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समयः
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कार्यम्
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सान्दर्भिकं संकेतञ्च
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4:00
AM
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जागरणम्, पादप्रक्षालनम्
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4:15-
5:15 AM
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पूर्वदिने पठितानां
विषयानां पुनरावृत्तिः
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टिप्पणी-निर्माणकार्यम्
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5:15-
6:15 AM
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व्यायामः,योगः ध्यानञ्च
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6:15-
6:30 AM
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स्नानम्
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6:30-
7:30 AM
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सामान्यप्रश्नपत्रस्य
अध्ययनम्
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टिप्पणी-निर्माणकार्यम्
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7:30-
8:00 AM
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जलपानं, समाचार-पत्रवाचनम्
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8:00-
11:00 AM
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अध्ययन-सत्रम् 1
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वैदिकसाहित्यस्याध्ययनम्
उत्तरलेखनञच
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11:00-
11:30 AM
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संक्षिप्तविरामः
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11:30-
01:00 PM
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अध्ययन-सत्रम् 2
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दर्शन-साहित्यस्याध्ययनम्
उत्तरलेखनञच
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1:00-
1:30 PM
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भोजनम्
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1:30-
2:00 PM
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संक्षिप्तविरामः
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2:00-
4:00 PM
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अध्ययन-सत्रम् 3
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व्याकरणं भाषाविज्ञानयोः
अध्ययनम् उत्तरलेखनञ्च
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4:00-
4:30 PM
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अल्पविरामकालः
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4:30-
5:30 PM
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अन्तर्जालचलचित्रमाध्यमेन
पुस्तकमाध्यमेन वा अध्ययनम्
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साहित्यशास्त्रस्य,
काव्यशास्य छन्दसः अध्ययनमुत्तरलेखनञ्च
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5:30-
6:15 PM
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शारीरिक-गतिविधयः
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भ्रमणं, मित्रैः सह
जल्पनम्
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6:15-
6:30 PM
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स्नानम्
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6:30-
7:30 PM
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अध्ययन-सत्रम् 4
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पुराणेतिहासस्य,धर्मशास्त्रस्य
अभिलेखशास्त्रस्य च अध्ययनम्
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7:30-
9:00 PM
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रात्रिभोजनम् + मित्रैः सह अधीतविषयोपरि चर्चा
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9:00-
