सोमवार, 8 अक्तूबर 2018

Facebook पर व्यक्त मेरे विचारों का संकलन

7 October at 21:58
ज्ञानं भारः क्रियां विना। संस्कृत पढ़े लोगों को जब कहीं छोटी सी नौकरी में भी नहीं मिलती तो यह सूक्ति सार्थक लगती है। संस्कृत पढ़ कर न तो बिजली का कोई काम कर सकता। मैं गाड़ी मरम्मत का। आखिर कौन सा काम कराने के लिए संस्कृत पढ़े लिखे लोगों को कोई रखेगा। संस्कृत की पुस्तकों में जो कुछ लिखा है उसकी आज रोजगार परक कोई उपयोगिता नहीं है।
Rajkamal Goswami शिक्षे तुम्हारा नाश हो तुम नौकरी के हित बनी !
मैथिली शरण गुप्त ने कभी मैकॉले की शिक्षा व्यवस्था पर यह टिप्पणी की थी ! संस्कृत को लेकर आप का दु:ख न्यायसंगत है किंतु अंग्रेजी को छोड़ कर सभी देशज भाषायें इसी गति को प्राप्त हैं ! भाषायें ज्ञान की संवाहक होती हैं , आज के युग का ज्ञान अंग्रेजी में अभिव्यक्ति पा रहा है ! अत: संस्कृत को अंग्रेजी को साथ ले कर चलना पड़ेगा ! संस्कृत का जो सम्मान देश के बाहर है वह भारत में कम पाया जाता है किन्तु वहाँ संस्कृत रोमन लिपि में भी लिखी जाती है जो वहाँ अधिक बोधगम्य है ! अभी एक उर्दू वाले से चर्चा हो रही थी, वह भी दुखी थे । उनका कहना था,
जिनमें उर्दू सोई है लफ्ज़ों की चादर तान कर ।
कुछ दिनों में उन किताबों के कवर रह जायेंगे !
संस्कृत तो शाश्वत सदानीरा नदी है ! जिन्होंने संस्कृत विषय के साथ आधुनिक विषय लिये हैं वे लोग बहुत आगे तक पहुँचे हैं ! कई संस्कृत विद्वान प्रशासनिक सेवाओं में उच्च पदों पर आसीन रहे हैं !
7 October at 21:45
संस्कृत जटिल भाषा है। आधे से अधिक जीवन भाषा सीखने में चला जाता है।
डॉ.कंचन तिवारी नगाधिराज प्रारंभ में सरल है। जीवन की जटिल समस्याओं को सुलझाने के लिये जटिलता भी धारण करती है ।कुल मिलाकर जीवन को सरल बनाती है
डॉ.कंचन तिवारी नगाधिराज प्रारंभ में सरल है।जीवन की जटिल समस्याओं को सुलझाने के लिये जटिलता भी धारण करती है ।कुल मिलाकर जीवन को सरल बनाती है
Kanchan Saroj Kemka Koi bhi cheez jatil tabhi tak hoti hain jab wo hume nahi aati jab tak uska gyan hume nahi hota baat bhaasha ki ho ya kisi or language ya kisi or subject ki ya phir kisi or kaam ki isi tarha sey sanskrit bhasha Jatil isliye hain kyuki wo humari mother tounge nahi hain wo humare ghar mey nahi boli jaati jaise hindi aur English boli jaati hain uska hum apne dainik jeevan mey use nahi karte .
Lekin jatil tabhi aasan bannta hain jab usmey dilchaspi ho aur isi dilchaspi ko aap aur aap hi jaise kai teachers ispar kaam kar rahe hain Sir
जगदानन्द झा Kanchan Saroj Kemka भाषिक संस्कृत और साहित्य, शास्त्रीय संस्कृत में जमीन आसमान का अंतर है। संस्कृत में गद्य साहित्य से अधिक पद्य साहित्य है जिसमें शब्दों को इस प्रकार तोड़ा मरोड़ा जाता है कि वह भाषिक संस्कृत से काफी अलग हो जाता है। मैं यह यूं ही नहीं कह रहा, बल्कि अन्य भाषाओं से तुलना करने के पश्चात इस संश्लिष्ट पदावली वाली भाषा के बारे में लिखा हूं। एक एक शब्द के इतने अधिक पर्याय हैं और कौन लेखक किस शब्द का प्रयोग करते हैं कहा नहीं जा सकता। एक अरब से अधिक शब्द और उसका अर्थ है याद रखना किसी मनुष्य के वश में नहीं और इसका प्रयोग हुआ है इसीलिए मैं कह रहा हूं कि यह भाषा अत्यंत जटिल है। जिसके पास जितना अधिक बुद्धि है वह नया नया शब्द गडकर प्रयोग कर सकता है य दूसरे के लिए समझ से बाहर भी होता है
सुशील कुमार पाराशर सरला भाषा संस्कृतं
जगदानन्द झा बटवृक्षः धावति का अर्थ लिख दे तो समझ लूँ कि यह सरल है।
Krishna Mohan Shukla धावति का अर्थ दौड़ना होता है किन्तु मैंने इसका आशय बढ़ने से ले लिया है
जगदानन्द झा बालकः धावति में धावति का अर्थ अलग होगा और यहाँ अलग। इसके लिए कोई नियम निर्देश प्राप्त होता है क्या? ताकि सभी को समान रूप से अर्थावबोध हो। मुझे बढ़ रहा है यह अर्थावबोध क्यों नहीं हुआ? यदि होता तो बढ़ रहा है> यह किस शब्द का अर्थ है? यह प्रश्न ही नहीं पूछता।
Krishna Mohan Shukla यदि रुचि हो जाय तो कुछ भी कठिन नहीं
जगदानन्द झा रुचि हो जाय तो चीनी भावचित्र में लिखी जानी वाली मन्दारिन' भी सीखी जा सकती है। इसे ८५ करोड़ वक्ता सीखते और प्रयोग भी करते हैं। यह दुनियों के सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली जाने वाली भाषा है।
Krishna Mohan Shukla लगन व परिश्रम से सब कुछ सम्भव है महोदय।
जगदानन्द झा Krishna Mohan Shukla मैं यहाँ दों भाषाओं की तुलना में लिखा हूँ। आज हम जिस भाषा को बोलते, लिखते पढ़ते हैं उस हिन्दी के सापेक्ष संस्कृत जटिल है। यहि जटिल नहीं होती तो लोग संस्कृत को यथावत् स्वीकार करते आ अब देखिये दुग्ध में मुख सुख है या दूध में। जटिलता से ,सरलता की ओर की यात्रा का नाम ही तद्भव है। इसी प्रकार वाक्य विन्यास में भी जटिलता से सरलता की ओर यात्रा हुई है। अक्के चेन्मधु विन्देत किमर्थं पर्वतं व्रजेत्।
Anjani Kumar Sinha अच्छा व्यंग्य किया है आपने।
जगदानन्द झा मान्यवर यह व्यंग्य नहीं यथार्थ है। जिस हिन्दी को हम लिखते और बोलते हैं, उसकी अपेक्षा यह जटिल है। अब देखिये न । हिन्दी के सभी विभक्तियों में कर्ता के स्वरुप में थोड़ा परिवर्तन होता है, चाहे वह किसी लिंग या स्वरान्त या हलन्त का हो। परन्तु संस्कृत में कितना अधिक परिवर्तन हो जाता है। हिन्दी की अपेक्षा इसमें कितने गुना परिवर्तन होता है इसे प्रयोग कर देखना चाहिए।
Usha Nagar ????
जगदानन्द झा Usha Nagar यदि ऐसा नहीं है तब संस्कृत कवि सम्मेलन में लोग सुनने क्यों नहीं जाते? कवि बिना देखे कविता पाठ क्यों नहीं करते? संस्कृत की पुस्तकें, पत्रिकाएं क्यों नहीं बिकती? सच तो यह है कि लोग संस्कृत समझ नहीं पाते तो पुस्तक पढ़ेंगे खाक।
राजकुमार हिरणवाल ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। न जाने क्यों, मुझे आपकी पोस्टें नकारात्मक लगने लगी हैं ? कोई बेचने वाला हो,संस्कृत किताबें खूब बिकती हैं।
जगदानन्द झा राजकुमार हिरणवाल मैं भी किताब बेचने का उपक्रम शुरू करने जा रहा हूं, पुस्तक विक्रेता संस्कृत की किताब नहीं बेचता है, कहता खरीदार नहीं है। मैंने एक दिन पूरे मार्केट में सर्वे भी किया था। लगभग 10000 किताबें तो मैं खुद ही खरीद चुका हूं एक एक पुस्तक का द्वितीय संस्करण 15 या 20 वर्ष बाद ही निकल पाता है। कई प्रकाशक तो एक बार पुस्तक छापने के बाद दोबारा प्रिंटिंग नहीं कराते क्योंकि उसका कोई ग्राहक नहीं होता। संस्कृत की पुस्तकों को स्वयं लेखक को छपवाना पड़ता है।
Usha Nagar झा महोदय , भाषा कोई भी कठिन या सरल नही होती । जो भाषा प्रतिदिन बोलने एवं सुनने में आए उसे समझना , याद रखना बोलना सरल हो जाता है । दुर्भागयवश संस्कृत लोक व्यवहार की भाषा न होने से कठिन लगती है । तथापि मैं कहूंगी कि आम लोगों को भी संस्कृत के श्लोक , स्तोत्र आदि कंठस्थ हैं । किसी भाषा की पुस्तक पढना व्यक्ति की रुचि , विषय एवं पुस्तक की उपयोगिता पर निर्भर करता है ।
जगदानन्द झा Usha Nagar श्लोक याद कर लेना अलग बात है। यदि कोई श्लोक बोल रहा हो तो तत्क्षण उसका अर्थ समझ में आना दोनों दो विषय हैं। आज तक गिने चुने लोग ही मुझे मिले जिनके सामने मैं पुस्तक रख दूं और पूछूं कि इसमें क्या लिखा है तो वह तत्काल पढ़ते ही उत्तर दे दे हैं। डाटा तब तक महत्व हीन है जब तक कि उसे व्याख्यायित न कर ली जाए।
Usha Nagar आप प्रयासरत हैं जिसका प्रभाव दिख रहा है । शिक्षाविदों को पाठ्यक्रम को आजकल के सामाजिक ढाॅचे के अनुरूप बदलना होग जैसा की अन्य भाषाओं के पाठ्यक्रम में हो रहा है ।
जगदानन्द झा Usha Nagar कुछ लोग द्वितीया विभक्ति का रूप हटाकर और भूतकाल के लिए कुछ प्रत्यय जोड़कर इसे सरल बना रहे हैं लेकिन जो उपलब्ध साहित्य है उसमें तो द्वितीय विभक्ति भी है और भूतकाल के लिए तीन लकारों का प्रयोग भी। उसे बिना जाने क्या हम उन ग्रंथों को समझ पाएंगे या उपयोग कर पाएंगे?
Usha Nagar आपका कथन सही है । सरली करण का तात्पर्य भाषा का स्वरूप बदलना नही है । आपने जो भूतकाल के प्रयोग का उदाहरण दिया सही है । तीनों भूतकाल ( लङ् , लुङ् व लिट्) का प्रयोग तीन पृथक-पृथक समय के लिए किया जाता है जो की प्रत्यय जोङकर नहीं दर्शाया जा सकता । आपकी व्यथा मैं समझ रही हूं । भाषा भी समय के साथ परिवर्तित होती है । यह वैदिक, लौकिक और पुराणों की संस्कृत में देखते हैं ।
Arknath Chaudhary न जटिल है और न कठिन।प्रयास में निष्ठा चाहिए।
Nikhil Barman संस्कृतभाषा सरला, कोsपि हृदयेन इच्छति चेत् केवलं २० घण्टा आवश्यकी ।उद्यमेन हि उद्यमी।
जगदानन्द झा Usha Nagar कुछ लोग द्वितीया विभक्ति का रूप हटाकर और भूतकाल के लिए कुछ प्रत्यय जोड़कर इसे सरल बना रहे हैं लेकिन जो उपलब्ध साहित्य है उसमें तो द्वितीय विभक्ति भी है और भूतकाल के लिए तीन लकारों का प्रयोग भी। उसे बिना जाने क्या हम उन ग्रंथों को समझ पाएंगे या उपयोग कर पाएंगे?
जगदानन्द झा 20 घंटे वालों ने माता पिता, स्वर्ग नर्क, सुख दुःख, आत्मा परमात्मा जैसे भावों का घंटा बजा दिया दिया है। यहाँ तो एक की ही सत्ता है, जो बहुवचन को उपयोग में लाने के लिए बहुवचन को साथ रखा है। वहाँ की शिक्षा का कतिपय उदाहरण- मम प्राक्तनविद्यालयस्य छात्राभि: सह कियत्क्षणम् । अहम् संस्कृतभाषा प्रचारक:सेबकश्च। कहो तो विभक्ति लोप कर संस्कृत लिखी जाय।

