शनिवार, 30 अगस्त 2014

वाल्मीकि रामायण की टीका परम्परा और गोविन्दराज

        आजकल मै प्रतिदिन प्रातः वाल्मीकि रामायण का स्वाध्याय कर रहा हूँ। वर्ष 1990 के आसपास भी इसका नियमित पाठ करता था। तब मैं इसका मूल पाठ करता था। एक बार 2011 में संस्थान द्वारा प्रकाशित सटीक वाल्मीकि रामायण के हिन्दी अनुवाद पर चर्चा शुरु हुई। इसके अनुवाद के लिए रामायण पढ़े एक संस्कृत के विद्वान के नाम पर मैं सहमत हो गया था। आज 2014 में मुझे ज्ञान हुआ 2011 वाला निर्णय मेरे अल्पज्ञान का परिणाम था। दरअसल नौकरी पा जाने के लिए पढ़ना तथा ज्ञान हेतु पढ़ने में महान भेद है।
            संस्कृत विद्या के क्षेत्र में विद्यार्जन तथा शैक्षणिक प्रमाण पत्र अर्जन में और भी ज्यादा दूरी है। कला और प्राच्य विद्या गुरु की कृपा के बिना पल्लवित पुष्पित नहीं होती है। थोड़े बहुत कौशल आ जाय अलग बात है। प्राच्य विद्या का क्षेत्र बहु आयामी है। उदर पूर्ति की लालसा लिये तदनुरुप शिक्षा ग्रहण कर रहे शिक्षार्थियों से यह आशा कभी नहीं की जा सकती कि वह वाल्मीकि रामायण के टीकाओं का अनुशीलन करे। कम संस्कृत पढ़े लिखे तथा जिसने गुरुमुख से यथापरम्परा प्रस्थान त्रयी की व्याख्या अर्जित न किया हो, जिसने व्याकरण न पढ़ा हो। शास्त्र परम्पराओं (उत्तर तथा दक्षिण भारत के साहित्य तथा अन्य परम्परा) का ज्ञान न हो, वह उपजीव्य काव्यों तथा  इनकी टीकाओं के मर्म को नहीं जान सकता। मैंने यत्र तत्र टीका परम्परा की बहुतेरी आलोचना की है, कि यह केवल चीड़ फाड़ है और स्वतंत्र ज्ञान को आगे नहीं बढ़ने देती। प्रस्तुत प्रसंग में मैं ऐसा भी महसूस कर रहा हूँ कि टीका वह दीपक है, जिससे हम मूल पाठ के अर्थ को ढूढ़ते हैं।
          0 प्र0 संस्कृत संस्थान ने वाल्मीकि रामायण का तिलक, गोविन्दराजीय आदि कई टीकाओं सहित प्रकाशन किया है।
वाल्मीकि रामायण के तीन पाठ प्राप्त होते हैः-
1. दाक्षिणात्य पाठ
2. गौडीय पाठ
3. पश्चिमोत्तरीय पाठ
        इन तीन पाठों में केवल पाठ भेद ही नही प्राप्त होते अपितु कहीं-कहीं इसके सर्ग भी भिन्न  भिन्न है। इसकी 30 टीकाएं प्राप्त होती है। प्रमुख टीकाओं मेंः-
1. रामानुजीयम् 2. सर्वार्थ सार 3. रामायण दीपिका 4. बृहद विवरण 5. लधु विवरण 6. रामायण तत्वदीपिका 7. रामायण भूषण 8. वाल्मीकि हृदय 9. अमृत कतक 10. रामायण तिलक 11. रामायण शिरोमणि 12. मनोहर 13. धर्माकूतम् 14. तीर्थी 15. तनिश्लोकी 16. विषम पद विवृति।
गोविन्दराज ने वाल्मीकि रामायण पर रामायण भूषण नाम से व्याख्यान लिखा है। इसे गोविन्दराजीय या भूषण के नाम से भी कहा जाता है। जैसा कि उन्होंने अपनी टीका के प्रस्तावना श्लोक में लिखा है-
पूर्वाचार्यकृतप्रबन्धजलधेस्तात्पर्यरत्नावली-
ग्राहंग्राहमहं शठारिगुरुणा संदर्शितेनाघ्वना।
अन्यव्यकृतिजातरूपशकलैरायोज्य सज्जीकृतैः।
                        श्रीरामायणभूषणं विरचये पश्यन्तु निर्मत्सराः।। प्रस्तावना श्लोक 5।।
