भारतीय आध्यात्मिक इतिहास की गलियों में जब हम 'कानफटा' योगियों की चर्चा करते हैं, तो मन में एक रहस्यमयी छवि उभरती है—गेरुआ वस्त्र, कानों में विशाल मुद्राएं और हाथ में खप्पर। लेकिन क्या ये केवल एक धार्मिक संप्रदाय के अनुयायी हैं? एक इतिहासकार की दृष्टि से देखें तो नाथ पंथ केवल धर्म नहीं, बल्कि शरीर और मन को जीतने का एक प्राचीन 'प्रायोगिक विज्ञान' है। यह पंथ वैदिक कर्मकांडों के बाह्य आडंबरों को त्यागकर अंतर्मुखी साधना और काया-कल्प की ओर मुड़ने का एक क्रांतिकारी पड़ाव था। आइए, नाथ योगियों की इस गूढ़ दुनिया के उन 7 सत्यों को उजागर करते हैं, जो आज भी शोधकर्ताओं को चकित कर देते हैं।
1. 'नाथ' शब्द का गहरा दार्शनिक अर्थ
नाथ पंथ में 'नाथ' केवल एक उपाधि नहीं, बल्कि
एक ब्रह्मांडीय स्थिति का परिचायक है। 'राजगुह्य'
और 'शक्ति संगम तंत्र' जैसे प्राचीन ग्रंथों में इस शब्द की व्याख्या अत्यंत सूक्ष्मता से की गई
है।
'नाथ' शब्द की दार्शनिक
व्याख्या
- 'ना' (अनादि रूप): वह तत्व जो आदि-अंत से रहित है, जो स्वयं ब्रह्म का बोध कराता है।
- 'थ' (त्रिलोक में स्थापित): वह शक्ति जो तीनों लोकों की
स्थिति का मूल कारण है और अज्ञान को रोकने में समर्थ है।
शक्ति संगम तंत्र
का प्रसिद्ध उद्धरण है: "श्री मोक्षानन्ददक्षत्वात् नाथ ब्रह्मानुबोधनात्। स्थगितज्ञान विभवत्वात्
श्रीनाथ इति गीयते॥" अर्थात्, वह तत्व जो मोक्ष देने में दक्ष है, ब्रह्म का साक्षात् बोध कराता है और अज्ञान के विभव (अंधकार) को रोक देता
है, वही 'नाथ' है।
सांस्कृतिक इतिहास के परिप्रेक्ष्य में यह भी रोचक है कि बंगाल
में 'नाथ' शब्द का प्रयोग बुनकर समुदाय के लिए भी किया जाता रहा है, जो इस पंथ के व्यापक सामाजिक और श्रम-सांस्कृतिक प्रभाव को दर्शाता है।
लेखक का विचार:
एक इतिहासकार के रूप में मैं देखता हूँ कि 'नाथ' शब्द गुरु और ईश्वर के बीच की दूरी को समाप्त
कर देता है। यहाँ गुरु स्वयं उस परम तत्व का साकार रूप है, जो
शिष्य के भीतर के अज्ञान को 'स्थगित' कर
उसे मोक्ष के योग्य बनाता है।
2. नवनाथ: नारायण के नौ
अवतार
नाथ परंपरा की एक सबसे चौंकाने वाली ऐतिहासिक विशेषता यह है कि
इसके नौ मुख्य नायकों (नवनाथों) को 'नवनारायण' का अवतार माना गया है। 'योगिसम्प्रदायाविष्कृति' के अनुसार, भगवान नारायण के नौ अंशों ने योग मार्ग के पुनरुद्धार हेतु अवतार लिया:
- कवि नारायण:
मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ)
- करभाजन नारायण: गहिनीनाथ
- अंतरिक्ष नारायण: जालंधरनाथ
- प्रबुद्ध नारायण: कनीपानाथ
इस ईश्वरीय अवतारवाद के पीछे एक अत्यंत गूढ़ कथा भी प्रचलित है:
"कहा जाता है कि जब प्रकृति देवी ने महादेव
को अपनी माया से छलने का प्रयास किया, तब शिव ने स्वयं को
अक्षुण्ण रखने के लिए 'गोरक्ष' नाम से
