लघुसिद्धान्तकौमुदी (तद्धिते स्‍वार्थिकाः)


अथ स्‍वार्थिकाः


१२४१ इवे प्रतिकृतौ

कन् स्‍यात् । अश्व इव प्रतिकृतिरश्वकः । 
सूत्रार्थ - इव (सदृश) अर्थ में विद्यमान (उपमानवाची) शब्द से कन् प्रत्यय होता है यदि वह इव प्रतिकृति (मूर्ति या चित्र) उपमेय हो
यहाँ उपमानवाची शब्द से कन् प्रत्यय विहित है और प्रत्ययान्त शब्द उपमेय के लिए आता है परन्तु यह उपमेय मिट्टी, काष्ठ आदि से निर्मित प्रतिमा होनी चाहिए। 
अश्वकः-अश्व इव प्रतिकृतिः (घोड़े के समान मूर्ति)- इस विग्रह में अश्व शब्द से 'इवे प्रतिकृतौ' से कन् (क) प्रत्यय हुआ, अश्व + क = अश्वक, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'अश्वकः' रूप बनता है। 
(सर्वप्रातिपदिकेभ्‍यः स्‍वार्थे कन्) । अश्वकः ।।
सूत्रार्थ -  सभी प्रातिपदिकों से स्वार्थ में कन् प्रत्यय होता है। 
अश्वकः-अश्व एव (घोड़ा)-इस विग्रह में अश्व शब्द से 'सर्वप्रातिपदिकेभ्यः स्वार्थे कन्' से कन् (क) प्रत्यय, अश्व + क = अश्वक, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'अश्वकः' रूप बनता है। 

१२४२ तत्‍प्रकृतवचने मयट्

प्राचुर्येण प्रस्‍तुतं प्रकृतम्तस्‍य वचनं प्रतिपादनम् । भावे अधिकरणे वा ल्‍युट् । आद्ये प्रकृतमन्नमन्नमयम् । अपूपमयम् । द्वितीये तु अन्नमयो यज्ञः । अपूपमयं पर्व ।।
सूत्रार्थ - प्रथमान्त शब्द से प्रचुरता (आधिक्य) अर्थ बताने में स्वार्थ में मयट् प्रत्यय होता है। 
मयट् में 'मय' शेष रहता है। 
प्राचुर्येणेति- सूत्र में प्रकृति का अर्थ है- अधिकता से प्रस्तुत और वचन का अर्थ है प्रतिपादन या कथन (अधिकता अर्थ को बतलाना)। वचन शब्द से भाव और अधिकरण में ल्युट् प्रत्यय होता है। जब वचन शब्द को भाववाचक मानते हैं तो मयट् प्रत्ययान्त शब्द उसी वस्तु की प्रचुरता को प्रकट करता है जिसके वाचक शब्द से मयट् प्रत्यय होता है। जब इसे अधिकरण वाचक मानते हैं तो जिसमें वस्तु की प्रचुरता है, उसे प्रकट करता है। जैसे - 
प्रथम अर्थ में (भाव ल्युट् के पक्ष में) 
अन्नमयम्- प्रकृतमन्नम् (अन्न की अधिकता)- इस विग्रह में अन्न शब्द से 'तत्प्रकृतवचने मयट्' से मयट् (मय) प्रत्यय, अन्न + मय = अन्नमय, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'अन्नमयम्' रूप बनता है। 
अपूपमयम्- प्रकृतमपूपम् (पुओं की अधिकता) इस विग्रह में अपूप शब्द से 'तत्प्रकृतवचने मयट्' से मयट् (मय) प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'अपूपमयम्' रूप बनता है। 

द्वितीय अर्थ में (अधिकरण ल्युट पक्ष में) 
अन्नमयः यज्ञः- प्रचुरम् अन्नं यस्मिन् यज्ञे सः (जिसमें अन्न की अधिकता है ऐसा यज्ञ) इस विग्रह में अन्न शब्द से 'तत्प्रकृतवचने मयट्' से मयट् (मय) प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'अन्नमयः' रूप बनता है।
अपूपमयं पर्व- प्रचुराः अपूपाः यस्मिन् तत् (जिसमें पुओं की अधिकता है ऐसा पर्व) इस विग्रह में 'अपूप' शब्द से 'तत्प्रकृतवचने मयट्' से मयट् प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'अपूपमयम्' रूप बनता है।

१२४३ प्रज्ञादिभ्‍यश्‍च

अण् स्‍यात् । प्रज्ञ एव प्राज्ञः । प्राज्ञी स्‍त्री । दैवतः । बान्‍धवः ।।
सूत्रार्थ - प्रज्ञादि गणपठित प्रकृति प्रथमान्त शब्दों से स्वार्थ में अण् प्रत्यय होता है। 
अण् में 'अ' शेष रहता है। 
प्राज्ञः- प्रज्ञ एव (विद्वान्) इस विग्रह में प्रज्ञ शब्द से 'प्रज्ञादिभ्यश्च' से अण् (अ) प्रत्यय, 'तद्धितेप्वचामादेः से आदिवृद्धि, 'यस्येति च' से अन्त्य अ का लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'प्राज्ञः' रूप बनता है। 
प्राज्ञी- स्त्रीलिङ्ग में प्राज्ञ शब्द से 'टिड्ढाणञ्.' से ङीप् (ई) प्रत्यय, अन्त्य 'अ' का लोप, सु प्रत्यय तथा सु का लोप होकर 'प्राज्ञी' रूप बनता है। । 
दैवतः- देवता एव (देव) इस विग्रह में 'देवता' शब्द से 'प्रज्ञादिभ्यश्च' से अण् (अ) प्रत्यय 'तद्धितेष्वचामादेः' से आदिवृद्धि, अन्त्य 'आ' का लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'दैवतः' रूप बनता है। 

वान्धवः- बन्धुः एव (बन्धु) इस विग्रह में बन्धु शब्द से 'प्रज्ञादिभ्यश्च' से अण् (अ) प्रत्यय, आदिवृद्धि, ओर्गुणः' से उ को गुण ओ, ओ को एचोयवायावः से अव् आदेश बान्धव, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'बान्धवः' रूप बनता है। 

१२४४ बह्‍वल्‍पार्थाच्‍छस्‍कारकादन्‍यतरस्‍याम्

बहूनि ददाति बहुशः । अल्‍पशः । 
सूत्रार्थ - बहु और अल्प अर्थ वाले कारक शब्दों से स्वार्थ में शस् प्रत्यय विकल्प से होता है। 

बहुशः। बहूनि ददाति (बहुत देता है) इस विग्रह में बहु शब्द से 'बह्वल्पाच्छस्कारकादन्यतरस्याम्' से शस् (शः) प्रत्यय, सकार को रुत्व विसर्ग, 'बहु + शः = बहुशः' रूप बनता है। 

अल्पशः- अल्पानि ददाति (थोड़ा देता है) इस विग्रह में अल्प शब्द से 'बह्वल्पार्थाच्छस्कारकादन्यतरस्याम्' से शस् (शः) प्रत्यय, 'अल्प + शः = अल्पशः' रूप बनता है।

(आद्यादिभ्‍यस्‍तसेरुपसंख्‍यानम्) । आदौ आदितः । मध्‍यतः । अन्‍ततः । पृष्‍ठतः । पार्श्वतः । आकृतिगणोऽयम् । स्‍वरेणस्‍वरतः । वर्णतः ।।
सूत्रार्थ - आद्यादि गणपठित शब्दों से सभी विभक्तियों के अर्थ में तसि प्रत्यय होता है। 
तसि के इ की इत्संज्ञा तथा लोप तथा स् को रुत्व-विसर्ग होकर 'तः' शेष रहता है। 
आदितः- आदी (आदि में) इस विग्रह में आदि शब्द से 'आद्यादिभ्यस्तसेरुपसंख्यानम्' से तसि (तः) प्रत्यय, आदि + तः = आदितः रूप बनता है। 
इसी प्रकार मध्य शब्द से तसि प्रत्यय होकर मध्यतः (मध्य से), अन्त शब्द से तसि प्रत्यय होकर अन्ततः (अन्त से), पृष्ठ शब्द से तसि प्रत्यय होकर पृष्ठतः (पीछे से) पार्श्व शब्द से तसि प्रत्यय होकर 'पार्श्वतः' (पास से) रूप बनते हैं। 
आकृतीति- आकृति आदि शब्द आकृतिगण हैं। अतएव स्वर शब्द से तसि प्रत्यय होकर स्वरतः (स्वर से) वर्ण शब्द से तसि प्रत्यय होकर वर्णतः (वर्ण से) रूप बनते हैं। 

१२४५ कृभ्‍वस्‍तियोगे संपद्यकर्तरि च्‍विः
(अभूततद्भाव इति वक्तव्‍यम्) विकारात्‍मतां प्राप्‍नुवत्‍यां प्रकृतौ वर्तमानाद्विकारशब्‍दात् स्‍वार्थे च्‍विर्वा स्‍यात्‍करोत्‍यादिभिर्योगे।।
सूत्रार्थ - कृ, भू और अस् धातु के योग में विकार को प्राप्त होने वाली प्रकृति (कारण) के अर्थ में वर्तमान विकारवाची (कार्यबोधक) शब्द से स्वार्थ में विकल्प से च्वि प्रत्यय होता है ।

अभूतेति- जो वैसा नहीं था (अभूत), उसके वैसा होने में 'च्वि' प्रत्यय होता है। 

व्याख्या-च्वि प्रत्यय का सर्वापहार (पूर्णरूप से) लोप हो जाता है अर्थात् च्वि प्रत्यय का कुछ भी शेष नहीं रहता है। 

