संस्कृत व्याकरण एक दृष्टि में

१. व्याकरण की व्युत्पत्ति- वि+आङ्+कृ+ल्युट् ।

२. व्याक्रियन्ते व्युत्पाद्यन्ते शब्दाः अनेन इति व्याकरणम्

३. व्याकरण को "शब्दानुशासन" भी कहा जाता है ।

४. स्वर-व्यंजन, संधि-समास, शब्द-धातु, प्रकृति-प्रत्यय व स्फोट सिद्धांत व्याकरण के प्रमुख विभाग है ।

५. रक्षा, ऊह, आगम, लाघव व संदेहनिवारण इसके पञ्च प्रयोजन है ।

६. वेदांगों में व्याकरण को "मुख" की संज्ञा दी गई है ।

७. व्याकरण के बिना व्यक्ति को " अंधे" की संज्ञा दी गई है ।

८ . व्याकरण के महत्त्व को गोपथ ब्राह्मण में स्पष्ट किया गया है- ओम्कारं पृच्छामः- को धातु:, किं प्रतिपादिकं,

किं नामाख्यातं, किं लिंगं, किं वचनं, का विभक्तिः, कः प्रत्ययः, कः स्वरः, उपसर्गोनिपात:, किं वै व्याकरणम्...।

९. ऋक्तंत्र के अनुसार व्याकरण का प्रवर्तन-

प्रथम वक्ता [ ब्रह्मा ] -

बृहस्पति - इंद्र - भारद्वाज- ऋषियों- ब्राह्मणों- समाज

१०. पाणिनि से परवर्ती प्रमुख वैयाकरण-

गार्ग्य, काश्यप, गालव, चाक्रवर्मन् ( ३१०० ईस्वी पूर्व), आपिशलि, काश्यप, भारद्वाज, शाकटायन ( ३००० ईस्वी पूर्व), सेनक, स्फोटायन ( २९५० ईस्वी पूर्व )

११. व्याकरण के भेद

छान्दस् ( प्रातिशाख्य )

लौकिक

( कातंत्र [ प्राचीनतम ],

चांद्र, जैनेन्द्र, सारस्वत

लौकिक-छान्दस् - पाणिनीय व्याकरण

१२. वोपदेव ने " कविकल्पद्रुम " में संस्कृत व्याकरण के ८ सम्प्रदायों का उल्लेख किया है-

इन्द्रश्चंद्र: काश्कृत्स्नापिश्ली शाकटायन: ।

पाणिन्यमरजैनेन्द्रा: जयन्त्त्यष्टौ च शाब्दिका: ।।

पाणिनीय व्याकरण (नव्य व्याकरण)

१. युधिष्ठिर मीमांसक के अनुसार पाणिनीय व्याकरण शैव संप्रदाय से सम्बंधित है..

२. इसका आधार १४ माहेश्वर सूत्र है ।

३ पुरुषोत्तम देव ने "त्रिकांड कोष" में पाणिनि के ६ नाम बताये हैं-

पाणिनिरत्त्वारहिको दाक्षीपुत्रो शालांकि पाणिनौ ।

शालोत्तरीय....।

४. शालातुरीयको दाक्षीपुत्र: पाणिनिराहिक: (वैजयंती कोष)

५. पाणिनि के पिता का नाम शलंक (दाक्षी) था ।

६. ये शालातुर (लाहौर) के निवासी थे ।

७. राजशेखर के अनुसार इनके गुरु पाटलिपुत्र (पटना) निवासी "वर्षाचार्य" थे ।

८. युधिष्ठिर मीमांसक के अनुसार "कात्यायन" इनके साक्षात शिष्य थे ।

९. एक कथा के अनुसार "त्रयोदशी" के दिन एक शेर द्वारा इनकी हत्या कर दी गई थी, इसलिए इस दिन व्याकरण पाठ निषेध है।

१०. पाणिनि की रचनायें-

अष्टक (अष्टाध्यायी, (शब्दानुशासन)

गण पाठ

धातुपाठ

लिंगानुशासन

पाणिनीय शिक्षा

* कुछ विद्वान् "उणादि सूत्रों" को भी इनकी रचना मानते है ।

११. इनकी रचनाओं को व्याकरण का "पंचांग" कहा जाता है, क्योंकि यह व्याकरण के पांच प्रमुख अंग है।