Usha Nagar आपका कथन सही है । सरली करण का तात्पर्य भाषा का स्वरूप बदलना नही है । आपने जो भूतकाल के प्रयोग का उदाहरण दिया सही है । तीनों भूतकाल ( लङ् , लुङ् व लिट्) का प्रयोग तीन पृथक-पृथक समय के लिए किया जाता है जो की प्रत्यय जोङकर नहीं दर्शाया जा सकता । आपकी व्यथा मैं समझ रही हूं । भाषा भी समय के साथ परिवर्तित होती है । यह वैदिक, लौकिक और पुराणों की संस्कृत में देखते हैं ।
3 October at 21:42
अन्तःसंजाल पर हिन्दी तथा अन्य भारतीय भाषाओं के समकालीन लेखकों की प्रतिनिधि रचनाएं आपको आसानी से पढ़ने को मिलता है। राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान ने इस दिशा में किंचित प्रयास भी किया था। मैंनें अपने ब्लॉग पर इसके बारे में कुछ लेख लिखा था। संस्कृत गीतकारों की जीवनी के साथ उनके कुछ प्रतिनिधि गीतों का संकलन https://sanskritbhasi.blogspot.com/2017_01_29_archive.html… इस लिंक पर किया। मुझे आशा है कि हिन्दी समय की तरह ही आने वाले दिनों में संस्कृत का भी एक अन्तः संजाल होगा, जहां प्रभूत मात्रा में सामग्री मिलेगी।
29 September 2018 at 22:26
विचार प्रवाह -
1. आजकल जिस शिक्षा को देने के लिए छात्रों को छात्रवृत्ति देनी पड़े, वह शिक्षा महत्वहीन है। जिस शिक्षा को देने के लिए भोजन और आवास भी देना पड़े, वह शिक्षा उससे भी अधिक महत्वहीन है। यह दोनों वाक्य सभी जगह लागू नहीं होते।
2. कोई भी पदासीन व्यक्ति अपने से ऊंचे पद पर आपको नहीं बैठा सकता और न ही नियुक्त कर सकता, परंतु प्रजातंत्र इसका अपवाद है।
3. बड़े और ऊंचे पहुंच वाले व्यक्ति तब तक आपके लिए फायदेमंद है जब तक आप उसकी सेवा लेते हैं परंतु ऐसा कम ही होता है। अक्सर ऐसे लोग दूसरे से सेवा लेने या दूसरे का उपयोग करने के पश्चात ही बड़ा बन पाते हैं।
4. जिस समाचार को बनाने के लिए पैसा खर्च नहीं करना पड़ता है और जिस समाचार को पाने के लिए पैसा खर्च नहीं करना पड़ता है, वह समाचार अनुपयोगी है।
27 September at 19:32
एक वैदिक ऋषि हुए। नाम था दीर्घतमा। गूगल पर सर्च करने पर इनकी कहानी कई भाषाओं में मिल जाएगी अतः चरित्र चित्रण करना यहां अनिवार्य नहीं। सुप्रीम कोर्ट का आज का फैसला इस देश के निवासी को वैसा ही ऋषि बनाना चाहता है।
Ritu Gupta M suni nahi in rhishi k baare m
जगदानन्द झा Ritu Gupta गूगल पर दीर्घतमा ऋषि लिखकर खोज लो। इनकी चर्चा ऋग्वेद तथा महाभारत में आयी है। यदि कुछ लिख दूं तो लोग गालियां देना शुरू करेंगे। वेदिक ऋषियों, ऋषिकाओं तथा पौराणिक ऋषियों के चरित्र स्वाभाविक होते थे। अब उसे लोग अजीबो गरीब मानते हैं । सारे फसाद की जड़ यही है।
राकेश पंचौली जगदानन्द झा
आदरणीय जी पुराण पाखंड है वेदों की ओर लौटो पुराणों में मिलावट की गई है मुगल काल में
जगदानन्द झा राकेश पंचौली आप दयानंद जी की व्याख्या पढ़े होंगे कृपया यह बताइए कि ऋग्वेद के किस सूक्त में इनका वर्णन आया है? वहां का मूल उद्धरण दे दीजिए।
26 September at 21:21
जो चिंतनशील होता है, जो कुछ विशेष सोचता है, जो अपने चिंतन तथा प्रयोग से किसी निष्कर्ष तक पहुँचा हो, घटना विशेष ऐसे व्यक्ति के चिंतनधारा में व्यापक परिवर्तन लाता है। इतना अप्रत्याशित कि चिंतक भी परिवर्तित होने वाले विचार के बारे में नहीं सोचे रहता । चूंकि चिंतनशील व्यक्ति विशिष्ट प्रकार का सोचता है, इसीलिए कई बार उसके सोच के प्रति अन्य लोगों के असहमति के स्वर काफी ऊंचे होते हैं। चिंतक का सोचा और किसी के पल्ले नहीं पड़ता।
चिंतन धारा में व्यापक परिवर्तन सिर्फ चिंतकों में दिखाई देता है। मैंने कई लोगों के विचार, जीवनशैली में आमूलचूल परिवर्तन होते देखा है। उनमें नहीं, जिसने कभी किसी मुद्दे पर कुछ भी चिंतन नहीं किया हो। किसी विशेष अवधारणा पर नहीं पहुंचा हो। शामिल बाजा हमेशा, जीवन पर्यन्त साथ बजते रहता है। जो सोचेगा वही सोच भी बदलेगा। जिसने सोचा ही नहीं, उसे सोच बदलने की जरूरत भी नहीं।
22 September at 20:46
आज कल संस्कृतभाषी ब्लॉग पर लिखे अपूर्ण लेखों को पूर्ण करने में संलग्न हूँ। कई स्थानों पर ध्वनियों को भी जोड़ना है। विशेषतः वहां जहां मूल संस्कृत है, ताकि नए बच्चे उसका शुद्ध उच्चारण करना सीख सकें। दिव्यरंजन जी कहते हैं- हिंदी प्रभाव के कारण हिंदी भाषी लोगों का उच्चारण काफी विकृत हो गया है। वे जो लिखते हैं वह बोलते नहीं जो बोलते हैं वह लिखते नहीं। कई बार ध्वनि भेद से अर्थ में भेद हो जाता है। वह कार्य करता है। कर्ता कारक का एक भेद है। इन दोनों वाक्यों में आये करता एवं कर्ता के ध्वनियों में लोग भेद नहीं कर पाते।
20 September at 21:57
मैं जो कुछ भी जानता हूं, जितना भी जानता हूं, उसे दूसरे तक पहुंचाने के लिए ब्लाग लिखते रहता हूं। इसे पढ़ने के लिए किसी को शुल्क चुकाने की आवश्यकता नहीं होती है। एक साथ कई लोग पढ़ भी सकते है। यह सबके लिए समान रूप से उपलब्ध रहता है। खोजे जाने पर तत्काल मिल जाता है। 2011 से अबतक मेरे एक एक लेख को 1000 से लेकर 100000 तक लोगों ने पढ़ा है। मेरे ब्लॉग का नाम संस्कृतभाषी है।
लिंक - https://sanskritbhasi.blogspot.in
मैं यह जानता हूं कि मुझसे कुछ लोग अधिक जानते हैं तो कुछ लोग कम। जो लोग हमसे कम जानते हैं, उनके लिए मेरा ब्लॉग उपयोगी हो सकता है। (पहली कक्षा में वर्णमाला सीखने वाले बच्चों की कभी कमी नहीं होती।) मैं मिलने वालों से बराबर कहता हूं, आपके द्वारा अबतक का अर्जित ज्ञान उन लोगों के लिए पर्याप्त है, जो अब तक आप इतना सीख नहीं पाया । आप लिखिए। उनके लिए लिखिए।
यदि एक अध्यापक यदि एक छात्र अपने नोट्स को इंटरनेट पर लिख दे तो आने वाले कक्षा के छात्रों के लिए कितना अधिक उपयोगी होगा। इसके लिए मैंने कई बार अध्यापकों को भी प्रोत्साहित किया। उदाहरण के तौर पर आप Google ग्रुप्स या ऐसे ग्रुप को देख सकते हैं जहां पर प्रभूत ज्ञान राशि इकट्ठा हो गई है।
मैं भी लिखता हूँ। वही लिखता हूँ, जो ज्ञान आज भी जरूरी है और कल भी रहेगा। यदि आप शिक्षित हैं तो आप भी लिखिए, शाश्वत काम आने वाली बातें। शाश्वत ज्ञान। किसी के काम आयेगा।

संस्कृत क्षेत्र में अभिनन्दन या स्मृति ग्रन्थ लिखने की परम्परा है। यदि अभिनन्दनीय व्यक्ति जीवित रहा तो स्वयं के खर्चे या पदासीन व्यक्ति कभी-कभी सरकारी पैसे से प्रकाशित कराता है। इसके द्वारा किसी विद्वान् के व्यक्तित्व तथा कृतित्व से लोगों को परिचित कराया जाता है। जो लेखक जिनसे जुड़ा या प्रभावित रहता है, वह उनके बारे में लिखता है। अनेक अभिनन्दन ग्रन्थों को देखने के पश्चात् ऐसा लगा कि सम्पादक या प्रकाशन समिति लेखकों के विद्वता पूर्ण लेख को भी प्रकाशित कर देते हैं,जिससे अभिनन्दनीय या स्मरणीय व्यक्ति का कुछ भी लेना देना होता है। कुछ अभिनन्दन ग्रन्थों की सूची अधेलिखित है-
15 September at 16:14
आचार्य युगलस्मृतिग्रन्थः । केशव शर्मा । 2008
गोपीनाथ कविराज अभिनन्दन ग्रन्थ । गोपीनाथ कविराज । 1968
डॉ0 वी0 राघवन स्मृति ग्रन्थः । वी0 सुब्रह्मण्यम् शास्त्री । 1983
पाण्डुरंगस्मरणम् । भि0 वेलणकर । 1980
प्रणामाञ्जलिः । ए.वि. नागसम्पिगे । 2015
प्रशस्तयः । शालिग्राम शास्त्री । 2015
भास्कर राय भारती दीक्षित व्यक्ति। बटुकनाथ शास्त्री खिस्ते । 1993
मंजुनाथ वाग्वैभवम् । मंडन मिश्र । 1990
महामहोपाध्यायचिन्नस्वामिशास्त्रिण। पट्टाभिराम शास्त्री । 1990
लक्ष्मीकान्तयशोभूषणम् । सुरेन्द्र पाल सिंह । 2014
विश्वदृष्टि । वि0 वैंकटाचलम् । 1993
विश्वदृष्टि डा0 सम्पूर्णानन्द स्मृति वि0 वैंकटाचलम् । 1993
विश्वमूर्तिवैभवम् । आचार्य विश्वमूर्ति शास्त्री । 2015
शशिगौरवामृतम् । शशिधर शर्मा । 1988
श्रुतिनैवेद्यम् । प्रवेश सक्सेना । 2006
हिमांशुश्रीः । विन्ध्येश्वरी प्रसाद हिमांशु । 2005
DrSurendra Kumar Pandey Jha ji
Yah bhi kid lijiyr
Sahitya Sevadhi = Dr S K Pandey
( Pro Suresh Chandra Pande Abhinandan Granth )
Ichchha Ram Dwivedi पूर्णमदः पूर्णमिदम्। आचार्य इच्छाराम द्विवेदी अभिनन्दन ग्रन्थ 2012
अभिषेक प्रकाशन दिल्ली
जगदानन्द झा Ichchha Ram Dwivedi आदरणीय, अभिनंदन ग्रंथों की सूची बहुत लंबी है, सोशल मीडिया पर रुक कर लोग उतना नहीं पढ़ते। यहां सामान्य सूचना दी, ताकि नई पीढ़ी इस विधा से परिचित हो सकें और शोध करते वक्त इन ग्रंथों से भी सहायता ले सके। आपने टिप्पणी कर उत्साह बढ़ाया। मैं अपने ब्लॉग पर विस्तारपूर्वक संस्कृत के विद्वानों के अभिनंदन ग्रंथों के बारे में एक लेख लिखूंगा।
Karuna Lahari is feeling sad with Amoda Acharya and 5 others.
15 September 2018 at 14:48
तो क्या मान लूँ कि अब एक ऐतिहासिक युग का अवसान हो गया? आपने इस सोशल मिडिया को संस्कृत की धारा से जोड़ते हुए एक नया आयाम स्थापित किया है। आपका हर पोस्ट हमारे जैसे हजारों लोगों में तूफानी जज्वा पैदा करता है। हम आपको यूँ ही मरने नहीं देंगें। मैं सोचती हूँ, जिसने इतने अनगिनत काम किये, वह यूँ ही हार नहीं सकता। आपको जरूर गिरोहबंद लोगों ने हराया होगा। हम आपको हारने भी नहीं दूँगी। आजतक आप हमारे आवाज थे अब मैं आपकी आवाज बनूँगी। जब से यह Post देखी हूँ, मन बेचैन हो गया है। मैं तो कहूँगी, आप लौट आओ। लौट आओ, मेरे मार्ग दर्शक। इसलिए भी आपको लौटना होगा ताकि कल दुनियाँ यह नहीं कहे कि संस्कृत का अलख जगाने वाला एक महान् क्रानितदर्शी भी हार सकता है। यह आपका अवसान नहीं, आने वाली संस्कृत भाषा और समाज का अवसान होगा। फिर कोई भी जगदानन्द बनाना नहीं चाहेगा।

