मंगलवार, 11 नवंबर 2014

उत्तराखंड की संस्कृत साहित्य परम्परा

      उत्तराखंड में ईसा की आठवीं शताब्दी के आस-पास से संस्कृत आचार्यों का उल्लेख मिलना शुरू होता है । इनमें पहला उल्लेख श्रीहरि का आता है । श्री हरि संस्कृत आचार्य वासुदेव तथा आचार्य विज्ञानेश्वर के समकालीन चंद्रवंशीय राजाओं के मूल पुरूष सोमदेव (700-721 ई.) के साथ उत्तराखंड में आए थे तथा ये पाण्डेयास्पद ब्राह्मण थे। सत्रहवीं सदी में इन्हीं की वंश परंपरा में  संस्कृत के सुप्रसिद्ध विद्धान आचार्य विश्वेश्वर पाण्डेय हुए। श्रीहरि (हरिहर) पारस्करगृह्यसूत्र के टीकाकार थे। 
            श्रीहरि के बाद दूसरा उल्लेखनीय नाम आचार्य केदार का आता है। इन्होंने छंद विषयक ग्रंथ वृत्तरत्नाकरकी रचना की । इस काल में साहित्य रचना संस्कृत भाषा में ही हो रही थी, किंतु स्थानीय बोलचाल की कुमाउनी भाषा में मौखिक परंपरा  का प्रचुर लोक साहित्य सृजित होता रहा । चंद राजाओं के शासन काल में कुमाउनी, कुमाऊँ की प्रशासनिक भाषा थी। तत्कालीन अभिलेखों एवं ताम्रपत्रों में संस्कृतनिष्ठ कुमाउनी के प्रयोग हुए हैं।चंद्रवशीय राजाओं के समय के अभिलेखों एवं ताम्रपत्रों में संस्कृतनिष्ठ कुमाउनी के प्रयोग हुए हैं। चंद्रवशीय राजाओं ने साहित्य एवं साहित्यकारों को भी प्रोत्साहित किया। वे स्वंय भी साहित्य रचना करते थे। इस युग को कूर्मांचल (उत्तराखण्ड) के संस्कृत साहित्य का स्वर्ण युग माना जा सकता है। इस युग में यहां अलंकारशास्त्र, होरा, सिद्धांत, फलित ज्योतिष जैसे विविध विषयों पर ग्रंथ लिखे गए। यहां के ज्योतिषियों की प्रतिष्ठा उत्तराखंड में ही नहीं, बल्कि यहां से बाहर पटियाला, दरभंगा, कपूरथला, रामपुर, संभल, जोधपुर आदि रियासतों तक भी थी। महाराजा रूद्रचन्द्र देव (1567-1597) ने स्वंय भी अनेक ग्रंथों की रचना की थी, जिनमें  सैनिक शास्त्रउषा रागोदय, ‘त्रैवार्णिक धर्म निर्णयययाति चरितम्आदि उल्लेखनीय हैं। उनके साहित्य-प्रेम तथा विद्वत्प्रेम के कारण उस काल में कुमाऊँ में अनेक विद्वानों को प्रश्रय मिला और उत्कृष्ट रचनाएं हुई। सोलहवीं से अठारहवीं सदी के मध्य महाराजा रूद्र चन्द के अतिरिक्त पं. रूद्र चन्द, कल्याण चन्द, त्रिलोचन जोशी, प्रेमनिधि पंत, हरिदत्त जोशी, भगीरथ पाण्डे, शिवानंद पाण्डे, विक्रम चन्द आदि अनेक विद्वान हुए; जिन्होंने संस्कृत भाषा में विविध विषयों पर  ग्रंथों की रचना की थी। पं. रूद्र चन्द (1638) ने ज्योतिषचंद्रांर्कतथा रूद्र प्रदीपअनन्त देव ने प्रायश्चित दीपिकाकाल निर्णय बिंदुअग्निहोत्र प्रयोगतथा अग्रायण प्रयोग; पं. भगीरथ पाण्डे ने काव्यादर्श टीका; किरातार्जुनीयम् टीका, देवी माहात्म्य टीका, शिशुपालवध टीकातत्व दीपिका, मेघदूत टीका,  जैसे ग्रंथों की रचना की। इसी काल में पंं. लक्ष्मीपति द्वारा रचित अब्दुल्लाहचरितम्’’ तथा फर्रूखासियचरितम् जगच्चंद्रिका, शिवानन्द पाण्डेय विरचित कूर्मांचलकाव्यकल्याणचंद्रोदयआदि अत्यधिक लोकप्रिय हुए।
            अठारहवीं सदी के पूर्वार्द्ध में प्रेम निधि पंत (1700-1760) एवं उत्तरार्द्ध में विश्वेश्वर पाण्डेय का योगदान विशेष उल्लेखनीय है। इन दोनों विद्वानों ने विभिन्न विषयों पर विपुल ग्रंथों की रचना की। टीका, भाष्य तथा साहित्यशास्त्र के अतिरिक्त इन्होंने अन्य विषयों पर सैद्धांतिक ग्रंथों की रचना की। प्रेम निधि पंत की पत्नी प्राणमंजरी उस काल की विदुषी महिला थी। इन्होंने दो ग्रंथों की रचना की थी। उक्त समस्त विद्वानों का साहित्य यह सिद्ध करता है कि अठारहवीं शती तक कूर्मांचल में संस्कृत भाषा तथा साहित्य के पठन-पाठन-अध्ययन का अधिक प्रचलन था। साहित्य रचना के अतिरिक्त धर्म, ज्योतिष तथा अन्य विषयों के शास्त्रीय ग्रंथों की रचना में तत्कालीन संस्कृत विद्वानों की विशेष रूचि थी। इस प्रकार कूर्मांचलीय विद्वानों का ज्योतिष, टीका एवं नाटक में विशेष योगदान माना जाता है।
            अठारहवीं सदी के पश्चात् कुमाऊँ के साहित्यकार संस्कृत भाषा के साथ कुमाउनी तथा खड़ी बोली में भी रचनाएं करने लगे। यह आधुनिक काल का प्रथम चरण था और इसे कुमाउनी भाषा के लिखित साहित्य का भी प्रांरभिक चरण कहा जा सकता है। इस नये युग का प्रारंभ लोकरत्न पंत गुमानी (1790-1846) से होता है। इनकी सर्वाधिक रचनाएं संस्कृत भाषा में ही हैं। इनका संस्कृत, हिन्दी, कुमाउनी तथा नेपाली चारों भाषाओं पर समान अधिकार था। इन चारों भाषाओं के अतिरिक्त गढ़वाली में भी इनकी रचनाएं उपलब्ध होती हैं, दूसरी ओर कुमाउनी और नेपाली में लिखित साहित्य का सूत्रपात करने के कारण ये कुमाउनी-नेपाली के परिनिष्ठित साहित्य के जनक माने जाते हैं और खड़ी बोली हिंदी में कविता लिखने वाले प्रांरभिक कवियों में शामिल हैं।