बन्दी नहीं, नियुक्ति है समाधान


इलाहाबाद के दैनिक समाचार पत्र हिंदुस्तान में यह समाचार छपते ही कुछ सजग संस्कृत प्रेमियों के बीच आक्रोश का उबाल आ गया। ऐसा नहीं है कि ऐसा आदेश केवल संस्कृत विद्यालय के लिए ही जारी हुआ है, चुंकि समाचार पत्र में संस्कृत विद्यालय के बारे में समाचार छप गया इसीलिए यह हमारा ध्यान आकर्षित कर गया। यू. पी. बोर्ड तथा बेसिक शिक्षा के अध्यापकों का स्थानान्तरण हो जाता है अतः वहाँ पर बन्द होने वाले स्कूल का असर और चिन्ता वहाँ के अध्यापकों को कम ही होती है।
 सरकार चाहती है कि विद्यालयों को रिफॉर्म किया जाए। जहां छात्र नहीं है, उसे बंद कर दिया जाए। इसके लिए कुछ लोग अपनी छाती पीटने लगे। दुर्भाग्य यह भी है कि संस्कृत समुदाय के लोग भी इसके लिए आवाज उठाने में या तो डरते हैं या हमेशा की तरह निष्क्रिय है । यहाँ समस्या से मुकाबला करने के बजाय अधिकांश आबादी चैन की नींद सो रही है। कुछ पीठ पीछे कर भाग रहे हैं। अंगुलि पर गिने जा सकने भर लोग यहाँ वहाँ उछल कूद कर अपनी आपत्ति दर्ज करा रहे हैं।  ( हाय-तौबा मचाने वाले की संख्या मुट्ठी भर है फिर भी इनका छाती पीटना मुझे अच्छा लगा)
उत्तर प्रदेश में कक्षा 6 से 12 तक के परम्परागत संस्कृत छात्रों की प्रथमा, पूर्व मध्यमा तथा उत्तर मध्यमा की परीक्षा कराने के लिए सम्पूर्णानन्द संस्कृत विश्वविद्यालय से अलग कर उ0प्र0 माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद, शाहमीना रोड, लखनऊ का गठन राज्य सरकार की अधिसूचना संख्या 102 सा0/15/09/2001-25 (72)/96 दिनाँकः 17/02/2001 द्वारा किया गया। यह संस्कृत भवन, 2 शाहमीना रोड, लखनऊ २२६ ००३ पर अवस्थित है। माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद् में नए संस्कृत विद्यालय खोलने के इच्छुक लोग अक्सर मिलते रहते हैं । मैं उनसे एक ही प्रश्न पूछता हूं, आप विद्यालय क्यों खोलना चाहते हैं? वे कहते हैं मेरे यहां संस्कृत विद्यालय नहीं है। मैं लोगों को संस्कृत बढ़ाना चाहता हूं। मैं पूछता हूं आपके खोले जाने वाले विद्यालय से कितनी दूरी पर संस्कृत विद्यालय है तो अक्सर लोग 10 से 20 किलोमीटर की दूरी बताते हैं। जिन्हें नहीं पता होता है, उन्हें मैं बता देता हूं। मैं पुनः पूछता हूं कि आप की अभिरुचि लोगों को संस्कृत पढ़ाने में है अथवा विद्यालय खोलने में है? यदि लोगों को संस्कृत पढ़ाने में है तो उन्हीं विद्यालयों में नामांकन क्यों नहीं करा देते? छात्रों को अपनी ओर से सुविधाएं क्यों नहीं देते? यदि आपकी इच्छा संस्कृत की सेवा है तो वर्तमान विद्यालय को ही मजबूत कीजिए क्योंकि वही दुर्दशा ग्रस्त है। आपके यहां 10 किलोमीटर से लोग आएंगे भी नहीं। स्थानीय इतने बच्चे मिलते भी नहीं। इससे अच्छा होगा कि आप दूसरे विद्यालय में आवासीय व्यवस्था करा दें। मेरे प्रश्नों का लोग समुचित उत्तर नहीं दे पाते और अक्सर चुप हो जाते हैं। दरअसल संस्कृत विद्यालय खोलने और चलाने के पीछे कुछ और ही लक्ष्य निर्धारित होता है जिसमें संस्कृत सेवा नहीं बल्कि स्वयं की सेवा की सोच होती है। मैं कई बार लिख चुका हूं कि एक-एक व्यक्ति कई विद्यालयों का प्रबंधक बन बैठा है जिससे उसे सुधारना भी मुश्किल हो गया है।
तर्क दिया जा रहा है कि
1- बन्दी नहीं नियुक्ति आवश्यक है ।
2- पहले शिक्षक दीजिये , फिर विद्यालयों को व्यवस्थित कीजिये ।
3- 1994 से यदि संस्थान में शिक्षक नहीं है तो सभी सरकारें दोषी हैं । पर आप तो पहल कीजिए ।
4- नियुक्तियों में यदि विसंगतियां हैं उन्हें तत्काल ठीक करें ।
5- वर्षों से बिना वित्तीय मदद के चल रहे विद्यालयों को बन्द करने का विचार तुरन्त वापस लें ।
6- जब माध्यमिक में ही नियुक्ति नहीं , छात्र नहीं तो क्या आप भविष्य में महाविद्यालय और विश्वविद्यालय भी बन्द करेंगे , यह सोच भी खतरनाक है ।
7- विद्यालयों को वर्षों से खण्डहर बनाकर रखा है, किसी ने मदद नहीं की, अब उन्हें अभिशाप नहीं, अनुदान दीजिये ।
8- जब प्रदेश में लाखों प्राथमिक विद्यालय चल सकते हैं जिनकी दशा किसी से छिपी नहीं , हजारों उर्दू शिक्षकों की नियुक्तियां हो सकती हैं तब बचे खुचे संस्कृत विद्यालयों को बन्द करना अस्वीकार्य है ।
संस्कृत सप्ताह की शुभकामना भी और यह निर्णय भी दोनों एकसाथ उचित नहीं ।
इन सभी तर्कों में लेकिन लगा हुआ है विद्यालयों में अध्यापकों की नियुक्ति कर देने मात्र से छात्र संख्या बढ़ जाएगी इसकी संभावना नगण्य है हम लोग प्रायः समाचार पत्रों में यह खबर पढ़ते रहते हैं कि इंटर कॉलेज में पर्याप्त अध्यापकों के रहते भी छात्र नहीं है इसके पीछे कुछ और कारण है। उन कारणों पर भी विचार करना होगा। जिस इंटर कॉलेज में संस्कृत के अध्यापक हैं भी वहां के छात्र संस्कृत पढ़ना ही नहीं चाह रहे हैं। मानविकी के ऐसे तमाम विषय हैं जहां छात्रों का टोटा बना हुआ है, जबकि वहां अध्यापक भी हैं और सभी प्रकार के संसाधन भी। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन विषयों को पढ़ने के बाद रोजगार के उतने अवसर उपलब्ध नहीं है जितने की विज्ञान, वाणिज्य,कानून आदि विषयों को पढ़ने के बाद।
यदि आप केंद्र सरकार और विभिन्न राज्य सरकारों की लोक सेवा आयोग तथा विभिन्न एजेंसियों द्वारा आयोजित प्रतियोगी परीक्षाओं पर ध्यान दें तो आप पाएंगे कि सिविल सेवा परीक्षा में अधिकांश इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्र के बच्चों का चयन होने लगा है। बैंकिंग सेक्टर में भी बीटेक किये छात्र की संख्या में इजाफा देखी जा रही है। आज जब हिंदी माध्यम के बच्चे प्रतियोगी परीक्षाओं में अपर्याप्त मात्रा में चयनित हो पा रहे हैं तो संस्कृत की स्थिति दूर की कौड़ी है। यह इसलिए क्योंकि हम अपने पाठ्यक्रम में सुधार करना नहीं चाहते । शिक्षण पद्धति में बदलाव लाना नहीं चाहते। स्वयं को रिफॉर्म नहीं करना चाहते। आप जानते होंगे कि हिंदी में करंट अफेयर्स कंटेंट का भारी अकाल रहता है। संस्कृत में तो है ही नहीं फिर प्रतियोगी परीक्षा में छात्र सफल होंगे तो कैसे? मैंने आज से 4 वर्ष पहले उत्तर प्रदेश के परंपरागत माध्यमिक विद्यालयों के पाठ्यक्रमों में परिवर्तन का खाका खींचा था, वह अब लागू होने के कगार पर है। इस पाठ्यक्रम मैं हम बुर्ज खलीफा के बारे में नहीं पढ़ा सकते। ट्रेन 18 के बारे में नहीं बता सकते। यहां कालिदास पढ़ाये जाएंगे जबकि प्रतियोगी परीक्षा में समसामयिक विषयों के प्रश्न पूछे जायेंगे ।
रिफॉर्म करने के लिए जिंदगी लगानी हीं पड़ती है। माध्यमिक संस्कृत शिक्षा परिषद् कि अपनी वेबसाइट नहीं थी मैंने इसके पीछे लग कर उसका वेबसाइट बनवाया आज उसका फायदा सभी लोगों को मिल पा रहा है। यद्यपि मैं वहां का शिक्षक नहीं हूं फिर भी संस्कृत के हित के लिए काम करना पड़ता है। यदि जागरूक रहते हुए एक एक व्यक्ति एक एक कदम भी सुधारात्मक काम किया होता तो आज यह मुंह देखने को नहीं मिलता। आज से 2 माह पहले 200 से अधिक संस्कृत के शिक्षक जुटे थे जिसमें से 5 अध्यापक ऐसे नहीं मिल पाए जिन्होंने अपने जीवन काल में संस्कृत की कोई कुंजी भी लिखी हो अब आप उनकी शैक्षिक यात्रा से अवगत हो चुके होंगे। लोग तो बस झोला उठाकर सरकार की नौकरी करने चले आए। यदि संकटग्रस्त भाषा संस्कृत को बचाना है तो यहां यह सब नहीं चल पाएगा आप भी मिटेंगे और संस्कृत भी मिट जाएगी।
आवश्यकता इस बात की है कि हर एक अध्यापक को अपनी उपलब्धि दिखाने के लिए कुछ होना चाहिए। उन्हें अध्ययन शील होना चाहिए और बाल्मीकि की तरह लव कुश को पढ़ाना चाहिए। वही लव कुश आज अश्वमेध का घोड़ा रोक लिया होता।
 जो लोग संस्कृत शिक्षा से जुड़े हैं वे बैठकर एक बार सोचें कि उन्होंने जनता को दिखाने लायक क्या काम किया और उनकी अब तक की उपलब्धि क्या रही है। निष्कर्ष स्वयं सामने आ जाएगा।

