प्रसरं भासयेच्छक्तिः संकोचं भासयेच्छिवः।
तयोर्योगस्य कर्ता यः स भवेत्
सिद्धयोगिराट्।। गोरक्षसिद्धान्तसंग्रह - 6
क्या यह सृष्टि स्थिर है, या निरन्तर बदलती हुई एक प्रक्रिया है? क्या यह केवल पदार्थों का संयोग है, या चेतना और
ऊर्जा का कोई गूढ़ खेल? नाथ परम्परा के महान ग्रन्थ गोरक्ष
सिद्धान्त संग्रह में कहा गया है—“यह सम्पूर्ण जगत् संकोच और
विकास का खेल है” यही
वाक्य हमें भारतीय ज्ञान परम्परा की गहराइयों में प्रवेश कराता है।
1. संकोच–विकास का दार्शनिक अर्थ नाथ पंथ के अनुसार—
विकास (Expansion) = शक्ति का बहिर्मुख होना । संकोच (Contraction)
= शिव में पुनः लय
यह द्वैत नहीं, बल्कि एक ही सत्य के दो पक्ष हैं।
कश्मीर शैव दर्शन की पुस्तक प्रत्यभिज्ञा
हृदयम् में कहा गया है—“चितिः
स्वातन्त्र्यविश्वसिद्धिहेतुः”
(चेतना अपनी स्वतन्त्र
शक्ति से विश्व की सृष्टि करती है) 'चिति' (चेतना) + 'स्वतंत्र' + 'विश्व'
+ 'सिद्धि' + 'हेतु' (कारण)।
अर्थात, चेतना की स्वतंत्रता ही जगत की सिद्धि का मूल कारण
है। यहाँ “चित्” (शिव) और “शक्ति” अभिन्न हैं।
2. शक्ति का बहिर्मुख होना और सृष्टि
की रचना
नाथ पंथ के अनुसार सृष्टि की
प्रक्रिया—
(1) शिव – पूर्ण चेतना निर्विकार और अद्वैत है। (2) शक्ति –
क्रियाशीलता, उसी चेतना की गतिशील अभिव्यक्ति।
तन्त्र परम्परा* में कहा गया—“शिवः शक्त्या युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं” (शिव शक्ति से युक्त होकर ही सृष्टि करने में समर्थ
होता है)
(3) बहिर्मुखता (Outward
Expansion) जब शक्ति बहिर्मुख होती है— एक → अनेक, सूक्ष्म → स्थूल
*उपनिषद्* का प्रसिद्ध
वाक्य है - “एकोऽहम् बहुस्याम्” (मैं एक होकर अनेक हो जाऊँ) यही सृष्टि का प्रारम्भ है।
(4) सृष्टि का विकास
पंचमहाभूतों की उत्पत्ति- शरीर, मन, इन्द्रियों का
निर्माण
सांख्य दर्शन में “प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः” कहा
गया। (सभी कार्य प्रकृति के गुणों द्वारा होते हैं) यहाँ “प्रकृति” = शक्ति है।
3. संकोच – पुनः शिव में लय
नाथ पंथ कहता है— जो उत्पन्न हुआ है, वह
पुनः लीन होगा। शक्ति अन्ततः शिव में विलीन हो जाती है
भगवद्गीता में “प्रकृतिं यान्ति भूतानि” (9.7) (सभी भूत अन्ततः प्रकृति में लीन हो जाते हैं) यही
“संकोच” है।
4. वैज्ञानिक दृष्टि से पुष्टि
नाथ सिद्धान्त केवल आध्यात्मिक नहीं, वैज्ञानिक भी प्रतीत होता है—
(क) ब्रह्माण्ड का
विस्तार - Big Bang → Expansion
(ख) संभावित संकुचन - Big
Crunch →
Contraction
(ग) ऊर्जा का सिद्धान्त * ऊर्जा
नष्ट नहीं होती, केवल रूप बदलती है
👉 “शक्ति =
ऊर्जा”
👉 “शिव = मूल
अवस्था”
5. भारतीय ज्ञान परम्परा में इसका
विकास
यह सिद्धान्त क्रमशः विकसित हुआ—
(1) ऋग्वेद के (नासदीय
सूक्त) में “नासदासीन्नो सदासीत्तदानीम्” (न तो अस्तित्व था, न
अनस्तित्व)
(2) उपनिषद् में “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”
(3) सांख्य दर्शन में पुरुष
+ प्रकृति = सृष्टि
(4) तन्त्र और शैव
दर्शन में शिव–शक्ति का स्पन्द
(5) नाथ पंथ का व्यावहारिक
रूप
नाथ योगियों ने इस सिद्धान्त को योग-साधना
में उतारा “अनुभव” को सर्वोपरि रखा
6. नाथ पंथ का विशेष योगदान
नाथ पंथ ने भारतीय ज्ञान परम्परा को—
(1) “योगमार्ग से ही परम पद की प्राप्ति” को अनुभव-आधारित
बनाया
(2) वर्ण, आश्रम से परे ज्ञान सामाजिक बन्धनों से मुक्त किया
(3) शरीर और चेतना का
विज्ञान दिया । जैसे - प्राणायाम, ध्यान, समाधि
(4) अद्वैत को व्यवहार
में उतारा
अतः यह स्पष्ट है कि यह सृष्टि कोई
जड़ वस्तु नहीं, बल्कि चेतना (शिव) और
ऊर्जा (शक्ति) का निरन्तर “संकोच–विकास”
का जीवंत नृत्य है।
“यथा पिण्डे तथा
ब्रह्माण्डे”जो प्रक्रिया ब्रह्माण्ड में है, वही हमारे भीतर भी है।
“जब शक्ति बहिर्मुख होती है तो सृष्टि बनती है और जब अन्तर्मुख होती है तो शिव में लीन हो जाती है। यही भारतीय ज्ञान परम्परा का शाश्वत सत्य है।”
यह पंथ आज भी योग,
आयुर्वेद और सामाजिक समरसता के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा को
जीवंत बनाए हुए है।





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