यहाँ पाणिनीय व्याकरण के अंतर्गत तिङन्त प्रकरण और विशेष रूप से भ्वादिगण की प्रक्रिया
का विस्तृत विवेचन किया गया है। इसमें इत्संज्ञा, लोप और पद संज्ञा से संबंधित मूलभूत सूत्रों की व्याख्या की
गई है,
जो संस्कृत धातुओं के शुद्ध रूप को समझने के लिए आवश्यक
हैं। पाठ में लट् लकार के प्रयोग, परस्मैपद और आत्मनेपद के वर्गीकरण तथा विभिन्न पुरुषों और
वचनों के निर्धारण संबंधी नियमों को स्पष्ट किया गया है। 'भू' धातु के उदाहरण के माध्यम से शप् विकरण, गुण कार्य और अवादेश जैसी संधिवत् प्रक्रियाओं को समझाते
हुए 'भवति' आदि रूपों की सिद्धि दिखाई गई है। यहाँ पर आप ऑडियो
पोडकॉस्ट के माध्यम से रूपसिद्धि को सुन सकते हैं। अंततः, यह लेख व्याकरणिक सूत्रों के माध्यम से क्रिया पदों के
निर्माण की एक व्यवस्थित और चरणबद्ध पद्धति प्रस्तुत करता है।
'भवति' रूप की सिद्धि की प्रक्रिया
१. धातु संज्ञा एवं लकार विधान:
सबसे पहले 'भू
सत्तायाम्' धातु
की 'भूवादयो धातवः' सूत्र से धातु संज्ञा होती है। वर्तमान काल की विवक्षा में 'वर्तमाने लट्' (सूत्र ३७६) से 'भू' धातु से परे 'लट्'
लकार आता है।
२. अनुबन्ध लोप (लट्):
'लट्' में 'ट' की 'हलन्त्यम्' सूत्र से और 'अ' की 'उपदेशेऽजनुनासिक इत्' सूत्र से इत् संज्ञा होती है। इसके बाद 'तस्य लोपः' (सूत्र ८) से इन इत् संज्ञक वर्णों का लोप हो जाता है, जिससे केवल 'ल्' शेष बचता है। स्थिति होती है: भू + ल्।
३. तिङ् प्रत्यय विधान:
कर्ता अर्थ में, प्रथम पुरुष एकवचन की विवक्षा में 'तिप्तस्झि...' (सूत्र ३७७) सूत्र द्वारा 'ल्' के स्थान पर 'तिप्'
आदेश होता है।
४. अनुबन्ध लोप (तिप्):
'तिप्' के अन्तिम 'प्' की 'हलन्त्यम्' (सूत्र २) से इत् संज्ञा और 'तस्य लोपः' से लोप होने पर 'ति' शेष रहता है। स्थिति होती है: भू + ति।
५. सार्वधातुक संज्ञा एवं शप् विकरण:
'तिङ्शित्सार्वधातुकम्' (सूत्र ३८८) सूत्र से 'ति' की सार्वधातुक संज्ञा होती है। इसके बाद 'कर्तरि शप्' (सूत्र ३८९) सूत्र से धातु और प्रत्यय के बीच 'शप्' विकरण आता है। 'शप्'
के 'श्'
की 'लशक्वतद्धिते' से और 'प्' की 'हलन्त्यम्' से
इत् संज्ञा होकर लोप हो जाता है और केवल 'अ' शेष बचता है। स्थिति होती है: भू + अ + ति।
६. गुण कार्य:
'शप्' (अ) के सार्वधातुक होने के कारण 'सार्वधातुकार्धधातुकयोः' (सूत्र ३९०) सूत्र द्वारा इगन्त अङ्ग 'भू' के 'ऊ' को गुण 'ओ' आदेश होता है। स्थिति होती है: भो + अ + ति।
७. अवादेश एवं वर्ण सम्मेलन:
एचोऽयवायावः (स्रोतों में इसका नाम नहीं पर प्रक्रिया 'अवादेश' के रूप में वर्णित है) के नियमानुसार 'ओ' के स्थान पर 'अव्'
आदेश होता है।
* भ् + अव् + अ + ति = भवति
इस प्रकार, परस्पर
वर्ण संयोग होने पर 'भवति'
रूप सिद्ध होता है।
विशेष बिन्दु:
* 'भू' धातु के 'ऊ' की इत् संज्ञा इसलिए नहीं होती क्योंकि वह अनुनासिक नहीं
है।
* 'ति' की परस्मैपद संज्ञा 'लः परस्मैपदम्' (सूत्र ३७८) से होती है, क्योंकि 'भू' धातु से आत्मनेपद का कोई निमित्त नहीं है।
* 'ति' की प्रथम पुरुष संज्ञा 'तिङस्त्रीणि त्रीणि...' (सूत्र ३८३) और एकवचन संज्ञा 'तान्येकवचन...' (सूत्र ३८४) सूत्रों से होती है।
संस्कृत व्याकरण: पाणिनीय तिङन्त नियम एवं भ्वादि प्रक्रिया
- अध्ययन निर्देशिका
यह अध्ययन निर्देशिका पाणिनीय व्याकरण के तिङन्त प्रकरण, विशेष रूप से इत्संज्ञा के नियमों और
भ्वादि गण की प्रक्रिया को समझने के लिए तैयार की गई है। इसमें मूल सूत्रों की
व्याख्या, पद-सिद्धि की प्रक्रिया और व्याकरणिक संज्ञाओं का
विस्तृत विवरण दिया गया है।
भाग 1: लघु उत्तरीय प्रश्न (प्रश्नावली)
निर्देश: निम्नलिखित
प्रश्नों के उत्तर स्रोत सामग्री के आधार पर 2-3 वाक्यों में दें।
- 'पद'
संज्ञा से क्या अभिप्राय है?