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काश्मीर का साहित्यिक एवं सांस्कृतिक इतिहास

काश्मीर का प्रामाणिक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक इतिहास जानने के दो मुख्य स्रोत हैं। पहला 12 वीं शती में कल्हण द्वारा रचित राजतरंगिणी एवं दूसरा मज्जिन सेनाचार्य का नीलमत पुराण ।  नीलमत पुराण एक उपपुराण है।   इसमें कश्मीर का वंशचरित, भूगोल का वर्णन है । इसमें वर्षों से कश्मीर में प्रचलित कथाओं,पराम्पराओं, स्थानों का वर्णन किया गया है। नीलमत शिव को व्याल यज्ञोपवीति कहता है। अर्थात् जिसने सर्प को जनेऊ (यज्ञोपवीत) की तरह धारण किया हो। इस देश की उत्पत्ति कथा बहुत ही रोचक है। यह कश्यप के पुत्रों, जो नाग थे उनका देश है। उनका नाम नील था। यहाँ नाग कहता है कि मैं मनुष्य के साथ  निवास नहीं कर सकता। इससे कुपित होकर कश्यप ने उन्हें पिशाचों के साथ रहने का शाप दिया। कश्यप द्वारा शापित नील ने गरुड के भय के बारे में बताते हुए करबद्ध क्षमा याचना की। पिता ने उस हिमालय पर पिशाचों के साथ रहने को कहा। वहाँ निकुम्भ ओर दुष्ट पिशाचों के बीच छः माह चलने वाले युद्ध का वर्णन मिलता है। कश्यप ऋषि कहते हैं- निकुम्भ के चले जाने पर छः माह तक मानवी सेना के साथ रहो। पुराण में नागों के इस देश को कश्मीर कहा गया है।
         तैनासौ निर्मितो देशः कश्मीराख्यो भविष्यति।
कश्मीर में शारदा पीठ है, अर्थात् ज्ञान का पीठ। यही पर ज्ञानियों की परीक्षा होती थी।  इसी धरा पर ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी माँ शारदा विराजती है। हम प्रतिदिन उनकी प्रार्थना करते हैं।
नमस्ते शारदे देवि काश्मीरपुरवासिनि ।