१२४६ अस्‍य च्‍वौ

अवर्णस्‍य ईत्‍स्‍यात् च्‍वौ । वेर्लोपे च्‍व्‍यन्‍तत्‍वादव्‍ययत्‍वम् । अकृष्‍णः कृष्‍णः संपद्यते तं करोति कृष्‍णीकरोति । ब्रह्‍मीभवति । गङ्गीस्‍यात् । 
सूत्रार्थ - अवर्ण को 'ई' हो जाता है च्वि प्रत्यय परे होने पर । 

वेर्लोप इति- च्वि के 'च्' को 'चुटू' से तथा 'इ' का उपदेशे से लोप हो जाता है। 'वेरपृक्तस्य' से 'व्' का लोप हो जाता है। इस प्रकार इस प्रत्यय में कुछ भी शेष नहीं बचता है। इसे सर्वापहार लोप कहते हैं। 
च्यन्तत्वादिति- च्चि प्रत्यय अन्त में होने से अव्यय संज्ञा होती है। तद्धितश्चासर्वविभक्तिः से च्वि प्रत्ययान्त शब्द की अव्यय संज्ञा हो जाती है। विशेष विवरण के लिए अव्यय प्रकरण देखें। 
कृष्णीकरोति- अकृष्णः कृष्णः संपद्यते तं करोति (जो काला नहीं है उसे काला बनाता है)-इस विग्रह में 'कृष्ण' शब्द से अभूततद्भाव में 'कृ' धातु के योग में 'अभूततद्भाव इति वक्तव्यम्' के सहयोग से 'कृभ्वस्तियोगे संपद्यकर्तरि च्विः' से च्वि प्रत्यय, कृष्ण + च्वि + करोति, च्वि का सर्वापहार लोप, 'अस्य च्वौ' से 'अ' को 'ई' होकर 'कृष्णीकरोति' रूप बनता है। 
ब्रह्मीभवति- अब्रह्म ब्रह्म भवति (जो ब्रह्म नहीं है, वह ब्रह्म होता है)-इस विग्रह में ब्रह्मन् शब्द से अभूततद्भाव में भू धातु के योग में 'अभूततद्भाव इति वक्तव्यम्' के सहयोग से 'कृभ्वस्तियोगे संपद्यकर्तरि च्विः' से च्वि प्रत्यय, ब्रह्मन् + च्वि + भवति, च्वि करोति-अकृष्णः जल से अभूततद्भाव  का सर्वापहार लोप नलोप प्रातिपदिकान्तस्य' से 'न्' का लोप, 'अस्व च्चो' से अ को महारचात अगहा गा स्यात् (जो गहा नहीं है यह गड़ा हो जाय)-इस विग्रह में गाणसे अभूततदभाव में अस धातु के योग में अभूततद्भाव इति वक्तव्यम्' के सहयोग से मस्तिसंपचकतरि चिः' से चि प्रत्यय, च्चि का सर्वापहारलोप, गङ्गा । स्वात् इस स्थिति में अस्प खो' से अको ई होकर गङ्गीस्यात्' रूप बनता है। 
(अव्‍ययस्‍य च्‍वावीत्‍वं नेति वाच्‍यम्) । दोषाभूतमहः । दिवाभूता रात्रिः ।।
अव्ययस्यति चि पत्यय परे होने पर अव्यय के 'अ' और 'आ' को 'ई' नहीं होता है। 
दोषाभूतमहः - अदोषा दोषा अभुत (जो रात नहीं था वह रात बन गया, बरसा ऋतु में बादलों के कारण दिन रात जैसा हो रहा है।)-इस विग्रह में दोषा शब्द से अभूत तद्भाव में भूधात के योग में स्वस्तियोगे संपधकर्तरि चिः से चि' प्रत्यय, दोषा + च्चि + भूतम् चिका सबापहारी लोप, अस्य च्चो' से 'आ' को ईत्व प्राप्त होता है। अव्ययस्य च्वावीत्वं नेति वाच्यम्' से इत्व का निषेध होकर दोषाभूतम्' रूप बनता है। 
विद्याभूता रात्रि:- अदिवा दिवा अभूत् (जो दिन नहीं थी वह दिन हो गयी अधिक चाँदनी के कारण रात दिन जैसी हो गयी है)-इस विग्रह में दिवा शब्द से अभूततद्भाव में भूधातु के योग में कृभ्वस्तियोगे संपधकर्तरि च्चिः' से च्चि प्रत्यय दिवा + च्चि + भूता, चिका सापहारी लोप, 'अस्य च्यौ' से 'आ' को ईत्व प्राप्त होता है 'अव्ययस्य च्चावीत्वं नेति वाच्यम्' से ईत्व का निषेध होकर 'दिवाभूता' रूप बनता है। 

१२४७ विभाषा साति कार्त्‍स्‍न्‍ये

च्‍विविषये सातिर्वा स्‍यात्‍साकल्‍ये ।।
सूत्रार्थ - च्वि प्रत्यय के विषय में साकल्य (सम्पूर्णता) के अर्थ में विकल्प से साति प्रत्यय होता है। 

१२४८ सात्‍पदाद्योः

सस्‍य षत्‍वं न स्‍यात् । कृत्‍स्‍नं शस्‍त्रमग्‍निः संपद्यतेऽग्‍निसाद्भवति । दधि सिञ्चति ।।
सूत्रार्थ - सात् प्रत्यय के 'स्' तथा पदादि के 'स्' को '' नहीं होता है। 

अग्निसाद् भवति- कृत्स्नं शस्त्रम् अग्निः सम्पद्यते (सम्पूर्ण शस्त्र जलकर अग्नि हो रहा है)-इस विग्रह में अग्नि शब्द से भू धातु के योग में च्चि के विषय में विभाषा साति कास्न्ये' से साति (सात) प्रत्यय होता है। अग्नि + सात् + भवति. इस स्थिति में 'आदेशप्रत्यययोः' से स को ष प्राप्त होता है किन्तु 'सात्पदाद्योः' से निषेध हो जाता है। इस प्रकार अग्निसाद् भवति' रूप बनता है। 

दधि सिञ्चति- दधि सिञ्चति यहाँ 'सात्पदाधोः' से पदादि होने के कारण स को ए नहीं होता है।

१२४९ च्‍वौ च

च्‍वौ परे पूर्वस्‍य दीर्घः स्‍यात् । अग्‍नीभवति ।।
सूत्रार्थ - च्चि प्रत्यय के परे होने पर पूर्ववर्तीह्रस्व स्वर को दीर्घ हो जाता है। 

अग्नीभवति- अनग्निः अग्नि: भवति (जो अग्नि नहीं है वह अग्नि बन रहा है)-इस विग्रह में अग्नि शब्द से अभूततदभाव में भ धात कं योग में कभ्वस्तियोगे संपद्यकर्तरि चिः' से च्चि प्रत्यय, च्चि का सांपहार लोप, अग्नि - भवति, 'च्यौ च' से अग्नि की 'इ' को दीर्घ 'ई' होकर 'अग्नीभवति' रूप बनता है। 

१२५० अव्‍यक्तानुकरणाद्द्व्‍यजवरार्धादनितौ डाच्

द्व्‍यजेवावरं न्‍यूनं न तु ततो न्‍यूनमनेकाजिति यावत् । तादृशमर्धं यस्‍य तस्‍माड्डाच् स्‍यात् कृभ्‍वस्‍तिभिर्योगे । 
सूत्रार्थ - जिसके अर्ध भाग में अनेक अच् (स्वर हों) और जिससे परे इति शब्द न हो ऐसे अव्यक्त (अस्पष्ट) ध्वनि के अनुकरण शब्द से कृ, भू और अस् धातु के योग में डाच् प्रत्यय होता है। (डाच् में आ शेष रहता है।) 


(डाचि विविक्षते द्वे बहुलम्)  इति डाचि विविक्षते द्वित्‍वम् ।

(नित्‍यमाम्रेडिते डाचीति वक्तव्‍यम्)  डाच्‍परं यदाम्रेडितं तस्‍मिन्‍परे पूर्वपरयोर्वर्णयोः पररूपं स्‍यात् । इति तकारपकारयोः पकारः । पटपटाकरोति । अव्‍यक्तानुकरणात्‍किम् ? ईषत्‍करोति । द्व्‍यजवरार्धात्‍किम् ? श्रत्‍करोति । अवरेति किम् ? खरटखरटाकरोति । अनितौ किम् ? पटिति करोति ।।
डाचीति- डाच प्रत्यय की विवक्षा में अव्यक्तानुकरण को विकल्प से द्वित्व होता है। 
नित्यमिति-डाच परक आमेडित द्वित्व का अगला भाग परे होने पर पूर्व और पर वर्ण को पररूप एकादेश होता है। 
पटपटाकरोति- पटत् करोति (पटपट करता है)-इस विग्रह में डाच् प्रत्यय करने की इच्छा होते ही 'डाचि विवक्षिते द्वे बहुलम्' से पटत् को द्वित्व हो जाता है-पटत् पटत करोति, 'अव्यक्तानकरणादद्वयजवरार्धदनिती डाच्' से डाच् (आ) प्रत्यय, पटत् पटत् आ करोति, इस स्थिति में 'तस्य परमानेडितम्' से अगले पटत् को आमेडित संज्ञा तथा 'नित्यमामेडित डाचिति वक्तव्यम्' से पूर्व आकार तथा अगले पकार को पररूप अर्थात पकार हो जाता है। पट . पटत् + आ + करोति, डित होने से 'टेः' से पटत के अत का लोप, 'पट , पट + आ + करोति = पटपटाकरोति' रूप बनता है। 
अव्यक्तानुकरणादिति- सूत्र में अव्यक्त ध्वनि के अनुकरण से डान् प्रत्यय होता है ऐसा क्यों कहा? यह इसलिए कहा कि इंपत्कराति (थाड़ा करता है) में 'डाच प्रत्यय नहीं। होगा क्योंकि ईपद अव्यक्त ध्वनि का अनुकरण नहीं है।' 
दयजवराधांदिति- सूत्र में दयच ही न्यून हा एसा क्या कहा गया है? यह इसलिए कहा गया है कि श्रुत करोति (श्रुत ध्वनि करता है) में डाच् प्रत्यय नहीं होता है क्योंकि इसमें अनेक 'अच्' नहीं हैं। 

