मातः चन्दिर एकाकी

मातः चन्दिर एकाकी

कस्मात् गगने सञ्चरति ।

मातरं पितरं गृहं विहाय

रात्रौ सततं सञ्चरति ॥

वायुः वेगेन तं नयति

सूर्यः किरणैस्तापयति ॥

मेघो जलेन आर्द्रयति

न कोपि तं परिपालयति ॥

अम्ब चन्दिरमानयतु

अस्मद्गेहे स्थापयतु ।

तेन सहाहं क्रीडामि

खादामि पिबामि नन्दामि ॥

मेघो वर्षति मेघो वर्षति प्रवहति नीरम् ।

तुष्यति कृषिकः गच्छति गोष्ठम् ॥

नयति च वृषभं

हलमपि वहति ।

कर्षति क्षेत्रं

वपति च बीजम् ॥

रोहति सस्यं फलति प्रकामम् ।

भवति समृद्धिः मनुकुलवृद्धिः ॥

     लेखकः- जि. महाबलेश्वरभट्टः 

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राघव ! माधव ! सीते ! ललिते !

 राघव ! माधव ! सीते ! ललिते !

विमानयान रचयाम

राघव! माधव! सीते! ललिते!

विमानयानं रचयाम ।

नीले गगने विपुले विमले

वायुविहारं करवाम ।।1।।

उन्नतवृक्षं तुङ्गं भवनं

क्रान्त्वाकाशं खलु याम

कृत्वा हिमवन्तं सोपानं

चन्दिरलोकं प्रविशाम ।।2 ।।

शुक्रश्चन्द्रः सूर्यो गुरुरिति

ग्रहान् हि सर्वान् गणयाम

विविधाः सुन्दरताराश्चित्वा

मौक्तिकहारं रचयाम ।।3।।

अम्बुदमालाम् अम्बरभूषाम्

आदायैव हि प्रतियाम ।

दुःखित-पीडित-कृषिकजनानां

गृहेषु हर्षं जनयाम ।।4।।

लेखकः - डॉ. विश्वासः
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विचरसि वायो कुत्र ?

विचरसि वायो कुत्र ?

सर सर सर सर्

विचरसि वायो कुत्र ?

मामपि नय भोस्तत्र ॥ ध्रुवम्॥

 

        ग्रामे नगरे भुवि वा गगने

        अविशेषा तव गतिः ।

        दीने धनिके कुजने सुजने

        भेदविरहिता मतिः ॥ १॥

 

सुरभितकुसुमं कलुषितपङ्कं

समभावनया स्पृशसि ।

कुमुदामोदं दूषितधूमं

अविकलमनसा वहसि ॥ २॥

 

        धृतभाराणां कृतकार्याणां

        तनुतापं त्वं हरसि ।

        कन्दुकक्षेपण-केलिरतानां

        श्रममनुपदमपनयसि ॥ ३॥

                 लेखकः – डॉ. विश्वासः

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सरलभाषा संस्कृतं सरसभाषा संस्कृतम्

सरलभाषा संस्कृतं सरसभाषा संस्कृतम् ।

सरस-सरल-मनोज्ञ-मङ्गल-देवभाषा संस्कृतम् ॥

 

मधुरभाषा संस्कृतं मृदुलभाषा संस्कृतम् ।

मृदुल-मधुर-मनोह-रामृत-तुल्यभाषा संस्कृतम् ॥(अमृत)तुल्यभाषा संस्कृतम् ॥

 

देवभाषा संस्कृतं वेदभाषा संस्कृतम् ।

भेद-भाव-विनाशकं खलुदिव्यभाषा संस्कृतम् ॥

 

अमृतभाषा संस्कृतम्अतुलभाषा संस्कृतम् ।

सुकृति-जन-हृदि परिलसितशुभवरदभाषा संस्कृतम् ॥

 

भुवनभाषा संस्कृतंभवनभाषा संस्कृतम् ।

भरत-भुवि परि-लसितकाव्य-मनोज्ञ-भाषा संस्कृतम् ॥

 