त्वामहं प्रार्थये नित्यं विद्यादानं च देहि मे ॥
 आप निःशुल्क डाउनलोड पर क्लिक कर इसे पा सकते हैं।
            कल्हण द्वारा लिखित राजतरंगिणी में कश्मीर के 2000 वर्षों का इतिहास वर्णित है। इसे पढ़े विना कश्मीर के इतिहास और संस्कृति को समझना असंभव हैै।.
राजतरंगिणी में कल्हण ने अनेक स्थलों पर नीलमत पुराण के श्लोकों को उद्धृत किया है। संस्कृत के ग्रन्थों में प्रवरसेन से लेकर चन्द्रापीड आदि राजाओं की कथा मिलती है। वहाँ 697 ई. से 738 ई. तक हिन्दू शासक ललितादित्य ने शासन किया। इसके बाद इनका का उत्तराधिकारी अवन्तिवर्मन्  बना। अवन्तिवर्मन् ने श्रीनगर के निकट अवंतिपुर बसाया। नीलमत पुराण 1924 में द पंजाब संस्कृत बुक डिपो लाहौर से प्रकाशित है।
नीलमतपुराण का अध्ययन करने पर यह बात निश्चित हो जाती है कि नीलमतपुराण वास्तव मे कश्मीर का भूगोल है । यह पुराण कश्मीर के पर्वतों , नदियों , जलाशयों , तीर्थों , दैवस्थानों, आदि का विशद विवरण करता है । उसमें जिन स्थानों, नदियों, पर्वत शिखरों, जलाशयों ,तीर्थों तथा दैवस्थान का उल्लेख है वह आज भी अपने मूल अपभ्रंश अथवा परिवर्तित नामों के साथ मिलते हैं। यहाँ उसकी अवस्थिति जहाँ बतायी गयी है वहीं ये स्थल मिलते है । उनकी दिशा, उनके समीप के वर्णित प्राकृतिक भौगोलिक स्थान , यथा स्थान मिलते है । बहुत से लुप्त स्थानों को नीलामत पुराण के आधार पर खोजा गया है । उल्लेखनीय है कि नीलमतपुराण कश्मीर की प्राचीन परंपरा , इतिहास, धर्म, आचार -विचार, रहन -सहन का सजीव चित्रण करता है । निस्संदेह तत्कालीन समाज का वास्तविक चित्र आँखो के सामने आ जाता है । नीलमत पुराण मे वर्णित स्थानों, उपस्थानो को मूल श्लोको से मिलाकर अध्ययन करने से वास्तविकता पर प्रकाश पडता है ।
चीनी पर्यटक ह्वेनसांग कल्हण से पहले कश्मीर आ चुका था। उसने नीलमत पुराण द्धारा वर्णित कश्मीर के इतिहास तथा कथाओं का उल्लेख किया है । निस्संदेह तत्कालीन कश्मीर मे नीलमतपुराण के प्रचलित होने की पुष्टि करता है ।
कल्हण ने नीलमतपुराण से यथेष्ट ऐतिहासिक सामग्री लेकर राजतरंगिणी की रचना की है । कल्हण द्धारा उल्लिखित कम से कम दो बाते ह्वेनसांग के पर्यटन वर्णन में मिलती है । ह्वेनसांग ने  संस्कृत ग्रन्थों के आधार पर लिखा है। प्राचीन काल मे कश्मीर विशाल सरोवर अर्थात "सतीसर" था । जल बह जाने के कारण भूमिमय उपत्यका बन गई थी। नाग जाति यहाँ की सरंक्षक थी । जल बह जाने पर सरोवर कश्मीर राज्य के रूप मे परिणत हो गया । उस समय भी नाग जाति यहाँ पर थी ।
ह्वेनसांग " मिहिर कुल" का वर्णन करता है वह कश्मीर का राजा था । राजतरंगिणी मे कल्हण ने पहली घटना ( सतीसर - जल प्लावन ) का वर्णन 1:25-31 मे किया है । दूसरी घटना ( मिहिर कुल ) के शासन ओर उसके राज्य काल के सन्दर्भ मे इस विषय पर ओर प्रकाश डाला गया है । ( तरंग --1 , 289-325 )
कश्मीर मे मुस्लिम शासन हो जाने पर भी नीलमत पुराण की मान्यता थी । नीलमतपुराण की प्राचीनता तथा उसके उसके अस्तित्व का समर्थन श्री जोनराज द्वितीय राजतरंगिणी में करते है।
परम्परागत रूप से कश्मीर का साहित्य संस्कृत में था। यहाँ भारतीय काव्यशास्त्र तथा शैवागम परम्परा का जन्म हुआ। नीचे कश्मीर के संस्कृत के प्रमुख साहित्यकारों के नाम और उनके समय का उल्लेख किया जा रहा हैं-
लगध, (1400-1200 ई,पू.) वेदाङ्ग ज्योतिष के लेखक।
चरक, ( ई. के प्रशम शती से 300 ई,पू.तक ) आयुर्वेदिक ग्रन्थ चरक संहिता के लेखक।
विष्णु शर्मा, पंचतन्त्र के रचयिता ; 300 ईसा पूर्व
नागसेन, (ई. पू. द्वितीय शती)  बौद्ध धर्म के प्रमुख आचार्य, मिलिन्द प्रश्न के उत्तर दाता (Pali: Milinda), the तिसत, c. 500 AD. A medical writer.[13]
जैज्जट,? 5 वीं शताब्दी, एक चिकित्सा और संभवत: सुश्रुत संहिता पर सबसे प्रारंभिक टीकाकार (ज्ञात), जिसे बाद में दल्हन ने उद्धृत किया।
वाग्भट, 7 वीं शताब्दी। आयुर्वेद के 'त्रिमूर्ति' (चरक और सुश्रुत के साथ) के रूप में माना जाता है।
भामह, 7 वीं शताब्दी। कल्हणकृत राजतरंगिणी के अनुसार ये कश्मीर के शासक जयापीड की विद्वत्परिषद् के सभापति थे। इन्होंने काव्यशास्त्र पर काव्यालंकार नामक ग्रंथ लिखा।
रविगुप्त, 700-725 कश्मीर के बौद्ध दार्शनिक