अवरेति- सूत्र में अवर शब्द क्यों रखा गया है। इसलिए कि खरटखरटाकरोति। (खरटत् शब्द करता है) में डाच् प्रत्यय होता है क्योंकि इसमें दो से अधिक अच् हैं। अवर शब्द के ग्रहण से यह आशय है कि आधा भाग कम से कम दो अच् वाला हो और यदि अधिक अच हों तो कोई बात नहीं है। खरटखरटाकराति रूप पटपटाकरोति की तरह सिद्ध होता है। 

अनितौ किमिति-सूत्र में इति परे होने पर डाच् प्रत्यय नहीं होता है। यह किसलिए कहा गया है? इसलिए कि पटत् इति करोति = पटिति करोति यहाँ डाच् प्रत्यय नहीं होगा, क्योंकि पटत् के आगे इति है। 

इति स्‍वार्थिकाः ।। १६ ।।

।। इति तद्धिताः ।।
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लघुसिद्धान्तकौमुदी प्रागिवीयप्रकरणम् (प्रागिधीयाः)

अथ प्रागिवीयाः

१२२१ अतिशायने तमबिष्‍ठनौ
अतिशयविशिष्‍टार्थवृत्तेः स्‍वार्थ एतौ स्‍तः । अयमेषामतिशयेनाढ्यः  आढ्यतमः । लघुतमःलघिष्‍ठः ।।
अतिशय अर्थ में विद्यमान शब्द से स्वार्थ में तमप् और इष्ठन् प्रत्यय होते 

तमप् और इष्ठन् प्रत्ययों में क्रमशः तम और इष्ठ शेष रहता है। ये प्रत्यय बहुतों में उत्कर्ष बतलाने के लिए प्रयुक्त होते हैं।
अयम् एषाम् अतिशेयन आढ्यः (यह इनमें अधिक धनी) इस विग्रह में आढय शब्द से ‘अतिशायने तमबिष्ठनौ' से तमप् प्रत्यय होता है। प् की इत्संज्ञा तथा लोप, आढय + तम = आढ्यतम, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'आठ्यतमः' रूप बनता है।
लघुतमः- अयम् एषाम् अतशयन लघुः (यह इनमें सबसे छोटा है)-इस विग्रह में लघु शब्द से 'अतिशायने तमविष्ठनो' से तमप् (तम) प्रत्यय होता है लघु + तम = लघुतम, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'लघुतमः' रूप बनता है। 

लपिष्टः-अयम् एषाम् अतिशयेन लघुः इस विग्रह में लघु शब्द से 'अतिशावने तमविष्ठनो' से इष्ठन् प्रत्यय होता है। न् की इत्संज्ञा तथा लोप, लघु + इष्ठ इस स्थिति में 'टे:' से 'उ' टि का लोप लघ+ इष्ठ = लघिष्ठ, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'लघिष्ठः' रूप बनता है। 
१२२२ तिङश्‍च
तिङन्‍तादतिशये द्योत्‍ये तमप् स्‍यात् ।।
तिङन्त से भी अतिशय अर्थ प्रकट करने के लिए तमप् प्रत्यय होता है। 
१२२३ तरप्‍तमपौ घः
एतौ घसंज्ञौ स्‍तः ।।
तरप् और तमप् प्रत्ययों की घसंज्ञा होती है। 
१२२४ किमेत्तिङव्‍ययघादाम्‍वद्रव्‍यप्रकर्षे
किम एदन्‍तात्तिङोऽव्‍ययाच्‍च यो घस्‍तदन्‍तादामुः स्‍यान्न तु द्रव्‍यप्रकर्षे । किन्‍तमाम् । प्राह्‍णेतमाम् । पचतिमाम् । उच्‍चैस्‍तमाम् । द्रव्‍यप्रकर्षे तु उच्‍चैस्‍तमस्‍तरुः ।।
किम्, एकारान्त, तिङन्त और अव्यय से परे जो 'घ' (तरप्, तमप) प्रत्यय, तदन्तं से आमु प्रत्यय होता है, परन्तु यदि द्रव्य का प्रकर्ष (उत्कप) बताना हो तो आमु प्रत्यय नहीं होगा। 
व्याख्या-आमु में आम शेष रहता है। अन्त में आम लगने से 'तर' को तराम और 'तम्' को तमाम् हो जाता है। 
किन्तमाम्- अयम् एषाम् अतिशयेन किम् इति (अतिशय प्रश्न, कौन सा)-इस विग्रह में 'किम' शब्द से 'अतिशायने तमबिष्ठनौ' से तमप् (तम) प्रत्यय होता है। किम +तम, इस स्थिति में 'किमेत्तिङव्ययघादाम्बद्रव्यप्रकर्षे' से आम् (आम) प्रत्यय, 'यस्येति च' से अन्त्य 'अ' का लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'किन्तमाम' रूप बनता है। 

प्राणेतमाम्-अयम् एषाम् अतिशयेन प्राणे (बहुत सवेरे)-इस विग्रह में 'प्राणे' शब्द से 'अतिशायने तमबिष्ठनौ' से तमप् (तम) प्रत्यय होता है 'तरप्तमपौ घः' से तमप् की घसंज्ञा, 'किमेत्तिङव्ययघादाम्बद्रव्यप्रकर्ष' से आमु (आम्) प्रत्यय, प्राणे + तम + आम् 'यस्येति च' से अन्त्य 'अ' का लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'पाह्णेतमाम्' रूप बनता है।पचतितमाम्- अयम् एपाम् अतिशयन पचति (बहुत अच्छा पकाता है)-इस विग्रह। में तिङन्त पचति' शब्द से 'तिडश्च' से तमप (तम) प्रत्यय, पचति + तम इस विग्रह में 'तरप्तमपी घः' से तमप् की घसंज्ञा, 'किमतिडव्ययघादाम्बद्रव्यप्रकर्षे' से आम (आम्) प्रत्यय, 'यस्वेति च' से अन्त्य 'अ' का लाप, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर ‘पचतितमाम्' रूप बनता है। 
उच्चस्तमाम्- अवम् एषाम् अतिशवेन उच्चैः (बहुत ऊँचा)-इस विग्रह में 'उच्चस्' शब्द से ‘अतिशायने तमविष्ठनौ' से तमप् (तम) प्रत्यय, उच्चैस् + तम, 'तरप्तमपी घः' से तमप् की घसंज्ञा 'किमेत्तिङव्ययघादाम्बद्रव्यप्रकर्षे' से आम (आम्) प्रत्यय, 'यस्येति च' से अन्त्य 'अ' का लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'उच्चस्तमाम्' रूप बनता 
द्रव्यप्रकर्षे इति-जहाँ द्रव्य का उत्कर्प दिखलाया जाता है वहाँ आमु प्रत्यय नहीं होता है। जैसे-उच्चैस्तमः तरुः (अधिक ऊँचा वृक्ष)।
१२२५ द्विवचनविभज्‍योपपदे तरबीयसुनौ
द्वयोरेकस्‍यातिशये विभक्तव्‍ये चोपपदे सुप्‍तिङन्‍तादेतौ स्‍तः । पूर्वयोरपवादः । अयमनयोरतिशयेन लघुः लघुतरो लघीयान् । उदीच्‍याः प्राच्‍येभ्‍यः पटुतराः पटीयांसः ।।
दो में से एक का उत्कर्ष बताने के लिए तथा जिससे विभाग करना हो तो उसके उपपद होने पर सुबन्त और तिङन्त से 'तरप्' तथा 'ईयसुन्' प्रत्यय होते हैं। 
तरप् में तर तथा ईयसुन् में ईयस् शेष रहता है। 
पूर्वयोरिति- तरप् और ईवसुन् प्रत्यय, तमप् और इष्ठन् प्रत्यय के बाधक हैं। आशय यह है कि दो में से एक का उत्कर्ष दिखाने के लिए तरप् तथा ईवसुन् प्रत्यय होते हैं। और बहुतों में से एक का उत्कर्ष दिखाने के लिए तमप् तथा इष्ठन् प्रत्यय होते हैं। 
लघुतरः- अयम् अनयोः अतिशयेन लघुः (यह इन दोनों में छोटा है)-इस विग्रह में 'लघ' शब्द से 'द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ' से 'तरप्' (तर) प्रत्यय, लघु + तर = लघुतर, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'लघुतरः' रूप बनता है। 
लघीयान्- 'अयम् अनयोः अतिशयेन लघुः' इस विग्रह में लघु शब्द से 'द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ' से ईयसुन् इयस्) प्रत्यय, लघु + ईयस् 'टेः' से 'उ' टि का लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'लघीयान्’ रूप बनता है। 

