जलवायु परिवर्तन के कारण एवं इसके दुष्परिणाम


ऊर्जा आज की आवश्यकता है परन्तु यह ऊर्जा हमारे लिए कल्याण कारक हो। वेद की इस ऋचा को देखें- पावको अस्मभ्यं शिवो भव अग्ने पावका रोचिषा। सन् 2030 तक ऊर्जा की मांग 50 प्रतिशत तक बढ़ सकती है, जिसमें भारत और चीन की जरूरत सबसे ज्यादा होगी। जीवाश्म ईंधन, कोयला,तेल,प्राकृतिक गैस के जलने से वायुमंडल में कार्वन का उत्सर्जन होता है। ग्रीन हाउस में गैस के सघन होने से धरती गर्म होती है तथा वैश्विक ताप में वृद्धि होती है। वैश्विक ताप के कारण जलवायु में परिवर्तन तेजी से हो रहा है। वर्षा, हवा, तापमान में वृद्धि के कारण ऋतु चक्र अनियमित हो उठता है। भारत का 60 प्रतिशत कृषि क्षेत्र वर्षा पर आधारित है। ऋतु चक्र में बदलाव के कारण अर्थव्यवस्था पर गम्भीर प्रभाव पडता है। संसाधनों के दोहन की रफ्तार अगर यही रही तो समुद्रों से मछलियां गायब हो जाएंगी। 250 वर्ष के विश्व इतिहास ने यह सिद्ध कर दिया है कि अत्यधिक भोग ने भूमि का दोहन अंतिम सीमा तक कर लिया है। जिस मशीनी युग का विकास व्यक्ति के सुख के लिए किया गया है, वहीं उसके दुःख का कारण बन गया है।
            ऋतु चक्र में परिवर्तन का प्रभाव दूरदराज तक गांवों, खेत-खलिहानों के कृषि पर पड़ रहा है, कम पानी और रासायनिक खादों के बिना पैदा होने वाली परंपरागत रूप से उत्पादित फसलों का नामो-निशान तक मिट गया है। कई फसलें समाप्त हो चुकी हैं और उसकी जगह नई फसलों ने ले लिया है. इनमें बड़ी मात्रा में रासायनिक खादों, कीटनाशकों, परिमार्जित बीजों और सिंचाई की जरूरत पड़ती है। इससे खेती का खर्च बढ़ा है और खेती के तरीके में बदलाव आया है। इसका सीधा असर ग्रामीण कृषक समाज के जीवन स्तर और रहन-सहन पर पड़ रहा है। खेती घाटे का सौदा बनने के चलते किसान अन्य धंधों की ओर जाने को विवश हुआ है। खेती में उपज तो बढ़ी लेकिन लागत कई गुना अधिक हो गई, जिससे अधिशेष यानी, माजिर्न का संकट पैदा हो गया। गर्मी, जाड़े और बरसात के मौसम में कुछ फेरबदल से फसलों की बुबाई, सिंचाई और कटाई का मौसम बदला और जल्दी खेती करने के दवाब में पशुओं को छोड़ मोटर चालित यंत्रों पर निर्भरता आई. इनका परिणाम हुआ कि खेती घाटे का सौदा हो गया. अब हर परिवार को खेती के अलावा कोई दूसरा काम करना मजबूरी हो गई।
            मानसून के समय में बदलाव की वजह से 51 प्रतिशत तक कृषि भूमि प्रभावित हुई। तापमान के बढ़ने से रबी की फसलों का जब पकने का समय आता है, तब तापमान में तीव्र वृद्धि से फसलों में एकदम बालियां आ जाती है। इससे गेहूँ व चने की फसलों के दाने बहुत पतले होते है व उत्पादकता घट जाती है।
            तापमान में 1 प्रतिशत वृद्धि की से 20 प्रतिशत तक गेहूँ की ऊपज कम हो जाती है। इससे कीटरोधी उपायों को तो झटका लगता ही है, फसल रूग्णता भी बढती है। जलवायु परिवर्तन के चलते विकसित देश आस्ट्रेलिया और स्पेन भी खाद्य सुरक्षा के संकट से दो-चार हो रहे हैं। आस्ट्रेलिया में कुछ साल पहले जो अकाल पड़ा था, उसकी पृष्ठभूमि में औद्योगिक विकास के चलते बड़े तापमान की ही भूमिका जताई गई है। इस वजह से यहां गेहूं का उत्पादन 60 फीसदी तक घट गया है। अर्थात् भारत समेत दुनिया को एक समय बड़ी मात्रा में गेहूं का निर्यात करने वाला देश खुद भुखमरी की चपेट में आ गया है। स्पेन में 40 लाख लोगों पर भूख का साया गहरा रहा है। वैश्विक तापमान के चलते 36 विकासशील और 21 अफ्रीकी देशों पर भूख की काली छाया मंडरा रही है। इन परिस्थितियों को हमारे ऋषि बहुत पहले जानते थे। अतः वे आकाश, अंतरिक्ष, पथ्वी, जल, ओषधि, वनस्पति की शान्ति की बात करते थे। द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष ँ शान्तिः पृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः। वनस्पतयः शान्तिर्विश्वे देवाः शान्तिर्ब्रह्म शान्तिः सर्वं शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सा मा शान्तिरेधि।। (यजु. 36/17)
