Uttar Pradesh Sanskrit Sansthan building Histry

   This building was gifted to the Uttar Pradesh Sanskrit Sansthan by a queen of Nepal, as she loved the language and wanted to contribute to it.
The campus dates back to 1971, when the sansthan was removed from its office in Royal Hotel, Lucknow. The then queen of Nepal, Shobha Devi Rana, had visited the sansthan and was impressed by its functioning. She decided to gift her house, a 22,000-sq ft property in New Hyderabad, situated on the banks of Gomti, to the sansthan for its office.

Uttar Pradesh Sanskrit Sansthan building

      The then chairman of the sansthan, Pt Karunapati Tripathi, had refused to accept it as a gift and insisted that the sansthan buy this house from the queen. Shobha Rana agreed and a token price of Rs 11 lakh was fixed. But the state department of languages, under which the sansthan operates, refused to give any money. Tripathi finally gave the money to the queen from the savings of the Sansthan and also contributed an amount from his own pocket. The deal had a clause that the Kadamb tree and an old well in the house would never be removed and the building, which came under the ownership of the Sansthan, would only be used for promotion of the Sanskrit language. The Sansthan finally shifted to this campus in 1971.
All these years, the Sansthan authorities kept their promise and dedicated the premises to the language.
        

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ज्ञानपण्यों ने कलुषित की संस्कृत गंगाधारा


     व्यापार करने वाला वणिक्‌ होता है। व्यापार वस्तु का हो या ज्ञान का फर्क विल्कुल नहीं है। दोनों अपने लाभ के लिए कार्य करते है। संस्कृत क्षेत्र में ज्ञानपण्यों की कमी नहीं। मैंने  संस्कृत से जुडे कार्यक्रमों में इनसे सहयोग की अपेक्षा की। आशा थी जिस प्रकार इन्होनें अपने गुरु से निःशुल्क शिक्षा प्राप्त की वैसे ही निःशुल्क वितरण भी करेंगें। किन्तु यह क्या ये तो ज्ञानपण्य हो गये।

        संस्कृत सम्भाषण का प्रशिक्षण देश में निःशुल्क दिया जा रहा है। उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान में भी सम्भाषण प्रशिक्षण कार्यक्रम रखा गया। परंतु हा धिक् विद्वद्गण सेवा की अपेक्षा लाभ की दृष्टि से इसे देखने लगे हैं। अलं विस्तरेण।
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आचार्य शंकर