शस्त्रभाषा संस्कृतंशास्त्रभाषा संस्कृतम् ।

शस्त्र-शास्त्र-भृदार्ष-भारत- राष्ट्रभाषा संस्कृतम् ॥

 

धर्मभाषा संस्कृतंकर्मभाषा संस्कृतम् ।

धर्म-कर्म-प्रचोदकं खलुविश्वभाषा संस्कृतम् ॥
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संस्कृतस्य रक्षणाय बद्धपरिकरा वयम्

 संस्कृतस्य रक्षणाय बद्धपरिकरा वयम् ।

संस्कृते: प्रवर्धनाय दृढनिधिर्भवेदिदम् ॥

 

संस्कृतस्य महिमवर्णनेन नास्ति साधितं

सततसम्भाषणेन तस्य जीवनं स्थिरम् ।

जनमुखेन भाषितं ननु जगति जीवितं

राजते चिरं समस्तराष्ट्र-मान्यतास्पदम् ॥

 

संस्कृतस्य सेवनं मातृसेवासमं

तेन सम्भाषणं वाङ्मातृपूजनम् ।

मातृभि: प्रवर्तनेन मातृभाषा परं

सरलसम्भाषणेन लसति बालादृतम् ॥

 

राजपोषणात् पुरा नीतमिदं वैभवं

लोकशक्ति-केन्द्रितं स्थास्यतीह केवलम् ।

शिक्षकास्तदर्थमेव त्यागशालिन: स्यु:

संस्कृतोज्जीवनाय प्राप्तजीवना ध्रुवम् ॥

           लेखक- गु. गणपय्यहोळ्ळः
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रचयेम संस्कृतभवनम्‌

रचयेम संस्कृतभवनम्‌

ग्रामे नगरे समस्तराष्ट्रे
रचयेम संस्कृत भवनम्‌
इष्टिकां विना मृत्तिकां विना
केवलसम्भाषणविधया
संस्कृतसम्भाषणकलया॥

               शिशुबालानां स्मितमृदुवचने
               युवयुवतीनां मञ्जुभाषेण
               वृद्धगुरूणां वत्सलहृदये
               रचयेम संस्कृतभवनम्‌ ॥1

अरूणोदयतः सुप्रभातम्‌
शुभरात्रिं निशि संवदेम
दिवानिशं संस्कृतवचनेन
रचयेम संस्कृतभवनम्‌ ॥2

               सोदर - सोदरी - भाव - बन्धुरं
               मातृप्रेमतो बहुजनरूचिरं
               वचनललितं श्रवणमधुरं
                रचयेम संस्कृतभवनम्‌ ॥3

मूलशिला सम्भाषणमस्य
हिन्दुजनैक्यं शिखरमुन्नतम्‌
सोपानं श्रवणादिविधानम्‌
रचयेम संस्कृतभवनम्‌ ॥4

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वन्दे त्वां भूदेवीमार्य-मातरम्

 वन्दे त्वां भूदेवीमार्य मातरं

जयतु जयतु पदयुगलं ते निरन्तरम् ॥ ध्रुवम्॥

 

शुभ्र-शरच्चन्द्र-युक्त-चारुयामिनीं

विकसित-नव-कुसुम-मृदुल-दामशोभिनीं

मन्दस्मितयुक्त-वदन-मधुरभाषिणीं

सुजलां सुफलां सरलां

शिववरदां चिरसुखदां

मुकुलरदामार्य मातरम् ॥ १॥

 

अगणितसंतानवृन्द-कण्ठनादिनीं

अमितभुजां धृतधरिणीं तनयतारिणीं

हिमनगजां स्वाभिमान-बुद्धिदायिनीं

कमलाम् अमलाम् अतुलां

रिपु-दलिनीं बलकरणीं

धृतनलिनीं राष्ट्रमातरम् ॥ २॥  वन्दे त्वां..

