बुधवार, 26 नवंबर 2014

गीति काव्य परम्परा

गीति काव्य परम्परा एवं नीति शतक खण्ड काव्य का अपर नाम गीति काव्य है। इसमें काव्यतत्व के साथ-साथ अन्तरात्मा की ध्वनि वर्णित होता है।
            हम अपने ब्लाग में बौद्ध स्तोत्रएवं कवि विल्हण के चौरपंचाशिका पर चर्चा कर चुके हैं। भर्तृहरि की एक अज्ञात सी कृति पुरूषार्थोपदेश को मूल श्लोक भी उपलब्ध करा दिया हूँ। बौद्ध स्तोत्र पढ़ते-पढ़ते गीति काव्य पर ध्यान आकृष्ट हुआ। वैसे भी स्त्रोत साहित्य एवं खण्ड काव्य मुझे बहुत आकर्षित करते हैं। बचपन की वह स्मृति ताजी हो उठती है जब मैं यामुनाचार्य के आलवन्दार स्तोत्र को पढ़ता हूं।
            गीति काव्य का उद्गम रामायण एवं महाभारत से हुआ। यहां अनेक स्तोत्र पाये जाते हैं। पुराणों में भी स्तोत्र भण्डार भरे पड़े है।
            कालिदास तक आते-आते गीतिकाव्य का विकसित स्वरूप सामने आ गया। कालिदास ने मेधदूतम की क्या रचना की दूत काव्यों की बाढ़ सी आ गयी। विक्रम का नेमिदूतरूद्रवाचस्पति का भ्रमरदूतवेंकटाचार्य का कोकिल संदेशकृष्ण चन्द्र पन्त का चन्द्रदूत जैसे सैकड़ों दूत काव्य रचे गये। आज भी दूतकाव्य का सृजन अनवरत जारी है। कालिदास ने दूसरा खण्ड काव्य या गीति काव्य की रचना की ऋतु संहारम्। घटकर्पर का घटकर्पर काव्य भी इसी श्रेणी में आते है। गीति काव्य की एक अच्छी विशेषता यह है कि कवि पूर्वापर भावों से निरपेक्ष हो अपने भाव को एक ही श्लोक में व्यक्त कर देता है। इसमें संगीतात्मकता तो होती ही है। इस प्रकार के काव्य में कोमल भावों की श्रृंगारिकता की प्रधानता होती है।
            जयदेव के गीत गोविन्द को कौन नहीं जानता। जगन्नाथ पुरी में रहते मंदिर प्रांगण में मैंने शतशः बार जय जय देव हरे की मधुरतम ध्वनि सुना था। अमरूक का अमरूक शतकगाथा सप्तशतीजगन्नाथ का भामिनी विलास तथा लहरी त्रय किसे आकर्षित नहीं करता।
            असंख्य गीति काव्यों के स्मरण के पश्चात् मैं प्रसिद्ध नीतिशतक पर कुछ चर्चा करना अपेक्षित समझता हूं। यद्यपि आज तक लक्षशः लेख इस पर लिखे पढ़े गये फिर भी इस चिरस्मरणीय कृति पर जितना कुछ लिखा जाय अन्तर्जाल के नवीन पाठकों के लिए नूतन एवं उपयोगी होगा।
       भर्तृहरि के जीवनी को मैं एक ही श्लोक लिखकर पूर्ण करता हूं।
            यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्ता साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्त:।

            अस्मत्कृते च परिशुष्यति काचिदन्या धिक्ताञ्च तं च मदनं च इमां च मां च।।