शंकराचार्य की जीवनी

आचार्य शंकर का जन्म  केरल प्रदेश के पूर्णानदी के तट पर बसे कालाड़ी ग्राम में ७८० ईस्वी में हुआ। माता विशिष्टा ने वैशाख शुक्ल पंचमी को इन्हें जन्म दिया।  उनके जन्म तिथि के संबंध में मतभेद है लेकिन अधिकांश लोगों का यही मानना है कि वे ७८८ ई. में आविर्भूत हुए । उनके पिता का नाम शिवगुरु तथा माता का नाम सुभद्रा या विशिष्टा था।
उनके बचपन से ही मालूम होने लगा कि किसी महान् विभूति का अवतार हुआ है।  पाँचवे वर्ष में यज्ञोपवीत करा कर इन्हें गुरु के घर पढ़ने के लिए भेजा गया और सात वर्ष की आयु में ही आप वेद, वेदान्त और वेदाङ्गों का पूर्ण अध्ययन कर वापस आ गये।  वेदाध्ययन के उपरान्त आपने संन्यास ग्रहण करना चाहा किन्तु माता ने उन्हें आज्ञा नहीं दी।
एक दिन वे माँ के साथ नदी पर स्नान करने गये, वहाँ मगर ने उन्हें पकड़ लिया।  माँ हाहाकार मचाने लगी।  शंकर ने माँ से कहा तुम यदि मुझे संन्यास लेने की अनुमति दो तो मगर मुझे छोड़े देगा।  माँ ने आज्ञा दे दी।  जाते समय माँ से कहते गये कि तुम्हारी मृत्यु के समय मैं घर पर उपस्थित रहूँगा।  घर से चलकर आप नर्मदा तट पर आये, वहाँ गोविन्द-भगवत्पाद से दीक्षा ग्रहण की।  उन्होंने गुरु द्वारा बताये गये मार्ग से साधना शुरु कर दी अल्पकाल में ही योग सिद्ध महात्मा हो गये।  गुरु की आज्ञा से वे काशी आये।  यहाँ उनके अनेक शिष्य बन गये, उनके पहले शिष्य बने सनन्दन जो कालान्तर में पद्मपादाचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए।  वे शिष्यों को पढ़ाने के साथ-साथ ग्रंथ भी लिखते जाते थे।  कहते हैं कि एक दिन भगवान विश्वनाथ ने चाण्डाल के रुप में उन्हें दर्शन दिया और ब्रह्मसूत्र पर भाष्य लिखने और धर्म का प्रचार करने का आदेश दिया।  जब भाष्य लिख चुके तो एक दिन एक ब्राह्मण ने गंगा तट पर उनसे एक सूत्र का अर्थ पूछा।  उस सूत्र पर उनका उस ब्राह्मण के साथ आठ दिन तक शास्त्रार्थ हुआ।
बाद में मालूम हुआ कि ब्राह्मण और कोई नहीं साक्षात् भगवान् वेद व्यास थे।  वहाँ के कुरुक्षेत्र होते हुए वे बदरिकाश्रम पहुँचे।  उन्होंने अपने सभी ग्रंथ प्राय: काशी या बदरिकाश्रम में लिखे थे, वहाँ से वे प्रयाग गये और कुमारिल भट्ट से भेंट की।  कुमारिल भट्ट के कथनानुसार वे माहिष्मति नगरी में मण्डन मिश्र के पास शास्त्रार्थ के लिए आये।  उस शास्त्रार्थ में मध्यस्थ थीं मण्डन मिश्र की विदुषी पत्नी भारती  इसमें मण्डन मिश्र की पराजय हुई, और उन्होंने शंकराचार्य का शिष्यत्व ग्रहण किया।  इस प्रकार भारत-भ्रमण के साथ विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित कर वे बदरिकाश्रम लौट आये । वहाँ ज्योतिर्मठ की स्थापना की और तोटकाचार्य को उसका मठाधीश बनाया।  अंतत: वे केदार क्षेत्र में आये और वहीं इनका जीवन सूर्य अस्त हो गया।
          
           शंकर की कृपा से जन्में बालक का नाम शंकर पड़ा।  आठवें वर्ष में शंकर ने सन्यास ले लिया।  गुरु की खोज में ओंकारेश्वर पहुँचे जहाँ इन्हें गोविन्दाचार्य मिले।  तीन वर्ष अध्ययन करके बारह वर्ष की आयु में ये काशी पहुँचे।  काशी में गंगा स्नान करके लौटते समय एक चांडाल को मार्ग से हटो कहा तब चांडाल ने इन्हें 'अद्वैत' का वास्तविक ज्ञान दिया और काशी में चांडाल रुपधारी शंकर से पूर्ण शिक्षा प्राप्त की। इन्होंने केदार धाम में ३२ वर्ष की आयु में शिवसायुज्य प्राप्त किया।