10:00 PM
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अध्ययन-सत्रम् 5
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कृताध्ययनस्य टिप्पणी-निर्माणकार्यम्
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10:00-10:30
PM
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अभ्यास- सत्रम्
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आदर्शप्रश्नपत्रस्य उत्तर-लेखनम्
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10:30
PM
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शयनकालः
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Model Timetable for UGC NET/ JRF Sanskrit (Code 25) Preparation
संस्कृत नाट्य प्रशिक्षण क्यों और कैसे?
संस्कृत शब्दकोश तथा इसके वर्णक्रम
बारहखड़ी / वर्णमाला शिक्षण एवं उच्चारण का क्रम बताती है, जबकि शब्दकोश (Dictionary) वर्णानुक्रम (Alphabetical order) पर आधारित होता है। दोनों का उद्देश्य भिन्न होने के कारण उनका क्रम भी भिन्न हो सकता है।
अँ, अं, अः को अलग “स्वतंत्र स्वर” नहीं माना गया है। ये अयोगवाह वर्ण हैं, जिन्हें न तो स्वतंत्र स्वर माना जाता है और न ही व्यंजन। इनका उच्चारण सदैव किसी स्वर के सहयोग से ही संभव होता है।
इसी सिद्धान्त के अनुसार संस्कृत शब्दकोश अ वर्ण से आरम्भ होता है। अ के पश्चात् पहले अयोगवाहयुक्त रूप—अं, उसके बाद अः—आते हैं। तत्पश्चात् अ + व्यंजन से बने शब्द वर्णानुक्रम के अनुसार व्यवस्थित किए जाते हैं।
जब अ वर्ण से आरम्भ होने वाले सभी शब्द समाप्त हो जाते हैं, तब अगले स्वतंत्र स्वर आ से आरम्भ होने वाले शब्द आते हैं—जैसे विस्मयादिबोधक ‘आ’। इसके पश्चात् अयोगवाहयुक्त रूप आं (जैसे ‘आम्’) के शब्द रखे जाते हैं।
संस्कृत में ईसा पूर्व से ही कोश की रचना होने लगी थी। संस्कृत के कोशों में अमरसिंह कृत अमरकोश की रचना 11वीं शती के पूर्व हो चुकी थी । संस्कृत के कोशकारों में मेदिनीकार से लेकर अमर सिंह तक 24 कोशकारों के नाम प्राप्त होते हैं।
मेदिन्यमरमाला च त्रिकाण्डो रत्नमालिका ।
रन्तिदेवो भागुरिश्च व्याडिः शब्दार्णवस्तथा ॥
द्विरूपश्च कलिङ्गश्च रमसः पुरुषोत्तमः ।
दुर्गोऽभिधाममाला च संसारावर्तशाश्वतो॥
विश्वो बोपालितश्चैव वाचस्पतिहलायुधौ।
हारावली साहसाहसाङ्को विक्रमादित्य एव च ॥
अमरकोश जैसे शब्दकोश में शब्दों की वर्तनी, लिंग और पर्यायवाची शब्द दिये हैं, जबकि वर्णक्रम वाले वामन शिवराम आप्टे एवं अन्य भारतीय विद्वानों के आधुनिक संस्कृत शब्दकोश में शब्दों की व्युत्पत्ति, वर्तनी,लिंग,शब्दार्थ और पर्यायवाची शब्द दिये रहते हैं। यहां हर शब्द के बाद बताया जाता है कि वह शब्द संज्ञा है या सर्वनाम या क्रियाविशेषण आदि। इस जानकारी के बाद उस का अर्थ लिखा जाता है. ‘‘शब्दकल्प द्रुम’’ (1828-58) तथा ‘‘वाचस्पत्यम’’ जैसे बड़े कोशों में शब्द का अर्थ समझाने के लिए उस की परिभाषा भी होती है। इन जानकारियों के लिए शब्दकोश देखने आना चाहिए। कोशकार कोश देखने और समझने के लिए आवश्यक निर्देंश दिये रहते हैं। आधुनिक संस्कृत कोश में शब्दों के लिंग ज्ञान के लिए अलग से लिंग निर्देश दिया रहता है। किसी शब्द के अर्थ को स्पष्ट करने के लिए उसके पर्यायवाची शब्द तथा व्युत्पत्ति भी दिया जाता है। कई बार उदाहरण के द्वारा भी शब्द के अर्थ को स्पष्ट किया जाता है जैसे- वर्षा के अनेक शब्द हमें पता हैं। पावस और वृष्टि जैसे शब्द शायद हमें नए लगें। इन का अर्थ भी वर्षा है। यह कोश ही बताता है।
मुद्रित संस्कृत शब्दकोश में इच्छित शब्द ढूढने की विधि अत्यन्त सरल है। इसके लिए देवनागरी लिपि का वर्णक्रम याद रहना चाहिए। इसमें पहले स्वर वर्ण है पश्चात् व्यंजन वर्ण। अयोगवाह को अर्ध स्वर मानकर मूल स्वर के बाद इस अक्षर को रखा जाता है। जैसे-
इस वर्णक्रम में वैज्ञानिकता और तार्किकता है। जैसा कि ऊपर में वर्णों का क्रम बताया गया है। मोटे तौर पर पहले स्वर वर्ण, पश्चात् अयोगवाह, उसके बाद व्यंजन वर्ण आते हैं। शब्दकोश में अ अक्षर के बाद अं अक्षर से वर्ण का आरम्भ होता है, क्योंकि स्वर अ के बाद अयोगबाह अनुस्वार वर्ण आएगा। आदि के स्वर वर्ण वाले अक्षरों के बाद आदि व्यंजन वाले वर्ण शुरु होते हैं।









