्रीस्वामी जी ने इन्हें शंख चक्र प्रदान करते हुए श्रीवैष्णव धर्म के प्रसार के लिये गॉंवों में भ्रमण करने को कहा। शुरू  में शारीरिक कमजोरी के कारण ये भ्रमण से हिचकिचाये परन्तु श्रीस्वामी जी ने इन्हें एकाध मील ही चलकर गॉंवों में जाने की  राय दी। बाद में श्रीरघुराज जी ने इनके लिये एक घोड़ी की व्यवस्था कर दी। यहीं से बिहार में ये श्रीवैष्णव धर्म के अग्रणी प्रचारक के रूप में एक उदीयमान सूर्य के रूप में उभरे। 82 वर्ष की अवस्था होने पर भी श्रीवैष्णव व्योम में यह सूर्य आज भी अध्यात्म मार्ग के  एक कुशल गुरू के रूप में भवरोग से ग्रस्त जनमानस को प्रकाश की राह दिखा रहे हैं।
        ई सन् 1969 में इन्होंने हुलासगंज  के पास  शुकियांवा गॉंव में ज्ञानयज्ञके साथ भागवत कथासे लोगों को लाभान्वित किया। यज्ञ में बचे हुए धन को जब ग्रामीण इनको देने लगे तो इन्होंने धन को स्वीकार करने से मना करते  हुए राय दी कि अगर संभव हो तो यहॉं एक संस्कृत विद्यालय का शुभारंभ करें। गॉंव वालों ने हुलासगंज के पास नदी के किनारे कुछ जमीन की व्यवस्था कर श्रीपराङ्कुश संस्कृत विद्यालयकी शुभारंभ कर दी। इसी के साथ यहॉं श्रीलक्ष्मीनारायण मन्दिरकी भी स्थापना हुई। पर्ण कुटीर के साथ यह आश्रम इनका आवास भी हो गया।

       
        हुलासगंज में स्थित आश्रम तथा महाविद्यालय का चित्र। पूरा परिसर वनाच्छादित दिख रहा है।

हुलासगंज में सर्व प्रथम लक्ष्मी नारायण मंदिर का निर्माण  हुआ। मंदिर के आगे जगमोहन का विस्तार ई सन् 1988 में हुआ। मेरे जाने के पूर्व 1- श्री स्वामी पराङ्कुशाचार्य संस्कृत उच्चविद्यालय  2-श्री स्वामी पराङ्कुशाचार्य संस्कृत महाविद्यालय  3- पराङ्कुशाचार्य आयुर्वेदिक दातव्य औषधालय का निर्माण हो चुका था। 
    मैं हुलासगंज में वर्ष 1983 से 1989 तक रहा। उसके बाद हुलासगंज भी यहाँ से जुड़ाव लगा रहा। वर्ष 2017 तक मैं देश के अनेक धार्मिक स्थलों, संस्कृत विद्या के केन्द्रों, भारत के अनेक भूभाग की सामाजिक, सांस्कृतिक स्थिति से परिचित हो चुका हूँ। अब मैं हुलासगंज का संस्मरण लिखने बैठा हूँ । इसे लिखने में कई वर्ष लग सकते हैं। अब विवरणात्मक लेखन के स्थान पर समीक्षात्मक लेखन होगा। अपने उन अनुभवों, हुलासगंज में व्यतीत किये की चर्चा प्रतिपलं तव संस्मरणम् (हुसालगंज संस्मरण 2) नामक दूसरे लेख में करुँगा। उसमें वहां के सन्तों, गुरुजनों, शिक्षा की स्थिति, शिक्षकों की योग्यता, छात्रों की स्थिति, हुलासगंज के विकास में महत्वपूर्ण व्यक्तियों का योगदान, सामाजिक वातारण तथा मित्रों के संस्मरण आदि की रोचक जानकारी दूँगा । 
श्री स्वामी रङ्गरामानुजाचार्य विरचित पुस्तकें एवं पत्रिका: 
स्वामी श्रीपराङ्कुशाचार्य द्वारा पूर्व में प्रकाशित पुस्तकों का नवीन संस्करण के प्रकाशन के अतिरिक्त श्रीस्वामी रङ्गरामानुजाचार्य जी ने गीता तथा कर्मकांड पर पुस्तकें प्रकाशित की हैं। सन् 1980? से इन्होंने हुलासगंज से वैदिक वाणीएक त्रैमासिक पत्रिका का नियमित प्रकाशन किया है। इनके द्वारा प्रणीत पुस्तकें निम्नवत् हैं।

 1. अर्थपञ्चकतत्व विमर्श             2. लघुस्तोत्र मञ्जरी 
 3. विशिष्टाद्वैत तत्वदिग्दर्शन        4. गीतापञ्चप्रसुन
5.  गीतारहस्य चन्द्रिका              6. स्तोत्र चन्द्रिका  
7. उपदेशमाला                         8. श्रीरामकथा रसायन 
9. गीताप्रवचन पीयूष.               10. वास्तुकर्म प्रकाश 
11.चौलादिविवाह चन्द्रिका         
12. श्राद्ध चन्द्रिका 
13. अर्चिरादिमार्ग