#जगदानन्दझा की वॉल से यह दुखदीयी खबर मिली-------
संस्कृत के कारण 22 अगस्त 2018 तक जो लोग मुझसे जुड़े थे कृपया मेरी बात सुनें -
संस्कृत को लेकर मेरी जो अवधारणा थी वह गलत साबित हुई। मैंने लगातार 15 दिनों तक चिंतन मनन कर यह विनिश्चय किया कि अब तक जो कुछ किया, वह उस समाज को समर्पित कर तटस्थ हो जाऊं। इसके बाद मुझे यहां से जुड़ाव नहीं रखना। अब मेरे मस्तिष्क में संस्कृत को लेकर कोई भी विचार नहीं पनपता है। आपको जो कुछ दिख रहा है, वह मेरा मनोरंजन मात्र है। इसमें मेरी कोई अवधारणा नहीं होती। संस्कृतज्ञों से मिलने, सभा संगोष्ठी में जाने, संस्थाओं के प्रति जिज्ञासा सब कुछ बंद कर आम जीवन जीना जीवन का ध्येय है। संस्कृतम् मेरे लिए सूचना मात्र है। अब संस्कृत के निमित्त मुझसे संपर्क करना बेकार है। मैं अब इस क्षेत्र में सक्रिय नहीं हूं और होना भी नहीं चाहता। संस्कृत से जुड़े हुए हरे लोगों के प्रश्नों का एक ही उत्तर है - नमस्कार। अलविदा।
12 September 2018 at 07:57
अभी हाल में ही मुझे पता चला कि मैं विगत दिनों जो कुछ कर रहा था उसमें से बहुत सारे कार्य अनावश्यक व मूल्यविहीन थे। अतः उनका परिणाम शून्य अथवा नकारात्मक था। मैंने उसमें सुधार लाना आरंभ कर दिया है।
7 September 2018
साहब अब मैं क्या क्या कहूँ?
तुम बुद्धिजीवी को परदेशी बता देते हो। नौकरी हो या देश सभी जगह रोहिंग्या टाइप के लोगों को शरण दे देते हो। साथ दूँ तब भी, न दूँ तब भी हमारे साथ तुमने जो व्यवहार किया, वैसा जंगल में भी देखने को नहीं मिलता। अपनी मनमर्जी के लिए कोई न कोई बहाने ढ़ूंढ़ ही लेते हो। बस अपना काम निकलना चाहिए। तुम्हें कुछ लाभ मिलना चाहिए। चाहे जिसके गले को रेतकर अपना स्वार्थ पूरा हो रहा हो, तुम कभी नहीं चूकते। हम अल्पसंख्यक हैं साहब। बुद्धिजीवी ढ़ेर सारा बच्चा पैदा करना नहीं जानता। यदि इस सब काम में लगे तो ज्ञान साधना छूट जाएगा। अपने हितों की रक्षा के लिए अब बुद्धिजीवी आपसे लड़े या अपना कुनबा बढ़ाये या बौद्धिक काम करे। आपने तो हमें गुलाम बना रखा है साहब। जब चाहो प्रयोग कर लो, जब चाहे दुत्कारो।
तुम हमेशा जीत जाते हो साहब। जब से पैदा हुआ,यही सब देख रहा हूँ।
5 September
जय मैकाले, जय शिक्षक दिवस । (शेष भाग ब्लॉग पर है)
Attri BL ये विद्वाता की टेंशन का परिणाम है वरना मैकाले को कौन महान बताएगा । महंगे मिशनरी स्कूल, देशी पब्लिक स्कूल, एडिड स्कुल, सरकारी स्कूल जैसी असमान और निर्धन भारतीयों के शोषण की शिक्षा प्रणाली दे गए वे । केवल नौकर पैदा करने की मशीन है आधुनिक शिक्षा प्रणाली । मैकाले की कृपा से दो सो सालों से नकली लोग पीएचडी कर रहे हैं, कुछ नेताओं की चंपी करके, कुछ प्रोफेसरों को तन मन धन समर्पित करके । बुआ, माता,मामी,पतोहू,सौतेली माता,बहन, आचार्य की पुत्री,आचार्य की पत्नी,अपनी पुत्री से सम्भोग करने पर गुरुपत्नी भोगी हमारे शिक्षा जगत् में कितने ही भरे पडे हैं । याज्ञवलक्य ने लिङ्गं छित्त्वा वधस्तस्य की तो व्यवस्था की थी । आज तो कोई रोने वाला भी नहीं है, हमारे शिक्षा जगत् में कितने ही बलात्कारी, कदाचारी, दुश्कर्मी हैं जिनका बाल भी बांका नहीं हूआ । ये तथाकथित उच्च सिक्षित भारतीय लाखों की रिश्वतें देकर नौकरियां लेने का जुगाड़ में रहते हैं । अंग्रेजी माध्यम लागूकर प्रतिभाशाली बच्चों का शोषण किया जा रहा है और मैकाले महान हैं । जिन स्त्रियों की विरुदावली गा रहे हैं तो एक बार वेदमंत्रदृष्टा अपाला, आत्रेयी, घोषा, उपनिषदों की मैत्रेयी गार्गी, रामकृष्ण बुद्ध की गुरुमाताओं का भी ख्याल कर लेते । संस्कृत के गौरीशंकर से नीचे पाताल में जाने से पहले पृथ्वीवासियों का भी ख्याल कर लेते झा जी ।
जगदानन्द झा मैकाले ने प्राइवेट और सरकारी स्कूल की बात नहीं की। यह तो उन प्रज्ञा पुरुषों का कमाल है जिन्होंने गुरुकुलों में सभ्य समाज को शिक्षा देता रहा। आज भी महंगे स्कूल उसी का बदला हुआ प्रतिरूप है।
4 September 2018
जरुरत से ज्यादा अच्छा होना भी कई बार आपको मुसीबत में डाल सकता है।
Madhav Prasad Shastri सत्योक्क्ति: श्रीमताम् । मयाप्यनुभूतम् यत् - जंगल के सीधे वृक्ष सर्वप्रथम काटे जाते हैं, टेढे वृक्ष को कोई नहीं छेडता ।
BuddhaDev Sharma नात्यन्तं सरलैर्भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम्।

सरलास्तत्र भिद्यन्ते कुब्जास्तिष्ठन्ति केवलम्।।




31 December 2014
उस महान् ईसामसीह के नाम पर सृजित ईसाई नव वर्ष की मंगलकामना, जिन्हें बुद्ध के जन्म निर्धारण में भी अब याद करना जरूरी हो चला है।
22 December 2014 ·
अभी मैं गोस्वामी बलभद्र प्रसाद शास्त्री रचित संस्कृत ग्रन्थ सतीशंकरमहाकाव्यम् के सम्पादन में लगा हूँ। आशा है यह जनवरी 2015 तक मुद्रित हो जाय।
16 December 2014
आइये हम कुछ सर्जनात्मक गतिविधि में भी भाग लें। संस्कृत भाषा की जीवन्तता समाज के सम्मुख रखें। अपनी सोच, रचना, संस्मरण साझा करें। संस्कृतज्ञ के रूप में आप सेवा दें। संस्कृत के प्रसार में सहयोगी बनें। आकर्षक एवं गुणवत्ता युक्त #संस्कृतसर्जना ई. पत्रिका में प्रकाशनार्थ अपने फोटोग्राफ के साथ sanskritsarjana@gmail.com पर संस्कृत विषयक सामग्री भेजें।
11 December 2014
आप भी अपनी राय दें-
बुद्धिजीवियों के सहयोग एवं परामर्श से एक सामान्य सर्जनात्मक पत्रिका के संचालन का प्रस्ताव है।
पत्रिका के संचालनार्थ उसके तकनीकी पहलुओं बटन आदि तथा स्वरूप पर विशेषज्ञों से चर्चा आदि कर निर्धारित किया जा चुका है। वर्तमान में सामान्य सर्जनात्मक पत्रिका के प्रकाशन पर विचार किया जा रहा हैं। ताकि इसे 31 दिसम्बर 2014 या सरस्वती समारोह 2015 के अवसर पर लोकार्पित कराया जा सकें। पत्रिका के नाम पर कुछ सुझाव प्राप्त हुये हैं। यथा संस्कृत परिचर्चा, संस्कृत भाषा, संस्कृत प्रिया, संस्कृत सर्जना आदि।
Software Development एवं website designing का कार्य करने वाला फर्म Business Innovation ने सर्जनात्मक पत्रिका का demo उपलब्ध करा दिया है।
प्रस्तावित सर्जनात्मक ई- पत्रिका का उद्देश्य संस्कृत सर्जकों (लघुकथा, एकांकी, गीत, गजल, निबन्ध, यात्रावृतान्त आदि) को एतदर्थ मंच प्रदान करना तथा उनकी प्रतिभा को पाठकों के सम्मुख लाना।
2. संस्कृत के नूतन लेखकों, अध्येताओं, छात्रों को लेखन हेतु प्रोत्साहित करना इस प्रकार उनमें भाषा विकास के साथ-साथ उनकी प्रतिभा को मंच देना। सर्जनात्मकता विकसित करना।
3. संस्कृत एवं संस्कृतेतर जगत को संस्कृत विद्या की जीवन्तता, इसमें निगूढ़ तत्व से परिचित करना तथा समसामयिक, ज्ञानवर्द्धक तथा जनोपयोगी जानकारी उपलब्ध कराना।
4. ऐसे समस्त ज्ञान सम्पदा को प्रकाश में लाना जो संस्कृत विद्या व भाषा के प्रसार-प्रचार में उपयोगी हो।
प्रत्येक लेख पर स्वत्वाधिकार तब तक लेखकों एवं सम्पादकों का बना रहेगा जब तक कि इसके लिए उन्हें पारिश्रमिक/मानदेय का भुगतान नहीं किया गया हो। पत्रिका में प्रकाशित लेख से सम्पादक/प्रकाशक की सहमति आवश्यक नहीं होगा।
ई. पत्रिका में अन्तर राष्ट्रीय मानकों का अनुपालन किया जायेगा। यह एक त्रैमासिक पत्रिका होगी। यह प्रत्येक वर्ष के जनवरी, अप्रैल, जुलाई एवं अक्टूबर में प्रकाशित होगी। इसमें अधोलिखित प्रकार की विषय वस्तु संस्कृत, हिन्दी भाषा में प्रकाशित होगी।
1. उ0 प्र0 संस्कृत संस्थान सहित अन्य संस्थाओं में आयोजित होने वाले संस्कृत, पालि, प्राकृत भाषा विषयक कार्यक्रमों की पूर्व तथा अनन्तर की सूचना।
2. संस्कृत भाषा के समबद्र्वन में किये जा रहे नवाचारों की रूपरेखा, योजना आदि परक वैचारिक व प्रेरक निबन्ध।
3. समसामयिक संस्कृत से सम्बद्ध घटनाक्रमों पर विशेषज्ञ विद्वानों के लेख/यथा पुरस्कार मृत्यु, रोजगार, नियुक्ति आदि।
4. नवीन प्रकाशित पुस्तक का समीक्षात्मक परिचय।
5. संस्कृत के दिग्गज विद्वानों, प्रचार-प्रसार में संघर्षरत बुद्धिजीवियों के साक्षात्कार,जिनमें उनकी विशेषज्ञता हो। संस्कृत से जुडी समकालीन समस्या उसके निदान।
6. संस्कृत को बढ़ावा देने हेतु कार्यरत विविध संस्थाओं संगठनों के क्रियाकलापों तथा उनके बारे में परिचय।
7. संस्कृत के लिए जीवन जिये पुरस्कार प्राप्त श्रेष्ठ पुरूषों की प्रेरणादायी जीवनी ।
8. पर्यटन, तीर्थ परिचय
9. मनोरंजक लेख
10. कक्षा 5 से 12 तक के लिए बालोपयोगी सामग्री,जिससे भाषा विकास हो सके।
11. अन्य जनोपयोगी विषयक, यथा ज्योतिष, कर्मकाण्ड, धर्मशास्त्र।
12. इसमें स्तुति वन्दना, पूर्व लिखित साहित्य आदि पर समीक्षात्मक शोधात्मक लेख प्रकाशित न के बराबर होंगे।
इस पत्रिका के लेखन सम्पादन हेतु वर्ष में एक बार इस प्रकार के साहित्य सर्जकों में श्रेष्ठ को चयन कर पुरस्कृत करने पर विचार किया जा सकता है।
13. अन्तर्जाल पर उपलब्ध संस्कृत विषयक सामग्री की जानकारी देना।
14. ई-पत्रिका में सम्पादक, प्रबन्ध सम्पादक, तकनीकी सम्पादक, परामर्शक, एवं सम्पादकीय काॅलम के लेखक अतिथि सम्पादक होगें।
15. उपर्युक्त पद धारकों से यह अनिवार्य अपेक्षा होगी कि वे अन्तर्जाल पर कार्य करने में दक्ष हो तथा उनके पास इस कार्य हेतु उचित संसाधन उपलब्ध हो।
16. पाठकों द्वारा प्राप्त पत्र भी इसमें प्रकाशित किये जायेगें।
17. समाचार और लेख प्राप्ति एवं पत्रिका के प्रसार हेतु कुछ संयोजकों को भी इसमें नामित किया जा सकता हैं।
इसमें कवर पृष्ठ को छोड़कर कुल 32 से 40 पृष्ठ होंगें। प्रस्तावित पत्रिका बहुरंगी एवं सचित्र होगी। इसे डिजायनर से डिजायनिंग कराकर आकर्षक स्वरुप दिया जाएगा।
6 December 2014
1- स्वस्मै स्वल्पं परस्मै सर्वस्वम्।
इस नीति वचन को खुद के जीवन में आत्मसात् करते हुए मैंने अपने लिए पुस्तकालय में एयर कंडीशनर नहीं लगवाया,जबकि वाचनालय में A C लगा है। यहाँ तक कि पुस्तकों के रैक में अनावश्यक CFL भी नहीं जलाता।
सुविधा उपलब्ध होते हुए भी एक नैतिक मानदण्ड का पालन करना संस्कृत विद्या से प्राप्त हुआ।
3 December 2014
कुछेक अपवाद करे छोड़कर मुझे ज्ञात नहीं है कि संस्कृत से जुड़े लोग अपने भाषाई गौरव के प्रतीक के रुप में कोई सामुहिक आयोजन करते हों। यही कारण है कि देश में संस्कृत से जुड़े कालिदास समारोह हो या व्यास महोत्सव या कोई अन्य। वर्षों से इसमें अनियमितता देखी जा रही है।
3 December 2014
पुस्तकालयाध्यक्ष बनने से पूर्व सामयिक विषयों पर कविता,निबन्ध लेखन चलता रहा। संस्कृत विद्या में महती अभिरुचि के कारण अबतक चार ग्रन्थों का सम्पादन। संस्कृत के प्रसार एवं विकास के लिए ब्लॉग तक चला आया। अपने ब्लॉग http://sanskritbhasi.blogspot.in/ में मेरे प्रिय गीतों, 260 वैचारिक निबन्धों, हिन्दी कविताएँ, 21 हजार से अधिक संस्कृत पुस्तकों, 100 से अधिक संस्कृतज्ञ विद्वानों की जीवनी और भी बहुत कुछ मुझे एक दूसरी ही दुनिया में खींच ले जाते है और जिन्हें महसूस कर अपने आप को अभिव्यक्त करने की इच्छा बलवती हो जाती है। मुझे इस क्षेत्र में कार्य करने एवं संस्कृत विद्या अध्ययन को उत्सुक समुदाय को नेतृत्व प्रदान करने में अत्यन्त सुखद आनन्द का अनुभव होता है।
3 December 2014

