कल्पना कीजिए एक ऐसी चुनौती की, जो मनुष्य की स्मरण-शक्ति, अनुशासन और ज्ञान की सीमाओं को परखती हो।
एक ऐसी परीक्षा, जिसमें किताब सामने रखकर पढ़ना नहीं, बल्कि ग्रंथ को
अपने भीतर जीना पड़ता हो।
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान द्वारा आयोजित अष्टाध्यायी
कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता ठीक इसी प्रकार की एक असाधारण बौद्धिक साधना है।
यह केवल एक प्रतियोगिता नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परम्परा की उस प्राचीन धारा का उत्सव है, जिसमें ज्ञान को केवल संग्रह नहीं, संस्कार माना
गया है।
अष्टाध्यायी : संस्कृत व्याकरण का महाग्रंथ
पाणिनि द्वारा रचित अष्टाध्यायी संस्कृत
व्याकरण का सबसे प्रामाणिक और सुव्यवस्थित ग्रंथ है।
लगभग चार हज़ार सूत्रों से युक्त यह रचना सदियों
से भारतीय बौद्धिक परम्परा की रीढ़ रही है।
प्रश्न स्वाभाविक है —
क्या इतने विशाल ग्रंथ को कोई हूबहू, क्रमबद्ध और शुद्ध उच्चारण के साथ कंठस्थ कर सकता है?
इसी प्रश्न का उत्तर खोजने का मंच है यह
प्रतियोगिता।
प्रतियोगिता का उद्देश्य : केवल परीक्षा नहीं, परम्परा का संवर्धन
इस प्रतियोगिता का मूल उद्देश्य पारंपरिक
संस्कृत शिक्षा में छिपे हुए असाधारण प्रतिभाओं को पहचानना और उन्हें सम्मान देना
है।
यह समझना आवश्यक है कि यह केवल अंकों की दौड़
नहीं है। यह उस कंठस्थ पाठ परम्परा का उत्सव है,
जिसमें ज्ञान को पढ़ा नहीं जाता, बल्कि उसे अपने अस्तित्व का हिस्सा बनाया जाता है।
मूल्यांकन प्रणाली : 100 अंकों का सुविचारित ढाँचा
प्रतियोगिता का संपूर्ण मूल्यांकन 100 अंकों
के पैमाने पर किया जाता है।
इन अंकों का विभाजन अत्यंत अर्थपूर्ण है —
* 70 अंक — कंठस्थ
पाठ (स्मृति की शुद्धता और क्रम)
* 20 अंक — उच्चारण
की शुद्धता, स्पष्टता और पाठ की गति
* 10 अंक — ग्रंथ
से संबंधित सामान्य ज्ञान
यह विभाजन स्पष्ट करता है कि इस प्रतियोगिता
का केंद्र बिंदु स्मरण-शक्ति है, किन्तु उसके साथ उच्चारण
और बौद्धिक समझ भी उतनी ही आवश्यक है।
चयन प्रक्रिया : तीन चरणों की कठिन परीक्षा
प्रतिभागियों की परीक्षा तीन चरणों में होती
है,
जो उनके ज्ञान को विभिन्न कोणों से परखती है।
पहला चरण —
निर्णायक किसी एक सूत्र का उच्चारण करते हैं और
प्रतिभागी को वहीं से आगे पाठ सुनाना होता है।
दूसरा चरण —
प्रसिद्ध और सबसे कठिन मानी जाने वाली शलाका
परीक्षा।
तीसरा चरण —
ग्रंथ पर आधारित प्रश्न-उत्तर का संक्षिप्त
दौर।
शलाका
परीक्षा : ज्ञान की अग्नि-परीक्षा
शलाका परीक्षा प्राचीन गुरुकुलीय परम्परा से
जुड़ी हुई विधि है।
इसमें प्रतिभागी से ग्रंथ का कोई भी पृष्ठ
खोलने को कहा जाता है।
निर्णायक किसी भी स्थान पर उंगली या शलाका
रखते हैं और वहीं से पाठ प्रारंभ करना होता है।
यहाँ अनुमान या स्मृति-भ्रम की कोई गुंजाइश
नहीं होती। यह परीक्षा वास्तव में प्रतिभागी के सम्पूर्ण कंठस्थ ज्ञान की कसौटी
है।
निर्णायक मंडल की भूमिका
पूरी प्रतियोगिता का मूल्यांकन दो
विषय-विशेषज्ञ न्यायाधीशों के पैनल द्वारा किया जाता है।
प्रतिभागी का परीक्षण कितनी देर चलेगा, यह पहले से निर्धारित नहीं होता। यह पूरी तरह निर्णायकों के विवेक और
प्रतिभागी के प्रदर्शन पर निर्भर करता है।
तीसरे चरण में
ग्रंथ से संबंधित पाँच प्रश्न पूछे जाते हैं,
जिनके लिए कुल 10 अंक निर्धारित हैं।
सफलता का मार्ग : तीन स्तंभ
इस प्रतियोगिता में सफलता
तीन मूल स्तंभों पर टिकी होती है —
1. अष्टाध्यायी का अक्षरशः कंठस्थ होना
2. शुद्ध, स्पष्ट और
संतुलित उच्चारण
3. ग्रंथ और उसके संदर्भों की गहरी समझ
इसके अतिरिक्त,
मुख्य राज्य-स्तरीय प्रतियोगिता तक पहुँचने
से पहले प्रतिभागियों को एक ऑनलाइन क्वालिफाइंग परीक्षा भी उत्तीर्ण करनी होती है।
अंत में एक विचार
इस प्रतियोगिता के लिए आवश्यक अथक परिश्रम, स्मरण-साधना और अनुशासन हमें एक मूल प्रश्न पर सोचने के लिए विवश करता है —
क्या ज्ञान केवल जानकारी है? या वह ऐसा तत्व है, जो हमारे चिंतन, स्मृति और अस्तित्व का एक अविभाज्य अंग बन जाना चाहिए?
अष्टाध्यायी कंठस्थ पाठ प्रतियोगिता इसी
प्रश्न का जीवंत उत्तर है।





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