 ‘ज्ञानयज्ञ’  एवं धार्मिक कृत्य
        सन् 1968 में सरौती श्रीस्वामी जी की अध्यक्षता में श्रीस्वामी रङ्गरामानुजाचार्य जी ने पहला ज्ञानयज्ञभोजपुर शिकरहटा में संपन्न किया। तबसे त्रिदिवसीय या पंचदिवसीय ज्ञानयज्ञके द्वारा हजारों गॉंवों को आप लाभान्वित करते रहे हैं। आपके द्वारा प्रत्येक वर्ष एक या दो ज्ञानयज्ञ अवश्य ही संपन्न होते रहे हैं। पंचदिवसीय ज्ञानयज्ञ’  ‘अयोध्याएवं वृन्दावनमें भी संपन्न हुए। अयोध्या’ के ज्ञान यज्ञ में मैं लखनऊ से गया था।  अर्द्धकुंभ या पूर्णकुंभ के अवसर पर आपका हरिद्वार’ ‘उज्जैन’ ‘नासिकतथा प्रयागराजमें बाड़ा भी जाता है, जहॉं ज्ञानयज्ञएवं धार्मिक प्रवचन से भक्तों को लाभान्वित होने का मौका मिलता है। मकर कुंभ के अवसर पर प्रत्येक वर्ष प्रयागराज में करीब एक माह की अवधि का बाड़ा लगता है।
यज्ञस्थल पर श्रीमद्भागवत पारायण एवं कथा’ ‘हरिनाम का अखंड कीर्तनतथा संत विद्वानों के प्रवचन से लगभग एक माह की अवधि मै आकर्षक धार्मिक वातावरण बना रहता है।  संतानहीन लोगों को हरिवंशपुराणसुनाया जाता है जिससे अनेकों को लाभान्वित होते देखाा गया है।  पृथक यज्ञमंडप में यज्ञाग्नि प्रज्वलित कर प्रत्येक दिन श्रीविष्णुसहस्रनामसे हवन दी जाती है। अगर त्रिदिवसीययज्ञ है तो प्रतिदिन श्रीविष्णुसहस्रनामसे कम से कम एक आवृति अवश्य पूरी की जाती है। इसी तरह से तीनों दिन होम की आवृति चलती है। पचदिवसीययज्ञ में पांच दिन यज्ञमंडप में श्रीविष्णुसहस्रनामका होम चलता है।
सम्प्रति स्वामी रङ्गरामानुजाचार्य जी महाराज के संरक्षण में प्रमुख रूप से
(१) श्रीराम संस्कृत महाविद्यालय, सरौती, रामपुर चौरम अरवल (बिहार)।
(२) श्री वेंकटेश परांकुश संस्कृत महाविद्यालय, अस्सी, वाराणसी (उत्तर प्रदेश)।
(३) श्रीस्वामी परांकुशाचार्य आदर्श संस्कृत महाविद्यालय, हुलासगंज, गया (बिहार)।
(४) श्रीस्वामी परांकुशाचार्य संस्कृत उच्च विद्यालय, हुलासगंज, गया (बिहार)।
(५) श्रीस्वामी परांकुशाचार्य प्रेस, हुलासगंज, गया (बिहार)।
(६) स्वामी परांकुशाचार्य संस्कृत महाविद्यालय, मेहन्दिया, अरवल (बिहार)।
(७) श्री परांकुश संस्कृत संस्कृति संरक्षा परिषद् हुलासगंज, गया (बिहार)। शिक्षण संस्थाएँ सञ्चालित हैं।
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प्रज्जालितो ज्ञानमयः प्रदीपः