आनन्दवर्धन, 820-890 ध्वनि सम्प्रदाय के प्रवर्तक आचार्य, 'ध्वन्यालोक' ग्रन्थ के लेखक।
वसुगुप्त, 860-925 वसुगुप्त को कश्मीर शैव दर्शन (प्रत्यभिज्ञा दर्शन) की परम्परा का प्रणेता माना जाता है। उन्होंने शिवसूत्र की रचना की थी।
सोमानन्द, 875-925 कश्मीर के शैव दार्शनिक ।
वटेश्वर, 880, वैवस्वर-सिद्धान्त के लेखक।
रुद्रट, 9वीं शती, अलंकार संप्रदाय के प्रमुख आचार्य। काव्यालंकार तथा श्रृंगार तिलक नामक ग्रन्थ के रचयिता।
उद्भट, 9वीं शती का पूर्वार्द्ध । काव्यालंकारसारसंग्रह तथा  भामह विवरण के लेखक।
शंकुक, 9वीं शती का आरम्भ। भरत के रस सूत्र के द्वितीय व्याख्याकार। अनुमितिवाद या अनुकृतिवाद के जनक। 
जयन्त भट्ट, 9वीं शती
भट्ट नायक,  9वीं - 10वीं शती, प्रसिद्ध काव्यशास्त्रकार। हृदयदर्पण नामक अनुपलब्ध ग्रन्थ के लेखक। ध्वनिविरोधी एवं रसनिष्पति सम्बन्धी सिद्धांतों के लिए जाने जाते हैं।
मेधातिथि, 9वीं - 10वीं शती, मनुस्मृति के टीकाकार।
अभिनव गुप्त,  950-1020 इनके बारे में मैं एक पृथक् लेख में विस्तार पूर्वक लिख चुका हूँ। नीचे लिंक में देखें।
मुकुल भट्ट,  कल्लट के पुत्र । अभिधावृत्तिमातृका के लेखक। राजतरंगिणी के अनुसार भट्ट कल्लट कश्मीर नरेश अवंतिवर्मा के शासनकाल में वर्तमान थे। अवंतिवर्मा का समय सन् 857-884 ई॰ मान्य है अत: मुकुल भट्ट का समय नवीं शताब्दी का अंतिम चरण और दसवीं का प्रारंभ है।
वल्लभदेव, 10 वीं शताब्दी। कालिदास के रघुवंश पर रघुपंचिका नामक टीकालिकने वाले प्रथम टीकाकार ।.
उत्पल देव, 10 वीं शताब्दी। एक महत्वपूर्ण गणितज्ञ।
क्षेमेन्द्र,  990-1070
क्षेमराज, 10 वीं शताब्दी के अंत / 11 वीं शताब्दी की शुरुआत में
बिल्हण, ग्यारहवीं शताब्दी। कश्मीर के प्रसिद्ध कवि। चौरपंचाशिका तथा विक्रमांकदेवचरितम् के लेखक। विक्रमांकदेवचरितम् ऐतिहासिक काव्य है।
कल्हण,  12वीं शती । राजतरंगिणी के लेखक। इसमें कश्मीर के 2000 वर्षों का इतिहास वर्णित है।
जल्हण, बारहवीं शताब्दी। इन्होंने 380 संस्कृत कवियों के काम को उद्धृत करते हुए एक सूक्तमूक्तावली नामक ग्रंथ लिखा है।
शारंगदेव, 13 वीं सदी। संगीत रत्नाकर के लेखक ,
केशव कश्मीरी भट्टाचार्य, 14 वीं शताब्दी, एक प्रमुख वेदांत दार्शनिक
जैयट, आचार्य मम्मट के पिता ।
मम्मट, 995 से 1050 वीं सदी के मध्य, काव्यप्रकाश के रचनाकार, ये जैयट के पुत्र, महाभाष्य के टीकाकार कैयट तथा वेदभाष्यकार उवट के भाई तथा नैषधीयचरितम् के रचयिता श्रीहर्ष के मामा थे। काव्यप्रकाश के टीकाकार झलकीकर ने उव्वट के पिता का नाम वज्रट बताया है। वज्रट भोजराज के समकालीन थे। मम्मट भोजराज के पश्चाद्वर्ती थे।  इनका काल महाराजा भोजदेव के बाद आता है। 
कैयट, पतंजलि कृत व्याकरण महाभाष्य की 'प्रदीप' नामक टीका के रचयिता। कैयट पामपुर (या येच) गाँव के निवासी थे।
भट्ट लोल्लट, (उद्भट और अभिनव गुप्त के बीच का समय) भरत के रस सूत्र के प्रथम व्याख्याकार। उत्पत्तिवाद या उपचयवाद, आरोपवाद सिद्धान्त के जनक। वर्तमान में भट्ट लोल्लट का कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। आचार्य मम्मट मे काव्यप्रकाश में लोल्लट के मत का उल्लेख किया है।
रुय्यक, 12वीं शती का मध्यकाल। अलंकारसर्वस्वम् के लेखक।
कुन्तक, 10वीं-11वीं शती। वक्रोक्तिजीवितम् के लेखक।
शंकुक, 9वीं शती का आरम्भ। भरत के रस सूत्र के द्वितीय व्याख्याकार। अनुमितिवाद या अनुकृतिवाद के जनक।
गुणाढ्य, विद्वानों का एक वर्ग गुणाढ्य को कश्मीरी मानता है।  पैशाची में बड्डकहा (संस्कृत : बृहत्कथा) नामक अनुपलब्ध आख्यायिका ग्रंथ के प्रणेता। क्षेमेंद्र कृत बृहत्कथा श्लोकसंग्रह (७५०० श्लोक) और सोमदेव कृत कथासरित्सागर (२४०० श्लोक) नामक संस्कृत रूपांतरों में उपलब्ध है।
सोमदेव (भट्ट)-  कथासरित्सागर के लेखक, यह संस्कृत कथा साहित्य का शिरोमणि ग्रंथ है। इसकी रचना  त्रिगर्त अथवा कुल्लू कांगड़ा के राजा की पुत्री, कश्मीर के राजा अनंत की रानी सूर्यमती के मनोविनोदार्थ 1063 ई और 1082 ई. के मध्य संस्कृत में की।
कश्मीर के अन्य विद्वानों का नामोल्लेख मात्र कर रहा हूँ। जिज्ञासु पाठक इनके बारे में इन्टरनेट के माध्यम से खोजबीन कर लें। 
पिंगल, जयदत्त, वामन, क्षीरस्वामी, मंख, पुष्पदन्त, जगधर भट्ट, रत्नाकर, माणिक्यचन्द्र