१२.अष्टाध्यायी में कुल ३९९६ सूत्र है जो आठ अध्यायों में विभक्त है ।

१३. SirHunter - सर हंटर के अनुसार- अष्टाध्यायी मानव मस्तिष्क का सर्वाधिक महत्वपूर्ण आविष्कार है, इसकी वर्ण शुद्धता, धातु अन्वय सिद्धांत व प्रयोजन विधि अद्वितीय है।

वस्तुत: "पाणिनीय व्याकरण" विश्व की सर्वोत्कृष्ट व्याकरण है ।

१४. प्रो टी शेरावातास्की के अनुसार - पाणिनि व्याकरण मानव मस्तिष्क की सर्वोत्तम रचना है

कात्यायन-

१. यह पाणिनि के साक्षात् शिष्य माने जाते हैं ।

२. इन्होंने अष्टाध्यायी के सूत्रों को आधार कर "वर्तिकों" की रचना की ।

३. महाभाष्यकार इनको दक्षिणात्त्य मानते हैं-

प्रियतद्धिता दाक्षिणात्या

४. "कथासरित्सागर" में इनको कौशाम्बी निवासी तथा वास्तविक नाम "वररुचि" बताया गया है-

ततः सः मर्त्यवपुष्पा पुष्पदंत: परिभ्रमन् ।

नाम्ना वररुचि: किञ्च कात्यायन इति श्रुतः ।।

५. समुद्रगुप्त ने "कृष्णचरित काव्य" में इनको "स्वर्गारोहण काव्य" कर्ता वररुचि व वैयाकरण कात्यायन बताया है ।

६.कालक्रम-

युधिष्ठिर मीमांसक- २९००-३००० ई०पू०

लोकमणि दहल- २००० ई०पू०

सत्यव्रत शास्त्री-२३५० ई०पू०

मैक्समूलर-३०० ई०पू०

कीथ- २५० ई०पू०

७. इनकी रचना "वार्तिक" सम्प्रति स्वतंत्र रूप से अप्राप्त है परन्तु महाभाष्य में संरक्षित अवश्य है ।

८. वार्तिक-

उक्तानुक्तादुरक्तचिंता वार्तिकम (राजशेखर)

उक्तानुक्तादुरक्तचिंता यत्र प्रवर्तते ।

   तं ग्रंथं वर्तिकं प्राहुवार्तिक्ज्ञा मनीषिण: ।। (पराशर पुराण)

९. वार्तिक वस्तुतः पाणिनीय सूत्रों की समिक्षा, परिष्कार व परिवर्धन है ।

पतंजलि

१. इनका जन्म कश्मीर के गोनर्द जनपद में हुआ था ।

२. इनको "शेषनाग" का अवतार माना जाता है ।

३. वस्तुतः ये योग व आयुर्वेद के आचार्य थे ।

४. अपर नाम-

गोणिकापुत्र

नागनाथ

अहिपति

फणी

शेष

गोनार्दीय

६. इनका स्थितिकाल ई०पू० १५० माना जाता है ।

७.रचनायें-

महाभाष्य [ पाणिनीय सूत्रों व कात्यायन के वर्तिकों का भाष्य ]

योगसूत्र

चरक परिष्कार

महानंद काव्य

८. भाष्य लक्षण-

" सूत्रार्थो वर्ण्यते यत्र पदै:सूत्रानुसारिभि: ।

स्वपदानि च वर्ण्यन्ते भाष्यं भाष्यविदो विदु: ।।

९. पाणिनीय व्याकरण के त्रिमुनियों में इनको सर्वोच्च स्थान प्राप्त है " यथोत्तरम् मुनीनां प्रमाण्यम् उक्ति इनको पाणिनि व कात्यायन से अधिक प्रमाणिक घोषित करती है ।

१०. महाभाष्यं वा पठनीयं महाराज्यं वा पालनीयं इति।

भाषा सरला, सरसा प्रान्जला च ।अनुपमा हि तत्र संवाद शैली।

३.. भर्तृहरि

- इनको कुछ विद्वान् अवन्ति नरेश विक्रमादित्य अनुज,

कुछ कश्मीर निवासी,

कुछ चुनार दुर्ग निवासी बताते हैं ।

- राजस्थान के अलवर जिले में आई सिलीसेढ़ झील के आस-पास का क्षेत्र इनकी तपस्थली मानी जाती है, यहाँ इनकी गुफा व मंदिर है ।