                                                                         लक्ष्मीनाथ समारम्भं नाथयामुनमध्यमाम्।
                                                                         अस्मदाचार्यपर्यन्तां वन्दे गुरुपरम्पराम्।।
बिहारप्रान्तस्य दक्षिणदिग्भागे संस्कृतभाषायाः प्रचारकस्य श्रीस्वामिरङ्गरामानुजाचार्यस्य नाम को न जानाति। एते स्वकीयपरिश्रमबलेन विविधसंस्कृतशिक्षासंस्थानस्य स्थापनां कृत्वा जनमनसि संस्कृतस्य नवजागरणं कुर्वन्नस्ति।
विशिष्टाद्वैतसम्प्रदाये प्राचीनकालादारभ्य वहवः सुपण्डिताः सुविचारकाः वैष्णवाग्रगण्याः च अभवन्। तेषु एकः प्रमुखः सुपण्डिताः विंशतिशताद्यां जहानाबादजनपदान्तर्गते मिर्जापुरनाम्निग्रामे जनिं लेभे । वाल्याकालादेवायं कुशाग्रबुद्धिः, विविधशास्त्रचिन्तने मग्नः विद्वत्समाजे परमश्रद्धेयानां ज्ञानवृद्धानां माधवाचार्य एवञ्च नीलमेधाचार्यवर्याणां अन्तेवासिरुपेण विभिन्नानि शास्त्राणि अधीतवान्। एतेषां गुरवः स्वामिपरांकुशाचार्यः तरेत नाम्नी ग्रामे संस्कृतविद्यालयमहाविद्यालयोः स्थापनां कृतवान्। तदानीन्तमाः वाराणसेयाः पण्डिताः रङ्गरामानुजाचार्यवर्यस्य प्रतिभां शास्त्रवैदुष्यं च वीक्ष्य चकितचकिताः आसन्। विशिष्टाद्वैतवेदान्ते कृतभूरिपरिश्रमः रङ्गरामानुजाचार्येण अन्येषु दर्शनष्वपि रुचिं विधाय गहनं अध्ययनं कृतम्।
   शास्त्रचिन्तने परिबद्धोयं समयाभावात् तद्दिने चणकं खादित्वा अध्ययने मग्नः आसीत्। यथा कणादः प्रतिदिनं रथ्यायां पतितान् तण्डुलकणान् भक्षयति स्म तथैव अयमपि शास्त्राध्ययनम् अतिक्लेशेन कृतवान्।
    सम्प्रति 84 वर्षदेशीयः अयं चतुविंशतितमे वयसि एव संस्कृतस्य प्रचाराय प्रसाराय च गया जनपदान्तर्गते हुलासंगजनाम्नि  ग्रामे एकं सुविस्तीर्णं भव्यञ्च संस्कृतविद्यालयं स्थापितवान्। तत्र छात्राणां अध्यापकानां च कृते भोजनवासव्यवथापि विहिता । अनन्तरं संस्कृतमहाविद्यालयस्य स्थापनापि कृता।
       बिहारप्रान्तस्य वंगदेशस्य उत्तरप्रदेशस्य च छात्राः तत्र भोजनादिव्यवस्थां प्राप्य अध्ययने रताः अभवन्। असौ सर्वत्र परिभ्रमन् विद्वांसं आनीय अध्यापने योजितवान्। अस्य अथकप्रयासेन उत्तरभारतस्य विद्वांसः तत्र ज्ञानलाभाय गच्छन्ति। तदैव एकः आशुकविः मनसिज शास्त्री आसीत्। सोsपि छात्रान् अध्यापयति स्म। गया जनपदस्य स्थानमिदं अतीव प्रसिद्धमभूत् ।

     गुरुवर्येण अश्वमारुह्य ग्रामे – ग्रामे विहरन् प्रतिगृहं गत्वा संस्कृताध्यापनाय एकं पुत्रं देहीति याचते। तत बालान् संगृह्य स्वविद्यालये आनीय अध्ययने प्रेम्णा योजयति। अस्मान् एते बहु मन्यन्ते स्म। ग्रीष्मावकाशे प्रतिवर्षं वदति स्म भोः सम्पूर्णं अध्ययनं समाप्य गृहं गन्तव्यम्। मध्ये गृहगमनेन अध्ययनभंगः भवति । कथितञ्च यदि वाञ्छसि मूर्खत्वं ग्रामे वस दिनत्रयम्। भवन्तः तु मासपर्यन्तं तत्र स्थास्यति। यदि यूयं गृहं नैव गमिष्यथ चेत् अहमत्रैव सर्वं योगक्षेमं करिष्यामि। छात्रेषु संस्कृतसम्भाषणस्याभ्यासः केन विधिना वर्धिष्यति एतदर्थं संस्कृतवाग्वर्धिनी सभा आरब्धा। परिसरीयाः जनाः संस्कृते एव व्यवहरेयुः एतदर्थं विविधाः योजनाः चालिताः। संस्कृतं लोकभाषा स्यात् इति तेषाम् आभिलाषा लक्ष्यं चास्ति। प्रातः नित्यक्रियां कृत्वा छात्राः तेषां पुरतः पंक्तिबद्धरुपेण उपविश्य अमरकोषः तर्कसंग्रहः लघुसिद्धान्तकौमुदी ग्रन्थानां वाचनं एव सम्मुखे पंक्तिबद्धेन उपावेश्य कारयति। इतः अध्ययनं कृत्वा बहुजनाः विश्वविद्यालये महाविद्यालये अन्यस्मिन् सेवायां युक्ताः सन्ति।

        अधुनापि चातुर्मासकाले प्रायशः दर्शनं‚ व्याकरणं‚ ज्यातिषञ्च पाठयति। स्वस्मै ग्रीष्मकालः भवतु वा शीतकालः सर्वदा वस्त्रद्वयमेव धारयति। संस्कृतं संस्कृतेश्च प्रसाराय गुरुवर्येण पुस्तकप्रकाशनार्थं एकं मुद्रणालयस्यापि स्थापना कृता। ततः एतैः प्रायः त्रिंशदधिकाः ग्रन्थाः वैदिकवाणीति नामिका पत्रिका मुद्रापयित्वा प्रकाश्यं नीताः। प्रतिवर्षं यज्ञकर्मणि छात्राणां श्लोकान्याक्षरी प्रतियोगिता शास्त्रार्थं च कारयित्वा जनसमक्षं संस्कृतस्य प्रदर्शनं कुर्वन्ति।
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असमय एक गुरु का चला जाना आचार्य रामानुज देवनाथन्