 

धर्मस्त्वं शर्म त्वं त्वं यशोबलं

शक्तिस्त्वं भक्तिस्त्वं कर्म चाखिलं

प्रतिसदनं प्रतिमा ते त्वं महाबलं

धरणीं भरणीं जननीं

कविप्रतिभां नतसुलभां 

जगदम्बां देशमातरम् ॥ ३॥ वन्दे त्वां..

                                                                
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Sarasvati shodha sansthan,Lucknow

3. सरस्वती शोध संस्थान -
इस संस्थान का पुस्तकालय सुरेन्द्र नगर, चिनहट में अवस्थित है। इस पुस्तकालय की स्थापना प्रो0 उमारमन झा ने किया, जो इसके निदेशक थे। आप राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान, मानित विश्वविद्यालय, (सम्प्रति केन्द्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय) लखनऊ परिसर के पूर्व प्राचार्य थे। इन्होंने अपने ही आवासीय परिसर के एक भाग में लोकोपकार तथा भाषाई प्रचार प्रसार हेतु निज को अर्पित कर दिया था। यह पुस्तकालय यद्यपि प्रारभिक अवस्था में है फिर भी गुणवत्ता की दृष्टि से पुस्तकों का संकलन बेजोड़ है। प्रो0 झा आने वाले शोधार्थियों को बहुत ही मनोयोग पूर्वक मार्ग निर्देशन करते रहते रहे। यहाँ लगभग 5,000 पुस्तकें, शोध पत्रिकाएँ, शोधप्रबंध, विभिन्न संस्कृत सम्मेलनों के शोधलेख तथा पाण्डुलिपियों के विवरणात्मक सूची, कोश आदि उपलब्ध हैं। इस पुस्तकालय का भविष्य अब अधर में है।

जिसका विवरण निम्नानुसार हैं -
वेद
50
कोष
65
तन्त्रशास्त्र
230
रामायण
30
व्याकरण
176
साहित्य
300
महाभारत
70
धर्मशास्त्र
105
दर्शन
360
मैथिली साहित्य
132
शोध प्रबन्ध
85
ज्योतिष
31
शास्त्र संग्रह
200
न्याय दर्शन
111
गीता
24
अभिनन्दन ग्रन्थ
56
साहित्य
587
कैटलाग
30
हिन्दी साहित्य
100
आलइण्डिया ओरिय0 कान्फ्रेन्स
25
पुराण
36


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Akhil Bhartiya Sanskrit Parishd,Lucknow

अखिल भारतीय संस्कृत परिषद्‌ :- परिचय तथा इतिहास
इस परिषद्‌ के पुस्तकालय की स्थापना सन्‌ 1958 में की गई। इससे अनेक गणमान्य विद्वज्जनों का जुड़ाव रहा है। इसका एक स्वर्णिम इतिहास है। प्रो0 सुब्रह्मण्य अय्यर, डॉ0 सत्यव्रत सिंह, डॉ0 अतुल चन्द्र बनर्जी, डॉ0 हेमचन्द्र जोशी तथा डॉ0 मंगलदेव शास्त्री के पुस्तकीय संग्रह से संपोषित एवं विभिन्न माध्यमों से प्राप्त इस पुस्तकालय में दुष्प्राप्य या अप्राप्य लगभग 18000 ग्रन्थ संकलित है। यहां लगभग 15000 महत्वपूर्ण और प्राचीन पाण्डुलिपियां हैं। कुछ पाण्डुलिपियां 600 वर्ष से अधिक पुरानी हैं। लगभग 2500 पाण्डुलिपियां शारदालिपि में है। पुस्तकालय के लगभग 5,000 हस्तलिखित ग्रन्थों की विवरणात्मक सूची पाँच खण्डों में प्रकाशित हो चुकी है। परिषद्‌ द्वारा प्रकाशित पुस्तिका ''संघर्षों उपलब्धियों की कहानी में'' इसका पूरा परिचय प्रदान किया गया है। यहां पर श्री रमेश श्रीवास्तव कार्यरत हैं। इसका पता है-
अखिल भारतीय संस्कृत परिषद्‌
सेक्टर बी0, अलीगंज, लखनऊ
फोन-0522-2333962,4045295
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U.P.sanskrit sansthana, Lucknow Library

