राग का ऋतु वसन्त


भारतीय वर्ष का अंत और आरंभ दोनों वसन्त से होता है। इसे मधुऋतु,, मधूलिका, ऋतुओं की रानी, ऋतुराज, आदि अनेक नामों से पुकारा जाता है। इस ऋतु में मिठास तो है ही मधु का उत्पादन भी प्रभूत मात्रा में होता है,जिसे पीकर ऋषिगण इसकी प्रशंसा में अनेक गीत गाते रहे। संस्कृत में यह पुल्लिंग है तो हिन्दी में स्त्री।
 

 वसन्त को ऋतुराज अर्थात् सर्वश्रेष्ठ ऋतु माना गया है। माघ माह की शुक्ल पंचमी से वसन्त ऋतु आरंभ होती है। अतः उसी दिन को ’वसंत पंचमीअथवा श्री पंचमीके रूप में सम्पूर्ण भारत में बड़े उत्साह से मनाया जाता है। ग्रीष्म विराग का और वसन्त राग का ऋतु है। सज-धज का निकल पड़ता है।  
            इस ऋतु में प्रकृति सोलह कलाओं से खिल उठती है। जैसे युवावस्था मानव जीवन का बंसत है, उसी प्रकार इस सृष्टि की युवावस्था बसंत ऋतु है। इस मौसम में प्रकृति में ऐसा जादू उजागर होता है, मानो प्रकृति देवी ने स्वयं आकर पूरी धरती का अपने हाथों से श्रृगांर किया हो। 
श्रावण की हरियाली हेमंत व शिशिर में वृद्धा के समान हो जाती है तब बसंत ऋतु में धरती नववधू की भाँति श्रृंगार करके खिल उठती है। मानो पूरी धरती ने पीली चादर ओढ़ रखी हो। किसान भी हर तरफ फैला सरसों रूपी पीला सोना देखकर प्रफुल्लित होते हैं। महर्षि वाल्मीकिने रामायण में बसंत का वर्णन किया है, तो भगवान श्री कृष्ण ने गीतामें ऋतूनाम् कुसुमाकरःकहकर ऋतुराज बसंत को अपनी विभूति कहा है।
इस दिन सरस्वती देवी का पूजन किया जाता है तथा इसे ज्ञान के महापर्व के रूप में मनाया जाता है। इस दिन भगवती सरस्वती का अविर्भाव हुआ था ऐसा पुराणों में उल्लेख मिलता है। वे ही वि़द्या, बुद्वि और ज्ञान की देवी है। ऋग्वेद के 10/125 सूक्त में इनके असीम प्रभाव का वर्णन है- प्रणो देवी सरस्वती वार्जेभिर्वजिनीवती धीनामणित्रयवतु।
    प्राच्य विद्या के ग्रन्थों के अवलोकन से ज्ञात होता है कि सोम, अग्निष्टोम आदि अनेक प्रकार के याग का आरम्भ वसन्त ऋतु से ही होता था। शतपथब्राह्मणम् के काण्डम् 2 अध्यायः 1 ब्राह्मण 3 के मंत्र 1 में 6 ऋतुओं के नामोल्लेख में वसन्त का नाम सर्वप्रथम आया आया है।