गुरुदेव नहीं रहे। सुबह उठते ही फेसबुक पर पढ़ने को मिला। विश्वास ही नहीं हो रहा था। मित्र सुब्रह्मण्यम् को फोन किया। दुखद समाचार की पुष्टि हो गयी। फेसबुक पर जब-जब शोक समाचार पढ़ रहा हूं, असहज हो उठता हूं । गुरुदेव के जाने से पूरा सेशलमीडिया रो रहा है। जब भी कोई लिखते हैं श्रद्धाञ्जलि। सहसा गुरुदेव का चित्र सामने खड़ा हो आता है। तब वे दाढी नहीं रखते थे। 
      उन्होंने मुझे शिक्षाशास्त्री में पढ़ाया था । राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान के पुरी परिसर में आचार्य रामानुज देवनाथन् से मेरा परिचय हुआ। उनके अनेकों संस्मरण आज भी याद है। नियमित कक्षा में आकर पढाना। नियत समय पर कक्षा में प्रवेश और समय पर पाठ खत्म करना। इतना नियमित अध्यापक मैंने अपने जीवन में कभी नहीं देखा । पढ़ाने की शैली इतनी अच्छी कि एक बार जो पढ़ा दें,वह सदा के लिए स्मरण रह जाता था। वह मुझे शिक्षा मनोविज्ञान पढ़ाया करते थे और मैं उनका प्रिय छात्र था। आप संस्कृत, हिन्दी, तमिल, तेलगू, उड़िया, कन्नड, मलयालम और अंग्रेजी भाषाओं के ज्ञाता थे। आपका जन्म Aheendrapuram, Cuddalore District, तमिलनाडू में 2 अप्रैल 1959 को हुआ था। आपके माता का नाम कनकावली और पिता का नाम एस. रामानुजाचार्य था। वे जितने अच्छे विद्वान् शिक्षाशास्त्र के थे,उतने ही अच्छे वेदांत और व्याकरण के भी थे । वे एक कुशल वक्ता थे। मुझमें संस्कृत बोलने का अभ्यास उन्हीं से आया। एक बार समय से लेशन प्लान न बनाने पर गुरुदेव ने मुझे डांट दिया था। मैं तत्कालीन शिक्षाशास्त्र विभागाध्यक्ष आदरणीय प्रोफेसर सच्चिदानंद जी से आगे शिक्षाशास्त्र में नहीं पढने की बात कही। गुरुदेव ने स्नेह पूर्वक मुझे समझाया था। मैं छात्र अवस्था में बहुत ही चंचल था। गुरुदेव बार-बार मुझे गंभीर होने की नसीहत देते रहते थे । समय का पालन,कठोर अनुशासन मैंने गुरुदेव से ही सीखा है। शिक्षाशास्त्र की कक्षा के छात्रों को सामुहिक नसीहत देने से नहीं चूकते थे। एक बार राजस्थान के एक छात्र को उन्होंने व्यंग्य भरे लहजे में बोला, आज कल तुम बहुत तेल पी रहे हो। शाम को उन्होंने उस छात्र के हाथ में एक बोतल देख लिया था। उस समय टेलीविजन की कम ही उपलब्धता थी। टेलीविजन पर आने वाले समाचारों की चर्चा करते हुए कहा करते थे कि काश छात्रों को भी यह ज्ञान देने वाली सुविधा उपलब्ध हो पाती। एक छात्र, किसी छात्रा को प्रपोज करने के लिए पत्र लिखा था। उसमें लिखा था आई लव यू। मैंने वह पत्र उनके टेबल के नीचे रख दिया। कक्षा में आते ही उन्होंने उस पत्र को निकाला और उस छात्र का नाम लेते हुए बोले मैं तुमसे प्यार नहीं करता। पूरा कक्ष ठहाकों से गूंज उठा । पुरी से मैं भी वापस आ गया। वहाँ से आप तिरुपति चले गए। वहां की भी सूचना मुझे निरंतर मिलती रही। जब आप राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान में कुलसचिव होकर लौटे,उस समय भी और जब आप जगद्गुरु रामानंदाचार्य राजस्थान संस्कृत विश्वविद्यालय में कुलपति के पद पर आसीन थे। तब भी आप से दूरभाष पर मेरा निरंतर संपर्क बना रहा। हर एक काम में आपका मार्गदर्शन मिलता रहा। संस्कृतसर्जना पत्रिका की वेबसाइट बनवाते समय Home का संस्कृत आपने मुझे बताया था । twitter पर मैं आपको फॉलो करता था और मैं आपके हर tweet को पढ़ा करता था। आज भी आपके ट्वीटर पर 380 चित्र 13.8 हजार tweet  उपलब्ध हैं। आपके tweet को बहुत ही पसन्द किया जाता है। 31 दिसम्बर 16 को twitter पर आपका अंतिम श्लोकबद्ध  tweet आया।
                 भूयाच्छुभदे व्यावहारिके प्रत्ने फलदे पश्चिमावहे ।
                 अब्दे सततं मङ्गलं सुखं राष्ट्रं परमां वृद्धिमाप्नुयात् ॥
Happy VyAvahArika New Year

          हमें सुखी रहने और राष्ट्र की समृद्धि की कामना कर आप नहीं रहे। मैं किस से मार्गदर्शन लूंगा और संस्कृत के उत्थान की प्रेरणा किससे प्राप्त करूंगा। अच्छा नहीं लगा गुरुदेव। असमय आप चले गए। बहुत शोकाकुल हूँ। शब्द नहीं हैं। लिखने का भी मन नहीं करता। यह नहीं होना चाहिए था।
       एक अच्छा गुरु सर्वव्यापी और सर्व समर्थ होता है। हमें सभी प्रकार से शिक्षित करता है। कौन कहता है मेरे गुरु मेरे बीच नहीं हैं। उनका ज्ञान शरीर हमारे बीच है।