कवि क्षेमेन्द्र

क्षेमेन्द्र कश्मीरी महाकवि थे। वे संस्कृत के विद्वान तथा प्रतिभा संपन्न कवि थे। उनका जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। क्षेमेन्द्र ने प्रसिद्ध आलोचक तथा तंत्रशास्त्र के मर्मज्ञ विद्वान अभिनवगुप्त से साहित्यशास्त्र का अध्ययन किया था। इनके पुत्र सोमेन्द्र ने पिता की रचना बोधिसत्त्वावदानकल्पलता को एक नया पल्लव जोड़कर पूरा किया था। क्षेमेन्द्र संस्कृत में परिहास कथा के धनी थे। संस्कृत में उनकी जोड़ का दूसरा सिद्धहस्त परिहास कथा लेखक सम्भवत: और कोई नहीं है। क्षेमेन्द्र ने अपने ग्रंथों के रचना काल का उल्लेख किया है, जिससे इनके आविर्भाव के समय का परिचय मिलता है। कश्मीर के नरेश अनंत (1028-1063 ई.) तथा उनके पुत्र और उत्तराधिकारी राजा कलश (1063-1089 ई.) के राज्य काल में क्षेमेन्द्र का जीवन व्यतीत हुआ। क्षेमेन्द्र के ग्रंथ समयमातृका का रचना काल 1050 ई. तथा इनके अंतिम ग्रंथ दशावतारचरित का निर्माण काल इनके ही लेखानुसार 1066 ई. है। क्षेमेन्द्र के पूर्वपुरूष राज्य के अमात्य पद पर प्रतिष्ठित थे। फलत: इन्होंने अपने देश की राजनीति को बड़े निकट से देखा तथा परखा था। अपने युग के अशांत वातावरण से ये इतने असंतुष्ट और मर्माहत थे कि उसे सुधारने में, उसे पवित्र बनाने में तथा स्वार्थ के स्थान पर परार्थ की भावना दृढ़ करने में इन्होंने अपना जीवन लगा दिया तथा अपनी द्रुतगामिनी लेखनी को इसकी पूर्ति के निमित्त काव्य के नाना अंगों की रचना में लगाया। क्षेमेन्द्र संस्कृत में परिहास कथा के धनी थे। संस्कृत में उनकी जोड़ का दूसरा सिद्ध हस्त परिहास कथा लेखक कोई और नहीं है। उनकी सिद्ध लेखनी पाठकों पर चोट करना जानती थी, परंतु उसकी चोट मीठी होती थी।

कवि मंखक

मंखक (1100 से 1160 ईसवी लगभग) जन्म प्रवरपुर (कश्मीर में सिंधु और वितस्ता के संगम पर स्थित) आचार्य रुय्यक के शिष्य और संस्कृत के महाकवि। संस्कृत के महाकवि मंखक ने व्याकरण, साहित्य, वैद्यक, ज्योतिष तथा अन्य लक्षण ग्रंथों का ज्ञान प्राप्त किया था। आचार्य रुय्यक उनके गुरु थे। गुरु के अलंकारसर्वस्व ग्रंथ पर मंखक ने वृत्ति लिखी थी। मंखक के पितामह मन्मथ बड़े शिव भक्त थे। पिता विश्ववर्त भी उसी प्रकार दानी, यशस्वी एवं शिव भक्त थे। वे कश्मीर नरेश सुस्सल के यहाँ राजवैद्य तथा सभाकवि थे। मंखक से बड़े तीन भाई थे शृंगार, भृंग तथा लंक या अलंकार। तीनों महाराज सुस्सल के यहाँ उच्च पद पर प्रतिष्ठित थे। महाराज सुस्सल के पुत्र जयसिंह ने मंखक को प्रजापालन-कार्य-पुरुष अर्थात धर्माधिकारी बनाया था। जयसिंह का सिंहासनारोहण 1127 ई. में हुआ। मंखक की जन्मतिथि 1100 ई. (1157 विक्रमी संवत्) के आसपास मानी जा सकती है। एक अन्य प्रमाण से भी यही निर्णय निकलता है कि मंखकोश की टीका का, जो स्वयं मंखक की है, उपयोग जैन आचार्य महेंद्र सूरि ने अपने गुरु हेमचंद्र के अनेकार्थ संग्रह (1180 ई.) की अनेकार्थ कैरवकौमुदी नामक स्वरचित टीका में किया है। अत: इस टीका के 20, 25 वर्ष पूर्व अवश्य मंखकोश बन चुका होगा। इस प्रकार मंखक का समय 1100 से 1160 ई. तक माना जा सकता है।

श्रीकंठचरित्‌ 25 सर्गो का ललित महाकाव्य है। श्रीकंठचरित्‌ के अंतिम सर्ग में कवि ने अपना, अपने वंश का तथा अपने समकालिक अन्य विशिष्ट कवियों एवं नरेशों का सुंदर परिचय दिया है। अपने महाकाव्य को उन्होंने अपने बड़े भाई अलंकार की विद्वत्सभा में सुनाया था। उस सभा में उस समय कान्यकुब्जाधिपति गोविंदचंद (1120 ई.) के राजपूत महाकवि सुहल भी उपस्थित थे। महाकाव्य का कथानक अति स्वल्प होते हुए भी कवि ने काव्य संबंधी अन्य विषयों के द्वारा अपनी कल्पना शक्ति से उसका इतना विस्तार कर दिया है। समुद्रबंध आदि दक्षिण के विद्वान टीकाकारों ने मंखक को ही अलंकारसर्वस्व का भी कर्ता माना है। किंतु मखक के ही भतीजे, बड़े भाई शृंगार के पुत्र जयरथ ने, जो अलंकारसर्वस्व के यशस्वी टीकाकार हैं, उसे आचार्य रुय्यक की कृति कहा है।

अधोलिखित लिंक पर क्लिक कर इस विषय में और पढ़ें-




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सुरभारतीप्रभावः (SURBHARATI PRABHAVAH)


मङ्गलाचरणम् (नान्दी)

यस्मादक्षरतः क्षरन्ति सततं भूतानि खादीनि वै।
वाचो यत् प्रथयन्ति चार्थविभवं रूपाणि नामश्रुतिम्।
यस्याशेषकृपादृशा जगदिदं बालोपि बोद्धुं क्षमः।
शब्दार्थप्रतिपत्तये तमु नुमः  शश्वद्गुरुं शङ्करम्।।