पटुतराः, पटीयांसः-(उदीच्याः प्राच्येभ्यः) अतिशयेन पटवः (उत्तर के लोग पूर्व के लोगों से अधिक चतुर है)-इस विग्रह में पटु शब्द से 'द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनी'। से तरप् (तर) प्रत्यय, पटु + तर = पटुतर, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'पटुतराः' रूप बनता है।
पटीयांसः में पटु शब्द से 'द्विवचनविभज्योपपदे तरवीयसुनौ' से ईयसुन् (ईयस्)। प्रत्यय, पटु + ईयस्, 'टेः' से 'उ' टि का लोप, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर प्रथमा के बहुवचन में 'पटीयांसः' रूप बनता है। 
१२२६ प्रशस्‍यस्‍य श्रः
अस्‍य श्रादेशः स्‍यादजाद्योः परतः ।।
स्वरादि (इषठन् और ईयसुन्) प्रत्यय परे होने पर 'प्रशस्य' शब्द को 'श्र' आदेश होता है। 
१२२७ प्रकृत्‍यैकाच्
इष्‍ठादिष्‍वेकाच् प्रकृत्‍या स्‍यात् । श्रेष्‍ठःश्रेयान् ।।
इष्ठन् आदि प्रत्यय परे होने पर एकाच् (जिसमें एक स्वर रहता है) को प्रकृतिभाव हो जाता है। अर्थात् टि का लोप नहीं होता है। 
श्रेष्ठः- अयम् एषाम् अतिशयेन प्रशस्यः (इनमें यह सर्वाधिक प्रशंसनीय है) इस विग्रह में प्रशस्य शब्द से 'अतिशायने तमविष्ठनो' से इष्ठन् (इष्ठ) प्रत्यय होता है। प्रशस्य + इष्ठ, 'प्रशस्यस्य श्रः' से प्रशस्य को 'श्र' आदेश, श्र + इष्ठ इस स्थिति में 'टेः' से 'अ' टि को लोप प्राप्त होता है। 'प्रकृत्यैकाच्' से प्रकृतिभाव, 'आद्गुणः' से गुण, अ + इ = ए, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'श्रेष्ठः' रूप बनता है।। 

श्रेयान्- अयम् अनयोः अतिशयेन प्रशस्यः (यह इन दोनों में अधिक प्रशंसनीय है)-इस विग्रह में प्रशस्य शब्द से 'द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ' से ईयसुन् (ईयस्) प्रत्यय, 'प्रशस्यस्य श्रः' से 'प्रशस्य' को 'श्र' आदेश, 'टेः' से 'अ' टि का लोप प्राप्त होता है, 'प्रकृत्यैकाच्' से प्रकृतिभाव, 'आद्गुणः' से गुण, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'श्रेयान्' रूप बनता है। 
१२२८ ज्‍य च
प्रशस्‍यस्‍य ज्‍यादेशः स्‍यादिष्‍ठेयसोः । ज्‍येष्‍ठः ।।
इष्ठन् और ईयसुन् प्रत्यय परे होने पर प्रशस्य को ज्य आदेश होता है। 

ज्येष्ठः- अयम् एषाम् अतिशयेन प्रशस्यः (यह इनमें अधिक प्रशंसनीय है)-इस विग्रह में प्रशस्य शब्द से 'अतिशायने तमबिष्ठनौ' से इष्ठन् (इष्ठ) प्रत्यय, 'ज्य च' से प्रशस्य को 'ज्य' आदेश, ज्य + इष्ठ, इस स्थिति में 'टेः' से 'अ' टि का लोप प्राप्त होता है 'प्रकृत्यैकाच्' से प्रकृतिभाव, 'आद्गुणः' से गुण, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'ज्येष्ठः' रूप बनता है। 
१२२९ ज्‍यादादीयसः
आदेः परस्‍य । ज्‍यायान् ।।
ज्य से परे ईयस् के 'ई' को 'आ' आदेश होता है। 
आदेरिति- आदेः परस्य ।। 2 । 51। इस सूत्र के अनुसार 'आ' आदेश, ईयस् के आदि ईकार को होता है। 

ज्यायान्- अयम् अनयोः अतिशयेन प्रशस्यः (यह इन दोनों में अधिक प्रशंसनीय है)-इस विग्रह में 'प्रशस्य' शब्द से 'द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ' से ईयसुन् (ईयस्) प्रत्यय, 'ज्य च' से प्रशस्य को ज्य आदेश, ज्य + ईयस, इस स्थिति में 'टेः' से 'अ' टि का लोप प्राप्त होता है, 'प्रकृत्यैकाच्' से प्रकृतिभाव, 'आदेः परस्य' के सहयोग से 'ज्यादादीयसः' से 'ई' को 'आ' आदेश, सवर्णदीर्घ, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'ज्यायान्' रूप बनता है। 
१२३० बहोर्लोपो भू च बहोः
बहोः परयोरिमेयसोर्लोपः स्‍याद्बहोश्‍च भूरादेशः । भूमा । भूयान् ।।
बहु शब्द से परे इमनिच् और ईयसुन् प्रत्यय के आदि (इ, ई) का लोप होता है और बहु को 'भू' आदेश होता है। 
'आदेः परस्य' की व्यवस्था के अनुसार इमनिच् तथा ईयसुन् के इ, ई का लोप होता है। 
भूमा- बहोर्भावः (बहुत्व, अधिकता)-इस विग्रह में 'बहु' शब्द से 'पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा' से इमनिच् (इमन्) प्रत्यय, बहु + इमन् इस स्थिति में 'बहोर्लोपो भू च बहोः' से इमन् के इ का लोप और बहु को भू आदेश, भू + मन् = भूमन्, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'भूमा' रूप बनता है। भूमा वै सुखम् ।

भूयान्-अयम् अनयोः अतिशयेन बहुः (दो में अधिक)-इस विग्रह में बहु शब्द से 'द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ' से ईयसुन, (ईयस्) प्रत्यय, बहु + ईयस् इस स्थिति में 'बहोर्लोपो भू च बहोः' से ईयस् के ई का लोप तथा बहु को भू आदेश, भू + यस् = भूयस्, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'भूयान्' रूप बनता है। 
१२३१ इष्‍ठस्‍य यिट् च
बहोः परस्‍य इष्‍ठस्‍य लोपः स्‍याद् यिडागमश्‍च । भूयिष्‍ठः ।।
बहु शब्द से परे इष्ठन् के (आदि इ) का लोप होता है। ष्ठ से पहले यिट् का आगम होता है तथा 'बहु' को 'भू' आदेश होता है। 

भूयिष्ठः- अयम् एषाम् अतिशयेन बहुः (यह इनमें सबसे अधिक है)-इस विग्रह में बह शब्द से 'अतिशायने तमबिष्ठनौ' से इष्ठन् (इष्ठ) प्रत्यय, बहु + इष्ठ, इस स्थिति में 'इष्ठस्य यिट् च' से इष्ठ के इ का लोप, यिट् (यि) का आगम तथा बहु को भू आदेश होकर भू + यि + ष्ठ = भूयिष्ठ, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'भूयिष्ठः' रूप बनता है। 
१२३२ विन्‍मतोर्लुक्
विनो मतुपश्‍च लुक् स्‍यादिष्‍ठेयसोः । अतिशयेन स्रग्‍वी स्रजिष्‍ठः । स्रजीयान् । अतिशयेन त्‍वग्‍वान् त्‍वचिष्‍ठः । त्‍वचीयान् ।।
इष्ठन् और ईयसुन् प्रत्यय परे रहते विन् और मतुप् प्रत्यय का लोप हो जाता है। 
स्रजिष्ठ:- अतिशयेन स्रग्वी (सबसे अधिक माला वाला)-इस विग्रह में स्रग्विन् शब्द से 'अतिशायने तमबिष्ठनौ' 'से इष्ठन् (इष्ठ) प्रत्यय, 'विन्मतोर्लुक्' से विन् प्रत्यय का लोप, स्रज् + इष्ठ = स्रजिष्ठ, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'स्रजिष्ठः' रूप बनता है। 
स्रजीयान्-अयम् अनयोः अतिशयेन स्रग्वी (यह इन दोनों में अधिक माला वाला है)-इस विग्रह में स्रग्विन् शब्द से 'द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ' से ईयसुन् (ईवस्) प्रत्यय, 'विन्मतोर्लुक' से विन् प्रत्यय का लोप, स्रज् + ईयस् = स्रजीयस्, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'स्रजीयान्' रूप बनता है। 
त्वचिष्ठः-अतिशयेन त्वग्वान् (अधिक त्वचा वाला)-इस विग्रह में ‘त्वग्वत्' शब्द से 'अतिशायने तमबिष्ठमौ' से इष्ठन् (इष्ठ) प्रत्यय, 'विन्मतोलृक् से मतुप् प्रत्यय का लोप, त्वच् + इष्ठ = त्वचिष्ठ, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'त्वचिष्ठः' रूप बनता 