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नया साल बनाम Happy New year

         मैं सोचता हूं भारत की धरा पर प्रकृति में आज किसी प्रकार का बदलाव नहीं आया है। ठीक कल जैसा ही आज भी है। कुछ लोगों का कहना है कि आज नया साल आ गया है। हाँ सरकारी व्यवहार में दिखने वाला तथा धार्मिक कारणों से यह नववर्ष है। व्यवहार में इसी लिए आया क्योंकि हम गुलाम हो गये थे। अन्यथा हमने ही विश्व को समय को मापना सिखाया था। आज भी वह विद्या मेरे पास सुरक्षित है। नया वर्ष मानने के पीछे खगोलीय सिद्धांत नहीं, बल्कि एक मानसिक अवस्था कारण है। आज तो कुछ लोग एक पन्ना भर पलटते है। मुझे पलटने की जरुरत नहीं पडती। मकर संक्रान्ति से नया वर्ष क्यों नहीं शुरु हो सकता। उसी दिन से 1,2,3,4 की गिनती शुरु कर लो। आज के दिन की प्रतीक पूजा क्यों?
            यहां हमारे पूर्वज हजारों वर्षों से रहते आ रहे हैं । हम कहीं बाहर से आकर यहां नहीं बसे हैं । हमारी संस्कृति, हमारी धार्मिक चेतना, हमारी परंपराएं यहीं पली-बढ़ी है और हम आयातित धर्मों, सिद्धांतों, मान्यताओं, परंपराओं को आत्मसात तो करते हैं परंतु अपना बनाकर। अपनी शर्तों पर। हम जब विदेशी नामों का भी भारतीयकरण कर देते रहें हैं तो संस्कृतियों का क्यों नहीं ? अभी भारतीय किसानों के खेत की फसलें नहीं काटी जा रही है । न हीं बागों में फूल खिले हैं । पेडों में फल भी आने शुरू नहीं हुए, फिर किस बात का उल्लास? जब मैं इस नव वर्ष को उल्लास के साथ मनाने को सोचता हूं, अपने को जोड़ने की कोशिश करता हूं तो मुझे इसमें किसी भी प्रकार की तार्किकता नजर नहीं आती । नयापन नजर नहीं आता।किसी भी कैलेंडर का निर्माण समय के सिद्धांत पर होता है । समय का मापन धरती के भ्रमण के आधार पर होता है । आज सूर्य उत्तरायण या दक्षिणायन नहीं हुए अर्थात् समय की गति में भी किसी प्रकार का बदलाव नहीं हो रहा। मेरे किसी भी पूर्वजों, पौराणिक पुरुषों का संबंध इस नववर्ष से नहीं रहा है। भारत भूमि पर उत्पन्न हुए किसी संतों महापुरुषों का संबंध इस नव वर्ष से नहीं रहा है । इस नव वर्ष का धार्मिक या समय के सिद्धांतों (ऋतु चक्र परिवर्तन ) से सम्बन्ध भी नहीं है। फिर यह नववर्ष किसका और किसलिए? क्या अब मुझे उल्लास मनाने के लिए आयातित परंपराओं पर निर्भर रहना पड़ेगा? क्या हमारा इतिहास और गणित इतना कमतर है कि मुझे दूसरी परंपरा का अनुसरण करना पडे।     आप बहस कर सकते हैं कि आज का दैनिक व्यवहार इसी कैलेंडर के आधार पर निर्भर है। मैं अंशतः स्वीकार करता हूं । एक बार एक ज्योतिषी से भी यही प्रश्न पूछा गया कि मुझे तिथियां याद नहीं रहती, जबकि दिनांक याद रहते हैं उन्होंने छूटते ही उत्तर दिया। यदि आपको तिथि के आधार पर पेमेंट और छुट्टी दिया जाए तो सारी तिथियां याद रहेगी। कहने का आशय यह है कि जिसे हम दैनिक व्यवहार में लाते हैं, वह याद रहने लगता है । जैसे गांव के किसानों को नक्षत्रों के नाम। मेरे पास एक नहीं अनेकों कैलेंडर है और वह मुझे सुविधा देते हैं। भारत में ही काल गणना के अनुसार 8 प्रकार के वर्ष होते हैं। हम अपना पर्व त्यौहार और व्रत चंद्र वर्ष के अनुसार तथा कुछ कार्य सौर वर्ष के अनुसार मनाते हैं । सौर वर्ष में भी 365 दिन ही होते हैं ।            
