अमनस्क योग
अमनस्क
योग साधना की वह उच्चतम अवस्था है जहाँ मन समस्त संकल्पों और विकल्पों से रहित
होकर 'उन्मनी' भाव या 'अमनस्क'
(मन से परे) स्थिति को प्राप्त हो जाता है।
स्वरूप:
इस अवस्था को 'परब्रह्म' की स्थिति
कहा गया है, जो माया के प्रभावों से मुक्त, उत्पत्ति और विनाश से रहित तथा समस्त कल्पनाओं से परे है। इसे 'योग' के संदर्भ में 'समाधि'
भी कहा जाता है।
साधना
का आधार: इस स्थिति में साधक का मन 'गगन' (आकाश) के समान स्वच्छ और व्यापक हो जाता है। 'अमनस्क' योग में साधक 'सर्वारम्भ-परित्यागी'
(सभी सांसारिक कार्यों का त्याग करने वाला) होकर केवल आत्म-चिंतन
में लीन रहता है।
अवस्था:
यह वह अवस्था है जहाँ साधक स्वयं को अविनाशी और द्वंद्वों से परे अनुभव करता है, जहाँ न कोई लोक है, न वेद, न
माता-पिता और न ही कोई भेद-भाव।
नाद-बिंदु साधना
यह साधना ध्वनि (नाद) और एकाग्रता के केंद्र (बिंदु) के माध्यम से मन को लीन करने की एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है।
नाद
: 'लय' नाद
के आश्रित है। साधना का क्रम इस प्रकार बताया गया है: इंद्रियों का स्वामी मन है,
मन का स्वामी प्राण (मारुति) है, प्राण का
स्वामी लय है और लय नाद के आश्रित है। जब योगी 'अनाहत नाद'
में अपने चित्त को लगाता है, तो वह नाद में ही
विलीन हो जाता है।
बिंदु
(Bindu): बिंदु को शिव का स्वरूप माना गया है। साधना का मुख्य लक्ष्य बिंदु को
स्थिर करना है। गोरक्ष सिद्धांत संग्रह के अनुसार: "जब मन स्थिर होता है तो वायु (प्राण) स्थिर
होती है, और वायु के स्थिर होने से बिंदु स्थिर हो जाता है।
बिंदु की स्थिरता से ही पिंड (शरीर) की स्थिरता प्राप्त होती है"。
प्रणव
(ॐ) साधना: योगी 'बिंदु युक्त
ओंकार' (प्रणव) का नित्य ध्यान करते हैं। इस ओंकार के भीतर
ही वह परम तत्व स्थित है जिसे सद्गुरु प्रकाशित करते हैं।
साधना का महत्व और फल
जीवन्मुक्ति:
इन साधनाओं के माध्यम से योगी सुख-दुःख, भूख-प्यास
और काल (मृत्यु) के भय से मुक्त होकर 'जीवन्मुक्त' हो जाता है।
अजर-अमर
देह: खेचरी मुद्रा और नाद-बिंदु के अभ्यास से
बिंदु (अमृत) का क्षय रुक जाता है, जिससे योगी
का शरीर वज्र के समान सुदृढ़ और अजर-अमर हो जाता है।
परम
पद: जब मन संकल्प-विकल्प छोड़कर सर्वव्यापक 'परमनाथ' में विलीन हो जाता है, तब साधक स्वयं ब्रह्मस्वरूप होकर तीनों लोकों में इच्छानुसार विचरण कर
सकता है।
संक्षेप
में,
अमनस्क योग मानसिक शून्यता की स्थिति है, जबकि
नाद-बिंदु साधना उस शून्यता या लय को प्राप्त करने का माध्यम है।





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