त्वचीयान्-अयम् अनयोः अतिशयेन त्वग्वान् (यह इन दोनों में अधिक त्वचा वाला है)-इस विग्रह में 'त्वग्वत्' शब्द से 'द्विवचनविभज्योपपदे तरबीयसुनौ' से ईयसुन् (ईयस्) प्रत्यय, 'विन्मतोर्लुक्' से मतुप् प्रत्यय का लोप, त्वच् + ईयस् = त्वचीयस्, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'त्वचीयान्' रूप बनता है।
१२३३ ईषदसमाप्‍तौ कल्‍पब्‍देश्‍यदेशीयरः
ईषदूनो विद्वान् विद्वत्‍कल्‍पः । विद्वद्देश्‍यः । विद्वद्देशीयः । पचतिकल्‍पम् ।।
थोड़ा, कम या लगभग अर्थ में विद्यमान सुबन्त और तिङन्त शब्दों से कल्पप्, देश्य और देशीयर् प्रत्यय होते हैं। 
व्याख्या-कल्पप् में कल्प तथा देशीयर् में देशीय शेष रहता है। 
विद्वत्कल्पः- ईषदूनः विद्वान् (कुछ कम विद्वान्, विद्वान् जैसा)-इस विग्रह में 'विद्वस्' शब्द से 'ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः' से कल्पप् (कल्प) प्रत्यय, विद्वस् + कल्प, इस स्थिति में 'वसुस्रंसुध्वंस्वनडुहां दः' से 'स्' को 'द्', 'खरि च' से चर्त्व होकर 'द्' को 'त्', प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'विद्वत्कल्पः' रूप बनता है।। 

'विद्वद्देश्यः- ईषदूनः विद्वान्-इस विग्रह में विद्वस् शब्द से 'ईषदसमाप्तो कल्पब्देश्यदेशीयरः' से देश्य प्रत्यय, 'वसुसंसु. से स् को 'द्', विद्वद् + देश्य = विद्वद्देश्व, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'विद्वद्देश्यः' रूप बनता है।। 
विद्वद्देशीयः-इषदूनः विद्वान्-इस विग्रह में विद्वस् शब्द से 'ईपदसमाप्ती कल्पव्देश्यदेशीयरः' से देशीयर् (देशीय) प्रत्यय, 'वसुस्रंसुध्वंस्वनडुहां दः.' से स् को द्, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर विद्वद्देशीयः' रूप बनता है। 
पचतिकल्पम्-ईषदूनः पचति (कुछ कम पकाता है, पकाता सा है)-इस विग्रह में तिङन्त पचति शब्द से 'ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः' से कल्पप् (कल्प) प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर ‘पचतिकल्पम्' रूप बनता है। 
१२३४ विभाषा सुपो बहुच् पुरस्‍तात्तु
ईषदसमाप्‍तिविशिष्‍टेऽर्थे सुबन्‍ताद्बहुज्‍वा स्‍यात्‍स च प्रागेव न तु परतः । ईषदूनः पटुर्बहुपटुः । पटुकल्‍पः । सुपः किम् ? जयति कल्‍पम् ।।
कुछ कम या लगभग अर्थ में विद्यमान सुबन्त से विकल्प से बहुच् प्रत्यय होता है। यह प्रत्यय शब्द से पहले लगता है। 
बहुपटुः, बहुकल्पः- ईषदूनः पटुः (कुछ कम चतुर, चतुर सा)-इस विग्रह में पटु शब्द से 'विभाषा सुपो बहुच पुरस्तात्तु' से विकल्प से ‘पटु' शब्द से पूर्व बहुच् (बहु) प्रत्यय, बहु + पटु = बहुपटु, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'बहुपटुः' रूप बनता है। 
बहुच् प्रत्यय के अभाव पक्ष में पटु शब्द से 'ईषदसमाप्तौ कल्पब्देश्यदेशीयरः' से कल्पप् (कल्प) प्रत्यय, पटु + कल्प = पटुकल्प, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर ‘पटुकल्पः ' रूप बनता है। 

सुपः किमिति-प्रस्तुत सूत्र में सुपः क्यों कहा गया है? यह इसलिए कहा गया है कि बहुच् प्रत्यय सुबन्त से ही होता है, तिङन्त से नहीं। अतएव यजति तिङन्त शब्द से बहुच प्रत्यय न होकर कल्पप् प्रत्यय होता है और इस प्रकार 'यजतिकल्पम्' रूप बनता है। 
१२३५ प्रगिवात्‍कः
इवे प्रतिकृतावित्‍यतः प्राक्‍काधिकारः ।।
इवे प्रतिकृती 51 1। 96। इस सूत्र से पहले 'क' प्रत्यय का अधिकार है।
अव्यय और सर्वनाम शब्दों से अकच् प्रत्यय होता है और वह टि (स्वर सहित अंश) से पहले होता है।
१२३६ अव्‍ययसर्वनाम्‍नामकच् प्राक् टेः
कापवादः । तिङश्‍चेत्‍यनुवर्तते ।।
यह 'क' का बाधक सूत्र है। इसमें 'तिङश्च' की भी अनुवृत्ति होती है। अथात् अकच् प्रत्यय तिङन्त से भी होता है। 
१२३७ अज्ञाते
कस्‍यायमश्वोऽश्वकः। उच्‍चकैः। नीचकैः। सर्वके । 
 अज्ञात अर्थ में सुबन्त से 'क' प्रत्यय तथा अव्यय, सर्वनाम तथा तिङन्त की टि से पूर्व 'अकच्' प्रत्यय हो। 
अश्वकः- कस्य अयम् अश्वः (अज्ञात व्यक्ति का घोड़ा)-इस विग्रह में अश्व शब्द से 'अज्ञाते' से 'क' प्रत्यय, अश्व + क = अश्वक, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'अश्वकः' रूप बनता है। 
उच्चकैः- अज्ञातम् उच्चैः (अज्ञात ऊँचा)-इस विग्रह में उच्चैस् शब्द से 'अज्ञाते' सूत्र से टि से पहले अकच् (अक्) प्रत्यय उच्च् + अक् + ऐस् = उच्चकैस्, स् को रुत्व विसर्ग, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु तथा सु का लोप होकर 'उच्चकैः' रूप बनता है। 
नीचकैः- अज्ञातं नीचैः (अज्ञात नीचा)-इस विग्रह में नीचैस् शब्द से 'अज्ञाते सूत्र से टि ‘ऐस्' से पहले 'अकच्' (अक्) प्रत्यय, नीच् + अक + ऐस् = नीचकैस्, स् को रुत्व-विसर्ग, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु तथा सु का लोप होकर नीचकैः' रूप बनता 
सर्वके-अज्ञाताः सर्वे (अज्ञात सब)-इस विग्रह में सर्व शब्द से 'अज्ञाते' से अकच् (अक्) प्रत्यय, सर्व + अक् + ए = सर्वके, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'सर्वके रूप बनता है। 

(ओकारसकारभकारादौ सुपि सर्वनाम्‍नष्‍टेः प्रागकच्अन्‍यत्र सुबन्‍तस्‍य)। युष्‍मकाभिः । युवकयोः । त्‍वयका ।।
ओकारेति-यदि सुप् (विभक्ति प्रत्यय) के आदि में ओ, स या भ होता है तो उनसे परे सर्वनाम की टि से पहले अकच होता है और अन्यत्र सुबन्त की टि से पहले अकच् होता है। 
युष्मकाभिः-अज्ञातैः युष्माभिः (अज्ञात तुम लोगों ने)-इस विग्रह में युष्माभिः शब्द से 'ओकारसकारभकारादौ सुपि सर्वनाम्नष्टेः प्रागकच्' के विधान से 'अज्ञाते' से युष्म के बाद अकच् (अक्) प्रत्यय, युष्म + अक् + आभिः = 'युष्मकाभिः' रूप बनता है। 
युवकयोः-अज्ञातयोः युवकयोः (अज्ञात तुम दोनों का)-इस विग्रह में 'यवकयोः'। शब्द से ओस प्रत्यय परे होने पर 'ओकरसकार.' के विधान से 'अज्ञाते' से सर्वनाम की टि से पूर्व अकच् (अक्) प्रत्यय, 'युव् + अक् + अयोः = युवकयोः' रूप बनता 


ओकारेत्यादीति-वार्तिक में ओकार, सकार, भकारादि क्यों कहा गया? यह इसलिए कहा गया कि जहाँ ओकार, सकार या भकारादि प्रत्यय परे नहीं होंगे वहाँ सर्वनाम की टि से पूर्व अकच् प्रत्यय न होकर सुबन्त की टि से पहले अकच प्रत्यय होगा।
त्ववका-अज्ञातेन त्वया (अज्ञात तूने)-यहाँ सुबन्त की टि 'अ' से पूर्व अकच् प्रत्यय होगा। इस प्रकार त्वय् + अक् + आ = त्वयका रूप बनता है। 
१२३८ कुत्‍सिते
कुत्‍सितोऽश्वोऽश्वकः ।।
कुत्सित (निन्दित) अर्थ में विद्यमान शब्दों से 'क' और 'अकच्' प्रत्यय होते हैं। 

अश्वकः-कुत्सितः अश्वः (निन्दित घोडा)-इस विग्रह में अश्व शब्द से 'कुत्सिते' से 'क' प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'अश्वकः' रूप बनता है। 
१२३९ किंयत्तदो निर्धारणे द्वयोरेकस्‍य डतरच्
अनयोः कतरो वैष्‍णवः । यतरः । ततरः ।।
दो में से एक का निर्धारण करने में किम्, यद् और तद् शब्दों से डतरच प्रत्यय होता है। 
व्याख्या-डतरच् में 'अतर' शेष रहता है। 
कतरः- अनयोः कः वैष्णवः (इन दोनों में कौन वैष्णव है)-इस विग्रह में किम् शब्द से 'किंयत्तदोर्निर्धारणे द्वयोरेकस्य डतरच्' से इतरच् (अतर) प्रत्यय, डित् होने से 'टेः' से 'इम' टि का लोप, क् + अतर = कतर, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'कतरः' रूप बनता है। 
यतरः- अनयोः यः (इन दोनों में जो)-इस विग्रह में यद् शब्द से 'किंयत्तदोर्निर्धारणे द्वयोरेकस्य डतरच' से डतरच् (अतर) प्रत्यय, डित् होने से 'टेः' से 'अद्' टि का लोप. य+ अतर = यतर, प्रातिपकिदसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'यतरः' रूप बनता है। 