मिथिला,उडिया सहित अनेकों सांस्कृतिक परम्पराओं में अलग-अलग नववर्ष का आरंभ होता है। मुझे कब घर में रहना है और कब कौन सा मार्ग अवरुद्ध रहेगा, गुरु गोविंद सिंह जयंती कब है यह सब कुछ मैं उस कैलेंडर में देख कर निर्धारित करता हूं । अपने अन्य धर्मावलंबी मित्रों को बधाई भी तो मुझे देनी है। जानकारी के लिए सब कुछ रखना चाहिए, परंतु गर्व करने के लिए अपना ही होना चाहिए। मैं हिंदू और सब विचारधाराओं को आत्मसात करने का माद्दा भी रखता हूं । हमारी अपनी सनातन परंपरा और धर्म-दर्शन है । जीवन पद्धति है और प्रत्येक उल्लास के पीछे कोई न कोई हमारा इतिहास जुड़ा है । वह मुझे अतीत का स्मरण करता है। गर्व अनुभव करने में मददगार होता है । इस नव वर्ष में ऐसा कुछ नहीं लगता इसलिए मैं आत्मसात नहीं कर पाता हूं । जब तक इसका भारतीयकरण नहीं किया जाता तब तक इससे जुड़ना कठिन लगता है । इसमें भोगवादी प्रवृति दिखाई देती है । इसमें ईश्वर और मानवता के लिए समर्पण नहीं है ।
     हम वर्षों से जिन संस्था (कई महापुरुष भी संस्थागत रूप होते हैं ) से जुडते रहे हैं, जिससे हम लाभान्वित होते रहते हैं । उस संस्था के स्थापना दिवस/ पुण्यदिवस पर शुभकामना देना भूल जाते हैं । अच्छा होता जब हम अपने आदर्श चरित्रों को याद कर उनके जन्मदिन या पुण्यतिथि पर एक दूसरे को बधाई देते । यह नववर्ष भोगवादी और बाजारवादी प्रवृत्ति का नमूना है अतः मुझे इसमें कुछ भी नयापन नहीं लगता। मैं एक बुद्धिजीवी प्राणी हूं और मेरा विवेक आज तक इसमें कोई भी तत्व ढूंढ नहीं पाया।
भारतीय नव वर्ष कब?
भारत के विभिन्न हिस्सों में नव वर्ष अलग-अलग तिथियों को मनाया जाता है। प्रायः ये तिथि मार्च और अप्रैल के महीने में पड़ती है। पंजाब में नया साल बैशाखी नाम से अप्रैल में मनाई जाती है। सिख नानकशाही कैलंडर के अनुसार होला मोहल्ला नया साल होता है। इसी तिथि के आसपास बंगाली तथा तमिळ नव वर्ष भी आता है। तेलगु नया साल मार्च-अप्रैल के बीच आता है। आंध्रप्रदेश में इसे उगादी (युगादि=युग+आदि का अपभ्रंश) के रूप में मनाते हैं। यह चैत्र महीने का पहला दिन होता है। तमिल नया साल विशु १३ या १४ अप्रैल को तमिलनाडु और केरल में मनाया जाता है। तमिलनाडु में पोंगल १५ जनवरी को नए साल के रूप में आधिकारिक तौर पर भी मनाया जाता है। कश्मीरी कैलेंडर नवरेह १९ मार्च को होता है। महाराष्ट्र में नव वर्ष गुड़ी पड़वा के रूप में मार्च-अप्रैल के महीने में मनाया जाता है। कर्नाटक के लोग कन्नड नया वर्ष उगाडी चैत्र माह के पहले दिन को मनाते हैं।