- 'उपदेश'
शब्द का पाणिनीय व्याकरण में क्या अर्थ है?
- 'न
विभक्तौ तुस्माः' सूत्र किस प्रकार 'हलन्त्यम्' सूत्र का अपवाद है?
- 'इत्संज्ञा'
करने वाले किन्हीं दो सूत्रों के नाम और उनके कार्य बताइये।
- आत्मनेपद और
परस्मैपद में मुख्य अंतर क्या है?
- 'शप्'
प्रत्यय को 'विकरण' क्यों माना जाता है और इसका क्या कार्य है?
- 'झोऽन्तः'
सूत्र का प्रयोग कहाँ और क्यों किया जाता है?
- 'अतो
दीर्घो यञि' सूत्र का क्या महत्व है?
- क्रियाफल का 'कर्तृगामी' और 'परगामी' होना पद व्यवस्था को कैसे प्रभावित
करता है?
- 'तिङ्शित्सार्वधातुकम्'
सूत्र का कार्य स्पष्ट करें।
भाग 2: उत्तर कुंजी
- उत्तर: सूत्र 'सुप्तिङन्तं पदम्' के अनुसार,
सुबन्त (शब्द रूप) और तिङन्त (धातु रूप) की पद संज्ञा होती है।
जब किसी धातु में तिङ् प्रत्यय जुड़ जाते हैं, तभी उसे
व्याकरण की दृष्टि से 'पद' माना
जाता है।
- उत्तर: उपदेश का अर्थ 'आद्योच्चारण' है, जिसका तात्पर्य आचार्य पाणिनि द्वारा मूलतः पढ़े गए धातु, प्रत्यय आदि के मूल स्वरूप से है। उदाहरण के लिए, 'मिद्' धातु की उपदेशावस्था 'ञिमिदा' है।
- उत्तर: 'हलन्त्यम्' सूत्र
उपदेश के अंतिम व्यंजन की इत्संज्ञा करता है, किन्तु 'न विभक्तौ तुस्माः' इसे रोकता है। यह नियम कहता
है कि यदि विभक्ति प्रत्ययों (जैसे तिङ् या सुप्) के अंत में त-वर्ग, सकार या मकार हो, तो उनकी इत्संज्ञा नहीं होगी।
- उत्तर: 'उपदेशेऽजनुनासिक इत्' उपदेशावस्था में अनुनासिक स्वरों की इत्संज्ञा करता है, जबकि 'हलन्त्यम्' अंतिम
व्यंजन (हल्) की इत्संज्ञा करता है। इत्संज्ञा के बाद 'तस्य
लोपः' से उस वर्ण का लोप हो जाता है।
- उत्तर: आत्मनेपद (अपने लिए) का प्रयोग तब होता है जब क्रिया
का फल स्वयं कर्ता को प्राप्त हो (जैसे 'यज्ञमहं करिष्ये'), जबकि परस्मैपद
(दूसरे के लिए) का प्रयोग तब होता है जब क्रिया का फल कर्ता को छोड़कर किसी
अन्य को मिले।
- उत्तर: 'शप्' प्रत्यय धातु और तिङ् प्रत्यय के बीच में
आता है, इसलिए इसे विकरण कहा जाता है। 'कर्तरि शप्' सूत्र से कर्ता अर्थ में
सार्वधातुक प्रत्यय परे रहने पर धातु से शप् होता है, जिसमें
'अ' शेष बचता है।
- उत्तर: यह सूत्र प्रत्यय के अवयव 'झ' के स्थान पर 'अन्त्' आदेश करता है। उदाहरण के लिए, 'भव + झि' की स्थिति में 'झ'
को 'अन्त्' होकर 'भवन्ति' रूप सिद्ध होता है।
- उत्तर: यह सूत्र अदन्त अंग (जिसके अंत में 'अ' हो) को दीर्घ
करता है, यदि उसके बाद 'यञ्'
प्रत्याहार से शुरू होने वाला सार्वधातुक प्रत्यय हो। इसी नियम
से 'भव+मि' परिवर्तित होकर 'भवामि' बनता है।
- उत्तर: यदि क्रिया का फल कर्ता को मिले (कर्तृगामी), तो 'स्वरितञितः...'