- कुछ विद्वान् इनको बौद्ध मतावलंबी मानते है ।

- बलदेव उपाध्याय इनका स्थितिकाल ४५० ईस्वी मानते है ।

- √रचनायें-

महाभाष्यदीपिका

महाभाष्य की प्राचीनतम टीका

वर्तमान ने तीन पाद ही उपलब्ध

वाक्यपदीयं

तीन कांडों में विभक्त

१.ब्रह्म (आगम)

२.वाक्य

३. प्रकीर्ण

वाक्यपदीय टीका

भट्टिकाव्य

भागवृत्ति

शतकत्रय

मीमांसाभाष्य

वेदांतसूत्रवृत्ति

शब्दधातुसमीक्षा

४.जयादित्य-वामन(८००-५० ईस्वी)

- आप दोनों विद्वानों ने अष्टाध्यायी का प्रमुख वृतिग्रंथ काशिका लिखा ।

- आप का जन्मस्थान काशी माना जाता है तथा यही रचित होने के कारण आपका ग्रन्थ "काशिका" कहलाया

काशिका देशतो अभिधानं, काशीषु भवा

- इसके प्रारम्भिक पांच भाग जयादित्य तथा अंतिम तीन वामन ने लिखे है ।

६. कैयट ( १०००-५० ईस्वी)

- आप कश्मीर निवासी थे, आप के पिता का नाम जैयट था ।

- आप के गुरु महेश्वेराचार्य थे ।

- आप ने महाभाष्य पर प्रदीप नामक टीका लिखी है ।

७. धर्मकीर्ति ( १२००-५० ईस्वी )

- इतिहासकार वे.वरदाचार्य आप को श्रीलंका निवासी मानते है ।

- आपने रूपावतार नामक प्रक्रिया ग्रन्थ लिखा ।

८. विमल सरस्वती (१३०० ईस्वी)

- आपने रूपमाला नामक प्रक्रिया ग्रन्थ लिखा ।

९. रामचंद्र (१४०० ईस्वी)

- आप आंध्रप्रदेश के निवासी थे ।

- आप के पिता का नाम जनकाचार्य है ।

- आप ने प्रक्रिया कौमुदी नामक दो भागों में विभक्त प्रक्रिया ग्रन्थ लिखा।

स्रोत- संकलन

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संस्कृत भाषा के गुण

संस्कृत भाषा में समानार्थी शब्दों की प्रचूरता है। अँग्रेजी भाषा में cloud के समानार्थी नहीं मिलता है।

संस्कृत भाषा में जल के समानार्थी शब्द नीर , अम्बु , वारि , तोय , पय:, सलिल, उदक आदि हैं।

जल के समानर्थी शब्दों के पीछे आप लगाते चले जाइए और आप बादलके समानार्थी बना लेंगे जैसे नीरद , अम्बुद , वारिद , तोयद ,

क्योंकि का अर्थ है देना , देने वाला बादल हमें पानी देते हैं अतः पानी के संस्कृत शब्दों के पीछे लगाईए और बादल के समानार्थी बनाइये।

जल के समानर्थी शब्दों के पीछे आप लगाते चले जाइए और आप कमल के समानार्थी बना लेंगे जैसे नीरज , अम्बुज , वारिज , तोयज ,

क्योंकि का अर्थ है पैदा होना कमल पानी में पैदा होता है अतः पानी के संस्कृत शब्दों के पीछे लगाईए और कमल के समानार्थी बनाइये।

जल के समानर्थी शब्दों के पीछे आप धिया "निधि:" लगाते चले जाइए और आप सागरके समानार्थी बना लेंगे जैसे अम्बुधि , वारिधि , जलधि ,पयोधि ,उदधि , नीरनिधि, तोयनिधि आदि

क्योंकि धिका अर्थ है धारण करना समुद्र जल को धारण करता है और निधि अर्थात खजाना है अतः पानी के संस्कृत शब्दों के पीछे धिलगाईए और समुद्र के समानार्थी बनाइये।

संस्कृत से प्यार करिए ।

ऐसे कुछ अंग्रेज थे जिन्होंने हमारे शास्त्रों, हमारे ज्ञान और देवभाषा को आत्मसात किया और अपने देश ले गए, उसे सिखा,सिखाया और अपनाया-

कालिदास से उनको प्रेरणा मिली, कणाद से परमाणु का सिद्धांत, महाभारत से बड़ा कोई काव्य नहीं,

ना वेद से पुराने ग्रन्थ...

