सोमवार, 10 नवंबर 2014

गावो विश्वस्य मातरः

        गाय विश्व की माता है। वैदिक काल से ही गाय पूजनीया मानी जाती रही है। गाय भावनात्मक या धार्मिक कारणों से ही पूज्या नहीं है, अपितु मानव समाज की अनिवार्य आवश्यकताओं के कारण इसे पूज्या माना गया। गो उत्पाद की चर्चा वेदों में की गयी है। परवर्ती काल में कृषि, वाणिज्य एवं भारतीय अर्थव्यवस्था का सशक्त स्तंभ गाय वनी।  गाय तत्कालीन समाज में द्रव्य परिमाण, विनिमय का एक साधन भी थी। इसके बिना स्वस्थ एवं समृद्ध राष्ट्र की कल्पना असंभव था। आर्यावर्त में गो हिंसा सबसे जधन्य अपराध की श्रेणी में आने लगा। गो पातकी का शरणदाता कोई भी नहीं था। इसे घृणा की दृष्टि से देखा जाता था। सामाजिक वहिष्कार जैसी यातना गो हत्यारे को दी जाने लगी। कारण साफ और स्पष्ट था, गाय के बिना कृषि प्रधान देश की तरक्की सम्भव नहीं थी। धर्मशास्त्रकारों, स्मृतिकारों ने गोवंश वृद्धि या अर्थव्यवस्था में गुणात्मक वृद्धि हेतु इसे धार्मिक गतिविधियों से जोड़ा। भारतीय समाज के प्रत्येक व्रत त्योहार की शुरूआत गो पदार्थ से शुरू होने लगा।
      गाय भारतीय समाज में इतना धुलमिल गयी कि तमाम राजाओं को राज्य सत्ता के विस्तार एवं स्थिरता हेतु गोहितपरक निर्णय लेने पर वाध्य होना पड़ा। अकबर को भी इस योजना के अन्तर्गत गो हत्या पर प्रतिबन्ध लगाना पड़ा। अकबर के महामात्र कवि नरहरिदास ने एक छप्पय की रचना की, जिसमें उल्लेख था कि हम हिन्दुओं को यदि प्रतिदिन अमृत देती हूँ तो मुस्लिमों को भी कटु नहीं पिलाती हूँ।
      हिन्दुहि मधुर न देहि कटुक तुरकहि न पियावहि। हमें कोई मार नहीं सकता। इस प्रकार का छप्पय गाय के गले में लिखकर बांध दिया।
      बहादुर शाह ने भी 9 जुलाई 1857 को घोषणा की कि किसी स्थान पर गोहत्या न की जाय। इस प्रकार के अपराधी को तोप से उड़ा दिया जाएगा। उस वर्ष 1 अगस्त 1857 के दिन मुसलमानों का इदुज्जुहा (बकरीद) का पर्व था।
      ऋग्वेद के पांचवें मंडल में -5.3.9 उभे सुश्चन्द्र सर्पिषो दर्वी श्रीणीश आसनि मंत्र प्राप्त होता है जिसका अर्थ है कि विद्वान् धृत के सेवन करने के लिए इतना उत्सुक होता है कि यज्ञाहुति देने वाली करछी मुख में डाल लेता है ।
      ऋग्वेद में ही एक जगह घृत के काजल का अंजन लगाकर आनन्द से परिपूर्ण हो पत्नियां अपने पति के यज्ञशाला में पहुंचने के पूर्व ही पहु्ंचने का उल्लेख मिलता है। ऋग्वेद के 3.21.4 के मंत्र में अध्रिगु की संज्ञा दी गयी है अर्थात्  गो पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया जा सकता। ऋग्वेद में तो गौ को इतना महत्वशाली माना गया कि गो रक्षार्थ अनेक मन्त्र दृष्ट हुए हैं यथा-
1.   गौ की चोर से रक्षा ।
2.   गायों के लिए युद्ध ।
3.   गौ एवं गौदुग्ध चोर को दण्ड ।
4.   दुष्ट एवं असामाजिक तत्व से गौ की रक्षा ।
5.   गाय पालने वाले गौरक्षक ।
6.   गौ का माता एवं बहन के रूप में वर्णन ।
7.   गौ रक्षा का अत्युत्तम साधन-  गौ न बेचना तथा सत्पात्र को देना।
8.   अथर्ववेद में तो घी की नदियों का वर्णन मिलने लगता है। विविध प्रकार के गो औषधोपचार, गौ को तीन बार दुहने आदि का वर्णन मिलता है।