एक कृत्रिम पुतला (काया) निर्मित किया और उसमें प्रविष्ट हो गए। यही कारण है कि
गोरक्षनाथ को शिव का वह स्वरूप माना जाता है जिसे माया कभी पराजित नहीं कर
सकी।"
नवनाथों को नारायण का अवतार मानना यह सिद्ध करता है कि नाथ पंथ
ने कैसे शैव और वैष्णव धाराओं के बीच एक सेतु का कार्य किया। यह समन्वयवादी इतिहास
भारतीय दर्शन की महानतम उपलब्धियों में से एक है।
3. कानफटा परंपरा: कानों
में मुद्रा धारण करने का कठिन रहस्य
दीक्षा के समय योगी के कान के मध्य भाग को चीरकर उसमें भारी 'मुद्रा' (कुंडल) पहनाना
नाथ पंथ की सबसे कठोर परीक्षा है। 'क्षुरिकोपनिषद'
इस प्रक्रिया के महत्व को रेखांकित करता है।
- दीक्षा की कठोरता: कान छिदवाने के लिए 'क्षुरिका' (विशेष छुरी) का उपयोग होता है।
मान्यता है कि जो इस पीड़ा को सहकर योग सिद्ध करता है, वह
पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है।
- भाव-जोखा का व्यापार: यदि साधना के दौरान या किसी दुर्घटना में योगी का कान कट
जाए या फट जाए, तो उसे 'भाव-जोखा' (आध्यात्मिक दिवालियापन) माना
जाता है। ऐसा योगी संप्रदाय से बहिष्कृत कर दिया जाता है और वह अपनी समस्त
आध्यात्मिक प्रतिष्ठा खो देता है।
कान छिदवाना केवल शारीरिक कष्ट नहीं, बल्कि संसार के प्रति अपनी आसक्ति को 'काट' देने का प्रतीक है। 'भाव-जोखा'
का कठोर नियम यह बताता है कि इस मार्ग में अनुशासनहीनता के लिए कोई
स्थान नहीं है—यह अध्यात्म का एक अत्यंत कठिन व्यवसाय है।
4. हठयोग: सूर्य और
चंद्र का मिलन
नाथ पंथ ने विश्व को 'हठयोग' जैसा महान विज्ञान दिया। 'सिद्ध सिद्धांत पद्धति' के अनुसार, हठयोग का लक्ष्य 'समरसीकरण'
(Homogenization) है—जहाँ शरीर और आत्मा एकरूप
हो जाते हैं।
- 'ह' (सूर्य/पिंगला): दाहिनी नाड़ी, जो उष्णता का प्रतीक है।
- 'ठ' (चंद्र/इड़ा): बाईं नाड़ी, जो शीतलता का प्रतीक है। इन दोनों
ऊर्जाओं के संतुलन से ही 'सुषुम्ना' जागृत होती है।
षडंग योग (6
अंगों वाला योग):
- आसन:
शरीर को दृढ़ता प्रदान करना।
- प्राणायाम:
नाड़ी शुद्धि और आयु वृद्धि।
- प्रत्याहार:
इंद्रियों को बाह्य जगत से समेटना।
- धारणा:
चित्त को एकाग्र करना।
- ध्यान:
आत्म-स्वरूप में स्थित होना।
- समाधि:
मोक्ष की अंतिम अवस्था।
हठयोग ने भारतीय अध्यात्म को बाह्य कर्मकांडों से निकालकर शरीर
के भीतर की प्रयोगशाला में स्थापित किया। यह वैदिक युग के बाह्य यज्ञों से आंतरिक 'काया-यज्ञ' की ओर एक महान
क्रांतिकारी बदलाव था।
5. काया साधना: शरीर को
'वज्र' बनाने का विज्ञान
जहाँ अन्य दर्शन शरीर को 'नश्वर' कहकर त्यागने की बात करते हैं, नाथ योगी इसे 'साधना का साधन' मानते
हैं। उनका दर्शन है कि शरीर को योग की अग्नि में तपाकर 'अपरिपक्व'
(कच्चे) से 'परिपक्व' (पके
हुए) शरीर में बदलना।
- पिंड-ब्रह्मांड वाद: नाथों का मानना है—
"जो ब्रह्मांड में है, वही इस
पिंड (शरीर) में है।"