यो ह्याब्रह्म समस्तचेतनजडं स्वस्मिन्निलीनं जगद्।
प्राकाश्यं गमयत्यथ स्वधिषणाशक्त्या सिसृक्षावशात्।।
पात्रीकृत्य च लीलया नटयति स्वेच्छाविभूत्या समान्।
सिद्ध्यर्थं लघुरूपकाश्रयगतास्तं सूत्रधारं नुमः।।

(ततः प्रविशति सूत्रधारः)
सूत्रधारः- (सर्वतो विलोक्य) अहो, महती इयं विद्वत्सभा विराजते। आकारयामि तावत् सज्जिकाम्। आर्ये,    सज्जिके....
नटी- (नेपथ्यतः) क्षणेनैव आयामि।.....
सूत्रधारः- त्वरस्व। चिरात्प्रतीक्षे त्वाम्।
नटी- (सम्भ्रमं नाटयित्वा) इयमागता।
सूत्रधारः- क्व गता आसीः।
नटी- न क्वापि आर्य। अपि न स्मर्यते भवता उत्तरप्रदेश संस्कृतसंस्थानद्वारा आयोज्यमानोस्ति गुरुपूर्णिमासमारोहः।
सूत्रधारः- (विहस्य) स्मरामि आर्ये। तथापि.....एतां सहृदयानां सभां दृष्ट्वा सम्भ्रम इव जातः। एतेषां सुखाय प्रस्तोतव्यं किञ्चिद् विशिष्टम्।
नटी- नटा खलु वयम्। नाट्यमतिरिच्य किमपरं विशिष्टं भवितुमर्हति।
उक्तं हि-
उपदेशालापमात्रेण शिक्षितुं यन्न शक्यते।
तद्धि नाट्यप्रयोगेण स्वतः बुद्ध्यावगम्यते।।
सूत्रधारः- साधूक्तम् आर्ये। मतिमती भवती।
नटी- कथं विलम्बस्तर्हि। आचार्यया श्रीमत्या नवलतया विरचितं सुरभारतीप्रभावः इत्याख्यं
यन्नवीनं लघुनाट्यमस्माभिः सज्जीकृतं तस्य प्रयोगेण साधयामः स्वस्य अभीष्टम्।
सूत्रधारः- अलमति विलम्बेन। आकारय नटांस्तावत्।
नटी- सिद्धा अस्मदीया नटाः। मञ्चसज्जा अपि नाट्यानुकूला कृता एव वर्तते। एतु, पश्यावस्तावत्।
(इति निष्क्रान्तौ)

(प्रथमदृश्यम्)

स्थानम्- (शेषनाथमहोदयस्य गृहम्। एकस्मिन् कक्षे तस्य पुत्रः वैभवः अध्ययनोत्पीठिकायां
स्थापिते सङ्गणके किमपि चलच्चित्रं पश्यन्नस्ति।)
(नेपथ्ये तस्य मातुः स्वरः श्रूयते)
सरला- वत्स, वैभव, एहि जलपानं सिद्धमस्ति।
वैभवः- मातः, अधुना पठन्नस्मि। .......(कर्णयोः इयरफोन इति उपकरणं दधानः सः
कक्षस्य द्वारं पिधाय उपविष्टः।)  
सरला- (नेपथ्यतः) वैभव...वैभव, कथं न श्रृणोषि?
वैभव- (कोपेन) अम्ब, कथं मां पीडयसि। मया उक्तं, पठन्नस्मि।
सरला- भवतु, तत्रैव आनयामि। (हस्ते जलपानं दुग्धपात्रं च स्वीकृत्य) कपाटं कथं पिहितम्? उद्घाटय।
(वैभवः अश्रुत इव उपविशति)
सरला- सुप्तः किं वैभव! (मञ्चे आगत्य) अहं हस्ते जलपानं स्वीकृत्य स्थिता अस्मि। शीघ्रम्
उद्घाटय।
वैभव- (ससम्भ्रमम्) अरे बप्तः...! अम्बा अत्रागता। (शीघ्रं सङ्गणकं स्थगयति। कर्णाभ्यां
इयरफोन इति उपकरणम् अपसारयति। पुस्तकम् उद्घाट्य उत्पीठिकायां स्थापयति) (कपाटमुद्घाट्य सरोषम्) किं भोः अम्ब। पठितुमपि न पारयामि। वारं वारं विघ्नं करोति भवती।
सरला- (जलपानं दुग्धं च स्थापयित्वा लालयन्ती) जाने, बहु पठति मम वत्सः। किञ्चित् खाद।
वैभवः- (अपलपन्निव) भवती गच्छतु अम्ब। अहं खादिष्यामि। मम एकान्ते अध्ययनस्य अभ्यासः।
एवं व्यवधानं भवति।
(सरला गच्छति। वैभवः शनैः पुनः कपाटं पिधाय पुस्तकं कोणे स्थापयति। सङ्गणके च तदेव चलचित्रं सञ्चालयति। किमपि आधुनिकगीतं तत्र गीयमानं भवति। वैभवः कर्णयो उपकरणं धृत्वा उत्थाय गीतेन सहैव नृत्ते प्रवर्तते।)
वैभवस्य स्वसा मुक्ता- (कपाटं उद्घाट्य सहसा प्रविशति) ( भ्रातरमुदिश्य सर्वं विलोक्य नेत्रे भ्रामयन् इंगित्य वदति) अहो एतत् पठने विध्नं भवति।
वैभवः- भगिनीं ताडनाय (हस्तमुत्थाय) धावति। (मुक्ता उच्चस्वरेण अम्ब अम्ब इति वदन्  उभौ मञ्चतः अपसरतः)
           (द्वितीय दृश्यम्)