  1. उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान पुस्तकालय :- परिचय तथा इतिहास
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में संस्कृत, पाली तथा प्राकृत भाषा के पुस्तकालय हैं:- उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान पुस्तकालय, अखिल भारतीय संस्कृत परिषद्‌ का पुस्तकालय तथा सरस्वती शोध संस्थान, सुरेन्द्र नगर, लखनऊ का पुस्तकालय । इन पुस्तकालयों में सामान्य जिज्ञासुओं से लेकर बुद्धिजीवियों तक के लिए अध्ययन सामग्री प्रचूर मात्रा में उपलब्ध है । आपमें यदि 5000 वर्षों तक के चिन्तन परम्परा के समृद्ध रूप को एकत्र देखने और पढने की ललक हो, भारत के प्राचीन साहित्य, धर्म, संस्कृति, रंगकर्म, शिल्प, गणित, आयुर्विज्ञान, भाषायी तथा साहित्यिक इतिहास के प्रति जिज्ञासा हो तो ये पुस्तकालय आपके लिए उपयुक्त होगें। यहां बैठकर संस्कृत भाषा सीख सकते हैं तथा इसके द्वारा तमाम ग्रन्थों को मूल रूप में पढ भी सकते हैं ।
      ये पुस्तकालय जन सामान्य संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार हेतु दृढ़ संकल्पित है। इन पुस्तकालयों का क्रमशः परिचय इस प्रकार है।

1. उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान पुस्तकालय :- परिचय तथा इतिहास
      यह पुस्तकालय लखनऊ के न्यू हैदराबाद में अवस्थित है। इसकी स्थापना 16 जून 1978 को की गई। रायल होटल के एक छोटे से कक्ष से प्रारम्भ होकर आज यह बहुत ही विशालकाय हो चुका है। न्यू हैदराबाद में यह पुस्तकालय सन्‌ 1983 से संचालित हुआ। अनेक पुस्तकदाताओं के सहयोग, क्रय, पुरस्कार द्वारा प्राप्त तथा विभिन्न संस्थाओं से निःशुल्क प्राप्त पुस्तकों से समृद्ध इस पुस्तकालय में सम्प्रति लगभग 20,000 पुस्तकें हैं।
      पुस्तकालय के सुलभ संचालन हेतु इसे तीन भागों में विभक्त किया गया है। (क) संस्कृत, पाली तथा प्राकृत भाषा की पुस्तकें।
                        
2. राजा राम मोहनराय पुस्तकालय प्रतिष्ठान द्वारा पुस्तकीय सहायता प्राप्त बाल पुस्तकालय
3. शोध पत्रिका तथा पाण्डुलिपि का विभाग
इस पुस्तकालय में पाण्डुलिपियों का एक अलग विभाग है, जिसमें लगभग 8000 दुर्लभ पाण्डुलिपियाँ संरक्षित है। इनमें से लगभग 5,000 पाण्डुलिपियों की विवरणिका तैयार कर 'पाण्डुलिपि विवरणिका' नाम से प्रकाशित किया गया है।
यह पुस्तकालय शोधार्थियों के लिए अद्यतन सामग्री उपलब्ध कराता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता अधुनान्त प्रकाशित मौलिक साहित्यों का संकलन तथा संस्कृत भाषा पर आधारित कम्प्यूटर द्वारा पुस्तक खोज प्रणाली का साफ्टवेयर है। इस पुस्तकालय में देश के विभिन्न भाग से शोधार्थी जन आते रहते हैं। विशेषतः लखनऊ के आस-पास स्थित विश्वविद्यालयों के शोधार्थी, प्रबुद्ध नागरिक, विशिष्ट विद्वान्‌ लाभान्वित होते हैं। इस पुस्तकालय में दो कर्मचारी कार्यरत हैं।           1. सहायक पुस्तकालयाध्यक्ष -श्री जगदानन्द झा तथा 2. जेनीटर -श्री पृथ्वी पाल
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