  सिंधी उत्सव चेटी चंड, उगादि और गुड़ी पड़वा एक ही दिन मनाया जाता है। मदुरै में चित्रैय महीने में चित्रैय तिरूविजा नए साल के रूप में मनाया जाता है। मारवाड़ी नया साल दीपावली के दिन होता है। गुजराती नया साल दीपावली के दूसरे दिन होता है। इस दिन जैन धर्म का नववर्ष भी होता है। बंगाली नया साल पोहेला बैसाखी १४ या १५ अप्रैल को आता है। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में इसी दिन नया साल होता है। मिथिला तथा नेपाल के मिथिलांचल का नव वर्ष कार्तिक मास में आरंभ होता है।

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पुस्तक संदर्शिका Pustak Sangdarshika

पुस्तक संदर्शिका Android App में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ के पुस्तकालय में उपलब्ध पुस्तकों तथा पाण्डुलिपियों की सूची दी गई है। यह App संस्कृत जिज्ञासुओं तथा शोधार्थियों के लिए अत्यन्त ही उपयोगी है। मैंने विगत 10 वर्षों तक अनवरत श्रम कर पुस्तकों तथा पांडुलिपियों की सूची तैयार कर रहा था। अपने यहाँ आने वाले पाठकों की सुविधा के लिए विना किसी रोकटोक और सहायता के सूचना का सरल प्रवाह का आसान तरीके उपलब्ध कराने में लगा था, ताकि पाठकों के समय की बचत की जा सके । मैंने सबसे पहले डेस्कटॉप आधारित पुस्तकालय का एक ऑफलाइन सॉफ्टवेयर बनवाया था। इसके उपयोग में पाठक दक्ष नहीं हो पा रहे थे अतः शब्दकोश क्रम में पुस्तकाकार पुस्तकों की सूची पाठकों को दी। कैटलाग तो था ही। अब पुस्तकों, लेखकों आदि की जानकारी के लिए पाठक के पास तीन विकल्प उपलब्ध हो गये।  घर बैठे या दूरदराज के पाठकों तक पुस्तकालय और यहाँ उपलब्ध पुस्तकों की जानकारी प्राप्त कराने के लिए एक वेबसाइट बनाया ताकि पाठक पुस्तकालय में उपलब्ध पुस्तकों के बारे में जानकारी घर बैठे प्राप्त कर सकें। वेबसाइट तो बन गया परन्तु अध्येताओं को बार-बार डाटा खर्च करना पड़ता था । यह सबके पहुँच में भी नहीं था,क्योंकि इसके लिए इन्टरनेट युक्त मोबाइल चाहिए था। रखरखाव के अभाव में यह बंद रहने लगा। मैंने सोचा क्यों न इसके लिए एक मोबाइल App बनावाया जाय। आज लगभग हर पाठक के पास android फोन होता है । क्यों न इस माध्यम से भंडार में रखी अज्ञात पुस्तकों की सूची को हर हाथ तक पहुंचा दिया जाय। दूर स्थित लोगों को भी जानकारी हो कि कहीं पढ़ने के लिए पुस्तक उपलब्ध है । वह भी बार बार विना डाटा खर्च किये। बस रास्ता मिल गया और परिणाम सम्मुख है। अब प्रो. मदनमोहन झा तथा उनके पुत्र श्री सृजन झा के सहयोग से पुस्तक संदर्शिका नामक एक  Android App  बना दिया गया। इस Android App के निर्माण में किसी से भी आर्थिक सहायता नहीं ली गयी।
पुस्तक संदर्शिका में लगभग 19000 पुस्तकें तथा 4000 पांडुलिपियों की सूची दी गई है। इसमें विविध विषयों पर हिंदी भाषा में लिखित लगभग 2000 पुस्तकों तथा संस्कृत विषय पर अंग्रेजी में लिखित 1000 पुस्तकों की सूची को भी सम्मिलित किया गया है।
देवनागरी लिपि तथा इंग्लिश में लिखित पुस्तकों के लिए 1. पुस्तक 2. लेखक 3. विषय के नाम से अलग-अलग खोज की सुविधा दी गई है। हस्तलिखित पांडुलिपियों को 1. हस्तलिपि के नाम से तथा 2. विषय के नाम से खोजने की सुविधा उपलब्ध है।
जिन संस्कृत पुस्तकों की अनेक प्रतियां अथवा टीका उपलब्ध है, उसपर क्लिक करने पर लेखक एवं टीकाकार का नाम खुलता है। यहां चयन कर पुस्तक का विस्तृत विवरण प्राप्त किया जा सकता है । जिन पुस्तकों के अनेक नाम प्राप्त होते हैं, उन्हें अलग-अलग प्रदर्शित किया गया है।
पुस्तक तथा लेखक नाम के पूर्व लिखे गये आलंकारिक उपाधियों, मंगलवाची पदों यथा श्री, अथ, डॉ., आचार्य आदि को हटाकर टंकित किया गया है,तथापि असावधानीवश कुछ शेष रह गये हैं। वर्तनी की विविधता के कारण एक ही पुस्तक तथा लेखक के नाम अलग अलग  हो जाते हैं। यथा तत्त्व तत्व, चिंतन चिन्तन, रघुवंशम् तथा रघुवंशमहाकाव्यम् , रामकिशोर राम किशोर आदि । अतः वर्णक्रम से खोज करने वाले खोजकर्ता  अलग - अलग वर्तनी तथा प्रचलित नाम के वर्णक्रम में भी देखें। उपर्युक्त के समाधान तथा आपकी सुविधा हेतु कीवर्ड सर्च की सुविधा दी गयी है । उपयोगकर्ताओं की सुविधा को ध्यान में रखकर किन्हीं उपविषयों को मूल वर्ग में तो किसी उपविषय को विषय के रूप में रखा गया है। कुछ पुस्तकों को अवर्गीकृत श्रेणी में रखा गया है। विषय से खोज के क्रम में यदि पुस्तक उपलब्ध नहीं हो तो पुस्तक नाम अथवा लेखक के नाम से ढूंढना चाहिए ।