            यदि समय रहते तापमान वृद्धि पर नियंत्रण न पाया गया तो खतरनाक वन आग, बाढ,सूखे जैसे प्राकृतिक दुष्प्रभाव का और सामना करना पड सकता है। ऊर्जा उत्पादन में भारत की प्रथम प्राथमिकता सौर तथा पवन ऊर्जा होनी चाहिए। आशा है पेरिस में 122 देशों का जो सौर गठबंधन हुआ है, वह मिलकर काम करेगा।
पानी
            जलवायु परिर्वतन से शुद्ध पानी का भयानक संकट छा जाएगा। । विश्व का 40 प्रतिशत मीठा पानी वर्तमान में पीने योग्य नहीं रह गया है। नदियों और झीलों से पानी का दोहन सन् 1960 के मुकाबले दो गुना बढ़ चुका है।
            विश्व के दो लाख लोग प्रतिदिन गांवों या छोटे शहरों से बड़े शहरों की ओर जा रहे हैं। इससे भी पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है। ताजा पानी का भंडार 55 फीसदी घट चुका है और समुद्री जीवन भी घटकर एक-तिहाई ही रह गया है। ये सभी तथ्य एक खतरनाक भविष्य की ओर इशारा करते हैं,
 वर्षाचक्र में बदलाव, बाढ़, तूफान और भूस्खलन के चलते ज्यादातर शुद्ध जल के स्रोत दूषित होते जा रहे हैं। परिणामतः इस दूषित पानी के उपयोग से डायरिया व आंखों के संक्रमण का खतरा बढ़ गया है। वैसे भी दुनिया में पानी की कमी से हर दस में चार लोग पहले से ही जूझ रहे हैं। डायरिया से हरेक साल 18 लाख मौतें होती हैं। मौसम में आए वर्तमान बदलावों ने पानी और मच्छर जैसे संवाहकों द्वारा डेंगू और मलेरिया जैसी संक्रामक बीमारियों के खतरे उत्पन्न कर दिए हैं। 2006 में भारत में डेंगू के 10 हजार मामले सामने आए थे, जिनमें से दो सौ लोग मारे भी गए थे। हमारे ग्रन्थ इस समस्या से समाधान का मार्ग दिखाते हैं। अथर्ववेद में पृथिवी पर शुद्ध पेय जल के सर्वदा उपलब्ध रहने की ईश्वर से कामना की गयी है- शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु यो न: सेदुरप्रिये तं नि दध्म:। पवित्रेण पृथिवि मोत् पुनामि॥ यजुर्वैदिक ऋषि शन्नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शन्योरभिस्त्रवन्तु न: कहकर शुद्ध जल के प्रवाहित होने की कामना करते हैं।
अपो याचामि भेषजम्। अथर्ववेद 1.5.4
जल ओषधि है।
ता जीवला जीवधन्याः प्रतिष्ठाः। अथर्ववेद 12.3.25
जल जीवन शक्तिप्रद, जीवहितकारी, और जीवन का आधार है।
समुत्पतन्तु प्रदिशो नभस्वती। अथर्ववेद 4.15.1
जल को किसी भी प्रकार से दूषित होने से बचाना है। पुराणों में गंगा के किनारे दातुवन करने तक को मना किया गया। आज इस पवित्र नही में मानव मल तथा कारखाने का विषैला जल प्रवाहित करने में संकोच नहीं होता। कहाँ से कहाँ आ गये हम।
न दन्तधावनं कुर्यात् गंगागर्भे विचक्षणः।
परिधायाम्बराम्बूनि गंगा स्रोतसि न त्यजेत्।। ब्रह्म पुराण


वायु
आज वायु प्रदूषण के कारण अस्थमा जैसे अनेक रोग बढ़ते जा रहे हैं। इंधन के अंधाधुंध प्रयोग हमें मौत के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। आक्सीजन कन्सीटेचर, आक्सीजन सेलेंडर से बाजार पट चुका है। हम जिस नारकीय जीवन की सृष्टि में लगे हैं उसके हम ही दोषी हैं। यदि हम ऋग्वेद के इस मंत्र का मनन किये होते तो आज हमारी यह दुर्दशा नहीं होती।