जब हम आज तक इन्सान होकर इन्सानियत की भाषा नही पढ पाये तो देववाणी क्यों और कैसे पढ समझ सकते है। विश्व की यही एकमात्र भाषा है जिसमें मातृदेवो भवः, पितृदेवो भवः, अतिथिदेवो भवः, गुरूदेवो भवः, का पाठ पढाया जाता है। इन सबका इस अत्याधुनिक समय में कोई विशेष मतलब नही रह गया है। यदि पिता पेन्शनजीवी न हो तो महंगाई के समय में माॅ बाप का बोझ और भारी हो जाता है।




4 September 2014  
भारतीय परम्परानुसार अपने या किसी के अभ्युदय, कार्यसिद्धि, मनोकामना पूर्ति, सुरक्षा आदि हेतु, ईश पूजन, वन्दन तथा आर्शीग्रहण करने की परम्परा रही है। अनेक स्थलों पर मांगलिक वस्तुओं तथा प्रतीकों के निदर्शन की परम्परा प्राप्त होती है। स्मृतिशास्त्रों में मंगलकामनाओं हेतु विभिन्न प्रकार के मांगलिक पद्य दृष्टिगोचर होते है।
3 September 2014
रामसेतुभारत के गौरवशाली इतिहास का अभिन्न व बहुमूल्य अंग है। बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के बीच जहाज़ों को 400 समुद्री मीलों की यात्रा कम करने तथा समुद्री मार्ग की सीधी आवाजाही के लिए रामसेतु को न तोडें। राम कथाओं में वर्णित ‘‘रामसेतु’’ किसी के लिए मिथकीय कल्पना है और किसी के लिए पूरा-आख्यान। हिन्दु धर्म अनुयायियों के अनुसार आज से लगभग साढ़े सत्रह लाख वर्ष पूर्व भगवान श्री राम और उनकी वानर सेना ने इसी सेतु से समुद्र पार किया था, और लंका पर विजय प्राप्त की थी।

25 August 2014
डा0 प्रशस्य मिश्र शास्त्री हास्य के क्षेत्र में सर्वज्ञात कवि हैं। इन्होंने नर्मदा पुस्तक में एकविंशी शताब्दी समायाति में आधुनिक व्यवस्था, सामाजिक विषमता आदि पर तीखा हमला बोला है-
श्वानो गच्छति कारयानके
मार्जारः पर्यड्के शेते
किन्तु निर्धनो मानवबालः
बुभुक्षितो रोधनं विधत्ते।
22 August 2014
कार्य छोटे-छोटे है पर दृष्टि नहीं जाती। संस्कृतज्ञों से परीक्षा, रोजगार, पुरस्कार आदि के प्रपत्र भी हिन्दी या अन्य भाषा में भरायी जाती है। यहाँ संस्कृत में करने में परेशानी क्या है?
Pushkar Pradhan यदि कोई वस्तु आवश्यक न लगे तो सहजता और आकर्षण ही उसके अपनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर सकते हैं.
संस्कृत आदर्श ही नहीं चुनौती भी है. आपका प्रयास स्तुत्य है अग्रज.
 20 August 2014
संस्कृत में निरन्तर भ्रमण शील लोगों का अभाव है। पर्यटक स्थल तो जायेंगे परन्तु संस्कृत संस्थाओं, व्यक्तियों तक सुधि लेने भी नहीं जाते। पास के संस्थानों में तो जायें। संस्कृत में निहित ज्ञान सम्पदा से बच्चों को परिचित कराने के लिए छोठी-छोटी पुस्तकें लिखे जाने की आवश्यकता है। इसमें संस्कृत ग्रन्थों में उपलब्ध कहानियां हों। इसकी भाषा जो भी हो परन्तु कथ्य संस्कृत हो।
20 August 2014
संस्कृत के प्रचार-प्रसार एवं संरक्षण के बारे में यदि आपने कोई सर्वहितकारी कार्य योजना बनायी है और विश्वास हो कि न्यून जन धन संसाधन के वावजूद यदि इसे लागू किया जाय तो इस लिंक के टिप्पणी अनुच्छेद में जाकर अनुमानित व्ययाकलन के साथ अपनी कार्य योजना से अवगत करायें।
14 August 2014 
सरकार के अनुदान से प्रायोजित कार्यक्रमों का यदि सोशल आडिट कराया जाय तो कुछ होता हुआ भी दिखे। योजना निर्माता जमीनी हकीकत से वाकिफ नहीं होते या उनमें दृढ़ इच्छा शक्ति का अभाव होता है। जैसी सरकारें वैसी योजना।
संस्कृत भाषा को जो आज चुनौती अन्य भाषा तथा तज्जनित संस्कृति से मिल रही है। इसके कारक तत्वों का गहराई से पड़ताल की आवश्यकता है। आज अंग्रेजी मुख्य चुनौती है। भारत में ईस्ट इन्डिया कम्पनी द्वारा औद्योगिक क्रान्ति लाया गया। ईसाई मिशनरी और कम्पनी में गठजोर स्थापित हुआ। उद्योगों को कामगार मजदूर मिले तो मिशनरी ने इस मार्फत संास्कृतिक धावा बोला। भारतीय सरकारें भी उस रास्ते पर आगे बढ़ी। वर्षों से कई संस्थाएँ/व्यक्ति केवल विचारों को व्यक्त कर संस्कृत के विकास प्रचार-प्रसार में सर्टिफिकेट, यात्रा व्यय, मानदेय आदि लेकर अपने दायित्व को पूर्ण मान रहे हैं।