ना गीता से बड़ा कोई नीति,रीति,राजनीति और प्रबंधन का शास्त्र है..

ऐसे कुछ यूरोपियन्स की सूची जो भारतीय प्राच्य विद्या के विशेषज्ञ माने गए--

1. दुपरोन( Anquetil Duperron) ये फ्रांस के थे, इन्होंने दाराशिकोह द्वारा फ़ारसी में अनूदित उपनिषदों का लैटिन "औपनिखत(Oupnekhat) नामक अनुवाद किया।

2. जोहान फ़िकटे और पॉल दूसान ने वेदांत को सबसे बड़ा सच माना।

3. 1875 में सर चार्ल्स विलकिन्स ने गीता का इंग्लिश अनुवाद किया।

विलियम जोन्स पेशे से जज थे 1784 में इन्होंने एशियाटिक सोसाइटी बनाई,अभिज्ञानशाकुन्तलम् का अनुवाद और ऋतुसंहार का संपादन किया,1786 में कहा कि-

संस्कृत परम अद्भुत भाषा है। यह यूनानी से अधिक पूर्ण तथा लातिनी से अधिक सम्पन्न है।

जोन्स ने ही सर्वप्रथम यह कहा था कि-

गॉथिक और केल्टिक दोनों परिवार की भाषाओं का उद्गम स्तोत्र संस्कृत है।

जोन्स फ्रांज बाप,मेक्समूलर और ग्रीम के आदर्श रहे है, ये तीनों संस्कृत व भारतीय संस्कृति के प्रमुख यूरोपियन जानकार माने जाते है।

संस्कृत के संपर्क से पूर्व यरोपियनों को फोनेटिक्स तथा उच्चारण प्रक्रिया का ज्ञान नहीं था, निरुक्त और अष्टाध्यायी के अध्ययन के बाद यूरोपियन विद्वानों ने इन विषयों पर शोध तथा लिखना प्रारम्भ किया।

41805 में कोलब्रुक ने वेदों का प्रामाणिक विवरण दिया दर्शन,व्याकरण,ज्योतिष और धर्म शास्त्र पर शोध किया।

5. यूजीन बनार्फ़ ये मेक्समूलर के गुरु थे।

6. मेक्समूलर ने 30 वर्षों तक सायण भाष्य पर शोध कर वेद भाष्य लिखा।

7.गेटे ने शाकुन्तलम् की प्रशंसा में कविता लिखी।

8.शीलर ने मेघदूत को आधार बना "मेरिया स्टुअर्ट" नामक कविता लिखी।

9. विलियम वर्ड्सवर्थ की कविता "ओड ऑन इन्टीमेशन्स ऑफ़ इमोर्टिलिटी" आत्मा के पुनर्जन्म सिद्धान्त पर आधारित है।

10. शैली की कविता एडोनायज( Adonai's) उपनिषदों पर आधारित है।

11.अमरीकी कवि एमसर्न ने "ब्रह्म" तथा जे.जी. व्हिटियर ने "सोम" नामक कविता लिखी है।

12. आयरलैंड के कवि जार्ज रसेल ने (Over Soul, Krishna,The veils of maya,Om और Indian Song) जैसी शुद्ध भारतीय भाव की कविताये लिखी है।

13. डब्लू.बी.येट्स ने भी शुद्ध भारतीय पृष्ठभूमि पर आधारित कवितायेँ लिखी है- Anushay and Vijay,The Indian upon God और The Indian to his love.

14. स्टुअर्ट बेल्क़ि ने "त्रिमूर्ति" नामक कविता लिखी।

जब सम्पूर्ण पाश्चात्य ज्ञान,विज्ञान और साहित्य का आधार भारत और संस्कृत है तो भारत में संस्कृत को ये सम्मान क्यों नहीं...?

ये आंकड़े हमें ये बताने के लिए काफी है की भारतवर्ष और सनातन धर्म इतना गौरवशाली क्यों है...?