पुस्तकालय में जिन पुस्तकों की एक प्रतियां उपलब्ध हैं, वहाँ एक परिग्रहण संख्या दी गयी है। एक से अधिक प्रतियों के लिए प्रत्येक पुस्तक की पृथक् - पृथक् परिग्रहण संख्या दर्शायी गयी है। अनेक भाग वाले पुस्तकों के भाग संख्या में , चिह्न देकर अन्य भाग की संख्या लिखी है। पुस्तकों का विषय विभाजन संस्कृत वाङ्मय को केंद्र में रखकर किया गया है। यहाँ तक सम्भव हो सका इसे युक्तियुक्त तथा सुविधाजनक बनाने का प्रयास किया गया। सम्भव है कि किसी संस्कृत पुस्तकालय के द्वारा इस प्रकार का किया गया यह प्रथम कार्य हो। मुझे खुशी है कि मैं अपने पाठक को रीडिंग टेवल पर ही पुस्तक सूची दे दिया।
आशा है सुधी उपयोगकर्ता उपयोग के द्वारा इसके सैद्धांतिक पक्ष से परिचित हो जाएंगे । इसमें अनेक त्रुटियां रह जाना स्वाभाविक है,क्योंकि हम करके सीखते हैं। भविष्य में इसमें और अधिक परिवर्तन तथा संशोधन किया जाता रहेगा। संस्कृत पुस्तकालयों को चाहिए कि वे भी पाठकों की सुविधा को ध्यान में रखकर इस प्रकार का अभिनव प्रयास करेंगें।
विजेन्द्र शर्मा भारद्वाज का प्रश्न-
इस app से केवल पुस्तक व लेखक का नाम ही जान पाते हैं, अगर वो पुस्तक ही पढ़नी हो तो क्या करें इस एप्प से...?
App की उपयोगिता
यदि आप किसी पुस्तकालय या विद्यालय के लिए पुस्तक खरीदने की योजना बना रहे है, किसी विषय पर कौन कौन पुस्तक बाजार में उपलब्ध है, इससे पता करें आदि अनेक उपयोग हैं। आपको कई ऐसे पुस्तकों की जानकारी भी मिलेगी,जिसे पढने की सलाह आजतक आपको किसी ने नहीं दिया होगा। अनुसंधान निर्देशक तथा कक्षा में पाठ्येतर सामग्री,सहायक ग्रन्थ की जानकारी देने के लिए यहाँ से सूचना पा सकेंगें। संस्कृत में सद्यः प्रकाशित ग्रन्थों को भी सूची में स्थान दिया गया है। ग्रन्थ और ग्रन्थकार का नाम पलक झपकते आपके पास होती है। अबतक आप लोग संस्कृत के 200 से 500 पुस्तकों के नामों, लेखकों से परिचित होंगें। अब आपका दायरा बढ जाएगा।  अबतक इस प्रकार का साधन और सुविधा आपको नहीं मिली थी। शोधार्थी तथा अन्य जिज्ञासु समय निकालकर हमारे पुस्तकालय में आकर पढ सकते हैं। इसे पुस्तक का नाम इन्टरनेट पर खोजकर पढा जा सकता है। पुस्तक संदर्शिका App में तीन कारणों से पुस्तक पढने की सुविधा उपलब्ध नहीं करायी गयी। 1- पुस्तकों की DTP (टाइप कराना) कराकर हम उन पुस्तकों को ही उपलब्ध करा सकते, जिसपर किसी का कापीराइट नहीं हो अथवा इस हेतु लेखक प्रकाशक हमें अनुमति दें। यह कार्य व्यय और श्रम साध्य है। यह कार्य कई लोग कर रहे हैं। अनेक बेवसाइट पर उपलब्ध है।
2- PDF के रूप में पुस्तकों उपलब्ध कराने के लिए भी लेखक प्रकाशक से अनुमति चाहिए। यह भी भिन्न प्रकृति का काम है। इसके लिए डाटा स्पेश चाहिए।
3- यदि कुछ पुस्तकों के लिए अनुमति मिल भी जाती है तो इससे App के Mb में वृद्धि होती। सभी उपयोगकर्ता को इसके लिए डाटा खर्च करना पडता। उतने में वे पुस्तक खरीद भी सकते हैं। मेरा लक्ष्य पुस्तक के बारे में जानकारी प्रदान करना है। अनेक पुस्तकें इन्टरनेट पर उपलब्ध हैं। इस App की सहायता से कौन पुस्तक किस प्रकाशन से छपी है, पता कर खरीद लें अथवा इन्टरनेट पर जाकर पढ लें।
हमारा लक्ष्य 2 G उपयोक्ताओं तक पुस्तक सूची पहुँचाना है। हर पाठक के मोबाईल में कम स्थान ले। वह भी सिर्फ 1 बार 3 Mb डाटा खर्च कर। कई बार बडे साइज के कारण लोगों को App हटाना पडता है।
आप इस ऐप की उपयोगिता पर और भी प्रश्न कर सकते हैं।
प्रोफेसर मदनमोहन झा तथा इनके सुपुत्र श्री सृजन झा ने सर्वसुलभ इस पुस्तक संदर्शिका के द्वारा पुस्तकालय में भंडारित पुस्तकों तथा हस्तलेखों को जन-जन के Android फोन तक पहुँचाकर सबके लिए ज्ञान का द्वार उद्घाटित कर दिया है। इससे उपयोगकर्ताओं तक उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान, लखनऊ के पुस्तकालय में उपलब्ध सभी प्रकार की पुस्तकों की जानकारी पहुंचेगी। सभी पुस्तकें प्रयोग में आने लगेगी। पुस्तक खोज के क्रम में अनेकों पुस्तकों के नाम अनायास ही याद हो जायेंगें। पुस्तक संदर्शिका निर्माण में मैं निमित्तमात्र हूं । संस्कृत जगत् प्रो. झा का चिर आभारी रहेगा । मैं किन शब्दों में कृतज्ञता अर्पित करूं? 
App Download करने के लिए पुस्तक सन्दर्शिका  इस लिंक पर क्लिक करें। संस्कृत के अन्य App डाउनलोड करने के लिए search करें srujan jha

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वैचारिक लेख, कर्मकाण्ड,ज्योतिष, आयुर्वेद, विधि, विद्वानों की जीवनी, 15 हजार संस्कृत पुस्तकों, 4 हजार पाण्डुलिपियों के नाम, उ.प्र. के संस्कृत विद्यालयों, महाविद्यालयों आदि के नाम व पता, संस्कृत गीत
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