DrSurendra Kumar Pandey संस्कृत भाषा के लिए सबसे बड़ी चुनौती वे लोग है जिनके उपर संस्कृत भाषा के संरक्षण ,संवर्धन और पोषण का उत्तरदायित्व है .यह कटु सत्य है | अब भी वक्त है कि वे सभी लोग जिनके मन में रंच मात्र भी संस्कृत के प्रति प्रेम है वे इस देव भाषा की सेवा बिना किसी स्वार्थ और लाभ के करे | इसमें देश ,राष्ट्र और भारतीय संस्कृति का हित निहित है | झा जी के विचारों से मैं सहमत हूँ |
7 August 2014
संस्कृत नाटक दूतवाक्यम् के दृश्य को देखकर कलाकारों का उत्साह बढाते उत्तर प्रदेश विधानसभाध्यक्ष, श्री माता प्रसाद पाण्डेय तथा अन्य
Divya Ranjan Pathak उत्तर प्रदेश (समाजवादी) संस्कृत संस्थान ने संस्कृत का पूरा पूरा मजाक उड़ाया . दो दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन किया गया श्री जनेश्वर मिश्र के नाम पर जिसमें एक विदुषी को पुरस्कृत भी किया गया । सम्मान देने और पुरस्कार देने में अंतर होता है । मंच पर लगे बैनर में जनेश्वर मिश्र और अखिलेश यादव का नाम दिखा परन्तु जिस गरीब विदुषी को डेढ़ लाख दिया गया उस बेचारी का नाम ही नहीं, ऐसा लगता है कि संस्थान कभी ऐसे आयोजन करता ही नहीं हो. भाषण एवं चाटुकारिता में तो समय दिया गया परन्तु पुरस्कार प्रक्रिया दो मिनट में निपटा दी गयी, आम परंपरा के तहत सारा आयोजन हिंदी और अशुद्ध उर्दू में किया गया. बेचारा संस्थान शायद कोई समाजवादी संस्कृत वक्ता नहीं खोज पाया होगा. गलती संस्थान की नहीं है, अब तो जो सर्वदा अयोग्य और संस्कृत न जानता हो वो इस संस्थान के अध्यक्ष पद के लिए एक योग्य व्यक्तित्व होगा. प्रथम दिवस और द्वितीय दिवस की प्रस्तुतियों ने संस्कृत का मजाक उड़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ी . अध्यक्ष महोदय स्वयं अपना नाम शंकर के स्थान पर संकर उच्चारित करते दिखे तो शेष का क्या दोष । खैर सकार इत्यादि दोष तो आज के विद्वानों में भी आम है ।
प्रथम दिवस संस्कृत नाटक के नाम पर शुरू की गई नृत्य नाटिका हिन्दी गीतों पर आ गई और यह शो जिसे एक नृत्याङ्गना द्वारा निदेशित बताया जा रहा, मात्र लाइट एण्ड साउण्ड शो बनकर रह गया .
द्वितीय दिवस का कजरी गायन गाँव में होने वाले ऑर्केस्ट्रा शो से अधिक स्तर का नहीं था, परन्तु किसी गलती की वजह से भास का नाटक आमन्त्रित कर लिया गया था, शायद आयोजक ये नहीं जानते होंगे कि इसकी सुन्दर प्रस्तुति होगी वर्ना वे श्री प्रेमचन्द को न आमन्त्रित करते । इस प्रस्तुति ने पूरे समारोह का स्वाद बिगाड़ दिया । अन्यथा हम कह सकते थे कि इतना घटिया आयोजन आगे कभी न होगा ।
मै यह जानना चाहूँगा कि आखिर किस की गलती से श्री प्रेमचन्द होम्बल आ गए . अवश्य ही यह गलती से हो गया होगा । खैर जिसकी भी गलती हो, कमसे कम एक अच्छी प्रस्तुति दिखी । इस समाजवादी गलती के लिए संस्थान धन्यवाद का पात्र है । नाटक का पूर्वरंग ही यह दिखा गया कि यदि आप काम करना जानते हैं तो बड़ी बड़ी लाइट या मल्टीमीडिया व्यर्थ है, नाटक का पूर्वरंग ही सारे समारोह पर भारी पड़ा और पूर्व के सारे आयोजन से बहुत आगे निकल गया ।
मजे की बात है कि अध्यक्ष महोदय भी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय एवं फिल्म इन्टीट्यूट पुणे से सम्बद्ध एवं प्रशिक्षित बताए गए फिर भी इतना निम्न आयोजन होना आश्चर्य जनक किन्तु सत्य की श्रेणी में ही गिना जाएगा ।
Divya Ranjan Pathak खैर अब मुझे यह अफसोस नहीं रहैगा कि उर्दू नाटक के नाम पर उर्दू एकेडमी ने अशुद्ध उर्दू उच्रचारण वाले कलाकारों को लेकर आगा हश्र कश्मीरी की ऐसी तैसी फेरी थी , संस्कृत भी क्यों पीठ दिखाए...
Divya Ranjan Pathak
Divya Ranjan Pathak मगर आज तक मैंने उर्दू के कार्यक्रमों में संचालन में हिन्दी या संस्कृत का प्रयोग होता नहीं देखा, आमतोर पर नफीस उर्दू बोली जाती है, उर्दू अकादमी में भी स्टाफ उर्दू बोलता लिखता पढ़ता दिखता है परन्तु बोचारा संस्कृत संस्थान, यहाँ एक को छोड़ कोई भी संस्कृत का ज्ञान नहीं रखता । वास्तव में संस्कृत संस्थान की पहटान मात्र यहाँ के पुस्तकालय के कारण हैं जिस में छात्र पढ़ने आ जाते हैं, अन्यथा यहाँ सन्नाटा ही रहे ।
Pramodavardhana Kaundinnyayana यस्स्याश् चोरश् चिकुरनिकुरश् चन्द्रपूरो मयूरः,
भासो हासः कविकुलगुरुः कालिदासो विलासः। हर्षो हर्षो हृदयवसतिः पञ्चबाणस् तु बाणः, केषान् नैषा कथय कविताकामिनी कौतुकाय॥
4 August 2014
आज देखा जा रहा है कि संन्यासी न केवल किसी राजनीतिक पार्टी के प्रति पक्षपात के लिए विवश हो रहे हैं। यद्यपि आज भी देश में बहुत ऐसे संत भी हैं जो समाज के उत्थान के लिए अनेक प्रकल्पों के माध्यम से समाज का उत्थान कर रहे हैं। बड़े-बड़े संतों के अनेकानेक आश्रम चल रहे हैं। इन प्रकल्पों की सच्चाईयाँ भी हैं। आश्रमों के माध्यम से कुछ अच्छे कार्य भी हो रहे हैं। परन्तु जब कभी तथाकथित संतों की कुटिलतायें सामने आती हैं, जब किसी कारण से पोल खुल जाता है, तब धर्म और संत दोनों से विश्वास हिल जाता है, टूट जाता है। इसके कुछ उदाहरण सामने हैं, जिन्हें बताने की आवश्यकता नहीं है। सन्तों की परम्परा का संस्कृति के विकास में बहुत बड़ा योगदान रहा है। यह कोई छिपी बात नहीं है, पर आज उसी पहचान के सामने कुछ सन्तों के आचरण प्रश्नचिह्न बनकर खड़े हैं।
    लिंक पर जायें-  संन्यासियों ! ये तेरी कैसी विवशता
2 August 2014 
http://sanskritbhasi.blogspot.in/ के एक लेख से उद्धृत-
आचार्य करने तक मेरी पहुँच सन्दर्भ ग्रन्थों तक नहीं हुई थी। मैंने जीवनी संग्रह का भी कार्य किया। संस्कृतज्ञ विद्वानों की जीवनी भी अत्यल्प मात्रा में प्राप्त हुई। हिन्दी साहित्य में ग्रन्थकार की जीवनी पद-पद पर प्राप्त होता रहा परन्तु संस्कृत ग्रन्थों के सम्पादक तदनुरुप लेखन नहीं कर पाये हैं।
हिन्दी साहित्य में समालोचना का कार्य बहुत देर से आरम्भ हुआ, जबकि काव्यशास्त्रकारों ने काव्यों पर ढ़ेर सारी समालोचना कर रखी है। संस्कृत के समालोचक तथा हिन्दी समालोचको में महान् भेद प्रकट होते हैं। संस्कृत में शब्द और अर्थ के बीच समालोचना घूमती है। रस चर्चा होती है। काव्य के विन्यास पर ज्यादा जोड़ है परन्तु कथ्य पर आलोचना कम। जबकि हिन्दी में कथ्य या काव्य के सन्देशों पर ज्यादा आलोचना की जाती है। लेखकीय पृष्ठभूमि पर विचार मंथन चलता है।
31 July 2014
भोजप्रबन्ध के रचयिता बल्लाल का यह श्लोक कितना मार्मिक है।
वृद्धो मत्पतिरेष मञ्चकगतः स्थूणावशेषं गृहं
कालोयं जलदागमः कुशलिनी वत्सस्य वार्तापि नो।
यत्नात् सञ्चिततैलबिन्दुघटका भग्नेति पर्याकुला
दृष्ट्वा गर्भभरालसां निजवधूं श्वश्रूश्चिरं रोदिति।। 255।।
मेरे पति ने वृद्धावस्था में चारपाई पकड़ ली है, पूरा घर गिर गया है। केवल एक स्थूणा (ठूठ) भर बची है। बरसात का समय है। बेटे का कुशल-समाचार भी प्राप्त नहीं हो रहा है और बहू के प्रसव कर्म के लिए मैंने एक-एक बूंद जोड़कर जो तेल किसी तरह जमा किया था, उसका मटका भी फूट गया है।गर्भ के भार से अलसाई अपनी बहू को देख-देख कर उसकी सास उपर्युक्त बातें कहती हुई बड़ी देर से रो रही है।
Pushpa Gupta आह,अकिंचनता की पराकाष्ठा, हृदय बेधकर रख देती है
Jul 28 2014 : The Times of India (Lucknow)
Software to make learning Sanskrit easier
Lucknow
Learning Sanskrit language would be simpler with UP government working on a software and eportal. The software would be available in Indian languages besides English.
The UP Sanskrit Sansthan is being backed by Jawaharlal Nehru University and National Informatics Center for the purpose. “The effort is a part of Sanskrit literacy campaign towards which we are working,“ said chairperson Shankar Suhail. He added that the aim is to make Sanskrit a part of everyday life.
“The 'adaptation' is necessary to revive Sanskrit,“ he stated.
The software would include learning of basic Sanskrit so that people are able to read and write primary Sanskrit. A syllabus and a learning module are the two essentials for the software and different teams are already working upon them. “Once the raw material is ready , the software would be prepared for a trial run,“ informed Jagadanand Jha associated with the project.
Suhail also claimed that work for Sanskrit e-portal has also begun with technical assessment of requisites like construction of server room, data storage server, leased line for the room and 20KVA online UPS.
The Sansthan has big plans for literacy campaign which includes integrating Sanskrit with computer education and starting online courses for school children.
Chetan Pandey Govt. Initiative !!! it will be some bogus thing which will never work and if it is being sponsored by UP govt. then certainly it will be useless... gauranteed, reminds me of the Ashtadhyayi software done by CDAC with the help of JNU.... and otherefforts done by the t  Govt Fund embezlers at JNU
Govt Fund embezlers at JNU
Nripendra Pathak I am working on this in JNU... PhD on Sanskrit-Hindi Machine
30 July 2014
संस्कृत के पुरस्कारों से जुडा एक तथ्य यह भी
1- संस्कृत क्षेत्र से प्राप्त पुरस्कार धनराशि का सदुपयोग विद्वद्जन खुद या उनके पारिवारिक सदस्य करते हैं, जबकि अन्य भाषा एवं कला क्षेत्र के लोग उनके क्षेत्र से प्राप्त पुरस्कार की धनराशि को (परोपकारार्थ) उस क्षेत्र में अध्ययन रत छात्रों को छात्रवृत्ति आदि देकर सदुपयोग करते है। मैं अपवाद को नहीं जानता।
संस्कृतज्ञ के रूप में अपनी पहचान स्थापित करें।
संस्कृत को पहचान दें, संस्कृत का प्रसार करें।
कमलाकान्त बहुगुणा परमत्र अपवादः अपि वर्तते ।आसन् मदीयाः आचार्यवरा: पंडित युधिष्ठिर मिमांसकाः अथ च डॉ विजयपाल विद्यावारिधि महोदयाः।
डा. प्रदीप कुमार मिश्र हम तौ झुट्ठै खुशफ़हमी पाले बैठे थे ई सब भी कुछ परोपकार करते होंगे...........धत्त तेरे की......मने हमरे दिमाग की.............
30 July 2014
कल लखनऊ में संस्कृत दिवस की पूर्व संध्या पर नगर के मुहल्ले में जाकर संस्कृत के क्षेत्र में कार्यरत संस्कृतज्ञों की पहचान पर एक सर्वे किया गया। आश्चर्य तब हुआ जब विजली मिस्त्री. केश कर्तक, ट्यूटर वकील आदि को लोग उनके पेशे के साथ उनका नाम जानते थे,परन्तु अधिकांश संस्कृतज्ञ के बारे में यह नहीं जान सके कि मेरे पडोस में संस्कृत पढा लिखा व्यक्ति रहता है। आखिर कब संस्कृत से जुडे लोग संस्कृतज्ञ के रूप में अपनी पहचान स्थापित करेंगें ?
डॉ. अरविन्द कुमार तिवारी मेरा अभिप्राय प्रशंसा श्रवण का नहीं अपितु जो अन्य कार्यों में हमारे मित्र व्यस्त दिखते; क्या वे संस्कृत से पहचाने जायें। इस ओर उनका ध्यानाकर्षण किया जाय?
जगदानन्द झा प्रश्न निष्ठा एवं सुलभता का भी है।
25 July 2014
देश के विविध भागों में आयोजयिष्यमान संस्कृत दिवस की सूचना भी नहीं मिल रही है। मैं अपने संस्कृतज्ञ मित्रों से अनुरोध करता हूँ कि संस्कृत से जुडी संस्थाओं में होने बाले संस्कृत कार्यक्रमों की सूचना सार्वजनिक करें। ऐसा करना अच्छा है।
Shri Krishan Jugnu जब संस्‍कृतीय भारत में अंग्रेजी शिक्षा लागू हुई, तब संस्‍कृत के अध्‍यापक बडे ही चिंतित हुए थे,, उन्‍होंने संस्‍कृत प्रेमी एचएच विल्‍सन को पत्र लिखा, प्रत्‍युत्‍तर में विल्‍सन ने लिखा था - अमृतं मधुरं सम्‍यक् संस्‍कृतं हि ततोधिकम्। देवभोग्‍यमिदं यस्‍माद्देव भाषेति कथ्‍यते।। इसका अर्थ हुआ कि अमृत तो अमृत होता है, बहुत ही मीठा,, संस्‍कृत भाषा उससे भी अधिक मीठी है, देवता भी इसका उपयोग करते हैं, इस कारण यह देवभाषा के नाम से प्रख्‍यात है...

25 July 2014
क्या संस्कृत के विद्वद्जनों की रचनाधर्मिता इतनी कमजोर हो गयी कि मैं facebook पर व्यक्तिगत फोटो तथा कविताएँ अधिक मात्रा में पाता हूँ। मेरी लालसा थी कि मेरे अधिकाधिक संस्कृतज्ञ मित्र हों। मैं संस्कृत की रचनाओं तथा संस्कृत क्षेत्र में होने वाले गतिविधियों को जान सकूँ।
Shri Krishan Jugnu झा साहब, आप सही कह रहे हैं, यह पीड़ा मेरी भी हैं, मैं सदैव संस्‍कृत में होने वाले नित नए प्रकाशनों के विषय में जानना चाहता हूं ताकि खरीद भी सकूं,,, मगर यहां तो टिप्‍पणियां ही ज्‍यादा देखने को मिलती है... कभी क्षेमेन्‍द्र ने लिखा था-- हा प्रजे क्‍व गमिष्‍यसि !
डॉ.कंचन तिवारी नगाधिराज सत्यमेतदुक्तं भवता। परं स्वपक्षतो विषयमेकमाश्रित्य विचारशीलैर्विद्वद्भिर्भवद्भिरेव नित्यं किमपि अस्माकं बोधाय उपस्थापनीयम्
24 July 2014

कल से मैं बल्लाल का भोजप्रबन्ध पढ रहा हूँ। आशा है अपने Blog पर इसपर कुछ लिखूँ।
23 July 2014
मेरा वाराणसी तथा अन्य संस्कृत शिक्षा केन्द्रों से वर्षों से जुडाव रहा है। वहाँ हिन्दी सहित तमाम सामाजिक क्षेत्रों के यशःशेष मनीषियों के स्मारक,मूर्तियां स्थापित हैं।संस्कृत की राजधानी वाराणसी में भी संस्कृत से जुडे मनीषियों के नाम स्मारक या उनकी मूर्तियां उपलब्ध नहीं हैं। आपको कहीं संस्कृत से जुडे मनीषियों के नाम स्मारक या उनकी मूर्तियां लगी दिखी हो तो मेरे भी संज्ञान में लायें।
19 July 2014
आप भी इस साइट में शामिल हों   ।
http://sanskritbhasi.blogspot.in/
मैंनें अपने ब्लाग पर अकारादि अनुक्रम से अ से ह तक लगभग 15 हजार संस्कृत पुस्तकों एवं उनके लेखकों/टीकाकारों की सूची उपलब्ध करा दी है। ये पुस्तकें मेरे पुस्तकालय में उपलब्ध भी हैं।
19 July 2014
जयललिता एवं वाइको जी सुनिये। मैं भारत का नागरिक हूँ और यह जानता हूँ कि आपके प्रदेश में भी लोग संस्कृत पढते हैं। जब हमें भारतीय भाषाओं से परहेज नहीं है तो आपको क्यों?
15 July 2014
माँ गंगा। इसके तरंग पर चटकीले सुनहरे सूर्य रश्मि।ऊपर मेघ। देखा है ऐसा मनभावन दृश्य?
14 July 2014
क्या आप संस्कृत की अनुपलब्ध पुस्तकें online ढूँढकर पढते हैं यदि ऐसा है तो like पर click करें। दरअसल मैं यह जानने की कोशिश में लगा हूँ कि इस प्रकार के पाठकों की संख्या कितनी है? मैं संस्कृत के अनुपलब्ध पुस्तकों को online करना चाहता हूं। प्रयोग कर्ता तो मिलें।
काशी की संस्कृति को पास से देखकर महसूस करने के लिये आज मैं अस्सी घाट चौराहे पर देर तक बैठा रहा। एक ओर विदेशी सैलानी आ जा रहे थे तो दूसरी ओर धवल वस्त्र में ब्रह्मचारी। यही तो काशी है।
14 July 2014
त्रेता का निषाद बच्चों को वेद नहीं पढना चाहते द्वापर आते आते वही वेद का विभाजन करने में सक्षम हो गया। द्वापर में दो ही कृष्ण मुख्य हैं 1. कृष्ण द्वीपायन वेदव्यास 2. श्री कृष्ण। अब कलियुग में वेद का रक्षक कौन समुदाय?
आनन्द वर्द्धन दुबे वेदव्यासजी की माता 'मत्स्यगन्धा या योजनगन्धा' ये भरत वंशी राजा उपरिचर वसु की पुत्री तथा जरासन्ध की बुआ(पितृष्वसा) है । इसका पालन पोषण दाशराज ने किया है ।
वशिष्ठ के पौत्र पराशर जी व्यासजी के पिता हैं । मैं इन्हें निषाद नहीं मान सकता ।
इसका नाम सत्यवती भी है , बाद में इसका विवाह शान्तनु (भीष्म के पिताजी) से स्वयं भीष्मजी ने कराया ।
विचार करें द्वैपायन व्यास जी निषाद कैसे ।