हमें हमारे देश,सभ्यता,संस्कृति,संस्कृत और सनातन धर्म पर गर्व करना चाहिए, इसका संरक्षण,पोषण और विकास करना चाहिए।

जिस से भारत का विकास हो,वापस भारत अपने वैभव,गौरव को प्राप्त करे तथा विश्व का नेतृत्व करें।।

पाइथागोरस प्रमेय " या " बोधायन प्रमेय " कल्पसूत्र ग्रंथों के अनेक अध्यायों में एक अध्याय " शुल्ब सूत्रों " का होता है। " वेदी " नापने की रस्सी को " रज्जू अथवा शुल्ब " कहते हैं। इस प्रकार " ज्यामिति " को " शुल्ब या रज्जू गणित " भी कहा जाता था। अत: " ज्यामिति " का विषय " शुल्ब सूत्रों " के अन्तर्गत आता था।

भिन्न आकारों की वेदी‌ बनाते समय ऋषि लोग मानक सूत्रों (रस्सी) का उपयोग करते थे ।

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भारतीय जनगणना 2011 में संस्कृत का स्थान


2011 की जनगणना पर आधारित भारतीयों भाषाओं के आंकड़े आ चुके हैं। कुछ उत्साही मित्र समाचार पत्र की कटिंग लगाकर यह दिखाने की कोशिश में हैं कि संस्कृतभाषियों की संख्या में वृद्धि हो रही है। इस शुभ वार्ता को प्रचारित कर वे मूल समस्या से बचना चाह रहे हैं।  मैं साक्ष्य सहित यह कह सकता हूँ कि यह क्षणिक उफान है। 
जनगणना हेतु निर्मित परिवार अनुसूची में उल्लिखित 29 प्रश्नों में से मातृभाषा एक प्रश्न था। अन्य भाषाओं का ज्ञान दूसरा अन्य प्रश्न। ये आंकड़े  मातृभाषा वाले प्रश्न के हैं।जनगणना आधारित भाषायी आंकड़ों पर रह-रह कर हाय तौबा मचता रहता है। मैंने अपने एक अन्य लेख में भाषायी अल्पसंख्यकों और इसके लिए गठित संस्थाओं के बारे में विस्तार पूर्वक लिख चुका हूँ। जनगणना में कुछ स्थान पर श्रम पूर्वक कार्य सम्पादित होते हैं तो कुछ भी दूर बैठकर आंकड़े लिख दिये जाते हैं।  यह शिकायत हमेशा से रही है कि जनगणनाकर्ता पूछता है, तुम्हारी माँ किस भाषा को बोलती है? यदि तुम्हारी माँ संस्कृत नहीं बोलती तो तुम्हारी प्रथम मातृभाषा संस्कृत कैसे हो सकती है? चुंकि जनगणना करने वाला हिन्दी या अन्य क्षेत्रीय भाषा बोल रहा होता है, जिसका उत्तर उसी भाषा में दी जाती है। पुनः उसका दूसरा प्रश्न होता है कि तुम्हारी द्वितीय भाषा संस्कृत नहीं हो सकती तुम मेरी भाषा में धारा प्रवाहपूर्वक उत्तर दे रहे हो। अंततः तृतीय भाषा में संस्कृत को स्थान मिल पाता है। यह तब संभव है जब जनगणना करने वाले महाशय से आपकी भेंट हो जाय। अन्यथा आपका पड़ोसी या रिश्तेदार भी नहीं जानते कि आप संस्कृत बोलना जानते हैं। क्योंकि आपने उसके समक्ष कभी संस्कृत में बोला ही नहीं।
 भारतीय जनगणना परिणाम 2011 के लिंक पर क्लिक कर डाउनलोड कर ले। इसका विस्तार पूर्वक अध्ययन करें। 2011 के रिपोर्ट के अनुसार 22 सूचीबद्ध भाषाओं में संस्कृत सबसे कम बोली जाने वाली भाषा है। 2011 के रिपोर्ट के अनुसार इसे सम्पूर्ण भारत में प्रथम भाषा को रूप में बोलने वालों की कुल जनसंख्या मात्र 24,821 हैं।द्वितीय भाषा के रूप में बोलने करने वाले की कुल जनसंख्या 12,34,931 तथा तृतीय भाषा के रूप में बोलने करने वाले की कुल जनसंख्या 37,42,223 है। देखें रिपोर्ट -