गोविन्दराज ने दाक्षिणात्य पाठ के आधार पर रामायण की व्याख्या की है। गोविन्दराज कांची निवासी कौशिक गोत्र में उत्पन्न वरदराज के पुत्र थे। इनके गुरु का नाम शठकोपदेशिक था। शठकोपदेशिक अहोविलनामक मठ के छठवें उत्तराधिकारी थे। इनका समय छठी शताब्दी माना गया है। ये विजय नगर के शासक रामराय के समकालीन थे। अपने व्याख्यान के प्रस्तावना श्लोक 2 में उन्होनें लिखा है कि
श्रीमत्यत्यंजनभूधरस्य शिखरे श्रीमारुतेः सन्निधा-
वग्रे वेंकटनायकस्य सदनद्वारे यतिक्ष्माभृतः।
नानादेशसमागतैर्बुधगणै रामायणव्याक्रियां
विस्तीर्णां रचयेति सादरमंह स्वप्नेस्मि संचोदितः।।प्रस्तावना श्लोक 2।।
मैं स्वप्न में भगवान वेंकटेश की प्रेरणा पाकर रामायण की व्याख्या कर रहा हूँ।
            गोविन्दराजीय व्याख्यान से पता चलता है कि गोविन्दराज बड़गलइ मत, जो रामानुजीय संम्प्रदाय का एक अंग है से प्रभावित थे और उस मत के आचार्य वेदान्त देशिक के प्रति अत्यन्त श्रद्धालु थे। तिरूपति के पास रहते हुए गोविन्द राज रामायण का व्याख्यान सुनाते थे।
            अपने व्याख्यान के मंगलाचरण श्लोकों में ये शठकोप, लक्ष्मण योगी तथा अन्य मुनियों का स्मरण किया है। मैं स्वयं रामानुजीय परम्परा में दीक्षित हूँ। भगवान रामानुज और आलवारों के प्रति मेरी भी गहरी आस्था है। जब भी गुरु परम्परा से जुड़े तथ्य या रचनाएं मेरे सम्मुख होता है, पढ़ने और लिखने को आतुर हो जाता हूँ।
 यदि ये टीकाएँ वाल्मीकि रामायण के साथ न हो तो हम यह नहीं जान सकते कि प्रसिद्व वैयाकरण नागेश भटृ की तिलक टीका में मूल रामायणम् में 100 श्लोकों का पाठ है, जबकि गोविन्दराज अपनी भूषण टीका में 97 श्लोक हीं मानते हैं। भूषण टीका के रहस्य (गूढ़ार्थ) को जानने के लिए प्रबन्ध साहित्य का ज्ञान आवश्यक है।
सुस्पष्टमष्टादशकृत्व एत्य श्रीशैलपूर्णाद्यतिशेखरोयम्।
शुश्राव रामायणसंप्रदायं वक्ष्ये तमाचार्यपरंपरात्तम्।। प्रस्तावना श्लोक 6।।
वाल्मीकि रामायण की टीका एवं टीकाकार                                                      विशेष प्रतिपाद्य
1. भूषण                                  गोविन्द राज                         रामानुजीय सिद्वान्त के   अनुसार व्याख्या
2. तिलक                                  नागेश भटृ                                  व्याकरण तथा कतक मत,
3. रामायण शिरोमणि                                                               पुराणों से प्रमाण दिये गये हैं।
                                                                                           रामानन्द परम्परा, भूषण का  खण्डन
4. रामायण तत्वदीपिका         महेश्वर तीर्थ                     प्रतिकूल वचनों का अनुकूल  अर्थ किया गया है।

5. अहोबल स्वामी       तनिश्लोकी                                रहस्य एवं पाण्डित्य, द्रविड़ भाषा में लिखे                                                                                                                    रामायण की  व्याख्या का अनुवाद