ज्योतिष में योग

        योग शब्द का अर्थ होता है मेल (मिलाना) अथवा जोड़ना। योगशास्त्र में शक्ति का शिव से मिलन अर्थात् मूलाधार की कुण्डलिनी शक्ति को सहस्रार में सदाशिव से मिलाना ही योग है किन्तु ज्योतिषशास्त्र में काल के दो अवयवों को मिलाना ही योग नाम से जाना जाता है। पञ्चाङ्गों में दो प्रकार के योगों की गणना की जाती है। सात वारों तथा अभिजित सहित अश्विनी आदि अट्ठाईस नक्षत्रों को मिलाने से आन्दादि २८ योग बनते हैं।
प्रथम वार रविवार तथा प्रथम नक्षत्र अश्विनी इन दोनों के योग से प्रथम आनन्द योग बनता है। पुन: सोमवार के दिन (अश्विनी को लेकर ४ नक्षत्र तक छोड़कर ५ वां) मृगशिरा नक्षत्र के मूल से दूसरा काल दण्ड योग बनता है। इसी प्रकार अन्य नक्षत्रों का अन्य वारों में योग होने पर समस्त अट्ठाईस योग बनते हैं। इसमें अभिजित नक्षत्र को भी सम्मिलित किया जाता है जो उत्तराषाढ़ा का अन्तिम चरण तथा श्रवण के प्रथम चरण की ४ घटी अर्थात् ५३ कला २० विकला कुल १९ घटी का माना जाता है। ये योग इस प्रकार हैं
१. आनन्द, २. कालदण्ड, ३. ध्रूम, ४. धाता, ५. सौम्य, ६. ध्वांक्ष, ७. केतु, ८. श्रीवत्स, ९. वङ्का, १०. मुद्गर, ११. छत्र, १२. मित्र, १३. मानस, १४. पद्म, १५. लुम्ब, १६. उत्पात, १७. मृत्यु, १८. काण, १९. सिद्धि, २०. शुभ, २१. अमृत, २२. मुसल, २३. गद, २४. मातंग, २५. रक्ष, २६. चर, २७. सुस्थिर और २८. प्रवर्धमान।
इसमें आनन्द, धाता, सौम्य, श्रीवत्स, धन, मित्र, मानस, सिद्धि, शुभ, अमृत, मातंग, सुस्थिर तथा प्रवर्धमान ये सभी कार्यों के लिये शुभ होते हैं, शेष अन्य योग प्राय: अशुभ होते हैं।
सूर्य तथा चन्द्रमा के राशि अंशों के मेल से बनने वाले योग २७ होते हैं। सूर्य चन्द्रमा के स्पष्ट राशि अंशों को जोड़कर कलायें बनाकर ८०० का भाग देने पर गत योगों की संख्या आती है। यथा कर्कान्त के चन्द्रमा का अंश १२० तुला के सूर्य का अंश २१० दोनों का योग ३३० कला बनाने के लिये ६० से गुणा किया ३३र्० े ६० = १९८०० इसमें ८०० का भाग देने पर शेष २४ आता है अत: २५वां योग चल रहा है। इसका आशय यह है कि जब अश्विनी नक्षत्र के आरम्भ से सूर्य और चन्द्रमा दोनों मिलकर ८०० कला से आगे चलेंगे तब एक योग व्यतीत होता है। जब १६०० कलायें बीतती हैं तब दो योग पूर्ण होता है इसी प्रकार २१ हजार ६०० कलायें पूर्ण होने पर २७ योग पूर्ण हो जाते हैं। इन योगों के नाम और इनके स्वामी इस प्रकार हैं




योग                   स्वामी

विष्कुम्भ            यमराज
प्रीति                विष्णु
आयुष्मान          चन्द्रमा
सौभाग्य             ब्रह्मा
शोभन              बृहस्पति
अतिगण्ड           चन्द्रमा
सुकर्मा              इन्द्र
धृति                 जल
शूल                  सर्प
गण्ड                अग्नि
वृद्धि                सूर्य
ध्रुव                भूमि
व्याघात          वायु
हर्षण             भग
वङ्का           वरुण
सिद्धि            गणेश
व्यतिपात           रुद्र
वरीयान            कुबेर
परिघ              विश्वकर्मा
शिव                मित्र
सिद्ध               कार्तिकेय
साध्य              सावित्री
शुभ                 लक्ष्मी
शुक्ल              पार्वती
ब्रह्म                अश्विनीकुमार
ऐन्द्र               पितर
वैधृति            दिति
इन योगों में वैधृति एवं व्यतिपात योग अत्यन्त अनिष्टकारक है तथा विष्णु, कुम्भ, वङ्का, व्याघात, गण्ड, अतिगण्ड तथा शूल आदि योग भी अशुभ हैं। शेष योग शुभफल देने वाले होते हैं। जन्म कुण्डली में इन्हीं योगों का उल्लेख किया जाता है तथा इनका फल जातक के जीवन में देखने को मिलता है।