"पातभरी सहरी सकल सुत बारे बारे ..... इन्हें बेद ना पढाइहौं" और "बिन्ध्य के बासी उदासी तपी, ब्रतधारी महा बिनु नारि दुखारे" कवि(गोस्वामी जी) का मनोविनोद है । इससे अधिक क्या कहें ?
27 June 2014 ·
भारतीय शास्त्र जो ईश्वर सिध्धि पर चर्चा करता हो.पूजन परम्परा का निर्धारण करता हो.देवालय निर्माण मूर्ति स्थापन की विधि शास्त्रानुसार हो ,उस समृद्ध परंपरा के साथ ये सब क्या हो रहा है ?
27 June 2014 
आश्चर्य है शंकराचार्य के साईं मत पर रखे विचार पर संस्कृत के धुरन्धर मुखर क्यों नहीं हैं
सर्वेश त्रिपाठी आपका क्या मत है
शंकराचार्य की बात सही है। परम्परा से प्राप्त विद्या युक्त व्यक्ति शंकराचार्य की बात का निहितार्थ समझ सकता है।
सर्वेश त्रिपाठी मैंने यह देखा है की संस्कृत के अधिकतर विद्वान् सबसे ज्यादा स्वार्थी लालची अकर्मण्य घमंडी निष्क्रिय विद्या रुपी मणि पर भुजंग की भांति कुंडली मारे बैठे होते हैं। सिर्फ मीठा मीठा बोलकर काम निकालते हैं।
आचार्य सुधीर झा जय दुर्गे! सर्वेश त्रिपाठी जी संस्कृत विद्वान के लिए आपने जो भी शब्द प्रयोग किया है बिलकुल अमर्यादित है शायद आपके शब्दकोष में यही शब्द भरा हुआ है जिसको विद्वान शब्द कहकर प्रयोग कर दिया भाषा संयमित सम्मानित प्रयोग करने का प्रयाश रखे किसी व्यक्ति में ऐसा स्वाभाव हो सकता है भाषा के विद्वान में सद्गुण ही सद्गुण होता है ये आपकी परख की कमी है
सर्वेश त्रिपाठी सिद्धांत अलग है और यथार्थ अलग आजकल। बुरा उन्हे ही लगेगा जो वैसे हैं। मैंने सभी को नहीं कहा। और वहाँ प्रयुक्त विद्वान् शब्द व्यंग्य है
आचार्य सुधीर झा
आचार्य सुधीर झा जय दुर्गे! आपने सभी को कहा या न कहा, बुरा उसी को लगेगा जो वैसा होगा, आपका मानसिक दिवालियापन द्योतित होता है मैं आपसे निवेदन किया भाषा मर्यादित हो तो आप दम्भ भरने लगे सबसे ज्यादा अहंकार, मद आदि तो आपका ही प्रकट होता है
जगदानन्द झा बन्धु साईं पर बात करें,जो शास्त्र ईश्वर सिध्धि पर चर्चा करता हो.पूजन परम्परा का निर्धारण करता हो.देवालय निर्माण मूर्ति स्थापन की विधि शास्त्रानुसार हो ,उस समृद्ध परंपरा के साथ ये सब क्या हो रहा है ?
सर्वेश त्रिपाठी एक शैव होने के नाते मैं यह कहना चाहूँगा की जगती का प्रत्येक कण कण शिवरूप होने के कारन पूज्य है। पर जब हम किसी धर्म या पंथ के अनुयायी हों तो उसके शास्त्रों और उसके गुरुओं की बात हमें माननी चाहिए। एक संत या व्यक्ति के रूप में मैं साई बाबा का सम्मान करता हूँ। पर उनकी पूजा अर्चना नहीं कर सकता। शंकराचार्य जी के बयान से पूर्णतः सहमत हूँ। स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ।
हर हर महादेव
डॉ अभिवृत चौहान मैं शास्त्रों एवं वेदों में वर्णित भगवान को पूज्य मानता हूँ ....जो कि त्रिदेव हैं .....जो भी सत्कर्म करता है वो आदर का पात्र हो सकता है भगवान् नहीं .जो अहम् ब्रह्मास्मि कहता है वो रावण ही कहलाता है इतिहास में .....मुझे विश्वाश है कि अंधभक्त आशाराम को भी साईं और बाकी सब गुरुओं को भी उनके मरने के कुछ वर्षों बाद भगवान् बना ही देंगे ...पर कम से कम मैं तो असहमत हो सकता हूँ ....
किसी को भी भगवान् बनाना अपमान है प्रभु का ...और यह निंदनीय है .........
अंत में इतना ही कि ...............सनातन धर्म में सबसे बड़ा पाप गौ हत्या को माना गया है और मुझे विदित है .............
हरिहर निंदा सुने जो काना |
ताय पाप गौ घात समाना ||
Chandra Kala Shakya झा जी मैने देखा है परम्परा से प्राप्त विद्या युक्त व्यक्ति ही सबसे ज्यादा भेदभाव की बातें करके समाज में फूट डालने का काम करते है चाहे वह मदरसे हों या पारम्परिक विद्यालय ।
जगदानन्द झा साईं मत में गीता पवित्र ग्रन्थ है या अन्य कुछ .वेद पाठ की परम्परा है या नहीं,देव वाद की अवधारणा क्या है.प्रश्न बहुत है
Chandra Kala Shakya जय हो स्वामी शंकराचार्य जी की जिन्होने अभी चुनाव के वक्त 'हिन्दुत्व ''के नाम एक हुए समस्त हिन्दुओं को आपस में ही लडा दिया ।
अफसोसजनक

 27 June 2014
हमारे धर्म वेद अनुमोदित है अतः वेद पाठ की परंपरा है .वेदाध्ययन के लिए शास्त्र अध्ययन .शास्त्र अध्ययन के लिये संस्कृत भाषा अध्ययन.अंततः .संस्कृत की हानि करने वालों से साबधान.
भारतीय शास्त्र जो ईश्वर सिध्धि पर चर्चा करता हो.पूजन परम्परा का निर्धारण करता हो.देवालय निर्माण मूर्ति स्थापन की विधि शास्त्रानुसार हो ,उस समृद्ध परंपरा के साथ ये सब क्या हो रहा है ?
आश्चर्य है शंकराचार्य के साईं मत पर रखे विचार पर संस्कृत के धुरन्धर मुखर क्यों नहीं हैं।

13 June 2014
उज्जैन निवासी सुपसिद्ध संस्कृत कवि और विद्वान आचार्य श्रीनिवास रथ का आज निधन हो गया।

27 May 2014
आज विश्व गृह कीटों के दुष्प्रभाव से पीडि़त है। इससे आर्थिक एवं स्वास्थ्य की क्षति हो रही है। कीट घरेलू सामग्री को नष्ट कर रहे है। प्रदूषित कर रहे है। तमाम कम्पनियां इसके रोकथाम के लिए दवाएँ बना रही है। संस्कृत ग्रन्थ में घरेलू कीट के पहचान, भेद, उसकी आदतें, उसके दुष्प्रभाव से अपरिचित नहीं रहा होगा। संस्कृत ग्रन्थों में इसके रोकथाम के लिए एकत्र वर्णन नहीं है। तिलचटृा, दीमक आदि की उत्पत्ति मानव सभ्यता के पहले हो चुकी है। संस्कृतज्ञों द्वारा कहीं भी घरेलू कीट की पहचान एवं इसके रोकथाम के उपायों के लिए शोध नहीं किया जा रहा है। बृहत्संहिता के अध्याय 54 में अनेक जगह दीमक की वांवी (वल्मीक) को आधार मानकर जल के परिज्ञान का वर्णन मिलता है परन्तु कीटों के पहचान एवं उपचार का वर्णन नहीं मिलता है।
यदि हम जीवन को सरल एवं सहज करने वाले उपचारात्मक ज्ञान संस्कृत ग्रन्थों में खोज सकें तो जन-जन इस भाषा के अध्ययन को प्रेरित होगा।
http://sanskritbhasi.blogspot.in/ से साभार

अभी-अभी सम्पन्न हुए लोक सभा चुनाव में चयनित सांसदो को संस्कृत में शपथ लेने के लिए एक प्रेरक अभियान चलाने की आवश्यकता है। प्रत्येक सांसदीय क्षेत्र के संस्कृतज्ञ अपने संसदीय क्षेत्र से चयनित सांसदों से संस्कृत में शपथ लेने का आग्रह करें तो निश्चय ही संस्कृत की उच्च स्तर पर स्वीकार्यता का सन्देश जन-जन तक जाएगा। यह एक मौका है। SMS, मेल, फोन, पत्र, व्यक्तिगत एवं सामुहिक आग्रह द्वारा इसे सम्भव किया जा सकता है।

http://sanskritbhasi.blogspot.in/ के जगद्यात्रा से साभार

23-05-2014
     

     संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए जन जागरुकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। यह इसलिए के कक्षा 6 से 8 तक पढ़ने के बाद छात्र/छात्राओं को अगली कक्षाओं में संस्कृत पढ़ने की प्रेरणा देने वाला कोई नहीं होता। समाज में संस्कृत के प्रति अच्छी धारणा पैदा किये जाने पर ही इसके विकास की कल्पना की जा सकती है। अभी संस्कृत शिक्षा की पैरवी करने वाले सामाजिकों का अभाव है। जब तक जनमानस में संस्कृत की स्वीकार्यता पर्याप्त मात्रा में नही बढ़ायी जाती सांस्थानिक स्तर पर सभासंगोष्ठी करने का कोई खास लाभ नहीं मिलने वाला। पुनि-पुनि चन्दन की कहावत वाले कार्यक्रमों में वही गिने-चुने वक्ता और श्रोता होते हैजो इस क्षेत्र से जुड़े है।

            इस ग्रीष्मावकाश में हर मुहल्ले-गाँव के सामाजिक स्थलों पर स्थानीय अभिभावकों एवं छात्रों की सभा कर संस्कृत शिक्षा के लाभउद्येश्य व प्रेरक कार्यक्रम आयोजित किया जाना चाहिए। समाज के अनेक तबकों को इस शिक्षा के बारे में जानकारी मुहैया कराने एवं उसके लिए माहौल निर्मित करने के लिए कक्ष और फाइल से बाहर निकलकर धरातल पर कार्य करना होगा।

जन जागरुकता के लिए SMS, ई-मेलसोशल मीडियापत्र लेखन द्वारा अपने परिचितों को संदेश भेजनाग्राम मोहल्ले की गलियों में सभायें आयोजित करना व्यक्तिगत और सामूहिक रुप से जन सम्पर्क अभियान चलानासमाचारदीवार पर संस्कृत को अपनाने हेतु प्रेरक वाक्यों को लिखा जाना आदि कार्य किये जा सकते है।

            किसी एक क्षेत्र का चुनाव कर संस्कृत शिक्षा के लिए जन जागरुकता अभियान चलाने इसके लिए उचित माहौल तैयार करने का सकारात्मक असर आएगा। कुछ वर्षो बाद संस्कृत शिक्षार्थियों एवं संस्कृत के पैरोकारों की संख्या में वृद्धि होगी।

            अभी-अभी सम्पन्न हुए लोक सभा चुनाव में चयनित सांसदो को संस्कृत में शपथ लेने के लिए एक प्रेरक अभियान चलाने की आवश्यकता है। प्रत्येक सांसदीय क्षेत्र के संस्कृतज्ञ अपने संसदीय क्षेत्र से चयनित सांसदों से संस्कृत में शपथ लेने का आग्रह करें तो निश्चय ही संस्कृत की उच्च स्तर पर स्वीकार्यता का सन्देश जन-जन तक जाएगा। यह एक मौका है। SMS, मेलफोनपत्रव्यक्तिगत एवं सामुहिक आग्रह द्वारा इसे सम्भव किया जा सकता 

22 May 2014

     मैं शिक्षा आध्यात्म एवं चिकित्सा को त्रिकोण के रुप में देखता हूँ। सर्वप्रथम महाभारत में डिप्रेशन का जिक्र (अवसाद) प्राप्त होता है। अर्जुन के अवसाद ग्रस्त होने पर उनकी साइकोथैरेपीकाउंसलिंग श्री कृष्ण द्वारा किया गया।तनाव एक मनोरोग है। यह बीमारी आमतौर पर व्यक्ति को जीवन के पूर्वार्ध के वर्षों में खासकर किशोरावस्था व युवावस्था में अपना शिकार बनाती हैयदि मनोरोग खासकर तनाव का समय से उपचार न कराया जाये तो विकलांगताबेरोजगारीदुर्व्यवहारजेल की यातना सहनेआत्महत्या करने या एकाकी जीवन व्यतीत करने जैसी घटनाएँ सामने आती है।

योगवासिष्ठ में मनोदशा का वर्णन निम्न प्रकार से आया है-

क्षणमानन्दितामेति क्षणमेति विषादिताम्।

क्षणं सौम्यत्वमायाति सर्वस्मिन्नटन्मनः।

17 May 2014

स्वातंत्रयोत्तर काल में सृजनात्मक विधाओं में गीतियाँगजलकव्वालीउपन्यासलघुकथाजीवनीआत्मकथायात्रावृत्तहास्यविनोदपुस्तक-समीक्षायें तथा अन्य देशी-विदेशी विधाओं को लेखको ने संस्कृत भाषा में पिरोकर उसकी ग्राह्य क्षमता और समद्धि में वृद्धि की है। छन्दों में वार्णिक से मात्रिक तक तथा दोहाचौपाईसवैयाकवित्त से लेकर दंडकअश्वघाटी तक की रचना हो रही है। गजलें और गीतियाँ भी इसी क्रम में है। छन्दोमुक्त नव्यकाव्य की रचना के प्रति संस्कृत-लेखकों का झुकाव और हाइकू जैसी जापानी व प्रयोगात्मक कवितायें भी संस्कृत साहित्य की समृद्ध परम्परा में जुड़ रही है। व्यंग्य-लेख ललित-निबन्ध आदि नवीन विधाओं में लेखन पत्र-पत्रिकाओं के आवश्यक अंग है। मीडिया की विधाओं से प्रेरित संस्कृत-साहित्य में नाटकों के संकलन संस्कृत-नाट्यमंजरीपूर्व-शाकुन्तलम् आदि का प्रकाशन भी हुआ है। संस्कृत-धारावाहिकों के प्रसारण भी दूरदर्शन पर हुये। चीन देश की गायिका संस्कृत की प्रथम पाॅप गायिका है।

जगद्यात्रा

संस्कृत के प्रचार प्रसार के लिए जन जागरुकता अभियान चलाने की आवश्यकता है। यह इसलिए के कक्षा 6 से 8 तक पढ़ने के बाद छात्र/छात्राओं को अगली कक्षाओं में संस्कृत पढ़ने की प्रेरणा देने वाला कोई नहीं होता। समाज में संस्कृत के प्रति अच्छी धारणा पैदा किये जाने पर ही इसके विकास की कल्पना की जा सकती है। अभी संस्कृत शिक्षा की पैरवी करने वाले सामाजिकों का अभाव है। जब तक जनमानस में संस्कृत की स्वीकार्यता पर्याप्त मात्रा में नही बढ़ायी जाती सांस्थानिक स्तर पर सभासंगोष्ठी करने का कोई खास लाभ नहीं मिलने वाला। पुनि-पुनि चन्दन की कहावत वाले कार्यक्रमों में वही गिने-चुने वक्ता और श्रोता होते हैजो इस क्षेत्र से जुड़े है।

7 April 2014

चुनाव शुरु संस्कृत गायब। फिर मत कहना संस्कृत जरुरी है। इसे बचाओ।

Shastri Kosalendradas उर्दू 'अंदरसंस्कृत 'पारअबकी बार मोदी सरकार

योगेन्द्रकुमार गौतमः ये हो नही सकता

आचार्य वाचस्पति संस्कृत-भाषा रही पुकार,

घोषणा-पत्र में मिली न धार,

गौरव- थाती की बातें बेकार,

संस्कृत बिना न होगा उद्धार,

आन्दोलन करने को हो जाओ तैय्यार,

अबकी बारी मोदी सरकार !!!