'वात आ वातु भेषजं शंभू, मयोभु नो हृदे। प्राण आयुंषि तारिषत्'- ऋग्वेद (10/186/1)
शुद्ध ताजी वायु अमूल्य औषधि है जो हमारे हृदय के लिए दवा के समान उपयोगी है, आनन्ददायक है। वह उसे प्राप्त कराता है और हमारे आयु को बढ़ाता है।

जंगल
            कार्बन डाइऑक्साइड सोखने वाले सारे जंगल उजड़ते जा रहे हैं। सन् 1970 से 2002 के बीच पृथ्वी पर से जंगल का प्रतिशत 12 फीसदी कम हो गया है। 
जलवायु परिवर्तन का स्वास्थ्य पर सीधा प्रभाव मौसम की अतिशय घटनाओं खासकर लू, बाढ़, सूखे और आंधी की बढ़ती आवृति और तीव्रता की वजह से पड़ रहा है। संक्रामक रोगों के स्वरूपों में बदलाव, वायु प्रदूषण, खाद्य असुरक्षा एवं कुपोषण, अनैच्छिक विस्थापन और संघर्षों से अप्रत्यक्ष प्रभाव भी पैदा हो रहे हैं।
प्राकृतिक आपदा
बढ़ते तापमान से हिमखंडों में जो पिघलने की शुरुआत हो चुकी है, उसका खतरनाक दृश्य भारत, बंगलादेश आदि देशों में देखने को मिल रहा है। बांग्लादेश तीन नदियों के डेल्टा पर आबाद है। बांग्लादेश वर्ष 2080 तक इस देश के समुद्र तटीय इलाकों में रहने वाले पांच से 10 करोड़ लोगों को अपना मूलक्षेत्र छोड़ना होगा। बांग्लादेश के ज्यादातर भूखंड समुद्र तल से महज 20 फीट की ऊंचाई पर स्थित हैं, बर्फ की शिलाओं के पिघलने से समुद्र का जलस्तर उपर उठेगा तो सबसे ज्यादा जलमग्न भूमि इसी देश की होगी। यहां आबादी का घनत्व भी सबसे ज्यादा है, इसलिए मानव त्रासदी भी इस देश को ही ज्यादा झेलनी होगी। एक अनुमान के मुताबिक 2050 तक बांग्लादेश में धान की पैदावार 10 प्रतिशत और गेहूं की 30 प्रतिशत तक घट जाएगी।
बांग्लादेश के समुद्र तटीय बाढ़ के कारण कृषि भूमि में खारापन बढ़ रहा है। नतीजतन धान की खेती  बर्बाद हो रही है। ऐसे अनुमान हैं कि इस सदी के अंत तक बांग्लादेश का एक चैथाई हिस्सा पानी में डूब जाएगा। मोजांबिक से तवालू और मिश्र से वियतमान के बीच भी जलवायु परिवर्तन से ऐसे ही हालात निर्मित हो जाने का अंदाजा है।
दुनियाभर में 2050 तक 25 करोड़ लोगों को अपने मूल निवास स्थलों से पलायन के लिए मजबूर होना पड़ेगा। जलवायु बदलाव के चलते मालद्वीप और प्रशांत महासागर क्षेत्र के कई द्वीपों को समुद्र लील लेगा। इसी आसन्न खतरे से अवगत कराने के लिए ही मालद्वीप ने कॉर्बन उत्सर्जन पर नियंत्रण के लिए समुद्र की तलहटी में एक परिचर्चा आयोजित की थी। समुद्र के भीतर यह आयोजन इस बात का संकेत था कि दुनिया नहीं चेती, तो मालद्वीप जैसे अनेक छोटे द्वीपों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। आश्चर्य की बात है, जिस भारतीय समाज में पृथ्वी आदि पंचमहाभूतों को देवता की उपाधि से विभूषित कर वर्षो तक पूजा की गयी तथा जिन संस्कृत के ग्रन्थों ने हरे पेड़ को काटना पाप कहा, वह भी अपने अस्तित्व के लिए जूझ रहा है। अथर्ववेद का ऋषि पृथिवी पर शुद्ध पेय जल के सर्वदा उपलब्ध रहने की ईश्वर से कामना की गयी है-शुद्धा न आपस्तन्वे क्षरन्तु यो नः सेदुरप्रिये तं निदध्मः। पवित्रेण पृथिवि मोत् पुनामि।। आवश्यकता है समय रहते संस्कृत के ग्रन्थों से प्रेरणा लेकर हमें अपनी जीवन पद्धति को बदल लेने की। अंत में मध्य देश में बहने वाली सरस्वती पवित्र बनाने वाली, पोषण देने वाली बुद्धिमत्तापूर्वक ऐश्वर्य प्रदान करने वाली देवी सरस्वती ज्ञान और कर्म से हमारे यज्ञ को सफल बनायें ।
पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती । यज्ञं वष्टु धियावसुः ॥ ऋग्वेद 

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