2001 में हुई जनगणना रिपोर्ट के अनुसार संस्कृत बोलने वाले कुल संख्या 14,135 थी, जबकि 1991 में 49,736  । क्या 1991 में जो लोग संस्कृत बोल रहे थे वे 2001 आते आते बोलना भूल गये अथवा सहसा परमपद को सिधार गये ? यद्यपि 2001 में रिपोर्ट आने पर इस विषय पर बहुत अधिक चर्चा हुई थी। कारण खोजे गये थे। नयी पीढ़ी के लोगों तथा इस विषय में रूचि रखने वाले के लिए अंत में 1971 से लेकर अबतक संस्कृत भाषा बोलने वाले का रिपोर्ट विश्लेषण करने के लिए दे रहा हूँ। कुछ प्रश्न हो, जिज्ञासा हो, चर्चा करनी हो तो टिप्पणी में अपना मंतव्य लिख दें।                                             
वर्ष
1971
1981
1991
2001
2011
जनसंख्या
2,212
6,106
49,736
14,135
24,821

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संस्कृत व्याकरण समझने का औजार


                                                    संस्कृत व्याकरण के अङ्ग

व्याकरण के पांच अङ्ग हैं- सूत्रपाठ, धातुपाठ, गणपाठ, उणादिपाठ तथा लिङ्गानुशासन। माहेश्वर सूत्र, सूत्रपाठ, धातुपाठ, वार्तिकपाठ, गणपाठ, उणादिपाठ तथा लिङ्गानुशासन, आगम, प्रत्यय तथा आदेश को उपदेश कहा जाता है।

                 धातुसूत्रगणोणादि वाक्यलिङ्गानुशासनम्।
                 आगमप्रत्ययादेशा उपदेशाः प्रकीर्तिताः ।।

                 धातुसूत्रगणोणादि वाक्यलिंगानुशासनम्।
                 आदेशो आगमश्च उपदेशाः प्रकीर्तिता।।

इनमें सूत्रपाठ मुख्य भाग है, शेष उसके परिशिष्ट ग्रन्थ कहे जाते हैं। ये सभी रचनायें अष्टाध्यायी के सूत्रों के पूरक हैं। इन परिशिष्ट ग्रन्थों की सहायता से ही सूत्रों को लघु रूप में कह पाना सम्भव हो सका। आगे के पाठ में आप देख सकेंगे कि किस प्रकार प्रत्याहार तथा धातु आदि अन्य पाठों का उपयोग सूत्रों को छोटे आकार में बनाये रखने के लिए किया गया। जैसे- पाणिनि ने सर्वनाम संज्ञा के लिए सर्वादीनि सर्वनामानि’ (अष्टा. 1.1.27) सूत्र लिखते हैं, यहां सर्व आदि से सर्वादि गण का निर्देश किया गया है। सर्वादि गण के ज्ञान के लिए गणपाठ के सहारे की आवश्यकता होती है, यदि गण पाठ नहीं होता तो इतने कम शब्दों में सूत्रों को कहना सम्भव नहीं था। सूत्र का अर्थ ही होता है- धागा। इसके सहारे हम विभिन्न गणों, प्रत्याहार के वर्णों तक पहुँच पाते हैं। इस प्रकार सूत्र अपने छोटे आकार में रहकर भी अधिक अर्थ को कह पाता है। इसी प्रकार फणां च सप्तानाम्’ (अष्टा. 6.4.125) सूत्र में फणादि सात धातुओं का निर्देश मिलता है। इसकी जानकारी धातुपाठ से मिलती है। उणादयो बहुलम्’ (अष्टा. 3.3.1) सूत्र को समझने के लिए उणादिपाठ की शरण में जाना होता है। इस प्रकार धातुपाठ और गणपाठ  आदि उपदेश कहे जाते हैं। पाणिनि अपने सूत्र में प्रत्याहार की तरह ही  इसका भी प्रयोग करते हैं। अतः सूत्रों के साथ साथ धातुपाठ आदि का भी स्मरण करना चाहिए। 
                                                               अनुवर्तन

