योगवासिष्ठ (अपरनाम- आर्षरामायण, वसिष्ठ महारामायण, और मोक्षोपायसंहिता)

 

इस ग्रंथ के रचयिता के संबंध में मतभेद है। परंपरानुसार आदि कवि वाल्मीकि इसके रचयिता माने जाते हैं परंतु इसमें बौद्धों के विज्ञानवादी, शून्यवादी, माध्यमिक इत्यादि मतों का तथा काश्मीरी शैव, त्रिक, प्रत्यभिज्ञा तथा स्पंद इत्यादि तत्त्वज्ञानों का निर्देश होने के कारण इसके रचयिता उसी (वाल्मीकि) नाम के अन्य कवि माने जाते हैं। योगवासिष्ठ की श्लोकसंख्या 32 हजार है। विद्वानों के मतानुसार महाभारत के समान इसका भी तीन अवस्थाओं में विकास हुआ (1) वसिष्ठकवच, (2) मोक्षोपाय (अथवा वसिष्ठ-रामसंवाद) (3) वसिष्ठरामायण (या बृहद्योगवासिष्ठ) । यह तीसरी पूर्णावस्था ई. 11-12 वीं शती में पूर्ण मानी जाती है। गौड अभिनंद नामक पंडित ने ई. 9 वीं शती में किया हुआ इसका "लघुयोगवसिष्ठ" नामक संक्षेप छह हजार श्लोकों का है। योगवसिष्ठसार नामक दूसरा संक्षेप 225 श्लोकों का है। योगवसिष्ठ ग्रंथ छह प्रकरणों में पूर्ण है। प्रथम प्रकरण का नाम वैराग्य प्रकरण है। इसमें उपनयन संस्कार के बाद प्रभु रामचंद्र अपने भाइयों के साथ गुरुकुल में अध्ययनार्थ गए। अध्ययन समाप्ति के बाद तीर्थयात्रा से वापस लौटने पर रामचंद्रजी विरक्त हुए। महाराजा दशरथ की सभा में वे कहते हैं।

किं श्रिया, किं च राज्येन किं कायेन, किमीहया

दिनैः कतिपयैरेव कालः सर्वं निकृन्तति ।।

अर्थात् वैभव, राज्य, देह और आकांक्षा का क्या उपयोग है। कुछ ही दिनों में काल इन सब का नाश करने वाला है। अपनी मनोव्यथा का निवारण करने की प्रार्थना उन्होंने अपने गुरु वसिष्ठ और विश्वामित्र को की। दूसरे मुमुक्षुव्यवहार प्रकरण में विश्वामित्र की सूचना के अनुसार वसिष्ठ ऋषि ने उपदेश दिया है। 3-4 और 5 वें प्रकरणों में संसार की उत्पत्ति, स्थिति और लय की उपपत्ति वर्णन की है। इन प्रकरणों में अनेक दृष्टान्तात्मक आख्यान और उपाख्यान निवेदन किये हैं। छठे प्रकरण का पूर्वार्ध और उत्तरार्ध में विभाजन किया है। इसमें संसारचक्र में फंसे हुए जीवात्मा को निर्वाण अर्थात् निरतिशय आनंद की प्राप्ति का उपाय निवेदन किया है। इस महान् ग्रंथ में विषयों एवं विचारों की पुनरुक्ति के कारण रोचकता कम हुई है। परंतु अध्यात्मज्ञान सुबोध, तथा काव्यात्मक शैली में सर्वत्र प्रतिपादन किया है।

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1 टिप्पणी:

  1. अद्भुत ग्रंथ के बारे में अच्छी परिचयात्मक जानकारी।
    -अरविंद मिश्र

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