सूत्र से आत्मनेपद होता है। यदि फल परगामी (किसी और को मिले)
हो, तो परस्मैपद का विधान किया जाता है।
- उत्तर: यह एक संज्ञा सूत्र है जो धातु के अधिकार में कहे गए 'तिङ्' प्रत्ययों
और जिनमें 'श्' की इत्संज्ञा हुई
हो (शित्), उनकी 'सार्वधातुक'
संज्ञा करता है। इसी संज्ञा के आधार पर आगे शप् आदि कार्य होते
हैं।
भाग 3: निबंधात्मक प्रश्न (अभ्यास हेतु)
निर्देश: निम्नलिखित
विषयों पर विस्तृत लेख लिखें (उत्तर अपेक्षित नहीं हैं)।
- पाणिनीय
व्याकरण में 'इत्संज्ञा'
की प्रक्रिया और इसके विभिन्न सूत्रों का सोदाहरण विवेचन
कीजिए।
- 'भू'
धातु के लट् लकार (वर्तमान काल) के रूपों की सिद्धि प्रक्रिया
को सूत्रों के साथ विस्तार से समझाइये।
- आत्मनेपद और
परस्मैपद व्यवस्था के नियमों का तुलनात्मक विश्लेषण कीजिए। इसमें 'अनुदात्तङित' और 'स्वरितञित' सूत्रों की भूमिका स्पष्ट करें।
- 'उपदेश'
और 'अनुबन्ध लोप' की
अवधारणा को समझाते हुए स्पष्ट करें कि ये शुद्ध धातु और प्रत्यय निर्माण में
कैसे सहायक हैं।
- तिङ्
प्रत्ययों के विभाजन (पुरुष और वचन) की व्यवस्था और मध्यम तथा उत्तम पुरुष के
प्रयोग के विशेष नियमों (युष्मद्-अस्मद् उपपद) की व्याख्या करें।
भाग 4: पारिभाषिक शब्दावली (Glossary)
|
शब्द |
परिभाषा |
|
उपदेश |
आचार्य पाणिनि, कात्यायन
या पतंजलि द्वारा किया गया मूल व्याकरणिक उच्चारण। |
|
इत्संज्ञा |
वह संज्ञा जिसके होने पर 'तस्य
लोपः' सूत्र से उस वर्ण का लोप (अदर्शन) हो जाता है। |
|
अनुबन्ध लोप |
इत्संज्ञा और उसके बाद वर्ण के लोप की संयुक्त प्रक्रिया। |
|
सार्वधातुक |
तिङ् प्रत्ययों और 'शित्'
(जिनमें 'श' की
इत्संज्ञा हो) प्रत्ययों को दी गई संज्ञा। |
|
विकरण |
धातु और प्रत्यय के बीच में जुड़ने वाला तत्व, जैसे 'शप्'। |
|
अङ्ग |
वह प्रकृति (धातु या शब्द) जिसके बाद कोई प्रत्यय लगाया गया हो। |
|
प्रत्याहार |
वर्णों के समूह को संक्षिप्त रूप में कहने की विधि (जैसे 'यञ्' या 'तिङ्')। |
|
आत्मनेपद |
क्रिया का वह रूप जहाँ फल कर्ता को प्राप्त होता है; इसमें 'त, आताम्, झ' आदि प्रत्यय लगते
हैं। |
|
परस्मैपद |
क्रिया का वह रूप जहाँ फल दूसरों को मिलता है; इसमें 'तिप्, तस्,
झि' आदि प्रत्यय लगते हैं। |
|
विधिसूत्र |
वे सूत्र जो कोई विधान या कार्य (जैसे लोप, गुण, दीर्घ) करते हैं। |
|
निषेध सूत्र |
वे सूत्र जो किसी विधि या नियम के लागू होने को रोकते हैं (जैसे 'न विभक्तौ तुस्माः')। |
|
तिङ् |
धातुओं के अंत में लगने वाले 18 प्रत्यय जो पुरुष और वचन का बोध कराते हैं। |
|
इदित् / ऊदित् |
वे धातु जिनमें क्रमशः 'इ'
या 'ऊ' की इत्संज्ञा
हुई हो। |
|
समानाधिकरण |
जब दो शब्द एक ही अर्थ या कारक को प्रकट करते हों। |





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