डॉ. अरविन्द कुमार तिवारी किमिदं यथार्थंबहुभि: यदुक्तं कृतं तत्राजनीतौ सर्वं मतावाप्तये घोष्यते। अत: मा चिन्तयन्तु। संस्कृतज्ञा: करिष्यन्ति रक्षां संस्कृतस्य न नेतार:।

Pramodavardhana Kaundinnyayana सँस्कृतं विना का शिक्षा?

अवशिष्टा भवति दासतैव।

दासत्वमुक्तये आवश्यिका राजसत्तैव॥

7 April 2014

स्थान परिचयः-

चित्रकूट के महत्व का गुणगान आदि-कवि वाल्मीकिपुराणों के रचयिता महर्षि व्यासमहाकवि कालिदाससंस्कृत नाटककार भवभूतिसंतकवि तुलसीमुसलमान कवि रहीम ने मुक्त कण्ठ से किया है। मानवीय सृष्टि-सरणि में अवतारी पुरुष भगवान राम ने जिस स्थान को अपना निवास स्थान चुना हो और जिसकी प्रशंसा के भाव भरे गीत गायें हों उसके प्रभाव तथा माहात्म्य के बारे में कुछ कहना अशेष रह जाता है।

3 April 2014

विगत दिनों जम्मू एवं हिमाचल के अनेक शक्तिपीठ गया था। उनके बारे में कोई भी पौराणिक श्लोक कहीं लिखा नहीं मिला,जिससे ज्ञात हो सके कि यह कोई तीर्थ स्थल है।

28 March 2014

स्मृति ग्रन्थों में कुछ विषयों के प्रतिपादन में भिन्नतायें प्रतीत होती हैं। मनुस्मृति तथा याज्ञवलक्य स्मृति में आचारव्यवहारप्रायश्चित्त तीनों ही विषयों का समावेश किया गया है जबकि नारद स्मृति मूलतः व्यवहार प्रधान है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में मनुष्य के नैतिक मूल्यों का ह्रास हो रहा है ऐसे समय में स्मृतियां अत्यधिक सहायक सिद्ध होती है जहां गुरु-शिष्यपिता-पुत्रभाई-बहन आदि सम्बन्धों में पूजनत्व की भावना छिपी हुई है।

वर्तमान समय में गुरु-शिष्य के सम्बन्धों में नैकट्य तथा समर्पण की भावना समाप्त हो गई है। गुरु केवल अर्थोपार्जन के लिए पढ़ाता है तथा शिष्य केवल अर्थोपार्जन के लिए शिक्षा ग्रहण करता है अर्थात् अर्थोपार्जन जीवन का उद्देश्य बन गया है। ऐसा नहीं है कि प्राचीन समय में अर्थोपार्जन नहीं किया जाता था। वह जीवन का एक अभिन्न अंग थाकिन्तु धर्म को नहीं छोड़ा जा सकता था। स्मृतियों में इन सम्बन्धों में भी ‘‘गुरु देवो महेश्वराय’’ की भावना प्रबल थी जो आज क्षीण हो गई है।

20 March 2014

आचार्य वंशी दास जी.मानवता के प्रतिमान।इनके लिए सारे विशेषण कम हैं। मैं इनसे मिलकर धन्य हो गया। यहाँ वाचाल जीव सहज शान्त हो जाता है। जालन्धर के दाना मंडी,हनुमान मंदिर में इस परम सिद्ध संत की कुटी है। जीवन में एक बार इनका दर्शन अवश्य करें।

7 March 2014

मैंने संस्कृत रचनाओं का दो विभाग किया है। 1. आम जन के लिए की गयी रचनाएं श्लोकबद्ध 2. बुद्विजीवियों के लिए उपयोगी रचनाएं गद्य युक्त। ये परवर्ती काल में भी शास्त्रीय ग्रन्थ और उस पर भाष्यटीका परम्परा गद्य रुप में ही पातें है यथा ब्रहम्सूत्रउपनिषद् के भाष्य।

इसके पीछे श्रुति परम्परा महत्वपूर्ण कारक रहा है। लयात्मक (छन्दोबद्ध) रचना को याद रखना सहज होता है। स्मृति संरक्षण हेतु आम जन के योग्य ग्रन्थ के श्लोकबद्ध करने की परम्परा चल पड़ी। जबकि गद्य युक्त ग्रन्थ सन्दर्भ प्रधान होते थे उच्च श्रेणी के श्रेष्ठ विद्वानों के बीच चर्चा किये जाने वाले इन शास्त्रों को कण्ठस्थ करना उतना आवश्यक नहीं था।

7 March 2014

पुस्तकों का संसार मुझे अत्यन्त रोमांचित करते रहा है। बचपन से ही पुस्तकों को पढ़ना और उसे संग्रह करना मेरी दिनचर्या थी। कोई भी पुस्तक मिल जाये उसे जल्द से जल्द पढ़ने को मैं उतावला हो उठता हूँ।

अपने अतीत के अनुभव से मैं यह कह सकता हँू कि उच्च शिक्षा में प्रवेशार्थी छात्रों को पुस्तकालय के उपयोग की शिक्षा दी जानी चाहिए।

26 February 2014

विद्वान् और पुस्तक में श्रेष्ठ कौन?

लगभग 12 वर्ष बीत गये। अब मै सोचता हूँ। पुस्तक बड़ा या विद्वान्। निश्चय हीं पुस्तक की अपेक्षा ज्ञान की जीवित प्रतिमूर्ति बड़ा है। पुस्तकीय ज्ञान को आत्मसात किया विद्वान् उसमें व्यक्त विचारों की व्याख्या कर सकता है। भाष्य कर विस्तृत फलक उपलब्ध कराता है। उससे तर्क पूर्ण ढ़ग से सहमत या असहमत हो सकता है। तद्रुप अनेक ग्रंथो का सार संकलन कर समयानुकूल प्रस्तुत का सकता है।

अब तो मैं यह भी मानने लगा हूँ कि वह विद्वान् उस विद्वान से कहीं ज्यादा श्रेष्ठ है जोे अपने ज्ञान को केवल पुस्तकाकार कर ही नहीं छोड़ा अपितु उसके संवाहकों की एक जीवित वंश परम्परा स्थागित किया हो।

12 February 2014

सामाजिक एवं राष्ट्रीय उत्थान में संस्कृत की भूमिका-

एक बच्चा रोजगार को दृष्टि में रखते हुए रोजगार परक भाषा एवं विद्या पढ़ता है। अभिभावक उसे समाज से दूर किसी ऐसे विद्यालय में उसे पढ़ने भेजते हैं जहाँ वह रोजगार परक भाषा एवं शिक्षा प्राप्त करने में सफल होता है।

बच्चा संस्कृत नहीं पढ़ता। संस्कृत न पढ़ने से उसमें सामाजिक सदाचारनैतिकताअपने देश के सांस्कृतिक विरासत से अछूता रह जाता है। माँ-पिता सिर्फ धन देकर पढ़ने में सुविधा प्रदान करने वाले तक रह जाते हैं। बच्चा विदेश जाता है वहीं का निवासी हो जाता है। माँ-पिता द्वारा किया गया खर्च वह लौटाता है। ऐसा बच्चा न तो अपने देश न ही अपने समाज के लिए कुछ कर पाता है। अतः यह आवश्यक है कि मानव के संतुलित विकास के लिए संस्कृत की शिक्षा जरुर दी जाए।

5 February 2014

एक यक्ष प्रश्न संस्कृत का उद्धारक सरकार या प्रेरक समूह

यह तय है कि संस्कृत मूल धारा में न होकर भी समाज का उपकारक शास्त्र बना रहेगा। जिस गति से इस भाषा को चाहने वालें की संख्या घटती जा रही है सम्भव है कुछ दिनों बाद इसके उद्वारक तो दूर प्रशंसको को ढूढ़ना भी मुश्किल होगा।

31 January 2014

हम इस पचड़े में नही पड़ते कि गुप्त प्रेम के इस रोचक ग्रन्थ का कश्मीर या दक्षिण भारत पाठ के अतिरिक्त और कितने पाठ हैं। कितनी टीका है। कवि को मृत्युदण्ड दिया गया या राजकुमार सुन्दर के मृत्युक्षण का उल्लेख इसमें किया गया। वह प्रक्षिप्त है या नहीं। इसके बारे में विशद वर्णन अनेक ग्रन्थों में प्रकाशित है। मुझे तो बस इसमें अधिक रुचि और आनन्द है कि एक राजकुमारी के साथ गुप्त प्रेम कितना सरस होता है। जब कवि अपने गुप्त मिलन के आनन्द को अंतिम बार स्मरण किया तो कैसेकितना वह मार्मिक स्मरण था कि राजा भी प्रभावित हुए विना नहीं रहा।

30 January 2014

प्रेमाकुलविरही युवक युवतियों को तो इसे पढ़कर ऐसा लगता हैजैसे उसके ही भिन्न-भिन्न मनोदशाओं का वर्णन यहाँ किया गया है। पुस्तक की विधारचनाकर के बारे में तो छपी पुस्तकें उपलब्ध है ही अतः मैं भावरससौन्दर्यबोधनायिका भेद आदि का वर्णन यहां नहीं करना चाहता। बस इतना ही कहना चाहूँगा। आप यदि कामशास्त्रीय यथा किसी रूपसी (नव यौवना) का वर्णनप्रेम सम्बन्ध के प्रायोगिक स्वरूप (सुरत व्यापार) आलिंगन (बांहो में भरने) कामभाव के मुक्त मनोहारी आनन्द का ज्ञान चाहते है तो जरूर पढ़े चौरपंचाशिका ।

6 January 2014

मेरा यह मानना है कि केवल लेखन कर्म से ही संस्कृत की सेवा नहीं होती वरन् संस्कृत शिक्षा अध्ययन को प्रेरित करने वालेसंस्कृत छात्रों व विद्वानों को संरक्षरण देने वालेसंस्कृत के विकास हेतु जनान्दोलन चलाने वालेसंस्कृत के लिए संघटनात्मक ढ़ांचा निर्मित करने वालेमुद्रकडिजाइनरसंस्कृत गीत को ध्वनि देने वालेडाक्युमेंन्ट्री फिल्म निर्मित करने वालेइलेक्ट्रानिक संसाधनों द्वारा संस्कृत प्रचार करने सहित तमाम वे लोग भी संस्कृत सेवी हैजो निस्वार्थ भाव से संस्कृत को व्रत समझकर इसे पल्लवित एवं पुष्पित कर रहे है।


दसेक बुद्धिजीवी संस्कृतज्ञ काव्य रचनाटीका परम्परानिरर्थक बौद्धिक व्याख्यान देकर इस भ्रम में रह रहे हैं कि इससे संस्कृत पल्लवित एवं पुष्पित हो रहा है। मैं इससे असहमत हूँ। आखिर ये सब किसके लिएआपको कौन सुनेगाकौन पढ़ेगा?


