निर्गुणं वामभागे च सव्यभागेद्भुता निजा।
मध्यभागे स्वयं पूर्णस्तस्मै नाथाय ते
नमः॥1
वामभागे स्थितः शम्भुः सव्ये विष्णुस्तथैव च।
मध्ये नाथः परं ज्योति तज्ज्योतिर्मत्तमो हरम्॥3
1. संक्षिप्त परिचय तथा
इतिहास
नाथ पंथ (जिसे सिद्ध-मत,
योग-मार्ग या अवधूत-मत भी कहा जाता है) भारतीय आध्यात्मिक परंपरा की
एक अत्यंत प्रभावशाली और प्राचीन धारा है। इस पंथ के आदि-प्रवर्तक स्वयं भगवान
शिव (आदिनाथ) माने जाते हैं, जिन्होंने लाखों वर्ष पहले
हिमालय के कांतिसरोवर के पास सप्तऋषियों को योग का सूक्ष्म ज्ञान दिया था।
ऐतिहासिक रूप से, पूर्व मध्यकाल में महायोगी
मत्स्येंद्रनाथ और उनके शिष्य गुरु गोरखनाथ ने इस परंपरा को पुनर्गठित
किया। गोरखनाथ ने तंत्र-साधना की जटिलताओं को हटाकर इसे 'योग
के स्वच्छ मार्ग' के रूप में स्थापित किया, जो जन-सामान्य के लिए सुलभ था।
2. नव नाथ और चौरासी
सिद्ध
नाथ पंथ में 'नौ नाथों' (Nav Naths) और 'चौरासी
सिद्धों' (Eighty-Four Siddhas) की अवधारणा अत्यंत
महत्वपूर्ण है।
- नौ नाथ:
इन्हें 'ईश्वर-संतान'
माना जाता है। मुख्य नामों में आदिनाथ, मत्स्येंद्रनाथ,
उदयनाथ, दंडनाथ, सत्यनाथ,
संतोषनाथ, कूर्मनाथ, जालंधरनाथ और गोरखनाथ शामिल हैं। गोरखनाथ को अक्सर इन नौ नाथों का
मूल या उनका अवतार माना जाता है।
- चौरासी सिद्ध:
यह परंपरा बौद्ध वज्रयान और सहजयान सिद्धों के साथ गहराई से जुड़ी है।
जालंधरनाथ, कान्हपा और
मत्स्येंद्रनाथ जैसे नाम दोनों सूचियों में समान रूप से पूजनीय हैं।
3. नाथ पंथ की शाखाएँ
(बारह पंथ)
गुरु गोरखनाथ ने पंथ को सुव्यवस्थित करने के लिए इसे बारह
शाखाओं में विभाजित किया, जिन्हें 'बारह पंथी' योगी कहा
जाता है। इनमें प्रमुख हैं:
- सत्यनाथी,
2. धर्मनाथी, 3. रामपंथ, 4. नटेश्वरी (लक्ष्मणनाथी), 5. कनहड़, 6. कपिलानी, 7. वैराग (भर्तृहरि), 8. माननाथी (गोपीचंद), 9. आईपंथ, 10. पागलपंथ, 11. ध्वजपंथ, और
12. गंगानाथी।
4. गुरु-शिष्य परंपरा
नाथ पंथ में गुरु का स्थान सर्वोच्च है। "गुरु कीजै गहिला, निगुरा न रहिला" के अनुसार बिना गुरु के
आत्म-ज्ञान संभव नहीं है। गुरु ही शिष्य के कान में मंत्र फूंककर और उसकी कुंडलिनी
जागृत कर उसे आध्यात्मिक पथ पर दीक्षित करता है। गोरखपुर का गोरखनाथ मंदिर
इस परंपरा का जीवंत केंद्र है, जहाँ महंतों की एक अटूट
श्रृंखला (जैसे महंत दिग्विजयनाथ, महंत अवेद्यनाथ और वर्तमान
में महंत योगी आदित्यनाथ) आज भी इस विरासत को आगे बढ़ा रही है।
5. गुरु गोरखनाथ द्वारा