ततरः- अनयोः सः (इन दोनों में वह)-इस विग्रह में तद् शब्द से 'किंयत्तदोर्निर्धारणे दयोरेकस्य डतरच' से डतरच (अतर) प्रत्यय, डित् होने से 'टेः' से 'अद् टि का लोप, त + अतर = ततर, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'ततरः' रूप बनता है। 
१२४० वा बहूनां जातिपरिप्रश्‍ने डतमच्
जातिपरिप्रश्‍न इति प्रत्‍याख्‍यातमाकरे । बहूनां मध्‍ये एकस्‍य निर्धारणे डतमज्‍वा स्‍यात् । कतमो भवतां कठः । यतमः । ततमः । वाग्रहणमकजर्थम् । यकः । सकः ।।
बहुत में से एक का निर्धारण करने में किम्, यद् तथा तद् शब्दों से। विकल्प से डतमच् प्रत्यय होता है। 
व्याख्या-डतमच में 'अतम' शेष रहता है। 

जातीति--सूत्र में स्थित जातिपरिप्रश्ने शब्द का महाभाष्य में प्रत्याख्यान-खंडन किया गया है। अर्थात् महाभाष्य के अनुसार यह पद अनावश्यक है।
 कतमः भवतां कठः-कः भवतां कठः (आपमें कठ शाखा का कान है)-इस विग्रह में किम् शब्द से 'वा बहूनां जातिपरिप्रश्न इतमच्' से विकल्प से इतमच (अतम) प्रत्यय डित् होने से 'टे: से इम् का लोप, क् + अतम = कतम, प्रातिपदिकसंजा तथा स्वादिकार्य होकर 'कतमः' रूप बनता है 
यतमः यः भवताम् (आपमें जो)-इस विग्रह में यद् शब्द से 'वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने डतमच्' से विकल्प से इतमच (अतम) प्रत्यय, डित होने से 'टेः' से 'अद' टि का लोप, य् + अतम = यतम, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'यतमः' रूप बनता है। 
ततमः-सः भवताम् (आपमें वह)-इस विग्रह में तद् शब्द से 'वा बहूनां जातिपरिप्रश्ने डतमच्' से विकल्प से डतमच (अतम) प्रत्यय, डित् होने से 'टे:' से अद् 'टि' का लोप, त् । अतम = ततम, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'ततमः रूप बनता है।' 
वा ग्रहणमिति-सूत्र में 'वा' ग्रहण अकच् प्रत्यय के लिए हुआ है। । 
यकः-यो भवताम् (आपमें से जो)-इस विग्रह में सकारादि, यद् + सु प्रत्यय परे होने के कारण ‘ओकारसकार.' के विधान से सर्वनाम की टि अद् से पूर्व अकच् (अक) प्रत्यय होता है। य् + अक् + अद् + सु, इस स्थिति में 'त्यदादीनामः' से 'द' को 'अ', 'अतो गुणे' से पररूप, य् + अक् + अ + सु = यकसु, सु को रुत्व-विसर्ग होकर 'यकः' रूप बनता है। 

सकः-सः भवताम् (आपमें से वह)-इस विग्रह में सकारादि सु प्रत्यय परे होने के कारण ‘ओकारसकार.' के विधान से सर्वनाम की टि 'अद्' से पूर्व अकच् 'अक' प्रत्यय होता है। त् + अक + अद् + सु, इस स्थिति में 'त्यदादीनामः' से 'द' को 'अ' और 'अतोगणे' से पररूप, त् + अक् + अ + सु, इस स्थिति में 'तदोः सः सावनन्त्ययोः' से त को स आदेश होकर सक + सु और सु को रुत्व-विसर्ग होकर 'सकः' रूप बनता है। 

इति प्रागिवीयाः ।। १५ ।।
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लघुसिद्धान्तकौमुदी (तद्धिते प्राग्दिशीयाः)

अथ प्राग्‍दिशीयाः

१२०० प्राग्‍दिशो विभक्तिः
दिक्‍छब्‍देभ्‍य इत्‍यतः प्राग्‍वक्ष्यमाणाः प्रत्‍यया विभक्तिसंज्ञाः स्‍युः ।।
सूत्रार्थ - दिक्शब्देभ्यः. इस सूत्र से पहले के सूत्रों के द्वारा जो प्रत्यय कहे जायेंगे उनकी विभक्तिसंज्ञा होती है।
१२०१ किंसर्वनामबहुभ्‍योऽद्व्‍यादिभ्‍यः
किमः सर्वनाम्‍नो बहुशब्‍दाच्‍चेति प्राग्‍दिशोऽधिक्रियते ।।
सूत्रार्थ - दिक्शब्देभ्यः से पहले जो प्रत्यय कहे गये हैं, वे किम्, सर्वनाम शब्द और बहु शब्द से होते हैं। द्वि आदि शब्दों से ये प्रत्यय नहीं होते हैं। 
१२०२ पञ्चम्‍यास्‍तसिल्
पञ्चम्‍यन्‍तेभ्‍यः किमादिभ्‍यस्‍तसिल् वा स्‍यात् ।।
सूत्रार्थ - पञ्चम्यन्त किम् आदि शब्दों से विकल्प से तसिल् प्रत्यय होता है। 
तसिल् में इ और ल् की इत्संज्ञा तथा लोप होकर तस् शेष रहता है। 
१२०३ कु तिहोः
किमः कुः स्‍यात्तादौ हादौ च विभक्तौ परतः । कुतःकस्‍मात् ।।
सूत्रार्थ - तकारादि और हकारादि विभक्ति परे होने पर किम् शब्द को क आदेश होता है।
कुतः, कस्मात्- (किससे, कहाँ से)- इस विग्रह में पञ्चम्यन्त किम् शब्द से 'पञ्चम्यास्तसिल्' से तसिल् प्रत्यय, इ और ल् की इत्संज्ञा तथा लोप, किम् + इसि । तसिल इस स्थिति में 'कृत्तद्धितसमासाश्च' से प्रातिपदिकसंज्ञा तथा 'सुपो धातुप्रातिपादिकयोः' से 'ङसि' का लोप, 'कुतिहोः' से किम् को 'कु' आदेश, कु + तस् प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय, अव्यय होने से सु का लोप तथा 'स्' को रुत्व-विसर्ग होकर 'कुतः' रूप बनता 
तसिल् के अभाव पक्ष में 'कस्मात्' रूप बनता है। 
विशेष-प्राग्दिशीय प्रत्ययों से बने शब्द अव्यय होते हैं। (तद्धितश्चासर्वविभक्तिः)। 

तसिल् आदि प्रत्यय पञ्चम्यन्त सुबन्त आदि शब्दों से होते हैं। जैसे-किम् + ङसि + तस्। सुप् का लोप हो जाता है। यह प्रक्रिया आगे के प्रयोगों में भी समझनी चाहिए। 
१२०४ इदम इश्
प्राग्‍दिशीये परे । इतः ।।
सूत्रार्थ - प्राग्दिशीय प्रत्यय परे होने पर इदम् को इशु आदेश होता है। व्याख्या-इश् में 'इ' शेष रहता है। 

इतः, अस्मात् (इससे, यहाँ से)- इस विग्रह में पञ्चम्यन्त इदम् शब्द से 'पञ्चम्यास्तसिल्' से तसिल (तस्) प्रत्यय, इदम् + डसि + तस्, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा इसि का लोप, 'इदम् इश' से 'इदम्' को 'इश' आदेश होता है। प्रातिपदिकसंज्ञा सु प्रत्यय, अव्यय होने से सु का लोप तथा 'स्' को रुत्व-विसर्ग होकर 'इतः' रूप बनता है। 
१२०५ अन्
एतदः प्राग्‍दिशीये । अनेकाल्‍त्‍वात्‍सर्वादेशः । अतः । अमुतः । यतः । ततः । बहुतः । द्व्‍यादेस्‍तु द्वाभ्‍याम् ।।
सूत्रार्थ - प्राग्दिशीय प्रत्यय परे होने पर 'एतद्' शब्द को 'अन्' आदेश होता है। व्याख्या-'अन्' में 'अ' शेष रहता है। 
यह पूरा सूत्र 'एतदोऽन्' है। योगविभाग के द्वारा 'एतदः' और 'अन' ये दो सूत्र बनाये गये हैं। 
अनेकालत्वादिति-अनेक वर्णों वाला होने से सम्पूर्ण एतद् शब्द के स्थान पर अन् । आदेश होता है। 