वर्जित घटि में -

              विरुद्धसंज्ञा इह ये च योगास्तेषामनिष्ट: खलु पाद आद्य:।
              सवैधृतिस्तु व्यतिपातनामा सर्वोऽप्यनिष्ट: परिघस्य चाद्र्धम् ।।
             तिस्रस्तु योगे प्रथमे च वङ्को व्याघातसंज्ञे नवपञ्चशूले।
             गण्डेऽतिगण्डे च षडेव नाड्य: शुभेषु कार्येषु विवर्जनीया:।।
इन योगों में जो निन्दित नाम वाले योग हैं उनका पहिला चरण अनिष्टकारक होता है, परन्तु वैधृति तथा व्यतीपात नाम वाले जो योग हैं उनके चारों चरण और परिघ योग के दो चरण अनिष्ट हैं। किन्हीं आचार्यों का मत है कि विष्कुम्भ तथा वङ्कायोग में तीन नाड़ियां, व्याघात योग में ९ नाड़ियां, शूल योग में ५ नाड़ियां, गण्ड तथा अतिगण्ड योगों में ६ नाड़ियां, शुभ कार्यों में वर्जित करनी चाहिये।
आनन्दादि योगों के फल -
आनन्दादि योगों का फल यह है - आनन्द (सिद्धि), कालदण्ड (मृत्यु), धूम्र (असुख), धाता (सौभाग्य, सौम्य (बहुसुख), ध्वांक्ष (धनक्षय), केतु (दौर्भाग्य), श्रीवत्स (सुख सम्पत्ति), व्रङ्का (क्षय), मुद्गर (लक्ष्मीनाश), छत्र (राज सम्मान), मित्र (पुष्टि), मानस (सौभाग्य), पद्म (धनागम), लुम्ब (धनक्षय), उत्पात (प्राणनाश), मृत्यु (प्राणनाश), काण (क्लेश), सिद्धि (कार्यसिद्धि), शुभ (सुख), अमृत (राजसम्मान), मुसल (धनक्षय), गद (रोग), मातङ्ग (कुलवृद्धि), रक्ष (महाकष्ट), चर (कार्यसिद्धि), सुस्थिर (गृहारम्भ), प्रवर्धमान (विवाह)।
आनन्दादि योगों का ज्ञान -
                      दास्रादर्के मृगादिन्दौ सार्पाद्भौमेक राद्बुधे।
                      मैत्राद्गुरौ भृगौ वैश्वाद्गण्या मन्दे च वारुणात् ।।
आनन्दादि योग जानने का उपाय यह है कि रविवार को अश्विनी नक्षत्र से गिने, सोमवार को मृगशिरा से गिने, मङ्गलवार को आश्लेषा से गिने, बृहस्पतिवार को अनुराधा से गिने, शुक्रवार को उत्तराषाढ़ा से गिने और शनिवार को शतभिषा से गिने। रविवार को अश्विनी हो तो आनन्द योग, भरणी हो तो कालदण्ड इत्यादि। इसी प्रकार से सोमवार को मृगशिरा हो तो आनन्द, आद्रा हो तो कालदण्ड इत्यादि जानना चाहिये।
र्वािजत नाडियां -
                   ध्वाङ्क्षे वङ्को मुद्गरे चेषुनाड्यो वज्र्या वेदा: पद्मलुम्बे गदेऽश्वा:।
                    धूम्रे काणे मौसले भूद्वंयं द्वे रक्षोमृत्यूत्पातकालाश्च सर्वे।।
                   ध्वाङ्क्षमुद्गरवङ्कााणां घटीपञ्चकमादिषु।
                   काणमौसलयोद्र्वेदे चतस्र: पद्मलुम्बयो:।।
                   एकाधूम्रेगदे सप्तचरे तिस्रो घटीस्त्यजेत् ।
                  त्यजेत्सर्वान् शुभे मृत्यु कालोत्पाताख्यराक्षसान् ।।
                  कुयोगास्थितिवारोत्थास्तिभोत्था भवारजा:।
                   हूणवङ्गखसेष्वेव वज्र्यास्त्रितयजास्तथा।।

ध्वांक्ष, मुद्गर और वङ्का योगों की आदि की ५ घड़ियां, काण और मुसल योगों की दो-दो घड़ियां, पद्म और लुम्ब योगों की चार-चार घड़ियां वर्जित करनी चाहिये। ध्रूम योग में एक घड़ी, गद योग में ७ घड़ियां, चर योग में ३ घड़ियां छोड़नी चाहिये। मृत्यु, काल, उत्पात और राक्षस योगों की सब घड़ियां शुभ कार्यों में वर्जित करनी चाहिए। ये आनन्दादि योग वार तथा नक्षत्र के मेल से बनते हैं, इसलिये इनमें से कुत्सित योग केवल हूण, वङ्ग तथा खस देशों में वर्जित हैं।
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1 टिप्पणी:

  1. बहुत बहुत धन्यवाद, देव वाणी संस्कृत एवम् ज्योतिष के लिए आप का योगदान प्रशंसनीय है, आज बहुत थोड़े ही ऐसे लोग है को संस्कृत के लिए कुछ कर रहे है, अतः आप को मेरी शुभ कामनाएं।

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