रचित प्रमुख ग्रंथ
गोरखनाथ ने संस्कृत और लोकभाषा (हिंदी) दोनों में विशाल
साहित्य रचा:
- संस्कृत ग्रंथ: सिद्ध सिद्धांत पद्धति,
गोरक्ष संहिता, विवेक मार्तंड, अमनस्क, योग बीज और अमरौघशासनम्।
- हिंदी ग्रंथ (वाणी): सबदी, पद, प्राण संकली, नरवै
बोध, आत्मबोध और गोरखबानी।
6. दार्शनिक सिद्धांत:
पिंड-ब्रह्मांडवाद
नाथ दर्शन का मूल आधार पिंड-ब्रह्मांडवाद है, जिसके अनुसार "जो-जो पिंडे सो-सो
ब्रह्मांडे"। अर्थात, जो कुछ बाहरी ब्रह्मांड में है,
वह सब मानव शरीर (पिंड) के भीतर विद्यमान है। इनका दर्शन शिव
(शुद्ध चेतना) और शक्ति (ऊर्जा) के मिलन पर केंद्रित है, जिसे 'सामरस्य' कहा जाता है।
7. हठयोग, चक्र, नाड़ी और प्राण का विज्ञान
- नाड़ी:
शरीर में 72,000 नाड़ियाँ
हैं, जिनमें इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना
मुख्य हैं।
- चक्र:
रीढ़ के साथ स्थित नौ चक्रों
(मूलाधार से लेकर सहस्रार तक) का भेदन कर साधक परम पद प्राप्त
करता है।
- प्राण:
प्राणायाम के माध्यम से प्राण और अपान का निरोध कर सुषुम्ना मार्ग से कुंडलिनी
शक्ति को ऊपर ले जाया जाता है।
- हठयोग:
'ह' (सूर्य/प्राण) और 'ठ' (चंद्र/अपान) के योग को हठयोग कहते हैं।
8. कला, चित्रकला और चित्रकला (Art & Murals)
नाथ पंथ का प्रभाव भारतीय कला पर गहरा है:
- जोधपुर शैली:
महाराजा मानसिंह के काल में 'सिद्ध सिद्धांत पद्धति' और नाथों के जीवन पर
आधारित भव्य लघु चित्र और भित्ति चित्र बनवाए गए।
- प्रतीक चिन्ह:
कानों की मुद्रा (Mudra), श्रृंगी (Singi),
झोली और त्रिशूल जैसे तांत्रिक प्रतीकों का कलात्मक उपयोग
मंदिरों और मूर्तिकला में मिलता है।
9. चिकित्सा (रस
शास्त्र)
भारतीय चिकित्सा में रस चिकित्सा (Iatrochemistry) का विकास नाथ सिद्धों का बड़ा
योगदान है。 इन्होंने पारद (पारा) को शिव का वीर्य
और अभ्रक को शक्ति का प्रतीक मानकर उनसे औषधियाँ बनाने और 'दिव्य
देह' प्राप्त करने की विधियाँ खोजीं。
'रसरत्नाकर' और 'नागार्जुन
तंत्र' जैसे ग्रंथ इसी परंपरा की देन हैं।
10. प्रभाव और भारतीय
ज्ञान परंपरा में स्थान
- सामाजिक सुधार: नाथ पंथ ने वर्ण-व्यवस्था और ऊँच-नीच के भेदभाव को नकार
कर सामाजिक समरसता का संदेश दिया।
- साहित्यिक प्रभाव: कबीर, नानक और दादू जैसे निर्गुणी संतों की साधना पद्धति, उलटवासी शैली और पारिभाषिक शब्दावली (शून्य, अनहद
नाद) पर नाथ पंथ का अमिट प्रभाव है।





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