नेपाल में गोरखनाथ को 'राष्ट्रगुरु' के रूप में क्यों पूजा जाता है?

नेपाल में महायोगी गोरखनाथ को 'राष्ट्रगुरु' और 'राजगुरु' के रूप में पूजे जाने के पीछे कई ऐतिहासिक, धार्मिक और सैन्य कारण हैं, जिनका विवरण इस प्रकार है:

शाह राजवंश की स्थापना और आशीर्वाद: मान्यता है कि नेपाल के शाह राजवंश की स्थापना गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से ही हुई थी। उन्होंने नेपाल के एक राजकुमार, द्रव्य शाह, की सेवा से प्रसन्न होकर उनके वंश को नेपाल का शासक होने का वरदान दिया था।

पृथ्वीनारायण शाह और राज्य का एकीकरण: नेपाल के एकीकरण के सूत्रधार राजा पृथ्वीनारायण शाह पर भी गोरखनाथ की अहेतुक कृपा मानी जाती है। कहा जाता है कि गोरखनाथ जी ने उन्हें एक तलवार भेंट की थी, जिसके बल पर उन्होंने 24 परगनों में विभाजित नेपाल को एक झंडे के नीचे संगठित किया। युद्ध से पूर्व उन्होंने गोरखनाथ जी की पूजा की थी और एक राजाज्ञा के द्वारा उन्हें राज्य का प्रमुख संरक्षक घोषित किया था।

शाह वंश के इष्टदेव और सिक्के: शाह राजवंश के सभी राजाओं ने गोरखनाथ जी को अपना इष्टदेव स्वीकार किया है। नेपाल के ऐतिहासिक सिक्कों पर गोरखनाथ जी की चरण पादुकाओं का चिह्न और उनका नाम अंकित रहता था।

राजतिलक की परंपरा: नेपाल में जब तक राजशाही कायम थी, शाह वंश के राजाओं का राजतिलक गोरखनाथ की तपोभूमि मृगस्थली के महंत द्वारा ही संपन्न किया जाता था। आज भी मकर संक्रांति के अवसर पर नेपाल के राजपरिवार की ओर से गोरखनाथ मंदिर में 'खिचड़ी' चढ़ाई जाती है।

गोरखा सेना और 'जय गोरख' का उद्घोष: नेपाल का गोरखा राज्य और वहाँ की गोरखा जाति स्वयं को गुरु गोरखनाथ से जोड़ती है। नेपाल की सेनाएं युद्ध भूमि में 'जय-गोरख' का रणघोष करती हैं। यहाँ तक कि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान गोरखा रेजिमेंट की बहादुरी से प्रभावित होकर अंग्रेज गवर्नर भी आभार व्यक्त करने गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर आए थे।

गोरखा रेजिमेंट नाम की उत्पत्ति और संबंध: नेपाल का गोरखा राज्य और वहां की गोरखा जाति स्वयं को गुरु गोरखनाथ से जोड़ती है। वास्तव में, गोरखनाथ जी के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम 'गोरखा' पड़ा।

शाह राजवंश को वरदान: मान्यता है कि नेपाल के शाह राजवंश की स्थापना गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से हुई थी। उन्होंने राजकुमार द्रव्य शाह की गौ-सेवा से प्रसन्न होकर उनके वंश को नेपाल का शासक होने का वरदान दिया था। बाद में, इसी वंश के प्रतापी राजा पृथ्वीनारायण शाह को गोरखनाथ जी ने एक तलवार भेंट की थी, जिसके बल पर उन्होंने 24 परगनों में विभाजित नेपाल का एकीकरण किया।

राज्य के प्रमुख संरक्षक: पृथ्वीनारायण शाह ने एक राजाज्ञा के माध्यम से गुरु गोरखनाथ को अपने राज्य का प्रमुख संरक्षक घोषित किया था। इस राजवंश को प्रारंभ में 'श्री गोरखशाह वंश' के नाम से जाना जाता था।

रणघोष 'जय गोरख': नेपाल की सेनाएं और गोरखा सैनिक प्राचीन काल से ही युद्ध भूमि में प्रस्थान करने से पूर्व और युद्ध के दौरान 'जय-गोरख' का रणघोष करते आए हैं। यह उद्घोष उनके लिए केवल एक नारा नहीं, बल्कि अपने इष्टदेव और संरक्षक संत की शक्ति का आह्वान है।

ऐतिहासिक प्रभाव और वीरता: इस उद्घोष और गोरखा सैनिकों की वीरता का प्रभाव अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी देखा गया। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान गोरखा रेजिमेंट की अद्वितीय बहादुरी से प्रभावित होकर तत्कालीन अंग्रेज गवर्नर आभार व्यक्त करने के लिए गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर आए थे और वहां के महंत दिग्विजयनाथ जी से भेंट की थी।

प्रतीकों में उपस्थिति: नेपाल के ऐतिहासिक सिक्कों पर भी गुरु गोरखनाथ जी की चरण पादुकाओं का चिह्न और उनका नाम अंकित रहता था, जो सेना और प्रशासन पर उनके गहरे प्रभाव को दर्शाता है।

आज भी, नेपाल की सेना और गोरखा रेजिमेंट के जवान गुरु गोरखनाथ को अपना 'प्रतिपालक संत' मानते हैं और 'जय गोरख' का उद्घोष उनकी अजेय पहचान का हिस्सा बना हुआ है।

अकाल से मुक्ति की कथा: एक अन्य कथा के अनुसार, जब नेपाल में 12 वर्षों का भीषण अकाल पड़ा था, तब गोरखनाथ जी ने ही अपने गुरु मत्स्येंद्रनाथ के सम्मान में उस अकाल को समाप्त करवाया था, जिससे नेपाल पुनः हरा-भरा हुआ। इस उपकार की स्मृति में नेपाल नरेश नरेंद्र देव ने रथयात्रा और महास्नान यात्रा जैसे उत्सव प्रारंभ किए जो आज भी प्रचलित हैं।

इन्हीं कारणों से नेपाल की जनता और शासक वर्ग दोनों ही गुरु गोरखनाथ को नेपाल का प्रतिपालक संत और राष्ट्रगुरु मानते हैं।

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