अष्टाध्यायी की रचना सूत्रों की शैली में हुई अतः इसे अष्टाध्यायी सूत्रपाठ भी कहा जाता है। लघुसिद्धान्तकौमुदी का निर्माण  अष्टाध्यायी के सूत्रों से ही हुआ है। सूत्र में संक्षेपीकरण को महत्व दिया जाता है। हम इसके सहारे विस्तार तक पहुंच जाते हैं। सूत्रों को याद रखना आसान होता है। यदि ये सूत्र बड़े आकार में होते तो याद रखना भी कठिन होता। एक ही शब्द को बारबार कहना और लिखना पड़ता। सूत्र में कही गयी बातों को पूरी तरह समझने के लिए हमें कुछ बुद्धि लगानी पड़ती है। पाणिनि ने यदि किसी सूत्र में एक बार कोई बात कह दी तो उसे आगे के सूत्र में पुनः नहीं कहते। वह नियम आगे के सूत्र में आ जाते हैं। इसे अनुवर्तन कहते हैं। जब कोई शब्द किसी सूत्र में दिखाई नहीं दे और अर्थ पूर्ण नहीं हो रहा हो तो उसे पहले के सूत्र में देखना चाहिए। जैसे- हलन्त्यम् (1.3.3) सूत्र में उपदेशेऽजनुनासिक इत् (1.3.2) से  उपदेशे तथा इत् इन दो पदों की अनुवृत्ति आती है। आप देख रहे होंगें कि उपदेशेऽजनुनासिक इत् के बाद की संख्या हलन्त्यम् सूत्र की है। इस प्रकार हलन्त्यम् सूत्र का अर्थ पूर्ण हो जाता है। अनुवृत्ति को समझने के लिए हमें अष्टाध्यायी की आवश्यकता होती है परन्तु लघुसिद्धान्तकौमुदी में सूत्र के नीचे अनुवृत्ति आदि प्रक्रिया को पूर्ण कर उसकी वृत्ति अर्थात् सूत्र का अर्थ लिखा हुआ है।
  
                                                              उत्सर्ग एवं अपवाद

संस्कृत व्याकरण के शब्दों की संरचना दो भागों में विभाजित हैं 1. सामान्य संरचना। इन शब्दों के निर्माण के लिए सामान्य सूत्र बनाये गये। इसे उत्सर्ग सूत्र कहा जाता है। 2. अपवाद या विशेष। सामान्य नियम को वाधित करने के लिए अपवाद या विशेष सूत्रों का निर्माण किया गया। इस विधि से समान संरचना वाले शब्दों का निर्माण एक ही सूत्र से हो जाता है। उदाहरण के लिए अपत्य अर्थ को सूचित करने के लिए प्रातिपादिक सामान्य से अण् प्रत्यय जुड़ता है, यह सामान्य नियम कर देने पर सूत्रकार को ऐसे प्रातिपादिकों की सूची नहीं देनी पड़ती जिन्हें अण् प्रत्यय प्राप्त है अपितु केवल उन विशेषों के बारे में विधान करना शेष रहता है जो अण् प्रत्यय से भिन्न प्रत्यय द्वारा अपत्य अर्थ को सूचित करते हैं। उदाहरणार्थ तस्यापत्यम्’ (अष्टा. 4.1.22) सूत्र द्वारा सामान्य नियम कर देने पर प्रातिपादिक सामान्य से अपत्यार्थ में अण् प्रत्यय होता है, यह आवश्यक नहीं रहता कि अण् प्रत्यय प्राप्त करने वाले प्रातिपादिकों का किसी अन्य विशेष सूत्र द्वारा उल्लेख किया जाय। अपत्यार्थ को सूचित करने के लिए जिन प्रातिपादिक विशेष शब्दों का निर्माण अण् प्रत्यय से नहीं हो पाता वहीं किसी अन्य प्रत्यय का विधान करना है। जैसे- अत इञ्’ (अष्टा. 4.1.95) सूत्र द्वारा अकारान्त प्रातिपादिकों से अपत्य अर्थ में इञ्प्रत्यय का विधान करते हैं। अकारान्त प्रातिपादिक समूह का एक भाग विशेष है। अतः तत्सम्बन्धी नियम पूर्व नियम का बाधक या अपवाद होगा। यदि अकारान्त प्रातिपादिकों का भी कोई वर्ग विशेष उक्त अर्थ में अन्य प्रत्यय की अपेक्षा रखता है तो पाणिनि के सामने उन्हें सूचीबद्ध करके तत्सम्बन्धी नियम देने के अतिरिक्त कोई मार्ग नहीं रहता। ऐसा नियम उक्त रीति से अदन्त प्रातिपादिक-सामान्य के बारे में विहित अत इञ्इस विधि का अपवाद होगा, जैसे कि गर्गादिभ्यो यञ्’ (अष्टा. 4.1.105) गर्गादिगण के विषय में इसका अपवाद है। पाणिनि ने इस उत्सर्ग तथा अपवाद शैली से सूत्रों के आकार को छोटा रखने में सफलता तो प्राप्त किया ही, साथ ही एक ही प्रकार के अर्थ को समझाने में शब्दसमूह की विविध संरचनात्मक आकृतियों का तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत कर दिया। इस शैली के द्वारा हम संस्कृत शब्दों की संरचना को सरलता पूर्वक समझ पाते हैं।