(वैभवस्य सहपाठी कमलेशः सरला च मञ्चे प्रविशतः।)
(जनान्तिकम्)
कमलेशः- नमस्ते आण्टी जी। वैभवः गृहे अस्ति वा।
सरला- आम्, सः पठन्नस्ति। किमपि कार्यमस्ति वा।
कमलेशः- आम्, अद्य अस्माकं गुरु जी अतिरिक्तकक्षां स्वीकरिष्यति।
सरला- स तु न उक्तवान्।
कमलेशः- स असावधानोस्ति। अहम् आह्वयामि।....वैभव..... भोः वैभव। बहिरागच्छ! कक्षायां
न चलिषयसि?
वैभवः- (कक्षाद्बहिः आगमनं विनट्य) किं वदसि मित्र, अद्य......!
कमलेशः- (सङ्केतेन अपवार्य) वैभव, त्वया व्हॉट्सएप न दृष्टं स्यात्! तत्र सूचितं यदद्य गुरुजी
अतिरिक्तकक्षां स्वीकरिष्यति। एहि चलावः।
वैभवः- एवं ननु! चलामि। (सरलामभिलक्ष्य) मातः, यावदागच्छामि मम पुस्तकं कक्षे तथैव भवतु।

(उभौ निष्क्रान्तौ)

(तृतीय दृश्यम्)

(मञ्चे  एको बालकः द्वे बालिके च स्थिताः। ते परस्परमालपन्ति।)
(कमलेशः वैभवश्च प्रविशतः)
(मंचे कक्षा प्रदर्शनीया)
वैभवः- (रिक्तकक्षां पश्यन् व्यङ्ग्येन) अहो, इयं कक्षा चलति! त्वया मिथ्या कथमुक्तम्?
कमलेशः- मिथ्याभाषिणं प्रति मिथ्याभाषणे को दोषः?
वैभवः- कथम्?
कमलेशः- गुरो! अहं सर्वं जानामि। वराकीं मातरं वञ्चयित्वा सङ्गणके चलच्चित्रं पश्यसि।
(उभौ परस्परं हस्तौ सङ्घट्य हसतः- हा हा हा हा हा।)
मीना- किमभवत्। बहु हसतः उभौ भवन्तौ!
वैभवः- (हसन्नेव) रहस्यमेत्!
सुधीरः- (बलं दत्वा) वैभवं विमोच्य आनीतवान् कमलेशः।
राकेशः- चलामस्तावत्।
साध्वी- कुत्र।
मीना- न स्मरसि किम् अद्ये सर्वे वयं कुकरैलमनोरञ्जनस्थलं गन्तुं योजनां कृतवन्तः।
साध्वी- अहं न गमिष्यामि। मया दिनत्रयात् संस्कृतशिविरं गम्यते। पुनश्च गृहे अपि न सूचितम्मया।
कमलेशः- संस्कृतशिविरम्? पण्डिता भवितुमिचछसि किम्?
साध्वी- (उपेक्षया) पण्डिता भवानि न वा किन्तु मानवी अवश्यं भविष्यामि।
सुधीरः- (परिहासेन) हुम्,
मूषकान्नवशतान् भुक्त्वा विडालो तीर्थमेष्यति।
मीना- संस्कृतशिविरं.......?
साध्वी- (आक्षिप्य) आम्, संस्कृतशिविरम्।
वैभवः-  (व्यङ्ग्येन) धन्यासि देवि! अस्माभिः सह तव समायोजनं न भविता। मम बुद्धौ मम पाठ्यविषया अपि न आगच्छन्ति। त्वं संस्कृतशिविरं गच्छसि।
राकेशः- संस्कृतस्य अध्ययनं तु शुष्के क्षेत्रे वन्ध्यवीजवपनमिव।
कमलेशः- इदानीं तु विज्ञानस्य तन्त्रस्य च प्राधान्यं वर्तते। सर्वे तन्त्रज्ञाः भवितुमिच्छन्ति। त्वं पुनः....(इति उपहसति)।
साध्वी- पूर्वम् अहमपि एवमेव चिन्तयामि स्म। किन्तु यदा शिविरं गता तदा ज्ञातं संस्कृतस्य
सामर्थ्यम्।
सुधीरः- हॉं, हॉं, आलपस्व पुरागीतिम्! (सगर्वम्) वयं तु आधुनिकाः।
मीना- (बोधयन्ती इव) साध्वि, धनं जीवनस्य सर्वस्वम्। धनार्जनाय च विज्ञानम् आवश्यकम्।
साध्वी-  युष्माभिः न श्रुतं संस्कृतं पठ आधुनिको भव इति।
वैभवः- हा हा हा हा, संस्कृतं पठ आधुनिको भव’!
सुधीरः- (सनाट्यम्) शिखां धर! तिलकं विभूषय! धौतवस्त्रं धर! मन्त्रं वाचय!
कमलेशः- (तस्य स्वरेण स्वरं मेलयित्वा) आधुनिको भव!
साध्वी- (विहस्य) वानरः किं विजानीयाद् आर्द्रकस्वादमद्भुतम्। यावत्कालं समीपं गत्वा
कस्यापि गुणदोषं मा पश्यत तावत् कापि टिप्पणी न कार्या।
सर्वे- (सहैव उपहसन्त इव) साधु भोः! द्रक्ष्यामः।
साध्वी- अवश्यम्। श्वः तत्र चल। गुरुजी युष्मान् स्वयं बोधयिष्यति।
वैभवः- श्वः कथम्? अद्यैव चलिष्यामः। (प्रश्नमुद्रया) सम्यक्...!
राकेशः- युष्माकं पार्श्वे किमपि अपरं कार्यं नास्ति तर्हि गच्छत। मम रुचिः नास्ति। अयमहं गच्छामि। (इति निर्गच्छति)
(अन्ये सर्वे परस्परं हस्तमेलनं कुर्वन्ति।)
(सर्वे निष्क्रान्ताः)
  
(चतुर्थदृश्यम्)
(स्थानम्- आचार्यबृहस्पतेः संस्कृतमयं गृहम्, गृहे पुरातन- वैज्ञानिकानां विभिन्नानि चित्राणि राजन्ते। मन्दं मन्दं अनुदितगीतस्य ध्वनिः आयाति )
(साध्वीं पुरस्कृत्य सर्वाणि मित्राणि प्रविशन्ति)