अतः-एतस्मात् (इससे, इसलिए)-इस विग्रह में पञ्चम्यन्त एतद शब्द से 'पञ्चम्यास्तसिल' से तसिल (तस) प्रत्यय होता है। एतद् + डसि + तस, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा उसि का लोप, 'अन्' से एतद् को अन् (अ) आदेश, प्रातपदिकसंज्ञा, स् प्रत्यय, सलोप तथा स् को रुत्व-विसर्ग होकर 'अतः' रूप बनता है। 
अमुतः-अमुष्मात् (उससे)-इस विग्रह में पञ्चम्यन्त अदस् शब्द से ‘पञ्चम्यास्तसिल्' से तसिल (तस्) प्रत्यय, अदस् + ङसि + तस्, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा इसि का लोप, अदस् । तस्, 'त्यदादीनामः' से सकार को अकार तथा पूर्व अकार का 'अतोगुणे' से पररूप, अद + तस् इस स्थिति में 'अदसोऽसेर्दादुदोमः' से दकार से अगले अकार को उकार और दकार को मकार होकर अमु + तस् यह स्थिति हुईं, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय, सु का लोप, 'स्' को रुत्व-विसर्ग होकर 'अमुतः' रूप बनता है। 
यतः, यस्मात् (जिससे)-इस विग्रह में पञ्चम्यन्त यद शब्द से ‘पञ्चम्यास्तसिल्' से तसिल (तस्) प्रत्यय, यद् + ङसि + तस्, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा इसि का लोप, 'त्यदादीनामः' से दकार को अकार, पूर्व अकार को 'अतोगुणे' से पररूप, य + तस् = यतस्, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय, सु का लोप, स् को रुत्व-विसर्ग होकर 'यतः' रूप बनता 
ततः, तस्मात् (उससे, वहाँ से)-इस विग्रह में पञ्चम्यन्त तद् शब्द से 'पञ्चम्यास्तसिल्' से तसिल् (तस्) प्रत्यय, तद् + डसि + तस्, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा इसि का लोप, 'त्यदादीनामः' से दकार को अकार, पूर्व अकार का 'अतोगुणे' से पररूप, त + तस्, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय, सुलोप, स् को रुत्व-विसर्ग होकर 'ततः' रूप बनता है। । 
बहुतः, बहोः (बहुतों से)-इस विग्रह में पञ्चम्यन्त 'बहु' शब्द से 'पञ्चम्यास्तसिल्' से तसिल (तस्) प्रत्यय, बहु + ङसि + तस्, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा डसि का लोप, बहु + तस् = बहुतस्, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय, सु का लोप, 'स्' को रुत्व-विसर्ग होकर 'बहुतः' रूप बनता है। 
दयादेरिति- द्वि आदि सर्वनाम शब्दों से प्राग्दिशीय प्रत्यय नहीं होते हैं। अतएव द्वि आदि शब्दों को पञ्चमी में 'द्वाभ्याम्' आदि रूप बनेगा। 
१२०६ पर्यभिभ्‍यां च
आभ्‍यां तसिल् स्‍यात् । परितः । सर्वत इत्‍यर्थः । अभितः । उभयत इत्‍यर्थः ।।
सूत्रार्थ - परि और अभि से तसिल् प्रत्यय होता है। 
परितः-सर्वत्र (चारों ओर)-इस विग्रह में 'परि' शब्द से 'पर्यभिभ्यां च' से तसिल (तस्) प्रत्यय, परि + तस् = परितस्, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय और सु का लोप, स् को रुत्व-विसर्ग होकर 'परितः' रूप बनता है। 

अभितः । उभयतः (दोनों ओर)-इस विग्रह में अभि शब्द से 'पर्यभिभ्यां च' से तसिल (तस) प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय, सु का लोप और स् को रुत्वविसर्ग होकर 'अभितः' रूप बनता है।
१२०७ सप्‍तम्‍यास्‍त्रल्
कुत्र । यत्र । तत्र । बहुत्र ।।
सूत्रार्थ - सप्तम्यन्त किम् आदि शब्दों से बल् प्रत्यय होता है। व्याख्या-त्रल् में 'त्र' शेष रहता है। 
कुत्र-कस्मिन् (किसमें, कहाँ)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त किम् शब्द से 'सप्तम्यास्त्रल' से त्रल् (त्र) प्रत्यय होता है। किम् + डि +त्र, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा डि का लोप, किम् + च, 'कु तिहोः' से किम् को कु आदेश, क + त्र = कुत्र, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय, अव्यय होने से सु का लोप होकर 'कुत्र' रूप बनता है। यत्र-यस्मिन् (जहाँ, जिसमें)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त 'यद्' पद से 'सप्तम्यास्त्रल' से 'बल्' () प्रत्यय यद् + डि + त्र, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा डि का लोप, 'त्यदादीनामः' से दकार को अकार और पूर्व अकार का 'अतोगुणे' से पररूप, य +त्र = यत्र, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय तथा सु का लोप होकर 'यत्र' रूप बनता है। 
तत्र-तस्मिन् (वहाँ, उसमें)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त तद् शब्द से 'सप्तम्यास्त्रल' से त्रल् (त्र) प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, डि का लोप 'त्यदादीनामः' से द को अ, 'अतोगुणे से पररूप, त +त्र = तत्र, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय, सु का लोप होकर 'तत्र' रूप बनता 

बहुत्र, बहुषु (बहुतों में)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त बह शब्द से 'सप्तम्यास्त्रल' से त्रल् (त्र) प्रत्यय, बहु + सुप् +त्र, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा सुप् का लोप, पुनः प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय, सु का लोप होकर 'बहुत्र' रूप बनता है। 
१२०८ इदमो हः
त्रलोऽपवादः । इह ।।
सप्तम्यन्त इदम् शब्द से ह प्रत्यय होता है। व्याख्या-ह प्रत्यय त्रल् का बाधक है। 
इह-अस्मिन् (यहाँ, इसमें)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त इदम् शब्द से 'सप्तम्यास्त्रल' से प्राप्त बल् को बाधकर 'इदमोः हः' से ह प्रत्यय होता है। इदम् + डि + ह. प्रातिपदिकसंज्ञा तथा डि का लोप, 'इदम इश्' से इदम् को इश् (इ) आदेश, इ + ह = इह, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय, सु का लोप होकर 'इह' रूप बनता है। 

विशेष-अत्र रूप ‘एतस्मिन्' इस विग्रह में सप्तम्यन्त एतद् शब्द से त्रल् प्रत्यय तथा 'अन्' से एतद् को अ आदेश होकर बनता है।। 
१२०९ किमोऽत्
वाग्रहणमपकृष्‍यते । सप्‍तम्‍यन्‍तात्‍किमोऽद्वा स्‍यात् पक्षे त्रल् ।।
सूत्रार्थ - सप्तम्यन्त किम् शब्द से विकल्प से अत् प्रत्यय होता है। पक्ष में चल प्रत्यय होता है। 

वाग्रहणमिति- अग्रिम सूत्र वा ह च छन्दसि 51 3।13।। से वा ऊपर लाया गया है। इसीलिए अत् विकल्प से होता है। 
१२१० क्‍वाति
किमः क्‍वादेशः स्‍यादति । क्‍व । कुत्र ।।
सूत्रार्थ - अत् प्रत्यय परे होने पर किम को क्व आदेश होता है। 

क्व, कुत्र- कस्मिन्- (कहाँ, किसमें)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त किम् शब्द से 'किमोऽत्' से विकल्प से अत् (अ) प्रत्यय, किम् + डि + अ, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा ङि का लोप, 'क्वाति' से किम् को क्व आदेश, क्व + अ, इस स्थिति में 'अतो गुणे' से पररूप, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय तथा सु का लोप होकर 'क्व' रूप बनता है। पक्ष में त्रल् प्रत्यय होकर कुत्र बनता है। 
१२११ इतराभ्‍योऽपि दृश्‍यन्‍ते
पञ्चमीसप्‍तमीतरविभक्‍त्‍यन्‍तादपि तसिलादयो दृश्‍यन्‍ते । दृशिग्रहणाद्भवदादियोग एव । स भवान् । ततो भवान् । तत्र भवान् । तम्‍भवन्‍तम् । ततो भवन्‍तम् । तत्र भवन्‍तम् । एवं दीर्घायुःदेवानाम्‍प्रियःआयुष्‍मान् ।।
सूत्रार्थ - पञ्चमी और सप्तमी से भिन्न विभक्ति वाले शब्दों से भी तसिल और बल आदि प्रत्यय दिखाई देते हैं। 
दशिग्रहणादिति-दृशि धातु के ग्रहण से भवद् आदि के योग में ही तसिल आदि प्रत्यय होते हैं। भाव यह है कि जहाँ अन्य विभक्तियों वाले शब्दों से तसिल आदि का प्रयोग देखा जाता है, वहीं ये प्रत्यय होते हैं। चूँकि भवद् आदि के योग में इनका प्रयोग देखा जाता है, अतएव ये भवद् आदि के ही योग में होते हैं। 
स भवान ततो भवान्, तत्र भवान्-(पूज्य आप) भवद् शब्द के योग में प्रथमान्त अर्थात् सः के अर्थ में तद् शब्द से तसिल, और त्रल् प्रत्यय होते हैं। 
तं भवन्तम् ततो भवन्तम्, तत्र भवन्तम् (पूज्य आपको)-यहाँ भवद् शब्द के योग में द्वितीयान्त तद् शब्द से तसिल और वल् प्रत्यय होते हैं।। 

