गोरक्ष सिद्धांत संग्रह और नाथ पंथ के अन्य प्रामाणिक ग्रंथों के आधार पर 'अव्यय' और 'अनाम' का अर्थ निम्नलिखित है:
1.
अव्यय
स्रोतों
के अनुसार, 'अव्यय' का अर्थ है
वह जो अविनाशी, अक्षय और परिवर्तन रहित है।
अनादि
और अनन्त: ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद का एक
आदि, मध्य और अन्त होता है, लेकिन ब्रह्म
अनादि और अनन्त होने के कारण अव्यय कहा गया है।
द्वंद्वों
से परे: अव्यय वह स्थिति है जहाँ 'व्यय'
(क्षय) नहीं होता, इसलिए यह सुख-दुःख जैसे द्वंद्वों
के अभाव की स्थिति है।
प्रणव
(ॐ): इस ग्रंथ में प्रणव (ॐ) को भी 'अव्यय'
कहा गया है क्योंकि वह समस्त शब्दों का मूल है और स्वयं कभी नष्ट
नहीं होता।
2.
अनाम
'अनाम' का अर्थ है वह जो नाम और रूप की सीमाओं से परे
है। नाथ दर्शन में इसका महत्व इस प्रकार है:
नाथ
की व्युत्पत्ति: 'राजगुह्य'
के अनुसार, 'नाथ' शब्द
में 'ना' अक्षर स्वयं 'अनादि रूप' (बिना आदि या नाम वाला) का प्रतीक है।
सृष्टि
से पूर्व की अवस्था: नाथ परंपरा (विशेषकर *सिद्ध सिद्धांत
पद्धति*) के अनुसार, सृष्टि की उत्पत्ति से पहले
केवल 'अनाम' (परब्रह्म) ही विद्यमान था,
जिसमें कोई भेद या नाम नहीं था।
अनामय
स्थिति: योग की उच्च अवस्था में साधक स्वयं को 'अनामय' (विकारों और रोगों से रहित) अनुभव करता है।
यह वह अवस्था है जो 'अवाच्य' (वाणी से
परे) है और जिसे केवल अनुभव से जाना जा सकता है।
संक्षेप
में,
अव्यय उस परम तत्व की शाश्वतता और अमरता को दर्शाता है, जबकि अनाम उसकी उस सूक्ष्म स्थिति को दर्शाता है जहाँ वह किसी भी मानवीय
संज्ञा या नाम के बंधन में नहीं बंधा है।





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