(आचार्य बृहस्पतिः आसन्दे उपविष्टः  Science in Sanskrit इति पुस्तकं पठन्नस्ति। गुरुमाता रेणुका पार्श्वे उपविष्टास्ति। अन्तःपुरे बालक- बालिकानां कोलाहलध्वनिः श्रूयते। साध्वी स्वमित्रैः सह आगच्छति। सा आचार्यस्य चरणस्पर्शं करोति। आचार्य आशीर्वचो ब्रूते। अन्ये नमस्कुर्वन्ति। सहसा आचार्यपुत्रः बालकः आदित्यः आगत्य उच्चस्वरेण वदति।
आदित्यः – तात! रमा मां ताडयति।
गुरु जी- (उच्चस्वरेण) रमे! किं कुरुषे?
आदित्यः तात!
गुरु जी- गच्छ, क्रीड।
गुरु जी- (साध्वीं प्रति अभिमुखीभूय) वद। किं वदसि।
साध्वी - तेषां परिचयं कारयति। इयं मीना, अयं वैभवः, एष सुधीरः, असौ कमलेशः।)
(अन्ये यथाकथञ्चित् नमस्कुर्वन्ति।)
गुरु जी- वद साध्वि, कथमेते.......?
साध्वी- गुरु जी, एतेषां मनःसु संस्कृतं प्रति काश्चन शङ्काः सन्ति।
गुरु जी- (पुस्तकं हस्तात अपसार्य उत्पीठिकायां स्थापयति, उपनेत्रमपि पुस्तकस्योपरि स्थापयति।) एवम् ननु! हां, वदन्तु कस्य का शङ्का।
(सर्वे परस्परं सङ्कोचेन पश्यन्ति।)
गुरु जी- निःसङ्कोचं पृच्छन्तु।
सुधीरः- (सम्बोधनं विनैव) किं नाम पुस्तकम् एतत्। Science in Sanskrit. इति खलु। (साश्यर्यम्) संस्कृते विज्ञानम्!......
गुरु जी- (स्मयमानः प्रतिप्रश्नम् उपस्थापयति) कथं न? संस्कृतेन भवान् किम् अवगच्छति?
वैभवः- एका प्रचीना भाषा खलु। पण्डितानां भाषा.......।
मीना- संस्कृतेन पूजापाठः भवति।
कमलेशः- महोदय, बहु कठिना भाषा इयम्। मया तु कदापि रूपाणि एव न कण्ठस्थानि कर्तुं शक्यन्ते स्म।
आचार्य जी- अपरं किमपि?
साध्वी- गुरु जी, एतान् भवान् एव बोधयतु।
गुरु जी- बाढम्। ......उपविश्य ध्यानेन श्रृण्वन्तु। (सर्वे उपविशन्ति।)। संस्कृतं वेदादिशास्त्राणां
भाषा इति भवन्तः श्रुतवन्तः।
(वैभवः जृम्भत इव। तस्य मुखमुद्रया अरुचिः दृश्यते)
वैभवः- (जनान्तिकम्) साध्वि, क्व आनीताः वयं त्वया।
गच्छामः स्म विनोदाय पतिता उपदेशखातके..।
गुरुजी- (कर्णौ दत्वा) किमेतौ मन्त्रयतः। मन्ये एताभ्याम् अत्र न रोचते।
कमलेशश्च- नहि, नहि.....। (सङ्कोचमिश्रितधृष्ठतया) वस्तुतः वयं मनोरञ्जार्थं क्वचिद् गच्छन्त आस्म।
गुरु जी- अवश्यम्। मनोरञ्जनं तु श्रमहरम्। (किचद्विचिन्त्य) उचितकाले आगताः यूयम्। अद्य
गुरुपूर्णमावसरे प्रस्तोतुम् आचार्य वासुदेवद्विवेदिना विरचिता कजरीगीतिरेका मम पुत्र्या सज्जीकृता। साध्वि, तस्याः प्रस्तुतिपूर्वमभ्यासं श्रोतुमिच्छसि चेत्.......?
साध्वी- (सोत्साहम्) अरे हॉं, गुरुजी, मया तु विस्मृतमेव!  (सर्वान् अभिमुखीभूय) वैभव,
कमलेश, मीने, अतीव मधुरमस्ति तद्गीतम्। यूयमपि श्रृणुथ।
गुरुजी- भवतु तर्हि, पुत्रि सारिके, एहि अत्रैव अन्तिमाम् अभ्यासप्रस्तुतिं कुरु।
( सारिका स्वदलेन सह मञ्चं प्रविशति)
(कजरी गीयते) सखि श्यामला......इत्यादि।
(सर्वे मन्त्रमुग्धा इव श्रृण्वन्ति)
(गीतेः समाप्तौ तालिकावादनेन हर्षं प्रकटयन्ति)
सर्वे- (सहैव) अतीव आनन्दो अनुभूतः।
सुधीरः- एतन्मधुरं संस्कृतगीतं मया कदापि न श्रुतम्।
मीना- पुनरपि......संस्कृतगीते आधुनिकवाद्ययन्त्राणि!......आश्चर्यकरम्!
साध्वी- पूर्वं ममापि रुचिः नासीत्। किन्तु अधुना संस्कृते मम श्रद्धा भवति।
वैभवः- अहमपि जितः।
गुरु जी- एतदेव न। इतिहासः भूगोलम्, अर्थशास्त्रं कृषिशास्त्रं वास्तुशास्त्रम् (engineering)
रसायनविज्ञानं भौतिकी किं वा सर्वपि आधुनिकतन्त्रविज्ञानं technology इति संस्कृते वर्तते।
वैभवः- (आश्चर्येण) एतद्वा...!
कमलेशः- सर्वं संस्कृते कथं भवितुमर्हति?
गुरु जी- लोकभाषा आसीदियम् अत एव।
सुधीरः- गुरुजी, परन्तु......
गुरुजी- परन्तु किम्...?
कमलेशः- कथं वयं ज्ञास्यामः?
गुरुजी- संस्कृतेन सम्भाष्य, संस्कृतं पठित्वा।
साध्वी- सत्यम्।
सुधीरः- मित्राणि, कः विचारः?
कमलेशः-  तस्मात् तव कर्णस्फोटकाद् उद्धतगीताद् इदं गीतं मधुरतरम् इति भावये।
मीना-  गुरुजी, वयमपि संस्कृतं पठितुम् इच्छामः।
गुरुजी- (स्मयमानः) आगच्छन्तु। स्वागतम्।....अत्र निःशुल्कं पाठ्यते खलु!
सर्वे- ओम्। (पार्श्वतः पुष्पाणि आनीय गुरुचरणयोः समर्प्य प्रणम्य मञ्चात् निःसरन्ति)
(प्रणामसमये एव मञ्चे भरतवाक्यं गीयते)
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।
 गुरुः साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्।
तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः।।
(नेपथ्यतः मन्दस्वरः आयाति)
(असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मामृतङ्गमय।।)

लेखिका- डॉ. नवलता, लखनऊ
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