एवमिति- इसी प्रकार दीर्घायुः, देवानां प्रियः तथा आयुष्मान् शब्दों के योग में भी। ततः और तत्र का प्रयोग होता है। जैसे-स दीर्घायुः, ततो दीर्घायुः तत्र दीर्घायुः इत्यादि। 
१२१२ सर्वैकान्‍यकिंयत्तदः काले दा
सप्‍तम्‍यन्‍तेभ्‍यः कालार्थेभ्‍यः स्‍वार्थे दा स्‍यात् ।।
सूत्रार्थ - सप्तम्यन्त कालबोधक सर्व, एक, अन्य, किम्, यद् और तद् इन शब्दों से स्वार्थ में दा प्रत्यय होता है।
१२१३ सर्वस्‍य सोऽन्‍यतरस्‍यां दि
दादौ प्राग्‍दिशीये सर्वस्‍य सो वा स्‍यात् । सर्वस्‍मिन् काले सदा सर्वदा । अन्‍यदा । कदा । यदा । तदा । काले किम् ? सर्वत्र देशे ।।
सूत्रार्थ - प्राग्दिशीय दकारादि प्रत्यय परे होने पर सर्व शब्द को विकल्प से स आदेश होता है। 
सदा, सर्वदा-सर्वस्मिन् काले (सब समय में)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त सर्व शब्द से 'सर्वेकान्यकियत्तदः काले दा' से दा प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा डि का लोप सर्व + दा, इस स्थिति में 'सर्वस्य सोऽन्यतरस्यां दि' से विकल्प से सर्व को स आदेश, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय तथा सु का लोप होकर 'सदा' रूप बनता है। 
पक्ष में 'सर्वदा' बनता है। 
एकदा-एकस्मिन् काले (एक बार)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त एक शब्द से 'सर्वे कान्यकिंयत्तदः काले दा' से दा प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा ङि विभक्ति का लोप, एक + दा = एकदा, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय तथा सु का लोप होकर 'एकदा' रूप बनता 
अन्यदा- अन्यस्मिन् काले (अन्य समय)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त अन्य शब्द से 'सर्वेकान्यकिंयत्तदः काले दा' से दा प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा ङि का लोप, अन्य + दा = अन्यदा, प्रातिपदिकसंज्ञा और सु प्रत्यय, सु का लोप होकर 'अन्यदा' रूप बनता 
कदा- कस्मिन् काले (किस समय, कब)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त किम शब्द से 'सर्वेकान्यकियत्तदः काले दा' से दा प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा ङि का लोप, किम् + दा इस स्थिति में किमः कः' से किम् को क आदेश, प्रातिपदिकसंज्ञा, सु प्रत्यय, सु का लोप होकर 'कदा' रूप बनता है। 
यदा- यस्मिन् काले (जब)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त यद् शब्द से 'सर्वेकान्यकियत्तदः काले दा' से दा प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, ङि का लोप, यद् + दा, इस दशा में 'त्यदादीनामः' से द को अ 'अतो गुणे' से पररूप, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर यदा रूप बनता है। 
तदा- तस्मिन् काले (तब)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त तद् शब्द से 'सर्वेकान्यकियत्तदः काले दा' से दा प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा डि का लोप, 'त्यदादीनामः' से द को अ. 'अतो गणे' से पररूप, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'तदा' रूप बनता है। 

काले किमिति-सूत्र में काल अर्थ में दा प्रत्यय होता हैं ऐसा क्यों कहा गया है? इसलिए कि सर्वस्मिन् देशे-सर्वत्र यहाँ देश अर्थ है न कि काल इसलिए दा प्रत्यय नहीं होगा, अपितु त्रल् ही बना रहेगा। 
१२१४ इदमो र्हिल्
सप्‍तम्‍यन्‍तात् काल इत्‍येव ।।
सूत्रार्थ - सप्तम्यन्त इदम् पद से काल अर्थ में हिल् प्रत्यय होता है। 
हिल् में हि शेष रहता है। 
१२१५ एतेतौ रथोः
इदम्‍शब्‍दस्‍य एत इत् इत्‍यादेशौ स्‍तौ रेफादौ थकारादौ च प्राग्‍दिशीये परे। अस्‍मिन् काले एतर्हि। काले किम्इह देशे ।।
सूत्रार्थ - रेफादि तथा थकारादि प्राग्दिशीय प्रत्यय परे होने पर इदम् शब्द को क्रमशः एत और इत् आदेश होते हैं। 
व्याख्या- यदि बाद में 'र' होगा तो इदम् को एत आदेश होगा और यदि 'थ्' होगा तो इदम् को इत् आदेश होगा। 
एतर्हि-अस्मिन् काले (इस समय, अब)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त इदम् शब्द से 'इदमो हिल्' से हिल् (हि) प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा, ङि का लोप, इदम् + हि, इस स्थिति में एतेतौ रथोः' से इदम् को एत आदेश, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'एतहिं' रूप बनता है। 

काले किमिति-इदम् शब्द से काल अर्थ में हिल् प्रत्यय होता है। सूत्र में ऐसा क्यों कहा गया? इसलिए कि अस्मिन् देशे = इह देशे यहाँ हिल प्रत्यय नहीं होगा, क्योंकि यहाँ काल अर्थ न होकर देश अर्थ है अतएव 'ह' प्रत्यय होगा। 
१२१६ अनद्यतने र्हिलन्‍यतरस्‍याम्
कर्हिकदा । यर्हियदा । तर्हितदा ।।
सूत्रार्थ - अनद्यतन (जो आज का न हो) बोधक सप्तम्यन्त किम् आदि शब्दों से विकल्प से हिल्' प्रत्यय होता है। 
व्याख्या-पक्ष में दा प्रत्यय होता है। 
कर्हि, कदा-कस्मिन् काले (किस समय)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त किम् शब्द से 'अनद्यतने हिलन्यतरस्याम' से विकल्प से हिल् (हि) प्रत्यय होता है। प्रातिपदिकसंजा तथा डि का लोप, 'किमः कः' से किम को 'क' आदेश, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'कर्हि' रूप बनता है। 

हिल के अभाव पक्ष में 'दा' प्रत्यय होकर 'कदा' रूप बनता है।। यर्हि, यदा-यस्मिन् काले (जिस समय, जब)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त यद् शब्द से 'अनद्यतने हिलन्यतरस्याम' से विकल्प से हिल् (हिं) प्रत्यय, 'त्यदादीनामः' से 'द्' का अ, 'अता गणे' से पररूप, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'यर्हि' रूप बनता है। 
हिल' के अभाव पक्ष में 'दा' प्रत्यय होकर 'यदा' रुप बनता है। 
तर्हि, तदा-तस्मिन् काल (उस समय, तब)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त तद् शब्द से 'अनद्यतने हिलन्यतरस्याम' से हिल (हि) प्रत्यय, सप्तमी-विभक्ति का लोप, 'त्यदादीनामः' से 'द्' को अ, 'अतो गुणे' से पररूप, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'तर्हि' रूप बनता है। हिल के अभाव पक्ष में दा प्रत्यय होकर 'तदा' रूप बनता है। 
१२१७ एतदः
एत इत् एतौ स्‍तौ रेफादौ थादौ च प्राग्‍दिशीये । एतस्‍मिन् काले एतर्हि ।।
सूत्रार्थ - रेफादि और थकारादि प्राग्दिशीय प्रत्यय परे होने पर एतद् शब्द को क्रमशः । एत और इत् आदेश होते हैं। 
एतर्हि- एतस्मिन् काले (अब, इस समय)-इस विग्रह में सप्तम्यन्त एतद् शब्द से 'अनद्यतने हिलन्यतरस्याम्' से हिल, (हिं) प्रत्यय, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा ङि का लाप, 'एतदः' से एतद् को एत आदेश, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'एतर्हि' रूप बनता है। 
१२१८ प्रकारवचने थाल्
प्रकारवृत्तिभ्‍यः किमादिभ्‍यस्‍थाल् स्‍यात् स्‍वार्थे । तेन प्रकारेण तथा । यथा ।।
सूत्रार्थ - प्रकार अर्थ में किम् आदि शब्दों से स्वार्थ में थाल् प्रत्यय होता है। व्याख्या-'थाल्' में 'था' शेष रहता है। 
तथा-तेन प्रकारेण (उस प्रकार से, वैसा)-इस विग्रह में तद् शब्द से 'प्रकारवचने थाल्' से थाल् (था) प्रत्यय, तद् + था, इस स्थिति में 'त्यदादीनामः' से द को अ, 'अतो गणे' से पूर्व अ को पररूप, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'तथा' रूप बनता 

यथा- येन प्रकारेण (जिस प्रकार से, जैसा)-इस विग्रह में यद् शब्द से 'प्रकारवचने थाल्' से थाल् (था) प्रत्यय, यद् + था, इस स्थिति में 'त्यदादीनामः' से 'द्' को अ, 'अतो गणे' से पररूप, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'यथा' रूप बनता है।। 
१२१९ इदमस्‍थमुः
थालोऽपवादः । (एतदोऽपि वाच्‍यः) । अनेन एतेन वा प्रकारेण इत्‍थम् ।।
सूत्रार्थ - इदम् शब्द से प्रकार अर्थ में स्वार्थ में थम्' प्रत्यय होता है।
एतद् शब्द से भी प्रकार अर्थ में स्वार्थ में थम् प्रत्यय होता है। 
इत्थम्- अनेन प्रकारण (इस प्रकार से)-इस विग्रह में 'इदम' शब्द से 'प्रकारवचने थाल्' से प्राप्त थाल् प्रत्यय को बाधकर 'इदमस्थमुः' से थमु (थम्) प्रत्यय, इदम् + थम्, इस स्थिति में 'एतेती रथोः' से इदम् को 'इत्' आदेश, प्रातिपदिकसंज्ञा तथा स्वादिकार्य होकर 'इत्थम्' रूप बनता है। 

विशेष-एतद् शब्द से भी इत्थम् रूप बनता है। एतेन प्रकारण-इस विग्रह में एतद् शब्द से 'एतदोऽपि वाच्यः' से थमु (थम्) प्रत्यय तथा 'एतदः' से एतद् को इत् आदेश होगा। 
१२२० किमश्‍च
केन प्रकारेण कथम् ।।
सूत्रार्थ - किम् शब्द से भी प्रकार अर्थ में थमु प्रत्यय होता है।
इति प्राग्‍दिशीयाः ।। १४ ।।
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