शंकराचार्य का कृतित्व

 आचार्य शंकर ने १४ वर्ष की उम्र में ब्रह्मसूत्र, गीता, उपनिषद् पर भाष्य लिखे।  सोलह वर्ष की उम्र में वेदव्यास से भेंट हुई। प्रयाग में कुमारिल भट्ट से मिले, महिष्मति में मंडन मिश्र से शास्त्रार्थ किया।  
भगवान् शंकर के संबंध में जो भी पाठ्य सामग्री प्राप्त है तथा उनके जीवन संबंध में जो भी घटनाएँ मिलती हैं उनसे ज्ञात होता है कि वे एक अलौकिक व्यक्ति थे।  उनके व्यक्तित्व में प्रकाण्ड पाण्डित्य, गंभीर विचार शैली, अगाध भगवद्भक्ति आदि का दुर्लभ समावेश दिखायी देता है।  उनकी वाणी में मानों सरस्वती का वास था। 
         उनके ही समय में भारत में वेदान्त दर्शन अद्वैतवाद का सर्वाधिक प्रचार हुआ, उन्हें अद्वैतवाद का प्रवर्त्तक माना जाता है।  ब्रह्मसूत्र पर जितने भी भाष्य मिलते हैं उनमें सबसे प्राचीन शंकर भाष्य ही है।
उनके लिखे ग्रंथों की संख्या २६२ बतायी जाती है, लेकिन यह कहना कठिन है कि ये सारे ग्रंथ उन्हीं के लिख हैं।  उनके प्रधान ग्रंथ इस प्रकार हैं - ब्रह्मसूत्र भाष्य, उपनिषद् भाष्य, गीता भाष्य, विष्णु सहस्रनाम भाष्य, सनत्सुजातीय भाष्य, हस्तामलक भाष्य आदि।इन्होंने समस्त भारतवर्ष में भ्रमण करके बौद्ध धर्म को मिथ्या प्रमाणित करके वैदिक धर्म को पुनरुजीवित किया था ।  इन्होंने भारतवर्ष में चार मठों की स्थापना की थी जो अभी तक बहुत प्रसिद्ध और पवित्र माने जाते हैं और जिनके प्रबंधक तथा गद्दी के अधिकारी शंकराचार्य कहे जाते है । वे चारों स्थान निम्न- लिखित हैं—() बद्रिकाश्रम, (२) करवीरपीठ, () द्वारिका- पीठ और (४) शरदापीठ । इन्होंने अनेक विधर्मियों को भी अपने धर्म में दक्षित किया था । ये शंकर के अवतार माने जाते है ।
बिहार के सहरसा स्थित महिषी गाँव (प्राचीन काल में इसे महिष्मा के नाम  से जाना जाता था) में विश्व विख्यात दार्शनिक मंडन मिश्र का आविर्भाव हुआ था, साथ ही महामान्य आदि शंकराचार्य के पवित्र चरण भी पड़े थे। इसी स्थल पर जगत जननी उग्र तारा का प्राचीन मंदिर भी अवस्थित है और इसे सिद्धताभी प्राप्त है। यह भी उल्लेख मिलता है कि शिव तांडव में सती कि बायीं आँख इसी स्थान पर गिरी थी, जहाँ अक्षोभ्य ऋषि सहित नील सरस्वती तथा एक माता भगवती के साथ महिमामयी उग्रतारा की मूर्ति भी विराजमान है।
पौराणिक आख्यानों की मानें तो जब भगवान शिव महामाया सती का शव लेकर विक्षिप्त अवस्था में ब्रह्मांड का विचरण कर रहे थे, सती की नाभि महिषी गाँव में गिरी थी। मुनि वशिष्ठ ने उस जगह माँ उग्रतारा पीठ की स्थापना की। इसीलिए यह मंदिर सिद्ध पीठ और तंत्र साधना का केंद्र है। इस मंदिर से सौ कदम दूर लगभग दो एकड़ की एक वीरान भूमि है जहाँ पैर रखते ही एक अदृश्य आकर्षण आज भी होता है, इसी स्थान पर उस महापुरुष मंडन मिश्र का जन्म हुआ था जिनकी पत्नी भारती ने अपने पति के स्वाभिमान की रक्षा के लिए आदि शंकराचार्य को शास्त्रार्थ में पराजित किया था।

इस पराजय के पश्चात् आदि शंकराचार्य ने मंडन मिश्र को अपना उत्तराधिकारी बनाया जो साठ  वर्षों तक द्वितीय शंकराचार्य के रूप में विख्यात हुए। यह घटना आज से लगभग 2400 वर्ष पूर्व की है और तब से लेकर अब तक सत्तर शकाराचार्य हो चुके हैं। अतीत में और पीछे जाएँ तो पाते हैं कि मुनि वशिष्ठ ने हिमालय की तराई तिब्बत में उग्रतारा विद्या की महासिद्धी के बाद धेमुड़ा (धर्ममूला) नदी के किनारे स्थित महिष्मति (वर्तमान महिषी) में माँ उग्रतारा की मूर्ति स्थापित की थी। किंवदंतियां यह भी है कि निरंतर शास्त्रार्थ के कारण यहाँ के तोते और अन्य पक्षी भी शास्त्र की बातें करते थे।
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संस्कृत विभागों में भ्रष्टाचार को रोकने के लिये सूचना का अधिकार अधिनियम को जानें।