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संस्कृत पत्रकारिता के लिए दृष्टिपत्र


संस्कृत पत्रकारिता में अभी समाचार बेचने की परम्परा नहीं है। पाठक क्या पढ़ना चाहता है? इसपर विचार नहीं किया जाता । यहाँ पर लोगों को क्या पढ़ना चाहिए इस बात पर जोर है। कुल मिलाकर संस्कृत पत्रकारिता साहित्य की परिधि से बाहर नहीं निकल सका है। अन्य भाषाओं की पत्रकारिता साहित्य को सनसनीखेज बनता है, जिससे पाठक नहीं चाहते हुए अध्ययन को उत्सुक हो जाते है। भाषा ज्ञान तो बाधक है ही। आज स्मार्ट पत्रकारिता का युग है, दजिसमें समय प्रबन्धन से लेकर पाठकों की इच्छा तथा वितरण का ध्यान रखा जाता है। स्मार्ट पत्रकारिता में सफल पत्रकार वह माना जाता है, जो अधिक भागदौड़ से बचते हुए तकनीक का उपयोग करते हुए समाचार का संकलन करता है। जो उस पत्र का पाठक नहीं है, उसके पास तक अपनी पहुँच बनाने के लिए सोशल मीडिया, रिसर्च एण्ड डवलप आदि के द्वारा अपनी पहुँच बनाता है। जैसा कि मैंने पत्रकारिता के अपने लेख में शब्द चयन का उल्लेख किया था,पत्रकारिता में लगभग, आदि जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाता। कम शब्दों में अधिक बाते कही जाती जाती है ताकि अधिक से अधिक समाचार को स्थान दिया जा सके। पत्रकारिता में सत्यता की स्थापना के लिए फोटोग्राफी एवं सम्बन्धित व्यक्तियों से कथन को जोड़ा जाता है। स्थान भेद से व्यक्तियों के अध्ययन के प्रति रूचि में भेद देखा जाता है। आज के समाचार पत्र इसी आधार पर स्थानीय समाचार में इसका ध्यान रखते हैं। पत्रकारिता द्वारा बाजार की स्थापना और बाजार द्वारा पत्रकारिता को संरक्षण आवश्यक अंग बनता जा रहा है। दोंनों के बीच एक अदृश्य सम्बन्ध स्थापित है। इसी प्रकार अनेक क्षेत्रों के साथ गठजोर स्थापित करते हुए पत्रकारिता आगे बढ़ रही है।
          संस्कृत पत्रकारिता में गति देने के लिए इनमें से कुछ तत्वों को अपना पड़ेगा। संस्कृत पत्र- पत्रिका के कुशल प्रबन्धन एवं विक्री के लिए सम्बाददाता, छायाकार, विज्ञापन संकलन कर्ता को स्थान देना होगा। पत्रका के विस्तार के लिए RND (रिसर्च एण्ड डवलप) का कार्य करना होगा। रिसर्च एण्ड डवलप का काम किसी भी व्यक्ति से कराया जा सकता है। इसमें एक सर्वे पत्र बनाना चाहिए, जिसमें निम्नलिखित जानकारी इकट्ठा करने का प्रारूप हो।
1.     नाम
2.    परिवार में सदस्यों की संख्या
3.    उनमें से संस्कृत जानकारों की संख्या
4.    प्रत्येक व्यक्ति की अवस्था, लिंग एवं शैक्षिक योग्यता
5.    परिवार के सदस्यों में कौन नियमित पाठक है कौन अनियमित
6.    संस्कृत पत्र - पत्रिका पढ़ते है या नहीं?
7.    कौन क्या पढ़ते है?
8.    उसका उपयोग कहाँ करते है?
9.    संस्कृत पत्र- पत्रिका के अतिरिक्त और कौन सी पत्रिका पढ़ते है? नेट / मुद्रित
10.  क्या पढ़ना अच्छा लगता है?
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