- दिव्य देह:
साधना के माध्यम से योगी अपने रक्त और वीर्य को ओज में परिवर्तित कर 'अजर-अमर' शरीर
प्राप्त करने का प्रयास करते हैं, जिसे 'वज्र देह' कहा गया है।
काया साधना का अर्थ केवल दीर्घायु होना नहीं, बल्कि मृत्यु के भय को जीत लेना है। एक
इतिहासकार के रूप में मैं इसे 'जैविक अध्यात्म'
(Biological Spirituality) मानता हूँ, जो
मनुष्य की असीमित शारीरिक क्षमताओं को उजागर करता है।
6. बारह पंथी: नाथ
संप्रदाय का विशाल संगठन
गुरु गोरक्षनाथ एक महान संगठनकर्ता थे। उन्होंने बिखरे हुए
योगियों, बौद्ध सिद्धों और
यहाँ तक कि जैन अनुयायियों को भी एक सूत्र में पिरोने के लिए 'बारह पंथों' का पुनर्गठन किया। मूलतः प्रचलित 18
शिव पंथों और 12 गोरक्ष पंथों के कुछ अंगों को
संयोजित कर वर्तमान 'बारह पंथी' व्यवस्था
बनाई गई।
प्रमुख पंथ और उनके मूल:
- सत्यनाथी:
ब्रह्मा का स्वरूप।
- धर्मनाथी:
धर्मराज युधिष्ठिर से प्रेरित (नेपाल क्षेत्र में सक्रिय)।
- आईपंथ:
भगवती विमला देवी द्वारा प्रवर्तित।
- पागल पंथ:
चौरंगीनाथ (पूरन भगत) से संबंधित।
गोरक्षनाथ ने विभिन्न मतों को मिलाकर जो संगठन खड़ा किया, वह भारत के मध्यकालीन इतिहास का सबसे बड़ा
सामाजिक और धार्मिक एकीकरण था। यह दर्शाता है कि योग किसी एक संप्रदाय की बपौती
नहीं, बल्कि सार्वभौमिक सत्य है।
7. प्रतीक चिन्हों का
मनोविज्ञान: 'गोरखधंधा' और 'सिंगी'
नाथ योगियों के वेश और प्रतीकों के पीछे गहरा मनोवैज्ञानिक
अर्थ छिपा है, जिसे प्रसिद्ध यात्री
इब्न बत्तूता ने भी अपनी भारत यात्रा के दौरान अचंभे के साथ नोट किया था।
- गोरखधंधा:
लकड़ी या लोहे की सलाखों से बना एक उलझा हुआ चक्र। यह 'संसार की माया' का
प्रतीक है। इसे सुलझाना योगी को यह सिखाता है कि कैसे ईश्वर की कृपा से इस
भवसागर के जाल से निकला जा सकता है।
- सिंगी (नाद):
हिरण के सींग या धातु की बनी एक सीटी,
जिसे जनेऊ में बांधा जाता है। इब्न बत्तूता ने उल्लेख किया था
कि योगी इसे भोजन और वंदना से पहले बजाते थे। यह 'अनहद
नाद' (भीतर की गूंज) का बाह्य प्रतीक है।
मत्स्येंद्रनाथ को शिव का ऐतिहासिक उपदेश:
"भस्म धारण करो ताकि पृथ्वी जैसा धैर्य आए।
ऊन का जनेऊ (नाद-जनेऊ) तुम्हें सांसारिक समाज से भिन्न और श्रेष्ठ आचरण की निरंतर
प्रेरणा देता रहे।"
नाथों का हर प्रतीक एक 'स्मृति-चिन्ह' है। 'सिंगी'
का बजना योगी को स्मरण दिलाता है कि संसार के कोलाहल के बीच उसे
अपने भीतर के मौन 'नाद' को सुनना है।
नाथ पंथ केवल गुफाओं और कंदराओं का दर्शन नहीं है, बल्कि यह स्वयं के विरुद्ध युद्ध छेड़ने और
स्वयं पर विजय पाने की एक अनूठी विद्या है। कानों के कुंडल से लेकर शरीर को वज्र
बनाने की प्रक्रिया तक, हर तत्व मनुष्य को उसकी असीम
संभावनाओं का परिचय कराता है।





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