किसके लिए संस्कृत शिक्षा एवं पुरस्कार

शिक्षा व्यक्ति के सर्वांगीन विकास हेतु प्रदान किया जाता है। संस्कृत शिक्षा द्वारा आज के परिवेश के अनुरुप व्यक्ति का सर्वांगीन विकास नहीं करता। पुनश्च आज की शिक्षा उत्पादक शिक्षा हो गयी है। प्राचीन अवधाराणाओं के विपरीत यह रोजगार उपलब्ध कराने का एक जरिया है।


काम करना और उसमे डूब जाना मेरी आदत में शुमार है। महोत्सव का नाम सुनते ही मेरे रगों मे उत्तेजना फेल जाती है। पूरी योजना मेरे सामने तैरने लगती है और मैं जुट पड़ता हूँ उसे पूरे करने में।

अखिल भारतीय व्यास महोत्सव संस्कृत जगत् के लिए एक महत्वपूर्ण पर्व के रुप में प्रतिष्ठित हो इस अभिलाषा के साथ मैं गत वर्ष कार्य में जुटा। लक्ष्य था महोत्सव में सभी संस्कृत सेवियों एवं संस्कृत प्रेमियों को इस अवसर पर आमंत्रण भेजना।


भारतीय साहित्यखासकर संस्कृत साहित्य का स्वर्णयुग एक हजार वर्षों के बाद अकबर के राजत्व में ही परिलक्षित होता है। मध्यकालीन अखण्ड भारत की महान् विभूति ‘रहीम’ संयोग से इसी काल में हो आए हैं।


 मेरा नाम जगदानन्द झा है। सम्प्रति में उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थानलखनऊ में पुस्तकालयाध्यक्ष पद पर कार्यरत हूँ। सौभाग्य से मेरा कार्यक्षेत्ररूचि का क्षेत्रमेरी निष्ठा और क्रियाशील अन्तःकरण संस्कृत के लिए ही है। मुझे इस क्षेत्र में कार्य करने एवं संस्कृत विद्याध्ययन को उत्सुक समुदाय को नेतृत्व प्रदान करने में आनन्द का अनुभव होता है। मैं संस्कृत के क्षेत्र में रोजगार के नूतन क्षेत्र को यदि विकसित कर सकॅू तो अपने को धन्य समझूँगा।

समस्त भारतीय धर्म शाखाओं का उद्भव व्यास रचित ब्रहम सूत्र से हुआ है।

23 October 2013
महर्षि व्यास और व्यास महोत्सव

महर्षि व्यास ने जहां एक ओर वैदिक साहित्य का विस्तार किया वहीं पुराणमहाभारतव्यास स्मृति एवं ब्रहमसूत्र की रचना कर लौकिक साहित्य का भी प्रणयन किया। आज महर्षि व्यास के नाम पर जितना विपुल साहित्य उपलब्ध होता है उतना अनेको लेखकों के द्वारा मिलकर भी लिखा जाना असम्भव है। वेदों के चतुर्धा विभाग के पश्चात इसकी अनेक शाखाएं उदभूत हुर्इजिसका श्रेय भी महर्षि व्यास को जाता है। महाभारत समस्त विधाओं का आकार ग्रन्थ है। महाभारत काल से अब तक इसकी कथाओं का आश्रय लेकर सहस्रों ग्रन्थ लिखे जा चुके हैं। महर्षि व्यास रचनाकारों के लिये युग-युग तक प्रेरणा श्रोत बने रहेगें। रामधारी सिंह दिनकर के प्रेरणा श्रोत भी महर्षि व्यास ही हैंव्यास की अमर कथा को हिन्दी में काव्य रूप देने के कारण इन्हें राष्ट्रकवि की पदवी प्राप्त हुई। भारतीय धर्म शाखाओं के उद्भव का मूलाधार ब्रहमसूत्र है। गीता महाभारत का ही एक अंश है। इन ग्रन्थों के कारण भारतीय दार्शनिक चिन्तन परम्परा को एक उर्वरा भूमि प्राप्त हुई। महर्षि व्यास का संस्कृत साहित्य के विस्तार में महनीय अवदान है। व्यास के साहित्य को समाजिक एवं धार्मिक स्वीकृति प्राप्त हैपौराणिकों ने व्यास कथा के माध्यम से उनके कथानकोंसदुपदेशों को दिगिदगंतर तक विस्तार दिया लोक नायकों ने वर्षों से उन्हें समाज में समादर दिलाया है। व्यास साहित्य के आधार पर कला जगत के लोग अपनी-अपनी कल्पना के माध्यम से कलालोक का सृजन करते है। लोक गायकोंलोक कलाकारों में उनक चरित्रों को समाज में प्रचार और प्रसार किया है। सम्पूर्ण कला जगत व्यास साहित्य से ओत प्रोत है। वस्तुत: भारत का प्रत्येक जनप्रत्येक समाज और प्रत्येक सभ्यता व्यास साहित्य का अनुगमन करते दिखायी देता है। व्यास महोत्सव के माध्यम से व्यास साहित्य पर नित्य नूतन किये जा रहे गवेषणाओं नाटयगीतदृश्य कला को आम जन के सम्मुख लाने एवं उसे उचित पहचान दिलाने हेतु इसका आयोजन किया जाता है।

व्यास प्रणीत पुराणों के आधार पर राजाओं की वंशावली ज्ञात हो सकी। महर्षि व्यास का कालखाण्ड अत्यन्त गौरवपूर्ण रहा हैलगभग उसी समय से हमें भारत का क्रमिक इतिहास भी प्राप्त होता है। तब से आज तक एक लम्बी टीका एवं भाष्य परम्परा चली आ रही है। देश और विदेश के शोधार्थी व्यास की रचनाओं पर अपनी मौलिक प्रतिभा द्वारा अनेक रहस्यों से पर्दा उठा रहे है। शोध एवं विश्लेषण के लिये आधारभूत पुस्तकों की आवश्यकता होती है। हमने व्यास के प्रति अपना आदर प्रकट करने के लिए तथा भारतीय विधा की सर्व सुलभता के लिए देश के विविध ग्रन्थागारों में उपलब्ध व्यास साहित्य के ग्रन्थों की संक्षिप्त सूचना आप सुलभ करने का एक उपक्रम इस लेख में लिखने का लघुतम प्रयास किया है।

10 October 2013

महर्षि व्यास भारतीय दर्शन की चिन्तन धारा के मूल स्त्रोत हैं।

समस्त भारतीय धर्म शाखाओं का उद्भव व्यास रचित ब्रहम सूत्र से हुआ है।

देश ही नहीं अपितु विश्व के अनेक देशों के विश्वविद्यालयों में व्यास प्रणीत दर्शन शास्त्र का अध्ययन अध्यापन होता है।

भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों के इतर अन्य धार्मिक संस्थाओं में भी अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुरूप व्यास वाडमय का अध्यययन शोध एवं प्रकाशन आदि अनेक भाषाओं में किया जाता है।

22 September 2013 

इन्दौर से बाम्बे हाईवे रोड पर स्थित धामनोद से दक्षिण खलघाट के समीप ३ किमी पश्चिम श्रीनर्मदा के रामशय्या घाट की नर्मदा जी का दृश्य। यहाँ एक प्राचीन शिव मंदिर तथा हनुमान जी का मंदिर है , शिव मंदिर के नीचे गुफा है जिसका द्वार बंद कर दिया गया है और हनुमानजी ५००० वर्ष पुराने तथा दक्षिणाभिमुखी हैं | मगरमच्छ के आकार की दिखने वाली शिला त्रिपदा गायत्रीभगवान् रामलक्ष्मण एवं माँ जानकी की अति प्राचीन प्रतिमा थी , जो डूब क्षेत्र में आने के कारण वहां से खुदवाकर हटा दी गयी |

इससे लगता है कि यहाँ गायत्री और श्रीराम के उपासकों ने अवश्य ही साधना की होगी | यहाँ से ओंकारेश्वर ऐसा मनोरम दृश्य कहीं नहीं दिखतायहाँ जल की मात्रा और बहाव स्नान की दृष्टि से अत्युत्तम है | कीचड़ नाम मात्र नही |पहले इसे राम शय्या घाट कहते थे किन्तु अब लोग राम छज्जा घाट कहते हैं | पंचवटी जाते समय भगवान श्रीराम ने इस स्थान पर ३ दिन निवास किया था | इसलिए इसका नाम रामशय्या घाट (रामछज्जा घाट) पडा ।

31 August 2013

बाजार के प्रवाह को और तेज कर सकती है संस्कृत भाषा 
उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान लखनऊ और जुहारी देवी गर्ल्स पीजी कॉलेज के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक 30-8-2013शुक्रवार को संस्कृत सप्ताह समारोह आयोजित हुआ। कार्यक्रम का उद्घाटन संयोजक डॉ. रेखा शुक्ला. विशिष्ट अतिथि कॉलेज प्रबंधतंत्र सचिव सी के अरोड़ासभाध्यक्ष विजय लक्ष्मी त्रिवेदी और प्राचार्या बेबी रानी अग्रवाल ने किया।

उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थानलखनऊ से आये श्री जगदानन्द झा ने कहा कि सूचना-प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में संस्कृत भाषा की उपयोगिता जग जाहिर है। आज अनेकों विश्वविद्यालयों में कम्प्यूटर में संस्कृत भाषा के अनुप्रयोग तथा उसके द्वारा अनुवाद सम्पादन जैसे पाठयक्रम लाये गये हैं। प्रबन्धन के तमाम क्षेत्र में संस्कृत ग्रन्थ सहायक सिद्ध हो रहे है। सम्भ्रान्त वर्ग में प्रचलित इस भाषा का द्वार सामान्य जनों के लिए खोला जा रहा है। यही संस्कृत भाषा बाजार के प्रवाह को और तेज कर सकता है। यही भाषा भविष्य की तकनीकी है। अब संस्कृत साहित्य में लेखन एकदा और कश्मिंशिचद् से शुरू नहीं होते वरन् समसामयिक ज्वलंत विषयों पर सटीक वर्णन किया जाता है। इसका साहित्य व्यवस्था परिवर्तन का माद्दा भी रखता है।

27 August 2013

Rajkumar Mishra

वाग्देव्याश्च समर्चकः प्रतिपलं ज्ञानप्रसारे रतः

सल्लापेन मनो हरन् च सुखयन् वाण्या जगन्मानवान् ।

नाम्ना योऽस्ति गुणैर्युतो हि जगदानन्दः सुखैकस्थलः

रक्षाबन्धनपर्वणि सतनयः सोऽयं स्थितो दृश्यते ।।

1 August 2013

संस्कृत विद्यालयों में सूचना का अधिकार अधिनियम पढाया जाना चाहिए तथा इसके प्रयोग की विधि सिखाना चाहिए।

जागो संस्कृतज्ञ जागे संस्कृत।

16 July 2013

क्या वर्तमान स्थिति में संस्कृतज्ञ कहीं भाषाई अल्पसंख्यक हैं ?

भाषाई अल्पसंख्यकों के आयुक्त डा नंदलाल जोतवानी ने भाषाई अल्पसंख्यकों के आयुक्त की 48वीं रिपोर्ट अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री सलमान खुर्शीद को पर्यावरण भवन में 27 जुलाई 2012 को प्रस्तुत की. इसके बाद रिपोर्ट को भारत के राष्ट्रपति को प्रस्तुत किया जाना है जिसके बाद रिपोर्ट को संसद के दोनों सदनों के पटल पर रखा जाना है.

48वीं रिपोर्ट में जुलाई 2010 से जून 2011 की अवधि को शामिल किया गया है और इसमें देश के सभी राज्यों तथा केंद्र शासित प्रदेशों में भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए संरक्षण की योजनाओं को लागू करने की स्थिति की गहन समीक्षा की गयी है. इसके साथ साथ राज्य सरकारों/केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनों/केंद्रीय मंत्रालयों से प्राप्त 47वीं रिपोर्ट पर की गयी कार्यवाही रिपोर्ट की भी समीक्षा की गयी।

विदित हो कि भाषाई अल्पसंख्यक आयुक्त का पद संवैधानिक होता है. इनकी नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 350-बी के तहत की जाती है उसे भाषाई अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए संवै‍धानिक तथा राष्ट्रीय स्तर पर सहमत सभी मामलों की जांच करने की शक्तियां प्रदान की गयी है।

भाषाई अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की योजनाओं में प्रमुख रूप से निम्नलिखित बिंदुओं को शामिल किया गया.

• शिक्षा के प्राथमिक स्तर पर मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देना।

• शिक्षा के माध्यमिक स्तर पर अल्पसंख्यक भाषाओं की शिक्षा देना।

• अल्पसंख्यकों की भाषा के अध्यापकों तथा पाठ्यपुस्तकों का प्रावधान।

• जिले/तहसील की जनसंख्या में 15 प्रतिशत या इससे अधिक बोलने वाले अल्पसंख्यकों की भाषाओं में नियमोंविनियमों तथा नोटिसों आदि को अनुवादित तथा प्रकाशित करवाना।

• जिले की जनसंख्या में 60 प्रतिशत या इससे अधिक बोलने वालों की दशा में अल्पसंख्यकों की भाषाओं में शिकायतों की प्राप्तिइनका निदान तथा उनका उत्तर देना।

• राज्य की सेवाओं में भर्ती परीक्षाओं में अल्पसंख्यकों की भाषाओं का प्रयोग करना।

• राज्य तथा जिले के स्तंर पर भाषाई अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए उपयुक्त मशीनरी का गठन करना।

• भाषाई अल्पसंख्यकों के लिए उपलब्ध सुरक्षा के बारे में अल्पसंख्यकों की भाषा में सामग्री प्रकाशित कराना।

डॉ॰घनश्याम भट्ट संस्कृत के सन्दर्भ में तो यह देखना पड़ेगा कि भाषा की उपयोगिता मानक है या व्यापक व्यावहारिक उपयोगिता .यदि उपयोगिता मात्र है तो फिर भारत सहित अनेक राष्ट्रों में हिंदू जनता बहुवचनीयता के साथ रहती है और हिंदुओं के समस्त कार्य जन्म से लेकर मृत्यु के बाद तक संस्कृत भाषा के बिना सिद्ध नहीं होते हैं,किन्तु ये धार्मिक मान्यता और आस्थाओं तक ही सीमित है .हमारे दैनिक जीवन के समस्त क्रियाकलापों में संस्कृत मौन रहती है .कुछ प्रयास संस्कृत प्रेमी और संस्कृत भारती के द्वारा किया जाता है पर उसमें भी कृत्रिमता दिखती है .समाज के व्यावहारिक दृष्टिकोण को यदि निष्पक्ष रूप से टटोला जाय तो संस्कृत निश्चित ही अल्पसंख्यक प्रतीत होती है.यदि हिंदू संस्कृति के दृष्टिकोण से देखा जाय तो बहुसंख्यक .



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