जन सूचना अधिकारी के कार्य
प्रत्येक सरकारी विभाग में एक या अधिक अधिकारियों को जन सूचना अधिकारी (पीआईओ) का पद दिया गया है. ये जन सूचना अधिकारी प्रधान अधिकारियों के रूप में कार्य करते हैं. आपको अपनी सूचना हेतु प्रार्थनापत्र इनके पास जमा करनी होती है. यह उनका उत्तरदायित्व होता है कि वे उस विभाग के विभिन्न भागों से आपके द्वारा मांगी गयी जानकारी इकठ्ठा कर आपको प्रदान करें. इसके अलावा, कई अधिकारियों को सहायक जन सूचना अधिकारी के पद पर सेवायोजित किया गया है. उनका कार्य केवल जनता से प्रार्थनापत्र स्वीकारना व उचित पीआईओ के पास भेजना है.
प्रार्थनापत्र की फीस
एक प्रार्थनापत्र की फीस केंद्र सरकार के विभागों के लिए यह 10 रु. है. 
विभिन्न राज्यों ने भिन्न फीसें रखीं हैं. सूचना पाने के लिए, आपको 2रु. प्रति सूचना पृष्ठ केंद्र सरकार के विभागों के लिए देना होता है. यह विभिन्न राज्यों के लिए अलग- अलग है. इसी प्रकार दस्तावेजों के निरीक्षण के लिए भी फीस का प्रावधान है. निरीक्षण के पहले घंटे की कोई फीस नहीं है लेकिन उसके पश्चात् प्रत्येक घंटे या उसके भाग की रु. प्रतिघंटा फीस होगी. यह केन्द्रीय कानून के अनुसार है. प्रत्येक राज्य के लिए, सम्बंधित राज्य के नियम देखें. 
सूचना पाने के लिए फीस की अदायगी
प्रत्येक राज्य का अर्ज़ी फीस जमा करने का अलग तरीका है. साधारणतया, आप अपनी अर्ज़ी की फीस ऐसे दे सकते हैं:
आप फीस नकद में, डीडी या बैंकर चैक या पोस्टल आर्डर जो उस जन प्राधिकरण के पक्ष में देय हो द्वारा जमा कर सकते हैं. कुछ राज्यों में, आप कोर्ट फीस टिकटें खरीद सकते हैं व अपनी अर्ज़ी पर चिपका सकते हैं. ऐसा करने पर आपकी फीस जमा मानी जायेगी. आप तब अपनी अर्ज़ी स्वयं या डाक से जमा करा सकते हैं.
  • स्वयं नकद भुगतान द्वारा (अपनी रसीद लेना न भूलें)
  • डाक द्वारा: 
  • डिमांड ड्राफ्ट से 
  • भारतीय पोस्टल आर्डर से 
  • मनी आर्डर से [केवल कुछ राज्यों में] 
  • कोर्ट फीस टिकट से [केवल कुछ राज्यों में] 
  •  बैंकर चैक से 
  1-कुछ राज्य सरकारों ने कुछ खाते निर्धारित किये हैं. आपको अपनी फीस इन खातों में जमा करानी होती है. इसके लिए, आप एसबीआई की किसी शाखा में जा सकते हैं और राशि उस खाते में जमा करा सकते हैं और जमा रसीद अपनी आरटीआई प्रार्थनापत्र के साथ लगा सकते हैं. 
2- आप अपनी आरटीआई आवेदन के साथ उस विभाग के पक्ष में देय डीडी या एक पोस्टल आर्डर भी लगा सकते हैं.
प्रार्थनापत्र
एक साधारण कागज़ पर अपना प्रार्थनापत्र बनाएं और इसे जन सूचना अधिकारी के पास स्वयं या डाक द्वारा जमा करें. (प्रार्थनापत्र की एक प्रति अपने पास निजी सन्दर्भ के लिए अवश्य रखें)


जन सूचना अधिकारी के उपलब्ध न होने की स्थिति में आप अपना प्रार्थनापत्र एपीआईओ या अन्य प्रार्थनापत्र लेने के लिए नियुक्त अधिकारी के पास अर्जी जमा कर सकते हैं.
पीआईओ या एपीआईओ का पता लगाना
यदि आपको पीआईओ या एपीआईओ का पता लगाने में कठिनाई होती है तो आप अपनी अर्जी पीआईओ c/o विभागाध्यक्ष को प्रेषित कर उस सम्बंधित जन प्राधिकरण को भेज सकते हैं. विभागाध्यक्ष को वह अर्जी सम्बंधित पीआईओ के पास भेजनी होगी.