वसन्तो ग्रीष्मो वर्षाः । ते देवा ऋतवः शरद्धेमन्तः शिशिरस्ते पितरो य एवापूर्यतेऽर्धमासः स देवा योऽपक्षीयते स पितरोऽहरेव देवा रात्रिः पितरः पुनरह्नः पूर्वाह्णो देवा अपराह्णः पितरः ।
यहाँ पर वसन्त की महिमा गायी गयी है। वसन्त को ब्रह्म कहा गया है। वसन्त का जो सेवन करता है वह ब्रह्मवर्चस् होता है। ब्रह्मैव वसन्तः । क्षत्रं ग्रीष्मो विडेव वर्षास्तस्माद्ब्राह्मणो वसन्त आदधीत ब्रह्म हि वसन्तस्तस्मात्क्षत्रियो ग्रीष्म आदधीत क्षत्रं हि ग्रीष्मस्तस्माद्वैश्यो वर्षास्वादधीत विड्ढि वर्षाः - 2.1.5.5
स यः कामयेत । ब्रह्मवर्चसी स्यामिति वसन्ते स आदधीत ब्रह्म वै वसन्तो ब्रह्मवर्चसी हैव भवति - 2.1.3.[6]
    वैखानसगृह्यसूत्रम् के तृतीय खण्ड में ब्रह्मवर्चस् , आयुष्य तथा धन धान्य की कामना रखने वाले ब्राह्मण को वसन्त ऋतु में उपनयन संस्कार करने को कहा गया गया है।
अथ गर्भाधानादिवर्षे पञ्चमे ब्रह्मर्चसकामम् आयुष्काममष्टमे नवमे वा श्रीकामं वसन्ते ब्राह्मणमुपनयीत ॥ 1 ॥ ब्रह्मवर्चस् प्राप्त करने की प्रक्रिया उपनयन संस्कार से आरम्भ होती है। अतः इसी ऋतु में उपनयन संस्कार पूर्वक वेदारम्भ किया जाता है। विना उपनयन संस्कार किये वेदाध्ययन की अनुमति नहीं है।
प्राचीन काल से ही सरस्वती की कृपा पाने के लिए विद्यारम्भ संस्कार इस दिन करवाने की मान्यता है। वेद में कहा गया है- वसन्ते ब्राह्मणमुपनीयात्। ऋग्वेद में सरस्वती की वन्दना की गयी है और उन्हें विद्या की देवी के रूप में माना गया है।
            सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि।
            विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्विर्भवतु मे सदा।।
            इस दिन को सरस्वती के जन्मदिन के रूप में जाना जाता है अतः इसे वागीश्वरी जयंती व श्री पंचमी भी कहा जाता है। श्री सौदन्दर्य है और ऐश्वर्य भी।
             वासंती अथवा पीले रंग का इस दिन विशेष महत्व है। यह रंग परिपक्वता का प्रतीक है। स्त्रियाँ पीले वस्त्र धारण करती है। घरों में पीला भोजन बनाया जाता है। हल्दी का तिलक लगाया जाता है। इसे सुहाग का पर्व भी कहा जाता है। इस दिन कामदेव की भी पूजा होती है। इस माह को मधुमास भी कहा जाता है। शुक्र के प्रभाव के कारण यह अवधि कामोद्दीपक होती है। कालिदास ने ऋतुसंहार 6/2 में कहा है-  सर्वं प्रिये चारूतरं वसन्ते । 
कई नाटकों में मदनोत्सव के प्रमाण भी मिलते है जैसे रत्नावलीआदि।
             इसके अतिरिक्त इस दिन से ही होलिका के लिए लकड़ियाँ एकत्रित करनी आरंभ हो जाती है तथा धमार आदि होली के गीत गाना आरम्भ हो जाता है। इन गीतों से हंसी-खुशी ,मस्ती, उल्लास, उमंग के साथ किसानों के जीवन में नयापन आ जाता है। कई स्थानों में पतंगबाजी-प्रतिस्पर्धा का आयोजन होता है और  घरों में भी पतंगे उड़ाई जाती है।
            मथुरा, वृदावन में राधा कृष्ण वसंतोत्सव बहुत धूमधाम से मनाया जाता है। मंदिरों में बसंती भोग लगाए जाते हैं तथा बसंत के राग गाये जाते है।
            देवताओं का दिन अर्थात् सूर्य के उत्तरायण का काल भी आज से ही आरंभ होता है। इस पर्व का काल स्वंय इतना शुभ है अतः इसका आध्यात्मिक, धार्मिक तथा वैदिक दृष्टियों से अति विशिष्ट महत्व परिलक्षित होता है।
            परंतु यदि वसंत हमारे भीतर के राग का रूपक है तो उसे पृथ्वी पर सुरक्षित रखना भी हमारा कर्तव्य है। आधुनिकता, औद्योगिकता, कृत्रिमता के इस युग में वसंत ऋतु के उसी सौन्दर्य को समझना होगा जो जीवन-दृष्टि पुरातन ऋषियों द्वारा हमें प्रदान की गई थी। 
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1 टिप्पणी:

  1. सर्वं चारुतरं वसन्तम्। वसन्त के महत्त्व को आपने अत्यन्त सारगर्भित रूप में प्रस्तुत किया और उपयोगी सामग्री उपलब्ध करवायी

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