सूचना प्राप्ति की कोई समय सीमा
आपने अपनी अर्जी पीआईओ को दी है, आपको 30 दिनों के भीतर सूचना मिल जानी चाहिए. यदि आपने सूचना हेतु प्रार्थनापत्र सहायक पीआईओ को दी है तो सूचना 35 दिनों के भीतर दी जानी चाहिए. उन मामलों में जहाँ सूचना किसी एकल के जीवन और स्वतंत्रता को प्रभावित करती हो, सूचना 48 घंटों के भीतर उपलब्ध हो जानी चाहिए.
सूचना हेतु प्रार्थनापत्र देने का कारण बताना आवश्यक नहीं है
आपको कोई कारण या अन्य सूचना केवल अपने संपर्क विवरण (जो हैं नाम, पता, फोन न.) के अतिरिक्त देने की आवश्यकता नहीं है. अनुच्छेद 6(2) स्पष्टतः कहता है कि प्रार्थी से संपर्क विवरण के अतिरिक्त कुछ नहीं पूछा जायेगा.
पीआईओ आपकी सूचना हेतु प्रार्थनापत्र (आरटीआई) लेने से किसी भी परिस्थिति में मना नहीं कर सकता. चाहें वह सूचना उसके विभाग/ कार्यक्षेत्र में आती हो, उसे वह स्वीकार करनी होगी. यदि  आवेदन उस पीआईओ से सम्बंधित न हो, उसे वह उपयुक्त पीआईओ के पास 5 दिनों के भीतर अनुच्छेद 6(2) के तहत भेजनी होगी.
जवाबदेही जुर्माना
इतिहास में पहली बार कोई कानून किसी अधिकारी की अकर्मण्यता के प्रति जवाबदेही निर्धारित करता है. यदि सम्बंधित अधिकारी समय पर सूचना उपलब्ध नहीं कराता है, उस पर 250रु. प्रतिदिन के हिसाब से सूचना आयुक्त द्वारा जुर्माना लगाया जा सकता है. यदि दी गयी सूचना गलत है तो अधिकतम 25000रु. तक का जुर्माना लगाया जा सकता है. जुर्माना आपकी अर्जी गलत कारणों से नकारने या गलत सूचना देने पर भी लगाया जा सकता है. यह जुर्माना उस अधिकारी के निजी वेतन से काटा जाता है. जुर्माने की राशि सरकारी खजाने में जमा हो जाती है. हांलांकि अनुच्छेद 19 के तहत, प्रार्थी मुआवजा मांग सकता है.
यदि मुझे सूचना न मिले?
यदि आपको सूचना न मिले या आप प्राप्त सूचना से संतुष्ट न हों, आप पहला अपीलीय अधिकारी के पास सूचना का अधिकार अधिनियम के अनुच्छेद 19(1) के तहत एक अपील दायर कर सकते हैं.
पहला अपीलीय अधिकारी पीआईओ से वरिष्ठ रैंक का होता है.
प्रथम अपील का कोई प्रारूप नहीं होता (लेकिन कुछ राज्य सरकारों ने प्रारूप जारी किये हैं). एक सादा पन्ने पर प्रथम अपीली अधिकारी को संबोधित करते हुए अपनी अपीली अर्जी बनाएं. इस अर्जी के साथ अपनी मूल आवेदन पत्र व पीआईओ से प्राप्त जैसे भी उत्तर (यदि प्राप्त हुआ हो) की प्रतियाँ लगाना न भूलें.आपको प्रथम अपील की कोई फीस नहीं देनी होगी, कुछ राज्य सरकारों ने फीस का प्रावधान किया है.
आप अपनी प्रथम अपील सूचना प्राप्ति के 30 दिनों व आरटीआई  आवेदन दाखिल करने के 60 दिनों के भीतर दायर कर सकते हैं.
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